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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 5: सेवा ह परमो धमः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
47 – 56 9 49 हन्द
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 5: सेवा ह परमो धमः
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के पञ्चमः पाठः — सेवा ह परमो धमः के स ूण हल। पाठ का आरम्भ कक्षा के एक चत्र-
संवाद से होता है, जसम आचाया छात्र से पूछती ह क जीवन म सफलता के लए मनुष्य को क्या-क्या अ जत करना चा हए; उत्तर म मानवीय गुण
ही सव प र सद्ध होते ह। इसके बाद नागाजुन तथा दो युवक क कथा है — जसम औषध बनाकर लाने वाले युवक को नह , ब ल्क रोगी क सेवा म
लगे रहने वाले युवक को सहायक चुना जाता है। व्याकरण क दृ ष्ट से पूरा पाठ भूतकाल पर के न्द्रत है — क्तवतु-प्रत्ययः (प ठतवान् / प ठतवती) तथा
वतमानकाल क्रया + ‘स्म’ (पठ त स्म = अपठत्)। नीचे पृष्ठ 47 से 56 तक के संवाद-प्रश्न, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–६ (हर उपभाग स हत),
योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम् क्रमशः हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 7) 47 – 56
खं ड प्रश्न
9 49
माध्यम
हन्द
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 47–48
पाठार े चत्रसंवादः — आचाया तथा छात्राः
पाठः
प्र.1 प्रयच्छात्राः ! जीवने सफलतायै मानवः क कम् अजयेत् ?
छात्राः वद न्त — वद्याम् ! उपा धम् ! पदवीम् ! धनम् !
[ वद्या! उपा ध! पदवी! धन!]
पूणवाक्येन — जीवने सफलतायै मानवः वद्याम्, उपा धम्, पदव धनं च अजयेत् ।
[जीवन म सफलता के लए मनुष्य को वद्या, उपा ध, पदवी और धन अ जत करना चा हए।]
व्याकरण-दृ ष्ट: सफलतायै — ‘सफलता’ (आकारान्त स्त्री लङ्ग) का चतुथ एकवचन; ‘के लए’ अथ म चतुथ
आती है। अजयेत् — ‘अज्’ धातु का व ध लङ् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘अ जत करना चा हए’।
‘ वद्याम्, उपा धम्, पदवीम्, धनम्’ सब कम ह, अतः सब द्वतीया एकवचन म ह।
ध्यान द: ‘ क कम्’ क द्वरु क्त ‘क्या-क्या’ का अथ दे ती है — अथात् उत्तर म एक नह , अनेक वस्तुएँ अपे क्षत ह।
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प्र.2 कम् एतदे व पयाप्तम् ?
न, एतदे व न पयाप्तम् । मानवीयाः गुणाः अ प आवश्यकाः ।
[नह , केवल यही पयाप्त नह है। मानवीय गुण भी आवश्यक ह।]
कथा से प्रमाण: आचाया स्वयं उदाहरण दे ती ह — ‘यथा सद्धाथस्य जीवने वद्या, धनं, पदं च सवम प आसीत् ।
कन्तु मानवीयगुणैः एव सः महात्मा बुद्धः जातः ।’ अथात् सद्धाथ के पास वद्या, धन और पद — सब कुछ था, पर
उन्ह ‘महात्मा बुद्ध’ मानवीय गुण ने बनाया, वद्या-धन-पद ने नह ।
स न्ध- वच्छे द: एतदे व = एतत् + एव (जश्त्व-स न्ध: त् → द्)। मानवीयगुणैः — तृतीया बहुवचन, ‘गुण के द्वारा’।
प्र.3 अन्यत् कम् आवश्यकं महोदये ?
मानवीयाः गुणाः अ प आवश्यकाः ।
[मानवीय गुण भी आवश्यक ह।]
क्य : वद्या और धन बताते ह क मनुष्य क्या कर सकता है; मानवीय गुण बताते ह क वह क्या करेगा। इसी बात को
आगे क कथा सद्ध करती है — प्रथम युवक औषध बना सका, पर सेवाभावना के बना वह ‘यन्त्रवत्’ रहा।
शब्द-प रचय: ‘महोदये’ तथा ‘आय’ दोन सम्बोधन एकवचन (स्त्री लङ्गे ) ह — आदरपूवक अध्या पका को
पुकारने के लए। पुं लङ्ग म ये ‘महोदय !’ तथा ‘आय !’ होते।
प्र.4 आय ! के ते मानवीयाः गुणाः ?
सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः स न्त ।
[सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार, अक्रोध आ द मानवीय गुण ह।]
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गुणः हन्द अथ पाठे कुत्र दृश्यते ?
सत्यम् सत्य बोलना ि द्वतीयः य ुवकः िनष्कपटं स त्यम् उ क्तवान ् — ‘अहम् औषधं िनम त ुं न शक्तवान’् ।
करुणा दया रोिगणः शोचनीयां पिरि स्थितं दृ ष्ट्वा य ुवक स्य हृ द यं द िवतम् ।
उदारता बड़ा मन अपिरिचतं रोिगणम् अिप सः स्वग ृहं नीतवान ् ।
से वा सेवा-शुश्रूषा िद न द्वयं सः तस्य से वायां िनरतः आसीत ् ।
परोपकारः दूसरे का भला स्वपरीक्षां त्यक्त्वा अिप पर स्य पाणर क्षणम् ।
अक्रोधः क्रोध न करना चयनात ् पूव ं िख ,
ः अभवत ् न त ु क्रु ः ।
पाठ-शीषक का सूत्र: इन्ह गुण म सव प र गुण ‘सेवा’ है — इसी लए पाठ का नाम ‘सेवा ह परमो धमः’ रखा
गया।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 52
अभ्यासः — प्रश्नः १ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न पदद्वयेन वा उत्तरा ण लखन्तु
अभ्यासः
प्र.1 (क) कः प्र स ः च कत्सकः आसीत् ?
नागाजुनः ।
[नागाजुन।]
पाठ-आधारः: ‘नागाजुनः प्र सद्धः रसायनशास्त्रज्ञः च कत्सकः च आसीत् ।’ — वे रसायनशास्त्र के ज्ञाता भी थे और
च कत्सक भी।
वभ क्त: प्रश्न ‘कः’ (प्रथमा एकवचन, पुं लङ्ग) से पूछा गया है, अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन — नागाजुनः।
प्र.1 (ख) अन्य स्मन् दवसे कौ आगतौ ?
द्वौ युवकौ ।
[दो युवक।]
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः
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पाठ-आधारः: ‘अन्य स्मन् दने द्वौ युवकौ आगतवन्तौ ।’ — राजा क व्यवस्था से अगले दन दो योग्य युवक
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नागाजुन के पास आए।
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gl दे खए: ‘कौ’ द्ववचन का प्रश्नवाचक है, इस लए उत्तर भी द्ववचन म — द्वौ युवकौ (प्रथमा द्ववचन)। एक
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तो ‘कः – एकः युवकः’, अनेक होते तो ‘के – युवकाः’।
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प्र.1 (ग) कः खन्नः आसीत् ? a
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द्वतीयः युवकः ।
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[दूसरा युवक।]
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ag पाठ-आधारः: ‘तदभ्यन्तरे द्वतीयः युवकः अ प आगतवान् । सः खन्नः आसीत् ।’ — वह इस लए दुःखी था क दए
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गए काम (रसायन- नमाण) को पूरा नह कर सका।
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शब्दाथः: खन्नः = दुः खतः (दुःखी, उदास)।
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रुग्णस्य प र तः कथम् आसीत् ?
