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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 13: वणमा ा-प रचयः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
137 – 148 9 24 हन्द
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 13 वणमात्रा-प रचयः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 13: वणमात्रा-प रचयः
NCERT कक्षा 7 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के त्रयोदशः पाठः — (क) वणमात्रा-प रचयः (अ त रक्तम् अध्ययनम्) के स ूण हल। यह
संवाद-रूप म लखा गया शक्षा-व्याकरण का पाठ है, जसम छात्रा श्र ा अपने अध्यापक से पूछती है क स्वर क तीसरी मात्रा ‘प्लुतः’ क्या है।
उत्तर म अध्यापक ह्रस्वः (१ मात्रा) → द घः (२ मात्रा) → प्लुतः (३ मात्रा) → व्यञ्जनम् (१/२ मात्रा) — यह चतु वध मात्रा-व्यवस्था, २२ स्वर, कुक्कुट-
ध्व न का उदाहरण, याज्ञवल्क्य- शक्षा तथा पा णनीय- शक्षा के दो प्र सद्ध ोक, ओ३म् एवं अवग्रह (ऽ) चह्न तथा शब्द क मात्रा-गणना सखाते ह।
नीचे पृष्ठ 137 से 148 तक के पाठगत प्रश्न, दोन ोक क पद े द-अन्वय-अथ-भाव स हत व्याख्या, वयं शब्दाथान् जानीमः, वयम् अभ्यासं कुमः
के प्रश्न १–४ (हर उपभाग स हत), प रयोजनाकायम् तथा कायकलापः (मात्रा-गणनां क्र डामः) के सभी २३ शब्द क्रम से हल कए गए ह — पहले
संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 7) 137 – 148
खं ड प्रश्न
9 24
माध्यम
हन्द
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 137 – 139
अ त रक्तम् अध्ययनम् — (क) वणमात्रा-प रचयः (श्र ा-अध्यापकयोः संवादः)
पाठः
प्र.1 कः एषः स्वराणां ‘प्लुतः’ नाम त्रमात्रः ?
प्लुतः नाम सः स्वरः यस्य उ ारणे त्रयाणां मात्राणां कालः लग त। सः त्रमात्रः स्वरः अ स्त।
[‘प्लुत’ उस स्वर का नाम है जसके उ ारण म तीन मात्राओं जतना समय लगता है। वह त्रमात्र स्वर होता है।]
ह्रस्वः = एकमात्रः — १
दीघः = िद्वमात्रः — २
लुत ः = ि मा ः — ३
प् त्र त्र
ऐसा क्य : अध्यापक उत्तर दे ते ह — ‘श्र े ! समीचीनं प्रश्नं पृष्टवती।’ अन्य भारतीय भाषाओं म स्वर क प्रायः दो
ही मात्राएँ (ह्रस्व, द घ) मानी जाती ह, इसी लए कक्षा ६ क पाठ्यपुस्तक म सरलता के लए दो ही दखाई गयी थ ।
परन्तु संस्कृत म सभी स्वर का एक त्रमात्र उपभेद भी होता है — वही ‘प्लुतः’ है। जैसे — अ / आ / अ३, इ / ई /
इ३, उ / ऊ / उ३।
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प्लुत कहाँ प्रयुक्त होता है: (क) दूर से कसी को पुकारने म — हे३ राम !, अत्र आगच्छ कुमार३ ! (ख) वेदमन्त्र
के आरम्भ म ओंकार के उ ारण म — ओ३म् — भूभुवः स्वः। तत्स वतुवरेण्यम्… (गायत्री-महामन्त्रः), ओ३म्
— सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्… (सङ्गठन-मन्त्रः)।
ध्यातव्यम्: ये तीन मात्राएँ केवल स्वर म होती ह, व्यञ्जन म नह । सभी व्यञ्जन क सदा अधमात्रा ही होती है
— ‘सवषां व्यञ्जनानां तु नत्यम् अध-मात्रा एव भव त।’
प्र.2 कुक्कुटः प्रातः कथं रौ त ?
सव छात्राः उ ैः सोत्साहम् उत्तरं दद त — उ – उ – ऊ – उ३ । कु – कु – कू – कु३ ।
[सब छात्र ऊँचे स्वर म उत्साहपूवक बोलते ह — ‘उ–उ–ऊ–उ३’, ‘कु–कु–कू–कु३’।]
ध्व नः कालः मात्रा स्वर-भेदः
‘उ’ अल्पका लकः एकमात्र ः (१) ह्रस्वः
‘ऊ’ लम्बका लकः िद्वमात्र ः (२) द घः
‘उ३’ अ त वलम्बका लकः ित्र मात्र ः (३) प्लुतः
यह उदाहरण क्य दया गया: मात्राओं का भेद उ ारण-काल का भेद है — ‘ व वधानां मात्राणाम् उ ारणे परस्परं
कालस्य भेदः भव त।’ मुग क बाँग म यही तीन काल स्वाभा वक रूप से सुनाई दे ते ह, इस लए अध्यापक ने प्रकृ त
से ही उदाहरण चुना। छात्र के उत्तर पर अध्यापक हँसकर कहते ह — ‘अलम् ! अलम् ! बहु शोभनम्। भवन्तः तु
सव कुक्कुटाः एव सञ्जाताः !’
