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Government of Karnataka
Karnataka Secondary Education Examination Board
Question Paper
ANSWER KEY
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Karnataka School Examination and Assessment Board
ಕರ್ನಾಟಕ ಶನಲನ ಪರೀಕ್ಷೆ ಮತ್ತು ಮೌಲ್ಯನಿರ್ಾಯ ಮಂಡಲಿ
II PUC EXAM -1, MARCH 2025
ದ್ವಿತೀಯ ಪಿಯತಸಿ ಪರೀಕ್ಷೆ -1, ªÀiÁZÀð: 2025
SUBJECT: HINDI MODEL ANSWERS SUBJECT CODE: 03
ವಿಷಯ: ಹಂದ್ವ ಮನದರ ಉತ್ುರಗಳು ವಿಷಯ ಸಂಕೆೀತ್:03
QN. No. खण्ड-‘क’ Marks
I अ)
1 iv) आठ महीने 1
2 i) पड़ोस कल्चर 1
3 iii) कार्वेरी 1
4 iv) फकला 1
5 ii) मां के मातत्ृ र्व को 1
6 iii) राजस्थान 1
7 i) उपेंद्रनाथ अश्क़ 1
8 iv) िस र्वषम 1
9 ii) राजेंद्र यािर्व 1
10 iii) सजान भगत 1
आ)
11 मेहनत 1
12 नारा 1
13 फलकाररयााँ 1
14 कार्वेरी 1
15 सेर्वा 1
इ)
16 a) आंख रखना ii) ननगरानी करना 1
b) मंह फेरना i) उपेक्षा करना 1
c) टोपी उछालना v)अपमाननत करना 1
d) फूले न समाना iii) बहत प्रसन्न होना 1
e) दिन फफरना vi) भाग्य पलटना 1
II. अ) खंड-‘ख’
17. गंगा मैया से साक्षात्कार पाठ के लेखक डॉ.बरसानेलाल चतर्वेिी हैं । इसमें लेखक ने 3
उत्तर
समाज में फैली हई वर्ववर्वध समस्याएं जैसे समाज में प्रिष
ू ण, चररत्र का संकट, सेर्वा
के नाम पर मेर्वा खाना, धमम का व्यापाररकण, महंगाई, ररश्र्वतखोरी और पाश्श्र्वकता
बढती चली जा रही है। सभी र्वैभर्व और मान, सम्मान के ललए लड़ रहे हैं। पश -
पक्षी भी मनष्य के इन ककमों पर हंस रहे हैं। इस प्रकार लेखक ने समाज की
वर्ववर्वध समस्याओं पर प्रकाश डाला है।
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18. भारतरत्न वर्वश्र्वेश्र्वरय्या पाठ के लेखक डॉ. बालशौरी रे ड्डी हैं l वर्वश्र्वेश्र्वरय्या बाल्य काल से 3
उत्तर
ही एक अच्छे व्यश्तत थे l र्वे समय के बड़े पाबंि थे lर्वे हमेशा ज्यािा मेहनत करते थे l र्वे एक
कममयोगी थे l र्वे अपने जीर्वन में हमेशा समय का सिपयोग करते थे l उनका वर्वश्र्वास था फक
श्जस दिन हम अपने आलसीपन को त्याग िें गे उसी दिन हमारे िे श का वर्वकास होगा l सेर्वा
को पवर्वत्र आचरण मानते थे l उनका चररत्र समाज के ललए आिशम पूणम था l र्वे वर्वनयशील
तथा साध प्रकृनत के परुष थे l र्वह िे श की उन्ननत तथा वर्वकास का सपना िेखकर उन्हें साकार
करने में लगे रहते l
19. चीफ की िार्वत कहानी के लेखक डॉ. भीष्म साहनी है l लमस्टर श्यामनाथ के घर चीफ़ की 3
उत्तर
िार्वत थी l मख्य अनतथथ के रूप में चीफ घर आने र्वाले थे l श्जसके कारण शामनाथ और
उनकी धमम पत्नी, मां को लेकर बहत थचंनतत थी l रात आठ बजे पाटी का आयोजन फकया
गया था l इस पाटी में मां कहीं बाधा न ठहरे इस उद्िे श्य से र्वे उन्हें अपनी सहे ली या पड़ोस के
घर भेजना चाहते थे l मां पराने वर्वचार और परं परा के साथ रहने र्वाली थी l पनत और पत्नी
िोनों भी मां के वर्वषय को लेकर बहत थचंनतत थे l
20. यात्रा जापान की, यात्रा र्वत
ृ ांत की लेखखका ममता काललया है। इसमें लेखखका ने जापान 3