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शोचनीया ।
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[दयनीय / दुःखदायी।]
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पाठ-आधारः: ‘तस्य प र स्थ तः शोचनीया
इसी लए युवक उसे अपने घर ले गया।
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लङ्ग-मेल: ‘प र स्थ तः’ स्त्री लङ्ग है, अतः वशेषण भी स्त्री लङ्ग म — शोचनीया (नem
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क शोचनीयः)। पुं लङ्ग म यह
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तथा नपुंसक लङ्ग म ‘शोचनीयम्’ होता।
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प्र.1 (ङ) नागाजुनः सहायकरूपेण कं चतवान् ?
द्वतीयं युवकम् ।
[दूसरे युवक को।]
पाठ-आधारः: ‘तदनन्तरं नागाजुनः द्वतीयं युवकं सहायकत्वेन स्वीकृतवान् ।’ — यद्य प वह रसायन नह बना सका
था, फर भी उसम सेवाभावना थी।
वभ क्त: प्रश्न ‘कम्’ ( द्वतीया एकवचन) से है, अतः उत्तर भी द्वतीया एकवचन — द्वतीयं युवकम्। चतवान् =
चयनं कृतवान् (चुना)।
प्र.1 (च) कां वना च कत्सकः न भव त ?
सेवाभावनां वना । (सेवायाः भावनां वना)
[सेवा क भावना के बना।]
पाठ-आधारः: ‘सेवाभावनां वना च कत्सकः कथं भवेत् ?’ — यही नागाजुन के चयन का मूल कारण है। औषध
बनाना वद्या है, रोगी क पीड़ा अनुभव करना गुण है; च कत्सक बनने के लए दोन चा हए।
व्याकरण- नयम: ‘ वना’ के योग म द्वतीया वभ क्त आती है — इसी लए ‘सेवाभावनाम्’ ( द्वतीया एकवचन)।
(‘ वना’ के साथ तृतीया तथा पञ्चमी भी शास्त्रसम्मत ह, कन्तु पाठ म द्वतीया ही प्रयुक्त है।)
प्र.1 (छ) नागाजुनः युवकौ केन मागण गन्तुं सू चतवान् ?
राजमागण ।
[राजमाग (मुख्य सड़क) से।]
यह सङ् केत ही परीक्षा था: ‘गमनसमये राजमागण गच्छताम्’ — नागाजुन ने वह रोगी पहले ही माग म दे ख लया
था (‘तं रो गणम् अहं पूवमेव माग दृष्टवान्’)। दोन को उसी माग से भेजकर उन्ह ने दे खा क कौन रुककर सेवा करता
है।
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वभ क्त: ‘केन मागण’ — माग/साधन के अथ म तृतीया वभ क्त, अतः उत्तर भी तृतीया एकवचन —
राजमागण। राजमागः = मुख्यमागः।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 52–53
अभ्यासः — प्रश्नः २ : अधो ल खतानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखन्तु
अभ्यासः
प्र.2 (क) अहोरात्रं नागाजुनः कुत्र काय करो त स्म ?
अहोरात्रं नागाजुनः प्रयोगशालायां काय करो त स्म ।
[ दन-रात नागाजुन प्रयोगशाला म काम करते थे।]
पाठ-आधारः: ‘सः अहोरात्रं प्रयोगशालायां काय करो त स्म ।’ — इसी अथक प रश्रम के कारण उन्ह एक सहायक
क आवश्यकता पड़ी।
दो व्याकरण- बन्दु: (1) प्रयोगशालायाम् — आधार/स्थान के अथ म सप्तमी एकवचन (आकारान्त स्त्री लङ्ग)। (2)
करो त स्म — वतमानका लक क्रया के साथ ‘स्म’ लगने से भूतकाल का अथ होता है = ‘अकरोत्’ (करता था)।
अहोरात्रम् = दन-रात (अव्ययीभाव)।
प्र.2 (ख) नागाजुनः महाराजं क नवे दतवान् ?
नागाजुनः महाराजं नवे दतवान् — “महाराज ! मम च कत्साकायाय एकः सहायकः आवश्यकः” इ त ।
[नागाजुन ने महाराज से नवेदन कया — “महाराज! मेरे च कत्सा-काय के लए एक सहायक आवश्यक है।”]
राजा का उत्तर: ‘अस्तु, अहं व्यवस्थां करो म । श्वः केचन योग्याः युवकाः आग मष्य न्त । भवान् परीक्षां कृत्वा तेषु
युवकेषु कम प योग्यं स्वीकरोतु ।’ — राजा ने युवक भेजने क व्यवस्था क और चयन का अ धकार नागाजुन को ही
दया। इसी अ धकार से आगे क परीक्षा सम्भव हुई।
वभ क्त: च कत्साकायाय — प्रयोजन (‘के लए’) के अथ म चतुथ एकवचन। नवे दतवान् = नवेदनं कृतवान्
(क्तवतु-प्रत्ययान्त, पुं लङ्ग एकवचन)।
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प्र.2 (ग) प्रथमः युवकः कथं काय कृतवान् ?
प्रथमः युवकः यन्त्रवत् काय कृतवान् ।
[पहले युवक ने यन्त्र क भाँ त (मशीन क तरह) काम कया।]
वस्तरेण — सः सव प रत्यज्य केवलम् आदे शपालनाथम् औषधं न मतवान् । रो गणं दृष्ट् वा अ प सः अ े गतवान् । त स्मन्
सेवायाः भावना नासीत् ।
[उसने सब छोड़कर केवल आदे श पूरा करने के लए औषध बनाई। रोगी को दे खकर भी वह आगे बढ़ गया। उसम सेवा क भावना
नह थी।]
नागाजुन के अपने शब्द: ‘प्रथमः रो गणं दृष्ट् वा अ प अ े गतवान् । सः यन्त्रवत् काय करो त । त स्मन् सेवायाः
भावना ना स्त ।’ — यहाँ दोष काय-कुशलता का नह , भावना का है। यन्त्र आदे श पूरा करता है, पर पीड़ा नह
समझता।
ध्यान द: प्रथम युवक ने अपनी नष्ठा दखाने के लए घर क समस्याएँ भी गनाईं — ‘ पतुः उदरवेदना, मातुः ज्वरः च
आसीत् । तथा प अहं तत्सव प रत्यज्य औषधं न मतवान्’ । अथात् वह अपने ही माता- पता क सेवा छोड़कर
आया था — यही उसक सबसे बड़ी कमी थी।
प्र.2 (घ) द्वतीयः युवकः राजमाग रो गणं दृष्ट् वा क कृतवान् ?
द्वतीयः युवकः तं रो गणं स्वगृहं नीतवान् । दनद्वयं सः तस्य एव सेवायां नरतः आसीत् ।
[दूसरा युवक उस रोगी को अपने घर ले गया और दो दन तक उसी क सेवा म लगा रहा।]
प रणाम: ‘अद्य प्रातः सः स्वस्थः अभवत् । अहं ततः साक्षात् अत्र आगतवान् । रसायन नमाणाथ समयम् एव न
प्राप्तवान् ।’ — रोगी स्वस्थ हो गया, पर युवक को रसायन बनाने का समय ही नह मला। उसने बहाना नह बनाया,
सच बता दया।
व्याकरण: दृष्ट् वा — ‘दृश्’ धातु + क्त्वा-प्रत्यय (दे खकर); ऐसे अव्यय पूवका लक क्रया बताते ह। सेवायाम् —
सप्तमी एकवचन; ‘ नरतः’ के योग म सप्तमी आती है।
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प्र.2 (ङ) सेवायाः भावनां वना क न भवेत् ?
