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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 1: वन्दे भारतमातरम्
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
1 – 14 10 52 हन्द
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 1 वन्दे भारतमातरम् AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 1: वन्दे भारतमातरम्
वन्दे भारतमातरम् द पकम् (कक्षा ७) का प्रथम पाठ है। यह एक संवाद-प्रधान चत्रात्मक गद्यपाठ है, जसम माता अपने बालक को ‘वन्दे मातरम्’
गीत का अथ-इ तहास तथा तरंगे राष्ट्रध्वज के तीन वण एवं धमचक्र का सन्दे श सरल संस्कृत म समझाती है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 7) 1 – 14
खं ड प्रश्न
10 52
माध्यम
हन्द
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 10
प्रश्न १ — अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदे न पदद्वयेन वा उत्तरं लखन्तु
अभ्यासः
प्र.1 (क) पवतराजः कः ?
हमालयः। ( हन्द — पवत का राजा हमालय है।)
आधारवाक्यम्: पाठ म आया है — “साक्षात् पवतराजः हमालयः मुकुटरूपेण अस्याः मस्तके शोभते।” अथात्
हमालय भारतमाता के मस्तक पर मुकुट के रूप म सुशो भत होता है।
ध्यान द: प्रश्न ‘कः’ (प्रथमा वभ क्त, पुं ल्लङ्ग, एकवचन) से पूछा गया है, इस लए उत्तर भी प्रथमा एकवचन म —
हमालयः — ही होगा, ‘ हमालयम्’ नह ।
प्र.1 (ख) समुद्रः कस्याः चरणौ प्रक्षालय त ?
भारतमातुः (चरणौ)। ( हन्द — समुद्र भारतमाता के दोन चरण धोता है।)
आधारवाक्यम्: “अस्याः चरणौ प्रक्षालय त स्वयं रत्नाकरः समुद्रः।” यहाँ ‘अस्याः’ का अथ भारतमाता का ही है।
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व्याकरण-सङ् केत: ‘कस्याः’ षष्ठी वभ क्त, स्त्री लङ्ग, एकवचन है; अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन भारतमातुः होगा
(मातृ-शब्द का षष्ठी एकवचन ‘मातुः’)।
प्र.1 (ग) त्रवणयुतः ध्वजः कुत्र वलस त ?
भारतमातुः हस्ते। ( हन्द — तरंगा ध्वज भारतमाता के हाथ म सुशो भत होता है।)
आधारवाक्यम्: “भारतमातुः हस्ते वलस त त्रवणयुतः राष्ट्रध्वजः।” चत्र म भी भारतमाता के हाथ म तरंगा दखाया
गया है।
ध्यान द: ‘कुत्र’ स्थान पूछता है, इस लए उत्तर सप्तमी वभ क्त म — हस्ते (अ धकरण)।
प्र.1 (घ) ध्वज तः केशरवणः अस्मान् क वक्तुं प्रेरय त ?
‘जयतु सै नकः’ इ त (वक्तुं प्रेरय त)। ( हन्द — ध्वज म स्थत केस रया रंग हम ‘जयतु सै नकः’ — सै नक क जय हो — कहने
के लए प्रे रत करता है।)
आधारवाक्यम्: “‘जयतु सै नकः’ इ त वक्तुम् अस्मान् प्रेरय त ध्वज स्थतः अयं केशरवणः।” यह वण त्यागपरम्परा
तथा शौयपरम्परा का सूचक है और वीर के ब लदान क याद दलाता है।
प्र.1 (ङ) कृषकबान्धवाः भारतभू म कैः सञ्च न्त ?
स्व-स्वेद बन्दु भः। ( हन्द — कसान भाई भारतभू म को अपने पसीने क बूँद से स चते ह।)
आधारवाक्यम्: “कृषकबान्धवाः अस्माकं भारतभू म सवदा स्व-स्वेद बन्दु भः सञ्च न्त।” उन्ह के प रश्रम से
भारतभू म ह रतवणमयी और सस्यश्यामला बनी है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘कैः’ तृतीया वभ क्त बहुवचन (करण) है, अतः उत्तर भी तृतीया बहुवचन — स्वेद बन्दु भः।
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प्र.1 (च) केषां धवलं यशः राष्ट्रध्वजस्य मध्ये वलस त ?
वै ा नकानाम् (भारतीयानां वै ा नकानाम्)। ( हन्द — भारतीय वैज्ञा नक का उज्ज्वल यश राष्ट्रध्वज के मध्य म सुशो भत होता
है।)
आधारवाक्यम्: “वैज्ञा नकानां तत् धवलं यशः धवलवणरूपेण राष्ट्रध्वजस्य मध्ये वलस त।” अणुशास्त्र,
सङ्गणकशास्त्र, च कत्साशास्त्र, अन्त रक्षशास्त्र तथा आयुधशास्त्र म भारतीय वैज्ञा नक ने महान् यश पाया है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘केषां’ षष्ठी बहुवचन है, इस लए उत्तर वै ा नकानाम् (षष्ठी बहुवचन) — ‘वैज्ञा नकैः’ नह ।
प्र.1 (छ) सूयः कं वना नत्यं सञ्चर त ?
वरामं वना। ( हन्द — सूय बना रुके ( वश्राम के बना) प्र त दन चलता रहता है।)
आधारवाक्यम्: “सूयः वरामं वना नत्यं सञ्चर त।” धमचक्र का सन्दे श भी यही है — कतव्यपथ पर बना रुके
चलते रहो।
नयम: ‘ वना’ के योग म प्रायः तीया वभ क्त आती है — इसी लए ‘ वरामम्’ ( तीया एकवचन) रूप बना है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 10
प्रश्न २ — अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखन्तु
अभ्यासः
प्र.2 (क) प वत्राः नद्यः काः ?
गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सन्धुः, ब्रह्मपुत्रः, गण्डक , महानद , नमदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादयः प वत्राः नद्यः स न्त।
( हन्द — गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सन्धु, ब्रह्मपुत्र, गण्डक , महानद , नमदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आ द प वत्र न दयाँ ह।)
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आधारवाक्यम्: “अत्रैव गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सन्धुः, ब्रह्मपुत्रः, गण्डक , महानद , नमदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी
m के समान
इत्यादयः प वत्राः नद्यः प्रवह न्त। नद्यः अ प अस्माकं मातरः इव।” — इसी लए भारत म न दय कोeमाता
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माना गया है।.co
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aपाठ से जुड़ी बात: पाठ के अन्त म प्राचीन-आधु नक नाम क सूची भी द है — गङ्गा = जाह्नवी/भागीरथी, यमुना =
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का लन्द , शुतु द्रः = सतलुज्, वतस्ता = झेलम्, चन्द्रभागा = चनाब्, चमण्वती = चम्बल, रेवा = नमदा, गोदा =
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गोदावरी, कौ शक = कोसी।
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प्र.2 (ख) व वधेभ्यः प्रदे शेभ्यः जनाः कमथम् आगच्छ न्त ?
