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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 5: भारत, अथात इं डया
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
75 – 84 10 17 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 25 pages
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कक्षा 6 सामा जक व ान अध्याय 5 भारत, अथात इं डया AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 5: भारत, अथात इं डया
कक्षा 6 सामा जक व ान के अध्याय 5 भारत, अथात इं डया (पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) के सभी प्रश्न के वस्तृत
एन.सी.ई.आर.ट . समाधान। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण प्रश्न, दोन आइए वचार कर बॉक्स (पृष्ठ 77 एवं 80), आइए
पता लगाएँ बॉक्स (पृष्ठ 78 एवं 83) तथा पृष्ठ 81 का बॉक्स, पृष्ठ 78 एवं 80 के पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले... तथा प्रश्न, क्रयाकलाप और
प रयोजनाएँ के चार प्रश्न — भारतीय उपमहा प का भौ तक मान चत्र ( चत्र 5.2), महाभारत के क्षेत्र का मान चत्र ( चत्र 5.4) एवं सं वधान का
प्रथम पृष्ठ ( चत्र 5.5) ध्यानपूवक पढ़कर।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6) 75 – 84
खं ड प्रश्न
10 17
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 75
अध्याय का आरंभ
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 भारत को हम कैसे प रभा षत कर सकते ह?
उत्तर
इसका कोई एक उत्तर नह है — अध्याय दखाता है क भारत को तीन अलग-अलग तरीक से प रभा षत कया जा सकता है,
और तीन एक साथ सही ह।
प रभा षत करने का वह क्या कहता है अध्याय म कहाँ
तरीका
1. आधु नक राष्ट्र के आज भारत क प रभा षत सीमाएँ, प रभा षत राज्य और ात जनसंख्या है। पष्ृ ठ 77; ध्यान रखें
रूप म सं वधान का आरंभ ही है — “भारत, अथात् इ डया, राज्य का संघ होगा।” एवं िचत्र 5.5, पष्ृ ठ
81–82
2. भौगो लक क्षेत्र के वह भू म जसे हम भारतीय उपमहा प कहते ह, जो प्राकृ तक सीमाओं से घरी है िचत्र 5.2, पष्ृ ठ 76;
रूप म — उत्तर म हमालय एवं हदुकुश, शेष तीन ओर अरब सागर, बंगाल क खाड़ी एवं आइए िवचार करे ं,
हद महासागर। पष्ृ ठ 77
3. समय के साथ प्राचीन भारतीय ने भी इसे मान चत्र क ही भाँ त प रभा षत कया — “समुद्र के उत्तर िवष्ण ु पुर ाण एवं तिमल
वक सत एक वचार के म और हमाच्छा दत पवत के द क्षण म”, तथा “द क्षण म केप कुमारी से उत्तर म किवता, पष्ृ ठ 80
रूप म महान पवत तक”। नाम और सीमाएँ बार-बार बदलती रही ह।
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केवल आधु नक प रभाषा पयाप्त क्य नह है। अध्याय का पहला ही अनुच्छेद सचेत करता है — भारत “500, 2000 या 5000
वष पूव बहुत अलग था”। अशोक के समय, लगभग 250 सा.सं.पू., जस भू म को वे जम्बू प कहते थे उसम आज के बांग्लादे श,
पा कस्तान और अफगा नस्तान के भाग स म्म लत थे। अत: आज क सीमाओं से बनी प रभाषा अतीत के भारत का वणन नह
कर सकती।
सबसे लंबे समय तक टक प रभाषा भौगो लक है। वष्णु पुराण क एक पं क्त क प रभाषा वास्तव म यह वणन करती है —
िहमािद — ‘िहमाच्छािदत पवत’ = िहमालय
भारत
दिक्षण
उत्तर
वह देश जो इन दोनों के बीच मे ं है
समुद — अरब सागर, िहंद महासागर, बंगाल की खाड़ ी
वष्णु पुराण क भारत क प रभाषा, उत्तर-द क्षण काट के रूप म — ऊपर पवत, नीचे समुद्र और बीच म दे श।
तीन प रभाषाएँ एक साथ क्य आवश्यक ह: आधु नक प रभाषा बताती है क भारत अभी क्या है, भौगो लक
प रभाषा बताती है क यह भू म सदा से क्या रही है, और ऐ तहा सक प रभाषा याद दलाती है क सीमाएँ मनुष्य क
बनाई ह और बदल सकती ह। इ तहास के वद्याथ को तीन चा हए — अन्यथा ‘जम्बू प’ का प्राचीन शलालेख
पढ़कर वह भूल से आज का मान चत्र मन म बना लेगा।
क्या आप जानते ह? अध्याय के आरंभ म दया ी अर वद का उद्धरण भारत को इसी भौगो लक ढं ग से
प रभा षत करता है — “ हमालय और दो समुद्र के बीच इस महान मानवता क जीवनधारा”। ‘दो समुद्र’ अथात
अरब सागर और बंगाल क खाड़ी।
प्र.2 भारत के कुछ प्राचीन नाम क्या थे?
उत्तर
नाम अनेक थे, और वे दो प रवार म बँटते ह — जो नाम भारतीय ने स्वयं दए, और जो नाम वदे शय ने सधु नद से बनाए।
प रवार 1 — भारतीय ारा दए गए नाम
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नाम अथ कतना क्षेत्र ोत
सप्त ‘सात निदयों की भूिम’; सै ंध व शब्द िसंध ु से — केवल उपमहा प का भारत का सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद
सधव अथ त िसंध ु नदी या सामान्यत: एक नदी उत्तर-प मी क्षेत्र
भारतवष ‘भरत के दे श’ — भरत लोगों का एक पमुख वैिदक संपूण उपमहा ीप महाभारत, जो सा.सं.पू. क कुछ
समूह था, िजसका नाम सवपथम ऋग्वेद में िमलता है शता ब्दय पूव से लखा जाने लगा
जम्बू प ‘जामुन वृक्ष के फल के ीप’ — जम्बुल या मालाबार संपूण उपमहा ीप महाभारत; तथा अशोक ने लगभग
प्लम, भारत का एक सामान्य पेड़ 250 सा.सं.पू. अपने एक शलालेख म
भारत “वह दे श जो समुद के उत्तर में और िहमाच्छािदत संपूण उपमहा ीप वष्णु पुराण; आज भी प्रयोग म
(भारतम्) पवतों के दिक्षण में है”
इनके साथ-साथ महाभारत अनेक क्षेत्रीय नाम भी सूचीबद्ध करता है जो आज के मान चत्र म गूँजते ह — काश्मीर (लगभग आज
का कश्मीर), कुरूक्षेत्र (आज ह रयाणा का भाग), वंग (बंगाल का भाग), प्राग्ज्यो तष (कुछ-कुछ असम का भाग), कच्छ (आज का
कच्छ) और केरल (लगभग आज का केरल)।
प रवार 2 — वदे शय ारा दए गए नाम, सभी ‘ सधु’ से
कसने नाम कैसे बना
फारसी (प्राचीन ईरान) िहंद , िहदु, छठ शताब्द सा.सं.पू. म एक फारसी स ाट ने सधु नद के क्षेत्र पर नयंत्रण कया। ‘ हदू’
िहंदू फारसी म ‘ सधु’ ही है — यह पूणतया भौगो लक शब्द है, इसका धम से कोई संबंध नह
यूनानी इंडोई, इंिडके फारसी ोत से लया गया, पहला अक्षर ‘ह’ हटाकर, क्य क वह अक्षर यूनानी भाषा म नह था
लै टन, और उसके बाद India, यूनानी रूप लै टन म India बने, और लै टन से आधु नक यूरोपीय भाषाओं म पहुँचे
अंग्रेजी एवं च Inde
चीनी ियन्तू, ियंदू , ये भी ‘ सधु’ से — सधु → हदू → इंदू → यदू। तयन्जू को ‘स्वगतुल्य स्वामी’ के रूप म
ितयन्जू भी समझा जा सकता है — बुद्ध क भू म के प्र त सम्मान
फारसी, बाद म अरबी िहंद ुस्तान सवप्रथम आज से लगभग 1800 वष पूव एक फारसी शलालेख म; बाद म भारत पर
आक्रमण करने वाल का सामान्य शब्द
पूरा वंश-वृक्ष एक चत्र म —
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इंडोई / इंिडके
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यूनानी — ‘ह’ हटाकर लैिटन
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Inde (फें च)
/ िहदु / िहंद ू
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िहंद
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िस ंध ु िहंदु
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फारसी, छठी शताब्द ी सा.सं.पू.
