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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः

AglaSem पर कक्षा 7 संस्कृत पाठ 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Chapter 8 (Deepakam).
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NCERT Solutions Class 7 Sanskrit Chapter 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा7

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 8: हतं मनोहा र च दुलभं वचः

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

85 – 95 13 59 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 28 pages

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: हतं मनोहा र च दुलभं वचः
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के अष्टमः पाठः — हतं मनोहा र च दुलभं वचः के सम्पूण हल। यह पाठ कोई कथा नह , ब ल्क
दस सू क्तय (सुभा षत ) का संग्रह है। आरम्भ म कक्षा का एक संवाद है जसम आचाय बताते ह क ‘सू क्तः’ इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम्’ — और
सू क्तय म जीवनमूल्य छपे रहते ह। इसके बाद हर सू क्त का पदच्छे दः, अन्वयः तथा भावाथः दया गया है। व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ
मकारलेखनम् (म् और अनुस्वार का नयम) तथा वभ क्त- नदश पर के न् त है। नीचे पृष्ठ 85 से 95 तक क सारी सामग्री क्रम से हल क गई है —
संवाद का प्रश्न, दस सू क्तय का अन्वय-अथ-भाव, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–८ (हर उपभाग स हत), योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम्
और कायकलापः — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 7) 85 – 95

खं ड प्रश्न

13 59

माध्यम

हन्द

पाठे वद्यमानः प्रश्नः — पृष्ठ 85
पाठारम्भे कक्षायाः संवादः

सं वादः

प्र.1 आचाय ! ‘सू क्तः’ इत्युक्ते कः अ भप्रायः ?

आचायः उत्तरं ददा त — सू क्तः इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम्’ । सू क्तषु जीवनमूल्या न न हता न भव न्त ।
[‘सू क्त’ का अथ है ‘सुन्दर वचन’। सू क्तय म जीवनमूल्य छपे हुए रहते ह।]

शब्द कैसे बना: सु + उ क्तः = सू क्तः — ‘सु’ का अथ है ‘अच्छा, शोभन’ और ‘उ क्तः’ का अथ है ‘कथन’। दोन
म उ + उ मलकर द घ ऊ हो गया (सवणद घ-स न्ध), इस लए ‘सू क्तः’ रूप बना। अतः सू क्त = शोभना उ क्तः।

संवाद म आगे क्या-क्या कहा गया —

छात्रा — अद्य मम माता माम् एकां सू क्तं पा ठतवती, ‘सत्यं वद, धम चर’ इ त । [आज मेरी माँ ने मुझे एक सू क्त पढ़ाई
— ‘सच बोलो, धम का आचरण करो’।]
छात्रः — सूक्तयः अस्मान् सन्माग प्र त नय न्त इ त अहं श्रुतवान् । [सू क्तयाँ हम अच्छे माग क ओर ले जाती ह, ऐसा मने
सुना है।]
छात्राः — अस्मासु कुतूहलं वधते । वयम् एताः सूक्तीः पठामः । [हमारी उत्सुकता बढ़ रही है। हम ये सू क्तयाँ पढ़गे।]
आचायः — न केवलं पठामः अ पतु स्मरामः, जीवने आचरामः च । [केवल पढ़ ही नह , याद भी रख और जीवन म आचरण
भी कर।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

आचायः — सूक्तयः जीवने अस्माकं मागदशनं कुव न्त । संस्कृतसा हत्ये सूक्तीनां भाण्डागारः अ स्त । [सू क्तयाँ जीवन
म हमारा मागदशन करती ह। संस्कृत सा हत्य सू क्तय का भण्डार है।]

यही पाठ क कुंजी है: ‘पठामः → स्मरामः → आचरामः’ यह तीन-सीढ़ वाला क्रम पूरे पाठ का सार है, और
आठव सू क्त ‘यस्तु क्रयावान् पुरुषः स व ान्’ इसी बात को दुहराती है।

पाठस्य सूक्तयः — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः — पृष्ठ 86–90
दश सूक्तयः

सू क्तः

सू क्तः 1 माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः ॥१॥

पदच्छे दः — माता भू मः पुत्रः अहम् पृ थव्याः ।
अन्वयः — भू मः माता (अ स्त), अहं पृ थव्याः पुत्रः (अ स्म) ।
अथः ( हन्द ) — पृथ्वी मेरी माता है और म पृथ्वी का पुत्र ँ।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — पृथ्वी अस्मान् माता इव लालय त पालय त च । अतः भू मः अस्माकं सवषां माता अ स्त । वयं
सव अस्याः पृ थव्याः सन्तानाः स्मः । एषा सवदा पूज्या अ स्त ।
[पृथ्वी हम माँ क तरह दुलारती और पालती है। इस लए भू म हम सबक माता है। हम सब इस पृथ्वी क सन्तान ह। यह सदा
पूजनीय है।]

भावः: जो हम अन्न, जल, वायु और आश्रय दे ती है, वह माता ही है। इसी लए पृथ्वी को ‘भू ममाता’ कहा गया।
इसका सीधा प रणाम यह है क पयावरण क रक्षा कोई बाहरी कतव्य नह , अपनी माँ क सेवा है — कूड़ा न
फैलाना, वृक्ष लगाना, जल न बहाना, यही इस सू क्त का आचरण है।

ोतः: यह पं क्त अथववेद के भू मसूक्त से ली गई है। व्याकरण: पृ थव्याः — षष्ठी वभ क्तः, एकवचनम्,
स्त्री लङ्गः (‘पृथ्वी का’)। पुत्रोऽहम् = पुत्रः + अहम् ( वसग-स न्ध; ‘अ’ का लोप होकर अवग्रह ऽ आया)।

सू क्तः 2 न रत्नम न्वष्य त, मृग्यते ह तत् ॥२॥

पदच्छे दः — न रत्नम् अ न्वष्य त मृग्यते ह तत् ।
अन्वयः — रत्नं न अ न्वष्य त, तत् मृग्यते ह ।
अथः ( हन्द ) — रत्न ( कसी को) नह ढूँ ढ़ता, उसे ही ढूँ ढ़ा जाता है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — हीरकाद न रत्ना न ग्राहकस्य अन्वेषणं न कुव न्त अ पतु ग्राहकाः एव रत्नानाम् अन्वेषणं
कुव न्त । तथैव अस्मासु य द गुणाः स न्त त ह गुण ाः स्वयमेव अस्मान् अ न्वष्य आगच्छ न्त ।
[हीरा आ द रत्न ग्राहक को नह खोजते, ब ल्क ग्राहक ही रत्न को खोजते ह। उसी तरह य द हमम गुण ह तो गुण के पारखी स्वयं ही
हम खोजते हुए आ जाते ह।]

भावः: यहाँ रत्न और गुणी व्य क्त क उपमा है। सन्दे श यह है क अपनी प्रशंसा करवाने के पीछे मत दौ ड़ए —
योग्यता अ जत क जए। योग्यता स्वयं पहचान बुला लाती है। ‘मुझे कोई पूछता ही नह ’ क शकायत का उत्तर
यही है — पहले रत्न ब नए।

ोतः: का लदास के कुमारसम्भवम् से। व्याकरण: अ न्वष्य त = अन्वेषणं करो त (कतृवाच्यम् — ढूँ ढ़ता है);
मृग्यते = अ न्वष्यते (कमवाच्यम् — ढूँ ढ़ा जाता है)। एक ही सू क्त म दोन वाच्य आमने-सामने रखे गए ह — यही
इसक सुन्दरता है।

सू क्तः 3 शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम् ॥३॥

पदच्छे दः — शरीरम् आद्यम् खलु धमसाधनम् ।
अन्वयः — शरीरं खलु आद्यं धमसाधनम् ।
अथः ( हन्द ) — शरीर ही नश्चय ही धम का पहला साधन है।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — य द अस्माकं शरीरं स्वस्थम् अ स्त त ह वयं स्वकतव्यस्य पालनं कतु शक्नुमः, अतः अस्मा भः
स्वशरीरस्य रक्षा सवथा करणीया, यतः शरीरम् एव धमपालनस्य प्रथमं साधनम् अ स्त ।
[य द हमारा शरीर स्वस्थ है तभी हम अपने कतव्य का पालन कर सकते ह, इस लए हम हर तरह से अपने शरीर क रक्षा करनी
चा हए, क्य क शरीर ही धमपालन का पहला साधन है।]

भावः: ‘धम’ का अथ यहाँ केवल पूजा-पाठ नह , अपना कतव्य है। पढ़ाई, सेवा, प रश्रम — सब शरीर से ही होते ह।
रोगी शरीर से न पढ़ा जाता है, न कसी क सहायता क जाती है। इसी लए आद्यम् (पहला) शब्द रखा गया — बाक
सब साधन बाद म, शरीर पहले।