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a ( हन्द — व भन्न प्रदेश से असंख्य लोग तीथक्षेत्र क धूल अपने माथे पर लगाने के लए आते ह।)
व वधेभ्यः प्रदे शेभ्यः असंख्याः जनाः तीथक्षेत्राणां धू ल ललाटे ाप यतुम् आगच्छ न्त।
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. comयतुं व वधेभ्यः प्रदे शेभ्यः असंख्याः जनाः आगच्छ न्त।” agl
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आधारवाक्यम्: “एतेषां तीथक्षेत्राणां धू ल ललाटे स्थाप
अयोध्या, मथुरा, ह र ार, काशी, काञ्ची,la
मङ्गलमय तीथक्षेत्र ह। a g अव वैशाली, ा रका, पुरी, गया, प्रयाग, पाट लपुत्र आ द ऐसे ही
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व्याकरण-सङ् केत: ‘स्थाप यतुम्’ तुमुन्-प्रत्ययान्त अव्यय है — ‘रखने के लए’। ‘ कमथम्
इसी cतुo
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धमचक्रं कं भावं बोधय त ?
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प्र.2 (ग)
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धमचक्रं ‘चलनीयं कतव्यपथे वै, न वरम, सततं चल’ इ त भावं बोधय त।
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( हन्द — धमचक्र यह भाव समझाता है क कतव्य के माग पर चलते रहना चा हए, रुको मत, नरन्तर चलो।)
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m उदाहरण दे ता है — सूय वराम के बना नत्य चलता है, और नद कष्ट सहती हुई भी अपने ध्येय क ओर बहती रहती
वस्तार: ध्वज के मध्य घननीलवण के चक्र का नाम धमचक्रम् है और उसम चतु वश त (२४) अरे ह। पाठ इसके दो
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है।
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दूसरा सन्दे श: “जीवने श्रान्तेः, आलस्यस्य प्रमादस्य च स्थानं न भवतु” — जीवन म थकान, आलस्य और agl
असावधानी का स्थान न हो।
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प्र.2 (घ) कृषकबान्धवानां प रश्रमेण भारतभू मः कथं स ाता ?
कृषकबान्धवानां प रश्रमेण एव भारतभू मः ह रतवणमयी समृ ा सस्यश्यामला च स ाता।
( हन्द — कसान भाइय के प रश्रम से ही भारतभू म हरे रंग से भरी, समृद्ध तथा फसल से हरी-भरी हो गई है।)
आधारवाक्यम्: “एतेषां प रश्रमेण एव भारतभू मः ह रतवणमयी समृद्धा सस्यश्यामला च स ाता।” भारतमाता क
इसी समृ द्ध क आभा राष्ट्रध्वज म ह रतवण के रूप म वराजती है और हम ‘जयतु कृषकः’ कहने क प्रेरणा दे ती है।
प्र.2 (ङ) व ानस्य केषु क्षेत्रेषु भारतीयैः यशः प्राप्तम् ?
अणुशास्त्रे, सङ्गणकशास्त्रे, च कत्साशास्त्रे, अन्त रक्षशास्त्रे, आयुधशास्त्रे इत्या दषु व ानस्य व भ ेषु क्षेत्रेषु भारतीयैः
वै ा नकैः महत् यशः प्राप्तम्।
( हन्द — परमाणु वज्ञान, कम्प्यूटर वज्ञान, च कत्सा वज्ञान, अन्त रक्ष वज्ञान तथा शस्त्र वज्ञान आ द वज्ञान के व भन्न क्षेत्र म
भारतीय वैज्ञा नक ने महान् यश प्राप्त कया है।)
संस्कृतपदम् हन्द अथ ENGLISH
अणश
ु ास्त्रम् परमाण ु िव ान Atomic science
सङ् गणकशास्त्रम् क म्प्यूटर िव ान Computer science
िचिकत्साशास्त्रम् िचिक त्सा िव ान Medical science
अन्तिरक्षशास्त्रम् अन्तिर क्ष िव ान Space science
आयुध शास्त्रम् शस्त्र िव ान Science of weapons
जोड़ने योग्य बात: पाठ कहता है — “भारतीयं वज्ञानं शा न्त प्रग त सुरक्षां च प रपोषय त।” अथात् भारतीय वज्ञान
शा न्त, प्रग त और सुरक्षा — तीन का पोषण करता है।
प्र.2 (च) अन्ते सव क गीतं गाय न्त ?
अन्ते सव इदं गीतं गाय न्त —
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वयं बालकाः भारतभक्ताः
वयं बािलकाः भारतभक्ताः।
वयं िह सव भारतभक्ताः
पृथ्वी ं स्वग ं जेत ुं शक्ताः॥
( हन्द — हम बालक भारत के भक्त ह, हम बा लकाएँ भी भारत क भक्त ह। हम सब ही भारतभक्त ह और पृथ्वी तथा स्वग को
जीतने म समथ ह।)
भावः: यह लघुगीत बालक-बा लका के भेद को मटाकर सबको एक ‘भारतभक्त’ कहता है और यह वश्वास जगाता
है क मलकर प्रयत्न करने पर कुछ भी असम्भव नह । इससे पहले पाठ कहता है — “वयं सवऽ प धन्याः यत् अस्यां
प वत्रभूम्यां जन्म प्राप्तवन्तः।”
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 11
प्रश्न ३ — रेखाङ् कता न पदा न आ श्रत्य उदाहरणानुसारं प्रश्न नमाणं कुवन्तु (यथा — अस्माकं वत्सला भारतमाता। — केषां वत्सला भारतमाता
?)
अभ्यासः
प्र.3 (क) समुद्रः भारतमातुः चरणौ प्रक्षालय त। (रेखाङ् कतपदम् — भारतमातुः)
समुद्रः कस्याः चरणौ प्रक्षालय त ? ( हन्द — समुद्र कसके दोन चरण धोता है ?)
कैसे बना: रेखाङ् कत पद भारतमातुः षष्ठी वभ क्त, स्त्री लङ्ग, एकवचन है। षष्ठी स्त्री लङ्ग एकवचन का प्रश्नवाचक
रूप कस्याः है, अतः ‘भारतमातुः’ के स्थान पर ‘कस्याः’ रखकर वाक्य को प्रश्न बना दया।
प्र.3 (ख) जनाः तीथक्षेत्राणां धू ल ललाटे ापय न्त। (रेखाङ् कतपदम् — ललाटे )
जनाः तीथक्षेत्राणां धू ल कुत्र ापय न्त ? ( हन्द — लोग तीथक्षेत्र क धूल कहाँ रखते ह ?)