सेवायाः भावनां वना कोऽ प च कत्सकः न भवेत् ।
[सेवा क भावना के बना कोई च कत्सक नह हो सकता।]
यही पाठ का सार है: नागाजुन कहते ह — ‘ द्वतीयः अ प औषध नमाणे कुशलः अ स्त । कन्तु तेन समयः न प्राप्तः
। यतः सः सेवायां नरतः आसीत् । … सेवाभावनां वना च कत्सकः कथं भवेत् ?’ च कत्सक का काम केवल औषध
दे ना नह , रोगी का दुःख बाँटना भी है।
प्रयोग-सङ् केत: यही वचार पाठ के शीषक म सूत्ररूप म है — ‘सेवा ह परमो धमः’ (सेवा ही सबसे बड़ा धम है)।
उत्तर लखते समय इस वाक्य को उद्धत करना अच्छा रहता है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 53
अभ्यासः — प्रश्नः ३ : उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां स्त्री लङ्गरूपा ण लखन्तु (एकवचनम् / बहुवचनम्)
अभ्यासः
प्र.3 (क) प ठतवान् – …………… (एकवचनम्) – …………… (बहुवचनम्) [उदाहरणम् — पुस्तके पू रतम्]
पुस्तक म यही उदाहरण भरा हुआ है —
प ठतवान् – प ठतवती (एकवचनम्) – प ठतवत्यः (बहुवचनम्)
[पढ़ा था — (उसने / उन स्त्रय ने)]
नयम पहचा नए: क्तवतु-प्रत्ययान्त पद पुं लङ्ग म –वान् पर समाप्त होते ह। स्त्री लङ्ग बनाने के लए ‘–वान्’ के स्थान
पर –वती (एकवचन) तथा –वत्यः (बहुवचन) कर द जए। शेष शब्द ज्य -का-त्य रहता है।
पुंिलङ् गम् — पिठत वान् / पिठत वन्तः
स्त्रीिलङ् गम् — पिठत वती / पिठत वत्यः
प्रयोग: छात्रा पुस्तकं प ठतवती । छात्राः पुस्तका न प ठतवत्यः ।
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a gl – गतवती – गतवत्यः
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[गई — (वह) / (वे सब)]
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वाक्य-प्रयोग: बा लका वद्यालयं गतवती । बा लकाः वद्यालयं गतवत्यः । (मूल धातु — गम्; गच्छ त स्म = गतवान्
/ गतवती)
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ल खतवान् – …………… – ……………
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[ लखा था]
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वाक्य-प्रयोग: सा पत्रं ल खतवती । ताः पत्रा ण ल खतवत्यः ।
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खा दतवान् – …………… – ……………
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a खा दतवान् – खा दतवती – खा दतवत्यः
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[खाया था]
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वाक्य-प्रयोग: बा लका फलं खा दतवती । बा लकाः फला न खा दतवत्यः ।
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प्र.3 (ङ) क्र डतवान् – …………… – ……………
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क्र डतवान् – क्र डतवती – क्र डतवत्यः
[खेला था]
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em । छात्राः क्र डाक्षेत्रे क्र डतवत्यः । agl
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वाक्य-प्रयोग: सा क्र डाक्षेत्रे क्र डतवती
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प्र.3 (च) ह सतवान् – …………… – ……………
ह सतवान् – ह सतवती – ह सतवत्यः
[हँसी थी]
वाक्य-प्रयोग: बा लका उ ैः ह सतवती । सवाः बा लकाः ह सतवत्यः ।
प्र.3 (छ) नवे दतवान् – …………… – ……………
नवे दतवान् – नवे दतवती – नवे दतवत्यः
[ नवेदन कया था]
पाठ-सम्बन्ध: पाठ म है — ‘नागाजुनः महाराजं नवे दतवान्’ । य द नवेदन करने वाली स्त्री होती तो ‘सा महाराजं
नवे दतवती’ होता।
प्र.3 (ज) सू चतवान् – …………… – ……………
सू चतवान् – सू चतवती – सू चतवत्यः
[सू चत कया था / बताया था]
पूरी सूची एक साथ दे खए:
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पुं लङ्गे (एकवचनम्) स्त्री लङ्गे — एकवचनम् स्त्री लङ्गे — बहुवचनम् हन्द अथ
पिठतवान् पिठतवती पिठतव यः त् पढ़ा
गतवान् गतवती त्
गतव यः गया / गई
िलिखतवान् िल िखतवती िल िखतव यः त् लखा
खािदतवान् खािद तवती खािद तव यः त् खाया
क्रीिडतवान् क्रीिडतवती क्रीिडतव यः त् खेला
हिसतवान् हिसतवती हिसतव यः त् हँसा / हँसी
िनवेिदतवान् िनवेिद तवती िनवेिद तव यः त् नवेदन कया
सूिचतवान् सूिचतवती सूिचतव यः त् बताया
याद रखने का सूत्र: –वान् → –वती → –वत्यः। पुं लङ्ग का बहुवचन –वन्तः होता है (प ठतवन्तः), स्त्री लङ्ग का –
वत्यः (प ठतवत्यः) — दोन को आपस म न मलाएँ।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 53
अभ्यासः — प्रश्नः ४ : उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां पुं लङ्गरूपा ण लखन्तु (एकवचनम् / बहुवचनम्)
अभ्यासः
प्र.4 (क) प ठतवती – …………… (एकवचनम्) – …………… (बहुवचनम्) [उदाहरणम् — पुस्तके पू रतम्]
पुस्तक म यही उदाहरण भरा हुआ है —
प ठतवती – प ठतवान् (एकवचनम्) – प ठतवन्तः (बहुवचनम्)
[पढ़ा था — (उसने) / (उन्ह ने)]
उलट दशा का नयम: यहाँ स्त्री लङ्ग से पुं लङ्ग बनाना है। –वती के स्थान पर –वान् (एकवचन) तथा –वन्तः
(बहुवचन) रख द जए।
स्त्रीिलङ् गम् — पिठत वती / पिठत वत्यः
पुंिलङ् गम् — पिठत वान् / पिठत वन्तः
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प्रयोग: छात्रः पुस्तकं प ठतवान् । छात्राः पुस्तका न प ठतवन्तः ।
प्र.4 (ख) कृतवती – …………… – ……………
कृतवती – कृतवान् – कृतवन्तः
[ कया था]
पाठ-सम्बन्ध: ‘ द्वतीयः तथा न कृतवान्’ — पाठ म यही रूप आया है। मूल धातु ‘कृ’ (करो त स्म = कृतवान् /
कृतवती)।
प्र.4 (ग) दृष्टवती – …………… – ……………
दृष्टवती – दृष्टवान् – दृष्टवन्तः
[दे खा था]
पाठ-सम्बन्ध: ‘अहं क ञ्चत् रो गणं दृष्टवान्’ तथा ‘तं रो गणम् अहं पूवमेव माग दृष्टवान्’ । मूल धातु — दृश्