आचरण कैसे कर: समय पर सोना और उठना, सन्तु लत भोजन, प्र त दन खेल या व्यायाम, स्वच्छता — यही इस
सू क्त का व्यावहा रक रूप है। ोतः: का लदास के कुमारसम्भवम् से। व्याकरण: खलु एक अव्यय है, अथ —
‘ नश्चय ही’।

सू क्तः 4 क्षणशः कणश ैव वद्यामथ च साधयेत् ॥४॥

पदच्छे दः — क्षणशः कणशः च एव वद्याम् अथम् च साधयेत् ।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः
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अन्वयः — क्षणशः (एव) वद्यां, कणशः एव अथ च साधयेत् ।
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अथः ( हन्द ) — मनुष्य को पल-पल (का उपयोग करके) वद्या और कण-कण (जोड़कर) धन अ जत करना चा हए।
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भावाथः (पुस्तकानुo
. l नाशः न करणीयः ।
c सारम्) — ानं प्राप्तुं समयस्य नरन्तरम् उपयोगः करणीयः । एकस्य अ aप gक्षणस्य
एवम् एव यeदm
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gl कुतो धनम् ।’
कोऽ प धनस्य सङ् ग्रहं कतुम् इच्छ त त ह सः नरन्तरं रूप्यकस्य सङ् ग्रहणं कुयात् । ‘क्षणत्यागे कुतो वद्या,

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[ ान पाने के लए समय का लगातार उपयोग करना चा हए। एक क्षण भी नष्ट नह करना चा हए। इसी तरह जो धन जोड़ना चाहता

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है, उसे लगातार थोड़ा-थोड़ा जोड़ते रहना चा हए। ‘क्षण छोड़ दे ने पर वद्या कहाँ, कण छोड़ दे ने पर धन कहाँ।’]

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भावः: यह सू क्त ‘थोड़ा-थोड़ा, पर रोज़’ का नयम सखाती है। वद्या का माप क्षण है और धन का माप कण। जो
कहता है ‘एक दन म क्या बगड़ जाएगा’, उसके ३६५ दन ऐसे ही नकल जाते ह। प्र त दन आधा घण्टा भी नयम से

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पढ़ा जाए तो वष भर म वह बहुत बड़ा हो जाता है।

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emत् = सम्पादयेत् — व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन, अथ ‘करना चा हए’। कणश ैव = कणशः + च
व्याकरण: क्षणशः, कणशः — ‘शस्’ प्रत्ययान्त अव्यय ह; अथ — क्षणे क्षणे (हर क्षण), कणे कणे (हर कण म)।

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gl + एव ( वसग-स न्ध तथा वृ द्ध-स न्ध)।
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सुखा थनः कुतो वद्या, कुतो वद्या थनः सुखम् ॥५॥
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पदच्छे दः — सुखा थनः कुतः वद्या कुतः वद्या थनः सुखम् ।
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em( हन्द ) — सुख चाहने वाले को वद्या कहाँ, और वद्या चाहने वाले को सुख (आराम) कहाँ ?
अन्वयः — सुखा थनः वद्या कुतः (भवेत्), वद्या थनः सुखं कुतः (भवेत्) ।

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अथः
a भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — यः सदै व सुखम् इच्छ त, प रश्रमं न करो त, अलसः अ स्त, सः कथं वद्यां प्राप्तुं शक्नो त ?

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अतः यः ानं ल ुम् इच्छ त सः आलस्यं सुखं च त्यक्त्वा नरन्तरं वद्याजनं कुयात् ।

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[जो सदा सुख ही चाहता है, प रश्रम नह करता, आलसी है — वह भला वद्या कैसे पा सकता है? इस लए जो ान पाना चाहता है
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उसे आलस्य और आराम छोड़कर लगातार वद्या अ जत करनी चा हए।]

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भावः: यहाँ ‘सुख’ का अथ है आराम, आलस्य, सु वधा। सू क्त कहती है क वद्या और आराम एक साथ नह चल

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सकते — दोन म से एक चुनना पड़ता है। पर ध्यान रहे, यह त्याग स्थायी नह है: आज का प रश्रम ही कल का स ा

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सुख बनता है।
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m व्याकरण: सुखा थनः = सुखम् इच्छतः — षष्ठी एकवचन, ‘सुख चाहने वाले का’। कुतः अव्यय है — ‘कहाँ से’।
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ag कुतो वद्या = कुतः + वद्या ( वसग-स न्ध — वसग का ‘ओ’ हुआ)।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

सू क्तः 6 गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गं न च वयः ॥६॥

पदच्छे दः — गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गम् न च वयः ।
अन्वयः — गु णषु गुणाः (एव) पूजास्थानं (भव न्त), लङ्गं च न (भव त), वयः च न (भव त) ।
अथः ( हन्द ) — गुणवान म गुण ही आदर के स्थान होते ह, न लङ्ग (स्त्री-पुरुष होना) और न आयु।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — गुणानां सवदा एव आदरः भव त । गुणवान् जनः पुरुषः स्त्री वा भवेत्, बालः वृद्धः वा भवेत्,
सः सवदा पूजनीयः एव भव त । आदरस्य कृते लङ्गम् आयुः वा महत्त्वपूण न भव त ।
[गुण का सदा आदर होता है। गुणवान् व्य क्त पुरुष हो या स्त्री, बालक हो या वृद्ध — वह सदा आदरणीय ही होता है। आदर के लए
लङ्ग या आयु महत्त्वपूण नह है।]

भावः: यह सू क्त समानता का पाठ पढ़ाती है। आदर क एकमात्र कसौट गुण है — न क ‘लड़का है या लड़क ’,
‘बड़ा है या छोटा’। ुव, प्र ाद और न चकेता बालक ही थे, पर गुण के कारण आज भी स्मरणीय ह; गाग और
मैत्रेयी स्त्रयाँ थ , पर वद्वत्ता के कारण सभा म पूज्य थ ।

ोतः: भवभू त के उत्तररामच रतम् से। व्याकरण: गु णषु — सप्तमी वभ क्तः, बहुवचनम् (‘गुणवान म’)। वयः =
अवस्था, आयु — सकारान्त नपुंसक लङ्ग शब्द ‘वयस्’ का प्रथमा एकवचन।

सू क्तः 7 मा ू ह द नं वचः ॥७॥

पदच्छे दः — मा ू ह द नम् वचः ।
अन्वयः — (त्वं) द नं वचः मा ू ह ।
अथः ( हन्द ) — तुम द न ( गड़ गड़ाने वाला) वचन मत बोलो।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — समाजे सव वधाः जनाः भव न्त । के चत् साहाय्यं कुव न्त । के चत् केवलं वकत्थनं कुव न्त,
अतः स्वा भमानी जनः यस्य कस्या प पुरतः साहाय्यस्य याचनां न कुयात् ।
[समाज म सब तरह के लोग होते ह। कुछ सहायता करते ह, कुछ केवल अपनी झूठ बड़ाई करते ह; इस लए स्वा भमानी व्य क्त को
कसी के भी सामने सहायता क याचना नह करनी चा हए।]

भावः: यह सू क्त स्वा भमान सखाती है। ‘द न वचन’ का अथ है — गड़ गड़ाकर, अपने को छोटा दखाकर माँगना।
सू क्त यह नह कहती क सहायता कभी मत लो; वह यह कहती है क आत्मसम्मान बेचकर मत लो। पहले अपने
पुरुषाथ पर भरोसा करो — और सहायता माँगनी ही पड़े तो सीधे, सम्मानपूवक माँगो।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण: मा नषेधाथक अव्यय है — इसके साथ लोट् लकार आता है, ‘न’ नह । ू ह = वद (‘ ू’ धातु, लोट्
लकार, मध्यमपुरुष एकवचन)। द नम् = दै न्ययुक्तम्; यह वचः का वशेषण है, इस लए दोन नपुंसक लङ्ग द्वतीया
एकवचन म ह।

सू क्तः 8 यस्तु क्रयावान् पुरुषः स व ान् ॥८॥

पदच्छे दः — यः तु क्रयावान् पुरुषः सः वद्वान् ।
अन्वयः — यः तु क्रयावान् पुरुषः सः वद्वान् (भव त) ।
अथः ( हन्द ) — जो पुरुष क्रयाशील (कम करने वाला) है, वही वद्वान् है।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — अ जतस्य ानस्य जीवने आचरणेन, व्यवहारे च प्रयोगेण ह मनुष्यः वास्त वकः व ान्
भव त, न तु केवलम् अध्ययनेन । वद्या अनुकूल-कमणा वना व्यथा भव त । ‘ ानं भारः क्रयां वना’ ।
[अ जत कए हुए ान को जीवन म आचरण और व्यवहार म प्रयोग करने से ही मनुष्य स ा वद्वान् बनता है, केवल पढ़ लेने से
नह । अनुकूल कम के बना वद्या व्यथ है। ‘ क्रया के बना ान बोझ है’।]

