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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 4: नवारंभ— नगर एवं राज्य
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
67 – 82 10 19 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 24 pages
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: नवारंभ— नगर एवं राज्य
कक्षा 7 सामा जक व ान के अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य (पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे, भाग 1; वषयवस्तु —
अतीत के चत्रपट) के सभी प्रश्न के वस्तृत एन.सी.ई.आर.ट . समाधान। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण प्रश्न, दोन आइए
वचार कर बॉक्स (पृष्ठ 70 एवं 77), तीन आइए पता लगाएँ बॉक्स (पृष्ठ 70, 74 एवं 76), पृष्ठ 76 का इसे अनदे खा न कर बॉक्स, पृष्ठ 69 का
पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले… तथा चार प्रश्न और क्रयाकलाप — 16 महाजनपद के मान चत्र ( चत्र 4.3) एवं समय-रेखा ( चत्र 4.8) को
मु द्रत पृष्ठ से पढ़कर।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 67 – 82
खं ड प्रश्न
10 19
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 67
अध्याय का आरंभ — वषयवस्तु: अतीत के चत्रपट
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 भारत म ‘ तीय नगरीकरण’ से क्या अ भप्राय है?
‘ तीय नगरीकरण’ उस नवीन एवं जीवंत नगरीय चरण का नाम है जो प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. म आरंभ हुआ — वशेषतः गंगा के
मैदानी भाग, सधु घाट के कुछ क्षेत्र तथा उनके नकटवत क्षेत्र म, और जसका क्रमशः संपूण उपमहा प म वस्तार हुआ।
इसे ‘ तीय’ इस लए कहा जाता है क्य क इससे पूव भारत म एक नगरीकरण हो चुका था —
प्रथम नगरीकरण तीय नगरीकरण
कौन-सी िसंध ु / हड़प्पा / िसंध -ु सरस्वती जनपद एवं महाजनपद
सभ्यता
कब ततृ ीय सह ाब्दी सा.सं.पू.; िवघटन ि तीय सह ाब्दी सा.सं.पू. के पथम सह ाब्दी सा.सं.पू. में आरंभ
आरंभ में
कहाँ िसंध ु तथा सरस्वती घाटी गंगा का मैद ान, िसंध ु घाटी के भाग, िफर संपूण
भारत
प्रमुख धातु ताम एवं कांस्य लोहा
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इन दोन के बीच लगभग एक सह ाब्द का ऐसा काल रहा जब भारत से नगरीय जीवन लुप्तप्राय था, यद्य प उत्तर भारत के कुछ
भाग म कह -कह इसके अवशेष वद्यमान रहे ह गे।
ऐसा क्य हुआ: हड़प्पाकालीन नगर के टू टने पर नगरीय व्यव ा के सभी घटक लुप्त हो गए — भव्य नजी एवं
सावज नक भवन, भीड़-भाड़ वाले माग एवं व्यस्त बाजार, व भन्न शल्पकार के समूह (धातुकार, कुम्हार,
ापत्यकार, बुनकर, हस्त शल्पी), लेखन-प्रणाली, उन्नत स्वच्छता व्यव ा, व्यव त शासन तंत्र तथा शासक वग
वाली वृहत शासक य संरचना। लोग को ग्राम्य जीवन-शैली क ओर लौटना पड़ा। नगर तभी लौटे जब उनक शत
लौट — लोहे के उपकरण से वस्तृत कृ ष, बढ़ते व्यापा रक तंत्र, और राजधानी बनाने व उसक रक्षा करने म सक्षम
संग ठत राज्य।
क्या आप जानते ह? यह तीय नगरीकरण कभी रुका नह । पुस्तक के शब्द म यह “आज तक अनवरत चलता
आ रहा है” — आपके नकट का नगर भी इसी लंबी कहानी का भाग है।
प्र.2 जनपद और महाजनपद का भारत के प्रारं भक इ तहास म क्या महत्व है?
क्य क ये हड़प्पा काल के बाद भारत के प्रथम संग ठत राज्य थे, और आगे जो कुछ हुआ — नगर, सक्के, माग, साम्राज्य — उसक
न व इन्ह ने रखी।
राज्य क पुनस्थापना। कुल एक नयत भूभाग (जनपद) से जुड़े जनका शासक राजा होता था; 8व –7व शताब्द सा.सं.पू.
तक अनेक जनपद मलकर महाजनपद बने। प्रच लत सूची म 16 महाजनपद ह, जो उत्तर-प श्चम म गांधार से पूव म अंग तथा
मध्य भारत म अश्मक तक वस्तृत थे।
नगर का नमाण। महाजनपद क राजधा नयाँ वशाल एवं सुदृढ़ प्राचीर से युक्त नगर थ , जनके बाहर प रखा (खाई) थी
और जनके प्रवेश ार जान-बूझकर सँकरे रखे जाते थे ता क प्रहरी जन एवं वस्तुओं क आवाजाही नयं त्रत कर सक।
आज के नगर इन्ह क दे न ह। इनम से अ धकांश प्राचीन राजधा नयाँ आज भी जीवंत नगर ह — ये ‘आधु नक’ नगर वस्तुतः
2500 वष प्राचीन ह (मथुरा, उज्ज यनी/उज्जैन, वाराणसी, राजगृह/राजगीर, वैशाली…)।
प्रारं भक लोकतां त्रक परंपराएँ। सभा एवं स म त राजा को परामश दे ती थ ; व ज्ज तथा मल्ल म तो सभा ही राजा का चयन
करती थी।
नवाचार का युग। उत्तर वै दक, बौद्ध एवं जैन वचारधाराएँ और उनका सा हत्य, भारतीय कला का नवीनीकरण, लौह धातुकम
तथा भारत के प्रथम सक्के — सब इसी युग क दे न ह।
उपमहा प का जुड़ाव। व्यापा रक तंत्र तथा उत्तरापथ-द क्षणापथ जैसे माग ने उत्तर-द क्षण और पूव-प श्चम को जोड़ा; इनके
बीच हुए युद्ध और कभी-कभी गठबंधन से आगे चलकर नए राज्य और साम्राज्य बने।
संकेत: एक पं क्त म याद रखने योग्य उत्तर — जनपद ने राज्य को पुनज वत कया और महाजनपद ने नगर को।
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प्र.3 इन जनपद और महाजनपद ने कस प्रकार क शासन प्रणाली का वकास कया?
इन्ह ने दो प्रकार क प्रणा लयाँ वक सत क , और दूसरी प्रणाली ही इस अध्याय को वशेष बनाती है।
राजतंत्र गण अथवा संघ (‘प्रारं भक गणराज्य’)
सव च्च अ धकार कसके राजा के पास सभा / सिमित के पास
पास
राजा का पद कैसे मलता वंशानुग त — पायः पूववत राजा का पुत्र सभा के सद स्यों ारा चयन
था
बड़े नणय कैसे होते थे राजा ारा, मंित्रयों तथा विरष्ठजनों की सभा के िवचार -िवमश ारा तथा आवश्यकतानुस ार मतदान
समथन से ारा
अध्याय म उदाहरण मगध, कोसल, अवंित विज्ज (वृिज्ज), मल्ल
सभी जनपद म समान क्या था: प्रत्येक जनपद म एक सभा या प रषद होती थी जसे सभा या स म त कहा जाता था, जसम कुल
से संबं धत वषय पर वचार- वमश होता था। (ये दोन शब्द सवप्रथम वेद म मलते ह, जो भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ह।) इसके
अ धकांश सदस्य संभवतः कुल के व रष्ठजन होते थे। राजा से यह अपेक्षा नह क जाती थी क वह स्वेच्छाचारी शासन करे —
सदाचारी राजा वही माना जाता था जो मं त्रय , प्रशासक तथा सभा-स म त से परामश लेकर नणय ले, और कुछ ग्रंथ के अनुसार
अयोग्य राजा को सभा पदच्युत भी कर सकती थी।
राजा के प्रमुख उत्तरदा यत्व: कर (राजस्व) संग्रह करना, शासन व व ध व्यव ा बनाए रखना, राजधानी म सुदृढ़ प्राचीर और
प रखाएँ बनवाना तथा राज्य क रक्षा हेतु सैन्य-बल का संचालन करना या प र त अनुसार समीपवत राज्य से युद्ध करना।
यह क्य महत्वपूण है: व ज्ज तथा मल्ल म प्रमुख नणय सभा लेती थी और राजा का चयन भी वही करती थी।
इसी लए व ान इन्ह ‘प्रारं भक गणराज्य’ कहते ह — वश्व क सवप्रथम गणतां त्रक प्रणा लय म से एक।
स्वयं जाँच: अध्याय स्वयं सावधानी बरतता है — अयोग्य राजा को हटाने के उल्लेख महत्वपूण अवश्य ह, परंतु इससे
यह सद्ध नह होता क यह कोई व धसम्मत परंपरा थी, क्य क उस कालखंड के पूण साक्ष्य हमारे पास उपलब्ध नह
ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 69
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
तीय नगरीकरण के वषय म हम कैसे पता चलता है
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आइए दे ख, नगरीकरण का यह चरण कैसे वक सत हुआ?
