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NCERT Solutions Class 7 Hindi Chapter 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार

AglaSem पर कक्षा 7 हिंदी पाठ 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार (मल्हार) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter 8 (Malhar).
NCERT Solutions Class 7 Hindi Chapter 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार - Page 1 of 35

About NCERT Solutions Class 7 Hindi Chapter 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार

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NCERT Solutions Class 7 Hindi Chapter 8 बिरजू महाराज से साक्षात्कार – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा7

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 8: बरजू महाराज से सा ात्कार

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

96 – 115 15 37 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 34 pages

Page 2

कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 7 · हद · मल्हार

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: बरजू महाराज से साक्षात्कार
NCERT कक्षा 7 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह पाठ साक्षात्कार वधा म है —
श्रेया, तनुश्री और मा णक नाम के तीन ब े पद्म वभूषण कथक नतक पं डत बरजू महाराज से उनके बचपन, गुरु- शष्य परंपरा, कथक के इ तहास,
लय और शास्त्रीय नृत्य पर बातचीत करते ह। पृष्ठ 96 से 115 तक क हर ग त व ध — मेरी समझ से, मलकर कर मलान, शीषक, पं क्तय पर चचा,
सोच- वचार के लए, शब्द क बात, शब्द का प्रभाव, कला का संसार, साक्षात्कार क रचना, सृजन, आज क पहेली, झरोखे से, साझी समझ,
खोजबीन के लए और पढ़ने के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

मल्हार (कक्षा 7) 96 – 115

खं ड प्रश्न

15 37

माध्यम

हन्द

मेरी समझ से — पृष्ठ 104
पाठ से

पाठ से

प्र.1 ★
(क) नीचे दए गए प्रश्न का सबसे सही उत्तर कौन-सा है? उनके सामने तारा ( ) बनाइए। कुछ प्रश्न के एक से
अ धक उत्तर भी हो सकते ह। (1) बरजू महाराज ने गंडा बाँधने क परंपरा म प रवतन क्य कया होगा? • वे गुरु
के प्र त शष्य के नष्ठा भाव को परखना चाहते थे। • वे नृत्य शक्षण के लए इस परंपरा को महत्वपूण नह मानते
थे। • वे नृत्य के प्र त शष्य के लगन व समपण भाव को जाँचना चाहते थे। • वे शष्य क भट दे ने क साम य को
परखना चाहते थे।

सही उत्तर ( ★ लगाइए):

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
गलत

वे ग रु
ु के पित िशष्य के िनष्ठा भाव को ★ सही गंडा गुरु और शष्य के बीच का प वत्र रश्ता है। वष सखाने के बाद ही गंडा
परखना चाहते थे। बाँधने का अथ है — पहले शष्य क नष्ठा दे ख लेना।

वे नत्ृ य िशक्षण के िलए इस परंपरा को गलत वे परंपरा को महत्वपूण मानते थे, तभी तो उसे छोड़ा नह — केवल उसका क्रम
महत्वपूण नही ं मानते थे। बदला।

वे नत्ृ य के पित िशष्य के लगन व समपण ★ सही यह उत्तर पाठ म शब्दशः है — “जब दे खता हूँ क शष्य म स ी लगन है तभी
भाव को जाँचना चाहते थे। गंडा बाँधता हूँ।”

वे िशष्य की भेटं दे ने की साम य को गलत भट क बात उनके अपने बचपन से जुड़ी है (अम्मा ने दो कायक्रम क कमाई
परखना चाहते थे। भट म द थी)। वे स्वयं भट को कसौट नह बनाते।

क्य : पुरानी रस्म म गुरु तालीम के आरंभ म गंडा बाँधते थे। बरजू महाराज ने इसे उल्टा कर दया — गंडा अब
सीखने क शुरुआत का नह , शष्य क परख का प्रमाण-पत्र बन गया।

ध्यान द: प्रश्न म ही कहा गया है क एक से अ धक उत्तर हो सकते ह — इस लए यहाँ पहला और तीसरा, दोन
वकल्प चुनना सही है। इनम भी तीसरा वकल्प पाठ से सीधे प्रमा णत होता है।

प्र.2 (2) “जीवन म उतार चढ़ाव तो होता ही है।” बरजू महाराज के जीवन म कस तरह के उतार-चढ़ाव आए? • पता
के दे हांत के बाद आ थक अभाव का सामना करना पड़ा। • कोई भी सं ा नृत्य प्रस्तु तय के लए आमं त्रत नह
करती थी। • कसी समय वशेष म घर म सुख-समृ द्ध थी। • नृत्य के औपचा रक प्र शक्षण के अवसर बहुत ही
सी मत हो गए थे।

सही उत्तर ( ★ लगाइए): पहला और तीसरा वकल्प।
वकल्प सही / पाठ का प्रमाण
गलत

िपता के दे हांत के बाद आिथक अभावों ★ सही “मेरे बाबूजी के दे हांत के बाद आ थक परेशा नयाँ बढ़ने लग ।” — कज लेना, ज़री
का सामना करना पड़ा। क सा ड़याँ जलाकर तार बेचना, रात को कई बार न खाना। यही उतार है।

कोई भी संस्था नत्ृ य पस्तुितयों के िलए गलत उल्टा लखा है — “नृत्य के कायक्रम से भी कभी-कभी पैसा आ जाता था।”
आमंित्रत नही ं करती थी। कायक्रम मलते तो थे।

िकसी समय िवशेष में घर में सुख- ★ सही “एक जमाना था जब हमलोग छोटे नवाब कहलाते थे… आठ-आठ सपा हय का
सम ृिद्ध थी। पहरा होता था… तीन-चार लाख क क मत के हार।” यही चढ़ाव है।

नत्ृ य के औपचािरक पिशक्षण के अवसर गलत तालीम घर म ही चलती रही — पता और चाचा ही गुरु थे। ऐसा कह नह कहा
बहुत ही सीिमत हो गए थे। गया।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

क्य दोन उत्तर चा हए: ‘उतार-चढ़ाव’ एक जोड़ा शब्द है। केवल गरीबी बताने से आधी बात बनती है; समृ द्ध वाला
वकल्प चुनने पर ही वह ‘चढ़ाव’ पूरा होता है जससे जीवन का ग्राफ ऊपर-नीचे दखाई दे ता है।

प्र.3 (3) बरजू महाराज के अनुसार ब को लय के साथ खेलने क अनुशंसा क्य क जानी चा हए? • संगीत, नृत्य,
नाटक और सभी कलाएँ ब म मानवीय मूल्य का वकास नह करती ह। • कला संबंधी वषय से जुड़ाव ब
के बौ द्धक वकास के लए बहुत महत्वपूण है। • कला भी एक खेल है, जसम बहुत कुछ सीखने को मलता है। •
वतमान समय म कला भी एक सफल माध्यम नह है।

सही उत्तर ( ★ लगाइए): दूसरा और तीसरा वकल्प।
वकल्प सही / पाठ का प्रमाण
गलत

संग ीत, नत्ृ य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में गलत बरजू महाराज ठ क इसका उल्टा कहते ह — “लय हम अनुशासन
मानवीय मूल्यों का िवकास नही ं करती है।
ं सखाती है, संतुलन सखाती है।”

कला संबंध ी िवषयों से जुड़ाव बच्चों के बौिद्धक ★ सही “इस खेल क दु नया म संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग ब े
िवकास के िलए बहुत महत्वपूण है। के बौ द्धक वकास के लए बहुत महत्वपूण है।”

कला भी एक खेल है, िजसमें बहत
ु कु छ सीखने को ★ सही “जैसे अन्य खेल ह वैसे ही यह भी एक खेल है, जसम बहुत-कुछ
िमलता है। सीखने को मलता है।”

वतमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नही ं गलत वे कहते ह क शास्त्रीय नृत्य क लोक प्रयता अब बढ़ रही है; नराशा
है। क बात कह नह है।

याद रख: बरजू महाराज कला को ‘बोझ’ नह , खेल कहते ह। यही उनक बात का सबसे सुंदर हस्सा है — जो
चीज खेल क तरह क जाए, वह मन पर दबाव नह बनाती और सीखना अपने-आप हो जाता है।

प्र.4 (ख) अब अपने मत्र के साथ चचा क जए और कारण बताइए क आपने ये उत्तर ही क्य चुन?

यह कक्षा म मलकर करने क ग त व ध है। चचा को दशा दे ने के लए तीन बात ध्यान म र खए:

1. पाठ से प्रमाण द जए — हर उत्तर के साथ पाठ क वह पं क्त पढ़कर सुनाइए जससे वह उत्तर नकलता है। “मुझे ऐसा लगता
है” से बात नह बनती; “पाठ म लखा है क…” से बनती है।
2. गलत वकल्प भी समझाइए — केवल यह न बताइए क कौन-सा उत्तर सही है, यह भी बताइए क बाक क्य गलत ह। इससे
पता चलता है क आपने पूरा पाठ पढ़ा है।
3. असहम त का स्वागत क जए — य द कसी मत्र ने कोई और वकल्प चुना है तो पहले उसका कारण सु नए, फर अपना
प्रमाण र खए।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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नमूना उत्तर: “मने पहले प्रश्न म तीसरा वकल्प चुना, क्य क बरजू महाराज खुद कहते ह — ‘कई वष तक नृत्य
सखाने के बाद जब दे खता हूँ क शष्य म स ी लगन है तभी गंडा बाँधता हूँ।’ यहाँ ‘स ी लगन’eशब्द
s m ही उत्तर है।
दूसरा वकल्प.cमने
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o इस लए नह चुना, क्य क य द वे परंपरा को महत्वपूण न मानते तो गंaडाgबाँl धना बलकुल बंद कर
दे ते —se
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उन्ह ने बंद नह कया, केवल समय बदला।”

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मलकर कर मलान — पृष्ठ 105
पाठ से
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पाठ से मलान

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.cसंदभ या अवधारणाओं से मलाइए। इसके लए आप शब्दकोश, इंटरनेटaयाg अपने शक्षक क सहायता ले
प्र.1 पाठ म से चुनकर कुछ शब्द एवं शब्द समूह नीचे दए गए ह। अपने समूह म इन पर चचा क जए और इन्ह इनके

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se सकते ह। शब्द — 1. कनाटक संगीत शैली, 2. घराना, 3. शास्त्रीय संगीत, 4. हदुस्तानी संगीत शैली, 5.
सही
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agl कनछे दन, 6. लोक नृत्य। संदभ या अवधारणा — 1. भारत क प्राचीन गायन-वादन गीत-नृत्य अ भनय परंपरा का

om a s
अ भन्न अंग है। इसम शब्द क अपेक्षा सुर का महत्व होता है। इसम नयम क प्रधानता होती है। 2. भारतीय

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शास्त्रीय संगीत क एक शैली, जो मुख्य रूप से द क्षण भारत के राज्य म प्रच लत है। इसम स्वर शैली क
प्रधानता होती है। जल तरंगम, वीणा, मृदeं गm
एक है, यह कान म सोने या चाँद gका a s , मंडो लन वाद्ययंत्र से संगत द जाती है। 3. हदू धम के 16 संस्कार म
l तार पहनाने से संबं धत है। 4. हदुस्तानी संगीत म कलाकार का एक
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समुदाय या कुटुं ब, जो संगीत नृत्य क व शष्ट शैली साझा करते ह। संगीत या नृत्य क परंपरा, जसम सद्धांत और
शैली पीढ़ -दर-पीढ़ प्र शक्षण के ारा आगे बढ़ती है। 5. कसी क्षेत्र वशेष म लोक ारा कए जाने वाले
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पारंप रक नृत्य। लोक नृत्य, क्षेत्र वशेष क संस्कृ त एवं री त- रवाज को दशाते ह। ये वशेष रूप से फसल कटाई,