कैसे बना: ललाटे सप्तमी वभ क्त एकवचन (अ धकरण — स्थान) है। स्थान पूछने के लए अव्यय कुत्र का प्रयोग
होता है। चाह तो ‘क स्मन् स्थापय न्त ?’ भी लख सकते ह, पर ‘कुत्र’ अ धक सहज है।
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प्र.3 (ग) वीराः भारतमातुः सवदा सेवां कृतवन्तः। (रेखाङ् कतपदम् — वीराः)
के भारतमातुः सवदा सेवां कृतवन्तः ? ( हन्द — कन्ह ने भारतमाता क सदा सेवा क ?)
कैसे बना: वीराः प्रथमा वभ क्त, पुं ल्लङ्ग, बहुवचन है। प्रथमा पुं ल्लङ्ग बहुवचन का प्रश्नवाचक रूप के है (कः →
कौ → के)।
प्र.3 (घ) ‘जयतु कृषकः’ इ त वक्तुम् अस्मान् प्रेरय त। (रेखाङ् कतपदम् — अस्मान्)
‘जयतु कृषकः’ इ त वक्तुं कान् प्रेरय त ? ( हन्द — ‘जयतु कृषकः’ कहने के लए कनको प्रे रत करता है ?)
कैसे बना: अस्मान् तीया वभ क्त बहुवचन (कम) है। तीया पुं ल्लङ्ग बहुवचन का प्रश्नवाचक रूप कान् है (कम्
→ कौ → कान्)।
प्र.3 (ङ) नद क ा न सहमाना प्रवह त। (रेखाङ् कतपदम् — नद )
का क ा न सहमाना प्रवह त ? ( हन्द — कौन कष्ट को सहती हुई बहती है ?)
कैसे बना: नद प्रथमा वभ क्त, स्त्री लङ्ग, एकवचन है। प्रथमा स्त्री लङ्ग एकवचन का प्रश्नवाचक रूप का है।
प्र.3 (च) वयं गौरववधनाथ प्रयत्नं कुमः। (रेखाङ् कतपदम् — प्रयत्नं)
वयं गौरववधनाथ क कुमः ? ( हन्द — हम गौरव बढ़ाने के लए क्या करते ह ?)
कैसे बना: प्रयत्नम् तीया वभ क्त, नपुंसक-सदृश कमपद (यहाँ पुं ल्लङ्ग ‘प्रयत्नः’ का तीया एकवचन) है।
अचेतन कम के लए प्रश्नवाचक शब्द कम् होता है।
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सङ् केत: प्रश्न नमाण का सूत्र सरल है — रेखाङ् कत पद क वभ क्त, वचन और लङ्ग दे खो, उसी वभ क्त-वचन-
लङ्ग का ‘ कम्’ शब्द का रूप रखो, शेष वाक्य ज्य का त्य रहने दो और अन्त म प्रश्न चह्न लगाओ।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 11
प्रश्न ४ — अधः प्रदत्तानां शब्दानाम् उदाहरणानुसारं रक्त ानेषु रूपा ण लखन्तु (एकवचनम् / द्ववचनम् / बहुवचनम्)
अभ्यासः
प्र.4 (क) चरणम् — चरणौ — ............ ( द्वतीया वभ क्तः) [उदाहरणम् — पुस्तके एकवचनं द्ववचनं च दत्तम् अ स्त]
चरणम् – चरणौ – चरणान्। ( हन्द — चरण को / दो चरण को / अनेक चरण को।)
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
तीया चरणम् चरणौ चरणान्
क्य : ‘चरण’ अकारान्त पुं ल्लङ्ग शब्द है, जसके रूप ‘राम’ शब्द क तरह चलते ह — तीया म रामम्, रामौ,
रामान्। पाठवाक्य है — “अस्याः चरणौ प्रक्षालय त स्वयं रत्नाकरः समुद्रः।”
प्र.4 (ख) नद — ............ — नद्यः (प्रथमा वभ क्तः)
नद – नद्यौ – नद्यः। ( हन्द — नद / दो न दयाँ / अनेक न दयाँ।)
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमा नदी नद्य ौ नद्यः
क्य : ‘नद ’ ईकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द है। वचन म ई + औ = ◌्यौ (यण् स न्ध) होकर ‘नद्यौ’ तथा बहुवचन म ‘नद्यः’
रूप बनता है।
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ललाटे — ............ — ............ (सप्तमी वभ क्तः)
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agl– ललाटयोः – ललाटेषु। ( हन्द — माथे पर / दो माथ पर / अनेक माथ पर।)
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वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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सप्तमी ललाटे ललाटयोः ललाटेष ु
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क्य : ‘ललाट’ अकारान्त नपुंसक लङ्ग शब्द है, जसके रूप ‘फल’ शब्द क तरह चलते ह — सप्तमी म फले,
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फलयोः, फलेषु।
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a प्र.4 (घ) दे शाय — ............ — ............ (चतुथ वभ क्तः)
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दे शाय – दे शाभ्याम् – दे शेभ्यः। ( हन्द — दे श के लए / दो दे श के लए / अनेक दे श के लए।)
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वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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चतुथ दे शाभ्याम् भ्
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दे शाय दे श े
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s m : ‘दे श’ अकारान्त पुं ल्लङ्ग (राम-वत्) है — चतुथ म रामाय, रामाभ्याम्, रामेभ्यः। पाठ म इसी वभ क्त का रूप
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a ‘प्रदे शेभ्यः’ (पञ्चमी) भी आया है — ध्यान रख, अकारान्त शब्द म चतुथ और पञ्चमी के बहुवचन-रूप एक-से (–
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एभ्यः) होते ह।
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चक्रम् — ............ — चक्रा ण (प्रथमा वभ क्तः)
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चक्रम् – चक्रे – चक्रा ण। ( हन्द — चक्र / दो चक्र / अनेक चक्र।)
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वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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प्रथमा चक्रम् च े चक्रािण
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क्य : ‘चक्र’ अकारान्त नपुंसक लङ्ग (फल-वत्) है — प्रथमा म फलम्, फले, फला न। ‘चक्र’ म ‘र्’ के कारण णत्व
होकर चक्रा ण बनता है।
प्र.4 (च) ............ — ............ — वै ा नकैः (तृतीया वभ क्तः)
वै ा नकेन – वै ा नकाभ्याम् – वै ा नकैः। ( हन्द — वैज्ञा नक के ारा / दो वैज्ञा नक के ारा / अनेक वैज्ञा नक के ारा।)
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
तृतीया वै ािनके न वै ािनकाभ्याम् वै ािनकै ः
क्य : ‘वैज्ञा नक’ अकारान्त पुं ल्लङ्ग (राम-वत्) है — तृतीया म रामेण, रामाभ्याम्, रामैः। पाठवाक्य — “भारतीयैः
वैज्ञा नकैः महत् यशः प्राप्तम् अ स्त।”
प्र.4 (छ) अहम् — ............ — ............ (प्रथमा वभ क्तः)
अहम् – आवाम् – वयम्। ( हन्द — म / हम दोन / हम सब।)
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमा अहम् आवाम् वयम्
क्य : ‘अस्मद्’ (उत्तमपुरुष) सवनाम के रूप तीन लङ्ग म समान रहते ह। पाठ म तीन रूप मलते ह — “अहं मातुः
वन्दनं करो म”, “आवाम् ... ज्ञातुम् इच्छावः”, “वयं सवऽ प धन्याः”।
प्र.4 (ज) व ानस्य — ............ — ............ (षष्ठी वभ क्तः)
व ानस्य – व ानयोः – व ानानाम्। ( हन्द — वज्ञान का / दो वज्ञान का / अनेक वज्ञान का।)
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
षष्ठी िव ानस्य िव ानयोः िव ानानाम्
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क्य : ‘ वज्ञान’ अकारान्त नपुंसक लङ्ग (फल-वत्) है — षष्ठी म फलस्य, फलयोः, फलानाम्। अकारान्त शब्द म
पुं ल्लङ्ग और नपुंसक लङ्ग क षष्ठी वभ क्त के रूप एक जैसे होते ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 11–12
प्रश्न ५ — अधः प्रदत्ता न वाक्या न प ठत्वा मातृभाषायां / प्रान्तीयभाषायाम् / आङ् ग्लभाषायां वा अनुवादं कुवन्तु
अभ्यासः
प्र.5 (क) भारतभूमौ प वत्राः नद्यः प्रवह न्त।
हन्द अनुवादः — भारतभू म म प वत्र न दयाँ बहती ह।
English — Holy rivers flow in the land of India.
