Page 1
F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा7
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 4: न लभ्यते चेत् आम्लं ा ाफलम्
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
39 – 46 12 37 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 23 pages
Page 2
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के चतुथः पाठः — न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् के सम्पूण हल। यह गीतरूप म गूँथी हुई
पञ्चतन्त्र-शैली क नी तकथा है — भूखा-प्यासा शृगाल (लोमड़ी) वन म भटकता है, ऊँची बेल पर लगे अंगूर दे खकर बार-बार उछलता है, नह पहुँच
पाता और अन्त म ‘आम्लं ाक्षाफलम्’ (अंगूर ख े ह) कहकर भाग जाता है। व्याकरण क दृ ष्ट से यह पाठ आत्मनेपद धातुओं के लट् -लकार पर
के न् त है — जायते, लभते, पलायते जैसे रूप। नीचे पृष्ठ 39 से 46 तक का चत्र-संवाद, वयं शब्दाथान् जानीमः, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–७
(हर उपभाग स हत), योग्यता वस्तरः के दोन ोक, प रयोजनाकायम् तथा कायकलापः क्रम से हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर
कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 7) 39 – 46
खं ड प्रश्न
12 37
माध्यम
हन्द
पाठारम्भे चत्रसंवादः — पृष्ठ 39
पाठः — न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (कक्षायां संवादः)
पाठः
प्र.1 प्रयच्छात्राः ! एतत् चत्रं पश्यन्तु। चत्रे क कम् अ स्त ?
छात्राः वद न्त — महोदय ! चत्रे वृक्षः अ स्त । महोदय ! शृगालः अ स्त । द्राक्षाफला न अ प स न्त ।
[महोदय! चत्र म पेड़ है। महोदय! सयार (लोमड़ी) है। अंगूर भी ह।]
वाक्य कैसे बना: वृक्षः अ स्त — कता एकवचन है, इस लए क्रया भी एकवचन अ स्त। ाक्षाफला न स न्त —
‘ ाक्षाफलम्’ नपुंसक लङ्ग है; प्रथमा बहुवचन म द्राक्षाफला न बनता है, अतः क्रया बहुवचन स न्त आई। ‘अ प’ का
अथ है ‘भी’।
शब्द-भेद: क कम् अ स्त ? म ‘ कम्’ क द्वरु क्त (दोहराव) का अथ है ‘क्या-क्या है’ — अथात् एक से अ धक
वस्तुएँ बतानी ह। ‘ प्रयच्छात्राः’ = प्रय + छात्राः, सम्बोधन बहुवचन।
Page 1 of 23
Page 3
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 बहु सम्यक्। शृगालः क करो त ?
छात्रः वद त — आचाय ! शृगालः द्राक्षाफला न खा दतुम् इच्छ त, कन्तु न शक्नो त ।
[आचाय जी! सयार अंगूर खाना चाहता है, कन्तु नह खा पाता।]
‘खा दतुम्’ क्य ? जब एक ही कता के दो काम ह और दूसरा काम ‘चाहना/सकना’ हो, तो पहले काम म तुमुन्
प्रत्यय लगता है — खाद् + तुम् = खा दतुम् (खाने के लए/खाना)। इसी तरह पाठ म पातुम् इच्छा ( पपासा) और
भोक्तुम् इच्छा (बुभुक्षा) आए ह।
ध्यान द: बहु सम्यक् = बहुत ठ क; बहु समीचीनम् = बहुत अच्छा — आचाय छात्र क प्रशंसा इन्ह शब्द से करते
ह। ‘न शक्नो त’ = नह कर पाता (शक् धातु, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन)।
प्र.3 अहो ! भवन्तः कथं जान न्त ?
छात्राः वद न्त — महोदय ! वयम् एतां कथां मातृभाषया ुतवन्तः ।
[महोदय! हमने यह कथा अपनी मातृभाषा म सुनी है।]
तदा आचायः वद त — बहु समीचीनम् । त ह संस्कृतभाषायाम् एतां कथां गीतरूपेण गायामः अ भनयं च कुमः । छात्राः वद न्त
— अस्तु आचाय ! कृपया पाठयतु ।
[बहुत अच्छा। तो इस कथा को संस्कृत म गीत के रूप म गाएँगे और अ भनय भी करगे। — ठ क है आचाय जी! कृपया पढ़ाइए।]
आदर का प्रयोग: भवन्तः (आप सब) के साथ क्रया प्रथमपुरुष बहुवचन म आती है — भवन्तः जान न्त, न क
‘भवन्तः जानथ’। यही नयम ‘भवान् जाना त / भवती जाना त’ म भी चलता है।
ाकरण- बन्दु: मातृभाषया — करण (साधन) के अथ म तृतीया वभ क्त, एकवचन (मातृभाषा → मातृभाषया)।
गीतरूपेण भी तृतीया एकवचन है। ुतवन्तः = श्रु + क्तवतु, प्रथमा बहुवचन — ‘सुन चुके ह’।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 42–43
Page 2 of 23
Page 4
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
शब्दाथाः — मातृभाषया अथ लखन्तु
शब्दाथाः
प्र.1 मातृभाषया अथ लखन्तु — शृगालः, वनम्, पपासा, बुभुक्षा, कम प, इतोऽ प, लभते, ान्तः, ख ः, जायते,
वामतः, द क्षणतः, अग्रतः, पृष्ठतः, स्वेदः, तृषा, द्राक्षालताम्, उप र, दृश्यते, अनुक्षणम्, रसः, एकवारम्, द्ववारम्,
उत्पत त, पुनः पुनः, कथय त, आम्लम्, द्राक्षाफलम्, पलायते।
यह अ न्तम स्तम्भ आपक अपनी मातृभाषा के लए है — जो भी आपक भाषा हो ( हन्द , मराठ , बाङ् ला, त मऴ् , तेलुगु,
गुजराती, ओ डआ, अस मया, पंजाबी …), उसम अथ ल खए। नीचे पुस्तक क पूरी सूची संस्कृत-पयाय और हन्द अथ के साथ द
है; अ न्तम स्तम्भ आप भ रए।
Page 3 of 23
Page 5
as e
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
mलोमशा as e
शगृ ालः
.co
लोमड़ ी Fox
a g l
se m
g l a काननम् अरण्य Forest
a
वनम्
िपपासा पातुम् इच्छा यास
प् Thirst
co m
बुभक्ष
ु ा भोक्तुम् इच्छा
e m .
भूख Hunger ag
g l as
िकमिप यत् क चत्
a कु छ भी Anything
और भी
co m
इतोऽिप अतः परम् अ प More than this
em.
com as
पाता है
l
लभते प्रा ो त Gets
. a g
m
ase
ान्तः क्लान्तः थका हआ
ु Tired
aglिख ः दुः खतः खेद से युक्त Sad
mहै a s
.co agl
जायते भव त होता Becomes
se m
g l a बायी ं ओर Towards left
a
वामतः वामभागे
दिक्षणतः द क्षणभागे दािहनी ओर Towards right
co m
m .
se
अग तः अग्रभागे आगे In front
पष्ृ ठतः.co
m l a
agBehind
sem
पृष्ठभागे पीछे
a स्वेदः
agl घमः पसीना Sweat
se m
com l a
तषृ ा पपासा यास Thirst
g
प्
m . a
ase
अंगूर की बेल को Grape-vine climber
agl
द ाक्षालताम् ाक्षाफलस्य वल्लीम्
उपिर ऊध्वभागे ऊपर Above
co m
.
