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NCERT Solutions Class 7 Social Science Chapter 10 भारत का संविधान — एक परिचय

AglaSem पर कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 10 भारत का संविधान — एक परिचय (समाज का अध्ययन (भाग 1)) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 7 Social Science Chapter 10 The Constitution of India — An Introduction (Exploring Society (Part I)), Hindi Medium.
NCERT Solutions Class 7 Social Science Chapter 10 भारत का संविधान — एक परिचय - Page 1 of 29

About NCERT Solutions Class 7 Social Science Chapter 10 भारत का संविधान — एक परिचय

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NCERT Solutions Class 7 Social Science Chapter 10 भारत का संविधान — एक परिचय – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा7

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 10: भारत का सं वधान — एक
प रचय

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

209 – 228 12 32 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 28 pages

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 7 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: भारत का सं वधान — एक
प रचय
कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय के स ूण एनसीईआरट समाधान — पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन :
भारत और उसके आगे (कक्षा 7, भाग 1) के वषय-क्षेत्र शासन प्रणाली और लोकतंत्र से। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण प्रश्न,
पाँच आइए पता लगाएँ बॉक्स, पुनरावलोकन कर, प्रश्न पूछने वाला इसे अनदे खा न कर बॉक्स, पृष्ठ 210, 213 और 216 के पाठ्य प्रश्न तथा शब्द-
पहेली स हत सभी सात प्रश्न और क्रयाकलाप — उद्दे शका के पृष्ठ ( चत्र 10.16), मौ लक अ धकार, मौ लक कतव्य एवं नी त- नदशक तत्व के
सूचना- चत्र ( चत्र 10.14), सं वधान क वषय-वस्तु के चाट और शब्द-पहेली के खाक को मु द्रत पृष्ठ पर ध्यानपूवक दे खकर।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 209 – 228

खं ड प्रश्न

12 32

माध्यम

हन्द

महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 209
अध्याय का आरंभ — वषय-क्षेत्र घ, शासन प्रणाली और लोकतंत्र

महत्वपू ण प्रश्न

प्र.1 सं वधान क्या है और इसक आवश्यकता क्य होती है?

सं वधान वह प्रलेख है, जो कसी दे श के मूल सद्धांत और कानून को स्पष्ट रूप से नधा रत करता है। अध्याय इसे दे श के
लए नयम-पु स्तका कहता है।
अध्याय के अनुसार सं वधान नम्न ल खत बात नधा रत करता है —

सरकार के तीन अंग — वधा यका, कायपा लका और न्यायपा लका — क संरचना, भू मकाएँ और उत्तरदा यत्व;
इन तीन अंग के मध्य संतुलन और नयंत्रण क व्यव ा, जससे नष्पक्षता, उत्तरदा यत्व और जवाबदे ही सु न त हो;
नाग रक के अ धकार और कतव्य का उल्लेख;
राष्ट्र के द घका लक लक्ष्य और आकांक्षाओं क रूपरेखा।

भारतीय सं वधान स हत वश्व के अनेक सं वधान उन आदश और मूल्य को भी दशाते ह जनके प्र त दे श प्र तबद्ध है — सभी के
लए समानता और न्याय, बंधुत्व, व वधता म एकता और स्वतंत्रता। वास्तव म यही मूल्य सं वधान के कानून क न व बनते ह।
आवश्यकता क्य — अध्याय के कब ी मैच को याद क जए। ववाद केवल इस लए शां त से सुलझा क्य क रेफरी के पास एक
नयम-पु स्तका थी, जसे दोन कप्तान पहले से स्वीकार कर चुके थे। दे श तो कब ी के मैदान से कह बड़ा और कह अ धक व वध
है —

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

सं वधान के बना सं वधान के साथ

जो सबसे शिक्तशाली हो, वही िनणय करे शिक्त उन िलिखत िनयमों से सीिमत, िजन्हे ं सबने स्वीकारा है

कानून बनाने या बदलने की कोई तय पिक्रया नही ं कानून बनाने, लागू करने और परखने की स्पष्ट पिक्रया

अिधकार शासकों की इच्छा पर िनभर अिधकारों की गारंटी, िजनके िलए न्यायालय जाया जा सकता है

हर िववाद झगड़े में बदल जाए िववादों का िनपटारा स्वतंत्र न्यायपािलका ारा

ऐसा क्य : सं वधान केवल नयम क सूची नह है। चूँ क वह पहले से लखा हुआ है और सबने उसे स्वीकारा है,
इस लए कोई भी खेल के बीच म अपने लाभ के लए नयम नह बदल सकता। यही बात सरकार को जनता के प्र त
जवाबदे ह बनाती है।

प्र.2 भारतीय सं वधान का नमाण कस प्रकार हुआ?

