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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम्

AglaSem पर कक्षा 7 संस्कृत पाठ 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम् (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 7 (Deepakam).
NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम् - Page 1 of 39

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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा7

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 7: ईशावास्यम् इदं सवम्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

71 – 84 12 73 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 38 pages

Page 2

कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: ईशावास्यम् इदं सवम्
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के सप्तमः पाठः — ईशावास्यम् इदं सवम् के सम्पूण हल। यह पाठ एक नाटक (रूपकम्) है।
कक्षा म आचाया बालक को बताती ह क ईश्वर केवल दे वालय म नह , सवत्र व्याप्त है — और इसी बात को सद्ध करने के लए प्र ाद- हरण्यक शपु
का प्रसंग नाटक-रूप म प्रस्तुत होता है। व्याकरण क दृ से पाठ दो बन्दुओं पर के न्द्रत है — तृतीया वभ क्त (उपकरण तथा क्रया वशेषण-
स्वभाववाचक शब्द म) और लृट् लकार (भ वष्यत् काल)। नीचे पृष्ठ 71 से 84 तक के पाठगत प्रश्न, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–८ (प्रत्येक
उपभाग स हत), योग्यता वस्तारः, प रयोजनाकायम् तथा कायकलापः क्रम से हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 7) 71 – 84

खं ड प्रश्न

12 73

माध्यम

हन्द

पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 71–75
पाठः — ईशावास्यम् इदं सवम् (नाटकम्)

पाठः

प्र.1 अ य भोः बालाः ! क भवन्तः जान न्त ‘ईश्वरः कुत्र अ स्त’ ?

आम् आय ! ईश्वरः सवत्र अ स्त। सः न केवलं दे वालये, अ पतु वृक्षे, कक्षायाम्, शलायां, क्र डाङ्गणे च व्याप्तः अ स्त।

छात्राणाम् उत्तरम् — मान्ये ! ईश्वरः दे वालये भवित।

आचाय याः शु ीकरणम् — वत्साः ! ईश्वरः न के वलं दे वालये अिपत ु सवत्र व्याप्तः अिस्त।

हन्द अथ: ‘अरे ब ो ! क्या तुम जानते हो क ईश्वर कहाँ है ?’ — ब ने पहले उत्तर दया, ‘माननीया ! ईश्वर
म न्दर म होता है।’ इस पर आचाया ने कहा, ‘ब ो ! ईश्वर केवल म न्दर म ही नह , ब ल्क सब जगह व्याप्त है।’ यही
पूरे पाठ का मूल वषय है।

व्याकरण-सङ् केत: कुत्र = कहाँ (स्थानवाचक प्रश्नवाचक अव्यय)। भवन्तः — ‘भवत्’ शब्द का प्रथमा वभ क्त,
बहुवचन, पुँ ल्लङ्ग रूप; यह आदरसूचक सवनाम है, अतः इसके साथ क्रया प्रथमपुरुष बहुवचन (जान न्त) आती
है, ‘जानीथ’ नह ।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 क ‘ईशावास्य मदं सव’ इ त न ुतवन्तः ? — नैव आय ! तस्य कः अथः ?

एतत् सव जगत् ईशेन व्याप्तम् अ स्त। ईश्वरः सवत्र अ स्त इ त अथः।

पदच्छे द ः — ईशावास्यम् + इदम् + सवम्

ईशा (ईशेन ) = ईश्वर के द्वारा • वास्यम् = व्याप्त / आच्छािदत

इदं सवम् = यह सब कु छ (यह समस्त जगत्)

अथ ः — यह सम्पूण जगत् ईश्वर से व्याप्त है।

हन्द अथ: ‘क्या तुमने ईशावास्य मदं सवम् — यह नह सुना ?’ ‘नह आय ! उसका क्या अथ है ?’ — आचाया ने
उत्तर दया, ‘यह सारा संसार ईश्वर से व्याप्त है; अथात् ईश्वर सब जगह है।’

क्या आप जानते ह ? यह वाक्य ईशोप नषद् (शुक्ल यजुवद) के प्रथम मन्त्र का आरम्भ है — ‘ईशावास्य मदं सव
य त्कञ्च जगत्यां जगत्।’ इसी से इस उप नषद् का नाम ईशोप नषद् पड़ा और इसी से इस पाठ का शीषक लया गया
है।

प्र.3 मान्ये ! ईश्वरः वृक्षे, कक्षायां, शलायां, क्र डाङ्गणे चा प अ स्त कम् ?

आम्, ईश्वरः वृक्षे, कक्षायां, शलायां, क्र डाङ्गणे च — सवत्र अ स्त। यतः ‘ईशावास्यम् इदं सवम्’ इ त उप नषद्वचनम् अ स्त।

पदम् वभ क्तः / वचनम् हन्द अथ

वृक्षे स तमी, एकवचन (वृ — पुँ०)
प् क्ष वृक्ष म

कक्षायाम् स तमी, एकवचन (क ा —
प् क्ष स्त्र ी०) कक्षा म

िशलायाम् स तमी, एकवचन (िशला —
प् स्त्र ी०) शला (पत्थर) म

क्रीडाङ् गणे स तमी, एकवचन (क्रीडाङ् गण — नपुं०)
प् खेल के मैदान म

क्य : यहाँ प्रत्येक पद म अ धकरण (आधार) का अथ है — ‘ कस म ?’ — इस लए सभी म सप्तमी वभ क्त
प्रयुक्त हुई है। पाठ का उत्तर यही है क ईश्वर कसी एक आधार तक सी मत नह ; वह सब आधार म समान रूप से
वद्यमान है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 हो लका — कथं मां स्मर स ? कमथ दुः खतः भा स ? क कारणम् अस्य दुःखस्य ?

हरण्यक शपोः दुःखस्य कारणम् एतत् — तस्य पुत्रः एव तस्य शत्रुः जातः। प्र ादः अह नशं तस्य शत्रोः हरेः गुणगानं करो त।

िहरण्यकिशपोः उत्तरम् — ‘अनुजे ! त्वं जानािस एव, मम पुत्रः एव मम शत्रःु जातः।’

होिलकायाः आश्वासनम् — ‘भ ातः ! अलं िच न्तया, बह्मणः वरपसादात् अिग् नः मां न दहित , अहं ज्वालियष्यािम

प ादम्। आ श्वस्तो भव।’

हन्द अथ: हो लका पूछती है — ‘तुम मुझे कैसे याद कर रहे हो ? कस लए दुःखी लग रहे हो ? इस दुःख का क्या
कारण है ?’ हरण्यक शपु बताता है क उसका अपना पुत्र ही उसका शत्रु बन गया है। तब हो लका कहती है — ‘भाई
! चन्ता मत करो; ब्रह्मा के वरदान से अ ग्न मुझे नह जलाती, म प्र ाद को जला दूँ गी।’

शब्दाथ: भा स = प्रतीयसे (लग रहे हो)। अलं चन्तया = चन्तां मा कुरु — ‘अलम्’ के योग म तृतीया वभ क्त
आती है, इसी लए ‘ चन्तया’ रूप बना। वरप्रसादात् = वरदान के कारण (पञ्चमी — हेतु)।

प्र.5 आः, नारायण ! नारायण ! दशय, कुत्र अ स्त तव नारायणः ? — क ते ह रः अत्र अ स्त ? तत्र अ स्त ? सोपानेषु
अ स्त ? अथवा अ स्मन् स्तम्भे अ स्त ?

प्र ादस्य उत्तरम् — ‘तात ! ीह रः तु सवत्र अ स्त। नूनं ह रः सवत्र अ स्त। अ स्मन् स्तम्भे अ प अ स्त।’

िहरण्यकिशपुः — आः, मूढ ! पश्य पश्य, अने न खड् गेन स्त म्भं भङ् क्ष्यािम।

पिरणामः — (िहरण्यकिशपुः स्त म्भं पहरित। महता गजने न न ृिसंहः स्त म्भात् बिहः आगच् छित।)

हन्द अथ: हरण्यक शपु व्यंग्य से पूछता है — ‘ दखा, तेरा नारायण कहाँ है ? क्या वह यहाँ है ? वहाँ है ? सी ढ़य
म है ? या इस खम्भे म है ?’ प्र ाद नभय होकर कहता है — ‘ पताजी ! ीह र तो सवत्र ह; नश्चय ही इस खम्भे म
भी ह।’ यही उत्तर कथा का नणायक मोड़ है — इसी पर नृ सह स्तम्भ से प्रकट होते ह और ‘ईशावास्यम् इदं सवम्’
सद्ध हो जाता है।

व्याकरण-सङ् केत: अनेन खड् गेन — ‘खड् ग’ यहाँ उपकरण (करण) है, अतः तृतीया वभ क्त, एकवचन,
पुँ ल्लङ्ग। महता गजनेन भी तृतीया एकवचन (नपुंसक लङ्ग) है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
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em वद य
प्र.6 नृ सहः — मूढ ! पश्य, न त्वम स भु व, न च स्वग ; न वा पाताले, न च आकाशे ; न गृहाभ्यन्तरे, ब हभागे वा ; नायं

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म।o — अस्य पद्यांशस्य अन्वयः, अथः, भावः च लख्यताम्। gl
दवसो, न वा रा त्रः ; नाहं मनुष्यो, न च पशुः ; न अस्त्रेण, न च शस्त्रेण ; नजनखैः तव वक्षःस्थलं
ह नष्या.c
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अन्वयः —

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मूढ ! पश्य — त्वम् भुिव न अिस, स्वग च न (अिस) ; पाताले वा न, आकाशे च न ;

गृहाभ्यन्तरे न, बिहभ गे वा न ; अयं िदवसः न, राित्रः वा न ;

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अहं मनुष्यः न, पशुः च न ; (अहं त्वाम्) अस्त्रेण न, शस्त्रेण च न (हिनष्यािम) ;

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(अहं) िनजनखैः तव वक्षःस्थलं िवदीय हिन ष्यािम।
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l ( हन्द ) — ‘मूख ! देख — तू न पृथ्वी पर है, न स्वग म; न पाताल म, न आकाश म; न घर के भीतर, न बाहर। यह न दन है,
gअथः
a न रात। म न मनुष्य ँ, न पशु। न अस्त्र से, न शस्त्र से — अपने ही नाखून से तेरा वक्षःस्थल चीरकर तुझे मारूँगा।’
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भावः: हरण्यक शपु ने ब्रह्मा से वर पाया था कm
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उसक मृत्यु न दन म हो न रात म, न घर के भीतर न बाहर, न
मनुष्य से न पशु से, न अस्त्र से न शस्त्र सेl।aनृ सह ने वरदान का एक भी शब्द तोड़े बना — सन्ध्याकाल म (न दन, न
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रात), दे हली पर (न भीतर, न बाहर), नर- सह रूप म (न मनुष्य, न पशु), नख से (न अस्त्र, न शस्त्र) — उसका वध
कया। भाव यह है क अधम चाहे कतना भी चतुर हो, धम उससे अ धक चतुर होता है; और ईश्वर हर सीमा से
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परे, सवत्र वद्यमान है।
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a s eव्याकरण-सङ्
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केत: नजनखैः = अपने नाखून से — तृतीया वभ क्त, बहुवचन, पुँ ल्लङ्ग (करण अथ म)। अस्त्रेण
a / शस्त्रेण — तृतीया एकवचन, नपुंसक लङ्ग। वद य = वद ण करके (ल्यप् प्रत्यय)। ह नष्या म = हन् धातु, लृट्
लकार, उत्तमपुरुष एकवचन।
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प्र.7
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अध्या पका — एवं बालः प्र ादः ईश्वरः सवत्र अ स्त इ त द शतवान्। अत एव उच्यते, ‘ईशावास्यम् इदं सवम्’ इ त।

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— अस्य नाटकस्य सन्दे शः कः ?