(पश्य त स्म)।
प्र.4 (घ) दत्तवती – …………… – ……………
दत्तवती – दत्तवान् – दत्तवन्तः
[ दया था]
पाठ-सम्बन्ध: ‘तदथ दनद्वयस्य अवसरं दत्तवान्’ तथा ‘नागाजुनाय रसायनं दत्तवान्’ । मूल धातु — दा (ददा त
स्म)।
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प्र.4 (ङ) प्रक्षा लतवती – …………… – ……………
प्रक्षा लतवती – प्रक्षा लतवान् – प्रक्षा लतवन्तः
[धोया था]
वाक्य-प्रयोग: बालकः पात्रा ण प्रक्षा लतवान् । बालकाः वस्त्रा ण प्रक्षा लतवन्तः । (प्र + क्षल् = धोना)
प्र.4 (च) धा वतवती – …………… – ……………
धा वतवती – धा वतवान् – धा वतवन्तः
[दौड़ा था]
स्त्री लङ्गे (एकवचनम्) पुं लङ्गे — एकवचनम् पुं लङ्गे — बहुवचनम् हन्द अथ
पिठतवती पिठतवान ् पिठतव तः न् पढ़ा
कृ तवती कृ तवान ् कृ तव तः न् कया
दृ ष्टवती ष्
दृ टवान ् ष्
दृ टव तः न् दे खा
दत्तवती द त्त वान ् द त्त वन्तः दया
पक्षािलतवती पक्षािल तवान ् पक्षािल तवन्तः धोया
धािवतवती धािवतवान ् धािवतव तः न् दौड़ा
सावधानी: ‘धाव्’ धातु के दो अथ होते ह — दौड़ना तथा धोना/स्वच्छ करना; कौन-सा अथ लेना है, यह वाक्य के
प्रसङ्ग से तय होता है। जैसे — ‘बालकः क्र डाक्षेत्रे धा वतवान्’ (दौड़ा), कन्तु धोने के अथ म प्रायः ‘प्रक्षा लतवान्’ का
ही प्रयोग होता है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 53–54
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः
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अभ्यासः — प्रश्नः ५ : उदाहरणानुसारं वाक्या न प रवतयन्तु (वतमानकालः → क्तवतु-भूतकालः)
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अभ्यासः
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a s emयथा – पता कषायं पब त । …………… / अहं पुस्तकं नया म । …………… [उदाहरणे पुस्तके पू रते]
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प्र.5 (यथा)
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पुस्तक म ये दोन उदाहरण भरे हुए ह —
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िपता कषायं िपबित । → िपता कषायं पीतवान् ।
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अहं पुस्तकं नयािम । → अहं पस्ु तकं नीतवान् / नीतवती ।
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c ह। → पता ने काढ़ा पया। / म पुस्तक ले जाता हूँ। → म पुस्तक ले गया / aलेgगई।]
[ पता काढ़ा .पीते
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ag रूपान्तरण क व ध: वतमानकाल क क्रया हटाकर उसी धातु का क्तवतु-प्रत्ययान्त रूप र खए, और वह कता के
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लङ्ग तथा वचन के अनुसार बद लए —
• पुं लङ्ग एकवचन → –वान् • पुं लङ्ग बहुवचन → –वन्तः
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• स्त्री लङ्ग एकवचन → –वती • स्त्री लङ्ग बहुवचन → –वत्यः
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‘अहम्’ म दोन रूप क्य ? ‘अहम्’ से पता नह चलता क बोलने वाला पुरुष है या स्त्री — इसी लए पुस्तक ने
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दोन वकल्प दए ह: नीतवान् / नीतवती। कषायम् = क्वाथम् (काढ़ा)।
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ag युवकः आपणं गच्छ त ।
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प्र.5 (क)
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युवकः आपणं गतवान् ।
[युवक बाजार गया।]
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धातु: गम् → गच्छ त (लट् ) → गतवान् (क्तवतु, पुं लङ्ग एकवचन)। आपणः = बाजार, दुकान।
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प्र.5 (ख) सः रो टकां खाद त ।
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सः रो टकां खा दतवान् ।
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[उसने रोट खाई।]
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धातु: खाद् → खाद त → खा दतवान् । कता ‘सः’ पुं लङ्ग एकवचन है; ‘सा’ होता तो खा दतवती ।
प्र.5 (ग) म हला वस्त्रं ददा त ।
म हला वस्त्रं दत्तवती ।
[म हला ने वस्त्र दया।]
यहाँ सावधानी: कता ‘म हला’ स्त्री लङ्ग है, इस लए रूप दत्तवती होगा — ‘दत्तवान्’ लखना अशुद्ध है। धातु — दा
→ ददा त → दत्तवान् / दत्तवती।
प्र.5 (घ) बालकः द्वच क्रकातः पत त ।
बालकः द्वच क्रकातः प ततवान् ।
[बालक साइ कल से गर गया।]
वभ क्त: द्वच क्रकातः — ‘से (अलग होना)’ अथ म पञ्चमी; ‘–तः’ प्रत्यय पञ्चमी का ही अथ दे ता है (=
द्वच क्रकायाः)। द्वच क्रका = साइ कल।
प्र.5 (ङ) पतामही चल त्रं पश्य त ।
पतामही चल त्रं दृष्टवती ।
[दाद ने चल चत्र ( फ़ल्म) दे खा।]
दो बात: (1) ‘पश्य त’ का क्तवतु-रूप ‘प श्यतवान्’ नह , दृष्टवान् / दृष्टवती होता है — क्य क मूल धातु दृश् है,
‘पश्य्’ केवल उसका लट् -लकार का अङ्ग है। (2) ‘ पतामही’ स्त्री लङ्ग है, अतः दृष्टवती।
शब्दाथ: पतामही = दाद ( पता क माता); मातामही = नानी। चल त्रम् = चल् + चत्रम् ( त्व-स न्ध) = चलती
हुई तस्वीर, फ़ल्म।
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प्र.5 (च) अहं गृहपाठं लखा म ।
अहं गृहपाठं ल खतवान् / ल खतवती ।
[मने गृहकाय लखा।]
दो रूप क्य : ‘अहम्’ उत्तमपुरुष है — लखने वाला पुरुष हो तो ल खतवान्, स्त्री हो तो ल खतवती। गृहपाठः =
गृहकाय (home-work)।
प्र.5 (छ) त्वं कुत्र गच्छ स ?
त्वं कुत्र गतवान् / गतवती ?
[तुम कहाँ गए / गईं?]