संस्कृतपदम् हन्द व्याकरण-सङ् केतः
भारतभूम ौ भारतभूिम में सप्तमी एकवचन (अ धकरण)
पिवत्राः नद्यः पिवत्र निदयाँ प्रथमा बहुवचन (कता)
पवहिन्त बहती है ं लट् , प्रथमपुरुष, बहुवचन
प्र.5 (ख) भारतस्य मस्तके हमालयः मुकुटरूपेण शोभते।
हन्द अनुवादः — भारत के मस्तक पर हमालय मुकुट के रूप म सुशो भत होता है।
English — The Himalaya shines like a crown on the forehead of India.
सङ् केत: मुकुटरूपेण तृतीया एकवचन है — ‘मुकुट के रूप म’। ‘शोभते’ आत्मनेपद क्रया है (शुभ् धातु), इस लए
‘शोभ त’ नह लखना चा हए।
प्र.5 (ग) भारतभूमौ श्रेष्ठाः पवताः वराजन्ते।
हन्द अनुवादः — भारतभू म म श्रेष्ठ पवत सुशो भत होते ह।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 1 वन्दे भारतमातरम् AglaSem · NCERT Solutions
English — Great mountains stand in splendour in the land of India.
पाठ से: ये पवत ह — महेन्द्र ग र (पूव घाट), मलयाचल तथा सह्या द्र (प मी घाट), रैवतक ( गरनार), वन्ध्याचल
और अराव ल।
प्र.5 (घ) राष्ट्रध्वजे केशरः, ेतः, ह रतः च वणाः स न्त।
हन्द अनुवादः — राष्ट्रध्वज म केस रया, श्वेत और हरा — ये रंग ह।
English — Saffron, white and green are the colours in the national flag.
सङ् केत: ‘केशरः, श्वेतः, ह रतः च वणाः’ — यहाँ अनेक कता होने से क्रया बहुवचन ‘स न्त’ आई है। ‘च’ सदा
अ न्तम पद के बाद लगता है।
प्र.5 (ङ) वयं भारते जन्म प्राप्तवन्तः।
हन्द अनुवादः — हमने भारत म जन्म पाया है।
English — We have taken birth in India.
सङ् केत: प्राप्तवन्तः क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतका लक रूप है (प्राप्त् + वतु), जो कता के लङ्ग-वचन के अनुसार चलता
है — एकवचन म ‘प्राप्तवान्’, बहुवचन म ‘प्राप्तवन्तः’, स्त्री लङ्ग म ‘प्राप्तवती’।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 12
प्रश्न ६ — अधः प्रदत्तानां शब्दानाम् उदाहरणानुसारं वभ क्तं वचनं च लखन्तु (यथा — भारतमाता — प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम्)
अभ्यासः
प्र.6 (क) भारतमाता — ............ , ............
प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम्, स्त्री लङ्गम्। ( हन्द — ‘भारतमाता’ कता है, इस लए प्रथमा वभ क्त और एक ही है, इस लए
एकवचन।)
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आधारवाक्यम्: “एषा अस्माकं वत्सला भारतमाता।” यह पुस्तक म दया गया उदाहरण है, जससे शेष रूप क
पहचान करनी है।
प्र.6 (ख) नद्यः — ............ , ............
प्रथमा वभ क्तः, बहुवचनम्, स्त्री लङ्गम्। ( हन्द — न दयाँ।)
क्य : पाठवाक्य है — “नद्यः अ प अस्माकं मातरः इव।” यहाँ ‘नद्यः’ कता है। ‘नद ’ शब्द का तीया बहुवचन
‘नद ः’ होता है, अतः ‘नद्यः’ प्रथमा (अथवा सम्बोधन) बहुवचन ही है।
प्र.6 (ग) ललाटे — ............ , ............
सप्तमी वभ क्तः, एकवचनम्, नपुंसक लङ्गम्। ( हन्द — माथे पर।)
क्य : “धू ल ललाटे स्थाप यतुम्” — ‘पर’ अथ म अ धकरण होने से सप्तमी वभ क्त। ‘ललाट’ फल-वत्
नपुंसक लङ्ग शब्द है, अतः सप्तमी एकवचन ‘ललाटे ’।
सावधानी: ‘ललाटे ’ रूप नपुंसक लङ्ग क प्रथमा/ तीया वचन म भी बनता है, कन्तु पाठ के सन्दभ म यह
सप्तमी एकवचन ही है।
प्र.6 (घ) तीथक्षेत्राणाम् — ............ , ............
षष्ठी वभ क्तः, बहुवचनम्, नपुंसक लङ्गम्। ( हन्द — तीथक्षेत्र का/क ।)
क्य : “एतेषां तीथक्षेत्राणां धू ल ललाटे स्थाप यतुम्” — ‘का/के/क ’ सम्बन्ध बताने से षष्ठी वभ क्त; ‘–आनाम्’
अन्त से बहुवचन स्पष्ट है (फलानाम् क तरह)।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 1 वन्दे भारतमातरम्
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दे शस्य — ............ , ............