के टोतयो वर्वश्र्ववर्वद्यालय में संपन्न वर्वश्र्व दहंिी सम्मेलन के िौरान लमले अनभर्व एर्वं
प्रसंग को लेखखका ने रोचक ढं ग से अलभव्यतत फकया है। लशन्कानसेन का शाश्दिक
अथम है- न्यू ट्रं क लाइन। इसे बलेट ट्रे न भी कहते हैं। यह जापान की सबसे तेज गनत
से िौड़ने र्वाली रे ल है। इसमें 16 डडदबे हैं। हर गाड़ी में 1300 यात्रत्रयों के बैठने का
प्रबंध है।1300 फीट लंबी इस रे ल में 40 मोटर जनरे टर लगे होते हैं। 170 फकलोमीटर
प्रनत घंटे की रफ्तार से चलती है। इसे रुकने के ललए 5 फकलोमीटर की गंजाइश
चादहए। इतनी इसकी तीव्र गनत है। जापान के ननर्वासी इस रे ल से यात्रा करना एक
मौललक अनभर्व मानते हैं।
आ)
21. पाठ का नाम : सजान भगत
उत्तर
लेखक: प्रेमचंि 1
संिभम: लेखक ने सजान के व्यश्ततत्र्व का र्वणमन करते समय कहा है।
स्पष्टीकरण : सजान के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई थी । र्वह बहत दिनों से घर का
स्र्वामी था । अभी भी ऐसा ही समझता रहा । लेफकन श्स्थनत में फकतना उलट फेर हो गया था,
इसकी उसे खबर नहीं थी। बेटे उसका सम्मान करते थे। यह बात उसे भ्रम में डाले हए थी ।
2
लड़के उसके सामने थचलम नहीं पीते । खाट पर नहीं बैठते । यह केर्वल श्रद्धा थी, उसके
स्र्वालमत्र्व का प्रमाण नहीं। र्वह इस घर पर अपने होते हए िस
ू रों का अथधकार नहीं िे ख सकता।
इस संिभम में लेखक ने उपयमतत र्वातय का प्रयोग फकया है।
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22. आत्मकथा का नाम : एक कहानी यह भी
उत्तर 1
लेखखका : मन्नू भंडारी
संिभम : अपने व्यश्ततत्र्व पर वपता का प्रभार्व कैसे रहा और र्वह बचपन में कैसे
दिखती थी इसका वर्वर्वरण िे ते समय लेखखका कहती है।
स्पष्टीकरण : लेखखका यह बताना चाहती है फक उनके व्यश्ततत्र्व पर कौन सी खूबी
और खालमयां गंथी हई हैं । अनजाने-अनचाहे फकए वपता के व्यर्वहार ने लेखखका के
भीतर अनेक ग्रंथथयां को जन्म दिया था। उनमें से एक यह भी थी । वपताजी की 2
गोरा रं ग कमजोरी थी । बचपन में मझसे िो साल बड़ी, खूब गोरी, स्र्वस्थ और
हंसमख बहन सशीला से हर वर्वषय में र्वह तलना करते थे । उसकी प्रशंसा ने लेखखका
के भीतर ऐसे गहरे हीन भार्व की ग्रंथथ पैिा की थी फक मान, सम्मान, प्रनतष्ठा पाने
के बार्वजूि भी उबर नहीं पाई ।
कहानी का नाम : भोलाराम का जीर्व
23. उत्तर
लेखक : हररशंकर परसाई 1
संिभम : थचत्रगप्त ने नारि से कहा है।
स्पष्टीकरण : धममराज एक बड़ी वर्वकट उलझन में थे । भोलाराम नाम का व्यश्तत पांच दिन
पहले मर चका है। उसके जीर्व को लेकर ित
ू यहां आ रहा था। लेफकन उस जीर्व ने ित
ू को 2
चकमा दिया। ित
ू ने सारा ब्रहमांड छान डाला, पर र्वह कहीं नहीं लमला । नारि पूछते हैं फक
तया उस पर इनकम टै तस का कोई बकाया था, हो सकता है उन्होंने उसे रोक ललया हो । इसी
बीच नारि मनन से थचत्रगप्त उपयमतत र्वातय को कहते हैं।
24. ननबंध का नाम : कतमव्य और सत्यता
ननबंधकार: डॉ. श्यामसंिर िास
उत्तर 1
संिभम : सत्य के महत्र्व को बताते समय ननबंधकार पाठकों से कहते हैं।