ध्यान द: ‘त्वम्’ मध्यमपुरुष है, पर क्तवतु-रूप पुरुष नह दे खता, केवल लङ्ग और वचन दे खता है — इसी लए ‘त्वं
गतवान्’ तथा ‘त्वं गतवती’ दोन शुद्ध ह (दे खए पृष्ठ 52 का ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ बॉक्स)।
प्र.5 (ज) अ ाः वने धाव न्त ।
अ ाः वने धा वतवन्तः ।
[घोड़े वन म दौड़े।]
वचन का मेल: कता ‘अश्वाः’ पुं लङ्ग बहुवचन है, अतः क्तवतु-रूप भी बहुवचन — धा वतवन्तः (न क
धा वतवान्)।
प्र.5 (झ) बा लकाः शीघ्रम् आगच्छ न्त ।
बा लकाः शीघ्रम् आगतवत्यः ।
[बा लकाएँ शीघ्र आ गईं।]
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दोहरा मेल: कता ‘बा लकाः’ स्त्री लङ्ग बहुवचन है — इस लए रूप आगतवत्यः। पुं लङ्ग बहुवचन म यह ‘बालकाः
शीघ्रम् आगतवन्तः’ होता। ‘आ’ उपसग ज्य -का-त्य जुड़ा रहता है (आ + गतवत्यः)।
प्र.5 (ञ) वयं समुद्रतीरे पयो हमं खादामः ।
वयं समुद्रतीरे पयो हमं खा दतवन्तः / खा दतवत्यः ।
[हम लोग ने समुद्र-तट पर आइसक्र म खाई।]
वतमानकाले वाक्यम् क्तवतु-प्रत्ययेन भूतकाले कतुः लङ्गम् / वचनम्
युवकः आपणं गच्छित । य ुवकः आपणं गतवान ् । पुं., एकवचनम्
सः रोिटकां खादित । सः रोिटकां खािद तवान ् । पुं., एकवचनम्
मिहला वस्त्रं ददाित । मिहल ा व स्त्र ं द त्त वती । स्त्री., एकवचनम्
बालकः िद्वचिक्रकातः पतित । बाल कः ि द्वचिक्रकातः पिततवान ् । पुं., एकवचनम्
िपतामही चलिच्चत्रं पश्यित । िपतामही चल ि च च् त्र ं दृ ष्टवती । स्त्री., एकवचनम्
अहं ग ृहपाठं िलखािम । अहं ग ृहपाठं िल िखतवान ् / िल िखतवती । उत्तमपुरुषः, एकवचनम्
त्वं कु त्र गच्छिस ? त्वं कु त्र गतवान ् / गतवती ? मध्यमपुरुषः, एकवचनम्
अश्वाः वने धाविन्त । श्
अ वाः वने धािवतव तः । न् पुं., बहुवचनम्
बािलकाः शीघ म् आगच्छिन्त । बािल काः शीघ म् आगतव यः । त् स्त्री., बहुवचनम्
वयं समुद तीरे पयोिहमं खादामः । वयं पयोिहमं खािद तव तः न् / खािद तवत्यः । उत्तमपुरुषः, बहुवचनम्
शब्दाथ: पयो हमम् = पयः (दूध) + हमम् (बफ़) = आइसक्र म। समुद्रतीरे — सप्तमी एकवचन (समुद्र के कनारे)।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 54
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अभ्यासः — प्रश्नः ६ : ‘स्म’-अव्ययपदम् उपयुज्य अनुच्छेदं पुनः लखन्तु
अभ्यासः
प्र.6 अनुच्छेदे कोष्ठकेषु केचन धातवः दत्ताः स न्त । उप र दत्तम् अवधेयांशं प ठत्वा ‘स्म’ इ त अव्ययपदम् उपयुज्य
अनुच्छेदं पुनः लखन्तु । …………… (शीषकं लखन्तु) — कृषकः प्र त दनं कृ षक्षेत्रं …………… (गच्छ् ) ।
जलसेचनं …………… (कृ) । क टानां नवारणाथ जैवौषधं …………… ( ापय्) । सः कृ षकाय सम्यक्
…………… ( ा) । अतः अन्ये कृषकाः संशयेन …………… (पृच्छ्) । सः स्वा भमानेन …………… (जीव्) । अतः
‘अहं कृषकः भू मपुत्रः’ इ त सा भमानं …………… (वद्) । सः क्षेत्रे गोमयं …………… (योजय्), न तु कृतकान्
पदाथान् । अतः ीहेः गुणवत्ता अ धका …………… (भव्) । जनाः जालपुटमाध्यमेन तस्य तण्डु लं ……………
(क्र ण्) । एवं तस्य प रवारस्य सव जनाः कृ षकायण सुखं …………… (जीव्) । सः सवान् …………… (वद्)
“कृषकः न द नः न च द रद्रः, परं सवषां पोषकः” इ त ।
शीषकम् — ‘भू मपुत्रः कृषकः’ (अन्ये वकल्पाः — ‘स्वा भमानी कृषकः’, ‘सवषां पोषकः कृषकः’)
[शीषक — ‘भू मपुत्र कसान’]
पूणः अनुच्छेदः —
कृ षकः पितिदनं कृ िषक्षेत्रं गच् छित स्म । जलसेच नं करोित स्म । कीटानां िनवारणाथ ं जै वौषधं स्थ ापयित स्म ।
सः कृ िषकाय ं सम्यक् जानाित स्म । अतः अन्ये कृ षकाः संशयेन पृच् छिन्त स्म । सः स्वािभमाने न जीवित स्म ।
अतः ‘अहं कृ षकः भूिमपुत्रः’ इित सािभमानं वद ित स्म । सः क्षेत्रे गोमयं योजयित स्म, न त ु कृ तकान् पदाथ न् ।
अतः वीहेः गुणवत्ता अिधका भवित स्म । जनाः जालपुट माध्यमेन तस्य तण्डुलं क्र न् स् । एवं तस्य
ीणि त म
पिरवारस्य सव जनाः कृ िषकायण सुखं जीविन्त स्म । सः सव न् वद ित स्म — “कृ षकः न दीनः न च दिरद ः, परं
सवषां पोषकः” इित ।
[ हन्द अथ — कसान प्र त दन खेत जाता था। सचाई करता था। क ड़ को रोकने के लए जै वक औष ध डालता था। वह खेती का
काम अच्छ तरह जानता था। इस लए दूसरे कसान सन्दे ह होने पर उससे पूछते थे। वह स्वा भमान के साथ जीता था। इस लए ‘म
कसान हूँ, भू म का पुत्र हूँ’ — यह गव से कहता था। वह खेत म गोबर डालता था, कृ त्रम पदाथ नह । इसी लए धान क गुणवत्ता
अ धक होती थी। लोग इंटरनेट के माध्यम से उसका चावल खरीदते थे। इस प्रकार उसके प रवार के सब लोग खेती के काम से
सुखपूवक जीते थे। वह सबसे कहता था — “ कसान न द न है, न द रद्र; ब ल्क वह सबका पालनकता है।”]
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कोष्ठके धातुः कता (वचनम्) रक्त ाने पूरणीयं पदम् समानाथकं लङ् -रूपम्
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गच्छ् (गम्)
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कृषकः — एकवचनम् च् स्म
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अगच्छत्
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ग छित
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कृ (सः) — एकवचनम् अकरोत्
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करोित स्म
स्थापय् (स्था — िणजन्तः) (सः) — एकवचनम् स्थापयित स्म अस्थापयत्
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ा सः — एकवचनम्
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जानाित म
पच्ृ छ्
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अन्ये कृषकाः — बहुवचनम् च् न् स्म
प ृ छि त अपृच्छन्
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जीव् सः — एकवचनम् जीवित स्म अजीवत्
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वद् (सः) — एकवचनम् स्म अवदत्
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योजय् (युज् — िणजन्तः) सः — एकवचनम् स्म अयोजयत्
aglभू (भव्)
योजयित
गुणवत्ता — एकवचनम् भवित स्म अभवत्
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क्रीण् (क्री) जनाः — बहुवचनम् न् स्म अक्र णन्
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क्रीणि त
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जीव् सव जनाः — बहुवचनम् जीवि त न् स्म अजीवन्
वद् सः — एकवचनम् स्म अवदत्
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वद ित
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g न पठ त स्म’ = अपठत्
.cभव त । जैसे — ‘सः बाल्ये पुस्तका न पठ त’ (वतमान) → ‘सः बाल्ये पुस्aतका
नयम (पृष्ठ 54 का ‘अत्र इदम् अवधेयम्’): वतमानकाल- क्रयापदे न सह ‘स्म’ इ त अव्ययस्य योजनेन भूतकालस्य