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उत्तरg
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यह चरण चार चरण म वक सत हुआ, और अध्याय इन्ह क्रम से बताता है —
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1. कुल का बसना। तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के उत्तराध म उत्तर भारत क क्षेत्रीय संस्कृ तयाँ पुनसग ठत हुईं; लोग कुल या
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वंश के रूप म संग ठत हुए और प्रत्येक कुल एक नयत भूभाग — जनपद — से जुड़ गया।
2. व्यापा रक तंत्र का वस्तार। जैसे-जैसे व्यापा रक माग जनपद को आपस म जोड़ने लगे, जनपद भी वक सत होते गए।
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3. महाजनपद का बनना। 8व या 7व शताब्द सा.सं.पू. तक कुछ जनपद मलकर वशाल राजक य इकाइय — महाजनपद
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— म प रव तत हो गए; प्रच लत सूची म इनक संख्या 16 है।
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4. नगर का उदय। महाजनपद क राजधा नयाँ वशाल, प्राचीरयुक्त एवं प रखा से घरे नगर बने — यही तीय नगरीकरण है।
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और हम यह ात कैसे होता है? अध्याय दो प्रमुख ोत बताता है —
a gl पुराता त्वक उत्खनन, जनसे इन प्राचीन नगर के अ स्तत्व क पु ष्ट होती है — चत्र 4.1 म राजगृह (आधु नक राजगीर,
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बहार) के अवशेष, चत्र 4.4 म कौशांबी का भवन समूह, चत्र 4.7 म शशुपालगढ़ का ार तथा जल से भरी प रखा।
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प्राचीन सा हत्य — उत्तर वै दक, बौद्ध तथा जैन सा हत्य, जनम इन नवीन नगर का वशेष उल्लेख प्राप्त होता है।
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दो ोत एक से बेहतर क्य : उत्खननgसेl वास्त वक प्राचीर, प रखाएँ, सक्के और मृ ांड मलते ह, परंतु यह नह
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बताता क उस ान का नाम क्या था या वहाँ कसका शासन था। सा हत्य नाम, राजा और कथाएँ दे ता है, परंतु
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उसम अ तशयो क्त हो सकती है। जब कुदाल और ग्रंथ दोन एक ही बात कह — जैसे ठ क उसी ान पर कलेबंद
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नगर मले जहाँ ग्रंथ कसी महाजनपद क राजधानी बताते ह — तब इ तहासकार न श्चत हो
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a आइए वचार कर — पृष्ठ 70
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जनपद एवं महाजनपद — गंगा के मैदान म ही क्य ?
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आइए वचार कर
ध्यान द जए क अ धकांश महाजनपद गंगा के मैदानी भाग म क त थे। इसके अनेक कारण हो सकते ह, जैसे –
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प्र.1
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गंगा के उवर मैदान जसके कारण कृ ष काय का वकास संभव हुआ, समीपवत पहा ड़य म लौह क उपलब्धता
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( जसका आगे ‘लौह’ शीषक म वणन है) और नवीन वा ण ज्यक पथ का वकास
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पहले मान चत्र ( चत्र 4.3) पर ग नए। सोलह महाजनपद म से अ धकांश गंगा के मैदान म या उसके कनारे त ह — कुरू,
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पांचाल, शूरसेन, कोसल, काशी, वत्स, मल्ल, वृ ज्ज, मगध तथा अंग। केवल कंबोज और गांधार उत्तर-प श्चम म, मत्स्य, चे द तथा
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अवं त प श्चम-मध्य भारत म, और अश्मक सुदूर द क्षण म गोदावरी के नकट है।
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अब पुस्तक ारा दए गए तीन कारण, और प्रत्येक कैसे काय करता है —
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कारण इससे राज्य कैसे पनपा
गंगा के उवर समतल भूिम, गहरी जलोढ़ िम ी और पय प्त जल से अन्न का अिधशेष उत्पन्न होता है। यह अिधशेष उन लोगों का पोषण
मैदान करता है जो कृ षक नही ं है ं — सै िनक, िशल्पकार, व्यापारी, पुर ोिहत, अिधकारी — और नगर इन्ही ं से बनता है।
पहा ड़य म लौह मैद ान से लगी पहािड़यों (दिक्षण िबहार, झारखंड, िवंध् य के िकनारे ) में लौह अयस्क उपलब्ध था। लोहे की कु ाड़ी से वन
अयस्क साफ हएु , लोहे के हल से भारी िम ी जुती और लोहे के हिथयारों से रक्षा हईु ।
नवीन वा ण ज्यक गंग ा और उसकी सहायक निदयाँ स्वाभािवक राजमाग है;ं उत्तरापथ भी इसी मैद ान से होकर जाता था। वस्तुए ँ, िसक्के
पथ और िवचार सरलता से चलते रहे, अतः माग पर बसी बिस्तयाँ सम ृद्ध होकर नगर बन गईं।
ये तीन साथ मलकर ही काम करते ह: अकेला कोई कारण पयाप्त नह । लोहे के बना उवर म से केवल छोटे
खेत बनते; व्यापार के बना लोहे से संप त्त नह आती; अन्न के अ धशेष के बना व्यापार करने योग्य नगर ही नह
बनते। गंगा के मैदान म तीन एक साथ उपलब्ध थे — इसी लए सवा धक श क्तशाली राज्य मगध और कोसल वह
वक सत हुए।
यह करके दे ख: अपनी ओर से एक चौथा कारण जो ड़ए। न दय ने सस्ता प रवहन और पेयजल भी दया, और
मैदान म नमाण हेतु काष्ठ तथा म भी सुलभ थी। इ तहासकार क भाँ त अपने कारण के पक्ष म प्रमाण भी द जए।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 70
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16 महाजनपद का मान चत्र ( चत्र 4.3) पढ़ना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 इन नवीन राजक य इकाइय म सवा धक श क्तशाली महाजनपद थे— मगध, कोसल, वत्स तथा अवं त। मान चत्र
को दे खकर क्या आप इनक राजधा नय क पहचान कर सकते ह? साथ ही, इनम से कतने नगर क पहचान
वतमान भारतीय नगर से क जा सकती है?
कं बोज पुष्पकलावती
तक्षिशला
गाधं ार
कु रू
अिहच्छत्र
इन्द पस्थ
श्र ावस्ती
िवराट पाचं ाल कुशीनारा वृिज्ज
मथ ुरा
कोसल वैशाली
मत्स्य शूरसेन वत्स
मल्ल वाराणसी राजगृह
चंपा
कौशांबी काशी
मगध अंग
अवंित
ित्रपुरी
उज्जियनी
चेिद
अश्मक
रंगीन क्षत्र
े = एक महाजनपद (सीमाए ँ अनुमािनत)
राजधानी
नीली रेखा = नदी
चत्र 4.3 (पृष्ठ 71) — सोलह महाजनपद, भारत क वास्त वक तटरेखा तथा न दय पर पुनः बनाए गए। क्षेत्र और
राजधा नय के तारे पुस्तक के अनुसार ह; पुस्तक के अनुसार सीमाएँ अनुमा नत ह।
चत्र 4.3 म लाल तारे इन राजधा नय को दशाते ह। इन चार क पहचान आज के भारतीय नगर से होती है — चार ही।
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महाजनपद मान चत्र म राजधानी आज का नगर आज का राज्य
मगध राजग ृह राजगीर बहार
कोसल श्रावस्ती श्रावस्ती (सहेत-महेत) उत्तर प्रदे श
वत्स कौशांबी कोसम , पयागराज के समीप उत्तर प्रदे श
अवं त उज्जियनी उ ज्जैन मध्य प्रदे श
अब यही काय शेष मान चत्र के लए क जए — असली आश्चय मलान क संख्या म है:
महाजनपद राजधानी ( चत्र 4.3) आज
अंग चंपा चंपापुर/चंपानगर, भागलपुर के समीप, बहार
वृ ज्ज (व ज्ज) वैशाली वैशाली, बहार
मल्ल कु शीनारा कुशीनगर, उत्तर प्रदे श
काशी वाराणसी वाराणसी, उत्तर प्रदे श
कुरू इन्द पस्थ दल्ली
पांचाल अिहच्छत्र रामनगर, बरेली जला, उत्तर प्रदे श
शूरसेन मथुर ा मथुरा, उत्तर प्रदे श
मत्स्य िवराट बैराठ, राज ान
चे द ित्रपुर ी तेवर, जबलपुर के समीप, मध्य प्रदे श
गांधार तक्षिशला, पुष्पकलावती टै क्सला तथा चारस ा, आज के पा कस्तान म
कंबोज (राजधानी अंिकत नही ं) सुदूर उत्तर-प श्चम का क्षेत्र
अश्मक (राजधानी अंिकत नही ं) गोदावरी के कनारे, आज के महाराष्ट्र/तेलंगाना म
इतने नगर आज भी क्य बचे ह: राजधा नयाँ वह बसाई जाती थ जहाँ नगर टक सके — नद के कनारे,
व्यापा रक माग पर, उपजाऊ प्रदे श म, सुर क्षत भू म पर। ये सु वधाएँ समाप्त नह हुईं, अतः लोग ने वे ान कभी
नह छोड़े। अध्याय के शब्द म — ये ‘आधु नक’ नगर वस्तुतः 2500 वष प्राचीन ह।
ध्यान द: हद संस्करण का मान चत्र काशी तथा उसक राजधानी वाराणसी को भी अं कत करता है; अंग्रेजी
संस्करण के उसी मान चत्र म यह नारंगी क्षेत्र बना नाम के छोड़ दया गया है।
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प्र.2 इस मान चत्र क तुलना कक्षा 6 के अध्याय ‘भारत अथात इं डया’ म महाभारत म उ ल्ल खत प्रदे श के मान चत्र
( चत्र 5.4) से क जए और उन नाम को सूचीबद्ध क जए जो दोन म समान ह। आपके अनुसार यह समानता
क्या संकेत करती है?