स्पष्टीकरण : कतमव्य और सत्यता के बीच घननष्ठ संबध
ं है । हम सब लोगों का यह परम धमम
है फक सत्य बोलने को सबसे श्रेष्ठ माने । कभी झूठ ना बोले । चाहे उससे हमें फकतनी ही हनी
तयों ना हो, तयोंफक सच्चे को सब कोई चाहते हैं । झूठे से सभी घण
ृ ा करते हैं । इसललए लेखक 2
कहते हैं फक सत्य बोलने से ही समाज में हमारा सम्मान हो सकेगा और हम आनंिपूर्वमक अपना
समय त्रबता सकेंगे।
III. अ)
25. सरू िास के पि इस मध्यकालीन कवर्वता के कवर्व सरू िास हैं । गोपीकाएं उद्धर्व को िे खकर 3
उत्तर अपने आपको भाग्यशालानी समझती हैं। तयोंफक उद्धर्व की आंखों में उन्होंने श्री कृष्ण के
िशमन फकए हैं । जैसे भ्रमर के वप्रय समन की सगंध को हर्वा ले जाती है र्वैसे ही उद्धर्व को
िे खकर उन्हें अत्यथधक आनंि हो रहा है । उद्धर्व श्री कृष्ण का संिेश लेकर गोवपकाओं के पास
आए हैं। इसी कारण गोपीकाएं अपने आप को भाग्यशाललनी समझती है।
26. उत्तर मध्यकालीन कवर्वता रहीम के िोहे कवर्वता के कवर्व रहीम हैं । अहंकार के संबंध में कवर्व कहते
हैं फक ईश्र्वर की भश्तत त्रबना अहंकार के होनी चादहए। तयोंफक जब तक व्यश्तत में अहंकार 3
होगा तब तक र्वह भगर्वान तक नहीं पहंच पाएगा। जब अहंकार छोड़ िें गे, तो ईश्र्वर की कृपा
हो जाएगी । कवर्व कहते हैं फक जहां अहंकार होता है, र्वहां भगर्वान नहीं होते और जहां भगर्वान
होते हैं, र्वहां अहंकार नहीं होता I व्यश्तत को अहंकार त्यागना चादहए।
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आ)
27. आधननक कवर्वता कायर मत बन कवर्वता के कवर्व नरें द्र शमाम है। कवर्व ने मनष्य को कायर न 3
उत्तर
बनने का संिेश दिया है । कवर्व ने कवर्वता में मानर्वता को अथधक महत्र्व दिया है । हमें िष्टों
के सामने कभी आत्मसमपमण नहीं करना चादहए। कवर्व के अनसार यह जीर्वन एक यद्ध
भूलम है। हमें जीर्वन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसललए हमें कायरता
को छोड़कर र्वीरता, साहस, धैयम, ननडरता को अपनाने का संिेश दिया है।
28. आधननक कवर्वता 'एक र्वक्ष
ृ की हत्या' कवर्वता के कवर्व काँ र्वर नारायण है। कवर्व ने र्वक्ष
ृ ों के प्रनत 3
उत्तर
अपनी संर्वेिना जताई है। निी, हर्वा, जंगल की रक्षा के साथ-साथ मानर्वीय भार्वनाओं की
रक्षा करने की बात कवर्व ने प्रकट की है। पयामर्वरण में होनेर्वाली हानी और ननमामण होनेर्वाली
समस्याओं की चचाम की है। र्वक्ष
ृ ों को काटकर जंगल को नष्ट करनेर्वाले स्र्वाथी लोगों से बचाना
है। पयामर्वरण की रक्षा करना हमारी श्जम्मेिारी है ।
29. ‘हो गई है पीर पर्वमत सी’ कवर्वता के कवर्व िष्यंत कमार जी हैं । प्रस्तत गजल ‘साए में धप
ू ’ 3
उत्तर
गजल संग्रह से ली गई है । कवर्व ने िे शर्वालसयों को जागरण का संिेश दिया है । कवर्व के
अनसार समाज में अनेक समस्याओं ने गंभीर रूप धारण कर ललया है । भ्रष्टाचार, बेरोजगारी,
अन्याय, अत्याचार, समाज में बढ़ रहा हैl समाज की यह पीड़ा पर्वमत की तरह बढ़ रही है । इन
समस्याओं का हल करने के ललए दहमालय से श्जस प्रकार गंगा ननकलती है, उसी प्रकार समाज
