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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 6 क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्

AglaSem पर कक्षा 7 संस्कृत पाठ 6 क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 6 (Deepakam).
NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 6 क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् - Page 1 of 27

About NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 6 क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्

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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 6 क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

कक्षा 7

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 6: डाम वयं ोोकान्त्याक्षरीम्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

57 – 70 12 45 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 26 pages

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 6: क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के षष्ठः पाठः — क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् के सम्पूण हल। वषा के कारण बाहर न खेल पाने
पर द पका, भारती और उनक स खयाँ घर म ही ‘ ोक-अन्त्याक्षरी’ खेलती ह — दो गण बनते ह, ‘ ानमाला’ और ‘रत्नमाला’, और एक गण जस
व्यञ्जनवण पर ोक समाप्त करता है, दूसरा गण उसी वण से नया ोक आरम्भ करता है। इसी क्रम म वद्या के महत्त्व पर दस सुभा षत- ोक
आते ह। नीचे पृष्ठ 57 से 70 तक — संवाद के प्रश्न, दस ोक के अन्वयः → अथः → भावः, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–६ (हर उपभाग
स हत), योग्यता वस्तरः, प रयोजनाकायम् तथा कायकलापः — सब क्रम से हल कए गए ह; पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 7) 57 – 70

खं ड प्रश्न

12 45

माध्यम

हन्द

पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 57
पाठारम्भः — चत्रकथा (संवादः) : अन्त्याक्षरी क्र डा

पाठः

प्र.1 अरे भार त ! ब हः वृ ः अ स्त, कथं क्र डामः ?

भारती उत्तरं ददा त — वृ ः अस्तु नाम । इच्छा अ स्त चेत् क्र डामः । ब हगमनस्य आवश्यकता एव ना स्त । एषा नूतना
क्र डा अ स्त भोः ! ‘अन्त्याक्षरी क्र डा’ इ त ।
[वषा हो रही है तो होने दो। य द इच्छा है तो खेलगे। बाहर जाने क आवश्यकता ही नह है। यह एक नया खेल है — ‘अन्त्याक्षरी
क्र डा’।]

वाक्य कैसे बना: अस्तु नाम का अथ है ‘हो जाने दो / कोई बात नह ’। इच्छा अ स्त चेत् — ‘चेत्’ का अथ ‘य द’ है
और वह वाक्य के आरम्भ म नह , बीच म आता है। ब हगमनस्य = ब हगमनम् + षष्ठी एकवचन, अथात् ‘बाहर जाने
क ’।

ध्यान द: ब हः + गमनम् = ब हगमनम् — वसग-स न्ध ( वसग के बाद ग् आने पर वसग ‘र्’ हो जाता है)।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 कम् अन्त्याक्षरी क्र डा ? अहम प क्र डा म ।

अन्त्याक्षरी नाम सा क्र डा यस्यां प्रथमः गणः यं ोकं गाय त तस्य ोकस्य अ न्तमेन व्यञ्जनवणन द्वतीयः गणः नूतनं
ोकं गाय त ।
[अन्त्याक्षरी वह खेल है जसम पहला गण जो ोक गाता है, उस ोक के अ न्तम व्यञ्जन वण से दूसरा गण नया ोक गाता है।]

‘अन्त्याक्षरी’ शब्द का अथ: अन्त्यम् + अक्षरम् = अ न्तम अक्षर। जस खेल का आधार ‘अ न्तम अक्षर’ हो, वही
अन्त्याक्षरी। पाठ म यह ोक से खेली जाती है, इस लए पाठ का नाम है — क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
(आओ, हम ोक-अन्त्याक्षरी खेल)।

प्र.3 स ख ! त ह क्र डायाः नयमान् सूचयतु ।

क्र डायाः नयमाः —

1. वयं गणद्वयं रचयामः । प्रथमगणस्य नाम — ‘ ानमाला’, तीयगणस्य नाम — ‘रत्नमाला’ ।
[हम दो गण (टो लयाँ) बनाएँगे — पहली ‘ ानमाला’, दूसरी ‘रत्नमाला’।]
2. आदौ प्रथमगणस्य सदस्यः एकं पद्यं गाय त ।
[पहले पहली टोली का सदस्य एक ोक गाता है।]
3. तस्य पद्यस्य अ न्तमेन व्यञ्जनवणन द्वतीयगणस्य सदस्यः सदस्या वा अन्यं ोकं गाय त ।
[उस ोक के अ न्तम व्यञ्जन वण से दूसरी टोली का सदस्य/सदस्या दूसरा ोक गाता है।]
4. एवं क्रमशः क्र डा प्रचल त ।
[इसी क्रम से खेल आगे चलता रहता है।]

एक अ त रक्त नयम (पृष्ठ 70 से): य द पद के अन्त म म्-वणः, वसगः (◌ः) अथवा अनुस्वारः (◌ं) हो, तो उनसे
पूव वाला व्यञ्जन लेकर अगला ोक/पद बोला जाता है। जैसे — भूषणम् के अन्त म ‘म्’ है, अतः उससे पहले
का ण् लया जाता है।

क्रया-रूप दे खए: रचयामः, क्र डामः, गायामः — ये उत्तमपुरुष बहुवचन (लट् -लकार) ह। सूचयतु लोट् -लकार
प्रथमपुरुष एकवचन है — आदरपूवक ‘बताइए’।

पाठस्य ोकाः (१–५) — अन्वयः, अथः, भावः — पृष्ठ 58–60

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

ानमालागणस्य रत्नमालागणस्य च ोकाः

ोकाः

प्र.1 रूपयौवनसम्पन्ना वशालकुलसम्भवाः । वद्याहीना न शोभन्ते नगन्धा इव कशुकाः ॥१॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — रूप-यौवन-सम्पन्नाः, वशाल-कुल-सम्भवाः, वद्या-हीनाः, न, शोभन्ते, नगन्धाः, इव, कशुकाः ।
अन्वयः — रूपयौवनसम्पन्नाः वशालकुलसम्भवाः (परन्तु) वद्याहीनाः (जनाः) नगन्धाः कशुकाः इव न शोभन्ते ।
अथः — जो लोग रूप और यौवन से सम्पन्न ह तथा बड़े (उत्तम) कुल म जन्मे ह, कन्तु वद्याहीन ह, वे गन्धर हत पलाश (ढाक/टे सू)
के फूल के समान शोभा नह पाते।

भावः — पलाश का फूल दे खने म अत्यन्त सुन्दर, दहकता हुआ लाल होता है, पर उसम सुगन्ध नह होती —
इस लए न कोई उसे माला म परोता है, न पूजा म चढ़ाता है। ठ क वैसे ही सुन्दरता, जवानी और ऊँचा खानदान — ये
तीन बाहरी शोभा ह; वद्या ही वह सुगन्ध है जो व्य क्त को सचमुच आदरणीय बनाती है। अतः रूप, यौवन और
कुल क अपेक्षा वद्या एव ेष्ठा ।

अलङ् कारः: यहाँ उपमा अलङ् कार है — इव (के समान) वाचक शब्द है; उपमेय = वद्याहीन जन, उपमान =
नगन्ध कशुक, साधारण धम = ‘न शोभन्ते’।
अन्त्याक्षरी: ोक ‘ कशुकाः’ पर समाप्त हुआ → अ न्तम व्यञ्जन क् → अगला ोक ‘काव्यशास्त्र…’ से आरम्भ
होगा।

प्र.2 काव्यशास्त्र वनोदे न कालो गच्छ त धीमताम् । व्यसनेन च मूखाणां नद्रया कलहेन वा ॥२॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — काव्य-शास्त्र- वनोदे न, कालः, गच्छ त, धीमताम्, व्यसनेन, च, मूखाणाम्, नद्रया, कलहेन, वा ।
अन्वयः — धीमतां कालः काव्यशास्त्र वनोदे न, मूखाणां च (कालः) व्यसनेन नद्रया कलहेन वा गच्छ त ।
अथः — बु द्धमान का समय काव्य और शास्त्र के आनन्द म बीतता है, और मूख का समय व्यसन (बुरी लत/भोग- वलास), न द
अथवा झगड़े म बीतता है।