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अस्य नाटकस्य सन्दे शः — ईश्वरः सवत्र व्याप्तः अ स्त; सत्य नष्ठा भ क्तः च कदा प न पराजीयते।

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ईश्वरः सवत्र अ स्त — (ईश्वर सब जगह है) — प्र ाद ने यह वचन से नह , अपने जीवन से सद्ध कया।
बालोऽ प सत्यं वक्तुं शक्नो त — (छोटा बालक भी सत्य कह सकता है) — प्र ाद अल्पवयस्क था, फर भी राजा के सामने
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नभय रहा।
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अहङ् कारः वनाशस्य मूलम् — (अहंकm
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a अन्त बना।
ार ही वनाश क जड़ है) — हरण्यक शपु ‘अहम् एव सवश क्तमान् अ स्म, अहम्

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अमरः अ स्म’ कहता था; वही उसका

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

वरस्य दुरुपयोगः स्वस्य एव नाशं करो त — (वरदान का दुरुपयोग स्वयं का ही नाश करता है) — हो लका इसका प्रत्यक्ष
उदाहरण है।

क्य : पाठ का आरम्भ कक्षा के प्रश्न से होता है और अन्त उसी प्रश्न के उत्तर पर — यह नाटक का सुन्दर चक्राकार
गठन है। बीच क पूरी कथा केवल एक वाक्य को सद्ध करने के लए है — ‘ईशावास्यम् इदं सवम्’।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 79
अभ्यासः — प्रश्नः १ : अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरा ण लखन्तु

अभ्यासः

प्र.1 (क) दै त्यराजः कः ?

हरण्यक शपुः। (दै त्य का राजा हरण्यक शपु है।)

पाठे — ‘राजािधराजः राजगम्भीरः त्रैलोक्यािधपितः दे वािधदे वः दै त्यराजः िहरण्यकिशपुः आगच् छित।’

क्य यही उत्तर: ‘कः ?’ पुँ ल्लङ्ग प्रथमा एकवचन का प्रश्न है, अतः उत्तर भी प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुँ ल्लङ्ग
— हरण्यक शपुः म ही होगा। एकपदे न उत्तर दे ना है, इस लए केवल एक ही पद लख।

प्र.1 (ख) के हरण्यक शपुं ध्याय न्त ?

जनाः। (लोग हरण्यक शपु का ध्यान करते ह।)

पाठे — ‘सवत्र जनाः मामेव ध्यायिन्त खलु !’ इित िहरण्यकिशपुः वदित।

व्याकरण: ‘के ?’ = प्रथमा वभ क्त, बहुवचन, पुँ ल्लङ्ग ( कम् शब्द)। अतः उत्तर भी बहुवचन म — जनाः। क्रया
‘ध्याय न्त’ भी प्रथमपुरुष बहुवचन है, जो उत्तर के बहुवचन होने क पु करती है।

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प्र.1 (ग) क दे वेभ्यः न दास्य न्त ?

यज्ञभागा दकम्। (यज्ञ का भाग आ द दे वताओं को नह दगे।)

पाठे — ‘इतः परं यज्ञभागािदकम् अिप दे वेभ्यः न कोऽिप दास्यिन्त।’

शब्दाथ: यज्ञभागः = ह वः (यज्ञ क आहु त)। दे वेभ्यः — ‘दे व’ शब्द का चतुथ वभ क्त, बहुवचन रूप, क्य क
‘दा’ (दे ना) धातु के कम-सम्प्रदान म चतुथ आती है। दास्य न्त = दा धातु, लृट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन।

प्र.1 (घ) कस्य दलनेन अ प सः जीव त ?

गजस्य। (हाथी के कुचलने पर भी वह — प्र ाद — जी वत रहता है।)

पाठे — ‘स्वािमन् ! गजस्य पद -दलने न अिप सः जीवित।’

व्याकरण: प्रश्न ‘कस्य ?’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन म है, अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन म — गजस्य। ध्यान द क
‘दलनेन’ तृतीया वभ क्त म है, क्य क वह साधन (करण) है — ‘कुचलने से’।

प्र.1 (ङ) राक्षसाः कुतः प्र ादं पा ततवन्तः ?

उत्तुङ्ग शखरात्। (राक्षस ने प्र ाद को ऊँचे पवत के शखर से गराया।)

ु ् गिशखरात् तं पािततवन्तः। तथािप सः न मृत ः।’
पाठे — ‘भवदाज्ञया वयम् उत्तङ

व्याकरण: कुतः = कहाँ से (अपादान का प्रश्न)। उत्तर पञ्चमी वभ क्त, एकवचन म आएगा — उत्तुङ्ग शखरात्।
‘जहाँ से अलगाव हो, वहाँ अपादान म पञ्चमी’ — यही नयम यहाँ लागू है।

शब्दाथ: उत्तुङ्ग शखरात् = उन्नतपवतस्य अग्रभागात् (ऊँचे पवत क चोट से)।

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प्र.1 (च) हरण्यक शपुः कस्मात् वरं प्राप्तवान् ?

ब्रह्मदे वात्। ( हरण्यक शपु ने ब्रह्मदे व से वरदान पाया था।)

पाठे — ‘अहं बह्मदे वात् वरं पाप्य अमरः अिस्म।’ तथा ‘रे मूख ! अधम ! त्वं बह्मदे वात् वरं पाप्तवान् अिस।’

व्याकरण: ‘कस्मात् ?’ = कससे — पञ्चमी वभ क्त, एकवचन, पुँ ल्लङ्ग ( कम् शब्द)। अतः उत्तर भी पञ्चमी
एकवचन म — ब्रह्मदे वात्। यहाँ पञ्चमी अपादान ( जससे प्रा प्त हो) का बोध कराती है।

प्र.1 (छ) ह रः कुत्र अ स्त इ त कः वद त ?

प्र ादः। (प्र ाद कहता है क ह र सवत्र ह।)

पाठे — ‘तात ! ीहिरः तु सवत्र अिस्त।’ ‘नून ं हिरः सवत्र अिस्त। अिस्मन् स्तम्भे अिप अिस्त।’

क्य यही उत्तर: प्रश्न का मुख्य पद ‘कः वद त ?’ है — अथात् कता कौन है। कता म प्रथमा वभ क्त आती है,
इस लए उत्तर प्र ादः (प्रथमा, एकवचन, पुँ ल्लङ्ग) है, ‘प्र ादम्’ नह ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 80
अभ्यासः — प्रश्नः २ : अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् पूणवाक्येन उत्तरा ण लखन्तु

अभ्यासः

प्र.2 (क) के भीताः तष्ठ न्त ?

सुराः असुराः यक्ष-गन्धव- कन्नराः च सव भीताः तष्ठ न्त।

पाठे — ‘सत्यं दै त्यराज ! सुराः असुराः यक्ष-गन्धव-िक न्नराः भवतः सव भीताः ित ष्ठिन्त।’

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हन्द अथ: दे वता, असुर तथा यक्ष-गन्धव- कन्नर — ये सब आपसे ( हरण्यक शपु से) डरे हुए रहते ह। यह मन्त्री का
कथन है, जो हरण्यक शपु के भय-राज्य को दखाता है।

शब्दाथ: यक्षाः = कुबेरस्य अनुचराः; गन्धवाः = दव्यगायकाः; कन्नराः = कम्पुरुषाः (दे वानां जा त वशेषः)। ये तीन
दे वयो न क जा तयाँ ह।

प्र.2 (ख) प्र ादः अह नशं क करो त ?

प्र ादः अह नशं हरेः गुणगानं करो त।

पाठे — ‘कु लकलङ् कः सः प ादः अहिन शं मम शत्रोः हरेः गुणगानं करोित।’

हन्द अथ: प्र ाद दन-रात ह र ( वष्णु) का गुणगान करता है। हरण्यक शपु के लए ह र शत्रु ह, इस लए वह अपने
ही पुत्र को ‘कुलकलङ् कः’ (वंश को कलं कत करने वाला) कहता है।

व्याकरण-सङ् केत: अह नशम् = अहोरात्रः ( दन-रात) — यह क्रया वशेषण अव्यय है, अतः इसका रूप कभी नह
बदलता। हरेः — ‘ह र’ (इकारान्त पुँ ल्लङ्ग) का षष्ठी वभ क्त, एकवचन।

प्र.2 (ग) प्र ादं कथं समुद्रे क्षप्तवन्तः ?

रज्ज्वा बद्ध्वा प्र ादं समुद्रमध्ये क्षप्तवन्तः।

पाठे — ‘रज्ज्वा ब व् ा समुद मध्ये िक्षप्तवन्तः। तथािप...’