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g है। इसके प्रमुख राग क संख्या
.cके राज्य म प्रच लत है। तबला, सारंगी, सतार, संतूर वाद्ययंत्र से संगत दaजाती
उत्सव आ द के अवसर पर कए जाते ह। 6. भारतीय शास्त्रीय संगीत क एक शैली, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत

se m छह है।
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com l a

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सही मलान:

शब्द gl संदभ
aसही पहचान क कुंजी

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1. कन टक संग ीत शैल ी 2 ‘द क्षण भारत’ + जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडो लन

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2. घराना ‘समुदाय या कुटुं ब’ + ‘पीढ़ -दर-पीढ़ ’
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a s em 3. शास्त्रीय संगीत
gl
1 ‘प्राचीन परंपरा’ + ‘ नयम क प्रधानता’ (शास्त्र = नयम)

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4. िहंद ुस्तानी संग ीत शैल ी 6 ‘उत्तर भारत’ + तबला, सारंगी, सतार, संतूर

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5. कनछे द न 3
e m . co ‘कान म सोने या चाँद का तार’ — 16 संस्कार म से एक
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6. लोक नत्ृ य
a ‘फसल कटाई, उत्सव ’ + ‘री त- रवाज को दशाते ह’

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

मलान कैसे कर: हर ववरण म एक संकेत-शब्द छपा होता है। ‘द क्षण भारत’ मलते ही कनाटक शैली तय हो
जाती है और ‘उत्तर भारत’ मलते ही हदुस्तानी। ‘कुटुं ब/पीढ़ -दर-पीढ़ ’ घराने का ही अथ है, क्य क घराना प रवार
से बनता है। ‘कान’ शब्द ही कनछे दन का अथ खोल दे ता है (कन = कान, छे दन = छे दना)।

जोड़ने योग्य बात: पाठ म बरजू महाराज ने ‘लखनऊ घराने’, ‘जयपुर घराने’ और ‘बनारस घराने’ का उल्लेख
कया है — ये तीन कथक के घराने ह। इससे स्पष्ट होता है क ‘घराना’ केवल गायन का नह , नृत्य का भी होता है।

शीषक — पृष्ठ 105
पाठ से

पाठ से ले ख न

प्र.1 इस पाठ का शीषक ‘ बरजू महाराज से साक्षात्कार’ है। य द आप इस साक्षात्कार को कोई अन्य नाम दे ना चाहते ह
तो क्या नाम दगे? आपने यह नाम क्य सोचा? ल खए।

अच्छा शीषक वह है जो पाठ के कद्र य भाव को दो-तीन शब्द म पकड़ ले। इस साक्षात्कार म सबसे बार-बार लौटने वाला शब्द है
— लय। इस लए शीषक भी लय, साधना या वरासत के आसपास होना चा हए।

संभा वत शीषक यह नाम क्य

लय के महाराज पूरा साक्षात्कार लय पर िटका है — “लय हर काम में, नत्ृ य में, जीवन में संतलु न बनाए रखती है।” और
‘महाराज’ उनके नाम का ही िहस्सा है।

जीवन की लय क्य क वे लय को केवल नृत्य तक सी मत नह मानते — घ सयारे के हँ सया चलाने म भी उन्ह लय
दखती है।

चना िमले या न िमले , अभ्यास अम्मा का यह वाक्य पूरे साक्षात्कार क आत्मा है — क ठन दन म भी साधना न छोड़ने का संदेश।
जरूर करो

िवरासत से मंच तक कथक उन्ह वरासत म मला और उन्ह ने उसे वदे श के मंच तक पहुँचाया — पूरी यात्रा इसी म आ जाती
है।

नमूना उत्तर: म इस साक्षात्कार को ‘लय के महाराज’ नाम दूँ गा/दूँ गी। यह नाम मने इस लए सोचा क्य क बरजू
महाराज बार-बार लय क बात करते ह — बचपन म चाचा ने कहा था “लड़के के हाथ म लय है”, बीच म वे कहते ह
क हर ग त व ध म लय होती है, और अंत म ब से कहते ह क “लय हम अनुशासन सखाती है, संतुलन सखाती
है।” जो शब्द पूरे पाठ म सबसे अ धक चमकता है, वही शीषक बनने योग्य है। साथ ही ‘महाराज’ शब्द उनके नाम
क भी याद दलाता है, इस लए यह नाम पाठ और व्य क्त — दोन को एक साथ पकड़ लेता है।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान रख: शीषक बदलते समय दो कसौ टयाँ लगाइए — (1) क्या यह नाम पूरे पाठ पर लागू होता है, केवल एक
अनुच्छेद पर नह ? (2) क्या यह पढ़ने वाले के मन म जज्ञासा जगाता है? दोन उत्तर ‘हाँ’ ह , तभी शीषक अच्छा है।

पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 106
पाठ से

पाठ से

प्र.1 साक्षात्कार म से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दए गए ह। इन्ह ध्यान से प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको
इनका क्या अथ समझ म आया? अपने वचार ल खए। — “तुम नौकरी म बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नतक
पूरी तरह पनप नह पाएगा।”

यह बात बरजू महाराज के चाचा ने तब कही थी, जब उन्ह ने नौकरी शुरू क ।
सीधा अथ: नौकरी करोगे तो तुम्हारा समय, ध्यान और ऊजा दो हस्स म बँट जाएँगे — कुछ दफ्तर म, कुछ नृत्य म। जो कला पूरा
मन माँगती है, उसे आधा मन मलेगा और इस लए भीतर का कलाकार पूरी ऊँचाई तक नह पहुँच पाएगा।

‘बँट जाओगे’ और ‘पनप नह पाएगा’ — दो सुंदर शब्द: ‘बँटना’ शब्द बताता है क व्य क्त एक ही है, पर उसे दो
जगह दे ना पड़ेगा। ‘पनपना’ पौधे के लए आने वाला शब्द है — यानी कला भीतर एक पौधे क तरह है, जसे पूरा
पानी, पूरी धूप और पूरा समय चा हए। आधी दे खभाल म पौधा जी वत तो रह जाएगा, पर फलेगा-फूलेगा नह ।

मेरे वचार: चाचा क चता स ी थी, पर बरजू महाराज ने इसका उत्तर छोड़ने से नह , और अ धक मेहनत से दया — “मने दृढ़
नश्चय कया था क ‘महाराज’ बनना है तो उसके लए मेहनत भी करनी होगी।” वे स्वयं भी कहते ह क यह “अपने साम य पर
नभर करता है”, और उदाहरण दे ते ह अपनी शष्या शोभना नारायण का, जो आई.ए.एस. अफसर भी ह और अच्छ नतक भी।
इस लए इस पं क्त से यह सीख मलती है क दो काम एक साथ करना असंभव नह , पर उसक क मत दुगुनी मेहनत से चुकानी
पड़ती है।

प्र.2 “नृत्य म शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।”

अथ: नतक के लए उसका शरीर केवल हाथ-पैर हलाने का यंत्र नह है — वही उसका साधन है, जैसे चत्रकार के लए तू लका
और गायक के लए गला। और यह साधन तीन चीज से तैयार होता है — शरीर क साधना, मन का ध्यान (एकाग्रता) और वष क
तपस्या (कठोर अभ्यास)।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

शब्द नृत्य म उसका अथ पाठ से उदाहरण

शरीर भाव पकट करने का माध्यम — गद न, उँ गिलयाँ, पैर, “कथक म गदन को हल्के से हलाया जाता है”
आँखें

ध्यान एकागता — लय से जरा भी न भटकना “मारने और हटाने क इस लय म जरा भी गड़बड़ी हुई नह क उसका हाथ
गया।”

तपस्या लगातार, िबना छु ट्टी का अभ्यास “खाने को भले ही चना मले या कुछ भी न मले पर अभ्यास जरूर करो।”

गहरी बात: इसी पं क्त के तुरंत बाद बरजू महाराज कहते ह — “नृत्य करना एक तरह से अदृश्य श क्त को नमंत्रण
दे ना है।” यानी वे नृत्य को मनोरंजन नह , एक प्रकार क उपासना मानते ह। जस तरह तपस्वी अपने शरीर को
साधकर ईश्वर तक पहुँचता है, उसी तरह नतक अपने शरीर को साधकर कला तक पहुँचता है।

प्र.3 “कथक म गदन को हल्के से हलाया जाता है, चराग क लौ के समान।”

अथ: कथक म गदन का संचालन झटके से नह , बहुत कोमल और थरथराती-सी ग त से होता है — ठ क वैसे जैसे द ये क लौ हवा
म हौले-हौले काँपती है।

यह कौन-सा अलंकार है: यहाँ ‘के समान’ शब्द से गदन क ग त क तुलना चराग क लौ से क गई है — यह
उपमा (simile) है। उपमेय = गदन क ग त, उपमान = चराग क लौ, वाचक शब्द = ‘के समान’, साधारण धम =
हल्के-हल्के हलना।

यह उपमा इतनी सट क क्य है: लौ क ग त क तीन वशेषताएँ ह — वह धीमी है, नरंतर है और उसम एक भीतरी प्रकाश है।
कथक क गदन-ग त भी ऐसी ही है — धीमी, लगातार और चेहरे पर भाव क चमक लए हुए। साथ ही लौ कभी टू टती नह , बस
लहराती है; गदन भी झटका नह खाती, बस लहराती है।

इससे जुड़ी बात: ठ क आगे बरजू महाराज उँ ग लय क भी ऐसी ही कोमल ग त बताते ह — “जैसे घूँघट पकड़ने म
या घूँघट उठाने म।” और चाचा जी क टोक भी याद रखने योग्य है — “घूँघट उठा रहे हो या तंबू?” इससे समझ
आता है क कथक म कोमलता ही असली क ठन काम है।

सोच- वचार के लए — पृष्ठ 106

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से

पाठ से

प्र.1 1. साक्षात्कार को एक बार पुन: प ढ़ए और नम्न ल खत प्रश्न के उत्तर ल खए। (क) बरजू महाराज नृत्य का
औपचा रक प्र शक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?

बरजू महाराज का जन्म ही कथक के घर म हुआ था। उनके पता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज
— तीन प्र सद्ध कथक नतक थे। इस लए घर म दन-रात कथक का माहौल रहता था।
वे स्वयं कहते ह — “घर म चूँ क कथक का माहौल था, अत: औपचा रक प्र शक्षण शुरू होने से पहले ही म दे ख-दे खकर कथक सीख
गया था और नवाब के दरबार म नाचने भी लगा था।”

क्य ऐसा हो सका: छोटे ब े नकल से सीखते ह। जस घर म हर समय तबले क थाप, घुँघरू क झनकार और
तत्कार क आवाज हो, वहाँ ब ा भाषा क तरह ही ताल-लय भी अपने-आप सीख जाता है। यही कारण है क पाठ
के आरंभ म कहा गया है — “कथक क कला उन्ह वरासत म मली थी।”

प्रमाण: चाचा ने बहुत छु टपन म ही ताड़ लया था — “लड़के के हाथ म लय है।” और पाँच साल का होते-होते वे
हारमो नयम पर लहरा बजाने लगे थे। यह सब गंडा बँधने यानी औपचा रक तालीम शुरू होने से पहले क बात है।

प्र.2 (ख) नृत्य सीखने के लए संगीत क समझ होना क्य अ नवाय है?