में क्ांनत होनी चादहए । समाज में बिलार्व, क्ांनत, पररर्वतमन की आर्वश्यकता है । इसललए
हर व्यश्तत को संघषम करना आर्वश्यक है । समाज में फैले भेिभार्व को लमटाना चाहते हैं ।
इ)
30. उत्तर मध्यकाललन कवर्वता-रै िासबानी
कवर्व - रै िास 1
संिभम: कवर्व ने स्र्वयं को पानी, बाती, धागा और िास संबोथधत फकया है और भगर्वान को
चंिन, िीपक, मोती, स्र्वामी के रूप में स्र्वीकार फकया है।
स्पष्टीकरण :- भगर्वान के प्रनत कवर्व ने िास्यभार्व प्रकट फकया है। राम को पूरे समपमण भार्व
से स्र्वीकार फकया है। प्रभजी यदि मोती है तो भतत धागा है, िोनों लमलकर एक संिर हार बन
जाते है। िोनों का लमलन सोने पे सहागा है। कवर्व ने भगर्वान को स्र्वामी कहा है और अपने 2
को उनका िास। इस प्रकार रै िास की भश्तत है।
वर्वशेषताएाँ:-
1)भगर्वान को मोती, स्र्वामी कहा है।
2)स्र्वयं को धागा, िास कहा है।
3) रै िास की भश्तत-भार्वना प्रकट होती है।
अथर्वा
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मध्यकाललन कवर्वता का नाम - त्रबहारी के िोहे कवर्व - त्रबहारी
संिभम:-इसमें कवर्व ने दिखार्वे की भश्तत पर व्यंग्य फकया है और सच्ची भश्तत को महत्त्र्व 1
दिया है।
स्पष्टीकरण :- जपमाला, छापा नतलक धारण करने से कोई प्रयोजन नहीं है। र्वे फकसी काम
के नहीं है। अपररपतर्व मन की बात करे तो र्वह बेकार में नाचता रहता है। सांसाररक सखों
के ललए लालानयत होता है। सच्चे भततों का मन राम की भश्तत में रम जाता है। ढोंगी
भश्तत नहीं होनी चादहए। सच्चे मन से भगर्वान की भश्तत करनी चादहए। 2
वर्वशेषताएाँ:-
1) यह एक िोहा है।
2) भश्तत-भार्वना को प्रकट फकया है।
3) ढोंथगयों पर व्यंग्य फकया है।
31. उत्तर आधननक कवर्वता का नाम - अथधकार
कर्वनयत्री - महािे र्वी र्वमाम 1
संिभम :- प्रकृनत के माध्यम से जीर्वन के महत्र्व को बताया है।
स्पष्टीकरण :- श्जन फूलों को मरझाना नहीं आता, उन्हें मस्कराने का भी हक नहीं है। ऐसे
तारे कभी िीपक नहीं बन सकते, जो बझना नहीं जानते। जो व्यश्तत िुःख नहीं सह सकता,
उसे सख की चाह नहीं रखनी चादहए। सख और िुःख जीर्वन में आते रहते हैं। उनसे मनष्य
2
को वर्वचललत नहीं होना चादहए।
वर्वशेषताएाँ :
1 जीर्वन के प्रनत गहरी आस्था प्रकट की है।
2 प्रकृनत के अनके त्रबम्बों का प्रयोग फकया है।
अथर्वा
आधननक कवर्वता का नाम - भारत की धरती
कवर्व - डॉ. पण्यमचंि मानर्व 1
संिभम: कवर्व ने उत्तर भारत के तीथम स्थलों और महान परुषों का गणगान फकया है।
स्पष्टीकरण :- उत्तर भारत के प्रलसद्ध राज्य उत्तर प्रिे श जाते हैं, तो अनेक प्रलसद्ध स्थलो
को िे ख सकते है। काशी, प्रयाग, हररद्र्वार इसी राज्य में हैं। दहंिी सादहत्य के प्रलसद्ध कवर्व
मललक महमि जायसी, कबीरिास, तलसीिास की र्वाणी को सन सकते हैं। दहंिओं के पवर्वत्र
2
स्थल बद्रीनाथ, केिारनाथ इसी राज्य में है। माखन का भोग लगानेर्वाले श्रीकृष्ण का जन्म
भी इसी भम
ू ी पर हआ है।
वर्वशेषताएाँ :
1 उत्तर प्रिे श राज्य का र्वणमन है।
2 तीथमस्थलो का र्वणमन है।
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IV. अ) खण्ड ‘ग’