Try This: अपने आस-पास के प क्षय क बोली ध्यान से सु नए — कौए क ‘काँ~’ लम्बी ( मात्र) है, मोर क
‘म्याँऽऽ’ और भी लम्बी ( त्रमात्र) है।
ोक-व्याख्या — पृष्ठ 138 एवं 140
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याज्ञवल्क्य- शक्षायाः तथा पा णनीय- शक्षायाः प्र स ौ ोकौ
ोकः
प्र.1 एकमात्रो भवेद ् ह्रस्वः मात्रो द घ उच्यते। त्रमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः व्यञ्जनं चाधमा त्रकम्॥ — अस्य ोकस्य
पदच्छे दम्, अन्वयम्, अथ भावं च लखन्तु।
ोकः — याज्ञवल्क्य- शक्षायाः (पृष्ठ 138)।
पदच्छे दः — एकमात्रः + भवेत् + ह्रस्वः + मात्रः + द घः + उच्यते + त्रमात्रः + च + प्लुतः + ज्ञेयः + व्यञ्जनम् + च +
अधमा त्रकम्।
अन्वयः — एकमात्रः (स्वरः) ह्रस्वः भवेत्। मात्रः (स्वरः) द घः उच्यते। त्रमात्रः च (स्वरः) प्लुतः ज्ञेयः। व्यञ्जनं च अधमा त्रकम्
(भव त)।
अथः — एकमात्र (स्वर) ‘ह्रस्व’ होता है। मात्र (स्वर) ‘द घ’ कहलाता है। त्रमात्र (स्वर) ‘प्लुत’ जानना चा हए। और व्यञ्जन तो
अधमा त्रक (आधी मात्रा वाला) ही होता है।
स्वरः → एकमात्रः (१) = ह्र स्वः
स्वरः → िद्वमात्रः (२) = दीघः
स्वरः → ित्रमात्रः (३) = प्लुत ः
व्यञ्जनम् → अधमात्रम् (१ /२ ) = अधमाित्रकम्
भावः: यह ोक संस्कृत के समस्त वण क मात्रा-व्यवस्था को एक ही पद्य म बाँध दे ता है — स्वर क त्र वधा
मात्राः और व्यञ्जन क एक वधा अधमात्रा। इस प्रकार संस्कृत-भाषा के वण क कुल चतु वधाः मात्राः सद्ध होती
ह। शुद्ध उ ारण तथा छन्दोबद्ध ोक-रचना — दोन का आधार यही गणना है।
व्याकरण-सङ् केत: भवेत् = भू धातु, व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन। उच्यते = वच् धातु, कमवाच्य, लट्
लकार। ज्ञेयः = ज्ञा + यत् (कृदन्त) — ‘जानने योग्य’। चाधमा त्रकम् = च + अधमा त्रकम् (सवणद घ स ः)।
प्र.2 चाषस्तु वदते मात्रां मात्रं त्वेव वायसः। शखी रौ त त्रमात्रं तु नकुलस्त्वधमात्रकम्॥ — अस्य ोकस्य पदच्छे दम्,
अन्वयम्, अथ भावं च लखन्तु।
ोकः — पा णनीय- शक्षायाः (पृष्ठ 140)।
पदच्छे दः — चाषः + तु + वदते + मात्राम् + मात्रम् + तु + एव + वायसः + शखी + रौ त + त्रमात्रम् + तु + नकुलः + तु +
अधमात्रकम्।
अन्वयः — चाषः तु मात्रां वदते। वायसः तु एव मात्रं (वदते)। शखी तु त्रमात्रं रौ त। नकुलः तु अधमात्रकं (रौ त)।
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
अथः — चाष (नीलकण्ठ) पक्षी एक मात्रा जतना बोलता है। कौआ दो मात्रा जतना ही बोलता है। मोर तीन मात्रा जतना बोलता है
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और नेवला आधी मात्रा जतना बोलता है।
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m .co अपरं नाम agवण-भेदः
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प्राणी ध्व न-कालः तुल्यः
aचाषःgl नीलकण्ठः पक्षी एकमात्र ः (१) ह्रस्व-स्वरः इव
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वायसः काकः पक्षी िद्वमात्र ः (२) द घ-स्वरः इव
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िशखी मयूरः पक्षी त्रमात्रः (३) प्लुत-स्वरः इव
नकु लः सू चरदनः पशुः अध मात्र ः (१/२) व्यञ्जनम् इव
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भावः: मात्राओं क पहचान पोथी तक सी मत नह है — वह प्रकृ त म सुनी जा सकती है। पाeणनीय-
s m शक्षा चार
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gl बना रटे ही ह्रस्व, द घ,
coणय क बोली को चार मात्राओं का जीवन्त माप बना दे ती है, जससे वद्याथ
प र चत.प्रा
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aप्लुsतe और अधमात्रा का अन्तर अनुभव कर ले। पाठ स्वयं कहता है — ‘अस्माकं प रसरे प्रकृतौ च बहूनां पशु-
agl प क्षणां ध्व नषु अ प वणानाम् एताः मात्राः द्रष्टु ं शक्नुमः।’
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स - वच्छे द: चाषस्तु = चाषः + तु ( वसग-स .c
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ः)। त्वेव = तु + एव (यण् स ः)। नकुलस्त्वधमात्रकम् =
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नकुलः + तु + अधमात्रकम्।
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m / English तथा ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्त ः
