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NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग

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NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग - Page 1 of 15

About NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग

NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग is available here for free download. Published by NCERT for Class 9, this books can be viewed online or downloaded as a PDF (15 pages). Candidates preparing for Class 9 can use NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग to understand the exam pattern, the type of questions asked, and the overall difficulty level.

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NCERT Book Class 9 Mathematics (गणित) Chapter 1 स्वयं को प्रवृत्त करना - निर्देशांकों का उपयोग – Text

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Page 1

स््वयं को प्रवत्त
ृ करना —
1 निर्देशांकोों का उपयोग

1.1 भूमिका
निर्देशांकोों की पद्धति एक ससु गं ठित रूपरे खा है (जैसे कि एक मानचित्र अथवा आलेख पत्रक पर
जाल रे खाएँ) जो हमेें वस््ततुओ ं अथवा बिंदओ ु ं की वास्‍तविक भौतिक स््थथितियोों की व््ययाख््यया हेतु
सख्ं ्ययाओ ं के उपयोग के लिए सक्षम बनाती है।
‘जाल आधारित चितन ं ’ और समष््‍टटि (स््पपेस) मेें बिंदओ ु ं की स््थथितियोों को परिभाषित करने हेतु
ज््‍ययामिति की अवधारणा की गहरी जड़ेें भारत मेें निहित हैैं। जाल का प्रथम सव्ु ्यवस््थथित उपयोग
हजारोों वर््ष पर््वू सिंध-ु सरस््वती सभ््यता मेें व््ययापक नगरीय स््तर पर अस््ततित््व मेें आया था, जहाँ नगर
की गलियाँ समान रूप से लगभग 10 मीटर की दरू ी पर उत्तर-दक्षिण और पर््वू -पश््‍चचिम दिशा मेें अद्भुत
सटीकता के साथ निर््ममित की गई थीीं। वस््ततुतः यह एक व््‍ययावहारिक निर्देशांक पद्धति थी— कोई
व््ययापारी नगर के केें द्र से उत्तर-दक्षिण और पर््वू -पश््‍चचिम दिशाओ ं मेें दरू ी की इकाइयोों की गणना करके
किसी दक ु ान अथवा गोदाम की स््थथिति का पता लगा सकता था। जैसा कि हमने देखा है, बौधायन
(लगभग 800 सामान््य सवं त) ने कालांतर मेें उत्तर-दक्षिण और पर््वू -पश््‍चचिम रे खाओ ं का उपयोग अपनी
गहन ज््‍ययामितीय संरचनाओ ं के लिए और बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय को विकसित करने मेें किया
और इस प्रकार निर्देशांक ज््ययामिति की आधारशिला रखी गई।
पृथ््ववी की सतह पर निर्देशांकोों को सनु िश््‍चचित करना कालांतर मेें नौचालन (नौ-गमन) के लिए
महत््वपर््णू हो गया। उज््जयिनी का उल््ललेख प्राचीन विश्‍व मेें कम-से-कम चौथी शताब््‍ददी सामान््य संवत
पर््वू के प्रारंभिक सिद््धाांतोों मेें स््थथितियोों को निर््धधारित करने वाली केें द्रीय देशांतर मध््ययाह्न रे खा के रूप
मेें मिलता है जिसके सापेक्ष अन््य सभी भौगोलिक स््थथितियाँ मापी जाती थीीं। ग्रीक गणितज्ञ टॉलेमी
(लगभग 150 सामान््य सवं त पर््वू ) ने हिप््पपार््क स सहित अन््य पर््वू वर््ततियोों के कार्ययों की आधारशिला
पर आगे चलकर हजारोों स््थथितियोों के अक््षाांशोों और देशांतरोों का वर््णन किया, जिसमेें ‘ओजीन’
(उज््जयिनी) भी सम््ममिलित था। आर््यभट्ट (लगभग 499 सामान््य संवत) ने ग्रीक ‘कॉड्र््स’ के स््थथान पर
ज््यया (sines) का उपयोग किया, जिससे एक नगर अथवा एक तारे के निर्देशांकोों की गणना अपेक्षाकृत
सरल हो गई। उन््होोंने खगोलीय निर्देशांकोों का उपयोग करके आकाश के मानचित्र की रूपरे खा खीींची,
जिसमेें निर्देशांकीय दरू ियाँ क््राांतिवृत्त (सर््यू पथ) से मापीीं।
ब्रह्मगप्ु ‍त (लगभग 628 सामान््य संवत) ने शन्ू ्य और ॠणात््मक संख््ययाओ ं की संकल््पना तथा
उनके उपयोग को बीजगणितीय इकाइयोों के रूप मेें प्रस््ततुत किया; आधनु िक निर्देशांकीय प्रणाली मेें
‘मल ू बिंद’ु शन्ू ‍य होता है और ‘ॠणात््मक अक्ष’ शन्ू ‍य से कम मानोों को प्रदर््शशित करता है। ब्रह्मगप्ु ‍त
के इन योगदानोों के बिना चार-चतर््था ु ांशी कार्तीय तल का अध््ययन जिसे हम इस अध््ययाय मेें पढ़ेंगे,
असंभव होता।

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeBooks
Pages15
Languagehindi
Updated24 Sep 2026