32. i) सूखी डाली एकांकी के लेखक उपेंद्रनाथ अश्क है। इसमें सश्म्मललत पररर्वार का थचत्रण
उत्तर
है। यह सश्म्मललत पररर्वार एक वर्वशाल र्वट-र्वक्ष
ृ की हरी-भरी डाली के समान है। इसमें 5
मूलराज के पररर्वार का र्वणमन है। मूलराज के पररर्वार के मखखया िािाजी है। इनकी उम्र 72
र्वषम है। इनका बड़ा बेटा सन 1914 ई. के प्रथम महायद्ध में सरकार की और से लड़ते-लड़ते
काम आया था। उनके िो बेटे और पोते जमीन, फामम, डेयरी और चीनी के कारखाने की
िे खभाल करते है। छोटा पोता परे श अभी-अभी नायब तहसीलिार होकर इसी कस्बे में
आया है। परे श की पत्नी का नाम बेला है। इंि ू और बेला िोनों सलशक्षक्षत हैं। बडी भाभी,
मंझली भाभी, छोटी भाभी है। बडी बहू, मंझली बहू और छोटी बहू हैं। कममचंि इनका िस
ू रा
बेटा है। बेला, छोटी भाभी की बहू है। भाषी, मल्लू, पारो घर के अन्य सिस्य है। मल
ू राज
का पररर्वार एक वर्वशाल र्वट-र्वक्ष
ृ के समान है।
अथर्वा
ii) सख
ू ीडाली एकांकी के लेखक उपेंद्रनाथ अश्क है। मूलराज के पररर्वार फक छोटी बह बेला
है। इसकी सास छोटी भाभी है। बेला, परे श की पत्नी है। र्वह लाहौर के एक प्रनतश्ष्ठत तथा
संपन्न, सलशक्षीत सभ्य माता -वपता की इकलौती बेटी है।
घर का माहोल बेला के अनकल नहीं है। घर के सभी लोगों का व्यर्वहार अलग-अलग है। र्वह
पनत से कहती है फक मेरा मन इस पररर्वार में नहीं लगता। परे श इस वर्वषय को िािाजी से 5
कहते है। िािाजी पररर्वार के सभी सिस्यों बलाकर समझाते हैं फक र्वह सभी उसका आिर
करे , काम में सहायता करे । उसका हाँसी-मजाक न उडाये । लेफकन जब मान, सम्मान
आिर लमलने लगा तभी र्वह तंग आती है। उसकी कोई इज्जत नहीं करता यह उसकी
लशकायत थी। र्वह कहती है फक मझे आिर, सत्कार, मान, समान कछ नहीं चादहए । र्वह
आराम नहीं चाहती। र्वह सब के साथ घल-लमलकर रहना चाहती है। लेफकन सिस्यों के
व्यर्वहार से उसकी मानलसक िशा त्रबघड जाती है। उसको न अलग रहना है, न ही अथधक
सम्मान चादहए।
33. प्रनतशोध एकांकी के लेखक डॉ. रामकमार र्वमाम हैं। र्वे बहमखी प्रनतभा संपन्न सादहत्यकार
उत्तर
हैं। कवर्व, नाटककार और इनतहासकार है। प्रयाग वर्वश्र्ववर्वद्यालय में दहंिी प्राध्यापक और 2
वर्वभागाध्यक्ष रहे । ऐनतहालसक, राजनीनतक, सामाश्जक, सादहश्त्यक, र्वैज्ञाननक तथा व्यंग्य
वर्वनोि से संबंथधत एकांफकयों की सफलतापर्व
ू मक रचना की है।
प्रमख एकांकी संग्रह :चारुलमत्र, ॠतराज, रे शमी टाई, िीपिान आदि।
परस्कार - िे र्व परस्कार, भारत-भारती परस्कार आदि।
प्रनतशोध एकांकी का उद्िे श्य ननम्नललखखत है- यह एक सांस्कृनतक एकांकी है। इसका
कथानक संस्कृत के महाकवर्व भारवर्व के जीर्वन से संबंथधत है। मााँ सशीला अपने बेटे के घर
न लौटने के कारण िखी है। पनत अपनी पत्नी को समझाते हैं लेफकन मााँ का हृिय मानने के
ललए तैयार नहीं है। भारवर्व शास्त्राथी में पंडडतों को परास्त करने से अहंकारी बन जाता है।
2
बेटे के अहंकार को िे खकर वपताजी बेटे को अनशासन िे ते हैं। श्जसके कारण भारवर्व वपता