कं बोज पुष्पकलावती
तक्षिशला
गाधं ार
कु रू
अिहच्छत्र
इन्द पस्थ
श्र ावस्ती
िवराट पाचं ाल कुशीनारा वृिज्ज
मथ ुरा
कोसल वैशाली
मत्स्य शूरसेन वत्स
मल्ल वाराणसी राजगृह
चंपा
कौशांबी काशी
मगध अंग
अवंित
ित्रपुरी
उज्जियनी
चेिद
अश्मक
रंगीन क्षत्र
े = एक महाजनपद (सीमाए ँ अनुमािनत)
राजधानी
नीली रेखा = नदी
चत्र 4.3 (पृष्ठ 71) — सोलह महाजनपद, भारत क वास्त वक तटरेखा तथा न दय पर पुनः बनाए गए। क्षेत्र और
राजधा नय के तारे पुस्तक के अनुसार ह; पुस्तक के अनुसार सीमाएँ अनुमा नत ह।
दोन मान चत्र म समान नाम (इस अध्याय का चत्र 4.3 तथा कक्षा 6 का चत्र 5.4):
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क्र. दोन म समान नाम स्थ त
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ंध ार उत्तर-प श्चम
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3 म त्स्य आज का पूव राज ान
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a ऊपरी गंगा-यमुना दोआब
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7 कोसल मध्य गंगा का मैदान
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8 काशी वाराणसी के आस-पास
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10 अंग पूव बहार
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11 अवंित मालवा
12 अश्मक गोदावरी क्षेत्र
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अथात 16 म से 12 महाजनपद के नाम महाभारत क सूची म पहले से मलते ह। जो चार चत्र 5.4m .
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a म वदेह, क लग, वदभ, सुराष्ट्र,
. c om6 के पाठ म कुरुक्षेत्र का उल्लेख है), वत्स, मल्ल तथा वृ । दूसरी ओर aचत्रgl5.4
(यद्य प कक्षा
s e mचोल और पांड्य जैसे अनेक नाम ह जो महाजनपद नह थे।
glaयह समानता क्या संकेत करती है — तीन नष्कष:
केरल,
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नाम एवं भूभाग क नरंतरता। भारत के क्षेत्रीय नाम अत्यंत प्राचीन तथा आश्चयजनक रूप से र ह। वही नाम महाकाव्य
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परंपरा से होते हुए प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. के राजनी तक मान चत्र म आते ह और कई तो आधु नक भारत तक पहुँचते ह —
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गांधार, काशी → वाराणसी, मगध → बहार का मगध प्रमंडल, केरल → केरल।
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महाभारत वास्त वक भूगोल सुर क्षत रखता है। वह इ तहास-ग्रंथ नह , महाकाव्य है; फर भी जस भू म का वणन करता है
वह लोग क जानी-पहचानी भू म थी। इसी लए इ तहासकार उत्खनन के साथ-साथ उसम आए क्षेत्रीय नाम को भी साक्ष्य मानते
ह।
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प रवतन राजनी तक था, सांस्कृ तक नह । दोन मान चत्र के बीच जो बदला वह इकाई का स्वरूप है — ढ ले-ढाले प्रदे श
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और कुल अब कलेबंद राजधानी, सक्क और कर वाले संग ठत राज्य बन गए। लोग और उनका ान-बोध वह बना रहा।
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a यह करके दे ख: अपनी अभ्यास-पु स्तका म दो स्तंभ बनाइए — ‘दोन मान चत्र म’ तथा ‘केवल एक मान चत्र म’
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— और प्रत्येक नाम के आगे आज का राज्य ल खए। अंत म आपके सामने भारत का एक पहचाना हुआ मान चत्र
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होगा।
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 74
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प्रथम एवं तीय नगरीकरण क तुलना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 नम्न ल खत ता लका म प्रत्येक वग म ‘हाँ’ (सही का चह्न) या ‘नह ’ (काटने का चह्न) भर, जो भारतीय सभ्यता
के दोन चरण क एक रोचक तुलना करती है।
प्रथम तीय
नगरीकरण नगरीकरण
गंगा का मैदान
बौद्ध मठ
सा हत्य
व्यापार
युद्धकला
ताम्र / कांस्य
लोहा
पृष्ठ 74 पर छपी ता लका — वग भरने के लए रक्त छोड़े गए ह।
पूण क गई ता लका, प्रत्येक वग के कारण स हत:
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प्रथम तीय कारण
नगरीकरण नगरीकरण
गंगा का नही ं ✗ हाँ ✓ हड़प्पा के नगर सधु तथा सरस्वती घाट म थे; तीय नगरीकरण का आरंभ ही
मैदान गंगा के मैदान से हुआ।
बौद्ध मठ नही ं ✗ हाँ ✓ बौद्ध एवं जैन धम तथा यात्रा करने वाले भक्षु- भक्षु णयाँ महाजनपद युग क दे न
ह।
सा हत्य नही ं ✗ हाँ ✓ हड़प्पावा सय के पास लेखन-प्रणाली थी, परंतु वह आज तक अप ठत है और
कोई सा हत्य उपलब्ध नह । दूसरे चरण म उत्तर वै दक, बौद्ध तथा जैन सा हत्य
नवीन नगर के उल्लेख से भरा है।
व्यापार हाँ ✓ हाँ ✓ दोन चरण म व्यापक व्यापार हुआ — हड़प्पावा सय का प श्चम ए शया से,
महाजनपद का संपूण भारत तथा वदे श से; इसी कारण सक्क क आवश्यकता
पड़ी।
युद्धकला नही ं ✗ हाँ ✓ हड़प्पा नगर से युद्ध के स्पष्ट प्रमाण नह मले। इस अध्याय म समीपवत
महाजनपद के मध्य युद्ध के कुछ प्रमाण तथा लोहे के ह थयार का उल्लेख है।
ताम्र/ हाँ ✓ हाँ ✓ हड़प्पा सभ्यता ताम्र व कांस्य धातुकला म दक्ष थी; ये धातुएँ बाद म भी चलती रह
कांस्य — दूसरे चरण म तांबे के सक्के बने।
लोहा नही ं ✗ हाँ ✓ लोहा तीय नगरीकरण का ‘महत्वपूण तकनीक प रवतन’ है — कृ ष के
उपकरण तथा कांस्य से हल्के व तीक्ष्ण ह थयार।
यह प्र तरूप ऐसा क्य है: ✗ वाले वग को ऊपर से नीचे प ढ़ए और दोन युग का अंतर एक दृ ष्ट म मल जाएगा
— नया क्षेत्र (गंगा का मैदान), नया धा मक-सा ह त्यक संसार (मठ एवं ग्रंथ), नई धातु (लोहा) और उसके साथ
आया राज्य का संघष। जन दो पं क्तय म ✓✓ है, वे बताती ह क क्या अप रव तत रहा — व्यापार तथा ताम्र-
कांस्य कम।
स्वयं जाँच: यहाँ ‘नह ’ का अथ है अब तक प्रमाण नह मला, न क असंभव। इ तहासकार उपलब्ध साक्ष्य से काम
करते ह और हड़प्पा ल प आज भी अप ठत है — य द वह कभी पढ़ गई, तो इनम से कोई वग बदलना पड़ सकता
है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 76
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य AglaSem · NCERT Solutions
वण-जा त व्यवस्था — समाज समूह म क्य बँटता है
आइए पता लगाएँ
प्र.1 एक वक सत समाज अपने आप को व भन्न समूह म क्य वभा जत करता है? ऐसा क्य होता ह, इसके
संभा वत कारण पर वचार कर।
क्य क जब समाज बड़ा और ज टल हो जाता है तो कोई एक व्य क्त सब कुछ नह कर सकता। काय को समूह म बाँटना ही वह
उपाय है जससे वशाल समाज अपने सारे काम करा पाता है। इसके अनेक संभा वत कारण ह —
कौशल क व शष्टता। धातुकम, बुनाई, मृ ांड-कला, ापत्य, लेखा तथा च कत्सा — इनम से प्रत्येक को सीखने म वष
लगते ह। एक समूह कसी कौशल म दक्ष होकर सबक पू त करे, यह प्रत्येक प रवार ारा सब कुछ सीखने से कह अ धक
कुशल व्यव ा है।
ान का हस्तांतरण। वद्यालय और मु द्रत पुस्तक से पहले शल्प घर पर माता- पता से सीखा जाता था। इस प्रकार कौशल
और प रवार एक-दूसरे से जुड़ गए, पीढ़ -दर-पीढ़ — अध्याय जा त के वषय म ठ क यही कहता है।
राज्य क आवश्यकताएँ। शासन, प्रशासन, रक्षा, नगर- नयोजन तथा धा मक अनुष्ठान — इन सबके लए पूणका लक लोग
चा हए। नगर अंशका लक अ धका रय से नह चलता।
अन्न का अ धशेष इसे संभव बनाता है। जब कृषक अपनी आवश्यकता से अ धक उपजाते ह, तभी अन्य समूह बना खेती
कए जी वत रह सकते ह।