िसंध ु नदी सवपथम लगभग 1800 वष पूव एक फारसी िशलालेख में
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(स्थान का नाम, धम का नही ं)
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agl इंद ू ियन् तू / ियंद ू
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बीच का रूप चीनी
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— चीनी
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ितय न्ज ू
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इसे ‘स्वगत ुल्य स्वामी’ भी समझा जा सकता है — बुद्ध की भूिम
emके सभी वदेशी नाम एक ही भारतीय शब्द से नकले ह — सधु, अथात नद । पुस्तक के पृष्ठ 81 पर छपी दोन ंखलाएँ यहाँ नीली a
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भारत
और हरी शाखाएँ ह।
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एक नद ने पूरे दे श को नाम कैसे दे दया: प mम से आने वाले वदे शी सबसे पहले सधु से मलते थे। जस पहली agl
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बड़ी वस्तु को उन्ह पार करना पड़ता था, lउसी
seका नाम उनक भाषाओं म उस पार क हर वस्तु का नाम बन गया।
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इसी लए अंग्रेजी नाम India एक भारतीय नद का वदे शी उच्चारण है, जब क हमारा अपना नाम ‘भारत’ ऋग्वेद म
उ ल्ल खत एक जन-समूह से आया है।
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ase वचार कर — पृष्ठ 77
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कक्षा 6 सामा जक व ान अध्याय 5 भारत, अथात इं डया AglaSem · NCERT Solutions
भारतीय उपमहा प का भौ तक मान चत्र पढ़ना ( चत्र 5.2)
आइए वचार कर
प्र.1 इस अध्याय के प्रारंभ म दए गए भारतीय उपमहा प के भौ तक मान चत्र का अध्ययन क जए। वे कौन-कौन सी
प्राकृ तक सीमाएँ ह जसे आप समझ सकते ह?
70°पू. 75°पू. 80°पू. 85°पू. 90°पू.
35°उ. ुश
न
ीद 35°उ.
ूक
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ीद
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ीद
िह न
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30°उ. 30°उ.
ीद
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चंबल गंगा न
दी
25°उ. न दी 25°उ.
नमदा नदी
ताप्ती नदी मह
ान
दी
20°उ. 20°उ.
अरब गोद
बंगाल
ाव री न
सागर द ी की खाड़ ी
कृ ण
ष्
ा न दी
15°उ. 15°उ.
काव
ेरी न दी
10°उ. 10°उ.
िहं द म हा सा ग र
0 200 400 िक.मी.
उ.
70°पू. 75°पू. 80°पू. 85°पू. 90°पू.
चत्र 5.2, पृष्ठ 76 — भारतीय उपमहा प का भौ तक मान चत्र, कुछ न दय स हत।
उत्तर
पृष्ठ 76 का चत्र 5.2 एक ऐसी भू म दखाता है जो प्रकृ त ारा लगभग पूरी तरह घरी हुई है — स्थल क ओर पवत और शेष
तीन ओर समुद्र। इसी लए इसे उपमहा प कहा जाता है — एक बड़े महा प का स्पष्ट रूप से अलग दखने वाला वशाल भाग।
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दशा प्राकृ तक सीमा मान चत्र म कैसे पहचान
उत्तर िहमालय ऊपर भूरे-सफेद रंग का लंबा चाप, जस पर ह मा ल य लखा है — कश्मीर से पूव म असम तक।
इसके आगे मान चत्र बगनी हो जाता है — वह तब्बत का ऊँचा पठार है।
उत्तर- िहंद ुकु श ऊपर बाईं ओर सफेद अक्षर म लखा है। इसके द क्षण क अनाम े णय के साथ मलकर यह मध्य
प म ए शया और ईरान का स्थल-माग बंद करता है।
उत्तर-पूव बह्मपुत्र के पूव की ब्रह्मपुत्र के आगे म्यांमार क ओर बनी भूरी े णयाँ। मान चत्र इन्ह दखाता तो है, पर नाम नह दे ता।
पहािड़ याँ
प म अरब सागर गुजरात और क कण तट के प म के नीले भाग म नाम लखा है।
पूव बंगाल की खाड़ ी ओ डशा और आंध्र के पूव के नीले भाग म नाम लखा है।
द क्षण िहंद महासागर मान चत्र के नीचे, प्राय प के छोर से आगे, जहाँ पास ही ीलंका दखता है।
िहमालय
उत्तर की िहमाच्छािदत दीवार — मानिचत्र में नामािं कत
िहंदुकुश पूव पहािड़ याँ
उत्तर-पिश्चम िदखाई गई है,ं नाम नही ं
अरब सागर भारतीय बंगाल की
पिश्चम उपमहा ीप खाड़ ी
पूव
एक ओर पवत,
शेष तीन ओर समुद
िहंद महासागर
दिक्षण, पाय ीप के छोर से आगे
उपमहा प क प्राकृ तक सीमाएँ, एक चौखट के रूप म। इनम से प्रत्येक पृष्ठ 76 के चत्र 5.2 म दखाई दे ती है; केवल उत्तर-पूव पहा ड़य
का नाम नह दया गया है।
इन सीमाओं का इ तहास म इतना महत्व क्य रहा: पवत और समुद्र ने इस क्षेत्र म प्रवेश क ठन और इसक
पहचान सरल बना द , अत: यहाँ रहने वाले लोग बहुत पहले से इसे एक भू म मानने लगे — दे श बनने से भी बहुत
पहले। इसी लए वष्णु पुराण भारत को एक ही पं क्त म प रभा षत कर सका (पृष्ठ 80), और इसी लए 2000 वष
पूव एक त मल क व ने भी वही चार छोर गनाए — उत्तर म पवत, द क्षण म केप कुमारी, पूव और प म म
महासागर। इस द वार के जो ार ह — उत्तर-प म के दर — ठ क वह से फारसी और बाद म अनेक अन्य लोग
भीतर आए।
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फर से दे खए: मान चत्र उन न दय के नाम भी दे ता है जो इन्ह सीमाओं से नकलती ह। हमालय एवं हदुकुश से
सधु (झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास एवं सतलुज के साथ), सरस्वती, गंगा, यमुना एवं ब्रह्मपुत्र आती ह। प्राय प क
अपनी पहा ड़य से नमदा एवं ताप्ती नकलती ह — जो प म क ओर अरब सागर म गरती ह — तथा महानद ,
गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी, जो पूव क ओर बंगाल क खाड़ी म गरती ह।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 78
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भारतीय ने भारत नाम कैसे दया? — महाभारत के क्षेत्र का मान चत्र ( चत्र 5.4)
आइए पता लगाएँ
प्र.1 क्या आप पृष्ठ 79 पर मान चत्र ( चत्र 5.4) म दए गए कुछ क्षेत्र क पहचान कर सकते ह? आपने जन क्षेत्र के
बारे म सुना हो, उनक सूची बनाइए।
70°पू. 75°पू. 80°पू. 85°पू. 90°पू.
गगांांधधारार
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35°उ. 35°उ.
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30°उ. 30°उ.
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25°उ. 25°उ.
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20°उ. 20°उ.
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10°उ. 10°उ.
0 200 400 िक.मी.
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70°पू. 75°पू. 80°पू. 85°पू. 90°पू.