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ase(पढ़ता था)। ध्यान रहे — ‘स्म’ लगाने पर भी क्रया लट्-लकार म ही रहती है, वह ‘अपठत्’ जैसी नह बनती।
अथः
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दो सावधा नयाँ: (1) क्रया का वचन कता के अनुसार बद लए — ‘अन्ये कृषकाः पृच्छ न्त स्म’, ‘जनाः क्र ण न्त
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स्म’ (बहुवचन)। (2) ‘स्म’ सदा क्रया के बाद अलग पद के रूप म लखा जाता है — ‘गच्छ त स्म’, न क
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‘गच्छ तस्म’। जालपुटम् = इंटरनेट/वेबसाइट, ी हः = धान, तण्डु लम् = चावल, गोमयम् = गोबर, कृतकाः
पदाथाः = कृ त्रम (रासाय नक) पदाथ।
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योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 55
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योग्यता वस्तरः — ‘स्वास्थ्यरक्षणाय नयमाः’ ोकौ तथा भूतकालस्य धातुरूप-सारणी
योग्यता वस्तरः
प्र.1 स्वास्थ्यरक्षणाय नयमाः — ाह्मे मुहूत उ त्तष्ठेत् स्व ो रक्षाथमायुषः । सवमेव प रत्यज्य शरीरमनुपालयेत् ॥
अन्वयः — स्वस्थः (जनः) आयुषः रक्षाथम् ा े मुहूत उ त्तष्ठेत् । सवम् एव प रत्यज्य शरीरम् अनुपालयेत् ।
अथः ( हन्द ) — स्वस्थ मनुष्य को अपनी आयु क रक्षा के लए ाह्म मुहूत म (सूय दय से लगभग डेढ़ घण्टे पूव) उठ जाना
चा हए। आवश्यकता पड़े तो सब कुछ छोड़कर भी शरीर क रक्षा करनी चा हए।
भावः — शरीर ही सब कम का आधार है — ‘शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्’। धन, पद और काय सब बाद म; पहले स्वास्थ्य। जो
प्रातःकाल जल्द उठता है, उसे शुद्ध वायु, शान्त मन और पूरा दन मलता है। पाठ क कथा से इसका सीधा सम्बन्ध है — नागाजुन
स्वयं च कत्सक थे, और यह ोक बताता है क च कत्सा से पहले रोग न होने दे ना ही श्रेष्ठ है।
पदम् स न्ध- वच्छे दः / व्याकरणम् अथः
बाह्मे मुहूत सप्तमी एकवचनम् (अ धकरणम्) बा ह्म मुहूत में (पातः ४–६ बजे के बीच)
उित्तष्ठे त ् उद् + स्था; व ध लङ् -लकारः, प्रथमपुरुषः एकवचनम् उ ठना चािहए
रक्षाथमायुषः रक्षाथम् + आयुषः (स्वर-स न्ध); ‘आयुषः’ षष्ठी एकवचन आय ु की र क्षा के िल ए
पिरत्यज्य प र + त्यज् + ल्यप्-प्रत्ययः छोड़ कर
शरीरमनुपालयेत ् शरीरम् + अनुपालयेत् ( व ध लङ् ) शरीर का पाल न करना चािहए
ध्यान द: ‘उ त्तष्ठेत्’ तथा ‘अनुपालयेत्’ दोन व ध लङ् -लकार म ह — यह लकार व ध, उपदे श तथा ‘चा हए’ का
अथ दे ता है। इसी कारण पूरा ोक एक नयम के रूप म पढ़ा जाता है।
प्र.2 भोजनान्ते पबेत् तक्रं वासरान्ते पबेत्पयः । नशान्ते च पबेत् वा र त्रभी रोगो न जायते ॥
अन्वयः — भोजनान्ते तक्रं पबेत् । वासरान्ते पयः पबेत् । नशान्ते च वा र पबेत् । त्र भः (एतैः) रोगः न जायते ।
अथः ( हन्द ) — भोजन के अन्त म छाछ पीनी चा हए, दन के अन्त म (सन्ध्या-समय) दूध पीना चा हए और रा त्र के अन्त म
(प्रातःकाल) जल पीना चा हए। इन तीन ( नयम ) से रोग नह होता।
भावः — आयुवद का सार यही है क औष ध से पहले दनचया। भोजन के बाद तक्र पाचन ठ क रखता है, सन्ध्या को दूध बल और
न द दे ता है, प्रातः खाली पेट जल शरीर को शुद्ध करता है। तीन साधारण, सुलभ और बना खच के — फर भी रोग से बचाने म
समथ।
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समयः पेयम् (संस्कृतम्) हन्द लाभः
भोजनान्ते (भोजन के बाद) तक्रम् छाछ / म ा पाचनश क्त बढ़ती है
वासरान्ते (िदन के अन्त में) पयः दूध बल तथा सु नद्रा
िनशान्ते (रात के अन्त में) वािर जल शरीर क शु द्ध, कोष्ठशु द्ध
स न्ध तथा पद-प रचय: भोजनान्ते = भोजन + अन्ते (द घ-स न्ध, सप्तमी एकवचन)। पबेत्पयः = पबेत् + पयः।
नशान्ते = नशा + अन्ते। पबेत् — ‘पा’ धातु, व ध लङ् -लकार (‘पीना चा हए’)। त्रभी छन्द क सु वधा के लए
‘ त्र भः’ (तृतीया बहुवचन) का ही रूप है।
Tip: दोन ोक ‘अनुष्टुप्’ छन्द म ह — प्रत्येक चरण म आठ अक्षर, कुल बत्तीस अक्षर। इसी छन्द म गीता तथा
रामायण के अ धकांश ोक ह, इस लए ये सरलता से कण्ठस्थ हो जाते ह।
प्र.3 भूतकालः गतकालं ापय त । धातुना सह क्तवतु इ त प्रत्ययस्य योजनेन अ प भूतकालाथका न पदा न भव न्त ।
यथा — पठ् + क्तवतु = प ठतवान् (पुं लङ्गम्) प ठतवती (स्त्री लङ्गम्) । वतमानकाल क्रयापदे न सह स्म इ त
अव्ययपदस्य योजनेन अ प भूतकालाथः भव त । यथा — गच्छ त स्म – गतवान् / गतवती, लख त स्म –
ल खतवान् / ल खतवती । (धातु-सारणी : धातुः, लट् -लकारः, लङ् -लकारः, क्तवतुप्रत्ययः पुं लङ्गे , क्तवतुप्रत्ययः
स्त्री लङ्गे , स्म-प्रयोगः)
पृष्ठ 55 क सारणी पूरी इस प्रकार है — इसे कण्ठस्थ कर लेने पर अभ्यास ३, ४, ५ तथा ६ अपने आप हल हो जाते ह।
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धातुः लट् -लकारः लङ् -लकारः क्तवतुप्रत्ययः — क्तवतुप्रत्ययः — स्म-प्रयोगः
(वतमानकाले) (भूतकाले) पुं लङ्गे स्त्री लङ्गे (भूतकाले)
गम् गच्छ त अगच्छत् गतवान ् गतवती गच्छ त स्म
िलख् लख त अ लखत् िल िखतवान ् िल िखतवती लख त स्म
गा गाय त अगायत् गीतवान ् गीतवती गाय त स्म
पा पब त अ पबत् पीतवान ् पीतवती पब त स्म
श्रु शृणो त अशृणोत् श्र ुतवान ् श्र ुतवती शृणो त स्म
दा ददा त अददात् द त्त वान ् द त्त वती ददा त स्म
ा जाना त अजानात् ातवान ् ातवती जाना त स्म
कृ करो त अकरोत् कृ तवान ् कृ तवती करो त स्म
दृ श ् पश्य त अपश्यत् ष्
दृ टवान ् ष्
दृ टवती पश्य त स्म
स्था तष्ठ त अ तष्ठत् ि स्थतवान ् ि स्थतवती तष्ठ त स्म
तीन रूप एक ही अथ दे ते ह: ‘सः अगच्छत्’ = ‘सः गतवान्’ = ‘सः गच्छ त स्म’ — तीन का अथ है ‘वह गया /
जाता था’। अन्तर केवल इतना है क लङ् -लकार म क्रया का रूप बदलता है, क्तवतु म कता का लङ्ग-वचन दे खना
पड़ता है, और ‘स्म’ म क्रया वतमानकाल क ही रहती है।
ध्यान रखने योग्य अ नय मत रूप: पश्य त → दृष्टवान् (न क ‘प श्यतवान्’), गाय त → गीतवान्, पब त →
पीतवान्, ददा त → दत्तवान्, तष्ठ त → तवान्, शृणो त → ुतवान्। इनम क्तवतु मूल धातु (दृश्, गा, पा, दा,
स्था, श्रु) से बनता है, लट् -लकार के अङ्ग से नह ।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 56
प रयोजनाकायम् (प्रकल्प-काय)
प रयोजनाकायम्
प्र.1 पर हताथ सेवारतानां प्रेरकाणां महात्मनां जीवनसम्ब ां कथां सङ्गह्णन्तु ।
काय- व ध: दूसर क भलाई म लगे रहने वाले कसी एक प्रेरक महापुरुष को चु नए, उनके जीवन क एक ऐसी घटना खो जए
जसम सेवा दखती हो, और उसे 6–8 सरल संस्कृत वाक्य म लखकर नीचे हन्द अथ जोड़ द जए। कथा के साथ चत्र चपकाइए
और अन्त म एक वाक्य म सन्दे श ल खए।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः AglaSem · NCERT Solutions
एक अच्छे उत्तर म ये चार बात होनी चा हए —
महापुरुष का नाम, काल तथा स्थान (कः ? कदा ? कुत्र ?)