व्यापार एवं व नमय। भन्न- भन्न वस्तुएँ बनाने वाले समूह को परस्पर व नमय करना ही पड़ता है, जससे वभाजन ायी
और परस्पर आ त बनता है।
पहचान एवं अपनापन। समूह लोग को री त- रवाज, उत्सव, ववाह तथा भोजन के नयम और क ठन समय म सहारा दे ता है
— अध्याय क उप-जा तयाँ इसी का उदाहरण ह।
दूसरा पक्ष, जसे अध्याय स्पष्ट कहता है: एक आदश समाज म ये सभी समूह एक-दूसरे के पूरक होते और
समरसता से काय करते। परंतु अ धकांशतः ये वभाजन असमानताओं को भी जन्म दे ते ह — कुछ समूह दूसर क
तुलना म अ धक संप त्त, श क्त या प्रभाव प्राप्त कर लेते ह। ‘समानता’ ऐसा आदश है जसक कल्पना मानव ने प्रायः
क है, परंतु शायद ही कोई समाज इसे पूरी तरह प्राप्त कर सका हो।
क्या आप जानते ह? अध्याय यह भी बताता है क प्रारं भक काल म यह व्यव ा लचीली थी — लंबे अकाल या
प्राकृ तक आपदा म कृषक समुदाय नगर क ओर पलायन कर अन्य व्यवसाय अपना लेते थे, और कुछ ाह्मण
व्यापार या सै नक काय म भी प्रवृत्त हो जाते थे। कठोरता बहुत बाद म आई, वशेषतः टश शासनकाल म।
प्र.2 आप प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. के एक वक सत समाज म ऐसे और कौन-कौन से व्यवसाय क कल्पना कर
सकते ह?
अध्याय स्वयं शासन, प्रशासन, धम, शक्षा, व्यापार, नगर- नयोजन, कृ ष, शल्प तथा कला गनाता है। नीचे और भी अनेक व्यवसाय
ह, जन्ह वषय के अनुसार समूहबद्ध कया गया है ता क याद रखने म सरलता हो।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य AglaSem · NCERT Solutions
जीवन का संभा वत व्यवसाय अध्याय म प्रमाण
क्षेत्र
भोजन कृ षक, गोपालक, गड़िरया, मछु आ रा, माली, रसोइया, तेल ी, कौ टल्य के आदश राज्य म कृ षयोग्य क्षेत्र तथा “गोधन
अन्न-व्यापारी संपन्न चारागाह”
धातु एवं लोहार, लौह-गलक, तामकार, स्वणकार, पाषाण-िशल्पी, चत्र 4.5 साँची का लौह-कायशाला पैनल; चत्र 4.9
पाषाण मिणकार, शंख-िशल्पी कोडु मनाल का शंख एवं रत्न उद्योग
नगर- राजिमस्त्री, ईंट बनाने वाला, बढ़ ई, पाचीर व पिरखा िनम ता, प्रत्येक राजधानी म प्राचीर व प रखाएँ; चत्र 4.7
नमाण पथ-िनम ता, कू प खोदने वाला शशुपालगढ़
दै नक कु म्हार, बुनकर, रंग रे ज, दज , चमकार, टोकरी बुनने वाला, हड़प्पा के व शष्ट शल्पकार-समूह क वह सूची जसे
शल्प नािपत, मालाकार अध्याय स्मरण कराता है
व्यापार एवं व्यापारी, साथवाह, नािवक, गाड़ीवान, मुद ा-पिरवतक, िसक्के आहत सक्के ( चत्र 4.6); उत्तरापथ एवं द क्षणापथ
मु ा आहत करने वाला कारीगर, तौलने वाला
राज्य एवं राजा, मंत्र ी, कर-संग ाहक, ले खक, न्यायाधीश, ग प्ु तचर, राजा कर संग्रह, व ध-व्यव ा एवं सेना का संचालन
रक्षा सै िनक, सारथी, गजपाल, ारपाल करता था; सँकरे ार पर प्रहरी
ान एवं पुर ोिहत, आचाय, ग ंथ-पाठक, बौद्ध व जैन िभक्ष-ु िभक्षण
ु ी, वैद्य , व ान, भक्षु व भक्षु णयाँ भारतवष म यात्रा कर शक्षाओं
आस्था ज्योितिवद का प्रसार करते थे
कलाएँ मूितकार, िचत्रकार, वादक, नतक, कथावाचक, हिस्तदंत- “भारतीय कला का भी नवीनीकरण हुआ, जो आगे
िशल्पी साम्राज्य काल म पु ष्पत-पल्ल वत हुआ”
यह करके दे ख: ता लका म से कोई एक व्यवसाय चु नए और 500 सा.सं.पू. के राजगृह म उस व्य क्त के एक दन
पर चार पं क्तयाँ ल खए — वह क्या बनाता है, कौन खरीदता है, बदले म उसे क्या मलता है और वह नगर के कस
ार से आता-जाता है।
इसे अनदे खा न कर — पृष्ठ 76
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य
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वण-जा त व्यवस्था — ‘कास्ट’ शब्द कहाँ से आया
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इसे अनदे खा न कर
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a s emअं ेजी शब्द ‘कास्ट’ सुना होगा। यह शब्द पुतगाली भाषा के शब्द ‘कास्टा’ से आया है। 16व शताब्द म
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आपने
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प्र.1
जब पुतगाली यात्री भारत आए तो उन्ह ने भारत क सामा जक संरचना को समझने के लए इस शब्द का प्रयोग
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कया। कुछ व ान ‘कास्ट’ का प्रयोग वण के संदभ म करते ह। जब क अ धकांश इसे जा तय के लए उपयुक्त
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मानते ह। कुछ दूसरे व ान ‘कास्ट’ शब्द का प्रयोग संपूण वण-जा त व्यवस्था को इं गत करने के लए करते ह।
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इस बॉक्स का मूल बदु: ‘कास्ट’ भारतीय शब्द है ही नह । यह एक भारतीय वास्त वकता पर चपकाया गया वदे शी लेबल है, और
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इसी लए इसका प्रयोग इतना ढ ला-ढाला है।
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शब्द कहाँ से आया वस्तुतः कसे इं गत करता है
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a g वण वैिदक ग ंथों से उद् भतू
अवधारणा
चार े णयाँ — ाह्मण ( ान को सुर क्षत रखना व प्रसा रत करना तथा य ा द करना), क्ष त्रय
(समाज व दे श क रक्षा तथा आवश्यकता पड़ने पर युद्ध), वैश्य (व्यापार, व्यवसाय या कृ ष से समाज
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क समृ द्ध बढ़ाना), शूद्र ( शल्पकला, नमाण, सेवा या अन्य काय)
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जा त वशेष पेशे या जी वका से जुड़ा समुदाय, जसका कौशल पीढ़ -दर-पीढ़ हस्तांत रत होता था और जो
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भारतीय समाज स्वयं
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प्रायः उप-जा तय म वभक्त होता था — प्रत्येक के अपने ववाह, अनुष्ठान तथा भोजन-संबंधी री त-
रवाज
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कास्ट पुतगाली कास्टा, 16वी ं कुछ व ान इसे वण के लए, अ धकांश जा त के लए और कुछ संपूण वण-जा त व्यव ा के लए
शताब्दी के याित्र यों ारा प्रयोग करते ह
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पयुक्त
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agl यह भ्रम क्य उत्पन्न हुआ: पुतगाली या त्रय को ऐसा समाज मला जो एक साथ दो प्रकार से संग ठत था — ग्रंथ
से आई चार वण क अवधारणा, और धरातल पर जी वत सह व्यावसा यक जा तयाँ। उनके पास दोन के लए
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एक ही शब्द था, अतः एक शब्द को दोन पर फैलाना पड़ा। तभी से ‘कास्ट’ का अथ भन्न- भन्न लेखक के लए भन्न
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रहा है।
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संकेत: परीक्षा म लखते समय वह भारतीय शब्द अवश्य ल खए जो आपका अ भप्राय है — वण या जा त — और
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फर बताइए क उस वाक्य म ‘कास्ट’ कसके लए प्रयुक्त हुआ है। यही एक आदत अ धकांश भ्रम दूर कर दे ती है।
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agl आइए वचार कर — पृष्ठ 77
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वण-जा त व्यवस्था — असमानता एवं समानता
आइए वचार कर
प्र.1 समाज म असमानताएँ अनेक रूप म पाई जाती ह। क्या आपने कभी ऐसी कोई घटना दे खी या अनुभव क है
जब आपको या आपके कसी प र चत को दूसर से भन्न समझा गया हो? क्या आप मानते ह क समाज म
समानता आवश्यक है? य द हाँ, तो क्य ? क्या आपने कसी ऐसे व्य क्त या कसी ऐसी पहल को दे खा है, जनके
ारा समाज म असमानता को कम करने का प्रयास कया गया हो?