दृ श्यते अवलोक्यते दे खा जाता है Seen
e m
sImmediately
m l a
.co ag
अनुक्षणम् क्षणाभ्यन्तरे उसी क्षण
a s em रसः
gl
लालारसः / मुख ावः लार Saliva
a c
m .
e
एक बार Once
s
एकवारम् सकृत्
m a
ि वारम् वारद्वयम् / द्वः
e m . co दो बार Twice
agl
g l as
उत्पतित कूदते
a कू दता है Jumps
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 4 of 23
Page 6
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
पुनः पुनः भूयो भूयः बार-बार Frequently
कथयित वद त कहता है Tells
आम्लम् आम्लरसयुक्तम् ख ा Sour
द ाक्षाफलम् मृद्व काफलम् अंगूर Grapes
पलायते अन्यत्र धाव त भाग जाता है Runs away
शब्द बनाने का ढं ग दे खए: वामतः, द क्षणतः, अग्रतः, पृष्ठतः — इन सबम त सल् (–तः) प्रत्यय लगा है, जसका
अथ है ‘उस ओर से / उस ओर’। इसी नयम से बनते ह — मुखतः, सवतः, पुरतः। गीत म यही चार शब्द शृगाल का
चार ओर दे खना दखाते ह।
याद रखने क तरक ब: ‘ पपासा’ और ‘तृषा’ दोन का अथ प्यास है — पाठ म दोन आए ह। इसी तरह ‘उत्पत त’
का पयाय ‘कूदते’ है, जो स्वयं एक आत्मनेपद क्रया है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 43
प्रश्नः १ — सा भनयं गानम्
यात्मकः
प्र.1 एकः शृगालः इ त गीतस्य सा भनयं कक्षायां गानं कुवन्तु।
यह करने का प्रश्न है — कक्षा म मलकर ‘एकः शृगालः’ गीत गाइए और साथ-साथ अ भनय (मूक-अ भनय) क जए। नीचे गीत क
पूरी पं क्तयाँ और हर पं क्त पर करने योग्य अ भनय दया है।
Page 5 of 23
Page 7
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
गीत-पङ् क्तः हन्द अथ अ भनयः (क्या कर)
एकः शगृ ालः वनं गच्छित । एक सयार वन जाता है। एक ओर से धीरे -धीरे चलते हुए मंच पर आइए
िपपासया बुभक्ष
ु या वनं गच्छित । प्यास और भूख से वन जाता है। पेट पर तथा गले पर हाथ रखकर भूख-प्यास िदखाइए
तत्र गच्छित, िकमिप न लभते । वहाँ जाता है, कुछ भी नह पाता। इधर-उधर खोजते हुए दोनों हाथ फै लाइए
सः ान्तः जायते, िख ः जायते । वह थक जाता है, दुखी हो जाता है। कं धे ढीले करके थका हआ
ु मुख बनाइए
वामतः पश्यित, दिक्षणतः पश्यित । बाएँ दे खता है, दाएँ दे खता है। बाएँ–दाएँ, िफर आगे–पीछे गरदन घुमाइए
तस्य स्वेद ः जायते, तषृ ा जायते । उसे पसीना आता है, प्यास लगती है। माथे से पसीना पोंछने का अिभनय कीिजए
सः पश्यित द ाक्षाफलम् । वह अंगूर दे खता है। ऊपर की ओर उँ गली उठाकर आँखें बड़ ी कीिजए
अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते । उसी क्षण उसके मुँह म लार आ जाती है। होंठों पर जीभ फे रने का संके त कीिजए
एकवारम् उत्पतित, ि वारम् उत्पतित । एक बार उछलता है, दो बार उछलता है। िगनती के साथ तीन-चार बार उछिलए
आम्लं द ाक्षाफलम्, आम्लं द ाक्षाफलम् । अंगूर ख े ह, अंगूर ख े ह। मुँह बनाकर नाक -भौं िसकोिड़ ए
इत्येवं कथयित, सः पलायते । ऐसा कहकर वह भाग जाता है। मुँह फे रकर तेज़ी से मंच से बाहर जाइए
गाने का ढं ग: गीत क हर पं क्त म दोहराव है — ‘सः वनं गच्छ त, सः वनं गच्छ त’। इसी लए इसे दो दल म बाँटकर
गाइए — पहला दल पहली आधी पं क्त गाए, दूसरा दल उसे दोहराए। ताल के लए हाथ से थपक द जए;
‘उत्पत त’ पर सब उछल — इससे गीत याद भी हो जाएगा और आनन्द भी आएगा।
सुझाव: एक छात्र शृगाल बने, दो-तीन छात्र हाथ ऊपर उठाकर द्राक्षालता बन और शेष सब कोरस (समवेत गान)
गाएँ। कागज़ के अंगूर बनाकर ऊपर लटकाइए — दृश्य और भी सुन्दर लगेगा।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 43
प्रश्नः २ — अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदे न पदद्वयेन वा उत्तरं लखन्तु
एकपदे न उत्तरम्
प्र.2 (क) कः वनं गच्छ त ?
शृगालः । (पूण रूप म — एकः शृगालः ।)
[ सयार / लोमड़ी।]
Page 6 of 23
Page 8
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नशब्द से उत्तर क वभ क्त तय होती है: प्रश्न म कः (कौन) है — यह प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग है।
अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग म ही आएगा — शृगालः। ‘शृगालम्’ या ‘शृगालेन’ लखना गलत होगा।
गीत क पं क्त: ‘एकः शृगालः वनं गच्छ त।’ — यह से उत्तर लया गया है।
प्र.2 (ख) शृगालः कां पश्य त ?
द्राक्षालताम् ।
[अंगूर क बेल को।]
‘काम्’ का संकेत: प्रश्नपद काम् है — यह ‘ कम्’ का स्त्री लङ्ग, द्वतीया वभ क्त, एकवचन रूप है। अतः उत्तर
भी स्त्री लङ्ग द्वतीया एकवचन म — द्राक्षालताम् (मूल शब्द ‘ ाक्षालता’, आकारान्त स्त्री लङ्ग)। ‘लता’ स्त्री लङ्ग है,
इसी लए ‘कम्’ नह , ‘काम्’ पूछा गया।
तुलना क जए: पुं लङ्ग म कं पश्य त ?, नपुंसक लङ्ग म क पश्य त ? — तीन लङ्ग के प्रश्नपद अलग ह।
प्र.2 (ग) शृगालस्य मुखे क जायते ?
रसः । (अथात् लालारसः ।)
[लार।]
पाठ का आधार: ‘अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते’ — अंगूर दे खते ही उसी क्षण उसके मुँह म लार आ जाती है। यहाँ
‘रसः’ का अथ स्वाद नह , लालारसः / मुख ावः (लार) है — पुस्तक ने शब्दाथ म यही दया है।
ाकरण: मुखे — अ धकरण (जगह) के अथ म सप्तमी वभ क्त, एकवचन। शृगालस्य — सम्बन्ध के अथ म षष्ठी
एकवचन। तन्मुखे = तस्य + मुखे का समस्त रूप।
Page 7 of 23
Page 9
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (घ) द्राक्षालतायां शृगालः क पश्य त ?