चत्र 5.4, पृष्ठ 79 — महाभारत म सूचीबद्ध कुछ क्षेत्र को दशाता मान चत्र।
उत्तर
चत्र 5.4 म 38 नाम ह, और वे अफगा नस्तान से कन्याकुमारी तक फैले ह — मान चत्र का यही मुख्य संदेश है। नीचे वे नाम स्थान
के अनुसार दए गए ह, और वे भी च त ह जन्ह वद्याथ प्राय: पहचान लेते ह।
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उपमहा प का भाग चत्र 5.4 म छपे नाम जनके बारे म आपने अवश्य सुना होगा
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गांधार — गांधार मूितकला से , तथा महाभारतlaकीsगांधारी से
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उत्तर-प म गांध ार, द ,ु कं बोज, के कय,
s eपंmजाब)
(आज अफगा नस्तान, मद , वाहिलक, अंबष्ठ, सौवीर,
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पा कस्तान, िशिव के कय — रामायण की कै के यी
उत्तरी मैदान मत्स्य, शूर से न, पंचाल, चेिद, कोसल (अयोध्या), काशी (वाराणसी), मगध (दिक्षण िबहार), िवदे ह (िमिथला
c omका राज्य) ag
— सीता वैदे ही है)ं , पंचाल (द ौपदी पांचाली है)ं , शूर से न (मथुर ा का क्षेत्र ), अंग
. (कण
(आज राजस्थान, उ.प्र., कोसल, काशी, िवदे ह, मगध,
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बहार) अंग
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पूव
(आज बंगाल, असम,
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पाग्ज्योितष, पुंड, वंग , सुह्म,
किलंग
वंग — पुस्तक स्वयं कहती है ‘बंगाल का भाग’
पाग्ज्योितष — ‘कु छ-कु छ असम का भाग’
ओ डशा) किलंग — अशोक के युद्ध से , िजसे आप आगे पढ़ े ंगे
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सुरा — आज गुजरात का सौरा
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प म एवं मध्य आनत, सुर ा , अवंती, मािहष्मित,
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मािहष्मित — नमदा तट का नगर a
अवंती — उ ज्जैन का क्षेत्र
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(आज गुजरात, म.प्र., दशन, कारूष, दिक्षण कोसल
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छत्तीसगढ़)
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a दक्कन िवदभ, जनस्थान, अश्मक िवदभ — पूव महारा ; दमयंती एवं रुिक्मणी वही ं की थी ं
(आज महाराष्ट्र, तेलंगाना)
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जनस्थान — रामायण में गोदावरी तट का वन
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m केरल — पुस्तक कहती है ‘लगभग आज का केरल’ agl
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सुदूर द क्षण िकिष्कं धा, द िवड़, के रल, चोल,
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(आज कनाटक, केरल, पांड िकिष्कं धा — रामायण में सुगीव का राज्य
त मलनाडु ) चोल एवं पाडं — तिमल की महान राजवंश-परंपराएँ
. com
em ह। नकल क गई लंबी सूची
अपनी अभ्यास-पु स्तका म उत्तर कैसे लख। सूची क नकल मत क जए। तीन स्तंभ बनाइए — मान चत्र म नाम / यह नाम कहाँ
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सुना है? / आज भारत का कौन-सा भाग? — और केवल वही नाम भ रए जन्ह आप सचमुच पहचानते
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से ईमानदार
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agl नमूना उत्तर: “मने आठ नाम पहचाने। रामायण से कोसल और वदे ह; महाभारत से पंचाल, अंग और गांधार;
अशोक के बारे म सुना है इस लए मगध और क लग; और केरल, क्य क आज भी यही एक राज्य का नाम है। शेष
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नाम मेरे लए नए थे।”
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पुस्तक क्य कहती है क इन्ह याद रखने क आवश्यकता नह : शीषक स्पष्ट है — “आपको इन क्षेत्र को याद
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रखने क आवश्यकता नह है, परंतु आप ध्यान द क इनका वस्तार उपमहा प के संपूण भौगो लक क्षेत्र म मलता
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है।” यह मान चत्र रटने क सूची नह , प्रमाण है। नाम हदुकुश से समुद्र तक हर दशा म फैले ह, जससे पता चलता
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है क महाभारत के रच यता इस पूरी भू म को एक जुड़ा हुआ क्षेत्र मानते थे। मान चत्र यही तक प्रस्तुत करता है।
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स्वयं जाँ चए: पृष्ठ 78 के पाठ म काश्मीर, कुरूक्षेत्र और कच्छ के नाम भी आए ह — परंतु ध्यान से दे खए, ये
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तीन नाम चत्र 5.4 पर छपे ही नह ह। मान चत्र म चु नदा नाम ह, पूरी सूची नह । ोत म जो नह है उसे लक्ष्य करना
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सच्चे इ तहासकार क आदत है।
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कक्षा 6 सामा जक व ान अध्याय 5 भारत, अथात इं डया AglaSem · NCERT Solutions
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 78
भारतीय ने भारत नाम कैसे दया? — संपूण उपमहा प के लए एक नाम
प्र.1 वास्तव म हम कब समूचे भारतीय उपमहा प के लए एक नाम मला?
उत्तर
अध्याय ईमानदारी से उत्तर दे ता है — हम कोई न त त थ नह बता सकते, “चूँ क प्राचीन भारतीय ग्रंथ क त थ नधा रत करना
क ठन है”। हम इतना अवश्य कर सकते ह क प्रमाण को क्रम म रख द — कम त थ- न त से अ धक त थ- न त क ओर।
क्रम ोत प्रयुक्त नाम त थ कतनी न त?
1 ऋग्वेद ‘सप्त सै ंध व’ हजार वष पुराना — परंतु यह केवल उत्तर-प मी क्षेत्र का नाम है, संपूण
उपमहा प का नह
2 महाभारत ‘भारतवष’ तथा व ान सामान्यत: सहमत ह क यह महाकाव्य सा.सं.पू. क कुछ शता ब्दय पूव से
‘जम्बू ीप’ लखा जाने लगा — अत: नाम प्राचीन है, पर त थ एक अव ध है, कोई एक वष नह
3 अशोक का एक ‘जम्बू ीप’ लगभग 250 सा.सं.पू. — एक िनिश्चत ितिथ, क्योंिक िशलाले ख ात समय में उ त्कीण
शलालेख होता है। यही हमारा पहला ठोस पमाण है
4 वष्णु पुराण ‘भारत’ “कुछ शता ब्दय के बाद”, जब ‘भारत’ संपूण उपमहा प का सामान्य नाम बन चुका
था
अत: सं क्षप्त उत्तर: संपूण उपमहा प के पहले नाम महाभारत के भारतवष और जम्बू प ह, जो सा.सं.पू. क कुछ शता ब्दय
पूव से मलते ह; और त थ क दृ ष्ट से पहला ठोस प्रमाण है अशोक का लगभग 250 सा.सं.पू. का शलालेख, जसम
‘जम्बू प’ संपूण भारत के लए प्रयुक्त हुआ है — उस समय इसम आज के बांग्लादे श, पा कस्तान और अफगा नस्तान के भाग
स म्म लत थे।
ंथ क त थ शलालेख से क ठन क्य होती है: महाभारत जैसे महाकाव्य क रचना, वाचन, वस्तार और
प्र त ल प अनेक शता ब्दय तक चलती रही, अत: उसका कोई एक जन्म- दवस नह है। शलालेख एक ही बार पत्थर
पर उत्क ण होता है, ऐसे शासक के समय म जसका काल ात है, और तब से बदला नह है। इसी लए त थ क दृ ष्ट
से अशोक के पत्थर क एक पं क्त कसी ग्रंथ के अनेक पृष्ठ से अ धक मूल्यवान है — यही बात इ तहास के ोत
वाले पछले अध्याय म भी कही गई थी।
आइए वचार कर — पृष्ठ 80
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भारतीय ने भारत नाम कैसे दया? — वष्णु पुराण क भारत क प रभाषा
आइए वचार कर
प्र.1 क्या आप ‘ हमाच्छा दत पवत ’ को पहचानते ह?
उत्तर
हाँ — ‘ हमाच्छा दत पवत’ अथात हमालय।
संस्कृ त श्लोक: उत्तरं यत् समुदस्य िहमादेश्चै दिक्षणम् …
िहम = बफ + अिद = पवत → िहमािद = बफ का पवत
िहम + आ लय (= घर, िनवास) → िहमालय = “बफ का घर”
मान चत्र पर कैसे जाँच। पृष्ठ 76 के चत्र 5.2 पर लौ टए। ऊपर का लंबा सफेद-भूरा चाप ह मा ल य नाम से अं कत है और अपनी
पूरी लंबाई म हमाच्छा दत है — उपमहा प क एकमात्र ऐसी पवत-द वार जो स्थायी रूप से बफ से ढक रहती है। उसके प म म
मान चत्र हदुकुश लखता है, जो इसी वशाल पवत-प का प मी वस्तार है।
यही पवत इस अध्याय म तीन बार और आते ह:
पृष्ठ 80 क त मल क वता उन्ह “उत्तर म महान पवत” कहती है।
अध्याय के आरंभ म ी अर वद का उद्धरण कहता है — “ हमालय और दो समुद्र के बीच”।
चत्र 5.2 उन्ह मान चत्र के ऊपर बड़े अक्षर म अं कत करता है।
तीन भन्न ोत — एक संस्कृत पुराण, एक त मल क वता और एक आधु नक मान चत्र — तीन उसी उत्तरी द वार
को चुनते ह।
प्र.2 क्या आप समझते ह क भारत का यह सं क्षप्त ववरण सही है?