यह व्य क्तगत एवं चतनपरक प्रश्न है, अतः इसका उत्तर कोई बना-बनाया नह दे सकता। नीचे बताया गया है क अपना उत्तर कैसे
बनाएँ, और साथ म एक नमूना भी दया गया है।
अ े उत्तर म चार बात होनी चा हए:
1. एक वास्त वक घटना, संक्षेप म और शालीनता से। कसी का नाम न ल खए — ‘एक सहपाठ ’, ‘एक पड़ोसी’ ल खए।
2. असमानता का स्वरूप — संप त्त, लग, भाषा, क्षेत्र, दव्यांगता, प रवार का व्यवसाय या नया-नया आना।
3. समानता पर आपका मत, कारण स हत — केवल भावना नह ।
4. एक पहल या व्य क्त जसे आपने वास्तव म दे खा या पढ़ा हो और जसने असमानता घटाई हो।
नमूना उत्तर:
वष के बीच म हमारी कक्षा म आया एक वद्याथ घर पर दूसरी भाषा बोलता था और जब वह पढ़कर सुनाता तो कुछ बच्चे हँस दे ते।
दो सप्ताह तक उसने कक्षा म उत्तर दे ना ही छोड़ दया। हमारी अध्या पका ने पढ़ने के अभ्यास के लए हर वद्याथ क एक जोड़ी
बनाई और उससे कहा क वह कक्षा को अपनी भाषा के दस शब्द सखाए। महीने के अंत तक वही हमारा उच्चारण सुधार रहा था।
यह भाषा तथा ‘बाहरी’ होने क असमानता थी, और कक्षा के नयम बदलने मात्र से वह कम हो गई।
हाँ, समाज म समानता आवश्यक है — तीन कारण से। यह न्यायसंगत है: कोई अपना प रवार, भाषा या जन्म ान चुनकर नह
आता, अतः इनके आधार पर कसी को ऊँचा-नीचा नह माना जा सकता। यह उपयोगी है: यही अध्याय दखाता है क जस समाज
म हर समूह के कौशल का सम्मान और उपयोग होता है वह सशक्त होता है, और जहाँ प्र तभा केवल जन्म के कारण व्यथ जाती है
वह दुबल। और यह सं वधान का आदे श है: भारत का सं वधान व ध के समक्ष समता दे ता है तथा धम, मूलवंश, जा त, लग या
जन्म ान के आधार पर भेदभाव का नषेध करता है।
असमानता घटाने वाली पहल — वद्यालय म मध्याह्न भोजन तथा नःशुल्क पाठ्यपुस्तक; नधन प रवार के वद्या थय के लए
छात्रवृ त्तयाँ; दव्यांगजन के लए रप, बड़े अक्षर वाली पुस्तक एवं सांके तक भाषा; पंचायत म म हलाओं के लए आर क्षत ान;
डॉ. भीमराव आंबेडकर का समता हेतु काय तथा उससे नकले संवैधा नक प्रावधान; और अपने ही वद्यालय म वह व्यव ा जहाँ
बच्चे केवल क्रमांक से बैठाए जाते ह।
अध्याय से जो ड़ए: पुस्तक कहती है क वण-जा त व्यव ा ने भारतीय समाज को संरचना और कुछ रता द ,
परंतु समय के साथ यह कठोर होकर भेदभाव का कारण बनी — और यह भी क प्राचीन काल म यह कह अ धक
लचीली थी। इ तहासकार क यही शक्षा है: सामा जक व्यव ाएँ मनुष्य ने बनाई ह, और जो मनुष्य ने बनाया है उसे
मनुष्य बदल भी सकता है।
आगे बढ़ने से पहले… — पृष्ठ 80
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय तीन बदुओं म
आगे बढ़ने से पहले …
प्र.1 दूसरी सह ाब्द सा.सं.पू. के अंत से उत्तर और मध्य भारत के कुछ भाग म जनपद का उदय हुआ। ये छोटे राज्य
थे जनका शासक एक राजा होता था, जो व रष्ठजन क प रषद से परामश लेकर नणय करता था।
इस बदु को चार चरण म खो लए।
कब: तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के उत्तराध म, अथात 1000 सा.सं.पू. से कुछ शताब्द पूव, उत्तर भारत क क्षेत्रीय संस्कृ तयाँ
धीरे-धीरे स्वयं को पुनसग ठत करने लग ।
कैसे बने: लोग कुल अथवा वंश के रूप म संग ठत हुए, जो संभवतः समान भाषा एवं सांस्कृ तक परंपराएँ साझा करते थे,
और प्रत्येक कुल एक नयत भूभाग से जुड़ गया।
नाम का अथ: संस्कृत म जनपद का अथ है — “जहाँ ‘जन’ ने अपने पद (पग या चरण) रखे ह ”, अथात जहाँ लोग नवास
करने लगे। शब्द स्वयं उस क्षण को अं कत करता है जब घूमता हुआ समूह बसा हुआ जन बन गया।
शासन कैसे चलता था: शीष पर राजा, परंतु अकेला नह । प्रत्येक जनपद म सभा या स म त होती थी — प्रायः व रष्ठजन क
प रषद — जसम कुल से संबं धत वषय पर वचार- वमश होता था, और राजा से अपेक्षा थी क वह मं त्रय -प्रशासक के
साथ-साथ इस प रषद से भी परामश ले।
यही वास्त वक ‘नवारंभ’ क्य है: हड़प्पा के पतन के बाद लगभग एक सह ाब्द तक भारत म न राज्य था, न
नगर। जनपद वह क्षण है जब राज्य लौटता है — छोटा, कुल-आधा रत, और परामश क उस परंपरा को साथ लए
जसे आगे चलकर महाजनपद ने और वक सत कया।
प्र.2 प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. म 16 महाजनपद प्रथम संग ठत राज्य के रूप म स्था पत हुए। इसी कालखंड म भारत
म तीय नगरीकरण प्रारंभ हुआ, जो गंगा क्षेत्र से द क्षण भारत तक सभी दशाओं म वस्तृत हो गया। लगभग
300 सा.सं.पू. तक महाजनपद का अ स्तत्व समाप्त हो गया।
क्रम, जैसा पृष्ठ 79 का चत्र 4.8 दखाता है:
हड़ प्पा सभ्यता का अंत
1900 1200 800 400
सा.सं.पू. 300
जनपद
महाजनपद
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय क समय-रेखा ( चत्र 4.8) का पुनरांकन — लगभग 1900 सा.सं.पू. म हड़प्पा सभ्यता का अंत, लगभग 1200–500 सा.सं.पू. तक
जनपद, तथा लगभग 800 सा.सं.पू. से 300 सा.सं.पू. तक महाजनपद।
‘प्रथम संग ठत राज्य’ — महाजनपद के पास कलेबंद राजधानी, कर, मंत्री, सभा, सेना तथा अपनी मुद्रा थी। कुल के भूभाग
क तुलना म यही राज्य बनाता है।
‘ तीय नगरीकरण’ — इनक राजधा नयाँ ही वे नवीन नगर थ : वशाल, प्राचीरयुक्त, बाहर प रखा और जन व वस्तुओं के
नयंत्रण हेतु सँकरे प्रवेश ार।
‘सभी दशाओं म वस्तृत’ — गंगा क्षेत्र से बाहर क ओर: पूव म शशुपालगढ़, क लग क वगाकार योजना वाली राजधानी
जसम सुदृढ़ दुग और चौड़ी सड़क थ ; द क्षण म, जहाँ नगर लगभग 400 सा.सं.पू. से उभरे और चोल, चेर तथा पांड्य राज्य
का उदय हुआ; तथा दोन तट के बंदरगाह तक।
‘लगभग 300 सा.सं.पू. तक अ स्तत्व समाप्त’ — समीपवत राज्य के युद्ध और कभी-कभी गठबंधन से बड़े राज्य और
फर साम्राज्य बने, जनक चचा पुस्तक आगे करती है।
क्या आप जानते ह? लगभग इसी समय, 300 या 200 सा.सं.पू. तक, उत्तर-पूव प्रदे श समेत संपूण उपमहा प
एक परस्पर जुड़ा जीवंत भूभाग बन चुका था, और वस्तुएँ तथा संस्कृ त मध्य ए शया एवं द क्षण-पूव ए शया तक
पहुँच रही थ ।
प्र.3 इसी अव ध म उत्तर-द क्षण, पूव-प म तथा संपूण उपमहा प को जोड़ने वाला एक वशाल सड़क माग बना।
इन माग के माध्यम से लोग , वस्तुओं, वचार एवं शक्षाओं का आदान-प्रदान हुआ।