भावः — समय सबको बराबर मलता है — अन्तर केवल उसके उपयोग का है। बु द्धमन्तः जनाः काव्यानां
शास्त्राणां च अनुशीलनेन समयस्य सदुपयोगं कुव न्त, जब क मूख सोकर, लड़कर या व्यसन म पड़कर अमूल्य
समय गँवा दे ते ह। इस लए हम पढ़ने- लखने और वद्याभ्यास म समय लगाना चा हए — वयं नत्यं वद्याभ्यासेन
पठनेन लेखनेन वा समयस्य सदुपयोगं कुमः ।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
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वभ क्त दे खए: धीमताम् और मूखाणाम् — षष्ठी बहुवचन (…का/के)। व्यसनेन, नद्रया, कलहेन, वनोदे न —

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ोक ‘ वद्या ववादाय…’।gl
तृतीया एकवचन (साधन/करण), अथात् ‘…के ारा’।
अन्त्याक्षरी:.coोक ‘वा’ पर समाप्त → व्यञ्जन व् → अगला
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वद्या ववादाय धनं मदाय, श क्तः परेषां प रपीडनाय । खलस्य साधो वपरीतमेतत्, ानाय दानाय च रक्षणाय ॥
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प्र.3

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३॥ — अस्य ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

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पदच्छे दः — वद्या, ववादाय, धनम्, मदाय, श क्तः, परेषाम्, प रपीडनाय, खलस्य, साधोः, वपरीतम्, एतत्, ानाय, दानाय, च,
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रक्षणाय ।
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अन्वयः — खलस्य वद्या ववादाय, धनं मदाय, श क्तः परेषां प रपीडनाय (च भव त) । (परं) साधोः एतद्- वपरीतं — ( वद्या)

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ानाय, (धनं) दानाय, (श क्तः) रक्षणाय च (भव त) ।
l — दुष्ट व्य क्त क वद्या ववाद के लए, धन घमण्ड के लए और श क्त दूसर को कष्ट देने के लए होती है। सज्जन का इससे
gअथः
a उल्टा होता है — उसक वद्या ान के लए, धन दान के लए और श क्त (दुबल क ) रक्षा के लए होती है।
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m-आप म न अच्छे ह न बुरे; उनका फल पात्र के स्वभाव पर agl
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भावः — वद्या, धन और श क्त — ये तीन अपने

a glaम तक-कुतक का ह थयार बन जाती है और सज्जन के हाथ म ान बाँटने
नभर करता है। वही वद्या दुजन के हाथ
का साधन। इसी लए वद्या के साथ सुशीलता का होना अ नवाय है।

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चतुथ वभ क्त: ववादाय, मदाय, प रपीडनाय, ानाय, दानाय, रक्षणाय — ये सबem
m a s
gl ह।
चतुथ एकवचन ह और

. cे oलए’ (प्रयोजन) का अथ दे ते ह। यही रूप अभ्यास-प्रश्न ५ क मञ्जूषा मaभरने
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‘…क

g l as स न्ध: साधो वपरीतमेतत् = साधोः + वपरीतम् + एतत् ( वसग-स न्ध + स्वर-स न्ध)।
a अन्त्याक्षरी: ‘रक्षणाय’ → य् → अगला ोक ‘येषां न वद्या…’।

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asन शीलं न गुणो न धमः । ते मत्यलोके भु व भारभूताः, मनुष्यरूपेण मृगाश्चर न्त ॥
येषां न वद्या न तपो न दानं, lानं
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४॥ — अस्य a g
ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

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पदच्छे दः — येषाम्, न, वद्या, न, तपः, न, दानम्, ानम्, न, शीलम्, न, गुणः, न, धमः, ते, मत्य-लोके, भु व, भार-भूताः, मनुष्य-

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रूपे मृगाः, चर न्त ।
a
agl अन्वयः — येषां (जनानां) वद्या न, तपः न, दानं न, ानं न, शीलं न, गुणः न, धमः (अ प) न (अ स्त), ते मत्यलोके भु व भारभूताः
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मृगाः मनुष्यरूपेण चर न्त ।

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अथः — जनके पास न वद्या है, न तप, न दान, न ान, न च रत्र, न गुण और न धम — वे इस मृत्युलोक म पृथ्वी पर भार-स्वरूप

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ह; वे मनुष्य के रूप म पशु ही वचरते ह।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

भावः — मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली वस्तु शरीर नह , ब ल्क वद्या, तप, दान, ान, शील, गुण और धम — ये
सात गुण ह। जो इन्ह नह अपनाता, वह दे खने म मनुष्य होते हुए भी आचरण म पशु के समान है और पृथ्वी पर
केवल भार है। ोक कठोर शब्द म यही चेतावनी दे ता है क जन्म से नह , गुण से मनुष्यता आती है।

स न्ध- वच्छे द: मृगाश्चर न्त = मृगाः + चर न्त ( वसग-स न्ध — ‘च’ से पहले वसग का ‘श्’ हो गया)। न तपो न
दानम् = तपः + न ( वसग → ओ)।
अलङ् कारः: ‘मनुष्यरूपेण मृगाः’ म रूपक जैसा प्रयोग है — बना ‘इव’ के सीधे मनुष्य को मृग कह दया गया।
अन्त्याक्षरी: ‘चर न्त’ → त् → अगला ोक ‘तदा वृ त्तश्च…’।

प्र.5 तदा वृ त्तश्च क तश्च लक्ष्मीवाणी यश स्वनी । तत्त्व ानं परा शा न्तयदा वद्या भवेत्तव ॥५॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — तदा, वृ त्तः, च, क तः, च, लक्ष्मीः, वाणी, यश स्वनी, तत्त्व ानम्, परा, शा न्तः, यदा, वद्या, भवेत्, तव ।
अन्वयः — यदा तव वद्या भवेत्, तदा (तव) वृ त्तः, क तः, लक्ष्मीः, यश स्वनी वाणी, तत्त्व ानं, परा शा न्तः च (भवेत्) ।
अथः — जब तुम्हारे पास वद्या होगी, तभी तुम्ह आजी वका, क त, सम्प त्त, यश स्वनी वाणी, तत्त्व ान और परम शा न्त — ये सब
प्राप्त ह गे।

भावः — वद्या केवल एक वस्तु नह दे ती, ब ल्क छह वस्तुए ँ एक साथ दे ती है — रोज़गार, नाम, धन, प्रभावशाली
वाणी, वास्त वक ान और मन क शा न्त। ध्यान द जए क ोक म शत पहले है और फल बाद म — यदा वद्या
भवेत्, तदा…। अथात् इन सबक जड़ वद्या ही है, इस लए नरन्तर वद्याजन करना चा हए।

व्याकरण: भवेत् व ध लङ् लकार (प्रथमपुरुष एकवचन) है — ‘हो/होना चा हए’। वृ त्तश्च क तश्च = वृ त्तः + च,
क तः + च ( वसग-स न्ध)। लक्ष्मीवाणी = लक्ष्मीः + वाणी; शा न्तयदा = शा न्तः + यदा; भवेत्तव = भवेत् + तव ।
अन्त्याक्षरी: ‘भवेत्तव’ → व् → अगला ोक ‘ वद्या नाम नरस्य…’।

पाठस्य ोकाः (६–१०) — अन्वयः, अथः, भावः — पृष्ठ 61–63

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ानमालागणस्य रत्नमालागणस्य च ोकाः

ोकाः

प्र.1 वद्या नाम नरस्य रूपम धकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं, वद्या भोगकरी यशःसुखकरी वद्या गुरूणां गुरुः । वद्या बन्धुजनो
वदे शगमने वद्या परा दे वता, वद्या राजसु पूज्यते न ह धनं वद्या वहीनः पशुः ॥६॥ — अस्य ोकस्य अन्वयं
अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — वद्या, नाम, नरस्य, रूपम्, अ धकम्, प्रच्छन्न-गुप्तम्, धनम्, वद्या, भोगकरी, यशः-सुखकरी, वद्या, गुरूणाम्, गुरुः,
वद्या, बन्धु-जनः, वदे श-गमने, वद्या, परा, दे वता, वद्या, राजसु, पूज्यते, न, ह, धनम्, वद्या- वहीनः, पशुः ।
अन्वयः — वद्या नाम नरस्य अ धकं रूपं प्रच्छन्नगुप्तं धनं (च अ स्त) । वद्या भोगकरी यशःसुखकरी (च अ स्त) । वद्या गुरूणां गुरुः
(अ स्त) । वदे शगमने वद्या बन्धुजनः (भव त) । वद्या परा दे वता (अ स्त) । वद्या राजसु पूज्यते, धनं न ह (पूज्यते) । वद्या वहीनः
(जनः) पशुः (भव त) ।
अथः — वद्या मनुष्य का ेष्ठ रूप (सौन्दय) है और छपा हुआ, सुर क्षत धन है। वद्या भोग (सुख-सु वधा) दे ने वाली तथा यश और
सुख दे ने वाली है। वद्या गुरुओं क भी गुरु है। वदे श-यात्रा म वद्या ही बन्धु है। वद्या ही सव ेष्ठ दे वता है। राजाओं क सभा म वद्या
पूजी जाती है, धन नह । जो वद्याहीन है वह पशु है।