हन्द अथ: उन्ह ने प्र ाद को रस्सी से बाँधकर समुद्र के बीच म फक दया — फर भी वह जी वत रहा। ‘कथम्’
(कैसे) का उत्तर यहाँ साधन बताकर दया गया है।

व्याकरण-सङ् केत: रज्ज्वा = रस्सी के द्वारा — ‘रज्जु’ (ऊकारान्त स्त्री लङ्ग) का तृतीया वभ क्त, एकवचन; करण
(उपकरण) के अथ म तृतीया आती है — यही इस पाठ का व्याकरण-सूत्र है। बद्ध्वा = बाँधकर (क्त्वा प्रत्यय)।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
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नृ सहः कथं ब हः आगच्छ त ?
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agl महता गजनेन स्तम्भात् ब हः आगच्छ त।
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पाठे — ‘(िहरण्यकिशपुः स्त म्भं पहरित। महता गजने न न ृिसंहः स्त म्भात् बिहः आगच् छित।)’
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हन्द अथ: हरण्यक शपु ने खम्भे पर प्रहार कया और भारी गजना के साथ नृ सह खम्भे से बाहर नकल आए। इस
प्रकार प्र ाद का वचन — ‘अ स्मन् स्तम्भे अ प अ स्त’ — अक्षरशः सत्य सद्ध हुआ।
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gषण ‘महत्’ भी वशेष्य के
m .c केत: महता गजनेन — तृतीया वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग ( वशे
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l a seसार तृतीया म)। स्तम्भात् — पञ्चमी एकवचन (अपादान — जससे बाहर आना)।
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हरण्यक शपुः केन स्तम्भं भङ् क्ष्या म इ त.c
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हरण्यक शपुः खड् गेन स्तम्भं भङ् क्ष्या म इ त वद त।

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—o ‘आः, मूढ ! प य प य, अने न खड् गेन त भं भङ् यािम।’
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हन्द अथ: हरण्यक शपु कहता है क ‘इस तलवार से म खम्भे को तोड़ दूँ गा।’ ‘केन ?’ ( कससे) का प्रश्न सीधे
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करण पूछ रहा है, अतः उत्तर तृतीया वभ क्त म दे ना अ नवाय है।
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व्याकरण-सङ् केत: खड् गेन — ‘खड् ग’ (अकारान्त पुँ ल्लङ्ग) का तृतीया वभ क्त, एकवचन। भङ् क्ष्या म = भञ्ज्

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धातु, लृट् लकार, उत्तमपुरुष एकवचन (‘तो ग
ँ ा’)।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यासः — प्रश्नः ३ : उदाहरणानुसारं रक्तस्थाना न पूरयन्तु (तृतीया- वभक्तेः रूपा ण)

अभ्यासः

प्र.3 (क) (क) रामेण — रामाभ्याम् — रामैः [उदाहरणम् — पुस्तके पूवमेव पू रतम्]

यह पुस्तक म दया गया उदाहरण है। तीन वचन म तृतीया वभ क्त के रूप इस प्रकार ह —

एकवचनम् — रामेण • िद्ववचनम् — रामाभ्याम् • बहुवचनम् — रामैः

(राम के द्वारा • दो रामों के द्वारा • बहत
ु रामों के द्वारा)

सम्पूण पू रत ता लका (क से ज तक) —

क्रमः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

(क) रामेण रामाभ्याम् रामैः

(ख) चमसे न चमसा याम् भ् चमसै ः

(ग) आचायण आचाय याम् भ् आचायः

(घ) आस दे न न् आस दा याम्
न् भ् आसन्दै ः

(ङ) बािलकया बािलका याम् भ् बािलकािभः

(च) पेिटकया पेिटकाभ्याम् पेिटकािभः

(छ) िमत्रेण िम ा याम्
त्र भ् िम ैः
त्र

(ज) व ेण
स्त्र व ा याम्
स्त्र भ् वस्त्रैः

पहचानने का नयम: तृतीया वभ क्त के प्रत्यय शब्द के अन्त्य स्वर पर नभर ह —
• अकारान्त पुँ ल्लङ्ग / नपुंसक लङ्ग (राम, चमस, आचाय, आसन्द, मत्र, वस्त्र) → –एन / –आभ्याम् / –ऐः
• आकारान्त स्त्री लङ्ग (बा लका, पे टका) → –या / –आभ्याम् / –आ भः

ध्यान द: ‘रामेण’ म ‘न’ का ‘ण’ हो गया — यह णत्व- वधान है (र्, ऋ, ष् के बाद न् → ण्)। इसी लए वृक्ष →
वृक्ष◌ेण, आचाय → आचाय◌ेण, कन्तु मत्र → मत्र◌ेण तथा वस्त्र → वस्त्र◌ेण भी ‘ण’ ही लेते ह, जब क चमस →
चमस◌ेन म ‘न’ ही रहता है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 (ख) (ख) चमसेन — ............... — ...............

चमसेन — चमसाभ्याम् — चमसैः

मूलशब्दः — चमस (अकारान्त, पुँि लङ् गः) — अथः ‘यज्ञपात्रम्’ (चमचा / कटोरा)

एकवचनम् — चमसेन (चमस के द्वारा)

िद्ववचनम् — चमसाभ्याम् (दो चमसों के द्वारा)

बहवु चनम् — चमसैः (बहत
ु चमसों के द्वारा)

क्य ‘चमसेन’, ‘चमसेण’ नह : णत्व- वधान तभी लगता है जब शब्द म र्, ऋ या ष् पहले आया हो। ‘चमस’ म
ऐसा कोई वण नह है, इस लए यहाँ ‘न’ ही रहता है — जैसे ‘बालकेन’, ‘ शक्षकेन’।

प्र.3 (ग) (ग) आचायण — ............... — आचायः

आचायण — आचायाभ्याम् — आचायः

िरक्तस्थानम् (िद्ववचनम्) — आचाय भ्याम्

अथः — आचायण = आचाय के द्वारा • आचाय भ्याम् = दो आचाय ं के द्वारा • आचायः = आचाय ं के द्वारा

व्याकरण: ‘आचाय’ अकारान्त पुँ ल्लङ्ग है और ‘राम’ क भाँ त चलता है। द्ववचन म अन्त्य ‘अ’ द घ होकर ‘आ’ हो
जाता है और उसम ‘–भ्याम्’ जुड़ता है → आचाय + आभ्याम् = आचायाभ्याम्।

वाक्यप्रयोगः: आचायण छात्राः पा ठताः। (आचाय के द्वारा छात्र पढ़ाए गए।)

प्र.3 (घ) (घ) ............... — ............... — आसन्दै ः

आसन्दे न — आसन्दाभ्याम् — आसन्दै ः

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दत्तम् — बहवु चनम् आसन्दै ः → अतः मूलशब्दः आसन्द (अकारान्त, पुँि लङ् गः) — अथः ‘कु स ’

एकवचनम् — आसन्दे न • िद्ववचनम् — आसन्दाभ्याम्

उलट दशा म कैसे सोच: बहुवचन का रूप ‘–ऐः’ पर समाप्त हो रहा है, अतः शब्द न श्चत रूप से अकारान्त है
(आकारान्त स्त्री लङ्ग होता तो ‘–आ भः’ आता)। ‘आसन्दै ः’ म से ‘–ऐः’ हटाने पर मूलशब्द ‘आसन्द’ मलता है; अब
उसी से एकवचन और द्ववचन बना ली जए।

प्र.3 (ङ) (ङ) बा लकया — ............... — बा लका भः

बा लकया — बा लकाभ्याम् — बा लका भः

िरक्तस्थानम् (िद्ववचनम्) — बािलकाभ्याम्
मूलशब्दः — बािलका (आकारान्त, स्त्रीिलङ् गः)

अथः — बािलका के द्वारा • दो बािलकाओं के द्वारा • बािलकाओं के द्वारा

व्याकरण: आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द (बा लका, श क्षका, छात्रा, गदा) म तृतीया के प्रत्यय ह — –या / –आभ्याम् /
–आ भः। इसी लए यहाँ ‘बा लकेन’ या ‘बा लकैः’ लखना अशुद्ध होगा।

प्र.3 (च) (च) ............... — पे टकाभ्याम् — ...............

पे टकया — पे टकाभ्याम् — पे टका भः

दत्तम् — िद्ववचनम् पेिटकाभ्याम् → मूलशब्दः पेिटका (आकारान्त, स्त्रीिलङ् गः) — अथः ‘सन्दू क / िडब्बा’

एकवचनम् — पेिटकया • बहुवचनम् — पेिटकािभः

क्य : ‘–आभ्याम्’ रूप अकारान्त और आकारान्त दोन म एक-सा दखता है, इस लए लङ्ग क पहचान शब्द से
करनी होती है। ‘पे टका’ आकारान्त स्त्री लङ्ग है, अतः एकवचन म –या और बहुवचन म –आ भः लगेगा — ठ क
‘बा लका’ क तरह।

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प्र.3 (छ) (छ) मत्रेण — ............... — ...............

मत्रेण — मत्राभ्याम् — मत्रैः

मूलशब्दः — िमत्र (अकारान्त, नपुंसकिलङ् गः) — अथः ‘िमत्र / सूय’

एकवचनम् — िमत्रेण • िद्ववचनम् — िमत्राभ्याम् • बहुवचनम् — िमत्रैः

ध्यान रखने योग्य: तृतीया, चतुथ , पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी म अकारान्त पुँ ल्लङ्ग और अकारान्त नपुंसक लङ्ग के
रूप एक समान होते ह (जैसे ‘वन’ — वनेन, वनाभ्याम्, वनैः)। अन्तर केवल प्रथमा और द्वतीया वभ क्त म दखाई
दे ता है।

वाक्यप्रयोगः: अहं मत्रेण सह क्र डा म। (म मत्र के साथ खेलता ँ।) — ‘सह’ के योग म भी तृतीया आती है।

प्र.3 (ज) (ज) ............... — ............... — वस्त्रैः

वस्त्रेण — वस्त्राभ्याम् — वस्त्रैः

दत्तम् — बहुवचनम् वस्त्रैः → मूलशब्दः वस्त्र (अकारान्त, नपुंसकिलङ् गः) — अथः ‘कपड़ ा’

एकवचनम् — वस्त्रेण (वस्त्र के द्वारा) • िद्ववचनम् — वस्त्राभ्याम् (दो वस्त्रों के द्वारा)

क्य ‘वस्त्रेण’: ‘वस्त्र’ म ‘र्’ वद्यमान है, अतः णत्व- वधान के कारण प्रत्यय का ‘न’ बदलकर ‘ण’ हो जाता है —
वस्त्र + एन = वस्त्रेण। यही नयम ‘ मत्रेण’, ‘पत्रेण’, ‘नेत्रेण’ म भी काम करता है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 80–81

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यासः — प्रश्नः ४ : उदाहरणानुसारं रेखाङ् कतपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुवन्तु
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अभ्यासः

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a s emहरण्यक शपुः आगच्छ त। [उदाहरणम् — कः आगच्छ त ?]
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प्र.4 (क)

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कः आगच्छ त ? (कौन आ रहा है ?)
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रेखािङ् कतपदम् — िहरण्यकिशपुः → पथमा िवभिक्त, एकवचन, पुँि लङ् गः (पािणवाचकः)

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पश्नवाचकपदम् — कः (िकम् शब्दस्य पथमा एकवचनम्, पुँि लङ् गः)

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प्रश्न नमाण का नयम: रेखां कत पद जस वभ क्त, वचन और लङ्ग म हो, प्रश्नवाचक पद भी ठ क उसी वभ क्त-
a g वचन- लङ्ग म र खए, और शेष वाक्य ज्य -का-त्य रहने द जए। प्रा णवाचक पुँ ल्लङ्ग के लए ‘कः’, स्त्री लङ्ग के लए
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‘का’, अप्रा णवाचक के लए ‘ कम्’ प्रयुक्त होता है।
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प्र.4 (ख) सुरासुराः सव भीताः भ वष्य न्त।a g

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के सव भीताः भ वष्य न्त ? (सब कौन डरे हुए ह गे ?)
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ag रेखािङ् कतपदम् — सुरासुराः → पथमा िवभिक्त, बहुवचनम्, पुँि लङ् गः

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पश्नवाचकपदम् — के (िकम् शब्दस्य पथमा बहुवचनम्, पुँि लङ् गः)
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क्य ‘के’, ‘कः’ नह : रेखां कत पद बहुवचन म है (सुराः + असुराः = सुरासुराः), अतः प्रश्नवाचक पद भी बहुवचन म
ही आएगा — ‘के’। क्रया ‘भ वष्य न्त’ (लृट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन) भी बहुवचन क पु करती है।

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स न्ध: सुर + असुराः = सुरासुराः (द घ-स न्ध — अ + अ = आ)।
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दै त्यराजः खड् गेन प्रहर त।
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प्र.4 (ग)

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दै त्यराजः केन प्रहर त ? (दै त्यराज कससे प्रहार करता है ?)