भावः: पुस्तक कण्ठस्थ कर लेना वद्वत्ता नह है। तैरने के सौ ोक याद ह पर जल म उतरना न आता हो, तो वह
ान भार ही है। पाठ के आर म्भक संवाद म आचाय ने यही कहा था — ‘न केवलं पठामः अ पतु स्मरामः, जीवने
आचरामः च’। इसी को यह सू क्त एक पं क्त म कह दे ती है।

व्याकरण: यः … सः — यह यत्-तत् सम्बन्ध है (जो … वह)। क्रयावान् = क्रयाशीलः — ‘ क्रया’ शब्द से ‘मतुप्’
प्रत्यय लगकर बना, अथ ‘ क्रयावाला’। यस्तु = यः + तु ( वसग-स न्ध — वसग का ‘स्’ हुआ)।

सू क्तः 9 शीलं परं भूषणम् ॥९॥

पदच्छे दः — शीलम् परम् भूषणम् ।
अन्वयः — शीलं परं भूषणम् (अ स्त) ।
अथः ( हन्द ) — शील (सदाचरण) ही सबसे श्रेष्ठ आभूषण है।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — मनुष्यस्य आचरणम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अ स्त । सदाचारं वना अन्ये गुणाः नरथकाः
भव न्त ।
[मनुष्य का आचरण ही सवश्रेष्ठ आभूषण है। सदाचार के बना दूसरे गुण नरथक हो जाते ह।]

भावः: सोने-चाँद के गहने शरीर को सजाते ह, पर वे उतारे भी जा सकते ह और चुराए भी जा सकते ह। शील —
अथात् स ाई, वनय, दया, संयम — ऐसा गहना है जो न उतरता है, न चुराया जा सकता है, और जो व्य क्त के साथ
सदा रहता है। इस लए इसे परं भूषणम् (सवश्रेष्ठ आभूषण) कहा गया।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण: तीन पद — शीलम्, परम्, भूषणम् — नपुंसक लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन म ह, क्य क वशेषण
अपने वशेष्य के लङ्ग-वचन- वभ क्त का अनुसरण करता है। ‘अ स्त’ क्रया यहाँ अध्याहृत ( छपी हुई) है।

सू क्तः 10 हतं मनोहा र च दुलभं वचः ॥१०॥

पदच्छे दः — हतम् मनोहा र च दुलभम् वचः ।
अन्वयः — हतं मनोहा र च वचः दुलभं (भव त) ।
अथः ( हन्द ) — जो वचन हतकारी भी हो और मन को हरने वाला भी हो, वह दुलभ होता है।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — केचन हतकारकं वचनं वद न्त कन्तु तत् कठोरतया वद न्त । केचन मनोरञ्जकं वाक्यं
वद न्त कन्तु तत् हतकारकं न भव त । तादृशं वचनं दुलभं भव त यत् हतकारकम् अ प स्यात्, मनोरमम् अ प स्यात् ।
[कुछ लोग हतकारी बात कहते ह, पर कठोरता से कहते ह। कुछ लोग मनोरञ्जक बात कहते ह, पर वह हतकारी नह होती। ऐसा
वचन दुलभ होता है जो हतकारी भी हो और मन को भाने वाला भी।]
चार प्रकार के वचन — एक ता लका म दे खए:

वचनम् हतकारकम् ? मनोहा र ? उदाहरणम् / प रणामः

कठोरं सत्यम् आम् न ‘तुम मूख हो, पढ़ो!’ — बात सही, पर सुनने वाला चोट खाकर मुँह फेर लेता है

मध रु ं चाटुवचनम् न आम् चापलूसी — सुनने म मीठ , पर हा न करती है

कठोरम् अिहतं च न न गाली, अपमान — सवथा त्याज्य

िहतं मनोहािर च आम् आम् ‘तुम इससे बेहतर कर सकते हो, थोड़ा और अभ्यास करो’ — यही दुलभ है

भावः: सत्य बोलना ही पयाप्त नह ; कैसे बोला जाए, यह भी उतना ही महत्त्वपूण है। सत्य को मधुरता के साथ कहना
एक कला है और यही सबसे क ठन है — इसी लए इसे दुलभम् कहा गया। यही पाठ का शीषक भी है।

ोतः: महाक व भार व के कराताजुनीयम् से। व्याकरण: मनोहा र = मनः हर त इ त — मन को हरने वाला (यहाँ
नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन)। वचः — सकारान्त नपुंसक लङ्ग शब्द ‘वचस्’ का प्रथमा एकवचन।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 92

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.1 — अधो ल खता न वाक्या न प ठत्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इ त वदन्तु लखन्तु च

अभ्यासः

प्र.1 (क) क वयं पृ थव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः ?

आम् । वयं पृ थव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः ।
[हाँ। हम पृथ्वी के पुत्र और पु त्रयाँ ह।]

आधार: पहली सू क्त — माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः। भावाथ म स्पष्ट कहा गया है — ‘वयं सव अस्याः पृ थव्याः
सन्तानाः स्मः’।

प्र.1 (ख) क रत्नम् अ न्वष्य त ?

न । रत्नं न अ न्वष्य त, तत् मृग्यते ह ।
[नह । रत्न नह ढूँ ढ़ता, उसे ही ढूँ ढ़ा जाता है।]

आधार: दूसरी सू क्त — न रत्नम न्वष्य त, मृग्यते ह तत्। ग्राहक ही रत्न को खोजते ह, रत्न ग्राहक को नह
खोजता।

प्र.1 (ग) क शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अ स्त ?

आम् । शीलम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अ स्त ।
[हाँ। शील ही सवश्रेष्ठ आभूषण है।]

आधार: नव सू क्त — शीलं परं भूषणम्। भावाथ — ‘मनुष्यस्य आचरणम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अ स्त’।

प्र.1 (घ) क शरीरम् आद्यं धमसाधनम् ?

आम् । शरीरं खलु आद्यं धमसाधनम् ।
[हाँ। शरीर ही नश्चय ही धम का पहला साधन है।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः
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आधार: तीसरी सू क्त — शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्। स्वस्थ शरीर से ही कतव्य-पालन सम्भव है।

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aप्र.1gl(ङ) क गुणानां सवदा एव आदरः भव त ?

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आम् । गुणानां सवदा एव आदरः भव त ।
[हाँ। गुण का सदा ही आदर होता है।]
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आधार: छठ सू क्त — गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गं न च वयः। आदर क कसौट गुण है, लङ्ग या आयु नह ।

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a s em क क्रयाशीलः एव व ान् भव त ?
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[हाँ। जो क्रयाशील पुरुष है, वही वद्वान् होताgहैl।a
आम् । यः क्रयावान् पुरुषः सः एव वद्वान् भव त ।

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आधार: आठव सू क्त — यस्तु क्रयावान् पुरुषः स वद्वान्। ‘ ानं भारः क्रयां वना’ — क्रया के बना ान बोझ है।

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a s em(छ)
agl प्र.1 कम् अस्मा भः केवलं मनोरञ्जका न वाक्या न वक्तव्या न ?

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s बोलना चा हए।]
न । अस्मा भः हतकारकं मनोहा र च वचः वक्तव्यम् ।

g l aवचन
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[नह । हम हतकारी और मन को भाने वाला

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आधार: दसव सू क्त — हतं मनोहा र च दुलभं वचः। केवल मनोरञ्जक बात हतकारी नह होती; उत्तम वही वचन
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है जसम हत और माधुय दोन ह ।
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प्र.1 (ज) यः सदा सुखम् इच्छ त, क सः वद्यां प्रा ो त ?

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न । यः सदा सुखम् इच्छ त सः वद्यां न प्रा ो त ।
[नह । जो सदा सुख (आराम) ही चाहता है, वह वद्या नह पाता।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

आधार: पाँचव सू क्त — सुखा थनः कुतो वद्या, कुतो वद्या थनः सुखम्। वद्या और आलस्य एक साथ नह रह
सकते।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 92
प्र.2 — पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु

अभ्यासः

प्र.2 (क) आद्यं धमसाधनं कम् ?

शरीरम् ।
[शरीर।]

क्य : ‘शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्’ — यहाँ प्रश्न ‘ कम्’ (क्या) से है और उत्तर प्रथमा वभ क्त, एकवचन म एक ही
पद म दे ना है — शरीरम्।

प्र.2 (ख) क दृशं वचः मा ू ह ?