भावः — यह ोक वद्या के आठ रूप गनाता है — सौन्दय, गुप्त धन, भोगदात्री, यश-सुखदात्री, गुरुओं क गुरु,
परदे स म बन्धु, परम दे वता और राजसभा म सम्मान का आधार। इनम सबसे मा मक पं क्त है वदे शगमने वद्या
बन्धुजनः — परदे स म जब कोई अपना नह होता, तब सीखा हुआ ान ही सहारा बनता है। अ न्तम चरण चेतावनी
दे ता है — वद्या वहीनः पशुः ।

छन्दः: यह ोक शा ल वक्र डतम् छन्द म है (प्रत्येक चरण म 19 वण) — इसी लए यह शेष ोक से लम्बा है।
व्याकरण: राजसु = सप्तमी बहुवचन (राजाओं म); गुरूणाम् = षष्ठी बहुवचन; पूज्यते कमवाच्य (लट् ) प्रयोग है —
‘पूजी जाती है’।
अन्त्याक्षरी: ‘पशुः’ → श् → अगला ोक ‘शनैः प ाः…’।

प्र.2 शनैः प ाः शनैः क ा शनैः पवतलङ् घनम् । शनै वद्या शनै वत्तं पञ्चैता न शनैः शनैः ॥७॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — शनैः, प ाः, शनैः, क ा, शनैः, पवत-लङ् घनम्, शनैः, वद्या, शनैः, वत्तम्, पञ्च, एता न, शनैः, शनैः ।
अन्वयः — प ाः शनैः, क ा शनैः, पवतलङ् घनं शनैः, वद्या शनैः, वत्तं शनैः च — एता न पञ्च (काया ण) शनैः शनैः
(करणीया न) ।
अथः — रास्ता धीरे-धीरे (तय होता है), गुदड़ी धीरे-धीरे ( सली जाती है), पवत धीरे-धीरे लाँघा जाता है, वद्या धीरे-धीरे (आती है)
और धन धीरे-धीरे (जुड़ता है) — ये पाँच काम धीरे-धीरे ही होते ह।

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भावः — ोक का सन्दे श है — धैय और नय मतता। मनुष्य को चलते समय सावधानी से चलना चा हए, वस्त्र
सावधानी से सीना चा हए, पवत क्रम से चढ़ना चा हए तथा वद्या और धन नरन्तर प्रयत्न से अ जत करने चा हए।
कोई भी बड़ा काम एक छलाँग म पूरा नह होता; वह सोपानक्रमेण — सीढ़ -दर-सीढ़ — ही पूरा होता है।

स न्ध: शनै वद्या = शनैः + वद्या; शनै वत्तम् = शनैः + वत्तम् ( वसग-स न्ध); पञ्चैता न = पञ्च + एता न (वृ द्ध-
स न्ध — अ + ए = ऐ)।
शब्दाथ: प ाः = मागः (रास्ता), क ा = पुराने वस्त्र से बनी मोट चादर/गुदड़ी, वत्तम् = धनम् ।
अन्त्याक्षरी: ‘शनैः’ के अन्त म वसग है, अतः उससे पूव का व्यञ्जन न् लया गया → अगला ोक ‘न वद्यया
वना…’।

प्र.3 न वद्यया वना सौख्यं नराणां जायते ुवम् । अतो धमाथमोक्षेभ्यो वद्याभ्यासं समाचरेत् ॥८॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — न, वद्यया, वना, सौख्यम्, नराणाम्, जायते, ुवम्, अतः, धम-अथ-मोक्षेभ्यः, वद्याभ्यासम्, समाचरेत् ।
अन्वयः — वद्यया वना नराणां ुवं सौख्यं न जायते । अतः धम-अथ-मोक्षेभ्यः वद्याभ्यासं समाचरेत् ।
अथः — वद्या के बना मनुष्य को न श्चत ( ायी) सुख नह मलता। इस लए धम, अथ और मोक्ष क प्रा प्त के लए वद्या का
अभ्यास करना चा हए।

भावः — मनुष्य के चार पुरुषाथ म से तीन — धम, अथ और मोक्ष — वद्या के बना सद्ध नह होते। धन तो
भाग्य से भी मल सकता है, पर वह ुवं सौख्यम् ( र सुख) नह दे ता; र सुख ववेक से आता है और ववेक
वद्या से। इसी लए वद्याभ्यास मनुष्य के लए अ नवाय है, वकल्प नह ।

व्याकरण: वना के योग म प्रायः तृतीया वभ क्त आती है — इसी लए ‘ वद्यया वना’ ( वद्या के बना)।
धमाथमोक्षेभ्यः पञ्चमी/चतुथ बहुवचन का रूप है, यहाँ ‘…के लए’ अथ म। समाचरेत् व ध लङ् — ‘करना
चा हए’।
स न्ध: अतो धमाथमोक्षेभ्यो = अतः + धम… ( वसग → ओ) तथा मोक्षेभ्यः + वद्याभ्यासम् ।
अन्त्याक्षरी: ‘समाचरेत्’ → त् → अगला ोक ‘ताराणां भूषणम्…’।

प्र.4 ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सुमम् । पृ थव्याः भूषणं राजा वद्या सवस्य भूषणम् ॥९॥ — अस्य ोकस्य
अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — ताराणाम्, भूषणम्, चन्द्रः, लतानाम्, भूषणम्, सुमम्, पृ थव्याः, भूषणम्, राजा, वद्या, सवस्य, भूषणम् ।
अन्वयः — चन्द्रः ताराणां भूषणम् (अ स्त), सुमं लतानां भूषणम् (अ स्त), राजा पृ थव्याः भूषणम् (अ स्त), (परं) वद्या सवस्य
भूषणम् (अ स्त) ।

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अथः — चन्द्रमा तार का आभूषण है, फूल लताओं का आभूषण है, राजा पृथ्वी का आभूषण है, कन्तु वद्या सबका आभूषण है।

भावः — तारे चन्द्रमा के साथ ही शोभा पाते ह, लताएँ फूल से सुन्दर लगती ह और पृथ्वी क शोभा उसका सुशासक
बढ़ाता है — पर ये सब सी मत शोभाएँ ह, हर एक अपने-अपने क्षेत्र क । वद्या ही एकमात्र ऐसा आभूषण है जो
सबक शोभा बढ़ाता है — राजा क भी, प्रजा क भी, धनी क भी और नधन क भी। यही ोक का चरम- बन्दु
(उत्कष) है।

अलङ् कारः: तीन उदाहरण दे कर अन्त म चौथी बात को सबसे बड़ा सद्ध कया गया है — यह दृ ान्त तथा
क्रमोत्कष क शैली है। ‘भूषणम्’ शब्द क चार बार आवृ त्त से लय बनती है।
अन्त्याक्षरी: ‘भूषणम्’ के अन्त म म् है, अतः नयम के अनुसार उससे पूव का व्यञ्जन ण् (या उससे मलता-जुलता
न्) लया गया → अगला ोक ‘न चोरहायम्…’। पुस्तक म भी यहाँ (ण्/न्) लखा है।

प्र.5 न चोरहाय न च राजहाय न ातृभाज्यं न च भारका र । व्यये कृते वधत एव नत्यं वद्याधनं सवधनप्रधानम् ॥१०॥
— अस्य ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।

पदच्छे दः — न, चोर-हायम्, न, च, राज-हायम्, न, ातृ-भाज्यम्, न, च, भारका र, व्यये, कृते, वधते, एव, नत्यम्, वद्या-धनम्, सव-
धन-प्रधानम् ।
अन्वयः — ( वद्याधनं) चोरहाय न (अ स्त), राजहाय न (अ स्त), ातृभाज्यं न (अ स्त), भारका र च न (अ स्त); व्यये कृते
( वद्याधनं) नत्यं वधते एव, (अतः) वद्याधनं सवधनप्रधानम् (अ स्त) ।
अथः — वद्यारूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छ न सकता है, न भाइय म बाँटना पड़ता है और न वह बोझ बनता है;
खच करने पर वह सदा बढ़ता ही है — इस लए वद्याधन सब धन म प्रधान है।