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 143 – 144
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शब्दः / अथः
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शब्दाथाः
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प्र.1 मातृभाषया अथ लखन्तु।
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उत्तर agl
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पुस्तक क शब्दाथ-ता लका का अ न्तम स्तम्भ खाली छोड़ा गया है — उसम आपको अपनी मातृभाषा ( हन्द , मराठ , त मल,
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बांग्ला, गुजराती, अस मया … जो भी आपक भाषा हो) म अथ लखना है। नीचे पूरी ता लका संस्कृत-अथ और हन्द -अथ स हत द
m a s emली जए।
गयी है; अ न्तम स्तम्भ म नमूना उत्तर के रूप म हन्द द गयी है, जसे आप अपनी भाषा से बदल
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथः
(नमूना)
उच्यते कथ्यते कहा जाता है Called as कहा जाता है
े यः ज्ञातव्यः जानना चा हए Should know जानना चािहए
भेद ः प्रकारः वभाग Types पकार / भेद
उपभेद ः उपप्रकारः उप वभाग Sub-types उपपकार
कु क्कु टः कृकवाकुः मुगा Cock / Rooster मुग
रौित वरौ त बाँग दे ता है Crowing / Cock-a- बाँग दे ता है
doodle-doo
रुविन्त वरुव न्त बाँग दे ते ह (Many) Crowing बाँग दे ते है ं
ध्यानं िनदधतु अवधानं ददतु ध्यान द जए Pay attention ध्यान दीिजए
अल्पकािलकः लघु-काल-प्रमाणः स्वल्प समय वाला Short time duration थोड़े समय वाला
लम्बकािलकः लम्बमान-काल-प्रमाणः लम्बे समय वाला Long time duration ल म् बे समय वाला
अितिवलम्बकािलकः अ धक-लम्बमान-काल- अ धक लम्बे समय Overly prolonged time बहुत ल म् बे समय वाला
प्रमाणः वाला duration
चाषः नीलकण्ठः पक्षी नीलकण्ठ Indian Roller (bird) नीलक ण् ठ पक्षी
वायसः काकः पक्षी कौआ Crow कौआ
िशखी मयूरः पक्षी मोर Peacock मोर
नकु लः सू चरदनः नेवला Mongoose नेवला
दोला प्रेङ्खा झूला Swing झूल ा
चटका गृहनीडः गौरेया Sparrow गौरै या
मूषकः आखुः चूहा Mouse चूहा
कपोतः पारावतः कबूतर Pigeon कबूतर
पुँस्कोिकलः पुमान् पकः नर कोयल Male cuckoo नर कोयल
कृ षकः कृषीवलः कसान Farmer िकसान
ऐितह्यम् पुरातन-वृत्तान्तः इ तहास History इितहास
िव ाथ शक्षाथ छात्र Student िव ाथ
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खिनत्रम् फालः फावड़ा Indian spade फावड़ा
अट्टहासः वह सतम् ठहाका Boisterous laughter ठहाका
Tip: इनम से अ धकांश शब्द आगे ‘कायकलापः’ क मात्रा-गणना म फर आते ह (दोला, चटका, मूषकः, कपोतः,
कृषकः, ऐ तह्यम्, वद्याथ , ख नत्रम्, अट्टहासः, पुँस्को कलः) — इस लए इन्ह अथ स हत याद कर ली जए।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 145
अभ्यासः — प्रश्नः १ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न पदे न वा उत्तरं लखन्तु —
अभ्यासः
प्र.1 (क) वणानां क त वधाः मात्राः भव न्त ?
चतु वधाः।
[वण क चार प्रकार क मात्राएँ होती ह।]
१. ह्रस्वः — एकमात्रः (१)
२. दीघः — िद्वमात्रः (२)
३. प्लुत ः — ित्रमात्रः (३)
४. अधमात्रा — व्यञ्जनम् (१ /२ )
क्य : स्वर क तीन मात्राएँ (ह्रस्व, द घ, प्लुत) और व्यञ्जन क एक ही मात्रा (अधमात्रा) — तीन + एक = चार।
पाठ का वाक्य है — ‘एवं संस्कृत-भाषायाः वणानां चतु वधाः मात्राः भव न्त।’
प्र.1 (ख) एक वधा मात्रा केषां भव त ?
व्यञ्जनानाम्।
[एक ही प्रकार क मात्रा व्यञ्जन क होती है।]
कारण: स्पश, अन्तःस्थ, ऊष्म तथा अयोगवाह — व्यञ्जन के चार भेद का उपभेद एक ही है — एक वधा अध-
मात्रा। पाठ म कहा गया — ‘तेषाम् एषः — एक एव उपभेदः भव त — एक वधा अध-मात्रा इ त।’
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व्याकरण: ‘केषाम्’ षष्ठी बहुवचन है, अतः उत्तर भी षष्ठी बहुवचन म — व्यञ्जनानाम् (नपुंसक लङ्गम्)।
प्र.1 (ग) स्वरेषु क त वधाः मात्राः भव न्त ?
त्र वधाः।
[स्वर म तीन प्रकार क मात्राएँ होती ह।]
ह्रस्वः (१) · दीघः (२) · प्लुत ः (३)
क्य : स्वर के दो भेद ह — समानाक्षरा ण तथा सन्ध्यक्षरा ण। इन दोन के आगे तीन उपभेद होते ह — ‘तयोः अग्रे
— एते त्रयः उपभेदाः भव न्त — त्र वधाः मात्राः इ त।’ ये तीन मात्राएँ केवल स्वर म ही मलती ह, व्यञ्जन म नह ।
प्र.1 (घ) संस्कृत-भाषायाम् आहत्य क त स्वराः भव न्त ?