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रेखािङ् कतपदम् — खड् गेन → त ृत ीया िवभिक्त , एकवचनम्, पुँि लङ् गः (करण / उपकरण)

पश्नवाचकपदम् — के न (िकम् शब्दस्य त ृत ीया एकवचनम्)

क्य : तृतीया वभ क्त ‘ कससे / के द्वारा’ का उत्तर दे ती है, अतः उसका प्रश्नवाचक पद केन है। यही इस पाठ का
मुख्य व्याकरण- बन्दु है — उपकरण के अथ म तृतीया। तुलना क जए — बालकः लेखन्या लख त → बालकः
कया लख त ?

प्र.4 (घ) अहं प्र ादं मार यष्या म।

अहं कं मार यष्या म ? (म कसको मारूँगा ?)

रेखािङ् कतपदम् — प ादम् → िद्वतीया िवभिक्त , एकवचनम्, पुँि लङ् गः (कम)
पश्नवाचकपदम् — कम् (िकम् शब्दस्य िद्वतीया एकवचनम्, पुँि लङ् गः)

ध्यान द: प्रश्न बनाते समय केवल रेखां कत पद बद लए — कता ‘अहम्’ और क्रया ‘मार यष्या म’ ज्य -के-त्य
रहगे। य द आप कता भी बदल दगे (‘त्वं कं मार यष्य स ?’) तो वह वाक्य-प रवतन हो जाएगा, प्रश्न नमाण नह ।

व्याकरण: मार यष्या म = मृ धातु का णजन्त (मा र) रूप, लृट् लकार, उत्तमपुरुष एकवचन — ‘मारूँगा’।

प्र.4 (ङ) तात ! ह रस्तु सवत्र अ स्त।

तात ! ह रस्तु कुत्र अ स्त ? ( पताजी ! ह र तो कहाँ ह ?)

रेखािङ् कतपदम् — सवत्र → स्थानवाचकम् अव्ययम् (सब जगह)

पश्नवाचकपदम् — कु त्र (स्थानवाचकं पश्नाथकम् अव्ययम् — कहाँ)

क्य : ‘सवत्र’ वभ क्तर हत अव्यय है, इस लए उसके स्थान पर ‘क स्मन्’ नह , ब ल्क स्थान का अव्यय-प्रश्न ‘कुत्र’
आएगा। नयम — अव्यय का प्रश्न भी अव्यय ही होता है (अत्र/तत्र/सवत्र → कुत्र; अद्य/श्वः → कदा; एवम् →
कथम्)।

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स न्ध: ह रः + तु = ह रस्तु ( वसग-स न्ध — वसग का ‘स्’)।

प्र.4 (च) पुत्रस्य वषये वक्तुम् इच्छ त।

कस्य वषये वक्तुम् इच्छ त ? (वह कसके वषय म कहना चाहता है ?)

रेखािङ् कतपदम् — पुत्रस्य → षष्ठी िवभिक्त , एकवचनम्, पुँि लङ् गः (सम्बन्धः)

पश्नवाचकपदम् — क स्य (िकम् शब्दस्य षष्ठी एकवचनम्, पुँि लङ् गः)

क्य : षष्ठी वभ क्त ‘का / के / क ’ अथात् सम्बन्ध बताती है; उसका प्रश्नवाचक रूप पुँ ल्लङ्ग-नपुंसक लङ्ग म ‘कस्य’
और स्त्री लङ्ग म ‘कस्याः’ होता है। ‘ वषये’ (सप्तमी) रेखां कत नह है, अतः वह अप रव तत रहेगा।

प्र.4 (छ) नृ सहः नजनखैः हरण्यक शपुं मा रतवान्।

नृ सहः कैः हरण्यक शपुं मा रतवान् ? (नृ सह ने हरण्यक शपु को कनसे मारा ?)

रेखािङ् कतपदम् — िनजनखैः → त ृत ीया िवभिक्त , बहुवचनम्, पुँि लङ् गः (करण)

पश्नवाचकपदम् — कै ः (िकम् शब्दस्य त ृत ीया बहुवचनम्)

क्य ‘कैः’, ‘केन’ नह : ‘ नजनखैः’ बहुवचन है (नाखून अनेक ह), अतः प्रश्नवाचक पद भी तृतीया बहुवचन ‘कैः’ ही
होगा। तृतीया के तीन वचन के प्रश्नवाचक रूप याद र खए — केन (एक०) • काभ्याम् ( द्व०) • कैः (बहु०)।

कथा-सम्बन्ध: नृ सह ने अस्त्र-शस्त्र से नह , अपने नख से वध कया — इसी से ब्रह्मा का वरदान अख ण्डत रहा
और अधम का अन्त भी हुआ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 81

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अभ्यासः — प्रश्नः ५ : अधः प्रदत्तेषु रक्तस्थानेषु तृतीया- वभक्त्यन्ता न रूपा ण लखन्तु

अभ्यासः

प्र.5 (क) अहं मम ................ (खड् ग) स्तम्भं भङ् क्ष्या म।

अहं मम खड् गेन स्तम्भं भङ् क्ष्या म। (म अपनी तलवार से खम्भे को तोड़ दूँ गा।)

मूलशब्दः — खड् ग (अकारान्त, पुँि लङ् गः)

पयुक्तं रूपम् — खड् गेन → त ृत ीया िवभिक्त, एकवचनम्

अथः — तलवार के द्वारा

क्य तृतीया: ‘तोड़ने’ क क्रया म तलवार उपकरण (करण) है, और नयम है — ‘वाक्ये उपकरणाथ तृतीया
वभ क्तः भव त।’ पुस्तक का उदाहरण भी यही है — ‘ हरण्यक शपुः खड् गेन स्तम्भं भञ्जय त।’

प्र.5 (ख) प्र ादः गजस्य ................ (पददलन) अ प जीव त।

प्र ादः गजस्य पददलनेन अ प जीव त। (हाथी के पैर से कुचले जाने पर भी प्र ाद जी वत रहता है।)

मूलशब्दः — पददलन (अकारान्त, नपुंसकिलङ् गः)

पयुक्तं रूपम् — पददलने न → त ृत ीया िवभिक्त, एकवचनम्

अथः — पैरों से कु चलने के कारण / कु चलने से

क्य तृतीया: यहाँ ‘पद-दलन’ वह साधन है जससे मारने का प्रयत्न हुआ, अतः करण म तृतीया आती है। अकारान्त
नपुंसक लङ्ग के तृतीया एकवचन का प्रत्यय भी ‘–एन’ ही है — जैसे वन → वनेन, फल → फलेन।

ध्यान द: ‘गजस्य’ षष्ठी म है (हाथी का), जो ‘पददलनेन’ से जुड़ा है — दोन क वभ क्तयाँ अलग-अलग ह, इन्ह
मलाइए मत।

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प्र.5 (ग) सव जनाः ................ (नारायण) अनुगृहीताः।

सव जनाः नारायणेन अनुगृहीताः। (सब लोग नारायण के द्वारा अनुगृहीत ह।)

मूलशब्दः — नारायण (अकारान्त, पुँि लङ् गः)

पयुक्तं रूपम् — नारायणेन → त ृत ीया िवभिक्त, एकवचनम्

अथः — नारायण के द्वारा

क्य तृतीया: ‘अनुगृहीताः’ कमवाच्य का भूतका लक कृदन्त है — ‘अनुगृहीत कए गए’। कमवाच्य म कता तृतीया
वभ क्त म आता है, इस लए ‘नारायणेन’। तुलना — रामेण रावणः हतः (राम के द्वारा रावण मारा गया)।

णत्व: नारायण + एन = नारायणेन — शब्द म ‘र्’ होने से प्रत्यय का ‘न’ भी ‘ण’ हो जाता है।

प्र.5 (घ) ................ ( नजनख) तव वक्षःस्थलं वद य मार यष्या म।

नजनखैः तव वक्षःस्थलं वद य मार यष्या म। (अपने नाखून से तेरी छाती चीरकर मारूँगा।)

मूलशब्दः — िनजनख (अकारान्त, पुँि लङ् गः)

पयुक्तं रूपम् — िनजनखैः → त ृत ीया िवभिक्त, बहुवचनम्

अथः — अपने नाखून ों के द्वारा

यहाँ बहुवचन क्य : नख एक नह , अनेक होते ह; और पाठ का मूल वाक्य भी बहुवचन म ही है — ‘ नजनखैः तव
वक्षःस्थलं वद य ह नष्या म।’ अतः ‘ नजनखेन’ लखना यहाँ अनुपयुक्त होगा।

शब्दाथ: नजनखैः = स्वस्य करजैः (अपने नाखून से)। वद य = चीरकर (ल्यप् प्रत्यय, व + दॄ धातु)।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
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बा लकाः ................ ( श क्षका) सह चचा कुव न्त।
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प्र.5 (ङ)

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agl श क्षकया सह चचा कुव न्त। (बा लकाएँ श क्षका के साथ चचा करती ह।)
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मूलशब्दः — िशिक्षका (आकारान्त, स्त्रीिलङ् गः)
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पयुक्तं रूपम् — िशिक्षकया → त ृत ीया िवभिक्त, एकवचनम्
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अथः — िशिक्षका के साथ
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क्य तृतीया: ‘सह’, ‘साकम्’, ‘साधम्’, ‘समम्’ — इन अव्यय के योग म सदा तृतीया वभ क्त आती है। यह
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उपकरण.cवाली तृतीया से भन्न प्रयोग है, पर वभ क्त वही रहती है। a
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रूप-सावधानी: आकारान्त स्त्री लङ्ग म तृतीया एकवचन ‘–या’ पर बनता है — श क्षका → श क्षकया, बा लका
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→ बा लकया, छात्रा → छात्रया। ‘ श क्षकेन’ अशुद्ध है।

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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 81
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अभ्यासः — प्रश्नः ६ : उदाहरणानुसारं संयोज्य लखन्तु (गुणस न्धः)

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अभ्यासः

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a प्र.6 (क) रमा + ईशः = ............... [उदाहरणम् — रमेशः]

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com g l a
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रमा + ईशः = रमेशः (लक्ष्मी के स्वामी — a s
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वष्णु

रमा (आ ) + ईशः (ई) → आ + ई = ए
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अतः रम् + ए + शः = रमेशः

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नयम (गुणस न्धः): ‘आ णः’ — य द अ या आ के बाद इ या ई आए तो दोन मलकर ए हो जाते ह। इसी प्रकार

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अ/आ + उ/ऊ = ओ तथा अ/आ + ऋ = अर्। इस प्रश्न के सभी ग्यारह उदाहरण इसी एक नयम पर आधा रत ह।
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पूरी सूची एक दृ ष्ट म: रमेशः • सुरेश्वरः • नागेन्द्रः • गजेन्द्रः • मातेव • रामे त • परोपकारः • ममोप र • सूय दयः •
रामेणोक्तम् • तस्योप र।

प्र.6 (ख) सुर + ईश्वरः = ...............