उत्तर
हाँ — इतने प्राचीन ववरण के लए यह उल्लेखनीय रूप से सही है, परंतु यह एक सं क्षप्त संकेत है, पूण प रभाषा नह ।
अच्छे उत्तर म दोन बात होनी चा हए।
यह कहाँ सही है
यह दो सबसे महत्वपूण सीमाओं को चुनता है — उत्तर क पवत-द वार और शेष ओर का समुद्र। दोन चत्र 5.2 म ठ क वैसे
ही दखते ह।
यह भू म को प्रकृ त से प रभा षत करता है, कसी राजा या राज्य से नह — अत: शासक बदलने पर प रभाषा पुरानी नह
पड़ती। इसी लए यह आज भी काम करती है।
दे श के अन्य भाग ने भी स्वतंत्र रूप से वही प रभाषा अपनाई। लगभग 2000 वष पूव क , सुदूर द क्षण क त मल क वता वही
चार छोर गनाती है — द क्षण म केप कुमारी, उत्तर म महान पवत, पूव और प म के महासागर।
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यह कहाँ अधूरा है
ोक म जो छू ट गया चत्र 5.2 जो दखाता है
यह ‘समुद्र’ कहता है, मानो एक ही हो यहाँ तीन नामां कत जल-रा शयाँ ह — अरब सागर, बंगाल क खाड़ी तथा हद महासागर
यह पूव-प म क सीमा बताता ही त मल क वता यह कमी पूरी करती है — “पूव के महासागर से प म के महासागर”
नह
यह उत्तर-प म का उल्लेख नह हदुकुश और उसके दर ही एकमात्र स्थल- ार ह — वही माग जससे छठ शताब्द सा.सं.पू. म
करता फारसी आए
यह भू-भाग का वणन है, कसी दे श आधु नक राजनी तक सीमाएँ इसे काटती ह — आज उसी भू म म भारत, पा कस्तान, बांग्लादे श,
का नह नेपाल, भूटान आ द ह
फर भी यह ोक प्रशंसा योग्य क्य है: जसने इसे रचा उसके पास न वायुयान था, न उपग्रह, न छपा हुआ
मान चत्र — फर भी उसने उपमहा प का आकार कुछ ही शब्द म बाँध दया। ऐसा वही लोग लख सकते थे
जन्ह ने इस भू म म दूर-दूर तक यात्रा क , व्यापार कया और आपस म बात क । त मल उदाहरण के बाद अध्याय
स्वयं कहता है — “प्रतीत होता है क प्राचीन भारतीय अपने भूगोल को अच्छ तरह से जानते थे।”
यह करके दे खए: केवल प्राकृ तक वशेषताओं का उपयोग करते हुए भारत क अपनी एक पं क्त क प रभाषा
ल खए, फर ोक से मलाइए। अ धकांश वद्याथ उसी के बहुत नकट कुछ लखते ह — और यही इस बात का
सबसे अच्छा प्रमाण है क प्राचीन प रभाषा उत्तम थी।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 80
भारतीय ने भारत नाम कैसे दया? — प्राचीन त मल क वता
प्र.1 ‘उत्तर म महान पवत’ को अब आप पहचान सकते ह और ‘केप कुमारी’ क पहचान करने म भी क ठनाई नह
होनी चा हए।
उत्तर
चत्र 5.2 सामने हो तो दोन क पहचान सरल है।
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त मल क वता का वह क्या है कहाँ है
वाक्यांश
“उत्तर म महान पवत” िहमालय चत्र 5.2 म ऊपर अं कत हमाच्छा दत चाप — वष्णु पुराण के ोक के वही
‘ हमाच्छा दत पवत’ ( हमा द्र)
“द क्षण म केप कुमारी” क न्याकु मारी (के प आज के त मलनाडु म भारतीय प्राय प का सबसे द क्षणी छोर — चत्र 5.2
कोमोिरन) म सबसे नीचे का बदु, ीलंका से ठ क उत्तर
“पूव के महासागर से प म बंगाल की खाड़ ी तथा दोन चत्र 5.2 म प्राय प के दोन ओर अं कत ह। कन्याकुमारी पर ये हद
के महासागर” अरब सागर महासागर से मलते ह
पुस्तक यह क्य पूछती है। दोन ववरण को साथ रखकर दे खए —
वष्णु पुराण (संस्कृत) त मल क वता (लगभग 2000 वष पूव)
उत्तर “िहमाच्छािदत पवतों के दिक्षण में” “उत्तर में महान पवत तक”
द क्षण “समुद के उत्तर में” “दिक्षण में के प कु मारी से ”
पूव एवं प म उल्ले ख नही ं “पूव के महासागर से पिश्चम के महासागर”
इससे क्या सद्ध होता है: सुदूर द क्षण का एक त मल क व और संस्कृत म रचा गया एक ग्रंथ — दोन एक ही दे श
का, एक ही सीमाओं के साथ वणन करते ह। दोन म से कोई कसी क नकल नह कर रहा। यह सच्चा प्रमाण है
क भन्न- भन्न भाषाएँ बोलने वाले, इस भू म के भन्न- भन्न भाग के लोग अपने दे श के आरंभ और अंत का एक ही
चत्र मन म रखते थे। अध्याय अपना नष्कष इसी वाक्य से नकालता है — “प्रतीत होता है क प्राचीन भारतीय
अपने भूगोल को अच्छ तरह से जानते थे।”
क्या आप जानते ह? क वता म प्रशंसा एक राजा क है, जसका नाम कुमारी से हमालय तक जाना जाता है —
अथात ात भू म के एक छोर से दूसरे छोर तक। क व इस ‘समुद्र-से-पवत’ शैली को सव च्च प्रशंसा मानते थे, और
यह तभी साथक है जब सुनने वाल को पहले से पूरे दे श का आकार ात हो।
आइए वचार कर — पृष्ठ 81
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कक्षा 6 सामा जक व ान अध्याय 5 भारत, अथात इं डया
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ध्यान रख — सं वधान म ‘भारत, अथात् इ डया’ ( चत्र 5.5)
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आइए वचार कर
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a s em5.5 (पृष्ठ 82) म भारत के मूल सं वधान के प्रथम पृष्ठ म क्या आप ‘इं डया अथात भारत’ को समझ सकते
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चत्र
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प्र.1
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यह प्र तकृ त क्या दशाती है। यह भारत के मूल हस्त ल खत सं वधान के प्रथम पृष्ठ का छाया चत्र है, जो
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agसुनहरे चौकोर े म के भीतर सधु घाट क एक मुद्रा का चत्र है — बाईं
क्र म रंग के चमपत्र पर है। चार ओर सुनहरे-भूरे कमल पदक क चौड़ी च त्रत कनार बनी है, जनके बीच
हरे रंग के कद्र ह। ऊपर मध्य म एक
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ओर मुख कए खड़ा कूबड़ वाला बैल, जसके ऊपर सधु ल प के अप ठत च क एक पं क्त है। चत्र के
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नीचे अं ेजी सुलेख म शीषक Part I और उसके नीचे The Union and its Territory लखा है। इसके
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बाद अनुच्छेद 1 के क्रमां कत खंड उसी लखावट म ह; इनम पहला खंड एक ही पं क्त का है जसम दे श का
. co दो बार आता है। बाएँ हा शये पर छोटे-छोटे शीषक ह — “Name and
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gterritory
em Union”, “Admission or establishment of new States”, “Formation of new States
नाम of the
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agl and alteration of areas, boundaries or names of existing States”।
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चत्र 5.5, पृष्ठ 82 — यहाँ केवल वणन दया गया है; मूल प्र तकृ त पाठ्यपुस्तक म दे खए ( ोत — भारत के मूल
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सं वधान का पुनमुद्रण, संस्कृ त मंत्रालय, भारत सरकार, 2000)।
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उत्तर
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हाँ। दोन शीषक के ठ क नीचे, हस्त ल खत पाठ क पहली ही क्रमां कत पं क्त दे खए।
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चत्र .5.5
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म कहाँ दे ख वहाँ क्या लखा है
agl पृष्ठ के ऊपर, अलंकृत कनारी के भीतर िसंध ु स भ्यता की एक मुहर का िचत्र, िजस पर एक साँड़ बना है
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भाग १
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पहला शीषक
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संघ और उसका राज्य-क्षेत्र
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दूसरा शीषक
पहला क्रमां कत उपबंध — अनुच्छेद 1(1) “१. (१) भारत, अथ त् इि डया, राज्यों का संघ होगा। ”
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उसी उपबंध के सामने, बाएँ हा शये पर छोटी-सी िटप्पणी “संघ का नाम और राज्य-क्षेत्र ”
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वाक्यांश को ध्यान से प ढ़ए। यह कुछ ही शब्द म दो काम करता है —
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m दे श को दो आ धका रक नाम दे ता है — भारत और इ डया — और कहता है क दोन का अथ एक ही है। कोई एक दूसरे
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क जगह नह लेता।
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इसी अध्याय के दोन नाम-प रवार को जोड़ता है — भारत, जो नाम भारतीय ने स्वयं दया (भारतवष = ‘भरत के दे श’
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से), और इ डया, जो नाम सधु → फारसी हदू → यूनानी इंडोई → लै टन India क यात्रा करके आया।
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g डया, दै ट इज भारत’ है; और सं वधान के हद अनुवाद म वही ‘भारत, अथात इं डया’ है।
अं ेजी संस्करण वही बात उलटे क्रम म कहता है। पृष्ठ 81 का ध्यान रख बॉक्स यही बताता है — सं वधान सवप्रथम अंग्रेजी म
लखा गया था, जहाँ यह वाक्यांशa‘इं
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क्या आप जानते ह? मूल सं वधान छपा नह था — वह हाथ से लखा गया था, और उसके प्रत्येक पृष्ठ को
शां त नकेतन के कलाकार ने सजाया था; चत्र 5.5 क कनारी के नीचे बाईं ओर एक कलाकार के हस्ताक्षर भी
दखते ह। पृष्ठ 81 के हा शये के अनुसार भारतीय सं वधान 1950 म लागू हुआ, और इसका अध्ययन आप कक्षा 7 म
करगे।
पहली ही पं क्त म नाम तय करना क्य आवश्यक था: कसी भी सं वधान को सबसे पहले यह बताना पड़ता है
क वह कसका सं वधान है। 1949–50 म दोन नाम रोज़ के प्रयोग म थे — एक भारतीय भाषाओं म, दूसरा शेष
वश्व क भाषाओं म — और जैसा यह अध्याय दखाता है, दोन का लंबा इ तहास था। कसी एक को चुनने के बजाय
सं वधान- नमाताओं ने दोन को पहली पं क्त म लख दया। इसी कारण इस अध्याय का शीषक भी ठ क यही शब्द
ह।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 83
वदे शय ने इं डया नाम कैसे रखा — भारत के भन्न- भन्न नाम क ता लका
आइए पता लगाएँ
प्र.1 क्या आप भारत के लए प्रयुक्त भन्न- भन्न नाम से इस ता लका को पूण कर सकते ह?