द नम् ।
[द न ( गड़ गड़ाने वाला) वचन।]

क्य : ‘मा ू ह द नं वचः’ — प्रश्न क दृशम् (कैसा) से है, अतः उत्तर वशेषण होगा। ‘वचः’ नपुंसक लङ्ग है, इस लए
वशेषण भी नपुंसक लङ्ग — द नम्।

प्र.2 (ग) श्रेष्ठम् आभूषणं कम् अ स्त ?

शीलम् ।
[शील अथात् सदाचरण।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

क्य : ‘शीलं परं भूषणम्’ — शील ही सबसे बड़ा गहना है। पाठ के शब्दाथ म भी दया है — शीलम् = आचरणम्
(च रत्र)।

प्र.2 (घ) सवषां मनुष्याणां माता का अ स्त ?

भू मः (पृ थवी) ।
[भू म अथात् पृथ्वी।]

क्य : ‘माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः’ — भू म ही सबक माता है। प्रश्न म ‘का’ (स्त्री लङ्ग) पूछा गया है, इस लए उत्तर
भी स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन — भू मः।

प्र.2 (ङ) रत्नानाम् अन्वेषणं के कुव न्त ?

ग्राहकाः ।
[ग्राहक लोग।]

क्य : दूसरी सू क्त के भावाथ म है — ‘ग्राहकाः एव रत्नानाम् अन्वेषणं कुव न्त’। प्रश्नपद ‘के’ बहुवचन है और क्रया
‘कुव न्त’ भी बहुवचन, इस लए उत्तर भी बहुवचन म — ग्राहकाः।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 92–93
प्र.3 — पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखन्तु

अभ्यासः

प्र.3 (क) कः व ान् अ स्त ?

यः क्रयावान् पुरुषः सः व ान् अ स्त ।
[जो पुरुष क्रयाशील है, वही वद्वान् है।]

पूण वाक्य कैसे बनाएँ: ‘कः’ का उत्तर यः … सः … रचना से द जए। केवल ‘ क्रयावान्’ लख दे ना एकपद य उत्तर
होगा; यहाँ पूरा वाक्य माँगा गया है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

वस्तार से: अ जत ान को जो जीवन म आचरण और व्यवहार म उतारता है, वही वास्त वक वद्वान् है — केवल
पढ़ लेने से कोई वद्वान् नह होता।

प्र.3 (ख) गु णषु पूजास्थानं कम् ?

गु णषु गुणाः एव पूजास्थानं भव न्त, न च लङ्गं न च वयः ।
[गुणवान म गुण ही आदर के स्थान होते ह, न लङ्ग और न आयु।]

ध्यान द जए: कता ‘गुणाः’ बहुवचन है, इस लए क्रया भी बहुवचन — भव न्त, न क ‘भव त’।

प्र.3 (ग) कः वद्यां न प्रा ो त ?

यः सदै व सुखम् इच्छ त, प रश्रमं न करो त, अलसः च अ स्त, सः वद्यां न प्रा ो त ।
[जो सदा सुख ही चाहता है, प रश्रम नह करता और आलसी है, वह वद्या नह पाता।]

आधार: पाँचव सू क्त का भावाथ ज्य -का-त्य यही कहता है। सं क्षप्त उत्तर भी दे सकते ह — सुखाथ वद्यां न
प्रा ो त ।

प्र.3 (घ) मनुष्यः वद्याम् अथ च कथं साधयेत् ?

मनुष्यः क्षणशः वद्यां कणशः च अथ साधयेत् ।
[मनुष्य को पल-पल का उपयोग करके वद्या और कण-कण जोड़कर धन अ जत करना चा हए।]

प्रश्नपद ‘कथम्’: ‘कैसे’ का उत्तर री त बताने वाले अव्यय से मलता है — यहाँ क्षणशः (क्षणे क्षणे) और कणशः
(कणे कणे)। एक भी क्षण व्यथ न जाए — ‘क्षणत्यागे कुतो वद्या, कणत्यागे कुतो धनम्’।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 (ङ) क दृशं वचनं दुलभम् ?

यत् वचनं हतकारकम् अ प स्यात् मनोरमम् अ प स्यात्, तादृशं वचनं दुलभम् ।
[जो वचन हतकारी भी हो और मन को भाने वाला भी हो, वैसा वचन दुलभ है।]

रचना: ‘क दृशम्’ का उत्तर यत् … तादृशम् … से द जए। संक्षेप म — हतं मनोहा र च वचः दुलभं भव त ।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 93
प्र.4 — रेखाङ् कतपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुवन्तु

अभ्यासः

प्र.4 (क) शीलं परं भूषणम् । (रेखाङ् कतपदम् — शीलं)

क परं भूषणम् ?
[सबसे श्रेष्ठ आभूषण क्या है?]

नयम: रेखाङ् कत पद को हटाकर उसके स्थान पर उसी लङ्ग- वभ क्त-वचन का प्रश्नवाचक सवनाम रख द जए,
शेष वाक्य ज्य -का-त्य रहेगा। ‘शीलम्’ नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन है, अतः प्रश्नपद कम् (यहाँ अनुस्वार के साथ
‘ क’)।

प्र.4 (ख) मनुष्यः पृ थव्याः सन्तानः अ स्त । (रेखाङ् कतपदम् — पृ थव्याः)

मनुष्यः कस्याः सन्तानः अ स्त ?
[मनुष्य कसक सन्तान है?]

क्य ‘कस्याः’: ‘पृ थव्याः’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग है। इसी रूप का प्रश्नवाचक सवनाम है कस्याः (पुं लङ्ग
म होता — कस्य)। लङ्ग बदलते ही प्रश्नपद भी बदल जाता है — यही इस अभ्यास क परीक्षा है।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः
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गु णषु लङ्गं वयः च न महत्त्वपूणम् । (रेखाङ् कतपदम् — गु णषु)
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प्र.4 (ग)

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l वयः च न महत्त्वपूणम् ?
केषुgलङ्गं
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[ कनम लङ्ग और आयु महत्त्वपूण नह ह?]

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क्य ‘केषु’: ‘गु णषु’ सप्तमी वभ क्त, बहुवचन, पुं लङ्ग है। ‘ कम्’ शब्द का सप्तमी बहुवचन रूप है केषु (एकवचन
म होता — क स्मन्)।
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हतकारकं मनोहा र च वचः दुलभं भव त । (रेखाङ् कतपदम् — वचः)

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a हतकारकं मनोहा र च क दुलभं भव त ?

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[ हतकारी और मन को भाने वाला क्या दुलभ होता है?]

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क्य ‘ कम्’: ‘वचः’ नपुंसक लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन है, अतः उसके स्थान पर कम् / क आएगा। शेष
वाक्य नह बदलता। a

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m(2) उसी रूप का
याद र खए — तीन सोपान: (1) रेखाङ् कत पद क वभ क्त, वचन और लङ्ग पहचा नए;
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. c a gla म प्रश्न चह्न (?) लगाइए।
प्रश्नपदoचुmनए (कः/का/ कम्, कस्य/कस्याः, केषु, कया, कस्मै …); (3) वाक्य के अन्त

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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 93
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प्र.5 — पाठस्य आधारेण उदाहरणानुसारं समु चतं मेलनं कुवन्तु

अभ्यासः
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(क) क्षणशः कणशः साधयेत् / (ख) सवश्रेष्ठम् आभूषणम् / (ग) रत्नं न अ न्वष्य त, तत् / (घ) आद्यं धमसाधनम्

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प्र.5

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/ (ङ) हतकारकं मनोहा र च वचः / (च) पूजास्थानम् — द क्षणस्तम्भः : शरीरम् , गुणाः, दुलभम्, शीलम्, वद्याम्

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.co अथ च, मृग्यते agl
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agl उत्तर
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पुस्तक म (क) का मेल उदाहरण के रूप म पहले से जोड़ा गया है — क्षणशः कणशः साधयेत् → वद्याम् अथ च। शेष इस प्रकार

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जुड़गे —
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क्रमः वामस्तम्भः मेलनम् (द क्षणस्तम्भः) आधारभूता सू क्तः

(क) क्षणशः कणशः साधयेत ् िवद्याम् अथ ं च क्षणशः कणशश्चैव वद्यामथ च साधयेत् ॥४॥ (उदाहरणम्)

(ख) सवश्रेष्ठम् आभूषणम् शीलम् शीलं परं भूषणम् ॥९॥

(ग) रत्नं न अिन्वष्यित, तत् मृग्यते न रत्नम न्वष्य त, मृग्यते ह तत् ॥२॥

(घ) आद्यं धमसाधनम् शरीरम् शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम् ॥३॥