क्य क गाना, बजाना और नाचना — तीन एक ही चीज के तीन हस्से ह। बरजू महाराज कहते ह, “गाना, बजाना और नाचना — ये
तीन संगीत का हस्सा ह। संगीत म लय होती है। उसका ज्ञान आवश्यक है।”
तीन ठोस कारण:

1. लय के बना नृत्य नह बनता। नृत्य पैर क ग त को ताल पर बाँधना है। जसे ताल क समझ नह , उसके पैर संगत से बाहर
चले जाएँगे।
2. नतक को अपनी संगत परखनी होती है। पाठ क पं क्त है — “अगर नतक को सुर-ताल क समझ है तो वह जान पाएगा क
यह लहरा ठ क नह है।” यानी वह पहचान लेगा क साथ बज रही धुन गलत है और उसे सुधरवा सकेगा।
3. संगीत नृत्य को ‘भीतर’ ले जाता है। बरजू महाराज कहते ह क सुर-ताल क समझ न हो तो “नृत्य अंग म प्रवेश नह करेगा”
— अथात नृत्य ऊपर-ऊपर क नकल रह जाएगा, शरीर के भीतर तक नह उतरेगा।

व्यापक अथ: उनके अनुसार लय केवल मंच पर नह , जीवन म भी है — घ सयारा घास पकड़कर हँ सया मारता है
और हटाता है; इस लय म जरा-सी गड़बड़ हुई तो हाथ कट जाए। इस लए लय क समझ केवल कलाकार क नह ,
हर काम करने वाले क जरूरत है।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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(ग) नृत्य के अ त रक्त बरजू महाराज को और कन- कन काय म रु च थी?
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aglमहाराज बहुमुखी प्र तभा के धनी थे। नृत्य के अलावा उनक रु चयाँ इस प्रकार थ —
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रु च पाठ म क्या कहा गया

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“मैं नत्ृ य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हू।
ँ ” बचपन में तबला पीटना, पाँच साल की उम में हारमोिनयम
पर लहरा, िफ ल्मीgगाने गाना।
गायन और वादन

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नत्ृ य-नािटकाओं की रचना और “नत्ृ य नािटकाएँ और उनके िलए संग ीत भी तैयार करता हू।
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ँ ” टैगोर, त्यागराज आिद किवयों की रचनाओं पर
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कथक रचनाएँ बनाईं।
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संग ीत-िनदशन

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मशीने ं और यंत्र खोलना-
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“मशीनों में मन खूब लगता है। अगर मैं नतक न होता तो शायद इंजीिनयर होता। ” बीफके स में हरदम पेचकस

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सुध ारना और छोटे औजार रखते थे; अपना पंखा-िफ ज खुद ठीक करते थे।
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a िचत्रकारी (पेंिटंग) बेटी-दामाद िचत्रकार है,ं उ न्हे ं दे खकर शौक लगा। पाय: रात बारह बजे के बाद िचत्र बनाने बैठते थे —
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“िपछले दो वष ं में लगभग स त्त र िचत्र बनाए है।ं ”
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वष ं तक िशष्यों को नत्ृ यmिसखाया; शोभना नारायण जैस ी िशष्याएँ तैयार की ं। agl
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िशक्षण

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ध्यान दे ने क बात: वे कहते ह — “खाली तो होता ही नह हूँ। न द म भी हाथ चलता रहता है।” यही एक स े

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कलाकार क पहचान है — उसका मन कभी बेकार नह बैठता, वह हर चीज म कुछ न कुछ खोजता रहता है।
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a s em (घ) बरजू महाराज ने ब
agl प्र.4 क शक्षा और रु चय के बारे म अ भभावक से क्या कहा है?

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उन्ह ने अ भभावक से वनती के स्वर म कहा है — “य द ब े क रु च है तो उसे लय के साथ खेलने द।”
उनक बात के चार हस्से ह — agl
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1. कला को खेल मा नए। “जैसे अन्य खेल ह वैसे ही यह भी एक खेल है, जसम बहुत-कुछ सीखने को मलता है।” यानी संगीत-

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नृत्य को पढ़ाई का दुश्मन न समझ।

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omबहुत महत्वपूण है।” l
2. यह बौ द्धक वकास करती है। “इस खेल क दु नया म संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग ब े के बौ द्धक वकास के
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a s em3. लड़ कय को अवश्य हुनर द। “लड़ कय के पास शक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चा हए ता क वे आत्म नभर हो
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सक। हुनर ऐसा खज़ाना है, जसे कोई नह छ न सकता।”

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4. मन क शां त के लए भी जरूरी है। ब से सीधे कहते ह — “य द नह तो ज़रूर सीखो। मन क शां त के लए यह बहुत

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जरूरी है।”
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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

अं तम संदेश: “लय हम अनुशासन सखाती है, संतुलन सखाती है… सुर और लय से हम एक-दूसरे का सहयोगी
बनकर अपने लक्ष्य क ओर बढ़ने क प्रेरणा मलती है।” — यानी कला केवल हुनर नह , च रत्र भी बनाती है।

प्र.5 2. पाठ म से उन प्रसंग क पहचानकर उन पर चचा क जए, जनसे पता चलता है क— (क) बरजू महाराज
बहुमुखी प्र तभा के धनी थे।

पाठ म कम-से-कम छह प्रसंग ऐसे ह जो उनक बहुमुखी प्र तभा दखाते ह —

1. तीन कलाएँ एक साथ — “म नृत्य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हूँ।” नतक, वादक और गायक — तीन एक व्य क्त म।
2. रचनाकार — नृत्य ना टकाएँ बनाना और उनके लए संगीत तैयार करना; टै गोर और त्यागराज जैसे भन्न- भन्न भाषाओं के
क वय क रचनाओं पर कथक रचना करना।
3. परंपरा म नवाचार — “कथक क पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण म बदलाव कए ह।” चाचा और
बाबूजी के खड़े होने के अंदाज को भी कथक म शा मल कर लया।
4. यंत्र का ान — “अगर म नतक न होता तो शायद इंजी नयर होता।” ब्रीफकेस म पेचकस; पंखा- ज खुद ठ क करना।
5. चत्रकार — रात बारह बजे के बाद चत्र बनाना; दो वष म लगभग सत्तर चत्र।
6. शक्षक — गंडा बाँधने क परंपरा को नई दृ ष्ट दे ना और शोभना नारायण जैसी शष्याएँ तैयार करना।

चचा का सूत्र: कक्षा म यह प्रश्न उठाइए — क्या इतनी सारी रु चयाँ रखने से मुख्य काम कमजोर नह पड़ जाता?
पाठ इसका उत्तर दे ता है: नह , क्य क उनक हर रु च क जड़ एक ही है — लय और संतुलन। मशीन के पुज म भी
लय है, चत्र क रेखाओं म भी।

प्र.6 (ख) बरजू महाराज को नृत्य क ऊँचाइय तक पहुँचाने म उनक माँ का बहुत योगदान रहा।

माँ का योगदान पाठ म तीन स्पष्ट प्रसंग से सद्ध होता है —

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

प्रसंग पाठ क पं क्त इससे क्या पता चलता है

संघ ष में “संघष के दौर म मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ िपता के दे हांत के बाद पूरा घर उ न्ही ं के बल पर िटका।
सहारा थ ।”

गज
ु ारे का “कभी कज लेते थे तो कभी पुरानी ज़री क सा ड़याँ अपनी सािड़ याँ तक जला दी,ं पर बेटे की तालीम रुकने नही ं दी।
पबंध जलाकर उनके सोने-चाँद के तार बेचते थे।”

गंडा बँध वाना “अम्मा ने मेरे दो कायक्रम क कमाई बाबूजी को भट बाबूजी ने कहा था — “भेटं िमलने पर ही गंडा बाँधूँगा।” यिद अम्मा
के रूप म दे द ।” वह भेटं न जुटाती ं तो औपचािरक तालीम शुरू ही न होती।

अभ्यास की “खाने को भले ही चना मले या कुछ भी न मले पर भूख से भी ऊपर उ न्होंने साधना को रखा — यही वाक्य पूरे जीवन
पेर णा अभ्यास जरूर करो।” का मंत्र बन गया।

नष्कष: पता और चाचा ने कला सखाई, पर माँ ने वह प र त बनाए रखी जसम सीखना संभव हो सका।
इसी लए कहा जा सकता है क उन्ह ऊँचाई तक पहुँचाने म माँ का योगदान सबसे बड़ा था।

प्र.7 (ग) बरजू महाराज म हलाओं के लए समानता के पक्षधर थे।

इसके तीन प्रमाण पाठ म मलते ह —

1. अपनी बे टय को कथक सखाया। “मेरी बहन को कथक नह सखाया गया पर मने अपनी बे टय को खूब सखाया।” यहाँ
वे स्वयं यह अंतर स्वीकार करते ह और अपनी पीढ़ म उसे बदल दे ते ह।
2. आत्म नभरता पर जोर। “लड़ कय के पास शक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चा हए ता क वे आत्म नभर हो सक।
हुनर ऐसा खज़ाना है, जसे कोई नह छ न सकता और वक्त पड़ने पर काम आता है।”
3. शष्या को उदाहरण बनाकर पेश करना। जब पूछा गया क क्या पढ़ाई या नौकरी के साथ नृत्य चल सकता है, तो उन्ह ने
उदाहरण एक म हला का दया — “मेरी शष्या शोभना नारायण आई.ए.एस. अफसर ह और अच्छ नतक भी।”

चचा के लए: ध्यान द जए क वे केवल ‘लड़ कय को भी मौका मलना चा हए’ नह कहते; वे कारण भी दे ते ह —
हुनर वह संप त्त है जो छ नी नह जा सकती। यह तक आज भी उतना ही सच है। कक्षा म इस पर बात क जए
क आपके आस-पास कौन-कौन-से हुनर लड़ कय को आत्म नभर बना रहे ह।

शब्द क बात — उपसग और प्रत्यय — पृष्ठ 106 और 107

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से

पाठ से व्याकरण

प्र.1 (क) पाठ म आए हुए कुछ शब्द नीचे दए गए ह, इन्ह ध्यान से प ढ़ए— आजी वका, सी मत, प्र शक्षण, सुंदरता,
आधु नक, पारंप रक, भारतीय, सामू हक, शास्त्रीय। आपने इन शब्द पर ध्यान दया होगा क मूल शब्द के आगे
या पीछे कोई शब्दांश जोड़कर नया शब्द बना है।

इन नौ शब्द को खोलकर दे खए — हर शब्द म एक मूल शब्द है और उसके आगे या पीछे जुड़ा एक शब्दांश।

शब्द वभाजन शब्दांश प्रकार

आजीिवका आ + जीिवका आ उपसग

सीिमत सीमा + इत इत प्रत्यय

पिशक्षण प + िशक्षण प्र उपसग

सुंद रता सुंद र + ता ता प्रत्यय

आध िु नक अधुना + इक इक प्रत्यय

पारंपिरक परंपरा + इक इक प्रत्यय

भारतीय भारत + ईय ईय प्रत्यय

सामूिहक समूह + इक इक प्रत्यय

शास्त्रीय शास्त्र + ईय ईय प्रत्यय

नयम याद र खए: शब्द के आगे जुड़ने वाला शब्दांश उपसग कहलाता है (अ + दृश्य = अदृश्य, आ + वरण =
आवरण, प्र + शक्षण = प्र शक्षण) और शब्द के पीछे जुड़ने वाला शब्दांश प्रत्यय (सीमा + इत = सी मत, सुंदर + ता
= सुंदरता, भारत + ईय = भारतीय, समूह + इक = सामू हक)।

ध्यान द जए: ‘इक’ और ‘ईय’ प्रत्यय जुड़ते ही मूल शब्द क पहली मात्रा प्राय: बड़ी हो जाती है — समूह →
सामू हक, परंपरा → पारंप रक, इ तहास → ऐ तहा सक। इसे व्याकरण म ‘वृ द्ध’ कहते ह।