भाषा भारत के लए नाम
फारसी ___
यूनानी ___
लै टन भारत
चीनी ___
अरबी और फारसी ___
अं ेजी इं डया
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उत्तर
पूण क गई ता लका नीचे द गई है। हर प्र व ष्ट अध्याय से ही आती है — कुछ भी अनुमान से नह भरना पड़ता।
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भाषा भारत के लए अध्याय म कहाँ
नाम
फारसी िहंद , िहदु, िहंदू पृष्ठ 81 — छठ शताब्द सा.सं.पू. से फार सय के प्रारं भक लेख और शलालेख म ‘ सधु’
का रूपांतरण
यूनानी इंडोई, इंिडके पृष्ठ 81 — फारसी ोत के आधार पर, पहला अक्षर ‘ह’ हटाकर
लै टन India (इंिडया) पुस्तक म पहले से भरा हुआ — यूनानी रूप लै टन म पहुँचे
चीनी ियन्तू, ियंदू (तथा पृष्ठ 81 एवं 83 — सधु → हदू → इंदू → यदू; ‘ तयन्जू’ को ‘स्वगतुल्य स्वामी’ भी समझा
ितयन्जू) जा सकता है
अरबी और िहंद ुस्तान पृष्ठ 83 — सवप्रथम लगभग 1800 वष पूव एक फारसी शलालेख म; बाद म
फारसी आक्रमणका रय का सामान्य शब्द
अं ेजी India (इंिडया) पुस्तक म पहले से भरा हुआ — लै टन से लया गया
च Inde (इन्डे) पुस्तक म पहले से भरा हुआ — वही लै टन शब्द, च म छोटा होकर
स्तंभ को ऊपर से नीचे दे खए। सात म से छह नाम वास्तव म एक ही शब्द ह, जन्ह छह भाषाओं ने अपने-अपने ढं ग से घस दया
—
िसंध ु → िहंदू (फारसी) → इंडोई / इंिडके (यून ानी) → India (लैिटन) → India (अंगेजी), Inde (फे ं च)
िसंध ु → िहंदू → इंदू → ियंदू (चीनी)
िसंध ु → िहंद → िहंद ुस्तान (फारसी, िफर अरबी)
‘ह’ बार-बार आता और जाता क्य है: संस्कृत का स प्राचीन फारसी म नय मत रूप से ह बन जाता था — अत:
सधु स्वाभा वक रूप से हदू हो गया। यूनानी के सामने उलट समस्या थी: शब्द के आरंभ म उस ‘ह’ ध्व न के लए
उनके पास अक्षर ही नह था, इस लए उन्ह ने उसे हटा दया और इंडोई लखा। ईरान क एक ध्व न-प रवतन और
यूनान का एक अनुप स्थत अक्षर — यही कारण है क आज अंग्रेजी म हमारे दे श को India कहा जाता है।
ध्यान द जए — पुस्तक क एक छपाई-त्रु ट: हद संस्करण क ता लका म ‘लै टन’ के सामने ‘भारत’ छपा है।
अंग्रेजी संस्करण म वहाँ ‘India’ है। लै टन म दे श का नाम India ही है, ‘भारत’ नह — अनुवाद करते समय
‘India’ को गलती से ‘भारत’ कर दया गया। अपनी अभ्यास-पु स्तका म वहाँ India (इं डया) ही ल खए।
यह करके दे खए: अपनी दो पं क्तयाँ और जो ड़ए। हद → भारत / हदुस्तान; त मल → பாரதம் (भारतम्)।
अब ता लका के दोन भाग मलाइए — भारतीय भाषाएँ प्राय: भारत का कोई रूप प्रयोग करती ह, जब क वदे शी
भाषाएँ प्राय: सधु का। यही एक अंतर पूरे अध्याय का सार है।
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आगे बढ़ने से पहले... — पृष्ठ 84
अध्याय तीन बदुओं म
आगे बढ़ने से पहले . ..
प्र.1 भारत एक प्राचीन भू म है, जसे इसके इ तहास के क्रम म कई नाम दए गए ह।
उत्तर
यह भू म अपने कसी भी नाम से कह अ धक प्राचीन है, और आधु नक राष्ट्र से तो और भी अ धक। अध्याय इसके कम से कम दस
नाम गनाता है, जो हजार वष म फैले ह।
लगभग कब नाम कसने प्रयोग कया
कई हजार वष पूव स प्त सै ंधव ऋग्वेद — परंतु केवल उत्तर-प मी क्षेत्र के लए
सा.सं.पू. क कुछ शता ब्दय पूव से भारतवष, जम्बू ीप महाभारत — संपूण उपमहा प के लए
छठ शताब्द सा.सं.पू. िहंद , िहदु, िहंदू फारसी लोग
फार सय के बाद इंडोई, इंिडके प्राचीन यूनानी
लगभग 250 सा.सं.पू. जम्बू ीप अशोक, अपने एक शलालेख म
लगभग 2000 वष पूव ियन्तू, ियंदू , ितयन्जू प्राचीन चीनी
लगभग 1800 वष पूव िहंद ुस्तान एक फारसी शलालेख; बाद म भारत पर आक्रमण करने वाले
महाभारत के कुछ शता ब्दय बाद भारत वष्णु पुराण — और तब से अ धकांश भारतीय भाषाएँ
1950 से भारत, अथ त् इि डया भारत का सं वधान
इतने नाम क्य , और उनका महत्व क्या: नाम स्वयं इ तहास का ोत होता है। इनम से हर नाम कसी वास्त वक
भट का अ भलेख है — एक वै दक जन अपनी न दय को नाम दे ता हुआ, सधु तट पर खड़ी एक फारसी सेना, बुद्ध
क भू म खोजता एक चीनी तीथयात्री, पत्थर पर आदे श उत्क ण कराता एक स ाट। नाम का उद्गम जान ली जए, तो
यह भी जान जाएँगे क कौन आया, कब आया और कस दशा से आया।
प्र.2 प्राचीन भारतीय ारा दए गए नाम म ‘जम्बू प’ तथा ‘भारत’ स म्म लत ह। बाद के समय म ‘भारत’ शब्द
अ धक प्रच लत हुआ। अ धकांश भारतीय भाषाओं म यही नाम मलता है।
उत्तर
ये दोन अपने ही घर के महान नाम ह — और दोन बहुत भन्न सामग्री से बने ह।
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जम्बू प भारत
अथ ‘जामुन वृक्ष के फल के ीप’ — जम्बुल या ‘भरत के दे श’ (भारतवष), जो लोगों का एक पमुख वैिदक समूह था; बाद में
मालाबार प्लम, भारत में पाया जाने वाला पेड़ कई महाराजाओं का नाम भी ‘भरत’ रहा
कस पर एक वनस्पित पर — भूिम में उगने वाली वस्तु एक जन-समूह पर — भूिम में रहने वाले लोग
आधा रत
सवप्रथम महाभारत में; िफर लगभग 250 सा.सं.पू. के ‘भरत’ ऋग्वेद में; ‘भारतवष’ महाभारत में; ‘भारत’ िवष्ण ु पुर ाण में
कहाँ अशोक के िशलाले ख में
आगे क्या धीरे -धीरे रोज़ के पयोग से हट गया सवत्र फै ल गया और आज भी हमारा नाम है — उ त्तर भारत में भारत,
हुआ दिक्षण भारत में भारतम्, तथा संिवधान के दो आिधकािरक नामों में से एक
‘भारत’ ही क्य टका: जस भू म पर रहने वाले लोग से लया गया नाम, उसे वहाँ रहने वाला हर व्य क्त अपना
सकता है, चाहे वह कोई भी भाषा बोलता हो — और ठ क यही हुआ। वष्णु पुराण के समय तक इस नाम के साथ
एक स्पष्ट भौगो लक प रभाषा भी जुड़ चुक थी (“समुद्र के उत्तर म और हमाच्छा दत पवत के द क्षण म”), अत:
यह अब कसी एक समूह के दे श का नह , संपूण भू म का नाम बन गया। प रभाषा-स हत नाम, प रभाषा-र हत नाम
से कह अ धक उपयोगी होता है।
क्या आप जानते ह? जस जामुन से ‘जम्बू प’ नाम बना, वह वही बगनी फल है जो हर गम म भारतीय बाज़ार म
बकता है। संपूण उपमहा प का एक प्राचीन नाम गाँव के एक साधारण पेड़ से आया — कसी राजा, दे वता या
वजेता से नह ।
प्र.3 भारत आने वाले वदे शी आगंतुक और आक्रमणका रय ने भारत के लए सधु या सधु नद आधा रत नाम को
अपनाया। इसके प रणामस्वरूप ‘ हदू’, ‘इंडोई’ तथा अंतत: इं डया जैसे नाम बने।
उत्तर
इस अध्याय का हर वदे शी नाम एक ही भारतीय शब्द से नकला है — सधु, अथात नद । तीन ंखलाओं का पीछा क जए और
दे खए वह शब्द कैसे रूप बदलता है —
श ृंखला 1 (पृष्ठ 81): िसंध ु → िहंद ु → इंडोई / इंिडके → India (लैिटन) → India (अंगेजी), Inde (फे ं च)
श ृंखला 2 (पृष्ठ 81): िसंध ु → िहंदू → इंदू → ियंदू / ियन्तू (चीनी)
श ृंखला 3 (पृष्ठ 83): िसंध ु → िहंद → िहंद ुस्तान (फारसी, बाद में अरबी तथा अिधकांश आक्रमणकारी)
दो बात म सावधानी आवश्यक है —
प्राचीन फारसी म ‘ हदू’ ान का नाम था, धम का नह । अध्याय स्पष्ट कहता है — “प्राचीन फारसी म ‘ हदू’ पूणतया एक