द्राक्षाफलम् । ( ाक्षाफला न इ त अ प साधु ।)
[अंगूर।]
वभ क्त दे खए: ाक्षालतायाम् सप्तमी एकवचन है (बेल पर/बेल म) — आकारान्त स्त्री लङ्ग म सप्तमी का रूप –
आयाम् होता है, जैसे लता → लतायाम्, कथा → कथायाम्। उत्तर द्राक्षाफलम् कम है, अतः द्वतीया एकवचन,
नपुंसक लङ्ग।
गीत क पं क्त: ‘पश्य त ाक्षालतां, सः पश्य त ाक्षाफलम्।’
प्र.2 (ङ) द्राक्षाफलं कुत्र दृश्यते ?
उप र लतासु । (पाठे — ‘उप र उप र लतासु’ ।)
[ऊपर बेल पर।]
‘कुत्र’ का उत्तर ान होता है: प्रश्न ‘कहाँ’ पूछता है, इस लए उत्तर म ानवाचक पद आएगा — लतासु सप्तमी
बहुवचन (बेल पर) और उप र अव्यय (ऊपर)। गीत म ‘उप र उप र’ क द्वरु क्त ‘बहुत ऊँचाई पर’ का भाव दे ती है
— और यही शृगाल क वफलता का कारण है।
या पहचा नए: दृश्यते कमवाच्य (भाववाच्य) का रूप है — ‘दे खा जाता है’। इसका कतृवाच्य रूप ‘पश्य त’ है।
प्र.2 (च) क शृगालः पुनः पुनः उत्पत त ? (आम्/न)
आम् । (आम्, शृगालः पुनः पुनः उत्पत त ।)
[हाँ। हाँ, सयार बार-बार उछलता है।]
पाठ से प्रमाण: ‘एकवारम् उत्पत त, द्ववारम् उत्पत त, त्रवारम् उत्पत त, पुनः पुनः उत्पत त’ — गीत म गनती
बढ़ती जाती है, इसी लए उत्तर ‘आम्’ है। ‘ कम्’ जब वाक्य के आरम्भ म आता है तो वह प्रश्नपद नह , ब ल्क ‘क्या?’
बनाने वाला अव्यय होता है — उत्तर आम्/न म दे ना होता है।
Page 8 of 23
Page 10
as e
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
शब्द: आम् = हाँ, न = नह । ये दोन अव्यय ह, इनके रूप नह चलते।
m as e
.co a g l
a s em
aप्र.2gl(छ) क शृगालः द्राक्षाफलं प्रा ो त ? (आम्/न)
co m
m . ag
as e
l
न । (न, शृगालः ाक्षाफलं न प्रा ो त ।)
[नह । नह , सयार अंगूर नह पाता।]
a g
. c om
कथा का मम यह है: बार-बार उछलने पर भी फल नह मलता — ‘तस्य स्वेदः जायते, श्रमः जायते’। अन्त म वह
s e mद्राक्षाफलम् (य द
अंm gla
फल को ख ा कहकर भाग जाता है। पाठ का शीषक भी यही कहता है — न लभ्यते चेत् आम्लं
न मले तोco
. a
em
गूर ख े ह)।
a s
a gl पयायवाची: प्रा ो त = लभते — दोन का अथ ‘पाता है’ है; कन्तु ‘प्रा ो त’ परस्मैपद और ‘लभते’ आत्मनेपद
m a s
.co agl
रूप है। यही आत्मनेपद इस पाठ का व्याकरण- वषय है।
se m
g l a
a
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 43–44
co m
.
प्रश्नः ३ — अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखन्तु
e m
m l as
.co g
पू ण वाक्ये न उत्तरम्
em a
a s
a gl प्र.3 (क) शृगालः कथं वनं गच्छ त ?
se m
com g l a
m . a
ase
agl
शृगालः पपासया बुभुक्षया च वनं गच्छ त ।
[ सयार प्यास और भूख के कारण वन जाता है।]
. c om
‘कथम्’ का उत्तर साधन/कारण होता है: इसी लए उत्तर म पपासया और बुभुक्षया — दोन तृतीया वभ क्त,
mलङ्ग शब्द म तृतीया
एकवचन, स्त्री लङ्ग म ह ( पपासा → पपासया, बुभुक्षा → बुभुक्षया)। आकारान्त eस्त्री
s
m
o का रूप –या होता है।
cएकवचन gl a
. a
a s em
agl c
पूणवाक्य कैसे लख: प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म दोहराइए और प्रश्नपद (कथम्) क जगह उत्तर रख द जए —
m .
m a s e
co agl
प्रश्न ‘शृगालः कथं वनं गच्छ त?’ → उत्तर ‘शृगालः पपासया बुभुक्षया च वनं गच्छ त।’
m .
as e
a g l
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 9 of 23
Page 11
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 (ख) वनं गत्वा शृगालस्य क जायते ?
वनं गत्वा शृगालः ान्तः ख ः च जायते । तस्य स्वेदः जायते, तृषा च जायते ।
[वन जाकर सयार थक जाता है और दुखी हो जाता है। उसे पसीना आता है और प्यास लगती है।]
दो-दो जोड़े दे खए: गीत म भाव दो-दो करके आते ह — श्रान्तः– खन्नः (शरीर क थकान और मन का खेद) तथा
स्वेदः–तृषा (पसीना और प्यास)। पहला जोड़ा दखाता है क प रश्रम व्यथ गया, दूसरा जोड़ा दखाता है क कष्ट
बढ़ता ही जा रहा है।
ाकरण: गत्वा = गम् + क्त्वा (‘जाकर’) — दो काम म पहले होने वाले काम के लए क्त्वा प्रत्यय आता है।
जायते आत्मनेपद क्रया है, प्रथमपुरुष एकवचन, लट् -लकार।
प्र.3 (ग) शृगालः द्राक्षाफलं कुत्र पश्य त ?
शृगालः उप र उप र लतासु द्राक्षाफलं पश्य त ।
[ सयार बहुत ऊपर बेल पर अंगूर दे खता है।]
‘उप र उप र’ का अथ: द्वरु क्त से ‘बहुत ऊपर, और भी ऊपर’ का भाव नकलता है। यही कथा का तनाव बनाता
है — फल दखता तो है, पर पहुँच से बाहर है। संस्कृत म ऐसी द्वरु क्त ‘अ धकता’ या ‘ नरन्तरता’ बताती है, जैसे
‘पुनः पुनः’ (बार-बार)।
वभ क्त: लतासु — सप्तमी वभ क्त, बहुवचन, स्त्री लङ्ग (लता → लतायाम् / लतयोः / लतासु)।
प्र.3 (घ) द्राक्षाफलं दृ ् वा कस्य मुखे रसः जायते ?