इसक रचना सं वधान सभा ने लगभग तीन वष क अव ध म क ।

1946 — स्वशासन के महत्वपूण पश्नों के उत्तर ढू ँढ़ने के िलए संिवधान सभा का गठन

9 िद संबर 1946 — सभा गिठत; सदस्य पांत ीय िवधाियकाओ ं ारा चुने गए, जो स्वयं जनता ारा िनव िचत थी ं

पारंभ में 389 सद स्य → िवभाजन के बाद 299; इनमें 15 मिहलाए ँ

डॉ . राजेंद पसाद — संिवधान सभा के अध्यक्ष

डॉ . भीमराव रामजी आं बेडकर — पारूप सिमित के अध्यक्ष, िजसने पारंिभक मसौदा तै यार िकया
26 नवंबर 1949 — काय पूण, संिवधान अंगीकृ त

26 जनवरी 1950 — संिवधान लागू हुआ ; इसीिलए यह िदन गणतं त्र िद वस है

सदस्य जानबूझकर भारत के व भन्न क्षेत्र , व्यवसाय और सामा जक वग से लए गए थे, ता क प्रलेख पूरे दे श क आवाज बने।
प्र क्रया के आरंभ म डॉ. स च्चदानंद सन्हा ने कामना क थी क सभा क कायवाही “केवल ववेक, जन-कल्याण और सच्ची
दे शभ क्त से ही नह , ब ल्क ान, स हष्णुता, न्याय और सभी के प्र त नष्पक्षता से भी युक्त हो।”

क्या आप जानते ह? अं तम पाठ हस्त ल प म सुलेखक प्रेम बहारी नारायण रायजादा ने लखा और नंदलाल
बोस तथा उनके सहयो गय ने पृष्ठ को ऐ तहा सक दृश्य से सजाया। मूल प्र त संसद म ही लयम से भरे काँच के
डब्बे म रखी है, क्य क ही लयम कागज या स्याही से कोई अ भ क्रया नह करती।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 हमारे स्वाधीनता संग्राम और सभ्यता क वरासत ने सं वधान को कैसे प्रभा वत कया?

दोन का प्रभाव सीधा पड़ा, क्य क सं वधान लखने वाले अनेक लोग स्वयं स्वतंत्रता संग्राम म स म्म लत रहे थे और इसी सभ्यतागत
वरासत म पले-बढ़े थे।

ोत सं वधान को क्या दया

स्वतंत्र ता आंद ोलन उसके आदश — सभी के लए समानता और न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व, भारत क सांस्कृ तक वरासत का संरक्षण
— तथा सं वधान को इन आदश क प्रा प्त का साधन मानना। आंदोलन के अनेक प्रमुख नेता सं वधान सभा के सदस्य
थे और अपने अनुभव साथ लाए।

संग ाम से िमली ‘कैसे’ और ‘क्या’ संबंधी प्रश्न के उत्तर — प्रत्येक वयस्क को मता धकार कैसे मले, कायपा लका, वधा यका और
व्यावहािरक िशक्षा न्यायपा लका क श क्तयाँ अलग कैसे रह, मौ लक अ धकार क गारंट कैसे हो, संशोधन क प्र क्रया क्या हो, और
कद्र-राज्य संबंध कैसा हो।

भारत की मत वै भन्य क स्वीकृ त, प्रकृ त को प वत्र मानना, ान और शक्षा क नरंतर खोज, म हलाओं के प्र त
स भ्यतागत िवरासत सम्मान, तथा वसुधैव कुटु म्बकम् (संपूण वश्व एक प रवार है) और सव भवन्तु सु खनः (सभी सुखी ह ) जैसे आदश।

पाचीन शासन जनपद, संघ, राजा और उनक सभाएँ, कौ टल्य का सप्तांग, राजधम — इन सब म शासन म जनता क भू मका और
व्यवस्थाएँ कतव्य पर बल था। वही बल आगे चलकर मौ लक कतव्य के रूप म सामने आया।

िविवधता के भीतर कक्षा 6 का ‘एक म अनेक’ वाला वचार — भारत के एक राष्ट्र होने क भावना — सं वधान म अंत न हत है।
एकता

सं वधान नमाताओं ने भारतीय परंपरा “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु वश्वतः” (सभी दशाओं से शुभ वचार मेरे पास आएँ) के अनुरूप
ांस, अमे रका, यूनाइटे ड कगडम, आयरलड और ऑस् े लया के सं वधान का भी अध्ययन कया। ांस से ‘स्वतंत्रता,
समानता और बंधुत्व’, आयरलड से राज्य के नी त- नदशक सद्धांत और अमे रका से स्वतंत्र न्यायपा लका क अवधारणा ली
गई।

प्र.4 भारतीय सं वधान क प्रमुख वशेषताएँ क्या ह? सत्तर वष से भी पहले लखा गया सं वधान आज भी प्रासं गक
क्य है?