(ङ) िहतकारकं मनोहािर च वचः दुल भम् हतं मनोहा र च दुलभं वचः ॥१०॥

(च) पूजास्थानम् गुणाः गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गं न च वयः ॥६॥

पूण वाक्य के रूप म —

सवश्रेष्ठम् आभूषणं शीलम् (अ स्त) । [सवश्रेष्ठ आभूषण शील है।]
रत्नं न अ न्वष्य त, तत् मृग्यते । [रत्न नह ढूँ ढ़ता, वह ढूँ ढ़ा जाता है।]
आद्यं धमसाधनं शरीरम् (अ स्त) । [धम का पहला साधन शरीर है।]
हतकारकं मनोहा र च वचः दुलभम् (अ स्त) । [ हतकारी और मनोहर वचन दुलभ है।]
गु णषु पूजास्थानं गुणाः (स न्त) । [गुणवान म आदर का स्थान गुण ह।]

मलान क यु क्त: दाय स्तम्भ के जस पद का लङ्ग-वचन बाय पद से मेल खाए, वही जोड़ा सही होता है — जैसे
‘पूजास्थानम्’ के सामने ‘गुणाः’ (बहुवचन) आया, क्य क सू क्त म भी गुण ही पूजास्थान बताए गए ह।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 93
प्र.6 — पाठात् अधो ल खतानां पदानां समानाथकपदा न चत्वा लखन्तु

अभ्यासः

प्र.6 (क) सुतः — ........................

सुतः — पुत्रः । (यह उदाहरण पुस्तक म पहले से भरा हुआ है।)
[सुत = पुत्र, बेटा।]

पाठ म कहाँ: पहली सू क्त — माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.6 (ख) प्रथमम् — ........................

प्रथमम् — आद्यम् ।
[प्रथम = पहला।]

पाठ म कहाँ: तीसरी सू क्त — शरीरम् आद्यं खलु धमसाधनम्। शब्दाथ-ता लका म भी दया है — आद्यम् =
प्रथमम्।

प्र.6 (ग) धनम् — ........................

धनम् — अथम् ( वत्तम्) ।
[धन = सम्प त्त, रुपया-पैसा।]

पाठ म कहाँ: चौथी सू क्त — क्षणशः कणशश्चैव वद्याम् अथ च साधयेत्। शब्दाथ-ता लका — अथम् = वत्तम् (धन
को)।

प्र.6 (घ) अवस्था — ........................

अवस्था — वयः ।
[अवस्था = आयु, उम्र।]

पाठ म कहाँ: छठ सू क्त — गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गं न च वयः। शब्दाथ-ता लका — वयः = अवस्था
(आयु)।

प्र.6 (ङ) वचनम् — ........................

वचनम् — वचः ।
[वचन = बात, कथन।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

पाठ म कहाँ: सातव सू क्त — ‘मा ू ह द नं वचः’ तथा दसव सू क्त — ‘ हतं मनोहा र च दुलभं वचः’। ‘वचस्’
सकारान्त नपुंसक लङ्ग शब्द है; प्रथमा एकवचन म ‘वचः’ बनता है।

प्र.6 (च) आचरणम् — ........................

आचरणम् — शीलम् ।
[आचरण = च रत्र, व्यवहार।]

पाठ म कहाँ: नव सू क्त — शीलं परं भूषणम्। शब्दाथ-ता लका — शीलम् = आचरणम् (च रत्र)।

एक दृ ष्ट म पूरी सूची: सुतः–पुत्रः, प्रथमम्–आद्यम्, धनम्–अथम्, अवस्था–वयः, वचनम्–वचः, आचरणम्–शीलम्।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 94
प्र.7 — उदाहरणानुसारम् अधो ल खतेषु वाक्येषु रेखाङ् कतपदानां वभ क्तं न दशन्तु

अभ्यासः

प्र.7 (क) माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः । (रेखाङ् कतपदम् — पृ थव्याः)

पृ थव्याः — षष्ठी वभ क्तः, एकवचनम्, स्त्री लङ्गः । (यह उदाहरण पुस्तक म पहले से दया हुआ है।)
[‘पृथ्वी का / क ’ — सम्बन्ध बताने वाली षष्ठी वभ क्त, एकवचन।]

पहचान: षष्ठी वभ क्त हन्द म ‘का / के / क ’ का अथ दे ती है। यहाँ ‘म पृथ्वी का पुत्र ँ’ — इस लए ‘पृ थवी’
शब्द षष्ठी एकवचन म आकर पृ थव्याः बना।

प्र.7 (ख) गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च लङ्गं न च वयः । (रेखाङ् कतपदम् — गु णषु)

गु णषु — सप्तमी वभ क्तः, बहुवचनम्, पुं लङ्गः ।
[‘गुणवान म’ — अ धकरण बताने वाली सप्तमी वभ क्त, बहुवचन।]

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

पहचान: सप्तमी वभ क्त ‘म / पर’ का अथ दे ती है। ‘गु णन्’ (नकारान्त पुं लङ्ग) का सप्तमी बहुवचन रूप है गु णषु
(एकवचन — गु ण न)।

प्र.7 (ग) शीलं परं भूषणम् । (रेखाङ् कतपदम् — शीलं)

शीलम् — प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम्, नपुंसक लङ्गः ।
[‘शील’ — कता/उ े श्य होने के कारण प्रथमा वभ क्त, एकवचन।]

पहचान: वाक्य म जो उ े श्य (कता) होता है वह प्रथमा म रहता है। यहाँ ‘शीलम्’ के वषय म कहा जा रहा है क वह
‘परं भूषणम्’ है — इस लए तीन पद प्रथमा एकवचन नपुंसक लङ्ग म ह।

प्र.7 (घ) क्षणशः कणश ैव वद्याम् अथ च साधयेत् । (रेखाङ् कतपदम् — वद्याम्)

वद्याम् — तीया वभ क्तः, एकवचनम्, स्त्री लङ्गः ।
[‘ वद्या को’ — कम होने के कारण द्वतीया वभ क्त, एकवचन।]

पहचान: ‘साधयेत्’ क्रया का कम ‘ वद्या’ है — ‘ कसे साधे? वद्या को’। कम म द्वतीया वभ क्त आती है;
आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द का द्वतीया एकवचन –आम् पर समाप्त होता है — वद्या → वद्याम्।

प्र.7 (ङ) सुखा थनः कुतो वद्या कुतो वद्या थनः सुखम् । (रेखाङ् कतपदम् — वद्या थनः)

वद्या थनः — षष्ठी वभ क्तः, एकवचनम्, पुं लङ्गः ।
[‘ वद्याथ का’ — सम्बन्ध बताने वाली षष्ठी वभ क्त, एकवचन।]

पहचान: अथ है ‘ वद्याथ को सुख कहाँ’ अथात् ‘ वद्याथ का सुख कहाँ’ — सम्बन्ध, इस लए षष्ठी। ठ क इसी तरह
वाक्य का पहला पद सुखा थनः भी षष्ठी एकवचन है (= सुखम् इच्छतः, ‘सुख चाहने वाले का’)।

सावधानी: ‘ वद्या थनः’ रूप षष्ठी/पञ्चमी एकवचन भी होता है और प्रथमा/ द्वतीया बहुवचन भी। कस वभ क्त म
है, यह वाक्य के अथ से तय होता है — यहाँ अथ ‘का’ है, इस लए षष्ठी एकवचन।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः
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हतं मनोहा र च दुलभं वचः । (रेखाङ् कतपदम् — वचः)
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प्र.7 (च)

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l प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम्, नपुंसक लङ्गः ।
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[‘वचन’ — उ े श्य होने के कारण प्रथमा वभ क्त, एकवचन।]

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पहचान: वाक्य कहता है — ‘वचः दुलभं (भव त)’ — अथात् ‘वचः’ ही उ े श्य है, अतः प्रथमा। ‘वचस्’ सकारान्त

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नपुंसक लङ्ग शब्द है; प्रथमा एकवचन म वसग आकर वचः बनता है ( द्वतीया एकवचन का रूप भी ‘वचः’ ही होता
है, पर यहाँ कोई सकमक क्रया नह है)।

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coकmु मः — पृष्ठ 94 g l as
वयम् अभ्यासं .
m स्वरः अ स्त तत्र अनुस्वारस्य स्थाने ‘म्’ ल खत्वा वाक्या न पुनः लखन्तु a
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प्र.8 —aयत्र
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प्र.8 (क) न रत्नं अ न्वष्य त ।
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न रत्नम् अ न्वष्य त । (यह उदाहरण पुस्तक म पहले से भरा हुआ है।)

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[रत्न नह ढूँ ढ़ता।]