द्राक्षाफलं दृ ् वा शृगालस्य मुखे रसः जायते ।
[अंगूर दे खकर सयार के मुँह म लार आ जाती है।]
‘कस्य’ का उत्तर षष्ठी म: प्रश्नपद कस्य षष्ठी वभ क्त, एकवचन है ( कसका), अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन म —
शृगालस्य। अकारान्त पुं लङ्ग म षष्ठी एकवचन का रूप –स्य होता है (बालकस्य, वृक्षस्य, शृगालस्य)।
Page 10 of 23
Page 12
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
ाकरण: दृ ् वा = दृश् + क्त्वा (‘दे खकर’)। पाठ म इसी प्रकार ‘गत्वा’, ‘कृत्वा’ रूप भी आए ह।
प्र.3 (ङ) अन्ते शृगालः क वद त ?
अन्ते शृगालः ‘आम्लं द्राक्षाफलम्, आम्लं द्राक्षाफलम्’ इ त वद त (कथय त), इत्येवं कथ यत्वा सः पलायते ।
[अन्त म सयार कहता है — ‘अंगूर ख े ह, अंगूर ख े ह’, और ऐसा कहकर भाग जाता है।]
कथा का सन्दे श: जो वस्तु प रश्रम करने पर भी न मले, उसे बुरा कह दे ना — यही ‘ख े अंगूर’ (sour grapes)
वाली मनोवृ त्त है। शृगाल अपनी असफलता स्वीकार नह करता, दोष फल पर मढ़ दे ता है। पाठ का शीषक इसी क
ओर संकेत करता है — न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्।
ध्यान द: उद्धरण के बाद इ त लगाना संस्कृत क वशेषता है — ‘…इ त वद त’ = ‘…ऐसा कहता है’। इत्येवम् =
इ त + एवम् (यण् स न्ध)।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 44
प्रश्नः ४ — उप र प्रदत्तां म ूषां दृ ् वा रक्त ानेषु उ चत यापदा न लखन्तु
रक्त ानपू तः
प्र.4 (क) वन्दते ....... ....... / ....... वन्दे थे ....... / ....... ....... वन्दामहे (वन्द् धातोः लट् -लकारस्य रूपा ण पूरयन्तु)
पुस्तक म तीन कोष्ठक पहले से भरे ह — वन्दते (प्रथमः पुरुषः, एकवचनम्), वन्दे थे (मध्यमः पुरुषः, द्ववचनम्) तथा वन्दामहे
(उत्तमः पुरुषः, बहुवचनम्)। शेष छह ान इस प्रकार भरे जाएँगे —
वन्द् (आत्मनेपद ) एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषः वन्दते वन्दे ते वन्द न्ते
मध्यमः पुरुषः वन्दसे वन्दे थे वन्द ध्वे
उत्तमः पुरुषः वन्दे वन्दावहे वन्दामहे
Page 11 of 23
Page 13
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
म ूषा (लभ्) से मलान क जए: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म दया गया साँचा है — लभते, लभेते, लभन्ते / लभसे,
लभेथे, लभध्वे / लभे, लभावहे, लभामहे। इसम से ‘लभ्’ हटाकर ‘वन्द्’ रख द जए — वन्दते, वन्दे ते, वन्दन्ते …
उत्तर स्वयं बन जाएगा। सभी आत्मनेपद धातुओं म अन्त्य भाग (–ते, –एते, –अन्ते …) एक ही रहता है।
अथ: वन्द् = वन्दना करना, प्रणाम करना। अहं दे वं वन्दे = म दे वता को प्रणाम करता ँ।
प्र.4 (ख) पलायते ....... ....... / ....... ....... ....... / ....... ....... ....... (पलाय् धातोः लट् -लकारस्य रूपा ण पूरयन्तु)
इस भाग म केवल पलायते दया है; शेष आठ ान भरने ह —
पलाय् (आत्मनेपद ) एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषः पलायते पलायेते पलायन्ते
मध्यमः पुरुषः पलायसे पलायेथे पलायध्वे
उत्तमः पुरुषः पलाये पलायावहे पलायामहे
पहचान: धातु का र भाग पलाय् है, उसके बाद वही नौ अन्त्य-भाग जुड़ते ह जो ‘लभ्’ म जुड़े थे। ध्यान द जए
— द्ववचन म ‘य’ के बाद ‘ए’ आता है (पलाय + एते = पलायेते), इस लए यहाँ कोई स न्ध-प रवतन नह दखता।
पाठ म प्रयोग: ‘इत्येवं कथय त, सः पलायते।’ — अथ है ‘भाग जाता है’। बहुवचन म ‘चोराः पलायन्ते’।
प्र.4 (ग) जायते ....... ....... / ....... ....... ....... / ....... ....... ....... (जन् धातोः लट् -लकारस्य रूपा ण पूरयन्तु)
यहाँ केवल जायते दया है; शेष आठ ान इस प्रकार भ रए —
जन् / जाय् (आत्मनेपद ) एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
प्रथमः पुरुषः जायते जायेते जायन्ते
मध्यमः पुरुषः जायसे जायेथे जायध्वे
उत्तमः पुरुषः जाये जायावहे जायामहे
Page 12 of 23
Page 14
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
क्य ‘जन्’ से ‘जाय’ बनता है: ‘जन्’ दवा दगण क आत्मनेपद धातु है; लट् -लकार म इसका अङ्ग जाय बन जाता
है — जन् + य = जाय। इसके बाद वही प र चत अन्त्य-भाग जुड़ते ह। अथ है ‘होना, उत्पन्न होना’ (= भव त)।
पाठ म प्रयोग: ‘श्रान्तः जायते, खन्नः जायते’, ‘तस्य स्वेदः जायते, तृषा जायते’ — पूरे गीत म यही क्रया बार-बार
आती है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 44–45
प्रश्नः ५ — उदाहरणानुसारम् एकवचनरूपं दृ ् वा द्ववचन-बहुवचनरूपा ण लखन्तु
रूपरचना
प्र.5 उदाहरणानुसारम् एकवचनरूपं दृ ् वा द्ववचन-बहुवचनरूपा ण लखन्तु — यथा : कम्प् — कम्पते, कम्पेते,
कम्पन्ते । (धातवः — वध्, वत्, प्र + काश्, वन्द्, याच्, लज्ज्, वीक्ष्, सेव्, वन्द्, शुभ्)
पहले दए गए एकवचन रूप का पुरुष पहचा नए, फर उसी पुरुष का द्ववचन और बहुवचन ल खए। पूरी ता लका —
धातुः एकवचनम् (पुस्तक म दया) पुरुषः द्ववचनम् बहुवचनम्
कम्प् (यथा) कम्पते प्रथमः क म्पेते क म्पन्ते
वध् वधते प्रथमः वधते वधन्ते
वत् वतसे मध्यमः वतथे वतध्वे
प + काश् प्रकाशते प्रथमः पकाशेते पकाशन्ते
वन्द् वन्दे उत्तमः वन्दावहे वन्दामहे
याच् याचते प्रथमः याचेते याचन्ते
लज्ज् लज्जसे मध्यमः ल ज्जेथे ल ज्जध्वे
वीक्ष् वीक्षते प्रथमः वीक्षेते वीक्षन्ते
से व् सेवे उत्तमः से वावहे से वामहे
वन्द् वन्दसे मध्यमः वन्दे थे वन्द ध्वे
शुभ ् शोभते प्रथमः शोभेते शोभन्ते
Page 13 of 23
Page 15
as e
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
सबसे बड़ी सावधानी — पुरुष बदलना नह है: इस प्रश्न म तीन पुरुष के रूप मलाकर दए गए ह। जस पुरुष
m as e
l
का एकवचन दया है, उसी पुरुष का द्ववचन-बहुवचन लखना है। पहचान का सूत्र —
अन्त m . c o a g
s e म –ते हो तो प्रथमः पुरुषः → द्व. –एते, बहु. –अन्ते
a glaअन्त म –से हो तो मध्यमः पुरुषः → द्व. –एथे, बहु. –ध्वे
अन्त म –ए हो तो उत्तमः पुरुषः → द्व. –आवहे, बहु. –आमहे
co m
.