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प्र.2 (ख) नीचे दो तबले ह, एक म कुछ शब्दांश (उपसग व प्रत्यय) ह, दूसरे तबले म मूल शब्द ह। इनक सहायता से नए
शब्द बनाइए— शब्दांश: आ, अ, ईय, सु, इक, आ, ता, इत। मूल शब्द: मम, गमन, राष्ट्र, खंड, श्रम, संस्कृ त, कम,
नाम, साधारण।

दोन तबल को जोड़कर बनने वाले शब्द —

मूल शब्द + शब्दांश नया शब्द अथ

गमन आ (उपसग) आगमन आना, पधारना

खंड अ (उपसग) अखंड जसके टु कड़े न ह , पूरा

श्रम आ (उपसग) आश्रम साधना और नवास का ान

कम सु (उपसग) सुक म अच्छा काम

रा ईय (प्रत्यय) रा ीय राष्ट्र से संबं धत

संस्कृ ित इक (प्रत्यय) सांस्कृ ितक संस्कृ त से संबं धत

मम इक (प्रत्यय) मािमक मन को छू लेने वाला

साधारण ता (प्रत्यय) साधारणता सामान्य होने का भाव

नाम इत (प्रत्यय) नािमत जसका नाम रखा या चुना गया हो

वाक्य म प्रयोग:

अ त थय के आगमन पर वद्यालय म कथक क प्रस्तु त हुई।
बरजू महाराज ने कथक क परंपरा को अखंड रखते हुए उसक प्रस्तु त बदल द ।
गुरुकुल के आश्रम म सुबह चार बजे से रयाज़ शुरू हो जाता था।
अम्मा का त्याग एक सुकम था, जसने बेटे को महाराज बना दया।
कथक हमारी राष्ट्रीय धरोहर है।
वद्यालय का सांस्कृ तक कायक्रम बहुत सफल रहा।
सुधा चंद्रन क कहानी बहुत मा मक है।
उनके व्यवहार क साधारणता ही उन्ह महान बनाती थी।
उन्ह इस वष के पुरस्कार के लए ना मत कया गया।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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सुझाव: तबले म ‘आ’ दो बार दया गया है — इस लए ‘आ’ से दो शब्द (आगमन, आश्रम) बनाना ही अपे क्षत है।

m a s emमक जैसे
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आप और भी जोड़ सकते ह, जैसे कम + इक = का मक, नाम + ईय? नह — पर धम + इक = धा
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उदाहरण पहचानने

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(ग) इस पाठ म से उपसग व प्रत्यय क सहायता से बने कुछ और शब्द छाँटकर उनसे वाक्य बनाइए।
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क. उपसग से बने शब्द

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शब्द उपसग + मूल अपना वाक्य

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अदृ श्य नत्ृ य के समय मानो कोई अदृ श्य शिक्त नतक के भीतर उतर आती है।

aglअनौपचािरक अन + औपचा रक पहले कथक कथा कहने का एक अनौपचािरक ढं ग था।

यह पद हिरया m a s
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पचिलत प्र + च लत गाँव में आज भी पचिलत है।

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पिरवतन प र + वतन
gl a न्होंने गंडा बाँध ने की परंपरा में पिरवतन िकया।

अितिरक्त अ त + रक्त
a नत्ृ य के अितिरक्त उ न्हे ं िचत्रकला में भी रुिच थी।

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परंपरा उस वृक्ष की तरह है जो सबको आश्रय दे ती है।
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आश्रय आ + श्रय

m यह साक्षात्कार एक सुपिस द्ध कलाकार का है।gla
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सुपिसद्ध सु + प्र सद्ध
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िनमंत्र ण न + मंत्रण उ न्हे ं िवदे श से नत्ृ य का िनमंत्रण िमला।

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ख. प्रत्यय से बने शब्द
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as अपना वाक्य
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शब्द मूल + प्रत्यय

नतक नृत् + अक
a शास्त्रीय नत्ृ य में एक नतक अके ला ही काफ़ ी होता है।

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मंच पर चार कलाकार एक साथ आए।
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कलाकार कला + कार

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m glकीa जाती है।ं
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मनमोह + क उनकी मनमोहक पस्तुितयाँ आज भी याद

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मनमोहक

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लोकिपयता लोक प्रय + ता अब शास्त्रीय नत्ृ य की लोकिपयता बढ़ रही है।
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हुनर लड़ िकयों को आत्मिनभर बनाता है।

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आत्मिनभर आत्म + नभर

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m कु छ वष पहले तक शास्त्रीय नत्ृ य की िस्थित दयनीय थी।
दयनीय दया + नीय
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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

छाँटने क तरक ब: जस शब्द के आरंभ म अ, अन, प्र, प र, व, न, सु, अ त जैसे टु कड़े दख, वहाँ उपसग क
संभावना है; जस शब्द के अंत म ता, इक, ईय, इत, अक, कार, नीय दखे, वहाँ प्रत्यय क । फर टु कड़ा हटाकर
दे खए — य द बचा हुआ शब्द अपने-आप म अथवान है, तो आपका वभाजन सही है।

शब्द का प्रभाव — पृष्ठ 107
पाठ से

पाठ से भाषा

प्र.1 1. “कुछ क थक डर गए कतु उन क थक क कला म इतना दम था क डाकू सब कुछ भूलकर उन क थक के
कथक म मग्न हो गए।” इस वाक्य म रेखां कत शब्द ‘इतना’ हटाकर वाक्य प ढ़ए और पहचा नए क क्या
प रवतन आया है?

‘इतना’ हटाने पर वाक्य बनेगा: “कुछ क थक डर गए कतु उन क थक क कला म दम था क डाकू सब कुछ भूलकर उन
क थक के कथक म मग्न हो गए।”
क्या प रवतन आया:

पहलू ‘इतना’ के साथ ‘इतना’ के बना

मात्रा का बोध कला में िकतना दम था — यह नाप दे ता है केवल इतना क दम था; कतना, पता नह चलता

वाक्य की ‘इतना… िक ’ एक जोड़ ी है, इसिलए दोनों िहस्से आपस में जोड़ी टू ट जाती है, ‘ क’ अकेला रह जाता है और वाक्य
बनावट कस कर जुड़ जाते है ं अटपटा लगने लगता है

पभाव चमत्कार का भाव — डाकु ओं का िठठक जाना िवश्वसनीय बात साधारण सूचना बनकर रह जाती है, अचरज गायब हो
लगता है जाता है

क्य : ‘इतना’ एक प रमाणबोधक वशेषण है। यह अकेले नह आता, ‘ क’ के साथ जोड़ी बनाकर आता है —
“इतना … क …”। यह जोड़ी कारण और प रणाम को बाँध दे ती है: कला म इतना दम था — यही कारण; डाकू मग्न
हो गए — यही प रणाम। ‘इतना’ हटते ही कारण क मात्रा गायब हो जाती है और प रणाम बेबु नयाद लगने लगता
है।

स्वयं पर खए: इन जोड़ को बोलकर दे खए — “वह इतना थक गया क सो गया” / “वह थक गया क सो गया”।
दूसरा वाक्य कान को खटकता है। यही ‘इतना’ क ताकत है।

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प्र.2 पाठ म आए हुए वाक्य म से ऐसे ही कुछ और शब्द ढूँ ढ़कर उन्ह रेखां कत क जए जनके प्रयोग से वाक्य म
वशेष प्रभाव उत्पन्न होता है?

पाठ म ऐसे कई शब्द ह जो वाक्य म बल, मात्रा या आश्चय भर दे ते ह। नीचे शब्द मोटे अक्षर म ह —

पाठ का वाक्य प्रभाव डालने क्या प्रभाव पड़ता है
वाला शब्द

“हवेल ी के दरवाजे पर आठ-आठ िसपािहयों का आठ-आठ ‘आठ’ कहने से केवल संख्या मलती; ‘आठ-आठ’ से हर दरवाजे
पहरा होता था।” पर आठ — यानी वैभव कतना बड़ा था, यह दखता है।

“अम्मा बार-बार यही कहा करती थी ं।” बार-बार माँ का आग्रह कतना गहरा था, यह पुनरु क्त से ही पता चलता
है।

“मैं दे ख-दे खकर कथक सीख गया था।” दे ख-दे खकर एक बार दे खने से नह , लगातार दे खते रहने से — सीखने क
प्र क्रया लंबी थी, यह उभर आता है।

“कथक की परंपरा बहुत पुरानी है।” बहुत ‘पुरानी’ क मात्रा बढ़ाकर उसे महाभारत-रामायण तक ले जाता
है।

“ जरा भी गड़बड़ी हुई नही ं िक उसका हाथ गया।” जरा भी छोट -से-छोट चूक क भी गुंजाइश नह — लय क कठोरता
तीखी हो जाती है।

“मैंने अपनी बेिटयों को खूब िसखाया।” खूब ‘ सखाया’ भर कहते तो सामान्य बात होती; ‘खूब’ से भरपूर,
दल खोलकर सखाने का भाव आता है।

“ अब िसफ ‘पनघट की गत दे खो’ कहकर बाकी िसफ पहले और अब के अंतर को तेज कर दे ता है — पहले वस्तृत
दशक की कल्पना पर छोड़ िदया जाता है। ” वणन, अब केवल संकेत।

“लड़िकयों के पास … कोई-न-कोई हन
ु र अवश्य अवश्य सलाह को आग्रह म बदल दे ता है — यह वकल्प नह ,
होना चािहए।” आवश्यकता है।

पहचान का नयम: ऐसे शब्द प्राय: तीन तरह के होते ह — (1) पुनरुक्त शब्द (आठ-आठ, बार-बार, कभी-कभी,
धीरे-धीरे, एक-एक), (2) प रमाणबोधक (इतना, बहुत, खूब, जरा भी), और (3) बल दे ने वाले (ही, भी, सफ,
अवश्य, बलकुल)। इन्ह हटाकर वाक्य प ढ़ए — य द अथ रह जाए पर असर चला जाए, तो सम झए वही शब्द
वशेष प्रभाव पैदा कर रहा था।

कला का संसार — पृष्ठ 108

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पाठ से आगे

पाठ से आगे

प्र.1 (क) बरजू महाराज— “कथक क पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण म बदलाव कए
ह।” इस कथन को ध्यान म रखते हुए ल खए क कथक क प्रस्तु तय म कस प्रकार के प रवतन आए ह?