की हत्या करना चाहता है। लेफकन जब र्वास्तवर्वकता का पता चलता है तो र्वह पाप का
प्रायश्श्चत भी वपताजी से चाहता है। भारवर्व नाराज होकर अपने वपता से बिला लेना चाहता था।
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भारवर्व को समझ में आ जाता है फक उसके वपता श्रीधर ने उसकी उन्ननत के ललए और उसके
अहंकार को लमटाने के ललए यह ननणमय ललया था। तत्पश्चात भारवर्व पश्चाताप के रूप में र्वह अपना
मस्तक कटर्वाने की लभक्षा मााँगता है। वपता कहता है – न तो मैं प्रनतशोध लेता हूाँ और न लभक्षा िे ता
हूाँ। वपता ने उसे समझाया फक ऐसा िण्ड नहीं दिया जा सकता तयोंफक वपत-ृ हत्या के ललए पत्र-हत्या
का िं ड नहीं दिया जा सकता। अन्त में िण्ड तो िे ना ही था। – श्रीधर भारवर्व को छुः मास तक
श्र्वसरालय में जाकर सेर्वा करने और जूठे भोजन पर अपना पालन पोषण करने का िण्ड सनाते हैं।
अथर्वा
प्रनतशोय एकांकी के लेखक डॉ रामकमार र्वमाम है। महाकवर्व भारवर्व इस एकांकी का नायक
है। र्वह संस्कृत के महापश्ण्डत श्रीधर के बेटे हैं। मााँ का नाम सशीला है। र्वह संस्कृत के
महाकवर्व हैं। भारवर्व ने कई वर्वद्र्वानों और पंडडतों को शास्त्राथों में परास्त फकया है। र्वह इस
4
कीनतम से इतना प्रभावर्वत हो जाता है फक र्वह घमंडी और अहंकारी बन जाता है। र्वह बहत ही
गमम-लमजाज का व्यश्तत है। र्वह अपने अपमानो का बिला लेना चाहता है। वपता की हत्या
करने के ललए भी तैयार होता है। उसी समय उसे गलती का एहसास भी होता है। उसे अपनी
करनीपर पश्चाताप होने लगता है। र्वह पाप का प्रायश्श्चत करने के ललए तैयार हो जाता है।
इस तरह र्व सचमच वर्वनम्रता का प्रिशमन करता है। भारवर्व अपना िं ड स्र्वीकार कर यह
सात्रबत करता है फक र्वह एक महान वर्वद्र्वान है। साथ ही साथ यह एक अच्छा इंसान भी है।
र्वह 'फकराताजमनीयम' महाकाव्य की रचना कर महाकवर्व भारवर्व बनता है।
V. खंड ‘घ’
अ) 34 i) उसे दिखार्वा नहीं रुचता है । 1
1
ii) मन में ऐसी शश्तत है ।
1
iii) ऐसा कभी नहीं हआ था ।
आ) 35. i) यात्री गंगा में स्नान करें गे । 1
1
ii) उस रोगी का शरीर बहत िबमल है।
1
iii) इस दिशा में काम शरू हआ था ।
इ) 36. i) अलभनेत्री 1
ii) र्वर 1
iii) आिमी
1
ई) 37. i) सिै र्व/शाश्र्वत 1
ii) करूप 1
iii) प्रशंसनीय
1
उ) 38. i) प्र+िष
ू ण= प्रिष
ू ण 1
ii) अन +शासन =अनशासन / प्र+शासन= प्रशासन 1
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ऊ)39. i) स्र्वच्छ+ता 1
ii) कहानन+यााँ 1
VI. अ) i) अमेररकी/अमेररका 1
40 ii) समाचार पत्र 1
iii) लक्ष्मीपूरा 1
iv) फ्ांसीसी 1
आ) i)
41
शीषमक
4
प्रस्तार्वना
खेलों का महत्र्व
खेल जगत में फक्केट का स्थान
फक्केट के प्रकार
फक्केट से लाभ और हानी
उपसंहार
अथवा
ii) पत्र ललखनेर्वाले का नाम,पता, दिनांक
प्रेवषनत
संबोधन
पत्र का कलेर्वर
समाश्प्त
इ) i) भाषा सरल और आसानी से समझ में आनी चादहए। 1
42 ii) कदठन पररश्रम/मेहनत के त्रबना सफलता नहीं लमलती। 1
iii) कल महीने का अंनतम/आखरी दिन है । 1
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