प्रमुख वशेषताएँ, जैसा अध्याय बताता है —

तीन अंग और श क्तय का पृथक्करण — वधा यका कानून बनाती है, प्रधानमंत्री क अगुवाई म कायपा लका उन्ह लागू
करती है, और न्यायपा लका जाँचती है क कानून सं वधान के अनुरूप ह या नह ।
प्रत्येक अंग क भू मका, काय, उत्तरदा यत्व और जवाबदे ही क स्पष्ट प रभाषा।
सरकार क त्र-स्तरीय व्यवस्था — कद्र, राज्य और ानीय (पंचायती राज); कुछ काय कद्र के लए आर क्षत, कुछ राज्य को
स पे गए।
ऐसा नवाचन तंत्र, जससे दे श के प्रत्येक पात्र नाग रक को मतदान का अवसर मले।
मौ लक अ धकार — वे प्र त ाएँ जन्ह नभाना अ नवाय है और जनके लए न्यायालय क सहायता ली जा सकती है।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय
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मौ लक कतव्य — नाग रक से राष्ट्र के प्र त अपे क्षत काय।
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राज्य के नी त- नदशक तत्व — सं वधान नमाताओं का सामा जक और आ थक दृ ष्टकोण; वे लक्ष्य जनक दशा म सरकार
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g न्याय, स्वतंत्रता,
.c मागदशक मूल्य न हत ह — संप्रभु, समाजवाद , पंथ नरपेक्ष, लोकतां त्रक aगणराज्य;
को बढ़ना चा हए।
उ े शका,mजसम
l a se बंधुता।
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समानता,

आज भी प्रासं गक क्य । क्य क इसे बढ़ने के लए बनाया गया था। अध्याय इसे जीवंत प्रलेख कहता है —

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नई आवश्यकता उत्पन्न होती है → पिरवतन (संशोधन ) पस्तािवत होता है
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→ संसद में गहन च च होती है (कु छ मामलों में राज्यों की िवधान सभाओं में भी)

→ अने क बार आ म जनता से राय ली जाती है
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→ कु छ पिरवतन जन आं द ोलनों से भी पारंभ होते है ं

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→ संिवधान बद ले िबना अद्य तन हो जाता है

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a अध्याय के तीन उदाहरण इसे दखाते ह — मूल कतव्य (भाग 4-ए) 1976 म जोड़े गए; पंचायती राज व्यव ा 73व सं वधान
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संशोधन अ ध नयम, 1992 से जुड़ी; और 2004 म उच्चतम न्यायालय ने माना क घर पर तरंगा फहराना अ भव्य क्त क
स्वतंत्रता के मौ लक अ धकार का भाग है।
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ऐसा क्य : उद्दे शका के मूल्य — न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता — पुराने नह पड़ते। बदलती है वह प र त

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जसम उन्ह लागू करना होता है। सं वधान ने मूल्य को दृढ़ता से तय कया और ब्योर को संशोधनीय छोड़ दया —
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इसी लए वह 1950 क तरह आज भी उपयोगी है।

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a पुनरावलोकन कर — पृष्ठ 210
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कक्षा 6 म पढ़े ‘सं वधान’ शब्द का पुनरावलोकन

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पु न रावलोकन कर

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प्र.1 कक्षा 6 म हमने ‘सं वधान’ शब्द का अथ जाना— यह एक ऐसा प्रलेख होता है जो कसी दे श के मूल सद्धांत

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और कानून क न व रखता है। अब तीन-तीन के छोटे समूह म बैठकर उन सभी प्रश्न क सूची बनाइए जो कसी

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दे श के सं वधान को लेकर आपके मन म आते ह।

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agl यह समूह- क्रयाकलाप है, इस लए यहाँ उत्तर देना नह , अच्छे प्रश्न पूछना लक्ष्य है। तीन-तीन के समूह म बै ठए, प्रत्येक सदस्य अपने
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मन के प्रश्न लखे, फर उन्ह छाँटकर कक्षा के सामने र खए।

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कैसे कर: हर सदस्य को दो मनट चुपचाप लखने द जए; फर सारे प्रश्न एक जगह क जए, दोहराव हटाइए और शेष को शीषक म

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बाँ टए — कसने बनाया? इसम क्या है? यह काम कैसे करता है? बदलना हो तो क्या? यह सूची सँभालकर र खए; अध्याय पूरा

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होते-होते आप स्वयं अ धकांश उत्तर दे सकगे।
नमूना उत्तर: हमारे समूह क सूची —

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

वषय हमारे प्रश्न उत्तर कस
पृष्ठ पर

िकसने बनाया हमारा सं वधान कसने लखा? क्या उसम भारत के सभी भाग के लोग थे? क्या कोई म हलाएँ 214
थ ? कतना समय लगा?

