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अ यतं गोपनीय - के वल आतं रक एव ं सी मत योग हेत ु
सीिनयर ूल सिटिफके ट परी ा - 2020
अंक-योजना HISTORY
SUBJECT CODE : 027 PAPER CODE : 61/1/2
सामा िनदश :-
1. आप जानते ह क परी ा थय के सही और उिचत आकलन के िलए उ र पुि तका का मू यांकन एक मह वपूण
या है। मू यांकन म एक छोटी-सी भूल भी गंभीर सम या को ज म दे सकती है जो परी ा थय के भिव य,
िश ा णाली और अ यापन- व था को भी भािवत कर सकती है। इससे बचने के िलए अनुरोध कया जाता है
क मू यांकन ारं भ करने से पूव ही आप मू यांकन िनदश को पढ़ और समझ ल। मू यांकन हम सबके िलए 10-12
दन का िमशन है अतः यह आव यक है क आप इसम अपना मह वपूण योगदान द।
2. मू यांकन अंक-योजना म दए गए िनदश के अनुसार ही कया जाना चािहए, अपनी ि गत ा या या कसी
अ य धारणा के अनुसार नह । यह अिनवाय है क अंक-योजना का अनुपालन पूरी तरह और िन ापूवक कया जाए।
हालाँ क, मू याक
ं न करते समय नवीनतम सच
ू ना और ान पर आधा रत अथवा नवाचार पर आधा रत उ र को
उनक स यता और उपयु ता को परखते ए परूे अक ं दए जाएँ।
3. मु य परी क येक मू यांकन कता के ारा पहले दन जाँची गई पाँच उ र पुि तका के मू यांकन क जाँच
यानपूवक कर और आ त ह क मू यांकन-योजना म दए गए िनदश के अनुसार ही मू यांकन कया जा रहा है।
परी क को बाक उ र पुि तकाएँ तभी दी जाएँ जब वह आ त हो क उनके अंकन म कोई िभ ता नह है।
4. परी क सही उ र पर सही का िनशान (√) लगाएँ और गलत उ र पर गलत का (×)। मू यांकन-कता ारा ऐसा
िच न न लगाने से ऐसा समझ म आता है क उ र सही है परं तु उस पर अंक नह दए गए। परी क ारा यह भूल
सवािधक क जाती ह।ै
5. य द कसी का उपभाग ह तो कृ पया के उपभाग के उ र पर दाय ओर अंक दए जाएँ। बाद म इन
उपभाग के अंक का योग बाय ओर के हािशये म िलखकर उसे गोलाकृ त कर दया जाए। इसका अनुपालन
दृढ़तापूवक कया जाए।
6. य द कसी के कोई उपभाग न हो तो बाय ओर के हािशये म अंक दए जाएँ और उ ह गोलाकृ त कया जाए।
इसके अनुपालन म भी दृढ़ता बरती जाए।
7. य द परी ाथ ने कसी का उ र दो थान पर िलख दया है और कसी को काटा नह है तो िजस उ र पर
अिधक अंक ा हो रहे ह , उस पर अंक द और दूसरे को काट द। य द परी ाथ ने अित र / का उ र दे
दया है तो िजन उ र पर अिधक अंक ा हो रहे ह उ ह ही वीकार कर/ उ ह पर अंक द।
8. एक ही कार क अशुि बार-बार हो तो उसे अनदख
े ा कर और उस पर अंक न काटे जाएँ।
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9. यहाँ यह यान रखना होगा क मू यांकन म संपूण अंक पैमाने 0 – 80 का योग अभी है अथात परी ाथ ने
य द सभी अपेि त उ र- बदु का उ लेख कया है तो उसे पूरे अंक दने े म संकोच न कर।
10. येक परी क को पूण काय-अविध म अथात 8 घंटे ित दन अिनवाय प से मू यांकन काय करना है और
ित दन मु य िवषय क बीस उ र-पुि तकाएँ तथा अ य िवषय क 25 उ र पुि तकाएँ जाँचनी ह। (िव तृत
िववरण ‘ पॉट गाइडलाइन’ म दया गया है)
11. यह सुिनि त कर क आप िन िलिखत कार क ु टयाँ न कर जो िपछले वष म क जाती रही ह –
उ र पुि तका म कसी उ र या उ र के अंश को जाँचे िबना छोड़ देना।
उ र के िलए िनधा रत अंक से अिधक अंक देना।