ा वश तः (२२) स्वराः।
[संस्कृत-भाषा म कुल मलाकर बाईस स्वर होते ह।]
वगः ह्रस्वः द घः प्लुतः सङ् ख्या
समानाक्षरािण अ, इ, उ, ऋ, ऌ आ, ई, ऊ, ॠ, – अ३, इ३, उ३, ऋ३, ऌ३ १४
सन्ध्यक्षरािण – ए, ऐ, ओ, औ ए३, ऐ३, ओ३, औ३ ८
आह य त् २२
गणना: समानाक्षर म अ, इ, उ, ऋ — इन चार के तीन-तीन रूप (३×४ = १२) तथा ‘ऌ’ के केवल दो रूप (ऌ,
ऌ३) — क्य क ‘ऌ’ का द घ रूप संस्कृत म नह है। अतः १२ + २ = १४। सन्ध्यक्षर म ए, ऐ, ओ, औ — इनके द घ
और प्लुत दो-दो रूप (२×४ = ८)। कुल १४ + ८ = २२।
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प्र.1 (ङ) व वध-मात्राणाम् उ ारणे कस्य भेदः भव त ?
कालस्य (उ ारण-कालस्य) भेदः भव त।
[ व वध मात्राओं के उ ारण म समय का अन्तर होता है।]
उदाहरणेन: कुक्कुट-ध्व न म — ‘उ’ अल्पका लक (एकमात्र), ‘ऊ’ लम्बका लक ( मात्र), ‘उ३’
अ त वलम्बका लक ( त्रमात्र)। ध्व न वही है, केवल उ ारण म लगने वाला समय बदलता है — यही मात्रा का भेद
है।
व्याकरण: प्रश्न म ‘कस्य’ (षष्ठी एकवचन) है, अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन म — कालस्य।
प्र.1 (च) नत्यम् अधमात्रा केषां भव त ?
व्यञ्जनानाम्।
[सदा आधी मात्रा व्यञ्जन क होती है।]
पाठ का वाक्य: ‘सवषां व्यञ्जनानां तु नत्यम् अध-मात्रा एव भव त।’ इसी लए मात्रा-गणना म क्, म्, स्, त् आ द
हर हलन्त व्यञ्जन को १/२ गना जाता है।
ध्यातव्यम्: अनुस्वार (◌ं) और वसग (◌ः) भी व्यञ्जन के ही अन्तगत ‘अयोगवाहौ’ ह, अतः इनक भी अधमात्रा ही
होती है।
प्र.1 (छ) ध्वनयः क त-प्रकारकाः स न्त ?
त्रप्रकारकाः।
[(कुक्कुट-ध्व न के उदाहरण म) ध्व नयाँ तीन प्रकार क ह।]
(१) अल्पकािलकः — ‘उ’ — एकमात्रः
(२) लम्बकािलकः — ‘ऊ’ — िद्वमात्रः
(३) अितिवलम्बकािलकः — ‘उ३’ — ित्रमात्रः
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सन्दभ: अध्यापक कहते ह — ‘अत्र त्रप्रकारकाः ध्वनयः स न्त।’ ये तीन काल स्वर क तीन मात्राओं का अनुसरण
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करते ह — ह्रस्वः, द घः, प्लुतः।
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प्र.1 (ज) वसगस्य क त मात्राः भव न्त ?
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अधमात्रा (१/२ मात्रा)। a g
[ वसग क आधी मात्रा होती है।]
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s e m क नत्य
gla= ४ १/२ मात्राः।
omहै। यही कारण है क रामः = र्+आ+म्+अ+◌ः = १/२+२+१/२+१+१/२
क्य : वसग ‘अयोगवाहौ’ म गना जाता है और अयोगवाह व्यञ्जन का ही एक भेद है; सब व्यञ्जन
अधमात्रा cहोती
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प्र.1 (झ) अनुस्वारस्य क त मात्राः भव न्त ?
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अधमात्रा (१/२ मात्रा)।
[अनुस्वार क भी आधी मात्रा होती है।]
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क्य : अनुस्वार भी वसग के साथ ‘अयोगवाहौ’ कहलाता है, अतः वह भी व्यञ्जन-वग का है और उसक नत्य
s m है। उदाहरण — संशयः = स्+अ+◌ं+श्+अ+य्+अ+◌ः = १/२+१+१/२+१/२+१+१/२+१+१/२ = ५ १/२
eअधमात्रा
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gl मात्राः।
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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 145 ase
अभ्यासः — प्रश्नः २ : पूणवाक्येन लखन्तु a
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अभ्यासः
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c o m स्वराणां क त वधाः भेदाः उपभेदाः च स न्त ? नामा न लखन्तु ? glas
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प्र.2 (क)
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स्वराणां वधाः भेदाः स न्त — (१) समानाक्षरा ण (२) सन्ध्यक्षरा ण च। तयोः अ े त्रयः उपभेदाः स न्त — (१) ह्रस्वः (२)
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द घः (३) प्लुतः च।
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[स्वर के दो भेद ह — समानाक्षर और सन्ध्यक्षर। इन दोन के आगे तीन उपभेद ह — ह्रस्व, द घ और प्लुत।]
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भेदः (२) वणाः उपभेदाः (३)
१. समानाक्षरािण अ आ अ३ · इ ई इ३ · उ ऊ उ३ · ऋ ॠ ऋ३ · ऌ ऌ३ ह्र स्वः (१) · दीघ ः (२) · प्ल ुतः (३)
२. सन्ध्यक्षरािण ए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ ओ३ · औ औ३
ध्यान द: ‘भेद’ और ‘उपभेद’ दो अलग बात ह। भेद = वण कस वग का है (समानाक्षर/सन्ध्यक्षर), उपभेद = उसका
उ ारण-काल कतना है (ह्रस्व/द घ/प्लुत)। इसी लए पाठ कहता है — ‘तयोः अग्रे — एते त्रयः उपभेदाः भव न्त —
त्र वधाः मात्राः इ त।’
व्याकरण: समानाक्षरा ण, सन्ध्यक्षरा ण — नपुंसक लङ्गम्, प्रथमा बहुवचनम्। भेदाः, उपभेदाः — पुं लङ्गम्,
प्रथमा बहुवचनम्।
प्र.2 (ख) व्यञ्जनानां क त वधाः भेदाः उपभेदाः च स न्त ? नामा न लखन्तु ?