पाठ के अनुसार कथक क आत्मा वही रही, पर उसका प्रस्तुतीकरण कई तरह से बदला —

पहले अब

मंच नही ं होते थे; फश पर ‘चाँद नी’ (बड़ी सफे द चादर) िबछा दी जाती ऊँ चा मंच बनता है, दशक सामने की ओर बैठते है,ं पकाश और ध्विन
थी और दशक चारों ओर बैठते थे। की व्यवस्था होती है।

श्रंगृ ार के िलए चंद नले प और होंठ रंग ने के िलए पान। आधुिनक मंच-श्रंगृ ार और वेशभूषा।

नतक कथा के दृ श्यों का इतना िवस्ततृ वणन करते थे िक पूर ा दृ श्य के वल “पनघट की गत दे खो” कहकर बाकी दशक की क ल्पना पर
दशक के सामने िखंच जाता था — गोिपयों का घड़ा उठाना, पनघट की छोड़ िदया जाता है — पस्तुित संिक्षप्त और संके त-पधान हो गई।
ओर चलना, कृ ष्ण का कं कड़ मारना।

िवषय मुख्यत: कृ ष्ण-लीला और पौरािणक कथाएँ। टैगोर, त्यागराज जैसे आधुिनक किवयों की रचनाओं पर भी कथक
रचनाएँ तैयार की गईं।

के वल नाचने की मुद ाएँ। िबरजू महाराज ने चाचा लोगों और बाबूजी के खड़ े होने के अंद ाज और
भाव-भंिगमाओं को भी कथक में शािमल कर िलया — तीनों की िशक्षा
को इक ा करके एक नया रूप बनाया।

कथक मंिदरों तक सीिमत, कथा कहने का अनौपचािरक ढं ग । कथक मंच की, दे श-िवदे श की कला बन गया — “भारत ही नही ं
बिल्क िवदे शों में भी िबरजू महाराज का स्मरण… िकया जाता है।”

‘परंपरा कायम, प्रस्तु त नई’ का अथ: ताल, लय, तत्कार, हस्तक और भाव — यह कथक का व्याकरण है, जसे
उन्ह ने छु आ तक नह । बदला केवल यह क वह व्याकरण कस मंच पर, कस वषय पर और कतने वस्तार से
दखाया जाए। वे स्वयं परंपरा को वृक्ष कहते ह — “वृक्ष से लए बीज को बोएँ तो समय आने पर ही एक और वृक्ष
फलेगा।” नया वृक्ष होगा, पर बीज वही रहेगा।

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प्र.2 (ख) लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य म क्या अंतर है? ल खए। (इस प्रश्न के उत्तर के लए आप अपने सहपा ठय ,
अ भभावक , शक्षक , पुस्तकालय या इंटरनेट क सहायता भी ले सकते ह।)

आधार लोक नृत्य शास्त्रीय नृत्य

स्वरूप सामूिहक — सब िमलकर नाचते है ं पाय: एकल — “एक नतक अके ला ही काफ़ ी होता है”

उ े श्य नाचने वाल के अपने मन-बहलाव और संतु ष्ट के लए; दनभर क दशक के लए — प्रस्तु त दखाने के लए
थकान दूर करने के लए

िनयम कोई कठोर शास्त्र नह ; क्षेत्र क परंपरा से चलता है नाट्यशास्त्र आ द ग्रंथ के नयम म बँधा; मुद्राएँ, ताल,
हस्तक न श्चत

पिशक्षण दे खकर, साथ नाचकर सीख लया जाता है वष क गुरु- शष्य परंपरा और कठोर तालीम
आवश्यक

अवसर फसल कटाई, त्योहार, ववाह, उत्सव मंच, नृत्य-सभा, महोत्सव

उदाहरण भांगड़ा (पंजाब), गरबा (गुजरात), बहू (असम), घूमर (राज ान), कथक, भरतनाट्यम, कु चपुड़ी, कथकली,
लावणी (महाराष्ट्र), छऊ (झारखंड/ओ डशा) मो हनीअट्टम, ओ डसी, म णपुरी, सत्रीया

दोन म रश्ता भी है: बरजू महाराज बताते ह क “शुरू म कथावाचक भी लोक नतक हुआ करता था। धीरे-धीरे
जब उसक खास शैली व रूप न श्चत होता गया तो वह शास्त्रीय नृत्य हो गया।” यानी शास्त्रीय नृत्य लोक नृत्य का ही
प रष्कृत और नयमबद्ध रूप है — वे एक-दूसरे के वरोधी नह , एक ही धारा के दो पड़ाव ह।

प्र.3 (ग) “बैर गया नाला जुलुम जोर, / नौ क थक नचाव तीन चोर। / जब तबला बोले धीन-धीन, / तब एक-एक पर
तीन-तीन।” इस पाठ म ह रया गाँव म गाए जाने वाले उपयुक्त पद का उल्लेख है। आप अपने क्षेत्र म गाए जाने
वाले कसी लोकगीत को कक्षा म प्रस्तुत क जए।

यह प्रस्तु त क ग त व ध है। इसे अच्छे ढं ग से करने के लए यह क्रम अपनाइए —

1. गीत जुटाइए — घर के बड़ , दाद -नानी या पड़ोस के कसी बुजुग से पू छए क आपके क्षेत्र म कस अवसर पर कौन-सा गीत
गाया जाता है — बुआई, कटाई, ववाह, तीज-त्योहार या ऋतु-प रवतन पर।
2. लख ली जए — गीत क पं क्तयाँ जैसी बोली जाती ह, वैसी ही ल खए। बोली के शब्द बद लए मत; यही उसक पहचान है।
3. अथ सम झए — गीत कस अवसर का है, उसम कौन-सी कहानी या भावना है, यह पहले खुद सम झए। जैसे बैर गया नाला
वाला पद एक घटना सुनाता है — नौ क थक ने अपनी कला से तीन डाकुओं को नचा दया।
4. ताल पक ड़ए — गीत को हाथ से ताल दे ते हुए गाइए। लोकगीत क ताल प्राय: सरल होती है (जैसे कहरवा या दादरा)।
5. कक्षा म प्रस्तुत क जए — पहले एक वाक्य म बताइए क गीत कसका है और कब गाया जाता है, फर गाइए। चाह तो समूह
म कोरस बनाकर गाइए।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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नमूना उत्तर (ह रयाणा/प मी उ.प्र. का वषा-गीत):

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“काली-काली बदरी उमड़ी आई रे,
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e के बैल, बोवे बाजरा,
हरी-हरी धरती ओढ़ चुनरी रे।
हलधरsहाँ
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g गावे मंगल, बाजे ढोल कया रे।”
aअम्मा
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प रचय: यह गीत पहली बा रश के बाद बुआई के समय गाया जाता है। इसम बादल, धरती और कसान — तीन क

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खुशी एक साथ आती है। इसक ताल कहरवा है और इसे ढोलक के साथ समूह म गाया जाता है।
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पद पर ध्यान द जए: बैर गया नाला वाले पद म “एक-एक पर तीन-तीन” का अथ है — तबले क एक थाप पर

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तीन गुनी ग त। यानी नतक तगुन लय म नाच रहे थे। लोकगीत म भी संगीत क यह बारीक छपी होती है।

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semक रचना — पृष्ठ 108 और 109
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साक्षात्कार
पाठ से आगे

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पाठ से आगे वधा

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प्र.1
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प्रस्तुत ‘साक्षात्कार’ के आधार परgबताइए— (क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैया रयाँ क गई ह गी?

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पाठ स्वयं कहता है — “साक्षात्कार क सफलता इस बात पर नभर करती है क साक्षात्कारदाता के संदभ म कतना शोध कया गया
.c कस प्रकार के बनाए गए ह।” इस साक्षात्कार से पहले ये तैया रयाँ हुई ह गी —
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as1.e व्य क्त के बारे म पढ़ाई — बरजू महाराज कौन ह, कस घराने के ह, उनके गुरु कौन थे, उन्ह कौन-से सम्मान मले
है और प्रश्न

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(पद्म वभूषण) — यह सब पहले जान लया गया, तभी ब े बाबूजी, चाचा, गंडा और घराने पर सीधे प्रश्न पूछ सके।

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2. वषय क समझ — कथक, लय, ताल, घराना, लहरा, लोक और शास्त्रीय नृत्य — इन शब्द को समझे बना ऐसे प्रश्न बन ही
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नह सकते थे।

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3. प्रश्न क सूची बनाना और क्रम तय करना — ध्यान द जए, बातचीत बचपन से शुरू होती है, फर तालीम, फर कथक का
इ तहास, फर वतमान त और अंत म ब -अ भभावक के लए संदेश। यह क्रम अपने-आप नह बना — पहले से सोचा
गया।
4. समय और
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ान तय करना — कब, कहाँ और कतनी दे र मलना है, इसक अनुम त पहले ली गई होगी।

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gधैl य। संघष और गरीबी जैसे प्रश्न पूछते समय
5. साधन जुटाना — कॉपी-पेन या रकॉडर, और बाद म बातचीत को लखकर व्यव त करना।

. o क तैयारी — पाठ म तीन शब्द दए ह: पयाप्त तैयारी, संवेदनशीलता और
6.cमन
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as em संवेदनशीलता ही सबसे बड़ी तैयारी है।
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प्रमाण पाठ म ही है: श्रेया का पहला प्रश्न है — “सुना है क आपका बचपन संघष से भरा हुआ था।” यह वाक्य
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बताता है क पूछने वाले को उत्तर क दशा पहले से मालूम थी। बना शोध के ऐसा प्रश्न बन ही नह सकता।
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प्र.2 (ख) आप इस साक्षात्कार म और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहगे?

अच्छा प्रश्न वह है जसका उत्तर ‘हाँ/नह ’ म न हो, और जो पाठ म छू ट हुई कसी बात को खोले। ऐसे कुछ प्रश्न —

प्रश्न यह प्रश्न क्य

आपके जीवन की सबसे यादगार पस्तुित कौन-सी रही और क्यों? कलाकार के मन का सबसे भीतरी क्षण सामने आता है।

मंच पर जाने से ठीक पहले आपके मन में क्या चलता है? क्या आपको कभी घबराहट बच्चों के अपने डर से जुड़ता है — बहुत उपयोगी उ त्तर
हुई? िमलता।

िवदे शी दशक, जो हमारी कथाएँ नही ं जानते, आपके नत्ृ य को कै से समझ पाते है?ं फ ांस वाले पसंग को और आगे बढ़ ाता।

एक नए िवद्याथ को रोज़ िकतने घंटे िरयाज़ करना चािहए और उसकी शुरुआत कै से व्यावहािरक मागदशन — पाठक तुर ंत काम में ला
करनी चािहए? सके ।

क्या आपने कभी नत्ृ य छोड़ दे ने का मन बनाया? उस समय आपको िकसने सँभाला? संघ ष के दू स रे पक्ष — हार के क्षण — को छू ता है।

आप नई रचना (कोिरयोग ाफी) कै से सोचते है ं — पहले संग ीत बनता है या भाव? स ृजन की पिक्रया समझ में आती है।

िफल्मों के िलए नत्ृ य-िनदशन करना और मंच पर नाचना — दोनों में क्या अंतर लगता उनकी दू स री दुिनया की जानकारी िमलती।
है?

आप अपनी िचत्रकारी और अपने नत्ृ य में कोई समानता दे खते है?ं उनकी दो रुिचयों को जोड़ कर नया उ त्तर िनकलवाता।

प्रश्न बनाते समय बच: “क्या आपको कथक पसंद है?” जैसे प्रश्न से — इनका उत्तर एक शब्द म खत्म हो जाता है।
‘क्य ’, ‘कैसे’, ‘क्या-क्या’ से शुरू होने वाले प्रश्न ही बातचीत को आगे बढ़ाते ह।

प्र.3 (ग) यह साक्षात्कार एक सुप्र सद्ध कलाकार का है। य द आपको कसी सब्जी वक्रेता, र ा चालक, घरेलू
सहायक या सहा यका का साक्षात्कार लेना हो तो आपके प्रश्न कस प्रकार के ह गे?

प्रश्न व्य क्त के काम, दनचया, क ठनाइय और सपन के आसपास ह गे — और सबसे बड़ी बात, वे सम्मानपूण ह गे। कसी से
उसक गरीबी पर तरस खाते हुए प्रश्न पूछना साक्षात्कार नह , अपमान है।

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कसका प्रश्न
साक्षात्कार

सब्जी िवक्रेता आपका िदन िकतने बजे शुरू होता है? मंडी से स ब्जी कै से चुनते है ं — ताजगी कै से पहचानते है?ं िकस मौसम में काम सबसे
किठन होता है? दाम तय करते समय सबसे बड़ ी मुिश्कल क्या आती है? क्या आपने यह काम िकसी से सीखा?