उ र या दए गए अंक का योग ठीक न होना।
उ र पुि तका के अंदर दए गए अंक का आवरण पृ पर सही अंतरण न होना।
आवरण पृ पर ानुसार योग करने म अशुि ।
योग करने म अंक और श द म अंतर होना।
उ र पुि तका से ऑनलाइन अंकसूची म सही अंतरण न होना।
कु ल अंक के योग म अशुि
उ र पर सही का िच न ( √ ) लगाना कतु अंक न देना। सुिनि त कर क ( √) या (×) का उपयु
िनशान ठीक ढंग से और प प से लगा हो। यह मा एक रे खा के प म न हो)
उ र का एक भाग सही और दूसरा गलत हो कतु अंक न दए गए ह ।
12. उ र पुि तका का मू यांकन करते ए य द कोई उ र पूण प से गलत हो तो उस पर (x) िनशान लगाएँ
और शू य (0) अंक द।
13. उ र पुि तका म कसी का िबना जाँचे ए छू ट जाना या योग म कसी भूल का पता लगना, मू यांकन काय
म लगे सभी लोग क छिव को और बोड क ित ा को धूिमल करता ह।ै
14. सभी परी क वा तिवक मू यांकन काय से पहले ‘ पॉट इवै यूएशन’ के िनदश से सुप रिचत हो जाएँ।
15. येक परी क सुिनि त करे क सभी उ र का मू यांकन आ है, आवरण पृ पर तथा योग म कोई अशुि
नह रह गई है तथा कु ल योग को श द और अंक म िलखा गया है।
16. क ीय मा यिमक िश ा बोड पुन: मू यांकन या के अंतगत परी ा थय के अनुरोध पर िनधा रत शु क
भुगतान के बाद उ ह उ र पुि तका क फोटो कॉपी ा करने क अनुमित दते ा ह।ै
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MARKING SCHEME HISTORY-027
CLASS XII A I S S C E-March 2020
CODE NO. 61/1/2
Q.NO. अपेक्षित उत्तर / मूल्य अंक PAGE MARKS
NO.
SECTION-A
1. D- इसकी लिखाई आज तक पढ़ी नहीीं जा सकी है Pg- 15 1
2. C- ब्राह्मी और खरोष्ठी Pg-28 1
3. लिखुणी OR Pg-92 1
अपने अनुयालययोीं को बुद्ध का अींलतम सींदेश था-“तुम सब अपने लिए खुद ही
ज्योलत बनो क्ोींलक तुम खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँ ढना है ” Pg-92 1
4. D- पुरा वनस्पलतज्ञो Pg-2 1
5. C- बुद्ध की ध्यान दशा Pg-100 1
6. C- I और III Pg-94 1
7. मथुरा (िगवान महावीर) से तीथंकर की छलव Pg-88 1
दृलिबालितोीं के लिए: सुत्त लपतक Pg-91 1
8. (A)- दोनोीं (A) और (R) सही हैं और(A) ,(R) सही स्पिीकरण है Pg-130 1
9. (D) औरीं गजेब Pg-234 1
10. (A)I, III औरीं IV Pg-233 1
11. गुरु रामानींद Pg-162 1
अथवा
1
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बसवण्णा Pg-147 1
12. गुरु गोलबींद लसींह Pg-164 1
13. मीराबाई Pg-164 1
14. (A) यह पुस्तक फारसी में लिखी गई है । Pg-118 1
15. लवष्णु Pg-144 1
16. (C) I, III औरीं IV Pg-425 1
17. (C) गोलवींद बल्लि पींत Pg-418 1
18. (C). स्वतींत्र िारत के लिए उपयुि राजलनलतक स्वरुप सुझाने के लिए Pg-389 1
19. अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा Action डायरे क्ट एक्शन डे ’की
घोषणा करने का कारण-, कैलबनेट लमशन से अपना समथथन वापस िेने के
Pg-391 1
बाद अपनी पालकस्तान की माूँग को जीतना था।
20. (B) लिप्स लमशन Pg-363 1
SECTION-B
21. 1857 के बाद औपक्षनवेक्षिक िहर-
i. 1857 के बाद िारत में लब्रलटश रवैया लवद्रोह के िगातार डर से
आकार िे रहा था।
ii. गोरे िोगोीं को अलिक सुरलित और अिग िेत्रोीं में रहने की जरूरत
थी।