इसी लए ‘वन्दे ’ (उत्तम) का उत्तर वन्दावहे–वन्दामहे है, पर ‘वन्दसे’ (मध्यम) का उत्तर वन्दे थे–वन्दध्वे है — एक ही
e m ag
l as
धातु, दो अलग पं क्तयाँ।
a g
co m
धात्वथाः: वध् = बढ़ना; वत् = होना/रहना; प्र+काश् = चमकना; वन्द् = प्रणाम करना; याच् = माँगना; लज्ज् =
e m.
लजाना; वीक्ष् = दे खना; सेव् = सेवा करना; शुभ् = शोभा पाना; कम्प् = काँपना। ध्यान द जए — शुभ् धातु का अङ्ग
m l as
.co g
गुण होकर शोभ बनता है, इसी लए रूप ‘शोभते’ है, ‘शुभते’ नह ।
m a
l a se
a g
s
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 45
m a
प्रश्नः ६ — उदाहरणानुसारं वाक्यद्वयं लखन्तु
m .co agl
l a se
a g
वाक्यरचना
यथा – शत्रुः (पलाय्) ....................... , चोराः (पलाय्) .......................
co m
.
प्र.6 (यथा)
em
m l as
m .co a g
स्eतक म यह उदाहरण पहले से भरा है —
a s
gl
पु
a शत्रुः पलायते । [शत्रु भाग जाता है।] चोराः पलायन्ते । [चोर भाग जाते ह।]
se m
o m l a
उदाहरण क्या सखाता है: बाय ओर कता एकवचन
m .c है (शत्रुः) तो क्रया भी एकवचन — पलायते; दाय ओर कता ag
l a se— पलायन्ते। यही ‘कता के अनुसार क्रया’ का नयम आगे के सभी
ag
बहुवचन है (चोराः) तो क्रया भी बहुवचन
उपभाग म लगाना है।
co m
m .
ase
दोन प्रथमपुरुष ह: कता ‘वह/वे’ के अथ म है, इस लए क्रया प्रथमपुरुष म ही रहेगी — एकवचन –ते, बहुवचन –
m l
.co a g
न्ते।
se m
g l a
a c
m .
m
वृक्षः (वध्) ....................... , बालाः (वध्) .......................
a s e
co agl
प्र.6 (क)
m .
as e
a g l
वृक्षः वधते । [पेड़ बढ़ता है।] बालाः वधन्ते । [ब े बढ़ते ह।]
co m
m .
m as e
.co
a g l Page 14 of 23
Page 16
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
रूप कैसे बना: ‘वृक्षः’ प्रथमा एकवचन है → क्रया वधते; ‘बालाः’ प्रथमा बहुवचन है → क्रया वधन्ते। वध्
आत्मनेपद है, इस लए ‘वध त’ लखना गलत होगा।
अपना वाक्य बनाइए: ‘मम ग्रामे आम्रवृक्षाः वधन्ते।’ (मेरे गाँव म आम के पेड़ बढ़ते ह।)
प्र.6 (ख) छात्रः (वन्द्) ....................... , भक्ताः (वन्द्) .......................
छात्रः वन्दते । [छात्र प्रणाम करता है।] भक्ताः वन्दन्ते । [भक्त प्रणाम करते ह।]
ध्यान द जए: यहाँ कता ‘वह/वे’ के अथ म है, अतः प्रथमपुरुष — वन्दते / वन्दन्ते। य द कता ‘अहम्’ होता तो
वन्दे और ‘वयम्’ होता तो वन्दामहे आता (दे खए प्रश्न ७ (घ))।
अपना वाक्य: ‘छात्राः प्रातः गुरुं वन्दन्ते।’ (छात्र सवेरे गुरु को प्रणाम करते ह।)
प्र.6 (ग) वै ः (वीक्ष्) ....................... , प्रेक्षकाः (वीक्ष्) .......................
वै ः वीक्षते । [वैद्य दे खता है / जाँचता है।] प्रेक्षकाः वीक्षन्ते । [दशक दे खते ह।]
शब्द-सम्बन्ध: वीक्ष् धातु से ही ‘प्रेक्षकः’ (दे खने वाला) और ‘परीक्षा’ शब्द बने ह — व + ईक्ष् = वीक्ष् (ध्यान से
दे खना)। इसी लए वाक्य म वैद्य ‘जाँचता है’ और दशक ‘दे खते ह’।
अपना वाक्य: ‘क्र डाङ्गणे प्रेक्षकाः कन्दुकक्र डां वीक्षन्ते।’ (खेल के मैदान म दशक क्रकेट/गद का खेल दे खते ह।)
प्र.6 (घ) कमचारी (सेव्) ....................... , म हलाः (सेव्) .......................
कमचारी सेवते । [कमचारी सेवा करता है।] म हलाः सेवन्ते । [म हलाएँ सेवा करती ह।]
Page 15 of 23
Page 17
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
कता का वचन पहचा नए: कमचारी इनकारान्त पुं लङ्ग शब्द का प्रथमा एकवचन है (कमचारी – कमचा रणौ –
कमचा रणः), इस लए क्रया एकवचन सेवते। म हलाः आकारान्त स्त्री लङ्ग का प्रथमा बहुवचन है, इस लए क्रया
बहुवचन सेवन्ते। क्रया लङ्ग नह दे खती, केवल पुरुष और वचन दे खती है।
अपना वाक्य: ‘ च कत्सालये से वकाः रुग्णान् सेवन्ते।’ (अस्पताल म से वकाएँ रो गय क सेवा करती ह।)
प्र.6 (ङ) वृक्षः (कम्प्) ....................... , रुग्णाः (कम्प्) .......................
वृक्षः कम्पते । [पेड़ हलता/काँपता है।] रुग्णाः कम्पन्ते । [रोगी काँपते ह।]
उदाहरण से मलान: प्रश्न ५ क ता लका क पहली पं क्त यही धातु दे ती है — कम्पते, कम्पेते, कम्पन्ते। एकवचन
कता ‘वृक्षः’ के साथ पहला रूप, बहुवचन कता ‘रुग्णाः’ के साथ तीसरा रूप लगाइए।
अपना वाक्य: ‘शीतकाले शीतेन जनाः कम्पन्ते।’ (जाड़े म ठं ड से लोग काँपते ह।) — ‘शीतेन’ तृतीया वभ क्त,
कारण के अथ म।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 45
प्रश्नः ७ — उदाहरणं दृ ् वा वाक्या न उ चतरूपैः पूरयन्तु
वाक्यपू तः
प्र.7 (क) शुनकं दृ ् वा बालकस्य भयं (जाय्) ................................