िरक्शा चालक आप रोज़ िकतनी दू री तय करते है?ं शहर का कौन-सा रास्ता आपको सबसे अच्छा लगता है और क्यों? गम और बरसात में
सवारी ढोना कै सा रहता है? कोई ऐसी सवारी जो आपको आज तक याद है? आप अपने बच्चों को क्या बनाना चाहते है?ं

घरे ल ू सहायक/ आपके िदन की शुरुआत कै से होती है? एक िदन में िकतने घरों में काम होता है? आपको सबसे अच्छा कौन-सा काम लगता
सहाियका है? काम और अपने घर — दोनों को कै से सँभालती है?ं आपको लोगों से िकस तरह का व्यवहार अच्छा लगता है?

ध्यान रखने योग्य पाँच बात: (1) पहले अपना प रचय द जए और अनुम त ली जए। (2) उनके काम के समय म
बाधा मत डा लए। (3) आमदनी जैसे नजी प्रश्न सीधे मत पू छए। (4) उनक बोली म ही बात क जए। (5) अंत म
धन्यवाद क हए — पाठ म लखा है क साक्षात्कार के लए “संवेदनशीलता और धैय क आवश्यकता होती है”, और
यह बात हर व्य क्त के लए बराबर लागू होती है, चाहे वह पद्म वभूषण हो या र ा चालक।

नमूना आरंभ: “नमस्ते चाचा जी! म सातव कक्षा म पढ़ता हूँ। हम वद्यालय से काम मला है क कसी कामकाजी
व्य क्त से बात कर। य द आपके पास दस मनट ह तो क्या म आपसे आपके काम के बारे म कुछ पूछ सकता हूँ?”

सृजन — पृष्ठ 109
पाठ से आगे

पाठ से आगे सृ ज न

प्र.1 आपके वद्यालय म कथक नृत्य का आयोजन होने जा रहा है। (क) आप दशक को कथक नृत्यकला के बारे म
क्या-क्या बताएँगे? ल खए।

दशक को कथक का प रचय दे ते समय पाँच बात अवश्य आनी चा हए — नाम का अथ, उद्गम, घराने, वशेषताएँ और दे खने का
तरीका।

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नमूना उत्तर (मंच से बोलने के लए):
“आदरणीय अ त थयो और सा थयो, आज आप जो नृत्य दे खने जा रहे ह, उसका नाम है कथक। ‘कथक’ शब्द
‘क थक’ से बना है, जसका अथ है कथावाचक — यानी कहानी सुनाने वाला। बहुत पहले मं दर म क थक रामायण
और महाभारत क कथाएँ संगीत और भाव-भं गमाओं के साथ सुनाते थे; वही धीरे-धीरे कथक बन गया।

कथक ब्रजभू म क रासलीला से उपजा है। इसके तीन प्रमुख घराने ह — लखनऊ, जयपुर और बनारस। लखनऊ
घराने के सबसे बड़े नाम रहे पं डत बरजू महाराज, जन्ह पद्म वभूषण से सम्मा नत कया गया।

कथक क पहचान है — तेज चक्कर, पैर का तत्कार यानी घुँघरुओं से नकलने वाली ताल, और चेहरे के कोमल
भाव। इसम गदन ‘ चराग क लौ के समान’ हल्के-से हलती है और उँ ग लयाँ ऐसे चलती ह जैसे घूँघट उठाया जा रहा
हो। इसक सबसे रोमांचक चीज है जुगलबंद — जसम तबलावादक और नतक के बीच मानो प्र तयो गता चलती
है: तबला जो बोलता है, पैर वही दोहरा दे ते ह।

आपसे नवेदन है क प्रस्तु त के समय ताल पर ध्यान द जए — घुँघरू और तबला जब एक साथ रुकते ह, वही क्षण
कथक का सबसे सुंदर क्षण होता है। धन्यवाद!”

अच्छे प रचय का ढाँचा: क्या → कहाँ से आया → कौन-कौन बड़े नाम → क्या खास दे खना है → धन्यवाद। पाँच
मनट से लंबा प रचय दशक को थका दे ता है।

प्र.2 (ख) इस कायक्रम क सूचना दे ने के लए एक व ापन तैयार क जए।

वज्ञापन म पाँच सूचनाएँ अ नवाय ह — क्या, कौन, कब, कहाँ और कैसे आएँ। भाषा छोट , आकषक और सीधी हो।

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नमूना व ापन:

घुँघ रू बोले ंगे!
कथक संध् या 2026

राजकीय उ च्च माध्यिमक िवद्यालय, नयागाँव

पस्तुित: लखनऊ घराने की कथक नत्ृ यांगना सुश्री ______ एवं िवद्य ालय के िवद्य ाथ
संगत: तबला, सारंगी एवं हारमोिनयम

िदनांक : शिनवार , 14 नवंबर
समय: सायं 5:00 बजे
स्थान: िवद्यालय का सभागार

पवेश िन:शुल्क · सभी के िलए खुल ा
िद व्यांग दशकों हेत ु िवशेष व्यवस्था उपल ब्ध

“लय हमें अनुशासन िसखाती है, संतल
ु न िसखाती है।” — पंिडत िबरजू महाराज

संपक : सांस्कृ ितक सिचव, िवद्यालय काय लय

व ापन क तीन कसौ टयाँ: (1) क्या सबसे ऊपर क पं क्त पढ़ते ही आयोजन का नाम समझ आता है? (2) क्या
तारीख, समय और ान एक नज़र म दख जाते ह? (3) क्या कोई ऐसी पं क्त है जो पढ़ने वाले को आने के लए
ललचाए? यहाँ “घुँघरू बोलगे!” और बरजू महाराज का उद्धरण यही काम करते ह।

प्र.3 (ग) य द इस नृत्य कायक्रम म कोई दृ ष्टबा धत दशक है और वह नृत्य का आनंद लेना चाहे तो इसके लए
वद्यालय क ओर से क्या व्यव ा क जानी चा हए?

दृ ष्टबा धत दशक नृत्य को कान, स्पश और शब्द से ‘दे ख’ सकता है। वद्यालय ये व्यव ाएँ कर सकता है —

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व्यव ा यह क्य काम करती है

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aमेsं स्वयं मौजूद था — पहले
.c omDescription) — एक व्यिक्त धीमे स्वर में साथ-
ऑिडयो-वणन (Audio
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यह वही तरीका है जो पुराने कथकl
नतक दृ श्य का ऐसा िवस्ततृ aवणन करते थे िक “पूरा दृ श्य िखंच
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sचक्कर…”
साथ बताता रहे िक मंच पर क्या हो रहा है: “अब नतकी दािहनी ओर मुड़ी…

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अब तीन जाता था”।

आगे की पंिक्त में बैठाना और अच्छी ध्विन-व्यवस्था घुँघ रू और तत्कार की आवाज सबसे स्पष्ट सुनाई दे गी —

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कथक का आधा आनंद तो ध्विन में ही है।
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पस्तुित से पहले पिरचय — कथा, पात्र, वेशभूषा और मुदाएँ aशब्दोंseमें समझा दे ना
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कहानी पहले से पता हो तो के वल ताल सुनकर भी दृ श्य मन में
बन जाता है।

पश-अनुभव — कायक्रम से पहले या बाद में घुँघरू, तबला, हारमोिनयम और
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स् वस्तु का आकार-भार हाथ से जान ले ने पर ध्विन का अथ खुल

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वेशभूषा को छू कर दे खने का अवसर जाता है।

बेल या बड़ े .अcoरोंm a s
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क्षमें कायक्रम-पि का; ऑिडयो रूप में भी
त्र
agl क्रम जान सकेंगे।
वे भी बाकी दशकों की तरह

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gl पास मंच-कं पन महसूस करने की जगह — लकड़ी के मंच के िनकट
मं च के
a बैठने की व्यवस्था
तत्कार की थाप फश से होकर शरीर तक पहचु ँ ती है — ताल
‘महसूस ’ की जा सकती है।

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सहायक साथी और बाधामुक्त रास्ता — पवेश से सीट तक स म्मानपूवक और स्वतंत्र रूप से आना-जाना संभव हो।

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मूल बात: सु वधा का उ े श्य दया दखाना नह , बराबरी दे ना है। बरजू महाराज कहते ह क नृत्य म लय ही सब कुछ

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है — और लय सुनी जा सकती है। इस लए थोड़ी-सी व्यव ा से दृ ष्टबा धत दशक भी कथक का पूरा आनंद ले

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सकता है।

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a l क पहेली — पृष्ठ 109 और 110
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पाठ से आगे
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पहे ली

प्र.1
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एक वद्याथ ने अपनी डायरी म अपने वद्यालय के कसी एक दन का उल्लेख कया है। उस उल्लेख म संगीत क

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कुछ ताल के नाम आए ह। आप उन ताल के नाम ढूँ ढ़ए— “कल हमारे वद्यालय म संगीत और नृत्य सभा का
आयोजन हुआ था। उसम एक-दो नह ब ल्क चार कलाकार आए थे। उन कलाकार म एक का नाम रूपक और
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o m l a seजब अपनी प्रस्तु त के लए मंच
दूसरे का नाम लक्ष्मी था। शेष दो कलाकार के नाम पता नह चल पाए। वे दोन

m .c पर आए तो दशक से पूछने लगे— ‘ तलवाड़ा, दादरा या झूमरा?’ दशक ag बोले— ‘तीन म से कोई नह । हम
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द पचंद और कहरवा पसंद है।’ दशक क यह बात सुनते ही कलाकार ने अपनी प्रस्तु त प्रारंभ कर द ।”
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डायरी के इस छोटे -से अंश म सात ताल के नाम छपे ह —

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क्रम ताल का नाम डायरी म कहाँ छपा है मात्राएँ

1 रूपक “एक का नाम रूपक” — कलाकार के नाम के रूप म 7

2 ल क्ष्मी (ताल ) “दूसरे का नाम लक्ष्मी था” 18

3 ितलवाड़ ा “ तलवाड़ा, दादरा या झूमरा?” 16

4 दादरा वही वाक्य 6

5 झूमरा वही वाक्य 14

6 दीपचंद ी “हम द पचंद और कहरवा पसंद है।” 14

7 कहरवा वही वाक्य 8

पहेली क चालाक : ‘रूपक’ और ‘लक्ष्मी’ को कलाकार के नाम बनाकर छपाया गया है, इस लए पढ़ते समय वे
ताल जैसे लगते ही नह । बाक पाँच नाम बातचीत के भीतर सीधे रख दए गए ह। यही इस पहेली का मज़ा है — नाम
सामने रखे ह, पर वेश बदलकर।

याद रखने योग्य: पाठ म समझाया गया है क मात्रा संगीत के समय को मापने क सबसे छोट इकाई है और ताल
कई मात्राओं का संयुक्त रूप — “ जस तरह घंटे म मनट और मनट म सेकड होते ह, उसी तरह ताल म मात्रा होती
है।” इसी लए हर ताल क अपनी मात्रा-संख्या होती है, जैसे दादरा म 6 और कहरवा म 8।

प्र.2 अब नीचे द गई शब्द पहेली म से संगीत क उन ताल के नाम ढूँ ढ़कर ल खए—

पुस्तक क शब्द-पहेली 7 पं क्तय और 6 खान क है। सात ताल इसम मौजूद ह — कुछ बाएँ से दाएँ, कुछ ऊपर से नीचे। नीचे पूरा
ग्रड और उसम मले नाम दए ह (मोटे अक्षर = ताल के अक्षर)।

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1 2 3 4 5 6

पं.1 ती झ रू ल भ ित

पं.2 न च प क्ष्मी क ल

पं.3 म ल क ह र वा

पं.4 ल इ झू म रा ड़ ा

पं.5 दी प चं दी दा त

पं.6 ड़ च क र द ढ़

पं.7 ए म ल घ रा क

पहेली म मले ताल:

ताल दशा ान

रूपक ऊपर से नीचे ↓ खाना 3, पं क्त 1–3 (रू–प–क)

लक्ष्म ी ऊपर से नीचे ↓ खाना 4, पं क्त 1–2 (ल–क्ष्मी)

ितलवाड़ा ऊपर से नीचे ↓ खाना 6, पं क्त 1–4 ( त–ल–वा–ड़ा)

कहरवा बाएँ से दाएँ → पं क्त 3, खाने 3–6 (क–ह–र–वा)

झूम रा बाएँ से दाएँ → पं क्त 4, खाने 3–5 (झू–म–रा)

दीपचंद ी बाएँ से दाएँ → पं क्त 5, खाने 1–4 (द –प–चं–द )

दादरा ऊपर से नीचे ↓ खाना 5, पं क्त 5–7 (दा–द–रा)

खोजने क तरक ब: पहले डायरी वाले प्रश्न से सात नाम लख ली जए, फर हर नाम का पहला अक्षर ग्रड म ढूँ ढ़ए
और वहाँ से केवल दो दशाओं म — दाईं ओर और नीचे — पढ़कर दे खए। ‘क्ष्मी’ जैसा संयुक्त अक्षर एक ही खाने
म रखा गया है, इस लए अक्षर गनते समय खान को ग नए, मात्राओं को नह ।

ध्यान द: ग्रड के बचे हुए खाने (जैसे पं क्त 6 और 7 के अ धकांश अक्षर) केवल भरने के लए ह — इन्ह ‘भराव
अक्षर’ कहते ह। हर शब्द-पहेली म ये होते ह ता क नाम आसानी से न दख जाएँ।

झरोखे से — नृत्य क छटाएँ — पृष्ठ 110 और 111

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पाठ से आगे

झरोखे से

प्र.1 बरजू महाराज ने भारत के व भन्न राज्य के शास्त्रीय नृत्य का उल्लेख कया है। आइए, इनके बारे म अपनी
समझ बढ़ाते ह—

पाठ म जन शास्त्रीय नृत्य का उल्लेख है, उनका सार एक ता लका म —

नृत्य राज्य उद्गम / नाम का अथ प्रमुख वशेषता

भरतनाट म तिमलनाडु ‘भरतमु न’ + ‘नाट्यम’; कुछ व ान नृत्य वधा का सवा धक प्राचीन रूप; भाव और नृत्त
‘भरत’ को भाव, राग, ताल से भी दोन का एक साथ प्रयोग।
जोड़ते ह। मं दर नतक क एकल
प्रस्तु त ‘सा दर’ से संबंध।

कथकली के रल रामानाट्टम और कृष्णानाट्टम — दो संगीत, नृत्य और नाटक का संयोजन; पुरुष मंडली
लोक नाट्य परंपराओं से उद्भव; ारा; आँख और भौह का लय-संचालन प्रमुख;
मलयाली क व वी.एन. मेनन ने राजा ‘ओज’ क प्रधानता।
मुकुंद के संरक्षण म प्रचार कया।

कथक उ त्तर भारत ब्रजभू म क रासलीला से उत्पन्न; नाम घरान का वकास; जुगलबंद मुख्य आकषण, जसम
(बजभूिम / लखनऊ, ‘क थक’ से, जसे कथावाचक भी तबलावादक और नतक के बीच प्र तस्पधात्मक खेल
जयपुर, बनारस कहते ह। होता है।
घराने)

कु िचपुड़ी आंध पदे श पारंप रक शास्त्रीय शैली। प्रस्तु त प्राथना से आरंभ, फर नृत्य-अ भनय; कनाटक
संगीत क संगत; समापन ‘तरंगम’ प्रस्तु त के बाद।

मिणपुर ी मिणपुर पौरा णक आख्यान के अनुसार ोत ‘लाई हरोबा’ त्योहार म प्रचलन; सामान्यत: स्त्रय
— म णपुर क घा टय म ानीय ारा; चेहरे क अ भव्य क्त के ान पर हाथ के हाव-
गंधव के साथ शव-पावती का दै वीय भाव और पैर क ग त महत्वपूण; कोमलता प्रधान।
नृत्य।

ओिडसी ओिडशा नाट्यशास्त्र म उ ल्ल खत ‘ओद्र नृत्य’ से मुख्य आकषण त्रभंग मुद्रा — शरीर का तीन मोड़
नाम। वाला रूप; नचला हस्सा र, धड़ लय-ताल के साथ
ग तमान; कुछ मुद्राएँ भरतनाट्यम से मलती-जुलती।

मोिहनीअट्टम के रल भारत के आठ शास्त्रीय नृत्य म से घुमावदार, कोमल आं गक अ भनय; मुख क
एक। अ भव्य क्त और हस्त-मुद्राओं को सवा धक महत्व;
पारंप रक पोशाक ‘मुंडू’; परंपरागत रूप से केवल
स्त्रय ारा (जब क कथकली केवल पुरुष ारा)।

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बरजू महाराज क तुलना याद र खए: “ओ डसी और म णपुरी म कोमलता है, कथकली म ओज है। कथक म
दोन ह।” साथ ही वे बताते ह क कथक क भाव-भं गमा दै नक जीवन से ली गई है और भरतनाट्यम क मू तकला
से; भरतनाट्यम म दोन भाव का प्रयोग एक साथ होता है और कथक म बारी-बारी से।

जोड़कर दे खए: बरजू महाराज ने सात शै लयाँ गनाई थ — कथक, भरतनाट्यम, कु चपुड़ी, कथकली,
मो हनीअट्टम, ओ डसी, म णपुरी। आठवाँ शास्त्रीय नृत्य सत्रीया (असम) है, जसका उल्लेख पाठ म नह है — इसे
भी अपनी सूची म जोड़ ली जए।

साझी समझ — पृष्ठ 112
पाठ से आगे

साझी समझ गतवध

प्र.1 अभी आपने शास्त्रीय नृत्य को नकटता से जाना समझा। पाँच-पाँच वद्या थय के समूह म भारत के लोक नृत्य
क सूची बनाइए और उनक व शष्टताओं का पता लगाइए।

समूह म काम बाँट ली जए — हर सदस्य दो-तीन राज्य क जम्मेदारी ले, फर सब मलाकर एक साझी सूची बनाइए।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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लोक नृत्य राज्य व शष्टता / अवसर

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भांग ड़ा और िग ा
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बैसाखी और फसल कटाई पर; ढोल क तेज थाप, ऊँची उछाल; ग ा स्त्रय का,

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बो लय के साथ।

glऔर डांिडया
aगरबा गुजरात नवरात्र म; गोल घेरे म ताली और डंड क ताल।
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घूम र राजस्थान घेरदार घाघरा घुमाते हुए गोलाकार नृत्य; ववाह और त्योहार पर।

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िबहू असम ag बोहाग बहू (नववष) पर; ढोल, पेपा (भस के स ग क बाँसुरी) के साथ तेज ग त।

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लावणी महारा ढोलक क थाप पर; कथा-प्रधान, तेज लय और भावपूण अ भनय।

मुखौटा नृत्य; युद्ध-कौशल और पौरा णक कथाओं काem
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झारखंड, ओिडशा, पिश्चम
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छऊ मंचन; यूनेस्को क सूची म

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राउत नाचा / पंथी छत्तीसगढ़ दे वउठनी एकादशी और गुरु घासीदास जयंती पर; तेज ग त और मानव-मीनार।

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राजस्थान
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कालबेिलया कालबे लया समुदाय क स्त्रय का साँप जैसी लचक वाला नृत्य; बीन और खंजरी

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क संगत।

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कन टक
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डोल्लू कु िनता

पडयनी / के रल मं दर उत्सव पर; तरुवा तरकली स्त्रय का वृत्ताकार नृत्य।

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ितरुवाितरकली

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नाटी िहमाचल पदे श कुल्लू दशहरा पर; लंबी पं क्त म धीमी, संयत ग त।

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उ त्तर पदे श (बज) सर पर जलते द य का बड़ा रथनुमा चक्र रखकर नृत्य; होली और जन्माष्टमी पर।

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िबहार
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िझिझया सर पर छद्रयुक्त घड़े म द पक रखकर; दशहरे के आसपास।

m पर बाँस टकराते ह और नत कयाँ बीच म पैर रखकर नाचती ह।
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चेर ाव (बाँस नत्ृ य) िमज़ ोरम
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व शष्टता खोजने के चार सवाल: (1) यह नृत्य कस अवसर पर होता है? (2) कौन करता है — स्त्री, पुरुष या

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दोन ? (3) कौन-से वाद्य साथ बजते ह? (4) वेशभूषा म क्या खास है? इन चार सवाल के उत्तर लख लेने से हर नृत्य

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क पहचान अपने-आप बन जाती है।

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प्र.2 नीचे दए गए भारत के मान चत्र म राज्यानुसार शास्त्रीय एवं लोक नृत्य दशाइए।

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पुस्तक म दया गया मान चत्र खाली रूपरेखा (outline map) है — उसम आपको स्वयं नाम भरने ह। यह व ध अपनाइए:
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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

1. दो रंग तय क जए — जैसे नीला = शास्त्रीय नृत्य, हरा = लोक नृत्य। मान चत्र के नीचे एक छोट सूची (Legend) बनाइए
जसम दोन रंग का अथ लखा हो।
2. पहले शास्त्रीय नृत्य भ रए — ये गनती म कम ह और राज्य न श्चत ह।
3. फर हर राज्य म एक-दो लोक नृत्य ल खए, ता क मान चत्र भरा-भरा न लगे।
4. अक्षर छोटे र खए और नाम राज्य क सीमा के भीतर ल खए; जगह कम हो तो तीर बनाकर बाहर ल खए।

राज्य शास्त्रीय नृत्य (नीला) लोक नृत्य (हरा)

तिमलनाडु भरतनाट म करगाट्टम, कुम्मी

के रल कथकली, मोिहनीअट्टम तरुवा तरकली, पडयनी

आंध पदे श कु िचपुड़ी वीरनाट्यम

ओिडशा ओिडसी छऊ (मयूरभंज), गोट पुआ

मिणपुर मिणपुरी थांग-टा, लाई हरोबा

असम स त्रीया बहू

उत्तर पदे श कथक (लखनऊ, बनारस घराना) चरकुला, रासलीला

राजस्थान कथक (जयपुर घराना) घूमर, कालबे लया

पंजाब — भांगड़ा, ग ा

गज
ु रात — गरबा, डां डया रास

महारा — लावणी, कोली

छत्तीसगढ़ — पंथी, राउत नाचा

झारखंड — छऊ, पाइका

िहमाचल पदे श — नाट

जम्मू-कश्मीर — रऊफ, कुद

कन टक — यक्षगान, डोल्लू कु नता

पिश्चम बंग ाल — छऊ (पुरु लया), गंभीरा

िमज़ोरम — चेराव

नागालै ंड — चांग लो

िबहार — झ झया, जट-ज टन

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान द: पुस्तक का मान चत्र भारतीय सवक्षण वभाग (Survey of India, Scale 1:16M) का है। मान चत्र म
नाम भरते समय राज्य क सीमाएँ बद लए मत और मान चत्र पर शीषक अवश्य ल खए — जैसे “भारत:
राज्यानुसार शास्त्रीय एवं लोक नृत्य”।

खोजबीन के लए — पृष्ठ 113
पाठ से आगे

खोजबीन

प्र.1 नीचे द गई इंटरनेट क ड़य क सहायता से आप भारतीय नृत्य, संगीत और बरजू महाराज के बारे म जान-समझ
सकते ह— • भारतीय शास्त्रीय संगीत म नृत्य संगत • कथक प रचय भाग 7 • पं डत बरजू महाराज