व्यञ्जनानां चतु वधाः भेदाः स न्त — (१) स्पशाः (२) अन्तः ाः (३) ऊष्माणः (४) अयोगवाहौ (अनुस्वार- वसग ) च।
तेषाम् एकः एव उपभेदः भव त — एक वधा अध-मात्रा।
[व्यञ्जन के चार भेद ह — स्पश, अन्तःस्थ, ऊष्म और अयोगवाह (अनुस्वार- वसग)। इन सबका एक ही उपभेद है — एक प्रकार
क अधमात्रा।]
भेदः वणाः उपभेदः
१. स्पश ः क् से म् तक (२५ वण) एकिवधा अध -मात्र ा (१/२)
२. अन्तःस्थाः य् र् ल् व्
३. ऊष्माणः श् ष् स् ह्
४. अयोगवाहौ अनुस्वारः (◌ं), वसगः (◌ः)
क्य केवल एक उपभेद: ह्रस्व-द घ-प्लुत का अन्तर स्वर म ही सम्भव है, क्य क स्वर को ख चकर बोला जा सकता
है। व्यञ्जन को अकेले ख चा नह जा सकता, इस लए उसक मात्रा सदा स्थर — आधी — रहती है। पाठ का वाक्य
— ‘तेषाम् एषः — एक एव उपभेदः भव त।’
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प्र.2 (ग) अनुस्वारस्य वसगस्य च सामान्यं नाम कम् ? तयोः प्रत्येकं क त मात्राः ?
अनुस्वारस्य वसगस्य च सामान्यं नाम ‘अयोगवाहौ’ अ स्त। तयोः प्रत्येकम् अधमात्रा (१/२ मात्रा) भव त।
[अनुस्वार और वसग का सामान्य नाम ‘अयोगवाह’ है। इन दोन म से प्रत्येक क आधी मात्रा होती है।]
अनुस्वारः (◌ं) = १ /२ मात्रा
िवसगः (◌ः) = १ /२ मात्रा
द्वयोः योगः = १ मात्रा
‘अयोगवाह’ क्य : ये दोन न पूरे स्वर ह और न स्वतन्त्र व्यञ्जन — ये स्वर के साथ जुड़कर (‘योग’ पाकर) ही
अपना काय ‘वहन’ करते ह, इसी लए इन्ह अयोगवाह कहते ह। वग करण म ये व्यञ्जन के चौथे भेद के रूप म रखे
गये ह, अतः इनक मात्रा भी व्यञ्जन जैसी अधमात्रा ही है।
प्रयोग: पुनःपुनः = प्+उ+न्+अ+◌ः+प्+उ+न्+अ+◌ः = १/२+१+१/२+१+१/२+१/२+१+१/२+१+१/२ = ७
मात्राः। यहाँ दोन वसग आधी-आधी मात्रा दे ते ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 145
अभ्यासः — प्रश्नः ३ : परस्परं मेलयत —
मे ल नम्
प्र.3 परस्परं मेलयत — (क) अ३, ऊ, ऋ, एँ, कू ; (ख) ह्रस्वः, २ १/२, प्लुतः, द घः, अनुना सक-स्वरः
पुस्तक म अ३ — प्लुतः का मेल उदाहरण-स्वरूप पहले ही जोड़कर दखाया गया है। शेष चार का मेल इस प्रकार है —
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(क) (ख) कारणम् / कारण
अ३ प्ल ुतः त्रमात्रः स्वरः (३) — पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्
ऊ दीघ ः ‘उ’ इत्यस्य द घ-रूपम् — मात्रः (२)
ऋ ह्र स्वः समानाक्षरेषु ह्रस्व-स्वरः — एकमात्रः (१)
एँ अनुनािसक -स्वरः चन्द्र बन्दु-युक्तः स्वरः — ना सकया सह उ ायते
कू २ १/२ क् (१/२) + ऊ (२) = २ १/२ मात्राः
कू = क् + ऊ
= १/२ + २
= २ १ /२ मात्राः
मेल कैसे पहचान: (ख) स्तम्भ म चार नाम स्वर के प्रकार बताते ह (ह्रस्व, द घ, प्लुत, अनुना सक) और एक मात्रा-
सङ् ख्या है (२ १/२)। मात्रा-सङ् ख्या केवल उसी के साथ जुड़ेगी जो अकेला स्वर न होकर व्यञ्जन-स हत अक्षर है —
वही ‘कू’ है। शेष तीन शुद्ध स्वर ह, इस लए उन्ह उनके प्रकार से जोड़ा गया।
Check it yourself: ‘एँ’ म चन्द्र बन्दु है — पाठ म इसी प्रकार के काँस्कान् तथा सँस्कता शब्द ‘अनुना सक-
स्वर-युक्ताः शब्दाः’ शीषक के नीचे दये गये ह। अनुना सकता से मात्रा नह बदलती — आँ क मात्रा आ जतनी (२)
ही रहती है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 146
अभ्यासः — प्रश्नः ४ : प ट्टकातः चत्वा उ चतं पदं पूरयन्तु — ( शखी, नकुलः, वायसः, चाषः, को कलः)
रक्त ान-पू तः
प्र.4 (क) ................................... त्रमात्रकालं ध्व न करो त।
शखी त्रमात्रकालं ध्व न करो त।
[मोर तीन मात्रा जतने समय तक ध्व न करता है।]
आधार: पा णनीय- शक्षा का ोक — ‘ शखी रौ त त्रमात्रं तु…’। शखी (= मयूरः) क ध्व न प्लुत-स्वर के समान
होती है।
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 13 वणमात्रा-प रचयः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 (ख) ................................... मात्रकालं ध्व न करो त।
वायसः मात्रकालं ध्व न करो त।
[कौआ दो मात्रा जतने समय तक ध्व न करता है।]
आधार: ‘… मात्रं त्वेव वायसः।’ वायसः (= काकः) क ध्व न द घ-स्वर के समान होती है।
प्र.4 (ग) ................................... एकमात्रकालं ध्व न करो त।
चाषः एकमात्रकालं ध्व न करो त।
[नीलकण्ठ पक्षी एक मात्रा जतने समय तक ध्व न करता है।]
आधार: ‘चाषस्तु वदते मात्रां…’ — यहाँ ‘मात्राम्’ का अथ है ‘एक मात्रा’। चाषः (= नीलकण्ठः) क ध्व न ह्रस्व-स्वर
के समान होती है।
प्र.4 (घ) ................................... अधमात्रकालं ध्व न करो त।
नकुलः अधमात्रकालं ध्व न करो त।
[नेवला आधी मात्रा जतने समय तक ध्व न करता है।]
आधार: ‘…नकुलस्त्वधमात्रकम्।’ नकुल एकमात्र पशु है (शेष तीन पक्षी ह) और उसक ध्व न व्यञ्जन के समान