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षष्ठीglवभ क्तः, एकवचनम्, पुं ल्लङ्गम्। ( हन्द — दे श का/क ।)
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क्य : “दे शस्य स्वतन्त्रतां प्राप्तुं सहष स्वप्राणान् अ पतवन्तः” — ‘दे श क स्वतन्त्रता’ म सम्बन्ध है, अतः षष्ठी। ‘–स्य’
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अकारान्त शब्द का षष्ठी एकवचन चह्न है।
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प्र.6 (च) ब लदानम् — ............ , ............
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द्वतीया वभ क्तः, एकवचनम्, नपुंसक लङ्गम्। ( हन्द — ब लदान को।)
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क्य : पाठवाक्य है — “तेषां वीराणां ब लदानं सूचय त एषः वणः।” यहाँ ‘ब लदानम्’ क्रया ‘सूचय त’ का कम है,
इस लए तीया वभ क्त एकवचन।
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सावधानी: अकेले दे खने पर ‘ब लदानम्’ प्रथमा एकवचन भी हो सकता है, परन्तु पाठ के प्रयोग के अनुसार यहाँ
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तीया ही ठ क है — इसी लए ऐसे प्रश्न म सदा पाठ का वाक्य दे खकर उत्तर लख।
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agl प्र.6 (छ) कृषीवलबान्धवाः — ............ , ............
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प्रथमा वभ क्तः, बहुवचनम्, पुं ल्लङ्गम्। ( हन्द — कसान भाई (अनेक)।)
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क्य : ‘कृषीवलबान्धवाः’ पाठ के ‘कृषकबान्धवाः’ का पयाय है (शब्दाथ-ता लका म दया है)। “कृषकबान्धवाः ...
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सञ्च न्त” — कता होने से प्रथमा और ‘–आः’ अन्त से बहुवचन।
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अस्मान् — ............ , ............
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द्वतीया वभ क्तः, बहुवचनम् (अस्मद् सवनाम)।
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क्य : “‘जयतु सै नकः’ इ त वक्तुम् अस्मान् प्रेरय त” — ‘प्रेरय त’ का कम होने से तीया। अस्मद् शब्द क तीया
— माम् (एकवचन), आवाम् ( वचन), अस्मान् (बहुवचन)।
प्र.6 (झ) क्षेत्रेषु — ............ , ............
सप्तमी वभ क्तः, बहुवचनम्, नपुंसक लङ्गम्। ( हन्द — क्षेत्र म।)
क्य : “ वज्ञानस्य व भन्नेषु क्षेत्रेषु भारतीयैः वैज्ञा नकैः महत् यशः प्राप्तम्” — ‘म’ अथ (अ धकरण) से सप्तमी; ‘–
एषु’ अन्त से बहुवचन (फलेषु क तरह)।
याद रखने का सूत्र: –स्य/–आनाम् = षष्ठी, –ए/–एषु = सप्तमी, –म्/–आन् = तीया, –एन/–ऐः = तृतीया, –
आय/–एभ्यः = चतुथ ।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 12
प्रश्न ७ — पाठे प्रयुक्ता न क्रयापदा न रक्त ानेषु लखन्तु
अभ्यासः
प्र.7 पाठे प्रयुक्ता न क्रयापदा न रक्त ानेषु लखन्तु — (पुस्तके चतुषु पङ् क्तषु चतुषु स्त ेषु च षोडश
रक्त ाना न स न्त; प्रथमं रक्त ानं ‘शृणुमः’ इ त पू रतम् अ स्त।)
पुस्तक क जा लका (grid) म सोलह रक्त स्थान ह और पहला स्थान शृणुमः से भरा हुआ है। पाठ म से चुने हुए सोलह क्रयापद
इस प्रकार भरे जा सकते ह —
ृ मु ः
शण जानीमः अिस्त वतते
शोभते पक्षालयित िवराजन्ते पवहिन्त
आग च्छिन्त िवलसित िस ञ्चिन्त स ञ्चरित
बोधयित पयच्छित कु म ः गायामः
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अथस हत सूची: शृणुमः (हम सुनते ह), जानीमः (हम जानते ह), अ स्त (है), वतते ( वद्यमान है), शोभते (सुशो भत
होता है), प्रक्षालय त (धोता है), वराजन्ते (सुशो भत होते ह), प्रवह न्त (बहती ह), आगच्छ न्त (आते ह), वलस त
(शोभा पाता है), सञ्च न्त (स चते ह), सञ्चर त (चलता है), बोधय त (समझाता है), प्रयच्छ त (दे ता है), कुमः (हम
करते ह), गायामः (हम गाएँ/गाते ह)।
और भी वकल्प: पाठ म ये क्रयापद भी आए ह — करो म, इच्छावः, गाय न्त, भवामः, सुशोभन्ते, स्थापय न्त,
प्रेरय त, सूचय त, प रपोषय त, स न्त, प्रवह त, प्राप्तवन्तः, कृतवन्तः, अ पतवन्तः, ल खतवान्, स ाता। इनम से
कोई भी सोलह लखे जा सकते ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 13
प्रश्न ८ — अधः प्रदत्तानां क्रयापदानां त्रषु पुरुषेषु त्रषु वचनेषु च लट् -लकारस्य रूपा ण लखन्तु
अभ्यासः
प्र.8 (1) प्रथमपुरुषः — भव त (शेषा ण रक्त ाना न पूरयन्तु)
भू (भव त) धातुः — लट् -लकारः, परस्मैपदम्। ( हन्द — ‘होना’ धातु का वतमान काल।)
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः भवित भवतः भविन्त
मध्यमपुरुषः भविस भवथः भवथ
उत्तमपुरुषः भवािम भवावः भवामः
पाठ-प्रयोगः: “सम्प्र त अ प इदं गीतं श्रुत्वा गीत्वा च वयं सव भारतीयाः प्रे रताः भवामः।” — यह उत्तमपुरुष
बहुवचन का रूप है।
प्र.8 (2) प्रथमपुरुषः — अ स्त (शेषा ण रक्त ाना न पूरयन्तु)
अस् (अ स्त) धातुः — लट् -लकारः, परस्मैपदम्। ( हन्द — ‘होना/ वद्यमान रहना’ धातु का वतमान काल।)
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पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः अिस्त स्तः सिन्त
मध्यमपुरुषः अिस स्थः स्थ
उत्तमपुरुषः अिस्म स्वः स्मः
ध्यान द: ‘अस्’ अदा दगण क धातु है, इस लए इसके रूप भव त क तरह सरल नह — एकवचन को छोड़कर