भौगो लक शब्द है। यहाँ इसे हदू धम से संद भत नह कया गया है।” इसका अथ केवल था ‘ सधु के उस पार क भू म और
उसके लोग’।
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‘ हदुस्तान’ उतना प्राचीन नह जतना लगता है। यह सवप्रथम आज से लगभग 1800 वष पूव एक फारसी शलालेख म
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मलता है — अथात सप्त सधव, भारतवष और जम्बू प के बहुत बाद।
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नद ही क्य , पवत या नगर क्य नह : उपमहा प क उत्तरी द वार म गने-चुने ही उपयोगी दर ह, और उनम से हर
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gl यात्री को सधु के मैदान म उतारता है। प म से आने वाले को सबसे पहले वही नद पार करनी पड़ती थी —
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उसी का नाम उस पार क हर वस्तु का नाम बन गया। दूसरी ओर, जो लोग यहाँ पहले से रह रहे थे उन्ह अपने
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आपको कसी सीमा के नाम से पुकारने क आवश्यकता ही नह थी; उन्ह ने भू म का नाम अपने जन-समूह पर रखा।
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परीक्षा के लए संकेत: य द पूछा जाए कg“भारत को इसका अंग्रेजी नाम कस नद से मला?”, तो उत्तर है सधु
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(इंडस) — और आपको ंखला सधु → हदू → इंडोई → India कंठस्थ होनी चा हए।
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प्रश्न, क्रयाकलाप
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और प रयोजनाएँ — पृष्ठ 84
agl के अंत के प्रश्न
अध्याय
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अध्याय के आरंभ म दए गए उद्धरण का क्या अथ है? चचा क जए।
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पृष्ठ 75 पर ी अर वद का उद्धरण है —
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“भारत में पारंिभक काल से ही आ ध्याित्मक औ र सास्ं कृ ितक एकता स्थािपत हो गई थी, जो िहमालय औ र द ो
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सम ुद ों के बीच
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इसे वाक्यांश-दर-वाक्यांश खो लए।
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वाक्यांश अथ अध्याय म इसका प्रमाण
“प्रारं भक काल से ही” हाल म नह — हजार वष पूव ऋग्वेद; महाभारत, जो सा.सं.पू. क कुछ शता ब्दय पूव
से लखा जाने लगा
“आध्या त्मक और एक शासन नह , ब ल्क साझे वचार, ग्रंथ, वश्वास महाभारत गांधार से केरल तक के क्षेत्र जानता है; एक
सांस्कृ तक एकता” और जीवन-शैली त मल क वता और एक संस्कृत पुराण एक ही दे श को
प रभा षत करते ह
“स्था पत हो गई थी” यह अधूरी या बखरी हुई नह थी; पूरी भू म तक चत्र 5.4 — महाभारत के क्षेत्र का “ वस्तार उपमहा प
पहुँची के संपूण भौगो लक क्षेत्र म मलता है”
“जीवनधारा का अ भन्न यह सजावट नह थी; यही रोज़ के जीवन क वे नाम आज भी जी वत ह — भारत, भारतम्, तथा
अंग” सामग्री थी सं वधान क ‘भारत, अथात् इ डया’
“ हमालय और दो भारत क एक भौगो लक प रभाषा: उत्तर क ठ क वही जो वष्णु पुराण कहता है (पृष्ठ 80) और ठ क
समुद्र के बीच” पवत-द वार तथा दोन ओर अरब सागर एवं वही जो चत्र 5.2 दखाता है
बंगाल क खाड़ी
एक वाक्य म: ी अर वद कह रहे ह क भारत एक दे श बनने से बहुत पहले ही एक संस्कृ त बन चुका था — और यह साझी
संस्कृ त हमालय और दो समुद्र से घरी पूरी भू म म फैली हुई थी।
कक्षा म चचा कैसे चलाएँ: उद्धरण को ऊपर दए पाँच वाक्यांश म बाँटकर हर समूह को एक द जए। प्रत्येक समूह
को इसी अध्याय से एक प्रमाण ढूँ ढ़कर पढ़ना होगा। आप पाएँगे क पूरा अध्याय — ऋग्वेद क न दयाँ, महाभारत
के क्षेत्र, वष्णु पुराण का ोक, त मल क वता और सं वधान क पहली पं क्त — वास्तव म इसी एक वाक्य का तक
है।
एक बात पर ईमानदार बहस भी होनी चा हए: ‘एकता’ का अथ ‘एकरूपता’ नह है। इस भू म म सदा अनेक
भाषाएँ, भोजन, वेशभूषा, दे वता और री तयाँ रही ह — अकेले चत्र 5.4 म ही 38 अलग-अलग क्षेत्र ह। ी अर वद
का दावा यह है क इस व वधता के नीचे कुछ साझा बहता है। अच्छ चचा यह पूछेगी क वह साझी वस्तु क्या है और
आज उसे कहाँ दे खा जा सकता है।
प्र.2 सही अथवा गलत क पहचान क जए — (i) ‘ऋग्वेद’ म भारत के संपूण भूगोल का वणन कया गया है। (ii)
‘ वष्णु पुराण’ म संपूण उपमहा प का वणन कया गया है। (iii) अशोक के समय ‘जम्बू प’ म आज का भारत,
अफगा नस्तान के कुछ क्षेत्र, बांग्लादे श और पा कस्तान स म्म लत थे। (iv) महाभारत म कश्मीर, कच्छ और केरल
समेत कई क्षेत्र को सूचीबद्ध कया गया है। (v) ‘ हदुस्तान’ शब्द का प्रयोग 2000 वष से भी पहले सवप्रथम एक
यूनानी शलालेख म कया गया था। (vi) प्राचीन फारसी म ‘ हदू’ शब्द का उपयोग हदू धम के लए कया गया है।
(vii) वदे शी या त्रय ारा इं डया को ‘भारत’ नाम दया गया।
उत्तर
तीन कथन सही ह और चार गलत। उत्तर से अ धक महत्वपूण कारण है, अत: नीचे प्रत्येक का संशोधन भी दया गया है।
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कक्षा 6 सामा जक व ान अध्याय 5 भारत, अथात इं डया AglaSem · NCERT Solutions
क्र. कथन उत्तर क्य — और सही बात
(i) ‘ऋग्वेद’ म भारत के संपूण भूगोल का वणन गलत ऋग्वेद केवल उत्तर-प मी क्षेत्र को नाम दे ता है — ‘सप्त सधव’,
कया गया है। सात न दय क भू म (पृष्ठ 77)। संपूण उपमहा प का नाम सवप्रथम
महाभारत म मलता है।
(ii) ‘ वष्णु पुराण’ म संपूण उपमहा प का वणन सही “वह दे श जो समुद्र के उत्तर म और हमाच्छा दत पवत के द क्षण म
कया गया है। है, उसे भारत कहते ह” (पृष्ठ 80) — यह वणन संपूण उपमहा प
को समेटता है।
(iii) अशोक के समय ‘जम्बू प’ म आज का सही पृष्ठ 79 पर अशोक के शलालेख (लगभग 250 सा.सं.पू.) के वषय
भारत, अफगा नस्तान के कुछ क्षेत्र, बांग्लादे श म ठ क यही लखा है।
और पा कस्तान स म्म लत थे।
(iv) महाभारत म कश्मीर, कच्छ और केरल समेत सही पृष्ठ 78 म काश्मीर (लगभग आज का कश्मीर), कच्छ (आज का
कई क्षेत्र को सूचीबद्ध कया गया है। कच्छ) और केरल (लगभग आज का केरल) के साथ कुरूक्षेत्र, वंग
एवं प्राग्ज्यो तष भी सूचीबद्ध ह।
(v) ‘ हदुस्तान’ शब्द का प्रयोग 2000 वष से भी गलत एक ही पं क्त म दो भूल। वह फारसी शलालेख था, यूनानी नह ;
पहले सवप्रथम एक यूनानी शलालेख म कया और वह लगभग 1800 वष पूव था, 2000 वष से भी पहले नह
गया था। (पृष्ठ 83)।
(vi) प्राचीन फारसी म ‘ हदू’ शब्द का उपयोग हदू गलत पुस्तक स्पष्ट कहती है — प्राचीन फारसी म ‘ हदू’ पूणतया
धम के लए कया गया है। भौगो लक शब्द है; इसे हदू धम से संद भत नह कया गया है (पृष्ठ