अधमात्र होती है।
ध्यातव्यम्: प ट्टका म पाँच पद दये गये ह पर रक्तस्थान चार ही ह — को कलः अ त रक्त पद है, वह कसी भी
वाक्य म नह आएगा।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 146
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 13 वणमात्रा-प रचयः
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प रयोजनाकायम् (प्रकल्प-काय)
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प रयोजनाकायम्
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a s emरसरे वद्यमानानां पशु-प क्षणां ध्वनीन् ध्यानेन शृण्वन्तु। तेषां ध्वनीनां मात्राः क त स न्त इ त लखन्तु।
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स्वप
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प्र.1
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m नह है। नीचे व ध, अ े उत्तर क शत और एक नमूना ता लका द
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यह सुनकर करने वाला काय है, इसका कोई एक न त उत्तर
गयी है।
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व धः / काय कैसे कर:
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1. प्रातःकाल तथा सायंकाल — दोन समय अपने घर, वद्यालय, खेत या उद्यान के आस-पास १५–२० मनट चुपचाप बैठकर
सु नए।
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2. जो पशु-पक्षी बोले, उसका नाम संस्कृत तथा मातृभाषा दोन म ल खए।
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gl4. मन म ग नए — ध्व न कतनी देर टक ? एक ‘अ’ जतनी (१ मात्रा), ‘आ’ जतनी (२ मात्रा), या और लम्बी (३ मात्रा)?
3. ध्व न को अक्षर म ल खए (जैसे — काँ, कु-कु-कू-कु३, ट-ट)।
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5. य द सम्भव हो तो मोबाइल से ध्व न रकॉड करके दुबारा सु नए — गणना अ धक शुद्ध होगी।
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em५–६ प्राणी; प्रत्येक का संस्कृत नाम; ध्व न का अक्षर-रूप; मात्रा- agl
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अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए: कम-से-कम
aglक कसक ध्व न सबसे लम्बी थी और कसक सबसे छोट ।
सङ् ख्या; और एक वाक्य म यह नष्कष
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नमूना उत्तर:
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e तुल्यः स्वर-भेदः
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प्राणी (संस्कृतम्) हन्द ध्व नः मात्राः
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नीलकण्ठ ‘क्रैक्’ १ ह्रस्वः
वायसः कौआ ‘काँ~’ २ द घः
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om~ऽऽ’
c‘म्याँ g l a
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िशखी मोर प्लुतः
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नकु लः
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नेवला ‘क्’ १/२ व्यञ्जनम् इव
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कु क्कु टः मुगा ‘कु–कु–कू–कु३’ १, १, २, ३ ह्रस्व + द घ + प्लुत
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चटका गौरैया ‘च -च ’ १+१ ह्रस्वः
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a१ + २
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कबूतर ‘गुटर्-गूँ~’ ह्रस्व + द घ
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नर कोयल ‘कु-ऊ~ऽऽ’ ह्रस्व + प्लुत
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पुँस्कोिकलः १+३
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em(तीन मात्रा) थी और नेवले क सबसे छोट (आधी मात्रा)।]
नष्कषः — मयूरस्य पुँस्को कलस्य च ध्व नः द घतमा ( त्रमात्रा) आसीत्, नकुलस्य ध्व नः च लघुतमा (अधमात्रा) आसीत्।
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[मोर और नर कोयल क आवाज़ सबसे लम्बी
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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 13 वणमात्रा-प रचयः AglaSem · NCERT Solutions
Tip: उत्तर-पु स्तका म इस ता लका के साथ प्राणी का एक छोटा चत्र या दनांक-समय भी लख द जए — इससे
यह स ा क्षेत्र-अवलोकन (field observation) बन जाता है।
कायकलापः — पृष्ठ 146 – 148
मात्रा-गणनां क्र डामः — प्रश्नः १ : अधो ल खतानां शब्दानां मात्रा-गणनां कुवन्तु —
कायकलापः
प्र.1 अधो ल खतानां शब्दानां मात्रा-गणनां कुवन्तु — दोला (उदाहरणम्), बालः, चटका, श क्तः, घ टका, ःखम्,