भावः — साधारण धन के चार खतरे ह — चोरी, राजा का अपहरण, बँटवारा और ढोने का बोझ; और उसका
पाँचवाँ स्वभाव यह है क खच करने पर वह घटता है। वद्याधन इन पाँच से मुक्त है। उलटे , वद्यायाः वतरणेन
वद्याधनम् इतोऽ प वधते — जतना बाँटो, उतना बढ़ता है। इसी लए यह सवधनप्रधानम् कहा गया।

शब्द-रचना: चोरहायम् = चोरेण हरणयोग्यम्; राजहायम् = रा ा हरणयोग्यम्; ातृभाज्यम् = ातृषु
वभाजनयोग्यम्; भारका र = भारं करो त इ त (बोझ बनाने वाला)। ‘हाय, भाज्य’ म ण्यत्/यत् प्रत्यय है — ‘…के
योग्य’।
प्रयोगः: व्यये कृते — यह स त सप्तमी (भावे सप्तमी) का प्रयोग है, अथात् ‘खच कर लेने पर’।
अन्त्याक्षरी: यह क्र डा का यह चक्र पूण होता है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 66

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
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अभ्यासः — प्रश्नः १ : अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरं लखन्तु
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अभ्यासः

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a s emवद्याहीनाः क दृशाः कशुकाः इव न शोभन्ते ?
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प्र.1 (क)

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नगन्धाः ।
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[गन्धर हत ( कशुक के समान)।]
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कहाँ से मला:
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ोक १ — वद्याहीना न शोभन्ते नगन्धा इव कशुकाः । प्रश्न म क दृशाः (कैसे) पूछा गया है,
m
em.
इस लए उत्तर वशेषण-रूप म आएगा — नगन्धाः (प्रथमा बहुवचन, पुं लङ्ग), जो ‘ कशुकाः’ का वशेषण है।
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a प्र.1 (ख) धीमतां कालः कथं गच्छ त ?

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काव्यशास्त्र वनोदे न ।
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[काव्य और शास्त्र के आनन्द से।] a

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कहाँ से मला:
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ोक २ — काव्यशास्त्र वनोदे न कालो गच्छ त धीमताम् । कथम् ( कस प्रकार) का उत्तर साधन

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बताने वाला पद होता है, अतः तृतीया वभ क्त म — काव्यशास्त्र वनोदे न ।
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प्र.1 (ग) केषां कालः नद्रया कलहेन वा गच्छ त ?
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मूखाणाम् ।
[मूख का।]

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m a s em केषाम् षष्ठी बहुवचन है,
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कहाँ से मला: ोक २ का उत्तराध — व्यसनेन च मूखाणां नद्रया कलहेन वा । प्रश्नवाचक
. o उत्तर भी षष्ठी बहुवचन म — मूखाणाम् ।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.1 (घ) खलस्य वद्या कमथम् ?

ववादाय ।
[ ववाद (झगड़े) के लए।]

कहाँ से मला: ोक ३ — वद्या ववादाय धनं मदाय…खलस्य । कमथम् ( कस लए) का उत्तर प्रयोजन बताता है,
इस लए वह चतुथ वभ क्त म आता है — ववादाय ।

प्र.1 (ङ) सज्जनस्य वद्या कमथम् ?

ानाय ।
[ ान (बढ़ाने) के लए।]

कहाँ से मला: ोक ३ का उत्तराध — खलस्य साधो वपरीतमेतत्, ानाय दानाय च रक्षणाय । साधु (सज्जन) क
वद्या ान के लए, धन दान के लए और श क्त रक्षा के लए होती है।

प्र.1 (च) चन्द्रः केषां भूषणम् अ स्त ?

ताराणाम् ।
[तार का।]

कहाँ से मला: ोक ९ — ताराणां भूषणं चन्द्रः । केषाम् = षष्ठी बहुवचन, अतः उत्तर ताराणाम् (तारा शब्द,
आकारान्त स्त्री लङ्ग, षष्ठी बहुवचन)।

प्र.1 (छ) सवधनप्रधानं कम् ?

वद्याधनम् ।
[ वद्यारूपी धन।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

कहाँ से मला: ोक १० — वद्याधनं सवधनप्रधानम् । कम् नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन है, अतः उत्तर भी उसी
रूप म — वद्याधनम् ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 67
अभ्यासः — प्रश्नः २ : अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखन्तु

अभ्यासः

प्र.2 (क) नगन्धाः कशुकाः इव के न शोभन्ते ?

रूपयौवनसम्पन्नाः वशालकुलसम्भवाः अ प वद्याहीनाः जनाः नगन्धाः कशुकाः इव न शोभन्ते ।
[रूप और यौवन से सम्पन्न तथा बड़े कुल म जन्मे होने पर भी वद्याहीन लोग गन्धर हत पलाश-पुष्प के समान शोभा नह पाते।]

सं क्षप्त उत्तर भी मान्य: वद्याहीनाः (जनाः) नगन्धाः कशुकाः इव न शोभन्ते । पूणवाक्य म उत्तर दे ते समय
प्रश्न के शब्द ज्य -के-त्य रखकर केवल ‘के’ के ान पर उत्तर-पद वद्याहीनाः रख द जए।

ध्यान द: ‘के’ प्रथमा बहुवचन (पुं लङ्ग) है, अतः उत्तर भी प्रथमा बहुवचन म — वद्याहीनाः, न क ‘ वद्याहीनः’।

प्र.2 (ख) मूखाणां कालः कथं गच्छ त ?

मूखाणां कालः व्यसनेन नद्रया कलहेन वा गच्छ त ।
[मूख का समय व्यसन से, न द से अथवा झगड़े से बीतता है।]

तीन साधन तृतीया म: व्यसनेन, नद्रया, कलहेन — तीन तृतीया एकवचन ह, क्य क ये बताते ह क समय कस
के ारा बीतता है। ‘वा’ का अथ ‘अथवा’ है।

तुलना क जए: इसी ोक का पूवाध कहता है — धीमतां कालः काव्यशास्त्र वनोदे न गच्छ त । एक ही ोक म
मूख और बु द्धमान का अन्तर स्पष्ट कर दया गया है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 (ग) दुजनः वद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करो त ?

दुजनः वद्यायाः उपयोगं ववादाय, धनस्य उपयोगं मदाय, शक्तेः उपयोगं च परेषां प रपीडनाय करो त ।
[दुजन वद्या का उपयोग झगड़े के लए, धन का उपयोग घमण्ड के लए और श क्त का उपयोग दूसर को कष्ट दे ने के लए करता है।]

वस्तु दुजनस्य उपयोगः सज्जनस्य उपयोगः

िवद्या िववाद ाय ानाय

धनम् मद ाय दानाय

शि तः पिरपीडनाय रक्षणाय

ोक का आधार: ोक ३ — वद्या ववादाय धनं मदाय, श क्तः परेषां प रपीडनाय । खलस्य
साधो वपरीतमेतत्… ‘खल’ और ‘दुजन’ पयायवाची ह।

प्र.2 (घ) क दृशाः मनुष्याः भु व भारभूताः भव न्त ?

येषां न वद्या, न तपः, न दानम्, न ानम्, न शीलम्, न गुणः, न धमः — तादृशाः मनुष्याः भु व भारभूताः भव न्त ।
[ जनके पास न वद्या है, न तप, न दान, न ान, न च रत्र, न गुण और न धम — ऐसे मनुष्य पृथ्वी पर भार-स्वरूप होते ह।]

ोक ४ क सात क मयाँ: वद्या, तप, दान, ान, शील, गुण और धम — इन सात से र हत व्य क्त ही भारभूतः
कहा गया है; वह मनुष्यरूपेण मृगः — मनुष्य के रूप म पशु — है।

शब्दाथ: भु व = भूमौ (पृथ्वी पर, सप्तमी एकवचन); भारभूताः = भारकराः (भार-स्वरूप)।

प्र.2 (ङ) शनैः शनैः का न साधनीया न ?