81)। इसका अथ केवल ‘ सधु क्षेत्र का’ था।
(vii) वदे शी या त्रय ारा इं डया को ‘भारत’ नाम गलत बात ठ क उलट है। ‘भारत’ वह नाम है जो भारतीय ने स्वयं दया —
दया गया। ऋग्वेद के ‘भरत’ से, महाभारत के ‘भारतवष’ होते हुए, वष्णु पुराण
के ‘भारत’ तक। वदे शय के दए नाम सधु से बने थे।
सारांश: सही → (ii), (iii), (iv) • गलत → (i), (v), (vi), (vii)
संकेत: सात म से चार कथन एक ही बात जाँचते ह — कौन-सा नाम कसने दया। दो सू चयाँ याद र खए:
भारतीय नाम = सप्त सधव, भारतवष, जम्बू प, भारत; वदे शी नाम = हदू, इंडोई, इं डया, यदू, हदुस्तान। इस
अध्याय का लगभग हर पेचीदा प्रश्न कसी नाम को एक सूची से दूसरी म खसका दे ता है।
प्र.3 य द आपका जन्म 2000 वष पूव हुआ होता और आपको अपने दे श का नामकरण करने का अवसर मलता, तो
आप कस नाम का चयन करते एवं क्य ? अपनी कल्पनाश क्त का उपयोग क जए।
उत्तर
यह प्रश्न आपका अपना है, अत: कोई एक ‘सही’ उत्तर नह है। परंतु कल्पनाशील उत्तर को भी स े प्राचीन नाम क तरह काम
करना चा हए — और अध्याय बताता है क प्राचीन नाम बनते कैसे थे।
चरण 1 — अपना नयम चु नए। इस अध्याय का हर नाम इन चार नयम म से कसी एक पर बना है —
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नयम अध्याय से उदाहरण आपका बनाया नाम
कसी नद पर नाम सप्त सै ंध व, तथा िसंध ु से बने सभी िवदे शी नाम गंगावष — ‘गंगा का दे श’, वह नदी िजसके िकनारे सबसे
अिधक लोग बसे थे
वहाँ रहने वाले लोग भारतवष — ‘भरत के दे श’ बहुभाषीवष — ‘अनेक भाषाओं का दे श’
पर नाम
कसी पेड़ या पशु पर जम्बू ीप — जामुन वृक्ष पर मयूर ीप — ‘मोर की भूिम’, अथवा वट ीप, ‘बरगद की
नाम भूिम’
सीमाओं पर नाम िवष्ण ु पुर ाण का श्लोक; तिमल किवता का ‘कु मारी से िहमसागर — ‘बफ और समुद की भूिम’, उ त्तर में पवत
महान पवत तक’ और शेष ओर समुद
चरण 2 — कारण द जए। इस प्रश्न के अंक नाम म नह , क्य म ह। कारण तभी अच्छा है जब वह ऐसी बात बताए जो (क) केवल
आपके कोने क नह , पूरी भू म क हो, और (ख) हजार वष बाद भी सच रहने क संभावना हो।
नमूना उत्तर: “य द म 2000 वष पूव जन्मा होता तो इस भू म को हमसागर कहता — ‘बफ और समुद्र के बीच क
भू म’। म यह नाम इस लए चुनता क्य क यही एक बात दे श के हर भाग म समान है: आप कसी भी दशा म च लए,
अंत म या तो हमाच्छा दत पवत मलगे या समुद्र। यह नाम कसी एक राजा, जनजा त या भाषा का भी नह है, अत:
गांधार के लोग और केरल के लोग — दोन इसे अपना कह सकते। मेरी दूसरी पसंद नद वष होती, ‘न दय का दे श’,
क्य क सधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, नमदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी — सभी इसी भू म म आरंभ और समाप्त होती ह,
और लोग अपना जीवन न दय के आसपास ही बसाते ह।”
यह केवल खेल नह , गंभीर प्रश्न क्य है: नामकरण स्वयं म प रभा षत करने का काय है। नद चु नए तो दे श जल
के वषय म हो जाता है; जन-समूह चु नए तो उनके वषय म; सीमाएँ चु नए तो भू म स्वयं के वषय म। प्राचीन
भारतीय ने तीन आज़माए — और जो टका, वह भारत था, क्य क वही सबका हो सकता था।
प्र.4 प्राचीन काल म वश्व के व भन्न भाग से लोग भारत क यात्रा क्य करते थे? इस प्रकार क लंबी यात्रा करने के
पीछे उनका उ े श्य क्या था? (संकेत – कम से कम चार या पाँच उ े श्य हो सकते ह।)
उत्तर
संकेत चार या पाँच उ े श्य माँगता है। यहाँ छह दए ह, हर एक प्रमाण के साथ — पहले तीन तो सीधे इसी अध्याय से आते ह।
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उ े श्य कौन आया और क्य प्रमाण
1. वजय शासक भू म, कर तथा समृद्ध नद -घा टय पर छठी शताब्दी सा.सं.पू. में एक फारसी समाट ने सै न्य अिभयान आरंभ
एवं सत्ता नयंत्रण चाहते थे कर िसंध ु नदी के क्षेत्र पर िनयंत्र ण िकया (पष्ृ ठ 81)। बाद में
आक्रमणकािरयों ने संपूण उपमहा ीप के िलए िहंद ुस्तान शब्द का पयोग
िकया (पष्ृ ठ 83)
2. धम एवं भारत बुद्ध क भू म था, और तीथयात्री उन स्थान ज़ आ
ु नज़ गै ं ने 7वी ं शताब्दी सा.सं. में चीन से भारत की यात्रा की, कई
तीथयात्रा को दे खने आते थे जहाँ उन्ह ने जीवन बताया और भागों का भमण िकया और 17 वष रहे (पष्ृ ठ 83)
उपदे श दए
3. व ा एवं व ान भारतीय आचाय से पढ़ने तथा ग्रंथ अपने ज़आ ै ं िव ानों से िमले , बौद्ध ग ंथ एकित्र त िकए और चीन लौटकर
ु नज़ग
ंथ दे श ले जाने आते थे उन पांडुिलिपयों का संस्कृ त से चीनी भाषा में अनुवाद िकया। “आगे
आने वाली शतािब्दयों में कई अन्य चीनी िव ानों ने भी भारत का भमण
िकया” (पष्ृ ठ 83)
4. ापार भारत के मसाले, सूती वस्त्र, रत्न, हाथीदाँत और िचत्र 5.2 की दो समुद -सीमाएँ और महान निदयाँ ही इन माग ं को संभव
एवं धन इस्पात सवत्र माँगे जाते थे; व्यापारी उत्तर-प म बनाती थी ं। इसी कारण फारसी और यूनानी भारत को जानते थे, और
के दर से स्थल-माग और प मी-पूव तट से इसी कारण उन्हे ं इसका नाम रखने की आवश्यकता पड़ी
जल-माग ारा आते थे
5. राजनय राजा भारतीय दरबार म दूत भेजते थे, और कुछ िवदे शी वृत्त ांत — यात्रा वृत्त ांत एवं ऐितहािसक वृत्त ांत — इस पुस्तक के
एवं सेवा वदे शी यह अ धकारी, सै नक या वैद्य बनकर रह िपछले अध्याय में िगनाए गए ोतों में से एक है ं
गए
6. ज ासा कुछ लोग केवल उस भू म को दे खना चाहते थे चीिनयों ने भारत को ितयन्जू कहा, िजसे ‘स्वग तुल्य स्वामी’ भी समझा
जसके वषय म उन्ह ने अ त बात सुनी थ , और जा सकता है — “यह बताता है िक चीिनयों का बुद्ध की भूिम के रूप में
उस पर लखना चाहते थे भारत के पित िकतना सम्मान था” (पष्ृ ठ 83)
यह भी याद र खए क ये यात्राएँ कतनी क ठन थ । तब इंजन नह थे। चीन से आने वाले को रे गस्तान और उत्तर-प म के
पवत-दर पार करने पड़ते थे, या मानसूनी हवाओं के सहारे महीन नाव चलानी पड़ती थी। जआनज़ग क पूरी यात्रा म 17 वष लगे।
इतनी लंबी यात्रा कोई छोटे कारण से नह करता — और यही इन छह उ े श्य क प्रबलता का सबसे अच्छा प्रमाण है।
यह प्रश्न इसी अध्याय के अंत म क्य है: इनम से हर यात्री भारत को एक नाम दे गया। फारसी सै नक ‘ हद’ छोड़
गया; यूनानी भूगोलवेत्ता ‘इंडोई’; चीनी तीथयात्री ‘ यदू’ और ‘ तयन्जू’; बाद का आक्रमणकारी ‘ हदुस्तान’। पृष्ठ 83
क नाम क ता लका वास्तव म उन कारण क सूची है जनके लए लोग यहाँ आए।
प रयोजना का वचार: कक्षा म एक द वार-मान चत्र बनाइए। एक ओर ईरान, यूनान और चीन तथा दूसरी ओर
भारत अं कत क जए, माग ख चए, और हर तीर पर यात्री का उ े श्य तथा वह नाम ल खए जो वह छोड़ गया। अंत
म आपके सामने अध्याय क नाम वाली ता लका होगी — यात्राओं के मान चत्र के रूप म।
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अध्याय — एक नज़र म