सेवा क एक ठोस घटना — केवल प्रशंसा नह , घटना
उस सेवा का प रणाम ( कसे लाभ हुआ ?)
अन्त म एक सू क्त — जैसे ‘सेवा ह परमो धमः’ / ‘परोपकाराय सतां वभूतयः’
नमूना उत्तर (संस्कृतम्) —
महात्मा गान्धी
ृ ः । बहवः श्रिमकाः पीिडताः
महात्मा गान्धी दिक्षण-आिफकादे शे अिधवक्ता आसीत् । एकदा तत्र प्लेगरोगः पसत
अभवन् । कोऽिप ते षां समीपं गन्त ुं न इच्छित स्म । गान्धी स्वयं ते षां सेवां कृ तवान् । सः औषधं दत्तवान्, अ ं च
योिजतवान् । अने के रोिगणः स्वस्थाः अभवन् । सः अवदत् — “सेवैव सत्यस्य साधनम्” इित ।
[ हन्द — महात्मा गान्धी द क्षण अ का म वक ल थे। एक बार वहाँ प्लेग फैला। बहुत-से मजदूर पी ड़त हो गए। कोई उनके पास
जाना नह चाहता था। गान्धी जी ने स्वयं उनक सेवा क । उन्ह ने औषध द और भोजन क व्यवस्था क । बहुत-से रोगी स्वस्थ हो
गए। उन्ह ने कहा — “सेवा ही सत्य का साधन है।”]
अन्य वकल्प: मदर टे रेसा (कोलकाता — नरा श्रतानां सेवा), बाबा आम्टे (कुष्ठरो गणां सेवा — ‘आनन्दवनम्’),
ईश्वरचन्द्रः वद्यासागरः ( वधवा- शक्षा), स्वामी ववेकानन्दः (‘द रद्रनारायणसेवा’), भ गनी नवे दता, तथा पाठ के
अपने नायक नागाजुनः।
प्र.2 अस्माकं समाजे कुटु म्बे वा सेवाकाय कुवतः जनद्वयस्य ववरणं लखन्तु ।
काय- व ध: अपने ही आस-पास से दो ऐसे व्य क्त चु नए जो बना प्र स द्ध के सेवा करते ह — प रवार से एक और मुहल्ले/
वद्यालय से एक। प्रत्येक के लए ल खए — नाम, सम्बन्ध/व्यवसाय, कौन-सी सेवा, कसके लए, और आपने उससे क्या
सीखा। य द सम्भव हो तो उनसे दो-तीन प्रश्न पूछकर उनक अपनी बात भी जो ड़ए।
नमूना उत्तर (संस्कृतम्) —
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः
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ववरणम् प्रथमः जनः द्वतीयः जनः
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श्रीमती सरोजा स्माकं ग ाम स्य वै
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श्रीरामपसाद ः
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मम िपतामही अ ः
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सा प्र त दनं वृद्धेभ्यः जनेभ्यः अन्नं ददा त । सः नधनेभ्यः रो गभ्यः नःशुल्कम् औषधं ददा त ।
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कस्मै ? ामस्य असहायेभ्यः वृद्धेभ्यः द रद्रे भ्यः कृषकेभ्यः श्र मकेभ्यः च
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फलम् कोऽ प वृद्धः क्षु धतः न तष्ठ त ।
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अहं िकं िशिक्षतवान् ?
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सेवा धनेन न, हृदयेन भव त । वृ त्तः अ प सेवा भ वतुम् अह त ।
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अनुच्छेदरूपेण — मम पतामही प्र त दनं ामस्य वृ े भ्यः अन्नं ददा त । सा वद त — ‘अन्नदानं महादानम्’ इ त । अस्माकं
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ामस्य वैद्यः नधनेभ्यः रो गभ्यः नःशुल्कम् औषधं ददा त । सः रात्रौ अ प रो गणः समीपं गच्छ त । एतौ द्वौ जनौ मम प्रेरकौ
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gगाँव के वैद्य नधन रो गय को
[मेरी दादmप्र.तc दन गाँव के वृद्ध को भोजन दे ती ह। वे कहती ह — ‘अन्नदान महादान है।’ हमारे
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स्तः ।
l a sल्कe औषध देते ह। वे रात म भी रोगी के पास जाते ह। ये दोन मेरे प्रेरक ह।]
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coरोmगभ्यः, नधनेभ्यः। agl
ध्यान द: यह उत्तर आपका अपना होना चा हए — ऊपर दए नाम केवल ढाँचा दखाने के लए ह। ‘…भ्यः’ (चतुथ
बहुवचन) का प्रयोग ‘दे ना’ अथ म होता है — वृद्धेभ्.यः,
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प्र.3 भवतां प रवेशे वद्यमानानाम् आयुवद यसस्यानां पदाथानां च नामा न लखन्तु । तेषां स्वास्थ्यरक्षणलाभान्
लखन्तु । यथा – बल्वं पाचन क्रयां वधते । लवङ्गं दन्तसमस्याः कासं च नाशय त । m
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ag काय- व ध: अपने घर, आँगन, वद्यालय अथवा रसोई म मलने वाले आयुवद य पौधे और पदाथ ढूँ ढ़ए। प्रत्येक के लए पुस्तक के
उदाहरण जैसा एक संस्कृत वाक्य बनाइए — ‘(पदाथः) + (रोगम्/लाभम्) + ( क्रयापदम्)’। य द हो सके तो पत्ती चपकाकर चत्र-
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सूची (herbarium) बनाइए।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृत-नाम हन्द नाम वाक्यम् (संस्कृतम्) स्वास्थ्यलाभः
िबल्वम् बेल ल्
िब वं पाचनिक्रयां वध ते । पाचन ठ क करता है
लवङ् गम् लग ल वङ्गं द तसमन् स्याः कासं च नाशयित । दाँत-दद तथा खाँसी दूर करता है
तुल सी तुलसी त ुल सी कासं ज्वरं च नाशयित । खाँसी-जुकाम-ज्वर म लाभ
आद कम् अदरक आद कं जठराि नं वध यित । ग् भूख तथा पाचन बढ़ाता है
हिरद ा हल्द हिरद ा वणं शोधयित । घाव भरती है, रोगप्र तरोध बढ़ाती है
आमलकम् आँवला आमल कं क ष्
े शान ् दृ ि टं च पोषयित । बाल तथा नेत्र के लए हतकर
िनम्बः नीम म् त्वग ोगान ् नाशयित ।
िन बः चमरोग तथा रक्तशु द्ध
पुद ीना (पूितहा) पुद ना प ुद ीना उ द रशूल ं शमयित । पेट-दद म लाभ
यिष्टमध ु मुलेठ ष्
यि टमध ु क ठश ुि ण् ं करोित । गला साफ़ करती है
अश्वगन्धा असगन्ध श् न्
अ वग धा बल ं वध यित । बल तथा ू त बढ़ाती है
एला इलायची न्
एल ा मुखद ुग धं दू रीकरोित । मुख क दुगन्ध हटाती है