सुर + ईश्वरः = सुरेश्वरः (दे वताओं के ईश्वर — इन्द्र)

सुरअ + ईश्वरः → अ + ई = ए
सुर ् + ए + श्वरः = सुरेश्वरः

नयम: गुणस न्ध — अ + ई = ए। यही रूप ‘सुरेशः’, ‘दे वेश्वरः’, ‘नरेश्वरः’ म भी बनता है।

प्र.6 (ग) नाग + इन्द्रः = ...............

नाग + इन्द्रः = नागेन्द्रः (नाग का राजा)

नागअ + इन्द ः → अ + इ = ए

नाग् + ए + न्द ः = नागेन्द ः

नयम: गुणस न्ध — अ + इ = ए। ‘इन्द्र’ शब्द के साथ बने अन्य पद — दे व + इन्द्रः = दे वेन्द्रः, सुर + इन्द्रः = सुरेन्द्रः,
राज + इन्द्रः = राजेन्द्रः।

प्र.6 (घ) गज + इन्द्रः = ...............

गज + इन्द्रः = गजेन्द्रः (हा थय म ेष्ठ — गजराज)

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गजअ + इन्द ः → अ + इ = ए

गज् + ए + न्द ः = गजेन्द ः

अथ-सङ् केत: ‘इन्द्र’ का अथ यहाँ ‘ ेष्ठ / राजा’ है, अतः गजेन्द्र = हा थय म ेष्ठ। पुराण-प्र सद्ध गजेन्द्रमोक्ष क
कथा इसी शब्द से जुड़ी है — वहाँ भी नारायण ने ही रक्षा क थी, जैसे इस पाठ म प्र ाद क ।

प्र.6 (ङ) माता + इव = ...............

माता + इव = मातेव (माता के समान)

मात आ + इव → आ + इ = ए

मात् + ए + व = माते व

नयम: गुणस न्ध म पूवपद का ‘आ’ भी वही व्यवहार करता है जो ‘अ’ करता है — आ + इ = ए। इव उपमावाचक
अव्यय है, इस लए ‘मातेव’ का अथ ‘माता क तरह’ होता है।

वाक्यप्रयोगः: गुरुः मातेव शष्यान् पालय त। (गुरु माता क तरह शष्य का पालन करता है।)

प्र.6 (च) राम + इ त = ...............

राम + इ त = रामे त (‘राम’ — इस प्रकार)

रामअ + इित → अ + इ = ए

राम् + ए + ित = रामेित

प्रयोग: ‘इ त’ उद्धरण-सूचक अव्यय है — जो कुछ कहा गया, उसे समाप्त करने के लए आता है। जैसे पाठ म —
‘ईशावास्यम् इदं सवम्’ इ त उच्यते।

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प्र.6 (छ) पर + उपकारः = ...............

पर + उपकारः = परोपकारः (दूसर का उपकार / भलाई)

परअ + उपकारः → अ + उ = ओ

पर् + ओ + पकारः = परोपकारः

नयम: यह भी गुणस न्ध ही है, केवल स्वर बदल गया — अ/आ + उ/ऊ = ओ। इसी नयम से — सूय + उदयः =
सूय दयः, मम + उप र = ममोप र।

सुभा षतम्: परोपकाराय सतां वभूतयः। (सज्जन का वैभव परोपकार के लए होता है।)

प्र.6 (ज) मम + उप र = ...............

मम + उप र = ममोप र (मेरे ऊपर)

ममअ + उपिर → अ + उ = ओ

मम् + ओ + पिर = ममोपिर

नयम: गुणस न्ध — अ + उ = ओ। उप र अव्यय है (ऊपर), जसके योग म प्रायः षष्ठी वभ क्त आती है — जैसे
‘वृक्षस्य उप र’ = वृक्षस्योप र।

प्र.6 (झ) सूय + उदयः = ...............

सूय + उदयः = सूय दयः (सूय का उगना)

सूयअ + उदयः → अ + उ = ओ

सूय ् + ओ + दयः = सूय दयः

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नयम: गुणस न्ध — अ + उ = ओ। इसी प्रकार चन्द्र + उदयः = चन्द्रोदयः तथा सूय + अस्तः = सूयास्तः (यह
द घस न्ध है, गुणस न्ध नह — ध्यान रख)।

प्र.6 (ञ) रामेण + उक्तम् = ...............

रामेण + उक्तम् = रामेणोक्तम् (राम के द्वारा कहा गया)

रामेणअ + उक्तम् → अ + उ = ओ

रामेण ् + ओ + क्तम् = रामेणोक्तम्

दोहरी सीख: यहाँ स न्ध के साथ इस पाठ का व्याकरण भी दखता है — ‘रामेण’ तृतीया वभ क्त, एकवचन है,
क्य क ‘उक्तम्’ कमवाच्य कृदन्त है और कमवाच्य म कता तृतीया म आता है।

प्र.6 (ट) तस्य + उप र = ...............

तस्य + उप र = तस्योप र (उसके ऊपर)

तस्यअ + उपिर → अ + उ = ओ

तस्य् + ओ + पिर = त स्योपिर

नयम: गुणस न्ध — अ + उ = ओ। ‘तस्य’ तद् शब्द का षष्ठी वभ क्त, एकवचन, पुँ ल्लङ्ग रूप है; ‘उप र’ के योग म
षष्ठी ही आती है।

अभ्यास हेतु: इसी नयम से जो ड़ए — नर + उत्तमः = नरोत्तमः, हत + उपदे शः = हतोपदे शः, महा + उत्सवः =
महोत्सवः।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 82

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
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अभ्यासः — प्रश्नः ७ : उदाहरणानुसारं वाक्या न वतमानकालतः भ वष्यत्-काले प रवतयन्तु (लृट् लकारः)
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अभ्यासः

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a s emसा आपणं गच्छ त। [उदाहरणम् — सा आपणं ग मष्य त।]
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प्र.7 (क)

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सा आपणं ग मष्य त। (वह बाज़ार जाएगी।)
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वतमानकालः (लट् लकारः) — गच्छित → भिवष्यत्कालः (लृट् लकारः) — गिमष्यित

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धात ःु — गम् • पुरु षः — पथमपुरु षः • वचनम् — एकवचनम्

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a s emभ वष्यत् काल के लए लृट् लकार का प्रयोग होता है। इसक पहचान है — धातु के बाद ‘–स्य’ या ‘–इष्य’
gl जुड़ना, फर लट् जैसे प्रत्यय। जैसे पठ् → प ठष्य त, गम् → ग मष्य त, दा → दास्य त।
नयम:
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लृट् लकार के प्रत्यय (पठ् धातु से): प्रथमपुरुषः — प ठष्य त / प ठष्यतः / प ठष्य न्त; मध्यमपुरुषः — प ठष्य स

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/ प ठष्यथः / प ठष्यथ; उत्तमपुरुषः — प ठष्या म / प ठष्यावः / प ठष्यामः।
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प्र.7 (ख)
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रमा क्र डाङ्गणे क्र ड त।
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a रमा क्र डाङ्गणे क्र डष्य त। (रमा खेल के मैदान म खेलेगी।)

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क्रीडित (लट् ) → क्र ीिडष्यित (लृट् )

धात ःु — क्रीड् • पथमपुरु षः, एकवचनम्
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क्य : कता ‘रमा’ एकवचन है, अतः क्रया भी प्रथमपुरुष एकवचन म रहेगी। केवल काल बदला है — ‘–इष्य त’
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जुड़ने से वतमान भ वष्य बन गया।
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बालाः फला न खाद न्त।

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बालाः फला न खा दष्य न्त। (बालक फल खाएँगे।)

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खादिन्त (लट् ) → खािद ष्यिन्त (लृट् )

धात ःु — खाद् • पथमपुरु षः, बहुवचनम्

क्य बहुवचन: कता ‘बालाः’ बहुवचन म है और कम ‘फला न’ भी बहुवचन (नपुंसक लङ्ग) है। कता के अनुसार ही
क्रया का वचन तय होता है, इस लए –इष्य न्त प्रत्यय लगा।

प्र.7 (घ) ताः योगासनं कुव न्त।

ताः योगासनं क रष्य न्त। (वे ( स्त्रयाँ) योगासन करगी।)

कु विन्त (लट् ) → किरष्यिन्त (लृट् )

धात ःु — कृ • पथमपुरु षः, बहुवचनम्

ध्यान द: ‘कृ’ धातु के लट् और लृट् रूप बहुत भन्न दखते ह — लट् म करो त / कुरुतः / कुव न्त, कन्तु लृट् म
सरलता से क रष्य त / क रष्यतः / क रष्य न्त। इसी लए ‘कु वष्य न्त’ लखना अशुद्ध है।

प्र.7 (ङ) अहं नत्यं पठा म।

अहं नत्यं प ठष्या म। (म प्र त दन प ँ गा।)

पठािम (लट् ) → पिठष्यािम (लृट् )

धात ःु — पठ् • उत्तमपुरु षः, एकवचनम्

क्य : कता ‘अहम्’ है, अतः क्रया उत्तमपुरुष एकवचन म — ‘–इष्या म’। ‘ नत्यम्’ अव्यय है, वह काल बदलने पर
भी अप रव तत रहता है।

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प्र.7 (च) त्वं क स्मन् वषये वद स ?