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नयम: ‘रत्नं’ के आगे अ न्वष्य त है, जो स्वर ‘अ’ से आरम्भ होता है। नयम कहता है — म्-कार के आगे स्वर हो
a तो अनुस्वार नह , ‘म्’ ही लखा जाता है। अतः रत्नं → रत्नम्।

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प्र.8 (ख) शरीरं आद्यं खलु धमसाधनम् ।

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शरीरम् आद्यं खलु धमसाधनम् ।

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[शरीर ही नश्चय ही धम का पहला साधन है।]
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केवल एक ही बदला: ‘शरीरं’ के आगे आद्यं है — स्वर ‘आ’, इस लए ‘शरीरम्’ हुआ। कन्तु ‘आद्यं’ के आगे खलु
है — व्यञ्जन ‘ख्’, इस लए वहाँ अनुस्वार ज्य -का-त्य रहेगा।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.8 (ग) वयं अद्यतनं पाठं पठामः ।

वयम् अद्यतनं पाठं पठामः ।
[हम आज का पाठ पढ़ते ह।]

क्य : ‘वयं’ के आगे अद्यतनं है — स्वर ‘अ’, अतः वयम्। ‘अद्यतनं’ के आगे ‘पाठं ’ (प्) और ‘पाठं ’ के आगे
‘पठामः’ (प्) — दोन व्यञ्जन ह, इस लए वे अनुस्वार के साथ ही रहगे।

प्र.8 (घ) त्वं अस्माकं गृहं आगच्छ ।

त्वम् अस्माकं गृहम् आगच्छ ।
[तुम हमारे घर आओ।]

दो जगह बदलाव: ‘त्वं’ के आगे अस्माकं (स्वर ‘अ’) → त्वम्; ‘गृहं’ के आगे आगच्छ (स्वर ‘आ’) → गृहम्। बीच
म ‘अस्माकं’ के आगे ‘गृहं’ है — व्यञ्जन ‘ग्’, इस लए वह नह बदला।

प्र.8 (ङ) अहं एकं प्रश्नं प्रष्टु ं इच्छा म ।

अहम् एकं प्रश्नं प्रष्टु म् इच्छा म ।
[म एक प्रश्न पूछना चाहता ँ।]

दो जगह बदलाव: ‘अहं’ के आगे एकं (स्वर ‘ए’) → अहम्; ‘प्रष्टु ं’ के आगे इच्छा म (स्वर ‘इ’) → प्रष्टु म्। ‘एकं →
प्रश्नं’ और ‘प्रश्नं → प्रष्टु ं’ म आगे ‘प्’ व्यञ्जन है, इस लए वहाँ अनुस्वार बना रहा।

ध्यान र खए: स्वर केवल अ/आ नह होते — इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ भी स्वर ह। इसी लए ‘एकं’ और
‘इच्छा म’ के पहले वाले पद भी ‘म्’ म बदले।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.8 (च) गुणं अज यतुं अ धकं प्रयत्नं करोतु ।

गुणम् अज यतुम् अ धकं प्रयत्नं करोतु ।
[गुण अ जत करने के लए अ धक प्रयत्न क जए।]

दो जगह बदलाव: ‘गुणं’ के आगे अज यतुं (स्वर ‘अ’) → गुणम्; ‘अज यतुं’ के आगे अ धकं (स्वर ‘अ’) →
अज यतुम्। ‘अ धकं → प्रयत्नं’ और ‘प्रयत्नं → करोतु’ म आगे व्यञ्जन (प्, क्) है, इस लए वे अनुस्वार म ही रहे।

पूरा नयम एक पं क्त म: म् + व्यञ्जन = अनुस्वार ( ◌ं ) ; म् + स्वर = म् — यही ‘मकारलेखनम्’ है, जो अगले
भाग (योग्यता वस्तरः) म वस्तार से दया गया है।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 94–95
योग्यता वस्तरः

योग्यता वस्तरः

प्र.1 मकारलेखनम् — यदा ‘म’कारात् (म्) परं व्यञ्जनवणः भव त, तदा ‘म’कारस्य (म्) स्थाने अनुस्वारः ( ◌ं )
लेखनीयः । यदा ‘म’कारात् (म्) परं स्वरवणः भव त, तदा ‘म’कारः (म्) एव लेखनीयः । यथा — पुस्तकम् पठ त =
पुस्तकं पठ त । पुस्तकम् अपठत् = पुस्तकम् अपठत् ।

नयमः — ‘म्’ के तुरन्त बाद व्यञ्जन हो तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार ( ◌ं ) ल खए; ‘म्’ के बाद स्वर हो तो ‘म्’ ही ल खए।

मूल रूप ‘म्’ के आगे क्या है व्यञ्जन या स्वर लखा जाएगा

पुस्तकम् पठित प व्यञ्जनम् पुस्तकं पठित
पुस्तकम् अपठत् अ स्वरः पुस्तकम् अपठत्
रत्नम् अिन्वष्यित अ स्वरः रत्नम् अिन्वष्यित
रत्नम् पश्यित प व्यञ्जनम् रत्नं पश्यित
ग ृहम् आगच्छ आ स्वरः गृहम् आगच्छ
ग ृहम् गच्छित ग व्यञ्जनम् गृहं गच्छित

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

ऐसा क्य होता है: ‘म्’ ओष्ठ्य (होठ से बोला जाने वाला) वण है। जब आगे व्यञ्जन आता है तो उ ारण म होठ
पूरे बन्द नह होते, केवल ना सक्य गूँज रह जाती है — उसी गूँज का लेखन- चह्न अनुस्वार है। स्वर के आगे होठ पूरे
बन्द होते ह, इस लए वहाँ ‘म्’ पूरा बना रहता है।

वाक्य म उपयोग: इसी नयम का सीधा अभ्यास प्र.8 है। जाँचने का सरल तरीका — जस पद के आगे का शब्द अ,
आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ से शुरू हो, वह ‘म्’ ल खए; शेष सब जगह अनुस्वार।

प्र.2 सू क्तः — सु + उ क्तः । शोभना + उ क्तः = सू क्तः इ त कथ्यते । एतासु सू क्तषु जीवनमूल्या न स न्न हता न
भव न्त । एताः सूक्तयः अस्मान् जीवने उन्नत्यथ प्रेरय न्त । संस्कृतसा हत्यम् एता भः सू क्त भः प रपूणम् अ स्त ।

सू क्तः = सु + उ क्तः — अथात् शोभना उ क्तः (सुन्दर कथन)। ‘सु’ उपसग का अथ है — अच्छा, शोभन; ‘उ क्तः’ का अथ है —
कहा हुआ वचन।

स कैसे हुई: सु का अ न्तम वण उ और उ क्तः का प्रथम वण भी उ — दो सवण स्वर मलकर द घ ऊ हो गए।
यह सवणद घ-स न्ध (द घ-स न्ध) है — उ + उ = ऊ। इसी लए सु + उ क्तः = सू क्तः।

पुस्तक इस भाग म तीन बात और कहती है —

एतासु सू क्तषु जीवनमूल्या न स न्न हता न भव न्त । [इन सू क्तय म जीवनमूल्य छपे रहते ह।]
एताः सूक्तयः अस्मान् जीवने उन्नत्यथ प्रेरय न्त । [ये सू क्तयाँ हम जीवन म उन्न त के लए प्रे रत करती ह।]
संस्कृतसा हत्यम् एता भः सू क्त भः प रपूणम् अ स्त । [संस्कृत सा हत्य इन सू क्तय से भरा हुआ है।]

इसी प्रकार क और स याँ: सु + आगतम् = स्वागतम् (यण्-स न्ध), वद्या + अथ = वद्याथ (द घ-स न्ध), सुख
+ अथ = सुखाथ (द घ-स न्ध) — पछले दोन शब्द इसी पाठ क पाँचव सू क्त म आए ह।

प्र.3 अत्र एताः सूक्तयः व वधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः संगृहीताः । तेषां ग्रन्थानां सं क्षप्तः प रचयः अत्र द यते — अथववेदः,
कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामच रतम्, नी तशतकम्, कराताजुनीयम् ।

पाठ क सू क्तयाँ छह ग्रन्थ से ली गई ह। पुस्तक म दया गया प रचय इस प्रकार है —

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

ग्रन्थः रच यता स्वरूपम् वषयः (पुस्तकानुसारम्)

अथववेदः अपौरुषेयः (वेद ः) वेदः चार वेद म से एक। इसम व वध स्तु तयाँ, अथशास्त्र, च कत्साशास्त्र,
तन्त्र वद्या, व ान और दशन व णत ह।

कु मारसम्भवम् महाकिवः कािलदासः महाकाव्यम् शव-पावती के ववाह तथा कुमार का तकेय के जन्म क कथा।