iii. गोरे िोगोीं के लिए लसलवि िाइन लवकलसत हुई।
iv. सैलनकोीं को तैनात करने के लिए कैंटोनमेंट बनाए गए थे। Pg-326- 3
327
2
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v. िारतीयोीं के लिए अिग िेत्र सामने आया।
vi. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकसी िी तीन लबींदुओीं की जाींच की जानी चालहए
अथवा
दक्षिण भारत के िहर- मुख्य क्षविेषताएं -
i. मदु रई और काीं चीपुरम जैसे दलिण िारत के शहरोीं में, मुख्य
ध्यान मींलदर था।
ii. ये शहर महत्वपणथ व्यावसालयक केंद्र िी थे।
Pg-318- 3
iii. यहाूँ िालमथक त्योहार अक्सर मेिोीं को व्यापार के साथ तीथथ यात्रा 319
से जोड़ते हैं ।
iv. शहर वे स्थान थे जहाूँ हर लकसी को शासक कुिीन वगथ के
वचथस्व वािे सामालजक व्यवस्था में अपनी क्तस्थलत जानने की
उम्मीद थी।
v. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकसी िी तीन लबींदुओीं की जाीं च की जानी चालहए
22. जाक्षत व्यवस्था पर अल-क्षबरूनी के क्षवचार:
i. उन्ोींने सामालजक प्रदषण की िारणा को अस्वीकार कर
लदया।
ii. उन्ोींने लटप्पणी की लक जो कुछ िी अशुद्धता की क्तस्थलत में
आता है , वह प्रयास करता है और शुद्धता की अपनी मि
क्तस्थलत को प्राप्त करने में सफि होता है ।
iii. सरज हवा को साफ करता है , समुद्र में नमक पानी को
प्रदलषत होने से बचाता है ।
3
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iv. सींस्कृत जानकारी के अनुसार, ब्राह्मण जैसे लसर से लनलमथत,
कींिोीं से िलत्रय, जाीं घ से वैश्य और ब्रह्मा के पैरोीं से शद्र।
V उनके लवचार प्रामालणक सींस्कृत ग्रींथोीं के अध्ययन से प्रिालवत थे। Pg-124- 3
125
vi। कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं तीन लबींदुओीं की व्याख्या की जाए।
23. क्षविाल स्नानगार
i. लवशाि स्नानगार आूँ गन में बना एक लवशाि
आयातकार जिाशय था जो गलियारोीं से चारो तरफ से
लघरा था
ii. जिाशय में जाने के लिए उत्तर और दलिण में सीलढया
बनी थी
iii. जिाशय के लकनारो को ईटोीं को जमाकर जि बद्ध
लकया गया था
iv. इसके चारोीं और कि बने हुए थे लजस पास कुआीं था
Pg-8 3
v. जिाशय से पानी नािे में जाता था.
गलियारे के दोनोीं ओर अन्य स्नानगार थे।
24. गांधीजी द्वारा भारतीय राष्ट्रवाद का पररवततन:
i. 1922 तक, गाीं िीजी ने िारतीय रािरवाद को पररवतथन कर लदया था,
यह अब केवि पेशेवरोीं और बुक्तद्धजीलवयोीं का आीं दोिन नहीीं था।
ii. अब सैकड़ोीं और हजारोीं लकसानोीं, श्रलमकोीं और कारीगरोीं ने इसमें
िाग लिया।
iii. असहयोग आीं दोिन फैि गया और एक जन आीं दोिन बन गया।
iv. छात्रोीं ने सरकारी स्कि और कॉिेजोीं में जाना बींद कर लदया।
4
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v। वकीिोीं ने अदाितोीं में जाना बींद कर लदया।
vi। कई कस्ोीं और शहरोीं में श्रलमक वगथ हड़ताि पर चिे गए।
vii। लकसानोीं ने कर दे ने से इनकार कर लदया।
viii। कुमाऊीं में लकसानोीं ने औपलनवेलशक अलिकाररयोीं के लिए िार उठाने से
इनकार कर लदया।
ix. गाीं िीजी ने क्तखिाफत आीं दोिन के साथ गैर-सहयोग को युक्तित लकया
और इस तरह लहीं द-मुक्तिमोीं के साथ सींघषथ के आिार को व्यापक बनाया।
x. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं तीन लबींदुओीं की व्याख्या की जाए। Pg-350- 3
351
SECTION-C
25. क्षववाह के क्षनयम:
i. वींश को जारी रखने के लिए बेटोीं को महत्वपणथ माना जाता था और
बेलटयोीं की शादी बाहर की जाती थी और घर के सींसािनोीं पर उनका
कोई दावा नहीीं था।
ii. एीं डोगामी और एक्सोगामी प्रचलित थे।
iii. । बहुलववाह िी होता था।
iv. बहुपलतत्व- जैसे पाीं डवोीं में था।
v. िमथसत्रोीं और िमथशास्त्ोीं ने लववाह के आठ रूपोीं को मान्यता दी,
लजनमें से केवि चार को ही अच्छा माना गया।
vi. िड़लकयोीं की शादी सही समय पर सही व्यक्ति से की जाती थी और
कन्यादान को लपता का िालमथक कतथव्य माना जाता था।
vii. मलहिाओीं से अपेिा की गई थी लक वे अपने लपता के गोत्र को त्याग
दें और लववाह पर अपने पलत को गोद िें।
5
Page 8
viii. उसी गोत्र के सदस्य लववाह नहीीं कर सकते थे।
ix. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
x. लकन्ीीं चार लबींदुओीं का वणथन
Pg- 4+4=8
अथवा
55,57,58
600BCE-600CE के दौरान पाररवाररक संबंध:
i. पररवार आमतौर पर बींिुत्व का लहस्सा थे।
ii. यह बींिुत्व माना जाता था, रि पर आिाररत था।
iii. बींिुत्के एक दसरे के साथ सींबींि थे िेलकन किी-किी वे झगड़ा करते
थे।
iv. कौरवोीं और पाीं डवोीं के झगड़े ने के लवचार को मजबत लकया।
सींसािनोीं और लसींहासन का दावा कर सकता है ।
i. रि के आिार पर पाररवाररक सींबींि स्वािालवक थे।
ii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं DO लबींदुओीं का वणथन
क्षववाह के क्षनयम:
i. लववाह के प्रकार - अींत लववाह , बलह लबवाह.बहुपत्नी लववाह
,बहुपलत लववाह का पािन लकया गया।
ii. कन्यादान या लववाह में बेटी का उपहार लपता का एक महत्वपणथ
िालमथक कतथव्य माना जाता था।
iii. मलहिाओीं के गोत्र - मलहिाओीं से अपेिा की जाती थी लक वे अपने
लपता के गोत्र को त्याग दें और अपने पलत के लववाह पर उसे अपना
6
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िें।
iv. उसी गोत्र के सदस्य लववाह नहीीं कर सकते थे।
v. प्रत्येक गोत्र का नाम एक वैलदक द्रिा के नाम पर रखा गया था।
vi. मातृसत्तात्मक समाज - सातवाहनोीं में माताओीं के गोत्र से प्राप्त नाम
थे।
vii. बहुलववाह िी होता था।
viii. बहुपलतत्व- जैसे पाीं डवोीं में था।
ix. िमथसत्रोीं और िमथशास्त्ोीं ने लववाह के आठ रूपोीं को मान्यता दी,
लजनमें से केवि चार को ही अच्छा माना गया।
Pg-55,56,
x. कन्यादान को लपता का िालमथक कतथव्य माना जाता था।
60-65, 68
2+2+4=8
xi. उसी गोत्र के सदस्य लववाह नहीीं कर सकते थे।
xii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
दोनोीं को लमिा कर लकन्ीीं चार लबींदुओीं का वणथन
अथवा
बंधुत्व
i. पररवार आमतौर पर बींिुत्व का लहस्सा थे।
ii. यह बींिुत्व माना जाता था, रि पर आिाररत था।
iii. बींिुत्के एक दसरे के साथ सींबींि थे िेलकन किी-किी वे झगड़ा करते
थे।कौरवोीं और पाीं डवोीं के झगड़े ने के लवचार को मजबत
लकया।सींसािनोीं और लसींहासन का दावा कर सकता है । Pg-55,56,
2+2+4=8
60-65, 68