प ाः, क ा, पवतलङ् घनम्, वद्या, वत्तम् — एता न पञ्च शनैः शनैः साधनीया न ।
[रास्ता, गुदड़ी, पवत लाँघना, वद्या और धन — ये पाँच काम धीरे-धीरे ही सद्ध करने चा हए।]

ोक ७ का आधार: शनैः प ाः शनैः क ा शनैः पवतलङ् घनम् । शनै वद्या शनै वत्तं पञ्चैता न शनैः शनैः ॥
‘पञ्चैता न’ = पञ्च + एता न, अतः उत्तर म पाँच नाम गनाना आवश्यक है।

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अथ याद रख: प ाः = माग, क ा = पुराने वस्त्र से बनी गुदड़ी, वत्तम् = धन।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 67
अभ्यासः — प्रश्नः ३ : उ चतान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु

अभ्यासः

प्र.3 उ चतान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु — (क) तदा वृ त्तश्च क तश्च / खलस्य साधो वपरीतमेतत् / शनै वद्या
शनै वत्तं / वद्याहीना न शोभन्ते / न चोरहाय न च राजहायम् / वद्या राजसु पूज्यते / अतो धमाथमोक्षेभ्यः • (ख)
पञ्चैता न शनैः शनैः / नगन्धा इव कशुकाः / यदा वद्या भवेत्तव / न ातृभाज्यं न च भारका र / ानाय दानाय
च रक्षणाय / वद्याभ्यासं समाचरेत् / न ह धनम्

सही जो ड़याँ (पुस्तक म पहली जोड़ी उदाहरण के रूप म मलाई हुई द गई है) —

(क) (ख) पूणः ोकांशः

तदा वृित्तश्च कीितश्च यद ा िव द्य ा भवेत्त व ोक ५ (उदाहरणम्)

खलस्य साधोिवपरीतमेतत् ानाय द ानाय च र क्ष णाय ोक ३

शनैिवद्या शनैिवत्तं पञ् चैतािन शनैः शनैः ोक ७

िवद्याहीना न शोभन्ते न्
िनग धा इव िकं श ुकाः ोक १

न चोरहाय ं न च राजहायम् ृ
न भातभा ज् यं न च भारकािर ोक १०

िवद्या राजसु पूज्यते न िह धनम् ोक ६

अतो धम थमोक्षेभ्यः िव द्य भ्
ा यासं समाचरे त ् ोक ८

मलाने क तरक ब: हर पं क्त के छन्द और अथ दोन दे खए। जैसे ‘तदा…’ के साथ अवश्य ‘यदा…’ आएगा
(यदा–तदा जोड़ा); ‘न चोरहाय न च राजहायम्’ म ‘न…न…’ क लय चल रही है, अतः उसी लय वाली ‘न ातृभाज्यं
न च भारका र’ उसक जोड़ी है; ‘अतः’ (इस लए) के बाद प रणाम-वाक्य ‘ वद्याभ्यासं समाचरेत्’ आएगा।

ध्यान द: ‘ वद्या राजसु पूज्यते’ के साथ ‘न ह धनम्’ जुड़ने पर पूरा अथ बनता है — राजसभा म वद्या पूजी जाती
है, धन नह ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 67–68

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यासः — प्रश्नः ४ : उदाहरणानुसारम् अधः रेखाङ् कता न पदा न आ त्य प्रश्न नमाणं कुवन्तु
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अभ्यासः

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a s emराजा पृ थव्याः भूषणं भव त । (रेखाङ् कतम् — पृ थव्याः) [यथा / उदाहरणम्]
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राजा कस्याः भूषणं भव त ?
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[राजा कसका आभूषण होता है?]
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नयम: रेखां कत पद पृ थव्याः — स्त्री लङ्ग, षष्ठी एकवचन है। अतः उसी लङ्ग- वभ क्त-वचन का प्रश्नवाचक शब्द
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रखा जाएगा — कस्याः ( कम् शब्द, स्त्री लङ्ग, षष्ठी एकवचन)। यही पुस्तक म उदाहरण के रूप म भरा हुआ है।
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याद रखने योग्य जोड़ी: पुं लङ्ग/नपुंसक लङ्ग षष्ठी एकवचन म कस्य, स्त्री लङ्ग म कस्याः ।
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साधोः वद्या ानाय भव त । (रेखाङ् कतम्
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प्र.4 (ख)
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कस्य वद्या ानाय भव त ?

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[ कसक वद्या ान के लए होती है?]
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m ‘कस्य’: साधोः — ‘साधु’ (उकारान्त पुं लङ्ग) का षष्ठी एकवचन रूप है। पुं लङ्ग षष्ठी एकवचन का प्रश्नवाचक
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agl = कस्य ।
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comहै, पर यहाँ अथ ‘सज्जन क ’ है, अतः षष्ठी ही है। g l a
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सावधानी: ‘साधोः’ पञ्चमी एकवचन भी हो सकता

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वद्या गुरूणां गुरुः । (रेखाङ् कतम् — गुरूणाम्)
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प्र.4 (ग)

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emवद्या केषां गुरुः ?

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agl [ वद्या कनक गुरु है?]
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क्य ‘केषाम्’: गुरूणाम् पुं लङ्ग षष्ठी बहुवचन है, अतः प्रश्नवाचक भी षष्ठी बहुवचन — केषाम् (वाक्य म अनुस्वार-
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स हत ‘केषां’)।

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तुलना: एकवचन — कस्य, वचन — कयोः, बहुवचन — केषाम् ।

प्र.4 (घ) ते मत्यलोके भु व भारभूताः भव न्त । (रेखाङ् कतम् — भारभूताः)

ते मत्यलोके भु व क दृशाः भव न्त ?
[वे मृत्युलोक म पृथ्वी पर कैसे होते ह?]

क्य ‘क दृशाः’: रेखां कत पद भारभूताः एक वशेषण है (कैसे ह — भार-स्वरूप)। वशेषण पर प्रश्न बनाते समय
क दृश् शब्द लया जाता है; कता ‘ते’ पुं लङ्ग बहुवचन है, अतः रूप होगा क दृशाः ।

ध्यान द: यहाँ ‘के’ नह चलेगा, क्य क ‘के’ से व्य क्त पूछा जाता है, गुण नह ।

प्र.4 (ङ) वद्याहीनाः न शोभन्ते । (रेखाङ् कतम् — वद्याहीनाः)

के न शोभन्ते ?
[कौन शोभा नह पाते?]

क्य ‘के’: वद्याहीनाः वाक्य का कता है — पुं लङ्ग, प्रथमा बहुवचन। अतः प्रश्नवाचक भी प्रथमा बहुवचन — के ।

पूरा क्रम: एकवचन — कः, वचन — कौ, बहुवचन — के ।

प्र.4 (च) सवस्य लोचनं शास्त्रम् । (रेखाङ् कतम् — शास्त्रम्)

सवस्य लोचनं कम् ?
[सबक आँख क्या है?]

क्य ‘ कम्’: शास्त्रम् नपुंसक लङ्ग, प्रथमा एकवचन है। नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन का प्रश्नवाचक रूप = कम् ।

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वाक्य का अथ: ‘सवस्य लोचनं शास्त्रम्’ — शास्त्र ही सबक आँख है, अथात् शास्त्र से ही सही-गलत दखाई दे ता
है।

प्र.4 (छ) वद्या राजसु पूज्यते । (रेखाङ् कतम् — वद्या)

का राजसु पूज्यते ?
[राजाओं म (राजसभाओं म) कौन पूजी जाती है?]

क्य ‘का’: वद्या स्त्री लङ्ग, प्रथमा एकवचन है। स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन का प्रश्नवाचक = का ( वचन — के,
बहुवचन — काः)।

क्रया अप रव तत: प्रश्न बनाते समय केवल रेखां कत पद हटाकर प्रश्नवाचक र खए; ‘पूज्यते’ ज्य -का-त्य रहेगा।

प्र.4 (ज) काव्यशास्त्र वनोदे न कालो गच्छ त धीमताम् । (रेखाङ् कतम् — काव्यशास्त्र वनोदे न)

केन धीमतां कालो गच्छ त ?
[ कससे बु द्धमान का समय बीतता है?]