पञ्चतन्त्रम् िवष्णश
ु म नी तग्रन्थः पाँच प्रकरण ह; पशु-प क्षय क कथाओं के माध्यम से नै तक शक्षा द गई
है।

उत्तररामचिरतम् महाकिवः भवभूितः नाटकम् संस्कृत नाटक म सुप्र सद्ध; भगवान् श्रीराम के राज्या भषेक के बाद के
जीवन का च रत व णत है।

नीितशतकम् ृ
भतहिरः (उज्जियनी शतककाव्यम् उन्ह ने तीन शतक-काव्य रचे; नी तशतक नी तशास्त्र का प्र सद्ध ग्रन्थ है।
के राजा)

िकराताजुनीयम् महाकिवः भारिवः महाकाव्यम् करात-वेशधारी शव तथा अजुन क कथा व णत है।

कौन-सी सू क्त कहाँ से: पुस्तक ने प्रत्येक सू क्त के आगे उसका ग्रन्थ नह लखा, केवल सूची द है। जो सम्बन्ध
सु न श्चत ह वे ये ह — ‘माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः’ — अथववेदः (भू मसूक्तम्); ‘न रत्नम न्वष्य त…’ तथा
‘शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्’ — कुमारसम्भवम्; ‘गुणाः पूजास्थानं…’ — उत्तररामच रतम्; ‘ हतं मनोहा र च दुलभं
वचः’ — कराताजुनीयम्। शेष सू क्तयाँ नी त-ग्रन्थ म प्रच लत सुभा षत ह — परीक्षा म केवल छह ग्रन्थ का प रचय
पूछा जाता है, सू क्त-वार मलान नह ।

तीन शतक: भतृह र के तीन शतक ह — नी तशतकम्, शृङ्गारशतकम् तथा वैराग्यशतकम्। ‘शतक’ का अथ है
सौ ोक का संग्रह।

प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 95
प रयोजनाकायम् (प्रकल्प-काय)

प रयोजनाकायम्

प्र.1 अन्तजालस्य (Internet) साहाय्येन एतादृशीनां प्रेरणादा यकानां दशानां सूक्तीनां सङ् ग्रहणं कृत्वा भ त्तपत्रम्
एकं रचयन्तु ।

यह करके दखाने वाला काय है। एक चाट-पेपर ली जए, ऊपर शीषक ल खए — ‘सुभा षता न — दश प्रेरणादा यन्यः
सूक्तयः’ — और नीचे दस खाने बनाकर हर खाने म एक सू क्त, उसका हन्द अथ तथा एक छोटा चत्र द जए।
अच्छे भ त्तपत्र म ये चार बात अवश्य ह —

1. सू क्त दे वनागरी म शुद्ध वतनी के साथ, बड़े अक्षर म;
2. उसका हन्द (या मातृभाषा म) अथ एक पं क्त म;

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः
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3. ग्रन्थ का नाम, जहाँ से वह ली गई है;
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4. अथ को समझाने वाला छोटा चत्र या प्रतीक — जैसे ‘शरीरमाद्यं…’ के साथ दौड़ता हुआ बालक।
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नमूना उत्तर (दस सू क्तयाँ, जन्ह आप सीधे उतार सकते ह) —

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gl सू क्तः
aक्रमः हन्द अथ ग्रन्थः

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काम पिरश्रम से िसद्ध होते है,ं के वल इच्छा करने से नहीं
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१ उद्यमेन िह िसध्यिन्त काय िण न मनोरथैः हतोपदे शः

सत्sयeकीmही िवजय होती है, असत्य की नहीं
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aglिवद्या िवनमता दे ती है
२ सत्यमेव जयते नानतृ म् मुण्डकोप नषद्

३ िवद्या ददाित िवनयम् हतोपदे शः

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४ परोपकाराय सतां िवभूतयः सज्जनों की सम्पित्त परोपकार के िलए होती है सुभा षतम्

m as e महोप नषद्
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वसुधै व कु टुम्बकम् सारी पथ्ृ वी ही एक पिरवार है
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g l a अिहंसा सबसे बड़ ा धम है
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६ अिहंस ा परमो धमः महाभारतम्

माता को दे व मानो, िपता को दे व मानो
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७ मातदृ े वो भव, िपतदृ े वो भव तै त्तरीयोप नषद्

om उनके सामथ्य से होती है, साधनों से a
बड़mों की.cसफलता agl
seनहीं
८ ि यािसिद्धः सत्त्वे भवित महतां नोपकरणे कराताजुनीयम्

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९ सव भवन्तु सुिखनः, सव सन्तु िनरामयाः सब सुखी हों, सब िनरोग हों सुभा षतम् /

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शा न्तपाठः

आल स्य मनुष्यों का शरीर में बैठा हुआ सबसे बड़ ा शsत्रeु हैm
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१० आलस्यं िह मनुष्याणां शरीरस्थो महान् हतोपदे शः

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agl खोज कैसे कर: अन्तजाल पर ‘संस्कृत सुभा षता न’, ‘सुभा षतरत्नभाण्डागारम्’ अथवा NCERT/CIIL क संस्कृत
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साइट पर खो जए। जो सू क्त मले, उसक वतनी दो
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ोत से मलाकर जाँ चए — इन्टरनेट पर संस्कृत क वतनी
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म अशु द्धयाँ बहुत मलती ह।

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सजावट का सुझाव: चाट के बीच म एक द पक बनाइए (पुस्तक का नाम ‘द पकम्’ है!) और उसक दस करण
पर दस सू क्तयाँ ल खए। कक्षा क भ त्त पर लगाइए और हर सप्ताह एक सू क्त पर चचा क जए।
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स्वमातृभाषायां प्र सद्धाः क तचन सूक्तीः लखन्तु ।
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यहाँ आपको अपनी मातृभाषा क कहावत/सू
s e m क्तयाँ लखनी ह। अच्छे उत्तर म — (1) सू क्त ज्य -क -त्य , (2) उसका अथ,
a वह मलती है उसका नाम — तीन ह ।
और (3) पाठ क जस संस्कृत सू क्तlसे
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नमूना उत्तर ( हन्द क प्र सद्ध सू क्तयाँ) —

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

मातृभाषा ( हन्द ) क सू क्त अथ पाठ क मलती-जुलती
सू क्त

बूदँ -बूदँ से घड़ा भरता है थोड़ा-थोड़ा करके ही बड़ा संग्रह होता है क्षणशः कणशश्चैव िवद्यामथ ं च
साधयेत ्
पहला सुख िनरोगी काया सबसे पहला सुख स्वस्थ शरीर है शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्
कथनी से करनी भली कहने से करना अच्छा है यस्तु ि यावान् पुरुषः स िव ान्
जो सोवत है सो खोवत है आलसी सब कुछ गँवा दे ता है सुखािथनः कु तो िवद्या
ऐसी बानी बोिलए, मन का आपा खोय / औरन को सीतल ऐसी वाणी बो लए जो दूसर को भी शीतल िहतं मनोहािर च दुल भं वचः
करे , आपहु सीतल होय करे और स्वयं को भी

हीरा मुख से ना कहे, लाख टका मेर ो मोल गुणी अपनी बड़ाई स्वयं नह करता न रत्नमिन्वष्यित, मृग्यते िह तत्

अपनी भाषा म क जए: य द आपक मातृभाषा मराठ , त मल, बांग्ला, गुजराती, अस मया, कन्नड आ द है तो उसी
क कहावत ल खए — जैसे मराठ म ‘थबे थबे तळे साचे’ (बूँद-बूँद से तालाब भरता है) — यह भी ‘क्षणशः
कणशः’ वाली सू क्त के समान है। घर के बड़ से पूछकर कम-से-कम पाँच कहावत एकत्र क जए।

प्र.3 एताः सूक्तीः प ठत्वा भवतां मन स कः वचारः उत्पद्यते इ त स्वभाषया लखन्तु ।

यह आपके अपने वचार का प्रश्न है — इसका कोई एक ‘सही’ उत्तर नह । अच्छे उत्तर म तीन बात होनी चा हए — (1) कौन-सी
सू क्त ने सबसे अ धक प्रभा वत कया, (2) क्य , और (3) उसे अपने जीवन म कैसे उतारगे — एक ठोस उदाहरण के साथ।
नमूना उत्तर ( हन्द म) —
इन दस सू क्तय को पढ़कर मेरे मन म सबसे पहले यह वचार आया क संस्कृत क एक छोट -सी पं क्त म कतनी बड़ी बात भर
द गई है। मुझे सबसे अ धक ‘यस्तु क्रयावान् पुरुषः स व ान्’ ने प्रभा वत कया। म अब तक यही समझता था क जो जतना
अ धक पढ़ ले, वह उतना बड़ा वद्वान्। पर इस सू क्त ने बताया क पढ़ हुई बात जब तक आचरण म न उतरे, तब तक वह केवल
बोझ है — ‘ ानं भारः क्रयां वना’। मुझे लगा क म स्वच्छता के बारे म बहुत कुछ जानता ँ, पर कक्षा म कागज़ नीचे गरा दे खकर
उठाता नह था। अब से म ऐसा नह करूँगा। इसी तरह ‘शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्’ पढ़कर मने तय कया क प्र त दन आधा
घण्टा खेलूँगा, और ‘क्षणशः कणश ैव…’ पढ़कर तय कया क प्र त दन नयम से प ँ गा, परीक्षा के समय ही नह । सबसे सुन्दर
मुझे पाठ का शीषक ही लगा — ‘ हतं मनोहा र च दुलभं वचः’ — सच बोलना ही काफ़ नह , उसे मीठे ढं ग से कहना भी सीखना
है। यही मेरे लए इस पाठ क सबसे बड़ी सीख है।