मिरचम् काली मच मिरचं श्ले ष्माणं नाशयित । कफ दूर करती है
भाषा-सङ् केत: पुस्तक के उदाहरण ‘ बल्वं पाचन क्रयां वधते’ म क्रया आत्मनेपद है; कमयुक्त वाक्य म ‘वधय त’
(बढ़ाता है) अ धक शुद्ध बैठता है — दोन म से जो आपके शक्षक बताएँ, वही प्रयोग कर। चेतावनी: कोई भी
औष ध बना वैद्य/ च कत्सक क सलाह के स्वयं न ल।
प्र.4 अधः का नचन चत्रा ण वाक्या न च स न्त । चत्रा ण पश्यन्तु , वाक्या न पठन्तु । इदानीम् उ चतं वाक्यं चत्रेण सह
योजयन्तु । (वाक्या न — धेनुमाता परम शवा / नत्यं माता पत्रोः सेवा / रोगातुराणाम् उपचारः / गृहकायषु
भ गन्याः साहाय्यम् / परस्परं कायकरणे साहाय्यम्)
पुस्तक के पृष्ठ 56 पर ऊपर से नीचे पाँच चत्र ह। उनका सही मेल इस प्रकार है —
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः AglaSem · NCERT Solutions
क्रमः चत्रम् ( क दृश्यते ?) उ चतं वाक्यम् हन्द अथ
१ भिगनी पक्षालनपात्रे पात्रािण पक्षालयित, भाता तस्याः साहाय्यं न्
ग ृहकायष ु भिग याः घर के काम म बहन क सहायता
करोित । य्
साहा यम्
(बहन बतन धो रही है, भाई साथ में हाथ बँटा रहा है)
२ त्रयः बालकाः िमिलत्वा िचत्रफलकं रचयिन्त । पर स्परं कायकरणे काम करने म एक-दूसरे क
(तीन बच्चे िमलकर एक िचत्र/पितकृ ित बना रहे है)ं य्
साहा यम् सहायता
३ बालकः स्थािलकायां जलपात्रे मातािपत्रोः समीपम् आनयित । त्
िन यं मातािप त्र ोः से वा प्र त दन माता- पता क सेवा
(बालक माता-िपता को तश्तरी में पानी के िगलास दे रहा है)
४ ृ ित ।
बािलका धे नं ु भोजयित, धे नं ु च स्पश धे न ुम ता परमिशवा गौ माता परम कल्याणका रणी है
(बच्ची गाय को चारा िखला रही है)
५ शय्यायां रुग्णः शेते, बालकौ जलम् औषधं च ददतः । रोगात ुराणाम् उ पचारः रोग से पी ड़त का उपचार
(िबस्तर पर ले टे रोगी को बच्चे पानी और दवा दे रहे है)ं
मेल करने क कु ी: हर वाक्य म एक शब्द ‘पात्र’ बता दे ता है — भ गन्याः (बहन) → रसोई/घर का चत्र,
परस्परम् (आपस म) → समूह म मलकर काम, माता पत्रोः (माता- पता का, षष्ठी द्ववचन) → माता- पता वाला
चत्र, धेनुः (गाय) → गाय वाला चत्र, रोगातुराणाम् (रो गय का, षष्ठी बहुवचन) → रोगी वाला चत्र।
स न्ध- वच्छे द: धेनुमाता = धेनुः + माता ( वसग-स न्ध — वसग का ‘र्’)। रोगातुराणाम् = रोग + आतुराणाम्
(द घ-स न्ध); ‘आतुरः’ = पी ड़त। माता पत्रोः — द्वन्द्व समास, षष्ठी द्ववचन। पाँच वाक्य मलकर पाठ का सन्दे श
दोहराते ह — सेवा घर से आरम्भ होती है और समाज तक फैलती है।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का सन्दे श — ‘सेवा ह परमो धमः’ अथात् सेवा ही सबसे बड़ा धम है। वद्या, धन, उपा ध और पदवी अपनी जगह
आवश्यक ह, पर उनके साथ मानवीय गुण न ह तो मनुष्य ‘यन्त्रवत्’ रह जाता है।
प्रार क संवाद — आचाया पूछती ह ‘जीवने सफलतायै मानवः क कम् अजयेत् ?’ छात्र उत्तर दे ते ह — वद्याम्, उपा धम्,
पदवीम्, धनम्। आचाया कहती ह क यह पयाप्त नह ; सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः — ये मानवीय
गुण भी आवश्यक ह। उदाहरण — सद्धाथ के जीवन म वद्या, धन और पद सब कुछ था, कन्तु मानवीय गुण से ही वे
महात्मा बुद्ध बने।
कथा — प्र सद्ध रसायनशास्त्रज्ञ एवं च कत्सक नागाजुन को एक सहायक चा हए था। राजा ने दो योग्य युवक भेजे। नागाजुन
ने दोन को दो दन म एक व शष्ट रसायन बनाकर लाने को कहा और यह भी कहा क ‘राजमागण गच्छताम्’।
कथा का मोड़ — प्रथम युवक औषध बनाकर ले आया और अपनी नष्ठा दखाने के लए घर क समस्याएँ ( पता का
उदरशूल, माता का ज्वर) गनाईं। द्वतीय युवक खन्न होकर खाली हाथ आया — उसने राजमाग पर एक रोगी को दे खा, उसे
अपने घर ले गया और दो दन उसक सेवा म लगा रहा; इस लए रसायन बनाने का समय ही नह मला।
नणय और उसका कारण — नागाजुन ने द्वतीय युवक को चुना। उन्ह ने राजा को बताया क वह रोगी उन्ह ने पहले ही माग
म दे ख लया था, इसी लए दोन को राजमाग से जाने को कहा था — यह परीक्षा औषध क नह , सेवाभावना क थी।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 5 सेवा ह परमो धमः AglaSem · NCERT Solutions
‘सेवाभावनां वना च कत्सकः कथं भवेत् ?’
व्याकरण-सार — (1) भूतकाल दो और तरीक से भी बनता है: धातु + क्तवतु — पठ् + क्तवतु = प ठतवान् (पुं.) /
प ठतवती (स्त्री.), बहुवचन म प ठतवन्तः / प ठतवत्यः; (2) वतमानका लक क्रया + ‘स्म’ — ‘पठ त स्म’ = ‘अपठत्’।
साथ ही ‘रसायनम्’ शब्द आयुवद म ‘औषधम्’ के अथ म प्रयुक्त होता है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः (पाठे प्रयुक्तः) संस्कृत-अथः हन्द अथ ENGLISH
उपा धम् नामिचह्नम् उपा ध को Degree
पदवीम् पदनाम पदवी Designation / Position
मानवीयाः मानवे भिवतव्याः मानव म होने वाले Humane
रसायनशास्त्रज्ञः यः औषधशास्त्रं जानाित रसायनशास्त्र का वशेषज्ञ Chemist & Druggist
च कत्सकः िभषक् वैद्य Physician
प्रयोगशालायाम् अनुस न्धान-परीक्षण-कक्षे प्रयोगशाला म In the laboratory
अङ्ग कृतवान् स्वीकृ तवान् स्वीकार कया Accepted
अन्य स्मन् दने अपरिस्मन् िदवसे अगले दन On another day
खन्नः दुःिखतः दुःखी Sad
शोचनीया दयनीया दुःखदायी Miserable
नरतः लीनः मग्न Engrossed
वृत्तान्तम् घटनाम् प्रसङ्ग को Anecdote
चतवान् चयनं कृ तवान् चुना Selected
यन्त्रवत् यन्त्रम् इव यन्त्र क भाँ त Like a machine
कषायम् क्वाथम् काढ़ा को Herbal decoction
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