क्य ‘केन’: काव्यशास्त्र वनोदे न — तृतीया एकवचन (साधन)। तृतीया एकवचन का प्रश्नवाचक = केन ।

संकेत: ‘केन’ के ान पर ‘कथम्’ भी पूछा जा सकता है — धीमतां कालः कथं गच्छ त ? — पर रेखां कत पद के
आधार पर वभ क्त- मलान करना हो तो केन ही ठ क है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 68

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अभ्यासः — प्रश्नः ५ : मञ्जूषातः समु चता न पदा न स्वीकृत्य रक्त ाना न पूरयन्तु

अभ्यासः

प्र.5 मञ्जूषातः समु चता न पदा न स्वीकृत्य रक्त ाना न पूरयन्तु — मञ्जूषा : रक्षणाय, मदाय, ववादाय,
प रपीडनाय, ानाय, दानाय । सज्जनस्य — श क्तः ……, वद्या ……, धनम् …… । दुजनस्य — श क्तः ……,
वद्या ……, धनम् …… ।

पू रतम् उत्तरम् —

सज्जनस्य दुजनस्य

शि तः र क्ष णाय पिरपीडनाय

िवद्या ानाय िववाद ाय

धनम् द ानाय मद ाय

वाक्यरूपेण —
सज्जनस्य श क्तः रक्षणाय, वद्या ानाय, धनं दानाय (भव त) ।
दुजनस्य श क्तः प रपीडनाय, वद्या ववादाय, धनं मदाय (भव त) ।
[सज्जन क श क्त रक्षा के लए, वद्या ान के लए और धन दान के लए होता है; दुजन क श क्त दूसर को कष्ट दे ने के लए, वद्या
झगड़े के लए और धन घमण्ड के लए होता है।]

आधार- ोक (३): वद्या ववादाय धनं मदाय, श क्तः परेषां प रपीडनाय । खलस्य साधो वपरीतमेतत्, ानाय
दानाय च रक्षणाय ॥ — पहली दो पं क्तयाँ दुजन क ह और तीसरी-चौथी पं क्त म क्रमशः वद्या → ानाय, धनम्
→ दानाय, श क्तः → रक्षणाय सज्जन के लए कहा गया है।

व्याकरण-सूत्र: मञ्जूषा के छह पद चतुथ वभ क्त, एकवचन म ह और ‘…के लए’ (प्रयोजन) का अथ दे ते ह
— ‘तादथ्य चतुथ ’ ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 68

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अभ्यासः — प्रश्नः ६ : उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां वभ क्तं वचनं च लखन्तु

अभ्यासः

प्र.6 उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां वभ क्तं वचनं च लखन्तु — यथा : ताराणाम् — षष्ठी वभ क्तः,
बहुवचनम् । (क) वद्याम् (ख) धनस्य (ग) कलहेन (घ) नराणाम् (ङ) मत्यलोके (च) ानाय (छ) राजसु

पदम् वभ क्तः वचनम् मूलशब्दः / अथः

यथा — ताराणाम् ष्
ष ठ ी िवभि तः बहुवचनम् तारा (स्त्री लङ्गः) — तार का

(क) िवद्याम् ि तीया िवभि तः एकवचनम् वद्या (स्त्री लङ्गः) — वद्या को

(ख) धनस्य ष्
ष ठ ी िवभि तः एकवचनम् धन (नपुंसक लङ्गः) — धन का

(ग) कलहेन ृ
ततीया िवभि तः एकवचनम् कलह (पुं लङ्गः) — झगड़े से

(घ) नराणाम् ष्
ष ठ ी िवभि तः बहुवचनम् नर (पुं लङ्गः) — मनुष्य का

(ङ) मत्यलोके प्
स तमी िवभि तः एकवचनम् मत्यलोक (पुं लङ्गः) — मृत्युलोक म

(च) ानाय चत ुथ िवभि तः एकवचनम् ान (नपुंसक लङ्गः) — ान के लए

(छ) राजसु प्
स तमी िवभि तः बहुवचनम् राजन् (पुं लङ्गः) — राजाओं म

पहचानने क कुंजी ( वभ क्त- चह्न):

-म् ( वद्याम्) → तीया एकवचन — ‘को’।
-एन / -या (कलहेन, वद्यया) → तृतीया एकवचन — ‘से/ ारा’।
-आय ( ानाय, दानाय) → चतुथ एकवचन — ‘के लए’।
-स्य (धनस्य) → षष्ठी एकवचन; -आनाम् / -ाणाम् (नराणाम्, ताराणाम्) → षष्ठी बहुवचन — ‘का/के/क ’।
-ए (मत्यलोके) → सप्तमी एकवचन; -सु / -षु (राजसु, धनेषु) → सप्तमी बहुवचन — ‘म/पर’।

सावधानी: नराणाम् म ‘ण’ है, ‘न’ नह — णत्व- वधान के कारण (‘र्’ के बाद ‘न्’ का ‘ण्’ हो जाता है)। तथा
राजसु ‘राजन्’ शब्द का सप्तमी बहुवचन है, इसम ‘न्’ लुप्त हो गया है।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 69

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
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योग्यता वस्तरः — वद्यायाः सन्दभ ोकाः तथा ‘ वद्या’ शब्दस्य रूपा ण
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योग्यता वस्तरः

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a s eस्तm वद्यासमो बन्धुना स्त वद्यासमः सुहृत् । ना स्त वद्यासमं वत्तं ना स्त वद्यासमं सुखम् ॥ — अस्य
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अथ भावं च लखन्तु ।

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अन्वयः — वद्यासमः बन्धुः न अ स्त, वद्यासमः सुहृत् न अ स्त, वद्यासमं वत्तं न अ स्त, वद्यासमं सुखं न अ स्त ।
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अथः — वद्या के समान कोई बन्धु नह है, वद्या के समान कोई मत्र नह है, वद्या के समान कोई धन नह है और वद्या के समान

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कोई सुख नह है।

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ोक चार बार ‘ना स्त’ दोहराकर वद्या को बन्धु, मत्र, धन और सुख — चार sसेeबड़ा बताता है। बन्धु m.
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भावः —
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glजीवन
और मत्र.cसाथ छोड़ सकते ह, धन समाप्त हो सकता है, सुख क्ष णक होता है; पर वद्या
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s क भू मका अकेले नभा दे ती है।
भर साथ रहती है और

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स न्ध: ना स्त = न + अ स्त (द घ-स न्ध); बन्धुना स्त = बन्धुः + ना स्त ( वसग-स न्ध)। वद्यासमः = वद्यया समः
(तृतीया-तत्पुरुष समास)।
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co m ोकस्य अथ भावं
वद्याभ्यासस्तपो ान म न्द्रयाणां च संयमः । अ हसा गुरुसेवा च नः ेयसकरं परम् ॥ — अस्य
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प्र.2

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च लखन्तु ।

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a अन्वयः — वद्याभ्यासः, तपः, ानम्, इ न्द्रयाणां संयमः, अ हसा, गुरुसेवा च — (एतत्) परं नः ेयसकरम् (अ स्त) ।

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अथः — वद्या का अभ्यास, तप, ान, इ न्द्रय का संयम, अ हसा और गुरु क सेवा — ये सब परम कल्याण करने वाले ह।
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भावः — ोक छह साधन गनाता a e
है sजो मनुष्य को नः ेयस (परम कल्याण/मोक्ष) तक पहुँचाते ह। ध्यान द जए
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क इनम केवल पढ़ाई नह है —aसंयम, अ हसा और गुरुसेवा भी ह। अथात् वद्या तभी फलती है जब साथ म

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च रत्र हो।

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स न्ध- वच्छे द: वद्याभ्यासस्तपः = वद्याभ्यासः + तपः; ान म न्द्रयाणाम् = ानम् + इ न्द्रयाणाम् ।
m नः ेयसकरम् = नः ेयसं करो त इ त (परम कल्याण करने वाला)।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 ा त भवण्ट्यते नैव चोरेणा प न नीयते । दाने नैव क्षयं या त वद्यारत्नं महाधनम् ॥ — अस्य ोकस्य अथ भावं
च लखन्तु ।

अन्वयः — ( वद्यारत्नं) ा त भः न एव वण्ट्यते, चोरेण अ प न नीयते, दाने (कृते) न एव क्षयं या त — (अतः) वद्यारत्नं महाधनम्
(अ स्त) ।
अथः — वद्यारूपी रत्न को न सगे-सम्बन्धी बाँटते ह, न चोर ले जा सकता है, और दान करने पर भी वह क्षीण नह होता — इस लए
वद्यारूपी रत्न ही महान् धन है।

भावः — यह ोक पाठ के दसव ोक (न चोरहाय…) का ही वस्तार है। साधारण धन बँटता है, चोरी जाता है
और खच होने पर घटता है; वद्या इन तीन दोष से मुक्त है — दाने नैव क्षयं या त — दूसर को दे ने पर भी घटती
नह । इसी लए उसे महाधनम् कहा गया।