इसमें क्या है इसम कतने भाग ह? क्या इसम लखा है क सरकार क्या कर सकती है और क्या नह ? क्या 211, 212,
इसम मेरे अ धकार ह? क्या मेरे कतव्य भी ह? 220–222

यह कै से काम इसका पालन कसे करना है? य द कोई कानून इसके वरुद्ध हो तो क्या होगा? यह कौन तय 211, 220
करता है करेगा?

पिरवतन क्या इसे बदला जा सकता है? कौन बदल सकता है? क्या अब तक बदला गया है? 223

इसके मूल्य यह कन आदश का पक्ष लेता है? वे कहाँ लखे ह? 224–225

मूल पित मूल प्र त कहाँ रखी है और उसक रक्षा कैसे होती है? 210

सुझाव: अच्छा प्रश्न वही है जसका उत्तर प्रमाण से दया जा सके — “सं वधान सभा म कतनी म हलाएँ थ ?” प्रश्न
“क्या सं वधान अच्छा था?” से बेहतर है। दूसरे प्रकार के प्रश्न कक्षा-चचा के लए बचाकर र खए।

पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 210
गणतंत्र दवस और काँच के डब्बे म रखी पुस्तक

प्र.1 परंतु वास्तव म सं वधान है क्या और यह क्य इतना महत्वपूण है?

सं वधान वह प्रलेख है जो कसी दे श के मूल सद्धांत और कानून क न व रखता है — शासन कैसे चलेगा, श क्त कसके
पास होगी, वह श क्त कैसे सी मत रहेगी, और नाग रक क्या माँग सकते ह तथा उन्ह क्या करना है।
अध्याय के अनुसार यह तीन कारण से महत्वपूण है —

यह सबसे बड़े पदा धका रय को भी बाँधता है। राष्ट्रप त शपथ लेते ह क वे इसे संर क्षत, सुर क्षत रखगे और इसक रक्षा
करगे। प्रधानमंत्री, मं त्रप रषद के सदस्य और न्यायाधीश संकल्प लेते ह क वे इसके प्रावधान का पालन करगे। पद पर बैठा कोई
भी व्य क्त इससे ऊपर नह ।
यह ववाद को झगड़े म बदलने से रोकता है। कब ी मैच क नयम-पु स्तका क तरह यह वह ल खत प्रमाण है, जसे सभी
पक्ष पहले ही स्वीकार कर चुके ह।
यह बताता है क दे श कन आदश पर खड़ा है। समानता, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व कसी क इच्छा पर नह छोड़े गए —
वे उद्दे शका और मौ लक अ धकार म लखे गए ह।

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क्या आप जानते ह? मूल हस्त ल खत प्र त इतनी बहुमूल्य है क उसे संसद म ही लयम से भरे काँच के डब्बे म
रखा गया है ( चत्र 10.2)। ही लयम कागज या स्याही से कोई रासाय नक अ भ क्रया नह करती, इस लए पृष्ठ खराब
नह होते।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 212
कब ी क नयम-पु स्तका — सं वधान क आवश्यकता

आइए पता लगाएँ

प्र.1 अपने समूह म चचा क जए क य द रेफरी और ट म कप्तान के पास ऐसी कोई नयम-पु स्तका नह होती, तो
क्या हो सकता था? सभी लोग उस नयम-पु स्तका का पालन कर, यह सु न त करने के लए क्या आवश्यक
होता है? अगर ट म कप्तान उस नयम-पु स्तका को मानने से ही मना कर दे ते, तो क्या होता?

य द नयम-पु स्तका न होती, तो ववाद के समाप्त होने का कोई ईमानदार रास्ता ही न बचता। दोन कप्तान अपनी-अपनी बात पर
अड़े रहते; रेफरी के नणय को ‘ नजी राय’ कहकर चुनौती द जा सकती थी; मैच रुक जाता, दोबारा कराना पड़ता या शोर मचाकर
प रणाम तय होता। तब जीत उस ट म क होती जो अ धक श क्तशाली या अ धक ऊँची आवाज वाली है — उस ट म क नह जो
वास्तव म सही थी।
सभी नयम-पु स्तका का पालन कर, इसके लए क्या आवश्यक है —

नयम मैच से पहले लखे और सावज नक ह , खेल के बीच म गढ़े न जाएँ।
वे दोन ट म के लए एक समान ह — कसी के लए अलग नयम नह ।
सभी ने उन्ह पहले से स्वीकार कया हो, ता क पालन करना पहले दए गए वचन जैसा हो।
एक नष्पक्ष व्य क्त हो — रेफरी — जसे नयम लागू करने का अ धकार प्राप्त हो।
नयम न्यायसंगत दख; लोग नयम तभी स्वेच्छा से मानते ह जब उन्ह लगे क नयम उनक भी रक्षा करते ह।