पुस्तक म यह उदाहरण पहले से भरा है —
शुनकं दृ ् वा बालकस्य भयं जायते ।
[कुत्ते को दे खकर बालक को डर लगता है।]
या कसके अनुसार बनी: वाक्य का कता भयम् है — नपुंसक लङ्ग, प्रथमा एकवचन। इस लए क्रया भी
प्रथमपुरुष एकवचन — जायते। ‘बालकस्य’ षष्ठी है (बालक का भय), वह कता नह है — यह छात्र प्रायः भूल
करते ह।
ाकरण: शुनकम् = कुत्ते को ( द्वतीया एकवचन), दृ ् वा = दे खकर (क्त्वा प्रत्यय)।
Page 16 of 23
Page 18
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.7 (ख) मूषकः माजारं दृ ् वा (पलाय्) ................................
मूषकः माजारं दृ ् वा पलायते ।
[चूहा बल्ली को दे खकर भाग जाता है।]
रूप-चयन: कता मूषकः प्रथमा एकवचन है और ‘वह’ के अथ म है, अतः क्रया प्रथमपुरुष, एकवचन, लट् -लकार
— पलायते। बहुवचन म यही ‘मूषकाः … पलायन्ते’ होता।
वभ क्त: माजारम् — कम है, इस लए द्वतीया एकवचन। पाठ का वाक्य भी यही रूप दे ता है — ‘सः पलायते’।
प्र.7 (ग) रा त्रकाले मागद पाः (प्रकाश्) ................................
रा त्रकाले मागद पाः प्रकाशन्ते ।
[रात के समय सड़क के द ये (स् ट-लाइट) चमकते ह।]
बहुवचन क्य : कता मागद पाः प्रथमा बहुवचन है, इस लए क्रया भी बहुवचन — प्रकाशन्ते (प्र + काश्)।
‘प्रकाशते’ लखना यहाँ गलत होगा, क्य क द ये एक नह , अनेक ह।
शब्द- नमाण: रा त्रकाले = रा त्र + काल, सप्तमी एकवचन (समय बताने के लए सप्तमी आती है)। मागद पः =
मागस्य द पः (षष्ठी-तत्पुरुष समास)।
प्र.7 (घ) अहं दे वं (वन्द्) ................................
अहं दे वं वन्दे ।
[म दे वता को प्रणाम करता/करती ँ।]
उत्तमपुरुष पहचा नए: कता अहम् है, अतः क्रया उत्तमपुरुष एकवचन म आएगी — आत्मनेपद म यह रूप केवल
वन्दे होता है (लभ् का ‘लभे’ दे खए)। ‘वन्दा म’ लखना भूल है, क्य क वन्द् आत्मनेपद धातु है।
वचन बद लए: आवाम् दे वं वन्दावहे (हम दोन ), वयं दे वं वन्दामहे (हम सब)। दे वम् कम है — द्वतीया एकवचन।
Page 17 of 23
Page 19
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.7 (ङ) त्वं कमथ (लज्ज्) ................................
त्वं कमथ लज्जसे ?
[तुम क्य लजाते हो? / तुम्ह कस लए संकोच हो रहा है?]
मध्यमपुरुष का रूप: कता त्वम् है, अतः क्रया मध्यमपुरुष एकवचन — आत्मनेपद म इसका अन्त –से होता है,
इस लए लज्जसे (लभ् → लभसे के समान)। ‘लज्ज स’ लखना गलत होगा।
शब्द: कमथम् = कस लए, क्य (अव्यय)। वचन बद लए — युवां लज्जेथे, यूयं लज्जध्वे।
प्र.7 (च) वयं दे शं (सेव्) ................................
वयं दे शं सेवामहे ।
[हम दे श क सेवा करते ह।]
उत्तमपुरुष बहुवचन: कता वयम् है, अतः क्रया उत्तमपुरुष बहुवचन — आत्मनेपद म इसका अन्त –आमहे होता
है, इस लए सेवामहे (लभ् → लभामहे)। दो लोग के लए ‘आवां दे शं सेवावहे’ होता।
ध्यान द: संस्कृत म ‘सेवा करना’ के साथ कम द्वतीया म आता है — दे शं सेवामहे, मातरं सेवामहे। हन्द क तरह
‘दे श क सेवा’ (षष्ठी) नह लखा जाता।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 46
ोकान् उ ैः पठन्तु, अथम् अवगच्छन्तु च
ोकाः
प्र.1 ोकान् उ ैः पठन्तु, अथम् अवगच्छन्तु च — प्रारभ्यते न खलु वघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य वघ्न वहता वरम न्त
मध्याः। वघ्नैः पुनः पुनर प प्र तहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न प रत्यज न्त॥१॥
अन्वयः — नीचैः वघ्नभयेन (कायम्) न खलु प्रारभ्यते । मध्याः प्रारभ्य वघ्न वहताः (सन्तः) वरम न्त । उत्तमजनाः तु वघ्नैः पुनः
पुनः अ प प्र तहन्यमानाः, प्रारभ्य च न प रत्यज न्त ।
Page 18 of 23
Page 20
as e
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
अथः ( हन्द ) — नीच ( नकृष्ट स्वभाव वाले) लोग वघ्न के भय से काम आरम्भ ही नह करते। मध्यम श्रेणी के लोग आरम्भ तो कर
co m
दे ते ह, कन्तु वघ्न आते ही रुक जाते ह (काम छोड़ दे ते ह)। उत्तम लोग बार-बार वघ्न से आहत होने पर भी आरम्भ कए हुए काय
em.