iv. बींिुत्के एक दसरे के साथ सींबींि थे िेलकन किी-किी वे झगड़ा करते
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थे।
v. कौरवोीं और पाीं डवोीं के झगड़े ने के लवचार को मजबत लकया।
सींसािनोीं और लसींहासन का दावा कर सकता है ।
vi. रि के आिार पर पाररवाररक सींबींि स्वािालवक थे।
vii. लववाह के प्रकार - अींत लववाह , बलह लबवाह.बहुपत्नी लववाह ,बहुपलत
लववाह का पािन लकया गया।
viii. कन्यादान या लववाह में बेटी का उपहार लपता का एक महत्वपणथ
िालमथक कतथव्य माना जाता था।
v. मलहिाओीं के गोत्र - मलहिाओीं से अपेिा की जाती थी लक वे अपने
लपता के गोत्र को त्याग दें और अपने पलत के लववाह पर उसे अपना
िें।
vi. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं चार लबींदुओीं का वणथन
वणत व्यवस्था
i. िमथसत्र और िमथशास्त्ोीं में आदशथ व्यवसाय के बारे में लनयम थे।
ii. ब्राह्मणोीं को वेदोीं का अध्ययन और लशिा दे ना, बलिदान और अनुष्ठान
करना, उपहार दे ना और प्राप्त करना था।
iii. िलत्रय युद्ध में शालमि होते थे, िोगोीं की रिा करते थे और न्याय
करते थे, वेदोीं का अध्ययन करते थे, बलिदान दे ते थे और उपहार दे ते
थे।
iv. वैश्य व्यापार, कृलष और दे हाती िमथ को लनिाना था, बलिदान प्राप्त
8
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करना और उपहार दे ना था।
v. शद्रोीं को राजकीय कायथ करने और तीन उच्च वणों की सेवा करनी
थी।
vi. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं चार लबींदुओीं का वणथन
यह क्षसद्ध करने के क्षलए क्षक इस क्षसद्धांत का सावतभौक्षमक रूप से पालन
नही ं क्षकया गया था:
i. गैर िलत्रय राजा- वणथ व्यवस्था के आदशथ पेशोीं के लवपरीत।शींग और
कण्व ब्राह्मण थे।
ii. कुछ सातवाहन रालनयोीं ने लववाह के बाद िी अपने लपता के गोत्र को
बरकरार रखा।
iii. सातवाहन शासकोीं में बेलिववाह के उदाहरण पाए गए।
iv. लहलडम्बा के साथ िीम का लववाह िमथसत्रोीं से अिग था।
वाकाटक रानी प्रिाती गुप्ता द्वारा िलमदान दे ने का प्रचिन
v. एकिव्य को तीरीं दाजी कौशि प्राप्त करना
vi. मींडसोर लशिािेख आदशथ व्यवसाय के लनयमोीं से लवचिन का एक
उदाहरण है ।
vii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु। (4)
लकन्ीीं चार लबींदुओीं का वणथन
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Page 12
26.
महानवमी क्षडब्बा से जुडे अनुष्ठान
i. महानवमी लडब्बा से जुड़े अनुष्ठान -जैसे लदन महानवमी (दस
लदवसीय लहीं द त्योहार के नौवें लदन) के साथ दशहरा )
ii. लवजयनगर के राजाओीं ने अपनी प्रलतष्ठा, शक्ति को प्रदलशथत लकयाI
iii. इस अवसर पर समारोह में छलव की पजा , घोड़े की पजा, िैंस और
अन्य जानवरोीं का बलिदान दे ना शालमि था I
iv. नृत्य, कुश्ती और घोड़ोीं हाथी, रथ और सैलनक के जुिस लनकािे
जाते थे ।
v. राजाओीं और मुख्य नायक और अिीनस्थ राजा, मेहमानोीं द्वारा
अनुष्ठान की िेंट दी गईींI
vi. समारोहोीं को जीवन के अथथ के साथ जोड़ा गया था।I
vii. कैसरबींद घोड़े , हाथी, रथ और सैलनकोीं का जुिस।
viii. राजा द्वारा सेना का लनरीिण।
ix. नायक द्वारा राजा को िेंट ।
x. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकसी िी छह लबींदुओीं को समझाया जाना है Pg-180- 6+2=8
183
हजारा राम मंक्षदर का महत्व:
i. यह मींलदर शायद राजा और उनके पररवार के लिए था।
ii. रामायण के दृश्योीं का वणथन दीवारोीं पर
iii. मींलदर पलवत्र केंद्र में क्तस्थत था।
iv. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं दो लबींदुओीं की व्याख्या की जाए।
10
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या
क्षवठ्ठला मंक्षदर की वास्तुकला की क्षविेषताएं :
i. मींलदर में प्रमुख दे वता लवठ्ठि हैं।
ii. लवठ्ठि लवष्णु का एक रूप है लजसे आमतौर पर महारािर में
पजा जाता है ।
iii. मींलदर में लवशाि गोपुरम (शाही द्वार) थे।
iv. इस मींलदर में कई हॉि थे।
v. गोपुरम
vi. स्तींलित मींडप।
vii. पथ के साथ सड़कें पक्की हो गईीं। एक अन्य लवलशि
लवशेषता रथ सड़कोीं की उपक्तस्थलत थी जो मींलदर से गोपुरम
तक एक सीिी रे खा में लवस्ताररत हुई थी।
viii. सड़कोीं को पत्थर की पलटयोीं से ढीं क लदया गया और स्तींिोीं
वािे मींडपोीं के साथ पींक्तिबद्ध लकया गया लजसमें व्यापाररयोीं Pg-186- 2+6=8
ने अपनी दु कानें िगाईीं। 188
ix. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
क्षवरुपाि मंक्षदर की क्षविेषताएं
i. मींलदर के सींरिक दे वता लवरुपाि और पम्पादे वी
थे।
ii. मींलदरोीं को अध्ययन केंद्र के रूप में कायथ लकया
जाता है ।
iii. िालमथक, सामालजक, साींस्कृलतक और आलथथक
केंद्र के रूप में मींलदर।
iv. शाही प्रालिकरण की लवशाि पैमाने की सींरचना।
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v. शाही द्वार या शाही गोपुरम
vi. मींडप
vii. हॉि को नक्काशीदार खींिोीं से सजाया गया है
viii. केंद्रीय स्थि या गिथगृह
ix. मींलदर में बने हॉि लवलिन्न प्रयोजनोीं के लिए
उपयोग लकए जाते थे।
x. वहाूँ पर दे वताओीं के लववाह सींपन्न हुए
xi. दोनोीं और स्तम्भ वािे मींडप
xii. छोटे -छोटे मींलदर
xiii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ी लबींदुओीं की व्याख्या
.
.
27. पहाक्षडयों के जीवन का तरीका:
i. राजमहि पहालड़योीं के आसपास रहने वािे िोग पहाड़ी के
रूप में जाने जाते थे।
ii. वे वनो पर रहते थे और स्थानाीं तरण खेती का अभ्यास करते
थे।
iii. उन्ोींने लवलिन्न प्रकार की दािें और बाजरा उगाए।
iv. उन्ोींने लबिी के लिए िोजन, रे शम कोकन और राि के लिए
महुआ एकत्र लकया।
v. वे लशकारी और िोजन इकट्ठा करते थे
vi. वे कृषक,उत्पादक, रे शम कृलम पािनकताथ थे।
vii. वे इमिी के पेड़ोीं के िीतर झोपलड़योीं में रहते थे।
viii. वे परे िेत्र को अपनी पहचान और अक्तस्तत्व का आिार मानते
थे।
ix. उन्ोींने बाहरी िोगोीं के प्रवेश का लवरोि लकया।
x. पहालड़या प्रमुखोीं ने समह की एकता बनाए रखी, लववादोीं को
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सुिझाया और िड़ाई में अपने कबीिोीं का नेतृत्व लकया।
xi. उन्ोींने लबखरे हुए वषों में अपने अक्तस्तत्व के लिए बसे लकसानोीं
के मैदानोीं पर छापा मारा और किी-किी उनके िाि के लिए
उनके साथ शाीं लत की बातचीत की।
xii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।.