य द कप्तान नयम-पु स्तका मानने से ही मना कर दे ते, तो खेल झगड़े म बदल जाता। यह तय ही न हो पाता क कौन जीता,
प्र तयो गता आगे नह बढ़ पाती, और भ वष्य के मैच भी नरथक हो जाते क्य क कसी प रणाम पर वश्वास ही न रहता।

ऐसा क्य : नयम-पु स्तका श क्तशाली होने के कारण नह , ब ल्क इस लए काम करती है क्य क जन पर वह लागू
होती है, उन सबने उसे पहले से स्वीकारा है। जस क्षण एक पक्ष उसे मानने से मना करता है, प रणाम तय करने के
लए केवल बल शेष रह जाता है। सं वधान वहीन दे श के सामने यही खतरा होता।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 कसी ऐसे खेल के बारे म सो चए जसे आप प्राय: खेलते ह और उसम पालन कए जाने वाले नयम क सूची
बनाइए। फर प्रत्येक समूह अपनी-अपनी नयम क सूची कक्षा के शेष वद्या थय के सामने प्रस्तुत करेगा। सभी
प्रस्तु तय को ध्यान से सु नए, नयम पर चचा क जए और मलकर उस खेल के लए एक साझा नयम तय करने
का प्रयास क जए। सभी क सहम त से नयम बनाने म आपको कन चुनौ तय का सामना करना पड़ता है?

कैसे कर: ऐसा एक खेल चु नए जसे पूरी कक्षा जानती हो — गल्ली-डंडा, खो-खो, लंगड़ी या गली- क्रकेट। प्रत्येक समूह ठ क वही
नयम लखे जनसे वह खेलता है (अभी उन्ह सुधा रए मत)। प्रस्तुत क जए, तुलना क जए और चचा करके एक साझा सूची
बनाइए। अं तम सूची चाट पर लखकर कक्षा म लगा द जए।
नमूना उत्तर: हमारे समूह ने गली- क्रकेट चुना।

नयम हमारा समूह दूसरा समूह

गेंद पड़ोसी के आँग न में जाए बल्लेबाज आउट छह रन, और गेंद बल्ले बाज ही लाए

एक टप्पा-एक हाथ कै च आउट माना जाए आउट नही ं

पित टीम िखलाड़ी छह िजतने आएँ, बराबर बाँट लो

पहले बल्ले बाजी कौन करे जसका बल्ला हो, उसक ट म िस क्का उछालकर

एल.बी.डब्ल्यू. बल्कुल नह गेंद बाज की टीम तय करे

सहम त बनाने म आई चुनौ तयाँ —

हर समूह को लगा क उसक अपनी आदत ही ‘असली’ नयम है, केवल इस लए क वह सदा ऐसे ही खेलता आया है।
कुछ नयम चुपचाप उन्ह के पक्ष म थे जन्ह ने उन्ह सुझाया — जैसे बल्ले के मा लक का पहले बल्लेबाजी करना।
अ े खलाड़ी कठोर नयम चाहते थे और नए खलाड़ी लचीले।
कुछ ववाद के लए कोई नष्पक्ष नणायक ही नह था, इस लए दोन पक्ष स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करते थे।
सबसे क ठन था सबका कुछ न कुछ छोड़ने को तैयार होना — सहम त के लए समझौता आवश्यक है।

यह क्य महत्वपूण है: सं वधान सभा के सामने यही समस्या राष्ट्रीय स्तर पर थी — व भन्न क्षेत्र , व्यवसाय और
सामा जक वग के 299 सदस्य, और सबक न्याय क अपनी-अपनी समझ। डॉ. राजद्र प्रसाद ने कहा था क
लोकतां त्रक सं ाओं के लए “दूसरे के वचार का सम्मान” तथा “लचीलेपन और समन्वय” क आवश्यकता होती
है। गली- क्रकेट के एक साझा नयम-सेट के लए भी आपको यही कौशल चा हए था।

प्र.3 कसी दे श के लए ऐसी ‘ नयम-पु स्तका’ क्या हो सकती है? उसे कैसे बनाया जाता होगा?

दे श के लए नयम-पु स्तका उसका सं वधान है। इस प्रश्न के तुरंत बाद अध्याय स्वयं कहता है — “हमारा सं वधान दे श के लए
नयम-पु स्तका क तरह ही है।”

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

उसे कैसे बनाया जाता है — और हमारा वास्तव म कैसे बना —

जनता पितिनिध चुन ती है → पितिनिध िमलकर संिवधान सभा बनाते है ं

→ सभा में हर क्षेत्र, व्यवसाय औ र सामािजक वग के सदस्य होते है ं

→ एक पारूप सिमित पारंिभक मसौदा तै यार करती है

→ पत्येक उपबंध पर सभा में बहस होती है, संशोधन होते है ं और मतदान होता है

→ सभा अंितम पलेख को अंगीकृ त करती है

→ िनयत ितिथ पर वह लागू होकर पूरे दे श पर बाध्यकारी हो जाता है

ध्यान द जए क यह आदे श नह , नयम-पु स्तका क्य है — यह जनता ने अपने प्र त न धय के माध्यम से स्वयं बनाया और
अपनाया है, इसे न कसी राजा ने दया, न कसी बाहरी श क्त ने। उद्दे शका के आरं भक शब्द ‘हम, भारत के लोग’ यही कहते ह।