आ द का ‘अ’ लुप्त हो जाता है (स्तः, स न्त, स्थः, स्मः)। पाठ-प्रयोग — “अ स्मन् चक्रे चतु वश तः अराः स न्त।”
प्र.8 (3) उत्तमपुरुषः बहुवचनम् — इच्छामः (शेषा ण रक्त ाना न पूरयन्तु)
इष् (इच्छ त) धातुः — लट् -लकारः, परस्मैपदम्, तुदा दगणः। ( हन्द — ‘चाहना’ धातु का वतमान काल।)
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः इच्छित इच्छतः इच्छिन्त
मध्यमपुरुषः इच्छिस इच्छथः इच्छथ
उत्तमपुरुषः इच्छािम इच्छावः इच्छामः
पाठ-प्रयोगः: “आवाम् अस्माकं राष्ट्रध्वजस्य वषये अ प क ञ्चत् ज्ञातुम् इच्छावः।” — दो ब क बात है, इस लए
उत्तमपुरुष द्ववचन ‘इच्छावः’ का प्रयोग हुआ है।
प्र.8 (4) प्रथमपुरुषः बहुवचनम् — आगच्छ न्त (शेषा ण रक्त ाना न पूरयन्तु)
आ + गम् (आगच्छ त) धातुः — लट् -लकारः, परस्मैपदम्, भ्वा दगणः। ( हन्द — ‘आना’ धातु का वतमान काल।)
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः आग च्छित आग च्छतः आगच्छिन्त
मध्यमपुरुषः आग च्छिस आग च्छथः आग च्छथ
उत्तमपुरुषः आग च्छािम आग च्छावः आग च्छामः
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पाठ-प्रयोगः: “ व वधेभ्यः प्रदे शेभ्यः असंख्याः जनाः आगच्छ न्त।” ‘गम्’ धातु का लट् -लकार म अङ्ग ‘गच्छ् ’ हो
जाता है — गम् → गच्छ त, इसी से ‘आ’ उपसग लगने पर आगच्छ त।
सूत्र: भ्वा दगण के परस्मैपद धातुओं के लट् -लकार के प्रत्यय एक ही ह — त, तः, न्त; स, थः, थ; म, वः, मः।
धातु का अङ्ग बदलता है, प्रत्यय नह ।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 14
पाठ-सम्ब ा अ त रक्ता सामग्री — ‘वन्दे मातरम्’ मूलगीतम् तथा तस्य इ तहासः
योग्यता वस्तरः
प्र.1 भारतस्य राष्ट्रगानस्य ‘वन्दे मातरम्’ इत्यस्य पूण मूलस्वरूपं म लत्वा गायामः। — वन्दे मातरम् (मूलगीतम्)
यह ग त व ध सामू हक गान क है — कक्षा म सब मलकर पूरा ‘वन्दे मातरम्’ गाएँ। नीचे गीत का अथ दया है, जससे गाते समय
भाव समझ म आए।
वन्दे मातरं, वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयज-शीतलाम्।
शस्य-श्यामलां मातरम्॥ वन्दे ...॥
अन्वयः — (अहम्) सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज-शीतलाम्, शस्य-श्यामलां मातरं वन्दे ।
अथः — सुन्दर जल से भरी हुई, उत्तम फल दे ने वाली, मलय-पवन से शीतल तथा फसल से हरी-भरी माता को म प्रणाम करता ँ।
भावः — क व मातृभू म को केवल भू म नह , जी वत माता मानता है। जल, फल, शीतल पवन और हरी फसल — ये माता के दए
हुए वरदान ह, इसी लए उसके प्र त कृतज्ञता ही ‘वन्दन’ है।
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पद्यांशः भावाथः ( हन्द )
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… सुखदां वरदां .मातरम्
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उ ज्ज्वल चाँद नी से पुल िकत राित्र वाली, िखले फू लों और वृक्षों के प ों से सुशोिभत, मध रु हँस ने-बोलने
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शुभ-ज्योत्स्ना-पुल िकत-यािमनीम्
a s em वाली, सुख तथा वर दे ने वाली माता।
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aकोिट-कोिट-कण्ठ-कलकल- करोड़ों क ण् ठों के कलकल -िननाद से भयंक र , चौदह करोड़ भुजाओं में तीखी तलवार धारण करने वाली —
िननाद-कराले … िरपुद ल-वािरणी ं हे माँ, तुम् हे ं अबला कौन कहता है ? बहब
ु ल धारण करने वाली, तारने वाली और शत्र दु ल को रोकने वाली
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मातरम्॥ २॥ माता को मैं नमन करता हू।
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तुिम िवद्या, तुिम धम … तोमारई
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(बाङ् गला अंश) तुम्ही ं िवद्य ा हो, तुम्ही ं धम , तुम्ही ं हृ दय और तुम्ही ं मम । शरीर में तुम्ही ं पाण हो, भुजाओं में
तुम् ही ं शिक्त, हृg
पितमा गिड मिन्दरे -मिन्दरे ॥ ३॥
a दय में तुम्ही ं भिक्त हो; हम मिन्दर-मिन्दर में तुम्हारी ही पितमा गढ़ ते है।ं
त्वं िह दुग … धरणी ं भरणी ं
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तुम् ही ं दस अस्त्र धारण करने वाली दुग हो, कमलदल में िवहार करने वाली कमला (ल क्ष्म ी) हो, िवद्य ा दे ने
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वाली वाणी (सर स्वती) हो। िनम ल और अतुल नीय माता को नमन। श्यामल , सरल , सुन्दर मुस्कान वाली,
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मातरम्॥ ४॥
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आभूिषत, सबको धारण-भरण करने वाली माता को पणाम।
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a gl अलङ् कार-सङ् केत: ‘सुजलां सुफलां … शस्यश्यामलाम्’ म अनुप्रास तथा सम्पूण गीत म मातृभू म को माता के रूप
म दे खने से रूपक/मानवीकरण अलङ् कार है।
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a l राष्ट्रगान (National Anthem) है। दोन को समान सम्मान प्राप्त है
तथ्य-सूचना: पुस्तक म इसे ‘राष्ट्रगान’ कहा गया है; शासक य दृ ष्ट से ‘वन्दे मातरम्’ भारत का राष्ट्रगीत
(National Song) है और ‘जन गणgमन’
— उत्तर लखते समय यह भेद स्पष्ट रख।
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g इ त सव अ नवायरूपेण गाय न्त
.cब्र टशजनानां शासनकाले प्रमुखकायक्रमेषु तेषां राष्ट्रगीतं ‘गॉड सेव द क्वीन’