अध्याय दो प्रमुख माग का नाम लेता है, जनका उल्लेख सा हत्य म बार-बार मलता है —
माग कहाँ से कहाँ तक इस पर क्या चलता था
उत्तरापथ उत्तर-पिश्चम क्षेत्र ों से गंग ा के मैद ानों तथा वहाँ से पूव त्तर भारत तक व्यापािरक वस्तुए ँ, तीथयात्र ी, से नाएँ, िस क्के तथा
नई िशक्षाएँ ले क र चलने वाले िभक्ष-ु िभक्षिु णयाँ
द क्षणापथ कौशाबं ी (पयागराज के समीप), जो उस समय एक महाजनपद की बहमु ूल्य व अध -बहमु ूल्य र त्न, स्वण तथा मसाले
ृ ला पार कर दिक्षण भारत तक
राजधानी थी — वहाँ से िवंध् य पवत श्रंख उ त्त र की ओर ; वस्तुए ँ व िवचार दिक्षण की ओर
और समानांतर माग। अनेक समानांतर माग भारत के अन्य भाग को, वशेषकर प श्चमी और पूव तट के बंदरगाह को जोड़ते थे,
जो व्यापार के स क्रय कद्र थे। द क्षणी क्षेत्र बहुमूल्य तथा अध-बहुमूल्य रत्न , स्वण और सुगं धत मसाल से समृद्ध थे, अतः उन्ह ने न
केवल संपूण भारत ब ल्क वदे शी राज्य व साम्राज्य के साथ भी लाभप्रद व्यापार कया।
इ तहासकार के लए माग क्य महत्वपूण ह: एक ही माग एक साथ चार चीज ढोता है — वस्तुए ँ (इसी कारण
सक्के एक क्षेत्र से दूसरे म फैले), लोग (व्यापारी, तीथयात्री, सै नक), वचार एवं शक्षाएँ (बौद्ध व जैन भक्षु इन्ह
माग पर चले) और कला-शै लयाँ। इसी लए अलग-अलग राज्य से भरा उपमहा प भी एक ही सभ्यता साझा कर
सका।
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यह करके दे ख: चत्र 4.3 के मान चत्र पर अँगुली से उत्तरापथ और द क्षणापथ का अनुमा नत माग ख चए और
प्रत्येक माग पर पड़ने वाले तीन-तीन महाजनपद के नाम ल खए। आज का ग्रड ं क रोड बहुत कुछ उत्तरापथ का ही
अनुसरण करता है।
प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 81
अध्याय के अंत का अभ्यास
प्र.1 अध्याय के आरंभ म दए गए उद्धरण पर वचार कर और समूह म चचा कर। अपने नरीक्षण तथा नष्कष क
तुलना कर क कौ टल्य ने एक राज्य के लए क्या अनुशंसा क थी? क्या यह आज क प र स्थ त से भन्न है?
चरण 1 — उद्धरण से कौ टल्य क अनुशंसाएँ नका लए। पृष्ठ 67 पर दया अथशास्त्र का यह अंश कुछ ही पं क्तय म छह माँग
रखता है —
कौ टल्य क माँग उनके शब्द राज्य को इसक आवश्यकता क्य
रक्षा “राजधानी तथा सीमांत नगरों की दुग बंद ी आवश्यक है” जो राज्य अपनी सीमा और राजधानी क रक्षा न कर
सके, वह टकता नह
अन्न-सुरक्षा, अ त रक्त “न के वल जनसामान्य का पोषण… अिपतु आपदाओं के अकाल या बाढ़ म शरणा थय को खलाने के लए
स हत समय आगंतक
ु ों का भी िनव ह” अन्न का अ धशेष
प्राकृ तक संसाधन “कृ िषयोग्य क्षेत्र , खिनजयुक्त पदे श, काष्ठवन, गजवन कृ ष, धातु, नमाण-सामग्री, युद्ध के हाथी, दूध तथा
तथा गोधन संपन्न चारागाह” हल के पशु
वषा पर नभर न रहने “जल के िलए के वल वष पर िनभरता नही ं होनी चािहए” न दयाँ, जलाशय और कूप राज्य को असफल
वाला जल मानसून म भी बचाते ह
प रवहन “सड़कें तथा जलमाग सुग म व सुव्यविस्थत होने चािहए” अन्न, वस्तुओं, राजस्व तथा सेना क आवाजाही
उत्पादक अथव्यवस्था “िविवध पकार की वस्तुओ ं से पिरपूण” अनेक उत्पाद अथात व्यापार, कर तथा कसी एक के
वफल होने पर भी टकाव
चरण 2 — चचा और ईमानदार नष्कष। कक्षा को समूह म बाँ टए, प्रत्येक समूह को एक पं क्त द जए और उससे आज का
समकक्ष खोजने को क हए। प्रायः सभी समूह इसी नष्कष पर पहुँचते ह —
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 4 नवारंभ— नगर एवं राज्य
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कौ टल्य, लगभग 300 आज का भारत समान या भन्न?
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राजधानी व सीमांत नगरों की दुग बंद ी
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सशस्त्र बल , सीमा चौिकयाँ, तटीय एवं साइबर उ े श्य वही,
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आपदा में बाहरी लोगों का भी पोषण भारतीय खाद्य िनगम का बफर स्टॉक , आपदा समान
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राहत
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खान, वन, चारागाह
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खिनज एवं ऊज संस ाधन, वन तथा दुग्ध नीित समान, साथ म नई चता — संधारणीयता
के वल वष पर िनभर न रहना
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बाँध , नहरे ं, नलकू प, जल -संभर तथा वष जल समस्या वही, अनेक जल म आज भी
संचयन अनसुलझी
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सुग म सड़कें तथा जलमाग राजमाग, रे ल , बंद रगाह, हवाई अ े , अंतद शीय समान
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जलमाग
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िविवध वस्तुओ ं वाली उत्पादक कृ िष, उ द्य ोग तथा से वा क्षेत्र साथ-साथ समान
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नष्कष: सूची लगभग बलकुल नह बदली — सुरक्षा, अन्न, जल, संसाधन, प रवहन और व्यापक अथव्यव ा आज भी वही
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पlत्त है; आज वही काय नवा चत सरकार करती है, जो नाग रक के प्र त उत्तरदायी है,
कसौ टयाँ ह जन पर सरकार परखी जाती है। जो बदला है वह है नणय कौन लेता है और कसके लए। कौ टल्य ऐसे राजा को
परामश दे ते ह जसका राज्य उसक अपनीaसंg
सं वधान के अधीन है, और जसक सूची म अ धकार तथा कल्याण ( शक्षा, स्वास्थ्य, समानता) भी जुड़ चुके ह — साथ ही
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पयावरणीय मूल्य भी, जसे कौ टल्य को कभी तौलना नह पड़ा।
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क्या आप जानते ह? कौ टल्य, जन्ह चाणक्य भी कहा जाता है, परंपरागत रूप से चौथी शताब्द सा.सं.पू. म रखे
m ह — ठ क इसी अध्याय के महाजनपद काल के अंत म। इसी लए वे पहले से ही कलेबंद राजधा नय और a g
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agl सीमांत नगर क भाषा म सोचते ह।
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s म शासक का चयन कैसे कया जाता था?