स्वयं जाँ चए: दोन नयम-पु स्तकाओं क तुलना क जए। कब ी क पु स्तका बताती है क खलाड़ी क्या कर
सकता है; सं वधान बताता है क सरकार क्या कर सकती है। दोन ही दुबल पक्ष को श क्तशाली पक्ष से बचाते ह।

इसे अनदे खा न कर — पृष्ठ 212
सं वधान के भाग और अनुसू चयाँ

इसे अनदे खा न कर

प्र.1 जस प्रकार आपक पाठ्यपुस्तक म अनेक खंड और अध्याय होते ह, उसी प्रकार भारत के सं वधान म 25 भाग
और 12 अनुसू चयाँ ह। प्रत्येक भाग म कई खंड ह। यह वश्व का सबसे बड़ा ल खत सं वधान है। जब यह लागू
हुआ था, तब इसम 22 भाग और 8 अनुसू चयाँ थ । इन्ह आपको कंठस्थ करने क आवश्यकता नह है। क्या आप
अनुमान लगा सकते ह क 1950 के बाद ये संख्याएँ क्य बढ़ ह गी?

क्य क सं वधान एक जीवंत प्रलेख है। दे श क आवश्यकताएँ बदलने पर संशोधन के माध्यम से नए भाग और अनुसू चयाँ जोड़ी
जाती रह ।

1950 — 22 भाग, 8 अन ुस ूिच याँ

आज — 25 भाग, 12 अन ुस ूिच याँ

अंत र — सत्तर से अिधक वष ं में 3 भाग औ र 4 अन ुस ूिच याँ ज ुड़ी ं

अध्याय स्वयं इसके दो कारण दे ता है —

नाग रक के लए नए दा यत्व जोड़े गए। ‘भाग 4-ए : मूल कतव्य’ वष 1976 म जोड़ा गया — एक पूरा नया भाग।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय
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नई संस्थाएँ बन । पंचायती राज व्यव ा सं वधान का मूल भाग नह थी; इसे 73व सं वधान संशोधन अ ध नयम, 1992
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ारा जोड़ा गया, जससे ानीय स्वशासन प्रलेख म स म्म लत हुआ।
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सामान्यतः संख्याएँ तब बढ़ती ह जब —
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कोई वषय इतना महत्वपूण हो जाए क उसके लए अलग भाग चा हए ( ानीय शासन, नाग रक के कतव्य);
a सू चयाँ बढ़ानी पड़ — अनुसू चयाँ अ धकतर सू चयाँ ही ह (राज्य और संघ राज्यक्षेत्र क , भाषाओं क , कद्र और राज्य के
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वषय क ), और नए राज्य बनने तथा नई भाषाएँ जुड़ने पर ये बदलती ह;

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समाज स्वयं बदले — और सं वधान नमाताओं ने इसके लए जानबूझकर ान छोड़ा था।

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agका पूवानुमान नह कर सकते। इस लए उन्ह ने प्रलेख को जड़ बनाने के
ऐसा क्य : नमाता जानते थे क वे हर बात
बजाय प रवतन क सावधानीपूण प्र क्रया रखी — संसद म चचा, कभी-कभी राज्य क वधान सभाओं म भी, और

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प्रायः जनता क राय। भाग और अनुसू चय का बढ़ना इस बात का प्रमाण है क सं वधान काम कर रहा है, न क

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यह क वह खराब लखा गया था।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 213
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स्वतंत्रता से पहले भारत के सामने खड़े प्रश्न

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प्र.1 ag
हम कस प्रकार क सरकार चा हए?

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भारत ने संसद य शासन प्रणाली वाला लोकतां त्रक गणराज्य चुना।

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la रखते ह; सरकार कुछ मूलभूत नयम के अनुसार चलाई जाती है।
लोकतां त्रक — लोग के पास समान राजनी तक अ धकार होते ह, वे अपने प्र त न धय का चुनाव करते ह और उन्ह जवाबदे ह

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गणराज्य — राष्ट्र का अध्यक्ष नवा चत होता है, न क वंशानुगत।

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संसद य — प्रधानमंत्री क अगुवाई वाली कायपा लका वधा यका से ही बनती है और उसी के प्र त उत्तरदायी होती है।
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तीन अंग और श क्तय का पृथक्करण — वधा यका, कायपा लका और न्यायपा लका, तथा इनके बीच संतुलन और

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नयंत्रण।
त्र-स्तरीय व्यवस्था — कद्र, राज्य और ानीय (पंचायती राज), प्रत्येक के अपने काय और दा यत्व।

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यही चुनाव क्य : भारत ने अभी-अभी ऐसे शासन से मु क्त पाई थी जसे उसने चुना नह था। वंशानुगत या गैर-

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जवाबदे ह सरकार वही दोहराती जसके वरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया था। जस गणराज्य म सव च्च पद भी
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as em चुनाव से भरा जाता हो, वह औप नवे शक शासन का सीधा वलोम है। a
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प्र.2 कौन-से नयम और सद्धांत हमारा मागदशन करगे?