मूषकः, कपोतः, कृषकः, ऐ तह्यम्, संशयः, वद्याथ , ख नत्रम्, धाष्टयम्, प्र क्रया, नःशुल्कम्, क स्म श्चद्,
कात्स्न्यम्, क्रमाङ् कः, अट्टहासः, नःस्वाथः, पुनःपुनः, पुँस्को कलः।
गणना का नयम — शब्द को वण म तो ड़ए, फर प्रत्येक वण क मात्रा जोड़ द जए —
हलन्त व्यञ्जनम् (क् , स्, म् …) = १ /२
ह्रस्व स्वरः (अ, इ, उ, ऋ) = १
दीघ स्वरः (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) = २
प्लुत स्वरः (अ३, ए३, ओ३ …) = ३
अनुस्वारः (◌ं) तथा िवसगः (◌ः) = १ /२
अनुन ािसकता (◌ँ) से मात्रा नही ं बदलती — आँ = २, अँ = १
पृष्ठ 146
शब्दः वण- वच्छे दः मात्रा-गणना योगः
दोला (उदाहरणम्) द् + ओ + ल् + आ १/२ + २ + १/२ + २ ५ मात्र ाः
बालः ब् + आ + ल् + अ + ◌ः १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ ४ १/२ मात्र ाः
चटका च् + अ + ट् + अ + क् + आ १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + २ ५ १/२ मात्र ाः
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शब्दः वण- वच्छे दः मात्रा-गणना योगः
शिक्तः श् + अ + क् + त् + इ + ◌ः १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ४ मात्र ाः
घिटका घ् + अ + ट् + इ + क् + आ १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + २ ५ १/२ मात्र ाः
दुःखम् द् + उ + ◌ः + ख् + अ + म् १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ४ मात्र ाः
मूषकः म् + ऊ + ष् + अ + क् + अ + ◌ः १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
कपोतः क् + अ + प् + ओ + त् + अ + ◌ः १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
कृ षकः क् + ऋ + ष् + अ + क् + अ + ◌ः १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ ५ मात्र ाः
ऐितह्यम् ऐ + त् + इ + ह् + य् + अ + म् २ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
संशयः स् + अ + ◌ं + श् + अ + य् + अ + ◌ः १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ ५ १/२ मात्र ाः
िव ाथ व् + इ + द् + य् + आ + र् + थ् + ई १/२ + १ + १/२ + १/२ + २ + १/२ + १/२ + २ ७ १/२ मात्र ाः
खिनत्रम् ख् + अ + न् + इ + त् + र् + अ + म् १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ५ १/२ मात्र ाः
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शब्दः वण- वच्छे दः मात्रा-गणना योगः
धाष्ट म् ध् + आ + ष् + ट् + र् + य् + अ + म् १/२ + २ + १/२ + १/२ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
पिक्रया प् + र् + अ + क् + र् + इ + य् + आ १/२ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + २ ६ १/२
मात्र ाः
िनःशुल्कम् न् + इ + ◌ः + श् + उ + ल् + क् + अ + म् १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
किस्मँि चद् क् + अ + स् + म् + इँ + श् + च् + इ + द् १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ६ मात्र ाः
कात्स्न्यम् क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् १/२ + २ + १/२ + १/२ + १/२ + १/२ + १/२ + १ + ६ १/२
१/२ मात्र ाः
क्रमाङ् कः क् + र् + अ + म् + आ + ङ् + क् + अ + ◌ः १/२ + १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + १/२ + १ + १/२ ७ मात्र ाः
अट्टहासः अ + ट् + ट् + अ + ह् + आ + स् + अ + ◌ः १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ ७ १/२
मात्र ाः
िनःस्वाथः न् + इ + ◌ः + स् + व् + आ + र् + थ् + अ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १/२ + २ + १/२ + १/२ + १ ७ १/२
◌ः + १/२ मात्र ाः
पुनःपुनः प् + उ + न् + अ + ◌ः + प् + उ + न् + अ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १ + ७ मात्र ाः
◌ः १/२
पुँस्कोिकलः प् + उँ + स् + क् + ओ + क् + इ + ल् + अ १/२ + १ + १/२ + १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ + १ + ८ मात्राः
+ ◌ः १/२
संयुक्त-व्यञ्जन कैसे गन: संयुक्त व्यञ्जन म जतने व्यञ्जन जुड़े ह, उन सबक अलग-अलग आधी-आधी मात्रा
गनी जाती है। जैसे कात्स्न्यम् म र्+त्+स्+न्+य् — पाँच व्यञ्जन = ५ × १/२ = २ १/२। पुस्तक का उदाहरण भी
यही दखाता है — लक्ष्मणः = ल्+अ+क्+ष्+म्+अ+ण्+अ+◌ः = ६ मात्राः।
Check it yourself: पुस्तक क खाली ता लका म हर शब्द के आगे बने रक्त खान क संख्या ही बता दे ती है
क उस शब्द म कतने वण ह — जैसे ‘पुँस्को कलः’ के सामने १० खाने ह और वण भी ठ क १० नकले। गणना
करने से पहले खान को गन ली जए, भूल नह होगी।
Did you know? मात्रा-गणना का यही ज्ञान आगे छन्द-शास्त्र म काम आता है — अनु ु प्, इन्द्रव ा,