पुस्तक म तीन वषय क इंटरनेट क ड़याँ (QR कोड स हत) द गई ह। इन्ह दे खते समय केवल वी डयो चलाकर छोड़ मत द जए —
साथ म नोट बनाइए। नीचे बताया गया है क हर कड़ी म क्या दे खना-सुनना है:

कड़ी क्या दे खए-सु नए अपनी कॉपी म क्या ल खए

भारतीय शास्त्रीय तबला, सारंगी, हारमो नयम और पखावज नृत्य के साथ कौन-कौन से वाद्य िदखे, कौन-सी ताल बजी, संगतकार
संग ीत में नत्ृ य संग त कैसे बजते ह; ‘लहरा’ कैसा सुनाई दे ता है। और नतक के बीच संके त कै से चलते है।ं

कथक पिरचय भाग 7 तत्कार, चक्कर, आमद, तोड़ा, टु कड़ा और हस्तक — पाँच कथक शब्द और उनका अथ; ‘जुगलबंद ी’ का एक
कथक के मूल अंग। उदाहरण।

पंिडत िबरजू महाराज उनक प्रस्तु तयाँ, हाव-भाव, गदन और उँ ग लय क पाठ की कौन-सी बात वीिडयो में सचमुच िदखी (जैसे
कोमल ग त — जनक चचा पाठ म हुई है। ‘िचराग की लौ के समान’ गद न का िहलना)।

खोजबीन का सही तरीका: कड़ी खोलने से पहले तीन प्रश्न लख ली जए जनका उत्तर आप ढूँ ढ़ना चाहते ह। दे खने
के बाद उन तीन प्रश्न के उत्तर ल खए और यह भी ल खए क कोई नया प्रश्न मन म आया या नह । इसी तरह
जानकारी टकाऊ बनती है।

और कहाँ खोज: संगीत नाटक अकादमी और भारत सरकार के संस्कृ त मंत्रालय क वेबसाइट, आकाशवाणी के
अ भलेखागार, तथा अपने शहर क सावज नक लाइब्रेरी। इंटरनेट पर दे खते समय शक्षक या घर के बड़ क
उप त म ही खोज क जए और ोत का नाम अपनी कॉपी म अवश्य ल खए।

पढ़ने के लए — नृत्यांगना सुधा चंद्रन — पृष्ठ 114 और 115

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से आगे — रामा ा तवारी

पढ़ने के लए

प्र.1 ‘नृत्यांगना सुधा चंद्रन’ — रामा ा तवारी (पाठ के अंत म ‘पढ़ने के लए’ दया गया गद्यांश)। इसे प ढ़ए और
सम झए क यह पाठ के साथ क्य जोड़ा गया है।

कथासार: सुधा चंद्रन के माता- पता — श्रीमती थंगम और श्री के. डी. चंद्रन — चाहते थे क उनक बेट राष्ट्रीय ख्या त क नृत्यांगना
बने। इस लए पाँच वष क अल्पायु म ही उन्ह मुंबई के प्र सद्ध नृत्य वद्यालय ‘कला-सदन’ म भत कराया गया। शक्षक को पहले
हच कचाहट हुई, पर श्री के.एस. रामास्वामी भागवतार ने उनक प्र तभा दे खकर उन्ह शष्या बना लया।
2 मई, 1981 को तरु चरापल्ली से मद्रास जाते समय बस दुघटना म उनका बायाँ पाँव टू टा और दाएँ पाँव म ‘गग्रीन’ हो गया।
दुघटना के एक महीने बाद दायाँ पैर घुटने से साढ़े सात इंच नीचे से काटना पड़ा। लकड़ी के गुटके और बैसा खय के सहारे चलते हुए
उन्ह ने फर पढ़ाई शुरू क ।
फर वे जयपुर जाकर कृ त्रम अंग वशेषज्ञ डॉ. पी.सी. सेठ से मल । उनके प्रश्न — “क्या म नाच सकूँगी?” — का उत्तर डॉ. सेठ
ने दया, “क्य नह , प्रयास करो तो सब कुछ संभव है।” पहले अल्यू म नयम का पैर बना, पर अभ्यास म ठूँ ठ से खून रसने लगा। तब
डॉ. सेठ ने उनके नृत्य प्र शक्षक के साथ बैठकर पाँव क मुद्राएँ परख और नृत्य क जरूरत के अनुसार नया पैर बनवाया। पैर
लगाते समय उन्ह ने कहा — “म जो कुछ कर सकता था मने कर दया, अब तुम्हारी बारी है।”
28 जनवरी, 1984 को मुंबई के ‘साउथ इं डया वेलफेयर सोसायट ’ के हॉल म उन्ह ने नतक प्री त के साथ फर सावज नक प्रदशन
कया — और वह अत्यंत सफल रहा। उनके जीवन पर तेलुगु फल्म ‘मयूरी’ बनी, जसम उन्ह ने स्वयं अ भनय कया और 33व
राष्ट्रीय फल्म समारोह म वशेष पुरस्कार पाया। हद म यही फल्म ‘नाचे मयूरी’ नाम से आई।

यह गद्यांश यहाँ क्य दया गया है: बरजू महाराज का साक्षात्कार कहता है क कला क ठन साधना माँगती है —
“अपने जीवन म प्राप्त सफलताओं के लए उन्ह ने क ठन साधना क थी।” सुधा चंद्रन क कहानी उसी बात का
दूसरा और और भी क ठन उदाहरण है। एक ने गरीबी से लड़कर कला बचाई, दूसरी ने शारी रक अक्षमता से लड़कर।
दोन क जड़ एक है — अभ्यास कभी मत छोड़ो।

सीख: लेखक क पहली ही पं क्त पूरे गद्यांश का सार है — “जीवन के कसी भी क्षेत्र म शखर तक पहुँचने के लए
दृढ़ इच्छाश क्त और क ठन प रश्रम क आवश्यकता पड़ती है।” साथ ही यह कहानी बताती है क सफलता अकेले
क नह होती — माता- पता, गुरु और डॉ. सेठ जैसे लोग मलकर उसे संभव बनाते ह। यही बात ‘सृजन’ वाले प्रश्न
(ग) से भी जुड़ती है, जसम दृ ष्टबा धत दशक के लए व्यव ा करने को कहा गया है।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ क वधा साक्षात्कार है — वह भी व्य क्तपरक साक्षात्कार, जसका उ े श्य साक्षात्कारदाता के नजी जीवन, कामकाज,
उपल य और वचार को पाठक के सामने लाना है। यह नौकरी वाले साक्षात्कार से बलकुल अलग है।
बरजू महाराज को कथक वरासत म मला। उनके गुरु थे उनके पता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू
महाराज। घर म कथक का माहौल था, इस लए औपचा रक तालीम शुरू होने से पहले ही वे दे ख-दे खकर कथक सीख गए थे।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार AglaSem · NCERT Solutions

पता के दे हांत के बाद घर म गहरी आ थक तंगी आई — कभी कज, कभी पुरानी ज़री क सा ड़याँ जलाकर सोने-चाँद के तार
बेचना। इस दौर म सबसे बड़ी सहयोगी उनक माँ थ , जो कहती थ — “खाने को भले ही चना मले या कुछ भी न मले पर
अभ्यास जरूर करो।”
गंडा (ताबीज़) बाँधने क रस्म गुरु- शष्य के प वत्र रश्ते का प्रतीक है। बरजू महाराज ने इस परंपरा को उल्टा कर दया — वे
पहले वष तक सखाते ह और जब शष्य म स ी लगन दखती है, तभी गंडा बाँधते ह।
लय पाठ का कद्र य वचार है। लय केवल नृत्य म नह , घ सयारे के हँ सया चलाने तक म है; वह हर काम म संतुलन बनाए
रखती है, अनुशासन सखाती है और नृत्य को सुंदरता दे ने वाला आवरण है।
कथक क परंपरा बहुत पुरानी है — ‘महाभारत’ के आ दपव और ‘रामायण’ म इसक चचा मलती है। लखनऊ घराने के बाद
जयपुर और बनारस घराने वक सत हुए; रायगढ़ के महाराज चक्रधर क भी अपनी शैली थी।
लोक नृत्य सामू हक होता है और नाचने वाल के अपने मनोरंजन के लए, जब क शास्त्रीय नृत्य म एक नतक अकेला ही
काफ़ होता है और वह दशक के लए होता है।

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कक्षा 7 हद अध्याय 8 बरजू महाराज से साक्षात्कार
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त्व रत पुनरावृ त्त
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अथ.co agअपने वाक्य म प्रयोग
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शब्द पाठ म सं दभ

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गंडा ताबीज़; तालीम आरंभ करते समय ग रु
ु ारा िशष्य “गुरु शष्य को गंडा (ताबीज़) बाँधते
ह”
गुरुजी ने स ी लगन दे खकर ही उसे
गंडा बाँधा।
के हाथ में बाँध ा जाने वाला धागा

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e mसमय…”
तालीम पिशक्षण, िशक्षा “कथक क तालीम शुरू करते संगीत क तालीम बचपन से ही शुरू

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कर दे नी चा हए।

घराना
a g “हमारे लखनऊ घराने के लोग…” कराना घराने क गायक अपनी
कलाकारों का समुद ाय या कु टुंब, जो शैल ी को

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पीढ़ ी-दर-पीढ़ ी आगे बढ़ ाता है अलग पहचान रखती है।

चलतेm
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m a s eहोतीसमयहै।भी हमारे कदम म एक
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लय गित का क्रमबद्ध और संतिु लत पवाह “लय हर काम म, नृत्य म, जीवन म

. co संतुलन बनाए रखती है।” लय

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ताल कई मात्रा-समूहों का संयक्ु त रूप, िजससे संग ीत “ताल कई मात्राओं का संयुक्त रूप तबले पर तीन ताल बजते ही सब
में लय मापी जाती है है।” झूमने लगे।

omइकाई मात्रा है” a s
.cछोट agl
मात्रा संग ीत के समय को मापने की सबसे छोटी इकाई “संगीत के समय को मापने क सबसे कहरवा ताल म आठ मात्राएँ होती ह।

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लहरा a
नत्ृ य के साथ बार-बार दोहराई जाने वाली संग ीत “वह जान पाएगा क यह लहरा ठ क हारमो नयम पर लहरा बजते ही
की ध नु नह है” नतक ने तत्कार शुरू कया।

co m
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e से सजाते थे।
क थक “वहाँ 989 क थक के घर हुआ करते क थक अपनी कथा भाव-भं गमाओं

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कथावाचक; कथा कहते हुए नाचने वाला

m l
.co g
कलाकार थे।”

m a
l a se
चाँदनी िबछाने की बड़ी सफे द चादर “फश पर चाँदनी … बछ होती थी” आँगन म चाँदनी बछाकर संगीत-

a g सभा सजाई गई।

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comहै।” l a
साम य शिक्त, क्षमता “यह तो अपने साम य पर नभर करता अपने साम य से अ धक बोझ मत

g
m. a
उठाओ।

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ओज तेज, जोश, शिक्त “कथकली म ओज है।” उसके भाषण म ऐसा ओज था क
सब मंत्रमुग्ध रह गए।

mम भाव-भं गमा शब्द से भी
cनृअoत्यधक
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भाव- चेहरे और शरीर से भाव पकट करने का ढं ग “हमने उन भाव-भं गमाओं को भी

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com पूवजों से िमली संपित्त या परंपरा as
भं गमा कथक म शा मल कर लया।” बोलती है।

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वरासत “कथक क कला उन्ह वरासत भाषा हम वरासत म मली सबसे

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मली थी” बड़ी पूँजी है।

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 7
TypeSolution
Pages35
Languagehindi
Updated19 Sep 2026