वही सद्धांत चुने गए जन पर स्वतंत्रता आंदोलन चला था और जन्ह भारत क अपनी वरासत लंबे समय से सँजोए हुए थी। अध्याय
इन्ह इस प्रकार गनाता है — सभी के लए समानता और न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा भारत क सांस्कृ तक वरासत का
संरक्षण।
फर इन्ह सं वधान म तीन स्तर पर लखा गया —

स्तर वह क्या करता है उदाहरण

उ े िशका मागदशक मूल्य को एक अनुच्छेद म रख दे ती है न्याय, स्वतंत्र ता, समानता, बंध त
ुा

मौिलक मूल्य को ऐसी प्र त ाओं म बदलते ह जनके लए न्यायालय अनुच्छे द 14 — कानून के समक्ष समानता
अिधकार जाया जा सके

नीित-िनद शक मूल्य को उन लक्ष्य म बदलते ह जनक दशा म सरकार को अनुच्छे द 47 — पोषण, जीवन स्तर और सावजिनक
तत्व बढ़ना चा हए स्वास्थ् य

कुछ सद्धांत भारत क अपनी संस्कृ त से आए — मत वै भन्य क स्वीकृ त, प्रकृ त को प वत्र मानना, ान क खोज, म हलाओं के
प्र त सम्मान, वसुधैव कुटु म्बकम् और सव भवन्तु सु खनः। शासन म जनता के कतव्य पर पुराना बल मौ लक कतव्य के रूप म
लौटता है।

प्र.3 मतदान का अ धकार कसे मलना चा हए?

प्रत्येक वयस्क नाग रक को — इसे सावभौ मक वयस्क मता धकार कहते ह।
अध्याय बताता है क सं वधान नमाताओं के सामने एक ‘कैसे’ वाला प्रश्न यही था — “हम यह कैसे सु न त कर क प्रत्येक वयस्क
नाग रक को मतदान का अ धकार मले?” उनका उत्तर था ऐसा नवाचन तंत्र, “ जससे दे श के प्रत्येक पात्र नाग रक को मतदान
का अवसर सु न त हो सके।”
अथात् मता धकार इन बात पर नभर नह है —

जा त, धम, समुदाय या लग;
कसी के पास कतनी संप त्त या धन है;
कोई पढ़ना- लखना जानता है या नह ;
वह भारत के कस भाग म रहता है।

यह क्य महत्वपूण है: अनेक पुराने लोकतंत्र म मता धकार पहले भू-स्वा मय को, फर श क्षत पुरुष को और
बहुत बाद म म हलाओं को मला। भारत ने यह अ धकार पहले ही चुनाव से हर वयस्क को दया। य द सभी
नाग रक कानून के समक्ष समान ह, तो उनके मत का मूल्य अलग-अलग रखना नरथक होगा।

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प्र.4 ववाद का समाधान कैसे कया जाएगा?

स्वतंत्र न्यायपा लका के माध्यम से, जसक कसौट सं वधान और कानून हो — न क बल, और न सरकार क अपनी पसंद।

िववाद उत्पन्न होता है (नागिरकों के बीच, या नागिरक और राज्य के बीच)

→ मामला न्यायालय में जाता है

→ न्यायाधीश तय करते है ं िक िकसी कानून का उल्लंघन हुआ या नही ं और क्या दंड िदया जाए

→ यिद िववाद स्वयं िकसी कानून पर है, तो न्यायपािलका दे खती है िक वह कानून संिवधान के अन रू
ु प है या

नही ं

→ दे श का उच् च तम न्यायालय संिवधान की रक्षा करता है

दो बात इसे संभव बनाती ह। पहली, न्यायपा लका सरकार के तीन अलग अंग म से एक है, इस लए वह कायपा लका या
वधा यका के वरुद्ध भी नणय दे सकती है। दूसरी, स्वतंत्र न्यायपा लका क अवधारणा सं वधान नमाताओं ने अमे रका के
सं वधान से ली थी।

स्वयं जाँ चए: 2004 का ध्वज-प्रकरण इसका वास्त वक उदाहरण है — एक नाग रक ने जस नयम को गलत
माना, उसे न्यायालय म चुनौती द और उच्चतम न्यायालय ने उससे सहम त जताई। यही है बल के बजाय कानून से
सुलझा ववाद।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 215
आपके क्षेत्र से सं वधान सभा के सदस्य