पाठ के अनुसार प्रारं भक वै दकaसमाज
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दो भन्न प्रकार से, राज्य के स्वरूप के अनुसार।
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m राजा का पुत्र होता था। वह सव च्च अ धकारयुक्त होता था, जसे मं त्रय तथा व रष्ठजन क सभा का समथन प्राप्त था।
राजतंत्र म — मगध, कोसल, अवं त तथा अ धकांश अन्य म — राजा का पद वंशानुगत होता था: राजा साधारणतः पूववत
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गण अथवा संघ म — व ज्ज (वृ ज्ज) तथा समीपवत मल्ल म — राजा का चयन सभा अथवा स म त ारा कया जाता
था। सभी महत्वपूण वषय पर वचार- वमश होता और आवश्यकतानुसार मतदान ारा नणय लए जाते थे; राजा का चयन भी
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उन्ह नणय म से एक था।
और दोन ही प्रकार के राज्य म सभा s m
काe महत्व था। प्रत्येक जनपद म एक सभा या स म त होती थी — ये शब्द सवप्रथम वेद म
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मलते ह, जो भारत के प्राचीनतम ग्रंgथlह — जसम कुल से संबं धत वषय पर वचार- वमश होता था और जसके अ धकांश सदस्य
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संभवतः कुल के व रष्ठजन होते थे। राजा से यह अपेक्षा नह थी क वह स्वेच्छाचारी शासन करे; सदाचारी राजा वही था जो सभा-
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स म त, मं त्रय तथा प्रशासक से परामश लेकर नणय ले। कुछ ग्रंथ के अनुसार अयोग्य राजा को सभा पदच्युत भी कर सकती
थी।
व तथा मल्ल को ‘प्रारं भक गणराज्य’ क्य कहा जाता है: क्य क वहाँ यह जन्म नह , ब ल्क सभा के सदस्य
तय करते थे क शासन कौन करेगा और नणय क्या ह गे। ये वश्व क सवप्रथम गणतां त्रक प्रणा लय म से ह —
महाजनपद के समाप्त होने से भी शता ब्दय पहले भारत क एक प्रारं भक लोकतां त्रक परंपरा।
स्वयं जाँच: अध्याय क यह चेतावनी अपने उत्तर म अवश्य जो ड़ए — सभा ारा राजा को हटाने के उल्लेख
महत्वपूण ह, परंतु इनसे यह सद्ध नह होता क यह कोई व धसम्मत परंपरा थी, क्य क उस कालखंड के पूण साक्ष्य
उपलब्ध नह ह।
प्र.3 कल्पना क जए क आप प्राचीन भारत के इ तहास का अध्ययन करने वाले एक इ तहासकार ह। महाजनपद के
वषय म अ धक जानकारी हेतु आप कौन-कौन से ोत (पुराता त्वक, सा ह त्यक इत्या द) का उपयोग करगे?
प्रत्येक ोत से आपको क्या जानकारी प्राप्त हो सकती है, वणन कर।
अध्याय स्वयं इस काल के दो प्रमुख ोत-वग बताता है; एक कायरत इ तहासकार इन सबका उपयोग करेगा और एक को दूसरे से
मलाकर जाँचेगा।
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ोत का इस अध्याय से उदाहरण इससे क्या ात होता है इसक सीमा
प्रकार
पुराता त्वक — राजग ृह (िचत्र 4.1), कौशांबी (िचत्र िक नगर वास्तव में थे; उनका िवस्तार , पत्थर यह नह बताते क
उत्ख नत स्थल 4.4), िशशुपालगढ़ (िचत्र 4.7), आधार -रचना, पाचीरे ं, पिरखा, ार की ान का नाम क्या था या
कोडुम नाल (िचत्र 4.9) चौड़ाई, सड़कों की योजना शासक कौन था
पुराता त्वक — चाँद ी के आहत िसक्के (िचत्र 4.6) िक व्यापार इतना बढ़ चुक ा था िक मुद ा प्रतीक का अथ नकालना
सक्के आवश्यक हो गई; कौन-सा क्षेत्र कौन-सी क ठन है और अ धकांश
मुद ा जारी करता था और वह कहाँ तक सक्क पर कोई लेख नह
पहच
ु ँ ी — धातु में िखंचा व्यापार का मानिचत्र
पुराता त्वक — लोहे के उपकरण व हिथयार; युग की तकनीक , लोग क्या बनाते थे और वस्तुएँ असमान रूप से
उपकरण एवं कोडुम नाल की शंख एवं रत्न िकसमें द क्ष थे बचती ह — धातु म जंग
उ ोग कायशालाएँ लगती है, वस्त्र व काष्ठ नष्ट
हो जाते ह
कला एवं साँची स्तूप का लौह-कायशाला पैनल काय कै से संगिठत था — िकतने श्रिमक , कला आदश करण कर
मू त शल्प (िचत्र 4.5), िजसमें श्रिमक जलावन व कौन क्या करता था सकती है; पैनल उस दृश्य से
जल लाते, आग जलाते और लोहा बाद का है जसे वह दखाता
पीटते िदखाए गए है ं है
सा ह त्यक उत्तर वैिदक, बौद्ध तथा जैन सािहत्य, महाजनपदों तथा उनकी राजधािनयों के भन्न ग्रंथ भन्न सू चयाँ दे ते
िजनमें नवीन नगरों का िवशेष उल्ले ख नाम , उनके शासक , उनकी सभाएँ, और ह; उनका त थ- नधारण
है; अथशास्त्र ; चोल-चेर -पांड हेत ु समकालीन लोग राज्य को कै सा दे खना क ठन है; क व अ तशयो क्त
पाचीनतम तिमल सािहत्य चाहते थे करते ह
अ भलेख अध्याय स्वयं व्यवसाय-पिरवतन के ितिथयुक्त, आिधकािरक कथन — उस प्रायः वही अं कत होता है जो
िलए “ग ंथों और अिभले खों से िमले काल के द स्तावेज़ के सबसे िनकट की वस्तु शासक या दानदाता स्मरण
ऐितहािसक पमाण” का उल्ले ख कराना चाहता था
करता है
इन्ह जो ग
ँ ा कैसे: एक कथन ली जए — “वैशाली वृ ज्ज क राजधानी थी।” बौद्ध सा हत्य यही कहता है; वैशाली म
उत्खनन से ठ क उसी काल का कलेबंद प्रारं भक-ऐ तहा सक नगर मलता है; उसी स्तर से क्षेत्र के सक्के भी मलते
ह। तीन स्वतंत्र प्रकार के साक्ष्य का एक ही दशा म संकेत करना ही कथा को इ तहास बनाता है। जहाँ वे परस्पर
भन्न ह — जैसे महाजनपद क भन्न- भन्न सू चयाँ — वहाँ ईमानदार इ तहासकार अपनी पसंद चुनने के ान पर
मतभेद को दज करता है।
संकेत: अ धक अंक वाले प्रश्न म नए वै ा नक ोत भी जो ड़ए — प्राचीन जलवायु का अध्ययन, धातुओं व मृ ांड
का रासाय नक व ेषण, तथा रे डयोकाबन त थ- नधारण, जससे द क्षण के प्रथम नगर क त थ ‘लगभग 400
सा.सं.पू.’ न श्चत होती है।
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प्र.4 प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. म नगरीकरण हेतु लौह धातु- व ान का वकास इतना महत्वपूण क्य था? उत्तर दे ने हेतु
आप पाठ म दए गए तथ्य के साथ-साथ अपनी जानकारी या कल्पना का भी उपयोग कर सकते ह।
क्य क नगर को न तो अच्छे उपकरण के बना भरा-पूरा रखा जा सकता है, न बनाया, न बचाया जा सकता है — और लोहा पहली
ऐसी धातु थी जो इतनी सस्ती और कठोर थी क उपकरण सबके हाथ म पहुँच सके।
पाठ के अपने बदु, क्रम से:
काल। भारत के अनेक क्षेत्र म लौह नष्कषण एवं उसे आकार दे ने क व धयाँ तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के प्रारंभ म ही
वक सत हो चुक थ , परंतु दै नक जीवन म लोहे का उपयोग कुछ शता ब्दय बाद व्यापक हुआ। तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के
अंत तक लोहे के उपकरण कृ ष म प्रयुक्त होने लगे।
कृ ष का वस्तार। लोहे के उपकरण से कृ ष का वस्तार हुआ — और बड़ी उपज ही उस नगर का पेट भरती है जसम अन्न
उपजाने वाले बहुत कम होते ह।
बेहतर ह थयार। लोहे के ह थयार — तलवार, भाले, तीर, ढाल — कांस्य क तुलना म अ धक हल्के, तीक्ष्ण एवं प्रभावशाली
सद्ध हुए। समीपवत महाजनपद के मध्य युद्ध के कुछ प्रमाण मलते ह, और इन्ह युद्ध तथा कभी-कभी होने वाले गठबंधन
से नए राज्य और साम्राज्य अ स्तत्व म आए।
तकनीक ही नगरीकरण चलाती है। अध्याय स्पष्ट कहता है — नगरीकरण तकनीक के बना संभव नह है। प्रथम नगरीकरण
ताम्र-कांस्य पर चला, तीय लोहे पर।
अपनी जानकारी से जोड़े जा सकने वाले बदु:
लोहे का उपकरण इससे क्या संभव हुआ