त्वं क स्मन् वषये व दष्य स ? (तुम कस वषय म बोलोगे ?)

वदिस (लट् ) → विद ष्यिस (लृट् )

धात ःु — वद् • मध्यमपुरु षः, एकवचनम्

क्य : कता ‘त्वम्’ है, अतः क्रया मध्यमपुरुष एकवचन म आएगी — ‘–इष्य स’। प्रश्नवाचक वाक्य म भी केवल
क्रया का काल बदलता है; ‘क स्मन्’ (सप्तमी एकवचन) ज्य -का-त्य रहता है।

प्र.7 (छ) आवां पाठं लखावः।

आवां पाठं ले खष्यावः। (हम दोन पाठ लखगे।)

िलखावः (लट् ) → लेिखष्यावः (लृट् )

धात ःु — िलख् • उत्तमपुरु षः, िद्ववचनम्

रूप-सावधानी: ‘ लख्’ धातु लृट् लकार म वृ द्ध लेकर ‘लेख्’ हो जाती है — ले खष्य त / ले खष्यतः /
ले खष्य न्त। यही रूप पुस्तक ने प्रश्न ८ (छ) म भी दया है — ‘बा लके कथां ले खष्यतः।’ अतः ‘ ल खष्यावः’
लखना ठ क नह ।

प्र.7 (ज) यूयं शालां गच्छथ।

यूयं शालां ग मष्यथ। (तुम सब वद्यालय जाओगे।)

गच्छथ (लट् ) → गिमष्यथ (लृट् )

धात ःु — गम् • मध्यमपुरु षः, बहुवचनम्

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ध्यान द: ‘गम्’ धातु का लट् रूप ‘गच्छ त’ है (शप्- वकरण म ‘गच्छ् ’ आदे श), कन्तु लृट् म मूल धातु ही रहती है —
ग मष्य त। इस लए ‘ग च्छष्यथ’ अशुद्ध है।

प्र.7 (झ) ते बा लके वैद्ये भवतः।

ते बा लके वैद्ये भ वष्यतः। (वे दोन बा लकाएँ वैद्य बनगी।)

भवतः (लट् ) → भिवष्यतः (लृट् )

धात ःु — भू • पथमपुरु षः, िद्ववचनम्

क्य द्ववचन: ‘ते बा लके’ तथा ‘वैद्ये’ — तीन पद द्ववचन म ह (स्त्री लङ्ग), इस लए क्रया भी द्ववचन म —
भ वष्यतः। संस्कृत म वशेषण, वशेष्य और क्रया — तीन का वचन एक-सा रहता है।

प्र.7 (ञ) वयं ोकान् स्मरामः।

वयं ोकान् स्म रष्यामः। (हम सब ोक याद करगे / स्मरण करगे।)

स्मरामः (लट् ) → स्मिरष्यामः (लृट् )

धात ःु — स्मृ • उत्तमपुरु षः, बहुवचनम्

क्य : कता ‘वयम्’ बहुवचन है, अतः क्रया उत्तमपुरुष बहुवचन म — ‘–इष्यामः’। ‘ ोकान्’ द्वतीया बहुवचन
(कम) है और काल बदलने पर वह अप रव तत रहता है।

पाठ-सम्बन्ध: प्र ाद ने भी अ ग्न म बैठकर भय के स्थान पर स्मरण ही चुना — ‘ॐ नमो नारायणाय’। स्मरण ही
उसका रक्षाकवच बना।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 82

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अभ्यासः — प्रश्नः ८ : उदाहरणानुसारं रक्तस्थाना न पूरयन्तु (एकवचनम् — द्ववचनम् — बहुवचनम्)

अभ्यासः

प्र.8 (क) (क) बालकः काय क रष्य त। — बालकौ काय क रष्यतः। — बालकाः काय क रष्य न्त। [उदाहरणम्]

यह पुस्तक म दया गया उदाहरण है — एक ही वाक्य तीन वचन म, लृट् लकार (भ वष्यत् काल) म।

एकवचनम् — बालकः काय ं किरष्यित। (बालक काम करेगा।)

िद्ववचनम् — बालकौ काय ं किरष्यतः। (दो बालक काम करेगं े।)

बहुवचनम् — बालकाः काय ं किरष्यिन्त। (बालक काम करेगं े।)

सम्पूण पू रत ता लका (क से ज तक) —

क्रमः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

(क) बालकः काय ं किरष्यित। बालकौ काय ं किरष्यतः। बालकाः काय ं किरष्यिन्त।

(ख) सः शालां गिमष्यित। तौ शालां गिम यतः।
ष् ते शालां गिम यि त।
ष् न्

(ग) त्वं श्लोकं विदष्यिस। युवां लोकं विद यथः।
श् ष् यूयं लोकं विद यथ।
श् ष्

(घ) अहं पु तकािन दा यािम।
स् स् आवां पुस्तकािन दास्यावः। वयं पु तकािन दा यामः।
स् स्

(ङ) छा ः पदशनी ं द यित।
त्र क्ष् छा ौ पदशनी ं द यतः।
त्र क्ष् छात्राः पदशनी ं द क्ष्यिन्त।

(च) अहं भगवद् ग ीतां ोष्यािम। आवां भगवद् गीतां ो यावः। ष् वयं भगवद् गीतां ो यामः। ष्

(छ) बािलका कथां ले िख यित। ष् बािलके कथां ले िखष्यतः। बािलकाः कथां ले िख यि त। ष् न्

(ज) वं िकं खािद यिस ?
त् ष् युवां िकं खािद यथः ?
ष् यूयं िकं खािदष्यथ ?

करने का तरीका: जो वाक्य दया गया है उससे पहले पुरुष (प्रथम / मध्यम / उत्तम) पहचा नए, फर उसी पुरुष के
तीन वचन के रूप ल खए। कता और क्रया — दोन का वचन एक साथ बदलेगा; कम प्रायः वैसा ही रहेगा।

प्र.8 (ख) (ख) सः शालां ग मष्य त। — ............... — ...............

द्ववचनम् — तौ शालां ग मष्यतः। | बहुवचनम् — ते शालां ग मष्य न्त।

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सः (एक०) → तौ (िद्व०) → ते (बह०
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ु ) — तद् शब्दः, पथमा िवभिक्तः, पुँि लङ् गः
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गिमष्यित → गिमष्यतः → गिमष्यिन्त — गम् धात ःु , लृट् लकारः, पथमपुरु षः
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a हन्द अथ: वह वद्यालय जाएगा। / वे दोन वद्यालय जाएँगे। / वे सब वद्यालय जाएँगे।

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ध्यान द: ‘शालाम्’ ( द्वतीया एकवचन) कम है औरem
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वह तीन वाक्य म अप रव तत रहता है — सब एक ही वद्यालय
जा रहे ह, इस लए कम का वचन नह बदलेg

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(ग) त्वं ोकं व दष्य स। — ............... — ...............
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प्र.8 (ग)

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द्ववचनम् — युवां ोकं व दष्यथः। | बहुवचनम् — यूयं ोकं व दष्यथ।
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त्वम् (एक०) → युवाम् (िद्व०) → यूयम् (बहु० ) — युष्मद् शब्दः, पथमा िवभिक्तः
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विदष्यिस → विद ष्यथः → विद ष्यथ — वद् धात ःु , लृट् लकारः, मध्यमपुरु षः

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हन्द अथ: तुम ोक बोलोगे। / तुम दोन ोक बोलोगे। / तुम सब ोक बोलोगे।
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agl याद र खए: युष्मद् शब्द के प्रथमा के तीन रूप — त्वम् • युवाम् • यूयम्; और अस्मद् शब्द के — अहम् • आवाम्

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• वयम्।

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प्र.8 (घ) agl
(घ) ............... — आवां पुस्तका न दास्यावः। — ...............

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एकवचनम् — अहं पुस्तका न दास्या म। | बहुवचनम् — वयं पुस्तका न दास्यामः।

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ag दत्तं िद्ववचनम् — आवाम् → अतः अयम् उत्तमपुरु षः (अस्मद् शब्दः)
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अहम् (एक०) → आवाम् (िद्व०) → वयम् (बहु० )

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दास्यािम → दास्यावः → दास्यामः — दा धात ःु , लृट् लकारः agl
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हन्द अथ: म पुस्तक दूँ गा। / हम दोन पुस्तक दगे। / हम सब पुस्तक दगे।

ध्यान द: कम ‘पुस्तका न’ ( द्वतीया बहुवचन, नपुंसक लङ्ग) तीन वाक्य म ज्य -का-त्य रहेगा — क्य क वचन कता
का बदल रहा है, कम का नह । पुस्तक म भी द्ववचन वाले वाक्य म ‘पुस्तका न’ ही छपा है।

प्र.8 (ङ) (ङ) ............... — ............... — छात्राः प्रदशन द्रक्ष्य न्त।

एकवचनम् — छात्रः प्रदशन द्रक्ष्य त। | द्ववचनम् — छात्रौ प्रदशन द्रक्ष्यतः।

दत्तं बहुवचनम् — छात्राः … द क्ष्यिन्त → पथमपुरु षः, पुँि लङ् गः

छात्रः → छात्रौ → छात्राः • द क्ष्यित → द क्ष्यतः → द क्ष्यिन्त

धात ःु — दृ श् (दे खना), लृट् लकारः

रूप-सावधानी: ‘दृश्’ धातु लृट् लकार म द्रक्ष् बन जाती है — द्रक्ष्य त / द्रक्ष्यतः / द्रक्ष्य न्त। ‘द शष्य त’ अशुद्ध है।
पाठ म भी हरण्यक शपु कहता है — ‘द्रक्ष्या म सः कथं जी वष्य त इ त।’

हन्द अथ: छात्र प्रदशनी दे खेगा। / दो छात्र प्रदशनी दे खगे। / छात्र प्रदशनी दे खगे।

प्र.8 (च) (च) अहं भगव तां ोष्या म। — ............... — ...............

द्ववचनम् — आवां भगव तां ोष्यावः। | बहुवचनम् — वयं भगव तां ोष्यामः।

अहम् → आवाम् → वयम् (अस्मद् शब्दः, उत्तमपुरु षः)

ोष्यािम → ोष्यावः → ोष्यामः — ु धात ःु , लृट् लकारः

रूप-सावधानी: ‘ ु’ धातु के लट् रूप ‘शृणो त / शृणुतः / शृण्व न्त’ ह, कन्तु लृट् म गुण होकर ोष्य त / ोष्यतः
/ ोष्य न्त बनते ह। इस लए ‘शृ णष्या म’ लखना अशुद्ध होगा।

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हन्द अथ: म भगव ता सुनूँगा। / हम दोन भगव ता सुनगे। / हम सब भगव ता सुनगे।

प्र.8 (छ) (छ) ............... — बा लके कथां ले खष्यतः। — ...............