संथालों के आने पर पहाक्षडयों की प्रक्षतक्षिया:
i. जब सींथािोीं ने वनोीं को साफ करने वािे िेत्र में डािना शुरू कर
लदया, तो िलम की जुताई करते हुए, पहालड़योीं ने राजमहि पहालड़योीं
में पुन: प्रवेश लकया।
ii. अींग्रेज़ोीं ने सींथािोीं को राजमहि की तिहटी में बसने के लिए
प्रोत्सालहत लकया और दालमन-ए-कोह को अपनी िलम घोलषत लकया।
iii. जब सींथाि लनचिी राजमहि पहालड़योीं में बसे तो पहालड़योीं ने शुरू
में लवरोि लकया, िेलकन उन्ें वापस िेने के लिए मजबर होना पड़ा।
iv. वे शुष्क आीं तररक और अलिक बींजर और चट्टानी ऊपरी पहालड़योीं Pg-266- 5+3
तक सीलमत थे, लजसने उनके जीवन को बुरी तरह प्रिालवत लकया 271
और उन्ें प्रिालवत लकया।
v. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं तीन लबींदुओीं की व्याख्या की जाए।
अथवा
राजमहल पहाक्षडयों की पररक्षध में बसे संथाल:
i. सींथािोीं ने 1780 के दशक तक बींगाि में आना शुरू कर लदया था।
ii. उन्ोींने जींगिोीं को साफ लकया, िकलड़योीं को काटा, िलम को जोता
और चावि और कपास उगाया।
iii. सींथाि हि की शक्ति का प्रलतलनलित्व करने के लिए आए थे।
iv. जमीींदारोीं ने उन्ें िलम को पुनः प्राप्त करने और खेती का लवस्तार
करने के लिए काम पर रखा।
v. लब्रलटश अलिकाररयोीं ने उन्ें जींगि में बसने के लिए आमींलत्रत लकया।
13
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vi. पहालड़योीं को लवफि करने के बाद, अींग्रेज सींथािोीं की ओर मुड़
गए।
vii. सींथािोीं को जमीन दी गई और राजमहि की तिहटी में बसने के
लिए राजी लकया गया।
viii. 1832 तक िलम का एक बड़ा िेत्र उनके लिए सीमाींलकत कर लदया
गया था, लजसे दालमन-ए-कोह के नाम से जाना जाता था।
ix. उनकी बक्तस्तयोीं का तेजी से लवस्तार हुआ।
x. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं पाूँ च लबींदुओीं की व्याख्या की जाए।
Pg-
270,271,
अंग्रेजों के स्लिलाफ संथाल क्षवद्रोह: 5+3
272
i. सींथािोीं ने पाया लक उनके हाथोीं से िलम क्तखसक रही थी।
ii. राज्य उस िलम पर िारी कर िगा रहा था जो उन्ोींने साफ़ की थी।
iii. ब्याज की उच्च दर वसि रहे थे।
iv. कजथ न चुकाने पर जमीन िे िेते थे।
v. जमीींदार दालमन िेत्र पर लनयींत्रण का दावा कर रहे थे।
vi. इसलिए सींथािोीं ने अींग्रेजोीं, जमीींदारोीं और िन उिारदाताओीं के
क्तखिाफ लवद्रोह कर लदया।
vii. कोई अन्य प्रासींलगक लबींदु।
लकन्ीीं तीन लबींदुओीं की व्याख्या
.
SECTION-D
28.
अकबर के िासन में भूक्षम का वगीकरण
चाछर भूक्षम तीन से चार वषत तक िली क्ों छोडी जाती थी ?
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Ans: चचेर िलम को तीन से चार वषों के लिए अवाप्त लकया गया था
तालक
i. यह इस अवलि के िीतर अपनी प्रजनन िमता वापस पा सकता है ।
ii. इससे उसकी ताकत ठीक हो सकती है । (2)
29.2 इस वगीकरण का आधार स्पष्ट् कीक्षजए।
उत्तर: वगीकरण पर आिाररत था
i. िलम की उवथरता।
ii. प्रलतवषथ खेती की जाने वािी लमट्टी की िमता या नहीीं। (2)
Pg-8 2+2+2=6
29.3 क्ा आपको लगता है क्षक राजस्व का आकलन करने के क्षलए यह
एक ठोस आधार था?