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m .c नक राष्ट्र है, परंतु यह भू म राष्ट्र से कह अ धक प्राचीन है। आज भारत aकgप रभा षत सीमाएँ, राज्य और
भारत एक
a e ख्या है। 500, 2000 या 5000 वष पूव यह बहुत अलग था। वश्व के इस भाग को, जसे हम प्राय: भारतीय
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agउपमहा प कहते ह, भन्न- भन्न नाम मले ह और इसक सीमाएँ भी बदलती रही ह। ये नाम हम प्राचीन पुस्तक , या त्रय तथा
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तीथया त्रय के वृत्तांत और शलालेख से मलते ह।
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उपमहा प क प्राकृ तक सीमाएँ स्पष्ट ह ( चत्र 5.2, पृष्ठ 76)। उत्तर म हमालय, उत्तर-प म म हदुकुश; प म म अरब
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ag एवं सतलुज, सूख चुक सरस्वती, गंगा, यमुना, चंबल एवं ब्रह्मपुत्र, प म
सागर, पूव म बंगाल क खाड़ी और द क्षण म हद महासागर। इनके बीच वे नद -तंत्र ह जन्ह मान चत्र नाम दे ता है — सधु
तथा उसक सहायक झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास
क ओर बहने वाली नमदा एवं ताप्ती, तथा पूव क ओर बहने वाली महानद , गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी।
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भारतीय ने स्वयं इस भू म का नामकरण कया। भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद म उपमहा प के उत्तर-प मी क्षेत्र का
s e m आशय सधु नद या
lत्रa, वंग, प्राग्ज्यो तष, कच्छ, केरल
नाम ‘सप्त सधव’ अथात ‘सात न दय क भू म’ दया गया है; ‘सधव’ शब्द ‘ सधु’ से आया है जसका
c mनद से है। महाभारत म उपमहा प-भर के क्षेत्र सूचीबद्ध ह (काश्मीर, कुरूक्षे
सामान्यत:oएक
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mतथा संपूण भू म के लए दो नाम मलते ह — ‘भारतवष’ अथात ‘भरत के देश’, और ‘जम्बू प’ अथात ‘जामुन वृक्ष
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a gl के फल के प’।
‘भारत’ नाम ही सवा धक प्रच लत हुआ और आज भी वही है। स ाट अशोक (लगभग 250 सा.सं.पू.) ने अपने एक
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comवष्णु पुराण ने भारत क प रभाषा द — “वह देश जो समुद्र के agl
शलालेख म संपूण भारत के लए ‘जम्बू प’ शब्द का प्रयोग कया — उस समय इसम आज के बांग्लादे श, पा कस्तान तथा
अफगा नस्तान के भाग स म्म लत थे। कुछ शता ब्दय .बाद
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है”e। 2000 वष पूव क एक त मल क वता भी इसी भू म का वणन “द क्षण म
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l है। उत्तर भारत म यह नाम भारत और द क्षण भारत म भारतम् लखा जाता है
agकरती
उत्तर म और हमाच्छा दत पवत के द क्षण म
केप कुमारी से उत्तर म महान पवत तक”
— और सं वधान क पहली ही पं क्त है ‘इं डया, दै ट इज भारत’।
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वदे शय ने सधु नद के आधार पर नाम रखे। छठ शताब्द सा.सं.पू. म सधु क्षेत्र पर नयंत्रण करने वाले फार सय ने
m a s emलक शब्द था, धा मक नह ।
o ने फारसी ोत से लेकर ‘ह’ अक्षर हटा दया, क्य क वह उनक भाषा मaनहglथा, और ‘इंडोई’ / ‘इं डके’ कहा —
‘ हद’, ‘ हदु’ या ‘ हदू’ लखा — यह ‘ सधु’ का उनक भाषा म रूपांतरण था और पूणतया भौगो
यूनाcनय
.
a semजससे लै टन एवं अंग्रेजी का India तथा च का Inde बना। ची नय ने ‘ यन्तू’ / ‘ यदू’ कहा, तथा ‘ तयन्जू’ भी, जसे
agl ‘स्वगतुल्य स्वामी’ के रूप म भी समझा जा सकता है — बुद्ध क भू म के प्र त उनके सम्मान का प्रतीक।
‘ हदुस्तान’ उतना प्राचीन नह जतना लगता है। यह शब्द सवप्रथम आज से लगभग 1800 वष पूव एक फारसी
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शलालेख म प्रयोग हुआ, और बाद म भारत पर आक्रमण करने वाल ने उपमहा प के लए इसी शब्द का प्रयोग कया। इस
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प्रकार अध्याय दो प रवार के नाम दे ता है — भारतीय के अपने दए नाम (जम्बू प, भारत) तथा वदे शय ारा सधु से
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बनाए नाम ( हदू, इंडोई, इं डया, हदुस्तान)।
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त्व रत पुनरावृ त्त
नाम अथवा अथ अध्याय म कहाँ कसने प्रयोग कया
शब्द
भारतीय िवश्व का वह भाग िजसमें आज भारत, पािकस्तान, पृष्ठ 77; भौ तक आज हम यही नाम प्रयोग करते ह
उपमहा प बांग्लादे श, नेपाल, भूटान, ीलंक ा एवं मालदीव है;ं इसके मान चत्र चत्र 5.2,
िभन्न-िभन्न नाम रहे है ं और सीमाएँ बदलती रही है ं पृष्ठ 76
सधु िसंध ु नदी — अथवा कभी-कभी सामान्यत: कोई भी नदी पृष्ठ 77 ऋग्वेद तथा बाद के भारतीय ग्रंथ
सप्त सधव ‘सात निदयों की भूिम’ — यह नाम उपमहा ीप के के वल पृष्ठ 77, चत्र 5.3 के ऋग्वेद, भारत का सबसे प्राचीन ग्रंथ
उ त्तर-पिश्चमी क्षेत्र का है, संपूण भूिम का नही ं साथ
भारतवष ‘भरत के दे श’ — यह नाम स्पष्ट रूप से समूचे उपमहा ीप पृष्ठ 78 महाभारत
के िलए पयुक्त हआ
ु है
भरत लोगों के एक पमुख वैिदक समूह का नाम; बाद के सािहत्य पृष्ठ 78 सवप्रथम ऋग्वेद म, फर बाद के सा हत्य
में िविभन्न महाराजाओं का नाम म
जम्बू प ‘जामुन वृक्ष के फल के ीप’ — जम्बुल वृक्ष या मालाबार पृष्ठ 78–79 महाभारत; तथा अशोक ने लगभग 250
प्लम, जो भारत में पाया जाने वाला एक सामान्य पेड़ है सा.सं.पू. एक शलालेख म
भारत / “वह दे श जो समुद के उत्तर में और िहमाच्छािदत पवतों के पृष्ठ 80, वष्णु पुराण आज भी संपूण भारत म प्रयुक्त — उत्तर
भारतम् दिक्षण में है” से उद्धत म ‘भारत’, द क्षण म ‘भारतम्’
सं वधान िकसी दे श के आधारभूत िसद्धात
ं ों और कानूनों को बताने हा शया, पृष्ठ 81 भारतीय सं वधान 1950 म लागू हुआ
वाला पले ख और इसका आरंभ ‘इं डया, दै ट इज
भारत’ से होता है ( चत्र 5.5)
हद / हदु / फारसी भाषा में ‘िसंध ’ु का रूपांतरण; पाचीन फारसी में यह पृष्ठ 81 फारसी लोग, छठ शताब्द सा.सं.पू. से
हदू पूणतया भौगोिलक शब्द है, धािमक नही ं
इंडोई / इं डके ‘िहंदू ’ में से पहला अक्षर ‘ह’ हटाकर बना नाम, क्योंिक यह पृष्ठ 81 प्राचीन यूनानी, फारसी ोत के आधार
अक्षर यूनानी भाषा में नही ं था पर
यन्तू / यदू / भारत के िलए चीनी शब्द, ये भी ‘िसंध ’ु से बने; ‘ितयन्जू’ को पृष्ठ 81 एवं 83 प्राचीन चीनी, जो बुद्ध क भू म के रूप म
तयन्जू ‘स्वगतुल्य स्वामी’ भी समझा जा सकता है भारत का सम्मान करते थे
हदुस्तान भारतीय उपमहा ीप के िलए अपेक्षाकृ त हाल का शब्द, जो पृष्ठ 83 फारसी; बाद म भारत पर आक्रमण करने
सवपथम लगभग 1800 वष पूव एक फारसी िशलाले ख में वाल ने
पयुक्त हुआ
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