अपना उत्तर कैसे लख: नमूना उत्तर क नक़ल मत क जए — उसका ढाँचा ली जए। कसी एक सू क्त को चु नए,
अपने जीवन क एक स ी घटना से उसे जो ड़ए, और एक संकल्प ल खए। पाँच-छह वाक्य पयाप्त ह।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

संस्कृत म लखना चाह तो: ‘एताः सूक्तीः प ठत्वा अहम् अ चन्तयम् — ानं क्रयया एव सफलं भव त । अतः
अहम् अद्यप्रभृ त यत् पठा म तत् जीवने आच रष्या म ।’ प्रश्न म ‘स्वभाषया’ कहा गया है, इस लए मातृभाषा म
लखना भी पूणतः स्वीकाय है।

कायकलापः — पृष्ठ 95
कायकलापः ( क्रयाकलाप)

कायकलापः

प्र.1 एताः सूक्तीः कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयन्तु ।

यह कण्ठस्थ करके सुनाने का काय है — ल खत उत्तर नह । इसे इस प्रकार क जए —

प्र त दन दो सू क्तयाँ — दस एक साथ रटने का प्रयत्न मत क जए। पाँच दन म दस सू क्तयाँ सहज ही याद हो जाएँगी।
अथ के साथ याद क जए — पहले भावाथ सम झए, फर सू क्त दोहराइए। अथ जान लेने पर याद करना आधा हो जाता है।
लय के साथ बो लए — सू क्तयाँ छन्दबद्ध ह; ताल के साथ बोलने से वे अपने आप बैठ जाती ह।
सुनाते समय — सीधे खड़े होइए, स्पष्ट और ऊँचे स्वर म बो लए, वसग (◌ः) तथा अनुस्वार ( ◌ं ) का उ ारण शुद्ध र खए —
जैसे ‘वचः’ म अन्त का वसग सुनाई दे ना चा हए।
अन्त म — प्रत्येक सू क्त के बाद उसका एक पं क्त का अथ भी बताइए; इससे सुनने वाले सहपा ठय को भी लाभ होगा।

नमूना उत्तर (कक्षा म सुनाने का क्रम) —

दवसः कण्ठस्थीकरणीयाः सूक्तयः एकवाक्ये सन्दे शः

पथमे िदने १, २ भू म हमारी माता है; गुण स्वयं पहचान बुला लाते ह

ि तीये िदने ३, ४ स्वस्थ शरीर पहला साधन; पल-पल का सदुपयोग

ततृ ीये िदने ५, ६ आराम और वद्या साथ नह ; आदर गुण से

चतुथ िदने ७, ८ स्वा भमान रखो; क्रया ही वद्वत्ता है

पञ्चमे िदने ९, १० शील सबसे बड़ा गहना; हतकर और मधुर वचन दुलभ

कक्षा के लए सुझाव: ‘सू क्त-अन्ताक्षरी’ खे लए — एक वद्याथ सू क्त बोले, दूसरा उसका अथ बताए, तीसरा
अगली सू क्त बोले। इससे दस सू क्तयाँ एक ही कालांश म सबको याद हो जाएँगी।

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 8 हतं मनोहा र च दुलभं वचः AglaSem · NCERT Solutions

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का स्वरूप — यह पाठ दस सू क्तय का संकलन है। पाठ का शीषक ही दसव सू क्त है — ‘ हतं मनोहा र च दुलभं
वचः’ अथात् ऐसी बात जो हतकारी भी हो और मन को भाने वाली भी हो, दुलभ होती है।
सू क्त क्या है — सु + उ क्तः = सू क्तः, अथात् ‘शोभना उ क्तः’ — सुन्दर वचन। पाठ के आर म्भक संवाद म आचाय कहते ह
क सू क्तय म जीवनमूल्य न हत रहते ह, वे हम सन्माग क ओर ले जाती ह, और संस्कृतसा हत्ये सूक्तीनां भाण्डागारः
अ स्त (संस्कृत सा हत्य सू क्तय का भण्डार है)।
दस सू क्तयाँ — (१) माता भू मः पुत्रोऽहं पृ थव्याः (२) न रत्नम न्वष्य त, मृग्यते ह तत् (३) शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम् (४)
क्षणशः कणशश्चैव वद्यामथ च साधयेत् (५) सुखा थनः कुतो वद्या, कुतो वद्या थनः सुखम् (६) गुणाः पूजास्थानं गु णषु न च
लङ्गं न च वयः (७) मा ू ह द नं वचः (८) यस्तु क्रयावान् पुरुषः स वद्वान् (९) शीलं परं भूषणम् (१०) हतं मनोहा र च दुलभं
वचः।
पाठ का केन् य सन्दे श — केवल पढ़ लेना वद्वत्ता नह है; ‘न केवलं पठामः अ पतु स्मरामः, जीवने आचरामः च’ —
पढ़ना, याद रखना और जीवन म उतारना — तीन आवश्यक ह। इसी को सू क्त ८ कहती है — क्रया के बना ान भार है
(‘ ानं भारः क्रयां वना’)।
व्याकरण — मकारलेखनम् — ‘म्’ के आगे य द व्यञ्जन हो तो ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार ( ◌ं ) लखा जाता है (पुस्तकम्
पठ त = पुस्तकं पठ त); और य द आगे स्वर हो तो ‘म्’ ही लखा जाता है (पुस्तकम् अपठत् = पुस्तकम् अपठत्)।
सू क्तय के ोत — योग्यता वस्तरः म छह ग्रन्थ का सं क्षप्त प रचय दया गया है, जनसे ये सू क्तयाँ संगृहीत ह —
अथववेदः, कुमारसम्भवम् (का लदासः), पञ्चतन्त्रम् ( वष्णुशमा), उत्तररामच रतम् (भवभू तः), नी तशतकम्
(भतृह रः) तथा कराताजुनीयम् (भार वः)।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः संस्कृत अथः हन्द अथ कस सू क्त / प्रसंग म
(पयायः)

चर आचरणं कु रु आचरण करो ‘सत्यं वद, धम चर’ — प्रार म्भक संवाद

इत्युक्ते इित कथने अथात् ‘सू क्तः’ इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम्’

भाण्डागारः कोषः भण्डार संस्कृतसा हत्ये सूक्तीनां भाण्डागारः अ स्त

अ न्वष्य त / अन्वेषणं करोित / ढूँ ढ़ता है / ढूँ ढ़ा जाता है सू क्त २ — न रत्नम न्वष्य त, मृग्यते ह तत्
मृग्यते अिन्वष्यते

आद्यम् / पथमम् / येन धमिसिद्धः पहला / धम- स द्ध का सू क्त ३ — शरीरमाद्यं खलु धमसाधनम्
धमसाधनम् भवित साधन

क्षणशः / कणशः क्षणे क्षणे / कणे कणे प्रत्येक पल म / प्रत्येक सू क्त ४
कण म

अथम् / साधयेत् िवत्तम् / सम्पादयेत ् धन को / अजन करना सू क्त ४
चा हए

सुखा थनः सुखम् इच्छतः सुख चाहने वाले का सू क्त ५

पूजास्थानम् / वयः श्रद्धायोग्यम् / अवस्था वन्दनीय / आयु सू क्त ६

मा / ू ह / द नम् न / वद / दै न्यम् मत / बोलो / दयनीय सू क्त ७ — मा ू ह द नं वचः (भावाथ — वकत्थनम् = मथ्या
आत्म-प्रशंसा)

क्रयावान् ि याशीलः स क्रय, कमशील सू क्त ८ — यस्तु क्रयावान् पुरुषः

शीलम् आचरणम् च रत्र सू क्त ९ — शीलं परं भूषणम्

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Board / OrgNCERT
ExamClass 7
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Pages29
Updated19 Sep 2026