m l as
.co g
को नह छोड़ते।
em a
a s
भावः — ोक मनुष्य को उनके पुरुषाथ के आधार पर तीन श्रे णय म बाँटता है —
agेणी l
स्वभावः पाठ से उदाहरण
co m
नीचाः
m . जो अंगूर दे खकर उछलता ही नही ं
ag
वघ्न के डर से आरम्भ ही नह करते
as e
म ध् याः
a g
आरम्भ करते ह, वघ्न आने पर रुक जाते ह l शगृ ालः — तीन-चार बार उछलकर छोड़ दे ता है
जो उपाय बदलकर अन्ततः फल पा ले ता है
om
उ त्त मजनाः बार-बार चोट खाकर भी नह छोड़ते
. c
m a s
इस दृ ष्ट से गीत का शृगाल मध्यम ेणी म आता है — उसने प्रयत्न तो कया, पर वघ्न (ऊँचाई) दे खकरem
छोड़ दया, और ऊपर से
फल को ही खco
. a gl
em
ा कह दया। ोक हम उत्तमजन बनने क प्रेरणा दे ता है।
a s
agl ाकरण-दृ : प्रारभ्यते कमवाच्य का रूप है (आरम्भ कया जाता है), इसी लए कता नीचैः तृतीया वभ क्त,
s
बहुवचन म है — कमवाच्य म कता तृतीया म आता है। वघ्नैः भी तृतीया बहुवचन है। प्रारभ्य = प्र + आ + रभ् +
m ान पर ल्यप् आता है। प्र तहन्यमानाः शानच् प्रत्ययान्त है a
.co agl
ल्यप् (‘आरम्भ करके’) — उपसगयुक्त धातु म क्त्वा के
se m
a
— ‘चोट खाते हुए’।
a g l
m
स न्ध- वच्छे द: पुनर प = पुनः + अ प ( वसग-स न्ध — वसग का ‘र्’)। चोत्तमजनाः = च + उत्तमजनाः (गुण-
. co
m
स न्ध — अ + उ = ओ)। वघ्न वहताः = वघ्नैः वहताः (तृतीया-तत्पुरुष समास)। यह ोक भतृह र के नी तशतक
m as e
.co l
से लया गया है।
a g
se m
g l a
a
प्र.2 गच्छन् पपीलको या त योजनानां शतान्य प। अगच्छन् वैनतेयोऽ प पदमेकं न गच्छ त॥२॥
se m
com g l a
m . a
ase
agl
अन्वयः — गच्छन् पपीलकः योजनानां शता न अ प या त । अगच्छन् वैनतेयः अ प एकं पदं न गच्छ त ।
m
अथः ( हन्द ) — चलती हुई च ट सैकड़ योजन (बहुत लम्बी दूरी) तक चली जाती है; कन्तु न चलने वाला गरुड़ भी एक कदम नह
. co
m
चल पाता।
o m l a se
है, .वैcनतेयः ( वनता का पुत्र गरुड़) अत्यन्त बलवान् और वेगवान् है। फर भी वजय च gट क होती है, क्य क वह चलती रहती है।
भावः — यहाँ जान-बूझकर सबसे छोटे और सबसे बड़े प्राणी क तुलना क गई है — पपीलकः (च ट ) अत्यन्त छोट और धीमी
m a
a se इसका सन्देश स्पष्ट है — साम य से बड़ा नरन्तर प्रयत्न है। थोड़ा-थोड़ा कन्तु प्र त दन कया गया अभ्यास बड़ी-से-बड़ी प्र तभा के
agl c
.
आलस्य से आगे नकल जाता है। शृगाल के पास पैर थे, कूदने क श क्त थी — पर उसने प्रयत्न छोड़ दया, इस लए उसे फल नह
मला।
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a
co m
m .
m as e
.co
a g l Page 19 of 23
Page 21
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
ाकरण-दृ : गच्छन् और अगच्छन् शतृ प्रत्ययान्त (वतमान कृदन्त) रूप ह — ‘चलता हुआ’ और ‘न चलता
हुआ’; ये कता ‘ पपीलकः/वैनतेयः’ के वशेषण ह, अतः प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग म ह। योजनानाम् — षष्ठी
वभ क्त, बहुवचन (योजन का)। शता न — द्वतीया बहुवचन, नपुंसक लङ्ग (सैकड़ को)। पदम् एकम् — द्वतीया
एकवचन।
स न्ध- वच्छे द: शतान्य प = शता न + अ प (यण्-स न्ध — इ + अ = य्)। वैनतेयोऽ प = वैनतेयः + अ प ( वसग-
स न्ध; ‘अ’ का लोप अवग्रह ‘ऽ’ से दखाया गया)। पदमेकम् = पदम् + एकम्। वैनतेयः = वनतायाः पुत्रः — गरुड़
का नाम; एक योजन लगभग आठ मील (13 क.मी.) माना जाता है।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 46
प रयोजनाकायम्
प रयोजना
प्र.1 त्वं जीवने कदा चत् अभी ं वस्तु न लभसे। कदा चत् तव लक्ष्यपू तः न भव त। तदा त्वं क करो ष, क च चन्तय स
इ त संस्कृतभाषया / स्वभाषया प्रसङ्गस हतं लख।
प्रश्न का आशय — जब तुम्ह मनचाही वस्तु न मले या तुम्हारा लक्ष्य पूरा न हो, तब तुम क्या करते हो और क्या सोचते हो — यह
अपने जीवन का कोई स ा प्रसंग दे कर संस्कृत म या अपनी भाषा म लखना है। यह व्य क्तगत उत्तर है, इस लए इसे अपने ही
अनुभव से ल खए।
अच्छे उत्तर म ये चार बात होनी चा हए —
1. प्रसंग — कब, कहाँ, क्या चा हए था (प्र तयो गता, परीक्षा, कोई वस्तु, कसी खेल म ान)।
2. अनुभू त — उस समय क्या लगा (खेद, नराशा) — पर उसे शृगाल क तरह ‘अंगूर ख े ह’ कहकर मत टा लए।
3. प्र त या — फर आपने क्या कया — कारण खोजा, अभ्यास बढ़ाया, कसी बड़े से पूछा।
4. सीख — पाठ या ोक से जो ड़ए — ‘उत्तमजनाः न प रत्यज न्त’ अथवा ‘गच्छन् पपीलकः योजनानां शतान्य प या त’।
नमूना उत्तर (संस्कृतभाषया):
गतवष मम वद्यालये चत्रकलास्पधा आसीत् । अहं बहु प रश्रमम् अकरवम्, कन्तु प्रथमं ानं न अलभे । तदा अहं खन्नः अभवम्
। अहं च न्ततवान् — ‘ कम् अहं चत्रकलां त्यजा म ?’ अनन्तरम् अहं गुरुं पृष्टवान् । गुरुः अवदत् — ‘तव रेखाः शोभन्ते, कन्तु
वणसंयोजनम् अभ्यासम् अपेक्षते ।’ अतः अहं प्र त दनं त्रशत्- नमेषपयन्तम् अभ्यासम् आरब्धवान् । अ स्मन् वष अहं द्वतीयं
ानम् अलभे । अधुना अहं जाना म — यत् न लभ्यते तत् आम्लम् इ त न वक्तव्यम् । ‘गच्छन् पपीलकः योजनानां शतान्य प या त’
इत ोकः मम प्रेरणा अ स्त ।
नमूना उत्तर ( हन्द म वही बात): पछले वष मेरे वद्यालय म चत्रकला प्र तयो गता थी। मने बहुत प रश्रम कया, पर प्रथम ान
नह मला। उस समय म दुखी हुआ और सोचा — क्या चत्रकला छोड़ दूँ ? फर मने गुरुजी से पूछा। उन्ह ने कहा — ‘तुम्हारी रेखाएँ
अच्छ ह, पर रंग-संयोजन म अभ्यास चा हए।’ इस लए मने प्र त दन तीस मनट अभ्यास आरम्भ कया। इस वष मुझे दूसरा ान
मला। अब म जानता ँ क जो न मले उसे ख ा कह दे ना उत्तर नह है — ‘चलती च ट सौ योजन पार कर जाती है’।
Page 20 of 23
Page 22
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