एकवचनम् — बा लका कथां ले खष्य त। | बहुवचनम् — बा लकाः कथां ले खष्य न्त।

दत्तं िद्ववचनम् — बािलके … लेिखष्यतः → पथमपुरु षः, स्त्रीिलङ् गः

बािलका (एक०) → बािलके (िद्व०) → बािलकाः (बहु० )

लेिखष्यित → लेिखष्यतः → लेिखष्यिन्त — िलख् धात ःु , लृट् लकारः

ध्यान द: आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द म प्रथमा के तीन रूप ह — बा लका • बा लके • बा लकाः। द्ववचन म ‘–ए’
लगता है, ‘–औ’ नह (वह पुँ ल्लङ्ग का चह्न है)।

हन्द अथ: बा लका कहानी लखेगी। / दो बा लकाएँ कहानी लखगी। / बा लकाएँ कहानी लखगी।

प्र.8 (ज) (ज) ............... — ............... — यूयं क खा दष्यथ ?

एकवचनम् — त्वं क खा दष्य स ? | द्ववचनम् — युवां क खा दष्यथः ?

दत्तं बहुवचनम् — यूयम् … खािद ष्यथ → अतः अयं मध्यमपुरु षः (युष्मद् शब्दः)

त्वम् → युवाम् → यूयम्

खािदष्यिस → खािद ष्यथः → खािदष्यथ — खाद् धात ःु , लृट् लकारः

हन्द अथ: तुम क्या खाओगे ? / तुम दोन क्या खाओगे ? / तुम सब क्या खाओगे ?

ध्यान द: ‘ कम्’ यहाँ द्वतीया वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग (कम) है — ‘क्या ?’ । कता का वचन बदलने पर भी
यह अप रव तत रहता है, और प्रश्न चह्न भी बना रहता है।

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योग्यता वस्तारः — पृष्ठ 83–84
योग्यता वस्तारः (ज्ञानवधनम्)

योग्यता वस्तारः

प्र.1 एषा घटना नर सहपुराणे ीम ागवतपुराणे च व णता अ स्त। एतयोः पुराणयोः रच यता मह षः वेदव्यासः अ स्त।
सः एव अष्टादश पुराणा न ल खतवान्। नर सहपुराणम् एकम् उपपुराणम् अ स्त। नृ सहावतार वषये कांश्चन
प्रमुखांशान् जानीमः।

सारः — यह कथा नर सहपुराण तथा ीम ागवतपुराण म व णत है। दोन के रच यता मह ष वेदव्यास ह, जन्ह ने अठारह
पुराण क रचना क । नर सहपुराण एक उपपुराण है।
नृ सहावतार- वषये प्रमुखांशाः (पाठे दत्ताः) —

बहारराज्ये ‘पू णया’ जनपदे बनमनखी-ग्रामे सकलीगढ-धरहरा इ त इ तहासप्र स ं स्थानम्। ( बहार के पू णया ज़ले
के बनमनखी गाँव म सकलीगढ़-धरहरा नामक ऐ तहा सक स्थान है।)
अ स्मन् एव स्थाने भगवान् नृ सहः अवतारं प्राप्तवान् इ त ख्या तः वतते। (मान्यता है क इसी स्थान पर भगवान् नृ सह ने
अवतार लया।)
अत्रैव नृ सहः हरण्यक शपोः वधं कृत्वा प्र ादस्य रक्षणं कृतवान्। (यह नृ सह ने हरण्यक शपु का वध करके प्र ाद क
रक्षा क ।)
भक्तस्य प्र ादस्य हरण्यक शपोः च सा ाज्यम् अत्रैव आसीत्। (भक्त प्र ाद और हरण्यक शपु का सा ाज्य यह था।)
अधुना प अत्र कश्चन वशालः बृहदाकारकः प्र स ः मा णक्यनामकः स्तम्भः वतते। (आज भी वहाँ मा णक्य नाम का एक
वशाल प्र सद्ध स्तम्भ है।)
यस्यां दे हल्यां हरण्यक शपोः वधः जातः, तस्याः एव दे हल्याः पाश्वस्तम्भः एषः इ त जन ु तः। लोक-मान्यता है क जस
दे हली पर वध हुआ, यह उसी का पाश्व-स्तम्भ है; तस्य भञ्जनाथ बहुधा प्रयासः कृतः तथा प न भग्नः — इसे तोड़ने के अनेक
प्रयास हुए, फर भी वह टू टा नह ।
हरण्यक शपोः अनुजायाः हो लकायाः दहनम् अत्रैव जातम् इ त मन्यते। ( हरण्यक शपु क बहन हो लका का दहन यह
हुआ माना जाता है।)
तदथमेव अत्रत्याः जनाः प्र तवष भस्मना मृ त्तकया च हो लकां क्र ड न्त; तदारभ्य भारतवष जनाः हो लकोत्सवम्
आचर न्त। (इसी लए वहाँ के लोग हर वष राख और मट्ट से होली खेलते ह; तभी से भारत म होली मनाई जाती है।)
अत्र नृ सहस्य प्राचीनः दे वालयः अ प अ स्त; सद्यः सः पुननवीकृतः। अ स्मन् म न्दरे ब्रह्म- वष्णु-महेश्वरस हतं प्रायः 40
दे वतानां प्र तमाः स न्त।
वै दककाले हो लकोत्सवः वसन्तोत्सवरूपेणा प आचयते। (वै दक काल म होली वसन्तोत्सव के रूप म भी मनाई जाती
थी।)
होलकः तृणाग्नौ भृष्टम् अ पक्वं धान्यम्; ‘होरा’ इ त हन्द भाषायाम्। जब नया गे ँ आ द अन्न घर आता है तब कसान
प्रसन्न होकर अ ग्न म ह व सम पत कर उत्सव मनाता है — वही हो लकोत्सव है।
शास्त्रेषु हो लकोत्सवः ‘वासन्तीय-नवसस्ये ष्टः’ उच्यते। (शास्त्र म होली को ‘वासन्तीय-नवसस्ये ’ अथात् नए अन्न का
वसन्तकालीन यज्ञ कहा गया है।)

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यह क्य पढ़ाया गया: यहाँ नाटक क कथा को भूगोल, पुराण-सा हत्य और लोक-पव — तीन से जोड़ा गया है।
इससे वद्याथ समझता है क होली केवल रंग का खेल नह , ब ल्क एक ओर भ क्त क वजय और दूसरी ओर नए
अन्न के स्वागत का उत्सव है।

प्र.2 भारतीयज्ञानपरम्परायां संस्कृतवाङ्मयस्य वशेषतः पुराणानां महती भू मका वतते। प्रधानतया अष्टादश पुराणा न
स न्त। — मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्। अनाप लगकूस्का न पुराणा न प्रचक्षते॥

अन्वयः —

मद्वयं भद्वयं च एव बत्रयं व-चत ष्ु टयम् ;

अ-ना-प-िलं-ग-कू -स्कािन (च) — पुराणािन पच क्षते ।

अथः ( हन्द ) — ‘म’ से आरम्भ होने वाले दो, ‘भ’ से आरम्भ होने वाले दो, ‘ब्र’ से आरम्भ होने वाले तीन, ‘व’ से आरम्भ होने वाले
चार, तथा अ, ना, प, ल, ग, कू और स्क — इन अक्षर से आरम्भ होने वाले (सात) — इस प्रकार कुल अठारह पुराण कहे जाते ह।
अष्टादश पुराणा न (पाठे दत्ता न) —

सङ् केतः सङ् ख्या पुराणा न

मद्वयम् २ १. मत्स्यपुराणम् २. माकण्डेयपुराणम्

भद्वयम् २ ३. भागवतपुराणम् ४. भ वष्यपुराणम्

बत्रयम् ३ ५. ब्रह्मपुराणम् ६. ब्रह्माण्डपुराणम् ७. ब्रह्मवैवतपुराणम्

वचतुष्टयम् ४ ८. वायुपुराणम् ९. वराहपुराणम् १०. वामनपुराणम् ११. वष्णुपुराणम्

अनापिलङ् गकू स्कािन ७ १२. अ ग्नपुराणम् १३. नारदपुराणम् १४. पद्मपुराणम् १५. लङ्गपुराणम् १६. गरुडपुराणम् १७.
कूमपुराणम् १८. स्कन्दपुराणम्

भावः: यह ोक अठारह पुराण को याद रखने क एक स्मृ त-कुंजी (सूत्र) है। प्रत्येक पुराण का पहला अक्षर लेकर
छोटा-सा पद बना दया गया — म-म, भ-भ, ब्र-ब्र-ब्र, व-व-व-व, तथा अ-ना-प- ल-ग-कू-स्क। गणना क जए — 2
+ 2 + 3 + 4 + 7 = 18। भारतीय ज्ञान-परम्परा म ऐसे सूत्र से वशाल सू चयाँ सरलता से कण्ठस्थ क जाती थ ।

ध्यान द: इसी पाठ क कथा दो पुराण म आती है — ीम ागवतपुराण (भद्वयम् म स म्म लत, क्रमाङ् क ३) तथा
नर सहपुराण, जो अठारह मुख्य पुराण म नह , अ पतु उपपुराण म गना जाता है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम्
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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 84
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प रयोजनाकायम् (प्रकल्प-काय)
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प रयोजनाकायम्

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माता- पत्रोः शक्षकस्य च साहाय्येन मानवानां षोडश-संस्काराणां नामा न लखन्तु।
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यह करके सीखने वाला काय है। माता- पता और शक्षक से पूछकर, अथवा घर के कसी पञ्चाङ्ग या धमशास्त्र क पुस्तक से

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दे खकर सोलह संस्कार के नाम अपनी उत्तर-पु स्तका म ल खए।

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काय कैसे कर —

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1. पहले माता- पता से पू छए — ‘हमारे प रवार म कौन-कौन से संस्कार हुए ?’ जो नाम वे बताएँ, उन्ह लख ली जए।

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gl3. प्रत्येक नाम के आगे एक पं क्त म उसका अथ ल खए और य द आपके प रवार म वह संस्कार हुआ हो तो उसक एक छोट -सी
2. फर शक्षक से पूरी सूची का क्रम पू छए — संस्कार जन्म से पहले आरम्भ होकर मृत्यु तक चलते ह।

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नमूना उत्तर — षोडश संस्काराः

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

क्रमः संस्कारः कदा / कमथम् ( हन्द )