शब्दाथ: ा त भः = सम्ब न्ध भः (सगे-सम्ब न्धय ारा, तृतीया बहुवचन); वण्ट्यते = वभज्यते (बाँटा जाता है);
नीयते = ले जाया जाता है (कमवाच्य); क्षयं या त = घटता है।

प्र.4 ‘ वद्या’ इ त शब्दस्य रूपा ण लखन्तु (सवासु वभ क्तषु, त्रषु वचनेषु) ।

वद्या — आकारान्तः स्त्री लङ्गः शब्दः (‘रमा’ शब्दवत्) ।

वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

पथमािवभि तः िवद्य ा वद्ये वद्याः

ि तीयािवभि तः िवद्य ाम् वद्ये वद्याः

ततृ ीयािवभि तः िवद्य या वद्याभ्याम् वद्या भः

चतुथ िवभि तः िवद्य ायै वद्याभ्याम् वद्याभ्यः

पञ्चमीिवभि तः िवद्य ायाः वद्याभ्याम् वद्याभ्यः

षष्ठीिवभि तः िवद्य ायाः वद्ययोः वद्यानाम्

सप्तमीिवभि तः िवद्य ायाम् वद्ययोः वद्यासु

सम्बोधनम् (हे) िवद्ये ! (हे) वद्ये ! (हे) वद्याः !

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पाठ म इन रूप का प्रयोग: वद्या (प्रथमा — ‘ वद्या सवस्य भूषणम्’), वद्याम् ( तीया — ‘ वद्यां न अजय न्त’),
वद्यया (तृतीया — ‘न वद्यया वना सौख्यम्’), वद्यायाः (षष्ठी — ‘ वद्यायाः उपयोगम्’) ।

याद रखने क तरक ब: पञ्चमी और षष्ठी का एकवचन दोन वद्यायाः ही है, तथा प्रथमा- तीया का वचन दोन
वद्ये है — अथ वाक्य से ही तय होगा। इसी प्रकार रमा, लता, बा लका, ग ा, माला आ द सभी आकारान्त
स्त्री लङ्ग शब्द चलते ह।

प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 69
प रयोजनाकायम् (प्रकल्प-काय)

प रयोजनाकायम्

प्र.1 क, त, व, म, य इ त पञ्च भः वणः ोकान् स ह्य ोरकपत्रे लखन्तु, शक्षकस्य अनुमत्या कक्षा भ त्तषु
ापयन्तु ।

काय व धः (कैसे कर) —

1. पुस्तकालय, पाठ्यपुस्तक तथा ‘सुभा षतरत्नभाण्डागार’ जैसे संग्रह से क, त, व, म, य — इन पाँच वण से आरम्भ होने वाले
ोक चु नए (प्रत्येक वण के लए कम-से-कम एक)।
2. प्रत्येक ोक को ोरकपत्रे (चाट पेपर पर) सुन्दर अक्षर म ल खए और नीचे उसका हन्द अथ ल खए।
3. चाट को सजाकर शक्षक क अनुम त से कक्षा क द वार पर लगाइए।

नमूना उत्तरम् (Sample answer) —

वणः ोकः हन्द अथ

क व् स्त्र
का यशा च्
िवनोदे न काल ो ग छित धीमताम् । व् यसनेन च मूख णां बु द्धमान का समय काव्य-शास्त्र म, मूख का व्यसन-
िनद या कल हेन वा ॥ न द-कलह म बीतता है।

त न् ृ
ताराणां भ ूषणं च द ः ल तानां भ ूषणं सुम म् । पिथ याः भ ूषणं राजा िव व् द्य ा चन्द्र तार का, फूल लताओं का, राजा पृथ्वी का — पर
सव स् य भ ूषणम् ॥ वद्या सबका आभूषण है।

व िवद्य ा द द ाित िवनयं िवनया द्य ाित पा त्र ताम् । पा त्रत् द्ध प्
वा नमा नोित धना द्ध मं वद्या वनय दे ती है, वनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन
ततः सुखम् ॥ से धम और धम से सुख मलता है।

म माता श त्र ुः िपता वैर ी येन बाल ो न पािठतः । न शोभते सभाम ये हंस म ये ध् ध् जो माता- पता बालक को नह पढ़ाते वे शत्रु ह; अनपढ़
बको यथा ॥ सभा म हंस के बीच बगुले-सा लगता है।

य येषां न िव द्य ा न तपो न द ानं , ानं न शील ं न ग ुणो न धम ः । ते म यल ोके त् वद्या-तप-दान आ द से र हत लोग पृथ्वी पर भार ह,
भ ुिव भारभ ूताः , मनष्ु यरूपेण म ृग ाश्चरिन्त ॥ मनुष्य-रूप म पशु ह।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

सुझाव: चाट पर हर ोक के आगे उसका अ न्तम व्यञ्जन कोष्ठक म लख द जए — इससे कक्षा म तुरन्त
अन्त्याक्षरी खेली जा सकेगी।

प्र.2 यथा अ स्मन् पाठे अन्त्याक्षरी ोकाः दत्ताः स न्त तथैव व वध ोतोभ्यः (ग्र ालयः, अन्तजालम्, अध्यापकाः,
मत्रा ण इत्या दभ्यः) सुभा षता न चत्वा अन्त्याक्षरीक्रमेण लखन्तु ।

काय व धः — पुस्तकालय, अन्तजाल (इन्टरनेट), अध्यापक और मत्र से सुभा षत एकत्र क जए। फर उन्ह ऐसे क्रम म सजाइए
क पहले ोक का अ न्तम व्यञ्जन ही अगले ोक का पहला वण बने । य द अन्त म म्, वसग (◌ः) या अनुस्वार (◌ं) हो, तो
उससे पूव वाला व्यञ्जन ली जए।
नमूना उत्तरम् (Sample answer) — एक अन्त्याक्षरी-शृंखला:

1. सत्यं ूयात् प्रयं ूयात् न ूयात् सत्यम प्रयम् । (अन्त — ‘अ प्रयम्’ → य्)
2. यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य ग तभवेत् । एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त ॥ (अन्त — ‘ सध्य त’ → त्)
3. तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कायाकायव्यव तौ । (अन्त — ‘व्यव तौ’ → त्)
4. तपःस्वाध्याय नरतं तपस्वी वा ग्वदां वरम् । (अन्त — ‘वरम्’ → र्)
5. रत्नाकरधौतपदां हमालय करी टनीम् । (अन्त — ‘ करी टनीम्’ → न्)
6. न चोरहाय न च राजहाय न ातृभाज्यं न च भारका र ।

जाँचने का तरीका: हर ोक लखने के बाद उसका अ न्तम पद अलग लखकर उसम से म्/ वसग/अनुस्वार
हटाइए — जो व्यञ्जन बचे, अगला ोक ठ क उसी से आरम्भ होना चा हए।

सावधानी: अन्तजाल से लया गया ोक कक्षा म पढ़ने से पहले अध्यापक से शुद्धता क जाँच अवश्य करवाइए
— वहाँ प्रायः अशुद्ध पाठ मलते ह।

कायकलापः — पृष्ठ 70

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम् AglaSem · NCERT Solutions

कायकलापः (कक्षा-ग त व धयाँ)

कायकलापः

प्र.1 पदान्त्याक्षरी क्र डा । कक्षायां पदान्त्याक्षर क्र डन्तु । यथा — प्रथमः छात्रः — रामः (‘म’कारः अ न्तमवणः),
द्वतीयः छात्रः — मानवः (‘व’कारः अ न्तमवणः), तृतीयः छात्रः — वनम् (अत्र ‘न’कारः अ न्तमवणः), चतुथः
छात्रः — नकुलः (एवमेव अग्रे क्र डा भ वष्य त) ।

नयमः — यदा पदस्य अन्ते ‘म्’-वणः, वसगः (◌ः) अनुस्वारः (◌ं) वा भव त, तदा तेभ्यः पूव ं व्यञ्जनवण स्वीकृत्य एव अ ग्रमं पदं
वक्तव्यम् ।
[जब शब्द के अन्त म ‘म्’, वसग या अनुस्वार हो, तब उनसे पहले वाला व्यञ्जन लेकर ही अगला शब्द बोलना चा हए।]
पुस्तक का उदाहरण कैसे चला —