यह प्रश्न पाठ से क्य जुड़ा है: शृगाल के पास दो ही रास्ते थे — उपाय बदलना या फल को बुरा कह दे ना। उसने
दूसरा चुना। प रयोजना आपसे पहला रास्ता चुनना सखाती है — असफलता का कारण खोजना, ठ क करना और
फर प्रयत्न करना।
लखते समय काम आने वाले वाक्य-साँचे: ‘अहं खन्नः अभवम्’ (म दुखी हुआ), ‘अहं पुनः प्रयत्नम् अकरवम्’
(मने फर प्रयत्न कया), ‘गुरुः माम् अबोधयत्’ (गुरु ने मुझे समझाया), ‘अन्ते अहं सफलः अभवम्’ (अन्त म म
सफल हुआ)। लड़ कयाँ ‘ खन्ना अभवम्’, ‘सफला अभवम्’ लख।
कायकलापः — पृष्ठ 46
कायकलापः — मुखेन द्राक्षाफलस्य ग्रहणम्
डा
प्र.1 मुखेन द्राक्षाफलस्य ग्रहणम् – इ त डां कारयामः। उप र रज्ज्वा फलस्य मधुरस्य वा बन्धनं कृत्वा तस्याः
आकषण- श थलीकरणैः अध्यापकः डाङ्गणे डां कारय त। छात्राः मुखस्य साहाय्येन ग्रहीतुं प्रयत्नं कुव न्त।
यह कक्षा म खेलकर सीखने वाला काय है — गीत के शृगाल क तरह छात्र भी ऊपर लटके फल या मठाई को केवल मुँह से
पकड़ने का प्रयत्न करते ह। हाथ का प्रयोग व जत है।
डायाः व धः (खेल क व ध) —
1. क्र डाङ्गणे द्वयोः स्तम्भयोः मध्ये एका रज्जुः बध्यते । [मैदान म दो खम्भ के बीच एक रस्सी बाँधी जाती है।]
2. रज्ज्वाम् फला न मधुरद्र ा ण वा सूत्रैः लम्बन्ते । [रस्सी पर फल या मठाइयाँ धाग से लटकाई जाती ह।]
3. अध्यापकः रज्जुम् आकष त श थलीकरो त च — तेन फला न उप र अधः च चल न्त । [अध्यापक रस्सी को ख चते और ढ ला
करते ह, जससे फल ऊपर-नीचे होते रहते ह।]
4. छात्राः हस्तयोः प्रयोगं वना केवलं मुखेन फलं गृह्ण न्त । [छात्र हाथ लगाए बना केवल मुँह से फल पकड़ते ह।]
5. यः प्रथमं फलं गृह्णा त सः वजयी भव त । [जो पहले फल पकड़ ले वही वजेता।]
डासमये उपयो ग-वाक्या न (खेलते समय बो लए) —
Page 21 of 23
Page 23
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतवाक्यम् हन्द अथ
फलम् उपिर अिस्त । फल ऊपर है।
उत्पत, उत्पत ! उछलो, उछलो!
सः फलं न पाप्नोित । वह फल नही ं पा रहा।
पुनः पुनः पयत्नं कु रु । बार-बार पयत्न करो।
अहो ! सा फलं पाप्नोित । अरे ! वह (लड़ की) फल पा गई।
सव आनन्दे न हसिन्त । सब आनन्द से हँस ते है।ं
यह खेल क्या सखाता है: खेलते ही समझ आ जाता है क शृगाल को कैसा लगा होगा — फल दखता है, पर
पहुँच से बाहर है। जो धैय रखकर सही क्षण क प्रतीक्षा करता है, वही फल पा लेता है; जो एक-दो बार म हार मानकर
हट जाता है, वह खाली रह जाता है। यही ोक का ‘उत्तमजनाः न प रत्यज न्त’ है।
सावधानी: रस्सी को छात्र क ऊँचाई से थोड़ा ही ऊपर बाँ धए; धक्का-मुक्क न होने द जए और एक बार म एक
ही छात्र को अवसर द जए। खाद्य पदाथ स्वच्छ ह तथा खेल के बाद हाथ-मुँह धोना न भू लए।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का आरम्भ (पृष्ठ 39) — कक्षा म आचाय एक चत्र दखाते ह। छात्र बताते ह क चत्र म वृक्षः, शृगालः, द्राक्षाफला न
ह और शृगाल अंगूर खाना चाहता है पर खा नह पाता। छात्र कहते ह क यह कथा वे मातृभाषा म सुन चुके ह; आचाय कहते ह
क अब इसे संस्कृत म गीतरूप म गाएँगे और अ भनय करगे।
गीत क कथा (पृष्ठ 40–41) — एक शृगाल प्यास और भूख से वन जाता है, वहाँ कुछ नह मलता; वह ान्तः (थका) और
ख ः (दुखी) हो जाता है, पसीना और प्यास बढ़ती है। वह बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे दे खता है और ऊपर बेल पर द्राक्षाफलम् दे ख
लेता है।
कथा का मोड़ — अंगूर दे खते ही उसके मुँह म रसः (लार) आ जाता है। वह एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार उत्पत त
(उछलता है), पर फल नह मलता — केवल पसीना और श्रम बढ़ता है। अन्त म वह ‘आम्लं द्राक्षाफलम्’ कहकर पलायते
(भाग जाता है)।
पाठ का ाकरण — आत्मनेपद लट् -लकार — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म लभ् धातु का पूरा रूप दया है — प्रथमः पुरुषः:
लभते, लभेते, लभन्ते; मध्यमः पुरुषः: लभसे, लभेथे, लभध्वे; उत्तमः पुरुषः: लभे, लभावहे, लभामहे। इसी साँचे पर वन्द्,
पलाय्, जन्, कम्प्, वध्, वत्, प्र+काश्, याच्, लज्ज्, वीक्ष्, सेव्, शुभ् चलते ह।
पहचान का सूत्र — आत्मनेपद म प्रथमपुरुष एकवचन –ते पर समाप्त होता है (गच्छ त — परस्मैपद, पर लभते —
आत्मनेपद)। बहुवचन म –न्ते, मध्यम एकवचन म –से, उत्तम एकवचन म –ए मलता है — इसी अन्त्याक्षर से पुरुष और वचन
पहचाना जाता है।
पाठ का सन्दे श और योग्यता वस्तार के ोक — जो नह मलता उसे बुरा कह दे ना दुबलता है। ोक कहते ह — नीच
लोग वघ्न के डर से आरम्भ ही नह करते, मध्यम बीच म रुक जाते ह, पर उत्तमजनाः न प रत्यज न्त; और चलती च ट सौ
Page 22 of 23
Page 24
कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 4 न लभ्यते चेत् आम्लं ाक्षाफलम् AglaSem · NCERT Solutions
योजन पार कर जाती है, न चलने वाला गरुड़ एक कदम भी नह — नरन्तर प्रयत्न ही सफलता क कु ी है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
शृगालः लोमशा लोमड़ी Fox
वनम् काननम् अरण्य, जंगल Forest
पपासा / तृषा पातुम ् इच्छा प्यास Thirst
बुभुक्षा भोक्तुम ् इच्छा भूख Hunger
लभते पाप्नोित पाता है Gets
श्रान्तः क्लान्तः थका हुआ Tired
खन्नः दुःिखतः खेद से युक्त Sad
जायते भवित होता है Becomes
स्वेदः घमः पसीना Sweat
ाक्षालताम् द ाक्षाफलस्य वल्लीम् अंगूर क बेल को Grape-vine climber
रसः लालारसः / मुख ावः लार Saliva
उत्पत त कू दते कूदता है Jumps
आम्लम् आम्लरसयुक्तम् ख ा Sour
पलायते अन्यत्र धावित भाग जाता है Runs away
Page 23 of 23