१ गभ धानम् सन्तान क कामना से कया जाने वाला प्रथम संस्कार

२ पुंस वनम् गभस्थ शशु के स्वस्थ वकास हेतु

३ सीमन्तोन्नयनम् गभवती माता के मंगल तथा प्रसन्नता हेतु

४ जातकम शशु के जन्म के तुरन्त बाद

५ नामकरणम् शशु का नाम रखना

६ िनष्क्रमणम् शशु को प्रथम बार घर से बाहर ले जाना

७ अन्नपाशनम् प्रथम बार अन्न खलाना

८ चूडाकम (मुण् डनम्) प्रथम बार केश उतारना

९ कणवेध ः कान छे दना

१० िव ारम्भः अक्षर-ज्ञान का आरम्भ

११ उपनयनम् यज्ञोपवीत धारण कर गुरुकुल-प्रवेश

१२ वेद ारम्भः वेदाध्ययन का आरम्भ

१३ के शान्तः (गोदानम्) वद्याथ -जीवन म प्रथम क्षौर

१४ समावतनम् शक्षा पूण कर गुरुकुल से घर लौटना

१५ िववाहः गृहस्थ-जीवन का आरम्भ

१६ अन्त्येिष्टः जीवन का अ न्तम संस्कार

सङ् केतः: ग्रन्थ के अनुसार क्रम म थोड़ा अन्तर मल सकता है (कह ‘कणवेध’ के स्थान पर ‘ वद्यारम्भ’ पहले आता
है)। अतः जो सूची आपके शक्षक या प रवार बताए, उसी को अपने उत्तर म ल खए और यह भी लख द जए क
आपने वह कससे पूछकर लखी है।

प्र.2 पुराणेभ्यः काम प एकां कथां संगृह्य लखन्तु, कक्षायां ावयन्तु च।

यह संग्रह और प्रस्तु त का काय है। कसी एक पुराण से एक कथा चु नए, उसे अपने शब्द म ल खए और कक्षा म सुनाइए।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए —

कथा का ोत — कस पुराण से ली है (जैसे — भागवतपुराणात् गृहीता)।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

पात्र-प रचय दो-तीन पं क्तय म, फर घटना क्रम से।
अन्त म एक पं क्त का सन्दे श (भावः)।
य द सम्भव हो तो दो-चार वाक्य संस्कृत म भी ल खए — जैसे ‘एकदा गजेन्द्रः सरोवरं गतवान्।’

नमूना उत्तर — गजेन्द्रमोक्षकथा ( ीम ागवतपुराणात्)

पुरा कश्चन गजेन्द ः सरोवरे जलं पात ुं गतवान्। तदा कश्चन बलवान् गाहः तस्य पादं गृहीतवान्। गजेन्द ः

बहुक ालं यावत् यु ं कृ तवान्, िकन्त ु न मुक्तः अभवत्। अन्ते सः सव ं बलं त्यक्त्वा भगवन्तं स्मृत वान् — ‘ॐ नमो

भगवते वासुदे वाय’ इित। तत्क्षणम् एव भगवान् िवष्णुः गरुडारूढः आगत्य चक्रे ण गाहं हतवान्, गजेन्द ं च
रिक्षतवान्।

हन्द सार — एक गजराज सरोवर म जल पीने गया। एक बलवान् मगर ने उसका पैर पकड़ लया। बहुत दे र तक लड़ने पर भी वह
छू ट न सका। अन्त म उसने अपने बल का अ भमान छोड़कर भगवान् को पुकारा और भगवान् वष्णु ने आकर उसक रक्षा क ।

भावः: जब तक गजेन्द्र को अपने बल का भरोसा था, वह बँधा रहा; जैसे ही उसने अहंकार छोड़कर शरणाग त
स्वीकार क , रक्षा हो गई। यही भाव इस पाठ का भी है — प्र ाद ने भी अपने बल से नह , ‘ॐ नमो नारायणाय’ के
स्मरण से रक्षा पाई।

अन्य वकल्प: ुव-च रतम् ( वष्णुपुराणम्), समुद्रमन्थनम् (भागवतपुराणम्), वामनावतारः (वामनपुराणम्), श ब-
कथा — इनम से कोई भी चुन सकते ह।

कायकलापः — पृष्ठ 84
कायकलापः ( क्रया-कलाप)

कायकलापः

प्र.1 कक्षायाः सव छात्राः म लत्वा अस्य नाटकस्य अ भनयं कुवन्तु।

यह अ भनय-काय है — कक्षा के सब छात्र मलकर इस नाटक का मंचन कर। पाठ के आरम्भ म ही आचाया कहती ह —
‘अनन्तरम् अ भनयस हतं नाटकम प क रष्यामः।’ अथात् यह काय पाठ क ही योजना का अंग है।
पात्र- वभाजनम् (कुल लगभग १०–१२ छात्र) —

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

पात्रम् कः / का सङ् केतः (अ भनय कैसे कर)

अध्यािपका १ आरम्भ और अन्त क कड़ी — शान्त, स्नेहपूण स्वर

िहरण्यकिशपुः १ ऊँचा गवभरा स्वर, अट्टहास — ‘ह ह ह ह....’

प ादः १ शान्त, नभय; हाथ जोड़कर ‘ॐ नमो नारायणाय’

होिलका १ पहले स्नेह का अ भनय, फर कठोरता

निृ संहः १ सहगजन, गम्भीर एवं भयानक स्वर

मन्त्री / दै त्यपुर ोिहतः / से नापितः ३ मन्त्री अधोमुख होकर संकोच से बोले

राजभटः / सभासदः / दै त्याः ३–४ ‘ वजयतां महाराज ! वजयताम्।’ — समवेत स्वर

मंचन क व ध —

1. दृश्य- वभाजन: (१) कक्षा का दृश्य, (२) हरण्यक शपु क सभा, (३) हो लका-दहन, (४) स्तम्भ-भङ्ग तथा नृ सहावतार, (५)
अध्या पका का समापन-वाक्य।
2. संवाद कण्ठस्थ कर — पाठ के संवाद ज्य -के-त्य बो लए, अपनी ओर से हन्द न मलाइए। क ठन शब्द का अथ पहले समझ
ली जए, तभी भाव सही उतरेगा।
3. सामग्री (सरल): मुकुट के लए गत्ता, तलवार के लए पु ा, अ ग्न के लए लाल-पीले कागज़ क लपट। वास्त वक अ ग्न का
प्रयोग कदा प न कर।
4. पाश्वध्व न: स्तम्भ-प्रहार के समय थाली बजाइए और नृ सह के प्रवेश पर सामू हक गजन क जए — इससे ‘महता गजनेन’ का
प्रभाव बनेगा।

इससे क्या सीखगे: संवाद बोलने से संस्कृत का उ ारण, वराम और स्वराघात स्वाभा वक रूप से आ जाता है;
और नाटक करते-करते पूरा पाठ, उसक तृतीया वभ क्त और लृट् लकार के प्रयोग स हत, अपने-आप कण्ठस्थ हो
जाता है।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का मूल वाक्य — ‘ईशावास्यम् इदं सवम्’ अथात् यह सम्पूण जगत् ईश्वर से व्याप्त है। यह ईशोप नषद् का प्र सद्ध वचन
है। आचाया इसी को समझाने के लए प्र ाद क कथा सुनाती ह।
कथा का आरम्भ — दै त्यराज हरण्यक शपु स्वयं को सवश क्तमान् और अमर मानता है। सभा म मन्त्री, दै त्यपुरो हत और
सेनाप त उसक स्तु त करते ह, कन्तु मन्त्री संकोच से बताता है क उसका अपना पुत्र प्र ाद अह नश ह र का गुणगान करता
है।
प्र ाद पर अत्याचार — गज के पद-दलन से, ऊँचे पवत- शखर से गराने से और रस्सी से बाँधकर समुद्र म फकने से भी
प्र ाद जी वत रहता है, क्य क नारायण उसक रक्षा करते ह।
हो लका-दहन — ब्रह्मा के वरदान से हो लका को अ ग्न नह जलाती। वह प्र ाद को गोद म लेकर अ ग्न म बैठती है, कन्तु
वरदान का दुरुपयोग करने के कारण अ ग्न हो लका को ही जला दे ती है और प्र ाद सुर क्षत रहता है। इसी से हो लकोत्सव

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 7 ईशावास्यम् इदं सवम् AglaSem · NCERT Solutions

जुड़ा है।
नृ सहावतार — ‘ह रः सवत्र अ स्त, अ स्मन् स्तम्भे अ प अ स्त’ — प्र ाद के इस उत्तर पर हरण्यक शपु खड् ग से स्तम्भ पर
प्रहार करता है और महान् गजन के साथ नृ सह स्तम्भ से बाहर आते ह। वे सन्ध्याकाल म, दे हली पर, न अस्त्र से न शस्त्र से,
अपने नख से उसका वक्षःस्थल चीर दे ते ह — ब्रह्मा का वर भी अख ण्डत रहता है।
व्याकरण — (क) उपकरण के अथ म तृतीया — ‘ हरण्यक शपुः खड् गेन स्तम्भं भञ्जय त’; (ख) क्रया वशेषण-
स्वभाववाचक शब्द म तृतीया — ‘नृ सहः क्रोधेन गज त’। साथ ही लृट् लकार — प ठष्य त / प ठष्यतः / प ठष्य न्त आ द
रूप।

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH

ईशावास्यम् ईश्वरे ण व्याप्तम् ईश्वर से व्याप्त Pervaded by God

राजगम्भीरः राजसु गम्भीरः राजाओं म कुशलतम The best amongst the Kings

सवश क्तमान् सवसाम यवान् सबसे अ धक श क्तशाली All powerful

यज्ञभागः हिवः यज्ञ-आहु त Yajna offering

कुलकलङ् कः कु लपातकः वंश को कलं कत करने वाला One who brings ill-fame to the family

अह नशम् अहोरात्रः दन-रात Day and night

पद-दलनेन पदकु ट्टनेन पैर के द्वारा कुचलने से Stamped (by foot)

उत्तुङ्ग शखरात् उन्नतपवतस्य अग भागात् ऊँचे पवत के शखर से From the peak of a high mountain

रज्ज्वा वराटके न रस्सी के द्वारा By the rope

अलं चन्तया िचन्तां मा कु रु चता मत करो Do not worry

पतृष्वसः ! िपतुः भिगिन ! हे बुआ ! Hey Paternal Aunt !

आतनादम् चीत्कार-क्रन्दनम् चल्लाकर रोना Cry for help

भङ् क्ष्या म भग्नं किरष्यािम तोड़ दूँ गा (I) Shall break

कालोऽहम् यमः अहम् म मृत्यु ँ I am Death

दे हल्याम् द्वारतले दे हरी म Threshold

नजनखैः स्वस्य करजैः अपने नाखून से By own nails

वक्षःस्थलम् उरःस्थलम् छाती Chest

भन त्त िवदीण ं करोित चीरता है Tears apart

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Board / OrgNCERT
ExamClass 7
TypeSolution
Pages39
Updated19 Sep 2026