वसन्त तलका जैसे छन्द म हर चरण क मात्राएँ न त होती ह। पाठ भी कहता है — ‘अ ग्रमासु कक्षासु
ोकरचना- वषये अ धकं ज्ञास्यामः।’
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अध्याय — एक नज़र म
पाठ का स्वरूप — यह ‘अ त रक्तम् अध्ययनम्’ खण्ड का पहला पाठ है। श्रद्धा नामक छात्रा और अध्यापक का संवाद है।
श्रद्धा का प्रश्न — ‘कः एषः स्वराणां प्लुतः नाम त्रमात्रः ?’ — से पूरा पाठ आरम्भ होता है।
चतु वधाः मात्राः — ह्रस्वः = एकमात्रः (१), द घः = मात्रः (२), प्लुतः = त्रमात्रः (३), व्यञ्जनम् = अधमात्रम् (१/२)। तीन
मात्राएँ केवल स्वर म होती ह; व्यञ्जन म सदा अधमात्रा ही होती है।
२२ स्वराः — समानाक्षरा ण (अ आ अ३, इ ई इ३, उ ऊ उ३, ऋ ॠ ऋ३, ऌ – ऌ३) = १४ तथा सन्ध्यक्षरा ण (ए ए३, ऐ ऐ३,
ओ ओ३, औ औ३) = ८ — कुल २२ स्वर।
प्लुत का प्रयोग — दो स्थल पर — (क) दूर से कसी को पुकारते समय (हे३ राम !, अत्र आगच्छ कुमार३ !), तथा (ख)
वेदमन्त्र के आरम्भ म ओंकार के उ ारण म (ओ३म् — भूभुवः स्वः)।
दो ोक — याज्ञवल्क्य- शक्षा का ‘एकमात्रो भवेद ् ह्रस्वः…’ मात्राओं क प रभाषा दे ता है; पा णनीय- शक्षा का ‘चाषस्तु वदते
मात्रां…’ चाष (नीलकण्ठ) = १, वायस (काक) = २, शखी (मयूर) = ३ तथा नकुल = १/२ मात्रा — इस प्रकार प्रकृ त से मात्रा
सखाता है।
मात्रा-गणना — शब्द को वण म तोड़कर मात्राएँ जोड़ी जाती ह — रामः = र्+आ+म्+अ+◌ः = १/२+२+१/२+१+१/२ = ४
१/२ मात्राः। अनुस्वार (◌ं) और वसग (◌ः) दोन क अधमात्रा होती है; इन्ह ‘अयोगवाहौ’ कहते ह।
वशेषं चह्नम् — ॐ ‘ओम्/ओ३म्’ का प्राचीन प वत्र चह्न है; ऽ ‘अवग्रहः’ है — यह कोई वण नह , इसका उ ारण नह
होता; स म लुप्त हुए ‘अ’ को दखाने के लए लगाया जाता है (कः + अ प = कोऽ प / को प)।
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त्व रत पुनरावृ त्त
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शब्दः हन्द अथ व्याकरण
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उच्यते कथ्यते कहा जाता है कमवाच्यम्, लट् लकार, प्र.पु. एकवचनम्
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ज्ञेयः ातव्यः जानना चा हए कृदन्तम् (यत्-प्रत्ययः), पुं., प्रथमा एकवचनम्
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agl उप वभाग
भेदः पकारः वभाग / प्रकार पुं लङ्गम्, प्रथमा एकवचनम्
उपभेदः उपपकारः पुं लङ्गम्, प्रथमा एकवचनम्
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कुक्कुटः कृ कवाकु ः मुगा पुं लङ्गम्, अकारान्तः
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बाँग दे ता है
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रु धातु, लट् लकार, प्र.पु. एकवचनम्
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रुव न्त िवरुविन्त बाँग दे ते ह रु धातु, लट् लकार, प्र.पु. बहुवचनम्
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ध्यानं नदधतु अवधानं ददतु ध्यान द जए लोट् लकार (आदराथम्)
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अल्पका लकः लघु-काल-पमाणः स्वल्प वाला वशेषणम्, पुं लङ्गम्
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लम्बका लकः लम्बमान-काल-पमाणः agl लम्बे समय वाला वशेषणम्, पुं लङ्गम्
अ त वलम्बका लकः अिधक-लम्बमान-काल-पमाणः अ धक लम्बे समय वाला
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वशेषणम्, पुं लङ्गम्
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चाषः नीलकण्ठ (Indian Roller) पुं लङ्गम्, अकारान्तः
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नीलकण्ठः पक्षी
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वायसः काकः पक्षी कौआ पुं लङ्गम्, अकारान्तः
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शखी मयूर ः पक्षी मोर पुं लङ्गम्, इन्नन्तः ( श खन्)
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नकुलः
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नेवला पुं लङ्गम्, अकारान्तः
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सूिचरदनः
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अयोगवाहौ अनुस्वार-िवसग अनुस्वार और वसग पुं लङ्गम्, प्रथमा वचनम्
अवग्रहः लुप्त ‘अ’ का चह्न पुं लङ्गम्; उ ारणं न भव त
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‘ऽ’ इित िचह्नम्
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ऐ तह्यम् पुर ातन-वृ ान्तः इ तहास नपुंसक लङ्गम्, अकारान्तम्
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