छात्रः पदम् अ न्तमः पूणव्यञ्जनः अगला पद कससे

पथमः रामः म् ( वसग से पूव) म

ि तीयः मानवः व् ( वसग से पूव) व

ततृ ीयः वनम् न् (‘म्’ से पूव) न

चतुथः नकु ल ः ल् ल

नमूना उत्तरम् (आगे का क्रम) — नकुलः → लता → तरुः → र वः → वनम् → नद → दयालुः → ल◌ेखनी → नगरम् →
ग◌ृहम् …

ध्यान द: ‘वनम्’ का अ न्तम वण दे खने म ‘म्’ है, पर नयम के अनुसार उससे पहले का न् लया जाता है —
इसी लए अगला शब्द ‘नकुलः’ रखा गया।

प्र.2 क्रयापदानां स्मरणक्र डा । छात्राः क्रयापदानां स्मरणक्र डां कतु शक्नुव न्त । यथा — प्रथमः छात्रः — गच्छ त,
द्वतीयः छात्रः — गच्छ त पठ त, तृतीयः छात्रः — गच्छ त पठ त लख त, चतुथः छात्रः — गच्छ त पठ त लख त
नय त ।

क्र डायाः नयमः — पहला छात्र एक क्रयापद बोलता है; दूसरा छात्र उसे दोहराकर एक नया क्रयापद जोड़ता है; तीसरा छात्र
पहले दोन बोलकर तीसरा जोड़ता है — इसी प्रकार ंखला बढ़ती जाती है। जो क्रम भूल जाए, वह खेल से बाहर।
नमूना उत्तरम् —

1. प्रथमः छात्रः — पब त
2. तीयः छात्रः — पब त खाद त
3. तृतीयः छात्रः — पब त खाद त धाव त

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 6 क्र डाम वयं ोकान्त्याक्षरीम्
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4. चतुथः छात्रः — पब त खाद त धाव त क्र ड त
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5. पञ्चमः छात्रः — पब त खाद त धाव त क्र ड त हस त
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6. षष्ठः छात्रः — पब त खाद त धाव त क्र ड त हस त शृणो त

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gl क्या सीखते ह: ये सब लट्-लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन के रूप ह। खेल-खेल म स्मरणश क्त के साथ-साथ
aइससे
धातु-रूप भी याद हो जाते ह। क ठनाई बढ़ाने के लए बहुवचन म खे लए — पब न्त, खाद न्त, धाव न्त, क्र ड न्त,

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हस न्त, शृण्व न्त ।

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वणलेखन्या अधो ल खतं ोकं पूरयन्तु — (पुस्तके बन्दुरेखा भः ल खतः ोकः)
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पुस्तक मm . a
है।a s e पृष्ठ 70 पर बन्दुओं (डॉटे ड अक्षर ) म जो ोक छपा है, उस पर वणलेखनी (सुलेख-कलम) से लखकर उसे पूरा करना

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वह ोक है —
क्षणशः कणशश्चैव वद्यामथ च साधयेत् ।

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coनष्टेmवद्या कुतः ? कणे नष्टे धनं कुतः ? agl
क्षणे न े कुतो वद्या कणे न े कुतो धनम् ॥

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अन्वयः — क्षणशः वद्यां कणशः च एव अथ साधयेत् । क्षणे
अथः — क्षण-क्षण करके वद्या और कण-कणlकरक
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कमाना चा हए। (क्य क) क्षण नष्ट हो जाने पर वद्या कहाँ से मलेगी और
कण नष्ट हो जाने पर धन कहाँ से मलेगा?

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भावः — यह ोक पाठ के सातव ोक (शनैः प ाः शनैः क ा…) का ही साथी है। बड़ी वद्या और बड़ा धन

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एक दन म नह बनते — वे छोटे -छोटे क्षण और कण के जुड़ने से बनते ह। जो एक-एक क्षण गँवाता है, वह अन्त

e mपूरी वद्या गँवा बैठता है। a
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लेखन-सङ् केत: लखते समय क्षणशः / कणशः के वसग तथा साधयेत् / न े के हलन्त और संयुक्ताक्षर (ष्ट, श्च)
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सावधानी से बनाइए। कणशश्चैव = कणशः + च + एव ( वसग-स न्ध तथा वृ द्ध-स न्ध)।
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अध्याय — एक नज़र म
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m .cपाठ का ढाँचा — आरम्भ म चत्रकथा (संवाद) है : बाहर वषा हो रही है, अतःaसgखयाँ घर के भीतर ही अन्त्याक्षरी क्र डा
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खेलने का नश्चय करती ह। शेष पाठ वद्या- वषयक दस सुभा षत ोक का संग्रह है, जनके साथ पुस्तक म पदच्छे दः,
अन्वयः और भावाथः दए गए ह।
.c
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comोक आरम्भ करता है। अन्त म य द म्, वसगः (◌ः) या अनुस्वारः (◌ं) हो, aतोgla
खेल का नयम — तस्य पद्यस्य अ न्तमेन व्यञ्जनवणन तीयगणस्य सदस्यः अन्यं ोकं गाय त — जो गण ोक बोलता
है, उसके अ न्तम व्यञ्जन से अगला गण नया
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उससे ठ क पहले वाला व्यञ्जन लया जाता है।
दस ोक क शृंखला —ag
कशुकाः (क्) → काव्यशास्त्र… → वा (व्) → वद्या ववादाय… → रक्षणाय (य्) → येषां न
वद्या… → चर न्त (त्) → तदा वृ त्तश्च… → भवेत्तव (व्) → वद्या नाम… → पशुः (श्) → शनैः प ाः… → शनैः (न्) → न

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वद्यया वना… → समाचरेत् (त्) → ताराणां भूषणं… → भूषणम् (ण्/न्) → न चोरहायम्…
मुख्य भाव — रूप, यौवन और ऊँचा कुल तभी शोभा दे ते ह जब साथ म वद्या हो; बु द्धमान का समय काव्य-शास्त्र म और
मूख का समय व्यसन, न द तथा कलह म बीतता है; एक ही वद्या दुजन के हाथ म ववाद और सज्जन के हाथ म ान बन
जाती है।
वद्याधन सव ेष्ठ है — उसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छ न सकता है, न भाइय म बाँटना पड़ता है, न वह बोझ बनता है;
व्यये कृते वधत एव नत्यम् — खच करने पर वह घटता नह , बढ़ता ही है।
व्याकरण- बन्दु — पाठ म वद्या (आकारान्त स्त्री लङ्ग) शब्द के सात वभ क्तय के रूप दए गए ह; अभ्यास म वभ क्त
और वचन पहचानना, रेखां कत पद के आधार पर प्रश्न नमाण (कस्याः, कस्य, केषां, के, का, कम्, केन, क दृशाः) तथा
मञ्जूषा से चतुथ -रूप भरना — ये तीन कौशल परखे गए ह।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ कहाँ आया

कशुकाः पलाशवृक्षाः ढाक / टे सू के पेड़ (सुन्दर पर गन्धहीन) ोक १

नगन्धाः गन्धहीनाः गन्धर हत ोक १

धीमताम् बुिद्धमताम् बु द्धमान लोग का ोक २

व्यसनेन भोगिवलासे न भोग- वलास/बुरी लत के ारा ोक २

मदाय गव य अ भमान के लए ोक ३

प रपीडनाय कष्टदानाय कष्ट दे ने के लए ोक ३

खलः दुष्टः दुजन ोक ३

शीलम् वृत्त म् च रत्र ोक ४

भारभूताः भारकराः भार-स्वरूप ोक ४

वृ त्तः उद्योगः आजी वका ोक ५

तत्त्व ानम् वास्तिवकं ानम् यथाथ ान ोक ५

प्रच्छन्नगुप्तम् आवृतं रिक्षतं च ढँ का हुआ और सुर क्षत ोक ६

क ा पुर ातनवस्त्रैः िनिमतम् आस्तरणम् जीण वस्त्र से बनी मोट चादर ोक ७

ुवम् िस्थरम् न श्चत रूप से ोक ८

सुमम् कु सुम म् पुष्प ोक ९

ातृभाज्यम् भात-ृ भिगनीषु िवभाजनयोग्यम् भाई-बहन म बाँटने योग्य ोक १०

सवधनप्रधानम् सवषु धनेष ु मुख्यम् सभी धन म प्रमुख ोक १०

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 7
TypeSolution
Pages27
Updated19 Sep 2026