कु ाड़ी गंगा के मैदान के सघन वन को खेत तथा ब स्तय के लए साफ करना
हल का फाल भारी, नम जलोढ़ म को जोतना, जसे काठ का हल केवल खुरच पाता था
हँिसया वषा से बगड़ने से पहले बड़ी फसल को शीघ्र काट लेना
छे नी, आरी, कीले ं बढ़ईगीरी, गा ड़याँ, नौकाएँ, नगर- ार तथा प्राचीर का काष्ठ काय
फावड़ा एवं कु दाल प्रत्येक राजधानी के चार ओर प रखा खोदना तथा प्राचीर खड़ी करना
लोहा ही क्य , कांस्य क्य नह : कांस्य के लए तांबे के साथ राँगा ( टन) भी चा हए, और राँगा दुलभ है — इस लए
कांस्य महँगा रहा और कुछ ही लोग तक सी मत रहा। लौह अयस्क सामान्य है और गंगा के मैदान से लगी पहा ड़य म
ही मल जाता है, अतः गलाने और गढ़ने क व ध आते ही कृषक, बढ़ई और सै नक — सबके पास लोहा पहुँच गया।
वला सता क धातु और समाज बदल दे ने वाली धातु म यही अंतर है।
चत्र 4.5 को फर दे खए: साँची का पैनल पूरी लौह कायशाला दखाता है — कोई जलावन ला रहा है, कोई जल,
कोई आग जला रहा है, कोई लोहा पीट रहा है। लौह-कम कसी एक चतुर व्य क्त का काम नह , ब ल्क एक संग ठत
और व शष्ट उद्योग था — ठ क वैसा व्यवसाय जसके लए नगर ान बनाता है।
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अध्याय — एक नज़र म
भारत का ‘प्रथम नगरीकरण’ समाप्त हुआ और लगभग एक सह ाब्द तक नगरीय जीवन लुप्त रहा। तीय सह ाब्द
सा.सं.पू. के आरंभ म सधु/हड़प्पा/ सधु-सरस्वती सभ्यता का वघटन हो गया। नगर प रत्यक्त हो गए या लोग ग्राम्य जीवन-
शैली क ओर लौट गए, क्य क नगरीय व्यव ा के सभी घटक — भव्य भवन, व्यस्त बाजार, व शष्ट शल्पकार-समूह, लेखन-
प्रणाली, स्वच्छता व्यव ा, शासन तंत्र तथा शासक वग — लुप्त हो गए थे।
‘ तीय नगरीकरण’ प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. म आरंभ हुआ — गंगा के मैदानी भाग, सधु घाट के कुछ क्षेत्र तथा
नकटवत प्रदे श म, और क्रमशः संपूण उपमहा प म फैला। इसके साक्ष्य दो ोत से मलते ह — पुराता त्वक उत्खनन तथा
प्राचीन सा हत्य (उत्तर वै दक, बौद्ध एवं जैन)। यह चरण आज तक अनवरत चल रहा है।
जनपद से महाजनपद बने। तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के उत्तराध म कुल एक नयत भूभाग से जुड़े, जसे जनपद कहा गया
और जसका शासक राजा होता था। ‘जनपद’ का अथ है ‘जहाँ जन ने अपने पद रखे ह ’। व्यापा रक तंत्र के वस्तार से 8व –
7व शताब्द सा.सं.पू. तक कुछ जनपद मलकर महाजनपद बने — प्रच लत सूची म 16 महाजनपद ह, उत्तर-प श्चम म गांधार
से पूव म अंग तथा मध्य भारत म अश्मक तक।
शासन प्रणाली म लोकतां त्रक तत्व थे। प्रत्येक जनपद म सभा या स म त होती थी — ये शब्द सवप्रथम वेद म मलते ह।
सदाचारी राजा सभा-स म त, मं त्रय तथा प्रशासक से परामश लेता था; कुछ ग्रंथ के अनुसार अयोग्य राजा को सभा पदच्युत
भी कर सकती थी। अ धकांश महाजनपद वंशानुगत राजतंत्र थे, परंतु व (वृ ) एवं मल्ल गण या संघ थे जहाँ सभा
मतदान ारा नणय लेती और राजा का चयन भी करती थी — व ान इन्ह ‘प्रारं भक गणराज्य’ कहते ह।
लोहे और सक्क ने दै नक जीवन बदल दया। लौह धातुकम क व धयाँ तीय सह ाब्द सा.सं.पू. के प्रारंभ म ही
वक सत हो चुक थ ; लोहे के उपकरण से कृ ष का वस्तार हुआ और लोहे के ह थयार कांस्य क तुलना म हल्के व तीक्ष्ण
सद्ध हुए। बढ़ते व्यापार ने भारत के प्रथम सक्क को जन्म दया — चाँद के आहत सक्के, बाद म तांबा और सोना;
सामान्यतः प्रत्येक महाजनपद अपनी मुद्रा जारी करता था।
समाज वण एवं जा त म संग ठत हुआ और संपूण उपमहा प जुड़ गया। जा त जी वका से जुड़ा समुदाय था जसका
कौशल पीढ़ -दर-पीढ़ हस्तांत रत होता था; वण वै दक ग्रंथ से उ त चार े णयाँ थ । उत्तरापथ एवं द क्षणापथ तथा तट य
बंदरगाह तक जाने वाले समानांतर माग ने उत्तर-द क्षण को जोड़ा। 300–200 सा.सं.पू. तक संपूण उपमहा प एक जीवंत,
परस्पर जुड़ा भूभाग बन चुका था — और महाजनपद का अ स्तत्व समाप्त हो गया।
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त्व रत पुनरावृ त्त
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agउदाहरण
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शब्द अध्याय म कहाँ पु स्तक से
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तीय पथम सह ाब्दी सा.सं.पू. में आरंभ हुआ नगरीय पृष्ठ 68–69 गंगा के मैदान व सधु घाट से आरंभ; “आज तक
नगरीकरण जीवन का नया चरण अनवरत चलता आ रहा है”
. coपृष्ठm69 ag
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जनपद एक कु ल का िनयत भूभाग, िजसका शासक राजा संस्कृत म — “जहाँ ‘जन’ ने अपने पद रखे ह ”
होता था
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महाजनपद पारंिभक जनपदों के िमलने से बनी िवशाल
a पृष्ठ 69 प्रच लत सूची म 16 — गांधार से अंग तथा
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राजकीय इकाई अश्मक तक
ये शब्द सवप्रथम वेm
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a s e द म मलते ह
com a(वृglज्ज) एवं मल्ल — व ान के ‘प्रारं भक
सभा / स म त कु ल की सभा या पिरषद पृष्ठ 70
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गण / संघ वह महाजनपद जो राजतंत्र नही ं था पृष्ठ 72 व ज्ज
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गणराज्य’
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प रखा (खाई) हा शया, पृष्ठ 70 शशुपालगढ़ के ार के बाहर जल से भरी प रखा
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िकले या िकले बंद शहर के चारों ओर गहरा-चौड़ा
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ग ा िजसमें पानी भरा होता था ( चत्र 4.7)
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आहत सक्के
g l a पृष्ठ 73–75 चत्र 4.6 — उत्तर भारत के प्राचीन नगर से प्राप्त
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भारत के पथम िसक्के — नरम चाँद ी पर पतीक
‘आहत’ कर अंिकत सक्के
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जा त िवशेष पेशे या जीिवका से जुड़ा समुद ाय पृष्ठ 76 कृ ष, धातुकम, वा णज्य या हस्तकला म दक्षता,
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पीढ़ -दर-पीढ़ हस्तांत रत
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वण पृष्ठ 76 ाह्मण, क्ष त्रय, वैश्य, शूद्र
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a कास्ट पुतगाली शब्द ‘कास्टा’ से बना अंग ेजी शब्द इसे अनदे खा न कर, 16व शताब्द के पुतगाली या त्रय ारा प्रयुक्त
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पृष्ठ 76
उत्तर-पिश्चम क्षेत्र ों से गंग ा के मैद ानों और पूवo m l a
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उत्तरापथ त्तर पृष्ठ 77–78 व्यापार, तीथयात्रा तथा सैन्य अ भयान हेतु प्रयुक्त
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भारत तक का माग
द क्षणापथ कौशांबी से िवंध् य पार कर दिक्षण भारत तक का पृष्ठ 78 कौशांबी आज के प्रयागराज के समीप है
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