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las स्म। तद् ात्वा बङ् कमचन्द्रवयः तस्य गीतस्य वकल्परूपेण भारतमातुः गौरवसूचकं ‘वन्दे मातरम्’ इ त गीतं
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ag र चतवान्। एतद् गीतं १८८२ तमे वष प्रका शते ‘आनन्दमठ’ इ त ग्र े वतते। तस्य प्रकाशनात् पूवमेव भारतीयाः
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‘वन्दे मातरं’ गीतं सवत्र गातुम् आरब्धवन्तः। ‘वन्दे मातरम्’ इ त गीतेन सह एतस्य इ तहासः अ प अवश्यं सवः
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पठनीयः।
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सारः (संस्कृतम्) — ब्र टशशासनकाले सव प्रमुखकायक्रमेषु ‘गॉड सेव द क्वीन’ इ त गीतं गाय न्त स्म। तस्य वकल्परूपेण
बङ् कमचन्द्रः च ोपाध्यायः ‘वन्दे मातरम्’ इ त गीतं र चतवान्, यत् १८८२ तमे वष प्रका शते ‘आनन्दमठ’ इ त उपन्यासे वतते।
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( हन्द — अंग्रेज़ी शासन के समय सभी बड़े कायक्रम म अ नवाय रूप से ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाया जाता था। यह जानकर
बङ्.cकमचन्द्र च ोपाध्याय ने उसके वकल्प के रूप म भारतमाता के गौरव का सूचकa‘वन्देg मातरम्’ गीत रचा। यह गीत सन् १८८२ म
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se प्रका शत ‘आनन्दमठ’ ग्रन्थ म है। प्रकाशन से पहले ही भारतीय इसे सवत्र गाने लगे थे।)
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तथ्यम् ववरणम्
रचियता बिङ् कमचन्द ः च ोपाध् यायः
ग न्थः ‘आनन्दमठः’ (उपन्यासः)
पकाशनवषम् १८८२ तमं वषम्
भाषा संस्कृ तम् बाङ् गला च
िवषयः भारतमातुः स्वरूपस्य र म् यं वणनम्
अथः ‘अहं मातुः वन्दनं करोिम ’ — मैं माता की वन्दना करता हू ँ
इससे क्या सीख: ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत नह , वह परतन्त्रता के वरुद्ध एक उत्तर था। इसी लए पाठ कहता
है — “स्वतन्त्रतायाः आन्दोलने सव दे शभक्ताः एतत् गीतं मन्त्रम् इव गाय न्त स्म।” गीत के साथ उसका इ तहास
पढ़ना भी आवश्यक है, तभी उसका भाव पूरी तरह समझ म आता है।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 14
क्रयात्मक काय — उ ोष-लेखनम्, स्वप्रदे शस्य नद -पवत-तीथाः, कृ षक्षेत्र-वणनम्, दे शभक्त- चत्रसङ् कलनम्
प रयोजनाकायम्
प्र.1 जयतु सै नकः, जयतु कृषकः, जयतु वै ा नकः इ त उ ोषान् बृहत्फलके व लख्य वद्यालयस्य कक्षायाः च भ त्तषु
ापयन्तु। एतेषां मातृभाषया अनुवादं च कुवन्तु।
करने क व ध — चाट-पेपर पर मोटे अक्षर म तीन उ ोष लख, ऊपर तरंगे क एक-एक प उसी रंग म बनाएँ जसका वह
उ ोष प्रतीक है, और नीचे मातृभाषा म अनुवाद लख। फर उसे कक्षा तथा वद्यालय क भ त्त पर लगाएँ।
उ ोषः (संस्कृतम्) हन्द अनुवादः ध्वजस्य वणः
जयतु सै िनकः सै िनक की जय हो केशरवणः (त्याग-शौय)
जयतु कृ षकः िकसान की जय हो ह रतवणः (समृ द्ध)
जयतु वै ािनकः वै ािनक की जय हो श्वेतवणः (शा न्त-सत्य-यश)
अच्छे पोस्टर म क्या हो: (१) उ ोष संस्कृत म शुद्ध लखा हो — ‘जयतु’ म लोट् लकार है, ‘जय त’ नह ; (२)
अनुवाद स्पष्ट हो; (३) एक सम्बद्ध चत्र हो — सै नक, हल चलाता कसान, प्रयोगशाला म वैज्ञा नक; (४) नीचे अपना
नाम और कक्षा लखी हो।
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प्र.2 स्वप्रदे शे वद्यमानानां नद नां पवतानां तीथक्षेत्राणां च नामा न लखन्तु।
करने क व ध — अपने राज्य का मान चत्र लेकर उसम बहने वाली न दयाँ, पवत/पहा ड़याँ तथा प्र सद्ध तीथस्थल च ह्नत कर,
फर उनके नाम संस्कृत म (प्रथमा वभ क्त म) एक ता लका म लख। यह उत्तर हर वद्याथ के लए अलग होगा।
नमूना उत्तर (उत्तरप्रदे शस्य कृते) —
नद्यः पवताः / पवतमालाः तीथक्षेत्रा ण
गङ् गा, यमुना, सरयूः, गोमती, बेत्र वती (बेतवा) िवन्ध्याचलः (दिक्षणभागे), कै मूर पवतमाला काशी, अयोध् या, मथुर ा, पयागराजः, िवन्ध् याचलः
अपने प्रदे श के लए ऐसे लख: महाराष्ट्रे — गोदावरी, कृष्णा, भीमा नद्यः; सह्या द्रः पवतमाला; पाण्डु रङ्गपुरम्
(पण्ढरपुरम्), त्र्यम्बकेश्वरम्, भीमशङ् करः तीथा न। त मलनाडु देशे — कावेरी, वैगै नद्यः; नील ग रः पवतः; रामेश्वरम्,
तरुप तः-समीपस्था न तीथा न। पाठ के अन्त म द गई ‘प्राचीन-आधु नक नाम’ ता लका से संस्कृत नाम ढूँ ढ़ने म
सहायता ल।
प्र.3 वराम दनेषु माता पतृभ्यां सह कृ षक्षेत्रं गच्छन्तु। तत्र कृ षकाय दृ ् वा संस्कृतभाषया पञ्चवाक्यैः अस्य वणनं
कुवन्तु अथवा चत्रं रचयन्तु।
करने क व ध — खेत जाकर दे ख क कसान क्या-क्या करता है — हल चलाना, बीज बोना, सचाई, नराई, फसल काटना। फर
पाँच सरल संस्कृत वाक्य लख। प्रत्येक वाक्य म एक क्रयापद (लट् लकार) अवश्य हो।
नमूना उत्तर (संस्कृतवाक्या न) —
१. अद्य अहं िपत्रा सह कृ िषक्षेत्रं गच्छािम।
२. क्षेत्रे कृ षकः हलेन भूिमं कषित।
३. सः बीजािन वपित, जलेन च क्षेत्रं िसञ्चित।
४. क्षेत्रं हिरतं सस्यश्यामलं च दृ श्यते ।
५. कृ षकस्य पिरश्रमेण एव वयं अ ं पाप्नुमः — अतः वदामः ‘जयत ु कृ षकः’।
( हन्द — १. आज म पताजी के साथ खेत जाता ँ। २. खेत म कसान हल से भू म जोतता है। ३. वह बीज बोता है और जल से
खेत स चता है। ४. खेत हरा-भरा और फसल से श्यामल दखाई दे ता है। ५. कसान के प रश्रम से ही हम अन्न मलता है — इस लए
हम कहते ह ‘जयतु कृषकः’।)