उत्तर:
i. यह वगीकरण िलम के प्रकार और उत्पादकता के अनुसार तय लकए
गए राजस्व का आकिन करने के लिए उलचत िगता है ।
ii. इसने काश्तकारोीं के लिए राजस्व का िुगतान आसान बना लदया।
(2)
29. क्षवद्रोही ग्रामीण
30.1 इन ग्रामीणों से क्षनपटने में अंग्रेजों के सामने आने वाली समस्या की
जााँच करें ।
उत्तर:
i. अींग्रेजोीं को ग्रामीणोीं से लनपटने में बहुत समस्या का सामना
करना पड़ा। वे लब्रलटश अलिकाररयोीं को दे खकर दर चिे जाते
थे।
ii. उन्ोींने बींदकोीं के साथ बड़ी सींख्या में लफर से एकत्र लकया।
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(2)
३०.२अवध) के लोग अंग्रेजों के स्लिलाफ क्ों थे?
उत्तर:
i. अवि के िोग शत्रुतापणथ थे क्ोींलक अवि के राजा को अींग्रेज़ोीं
ने लनष्कालसत कर लदया था
ii. िोकलप्रय राजा वालजद अिी शाह को किकत्ता में लनवाथ लसत
और लनवाथ लसत कर लदया गया था।
iii. लवघटन के साथ कई िोगोीं ने अपनी आजीलवका खो दी। (2)
Pg-296,
297, 305,
2+2+2=6
306
30.3 अंग्रेजों ने क्षवद्रोक्षहयों का दमन कैसे क्षकया?
उत्तर:
i. लवद्रोलहयोीं को वश में करने के लिए अींग्रेजोीं ने दमनकारी उपायोीं
को परी ताकत से अींजाम लदया। उत्तर िारत में माशथि िॉ िाग
लकया गया।
ii. कानन और व्यवस्था की सािारण प्रलियाओीं को लनिींलबत कर
लदया गया था और लवद्रोह के लिए सजा मृत्यु थी।
iii. लवद्रोही जमीींदारोीं को हटा लदया गया और वफादार को पुरस्कृत
लकया गया।
30.
सम्राट के अक्षधकारी की क्ा क्ा कायत करते थे
28.1 सम्राट के अक्षधकाररयों को क्षकस उद्दे श्य से क्षनयुक्त क्षकया गया था?
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उत्तर: राजा के अलिकाररयोीं को लनयुि लकया गया था
i. िोगोीं की सेवा करने के लिए, लवलिन्न प्रकार की नौकररयोीं की
दे खरे ख या दे खिाि करना।
ii. िोगोीं पर प्रशासलनक लनयींत्रण के लिए। (2)
अक्षधकारीयों द्वारा क्षकये गए व्यवसाय के प्रकारो को स्पष्ट् कीक्षजये
उत्तर:
i. कुछ अलिकाररयोीं ने नलदयोीं को अिीिण लदया।
ii. कुछ ने जमीन की पैमाइश की।
iii. कुछ ने लनरीिण लकया लजसके द्वारा नहरोीं से पानी छोड़ा जाता है ।
iv. कुछ तो लशकाररयोीं के आवेश थे।
v. अन्य िोगोीं ने कर एकत्र लकए।
vi. जमीन से जुड़े कुछ अिीिण व्यवसाय।
(लकसी िी दो लबींदुओीं को समझाया जाए) (2)
Pg-34 2+2+2=6
कमतचाररयों के कायों का क्षनररिण करने की क्ा आवश्यकता थी थी?
उत्तर:
i. उन पर लनयींत्रण रखने के लिए काम करने वािोीं का काम अिीिक
को करना आवश्यक था।
ii. उनके काम को लवलनयलमत करने के लिए। (2)
1.
SECTION-E
31. मानक्षचत्र आधाररत कायत 1x6=6
31.1 िरा हुआ नक्शा सींिग्न है 1x3=3
31.2 िरा हुआ नक्शा सींिग्न है 1x3=3
नेत्रहीन परीिाक्षथतयों के क्षलए:
31.1 बारडोिी, चौरी-चौरा, चींपारण, दाीं डी, अमृतसर, बींबई, किकत्ता, 1x3=3
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खेड़ा, अहमदाबाद, बनारस, िाहौर, कराची।
1x3=3
(दी गई सची से कोई िी तीन केंद्र।)
अथवा
मगि, वक्ति, कोशि, पाीं चिा, कुरु, गाीं िार, अवींलत, राजगीर, उिैन, 1x3=3
तिलशिा, वाराणसी (काशी)।
(सची से कोई िी तीन केंद्र।)
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