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चत्र बनाना चाह तो: खेत, हल या ै क्टर, नहर/नलकूप, फसल और सूय बनाएँ तथा प्रत्येक वस्तु के नीचे संस्कृत
नाम लख — क्षेत्रम्, हलः, कृषकः, सस्यम्, सूयः, जलम्।
प्र.4 दशानां (१०) दे शभक्तानां नामस हता न चत्रा ण सङ् कलय्य A3 आकारस्य कलापत्रके (A3 size Drawing
sheet) सं ेषयन्तु।
करने क व ध — समाचारपत्र, पुरानी प त्रकाओं अथवा पुस्तकालय क पुस्तक से दस दे शभक्त के चत्र काटकर A3 शीट पर
चपकाएँ। प्रत्येक चत्र के नीचे संस्कृत म नाम तथा एक पं क्त म उनका योगदान लख।
नमूना सूची (दश दे शभक्ताः) —
क्रमः नाम (संस्कृतम्) एकवाक्ये योगदानम्
१ बिङ् कमचन्द ः च ोपाध्यायः ‘वन्दे मातरम्’ इित गीतस्य रचियता।
२ महात्मा गान्धी स त्याग हेण अिहंस या च स्वतन्त्र तायाः नेतत्ृ वम् अकरोत्।
३ सुभाषचन्द ः बोसः ‘आजाद िहन्द से ना’ इित सै न्यस्य सङ् गठनम् अकरोत्।
४ भगतिसंहः दे शस्य स्वतन्त्र तायै पाणान् अिपतवान्।
५ रानी लक्ष्म ीबाई झाँस ीर क्षणाथ ं वीरतया युद्धम् अकरोत्।
६ बालगङ् गाधरः ितलकः ‘स्वराज्यं मम जन्मिस द्धः अिधकारः’ इित उद् घ ोिषतवान्।
७ सरदारः वल्लभभाई पटेल ः भारतस्य राज्यानाम् एकीकरणम् अकरोत्।
८ डॉ. भीमरावः अम्बेडकरः भारतस्य संिवधानस्य िनम णे पमुखा भूिमका आसीत्।
९ चन्द शेखरः आजादः जीवनपयन्तं स्वतन्त्र तायै सङ् घषम् अकरोत्।
१० िबरसा मुण् डा जनजातीयजनानां अिधकाराथ ं िबिटशशासनस्य िवरोधम् अकरोत्।
अच्छे कलापत्रक म क्या हो: ऊपर शीषक ‘भारतस्य दे शभक्ताः’, चत्र समान आकार के और पं क्तबद्ध, प्रत्येक के
नीचे नाम व जन्म- नधन वष, तथा कनारे तरंगे क सजावट। अपनी लखावट साफ़ रख और चत्र का ोत भी नीचे
लख द।
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अध्याय — एक नज़र म
बङ् कमचन्द्रः च ोपाध्यायः ने १८८२ तमे वष ‘आनन्दमठः’ नामक उपन्यास लखा; ‘वन्दे मातरम्’ गीत उसी उपन्यास म है।
‘वन्दे मातरम्’ का अथ है — ‘अहं मातुः वन्दनं करो म’ (म माता क वन्दना करता ँ)।
यह गीत संस्कृत तथा बाङ्गला — दोन भाषाओं म है, और इसम भारतमाता के स्वरूप का रमणीय वणन है। स्वतन्त्रता-
आन्दोलन म दे शभक्त इसे मन्त्र क तरह गाते थे।
भारतमाता का वणन — पवतराज हमालय उसके मस्तक पर मुकुट-रूप म शो भत है, रत्नाकर समुद्र उसके चरण धोता है,
महेन्द्र ग र–मलय–सह्य–रैवतक– वन्ध्य–अराव ल जैसे पवत तथा गङ्गा–यमुना–सरस्वती– सन्धु–ब्रह्मपुत्र–गोदावरी–कृष्णा–
कावेरी जैसी प वत्र न दयाँ उसक शोभा ह।
त्रवणध्वज का सन्दे श — केशरवण त्याग एवं शौय का सूचक है (‘जयतु सै नकः’), श्वेतवण शा न्त, सत्य तथा वैज्ञा नक के
धवल यश का द्योतक है (‘जयतु वैज्ञा नकः’), ह रतवण कृषक के स्वेद बन्दुओं से स ञ्चत समृ द्ध का प्रतीक है (‘जयतु
कृषकः’)।
ध्वज के मध्य घननीलवण का धमचक्र है, जसम चतु वश त (२४) अरे ह। यह ‘चलनीयं कतव्यपथे वै, न वरम, सततं चल’ का
भाव दे ता है — जीवन म श्रा न्त, आलस्य और प्रमाद का स्थान न हो।
व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ म वभ क्त-वचन क पहचान, शब्दरूप, लट् -लकार के तीन पुरुष एवं तीन वचन तथा रेखाङ् कत
पद पर प्रश्न नमाण का अभ्यास कराया गया है।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 1 वन्दे भारतमातरम्
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त्व रत पुनरावृ त्त
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शब्दः हन्द अथ
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वन्दे पणामं करोिम प्रणाम करता/करती ँ I greet
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Having embraced
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आ लङ् ग्य आिलङ् गनं कृ त्वा आ लगन करके
बहुत्र बहषु ु स्थानेष ु
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अनेक स्थान पर In many places
जज्ञासा ातुम ् इच्छा
agजानने क इच्छा Curiosity
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वत्सला स्नेहयुक्ता स्नेहमयी Loving
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माहात्म्यम्
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पवतराजः पवतानां राजा पवत का राजा The king of mountains
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रत्नाकरः समुद ः सागर Sea / Ocean
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तीथक्षेत्रा ण पुण् यक्षेत्र ािण
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ललाटे भाले a On the forehead
स्वेद बन्दु भः घमस्य जलकणैः पसीने क बूँद से By sweat-drops
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सस्यश्यामला उपज से हरी-भरी Densely covered with crops
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सस्यैः घनश्यामा
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धवलम् शुक्लम् श्वेत White
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अराः चक्रस्य यि टकाः ती लयाँ Spokes of a wheel
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श्रान्तेः
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क्लान्तेः
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जेतुम् िवजयं पाप्तुम ् To win
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