आइए पता लगाएँ

प्र.1 छोटे -छोटे समूह म मलकर यह पता लगाने का प्रयास क जए क आपके क्षेत्र से कौन-कौन से व्य क्त भारतीय
सं वधान नमाण म स म्म लत हुए थे।

कैसे कर: सं वधान सभा के 299 सदस्य प्रांतीय वधा यकाओं ारा चुने गए थे, इस लए हर प्रांत और रयासत-क्षेत्र से सदस्य आए।
अपने वतमान राज्य से आरंभ क जए और यह ध्यान र खए क 1946 म उस क्षेत्र का नाम और सीमा भन्न रही होगी — बंबई
प्रेसीडसी, मद्रास प्रेसीडसी, मध्य प्रांत, बहार, संयुक्त प्रांत, असम, पंजाब आ द।
अ े उत्तर म क्या होना चा हए —

आपके क्षेत्र से जुड़े दो-तीन सदस्य के नाम;
प्रत्येक ने कस प्रांत या नवाचन क्षेत्र का प्र त न धत्व कया;
प्रत्येक के योगदान पर एक वाक्य — कोई स म त, कोई बहस, या स्वतंत्रता आंदोलन म उनका काय;

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हर तथ्य के लए ोत।

नमूना उत्तर: “हमारा व ालय बहार म है। बहार प्रांत से डॉ. राजद्र प्रसाद सदस्य थे — वे सं वधान सभा के अध्यक्ष चुने गए
और बाद म भारत के प्रथम राष्ट्रप त बने। बहार म स्वतंत्रता आंदोलन के नेता ी कृष्ण सह और अनुग्रह नारायण सह भी सभा
के सदस्य थे। यह जानकारी हम व ालय के पुस्तकालय क एक पुस्तक से मली और हमने इसे संसद क वेबसाइट के सं वधान
सभा वाले पृष्ठ पर जाँचा।”

सुझाव: अपनी खोज एक छोट ता लका म प्रस्तुत क जए — नाम · प्र त न धत्व · एक योगदान · ोत। इससे कक्षा
म तुलना सरल हो जाती है और यह आदत बनती है क हर तथ्य के साथ उसका ोत भी लखा जाए।

प्र.2 इसके लए आप कौन-से ोत का उपयोग कर सकते ह? (संकेत— अपने वद्यालय या स्थानीय पुस्तकालय म
उपलब्ध पुस्तक ढूँ ढ़। आप अपने शक्षक, माता- पता और पड़ोस के वृद्ध से भी पूछ सकते ह। साथ ही,
(https://sansad.in/ls/about/constituent-assembly) पर जाकर जानकारी प्राप्त कर।)

कई प्रकार के ोत काम म ली जए और उन्ह एक-दूसरे से मलाकर जाँ चए।

ोत का उदाहरण कसम उपयोगी
प्रकार

पुस्तकें व ालय और ानीय पुस्तकालय क , स्वतंत्रता आंदोलन तथा सं वधान िवश्वसनीय ितिथयाँ, पूरे नाम, पष्ृ ठभूिम
नमाण पर लखी पुस्तक; जला गजे टयर

सरकारी संसद (Sansad) क वेबसाइट के सं वधान सभा वाले पृष्ठ, जन पर सदस्य सद स्यों की सव िधक पामािणक सूची
अिभले ख क सूची और पूरी बहस उपलब्ध ह

लोग आपके शक्षक, माता- पता, दादा-दाद , पड़ोस के वृद्धजन, ानीय स्थानीय स्म ृित और ऐसे सूत्र जो
इ तहासकार या पुस्तकालयाध्यक्ष पुस्तकों में नही ं िमलते

स्थान प्र तमाएँ, स्मृ त-प काएँ, सड़क के नाम, संग्रहालय, ानीय अ भलेखागार यह पुिष्ट करना िक व्यिक्त वास्तव में
आपके क्षेत्र का था

समाचार -पत्र ों का जला पुस्तकालय म रखे पुराने अंक उस समय लोगों ने उस सद स्य के
संग ह बारे में क्या कहा

मलान क्य : मौ खक स्मृ त अत्यंत मूल्यवान है, पर त थय और वतनी म चूक सकती है; वह ल खत सूची कसी
व्य क्त का ानीय संबंध छोड़ सकती है। दोन का उपयोग करना और हर तथ्य के साथ ोत लखना — ठ क यही
इ तहासकार क पद्ध त है, जो आपने इस पुस्तक म प्राथ मक और तीयक ोत के साथ सीखी है।

ध्यान द: संकेत म दया गया पता है — https://sansad.in/ls/about/constituent-assembly

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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 216
स्वतंत्रता संग्राम से मले ‘कैसे’ और ‘क्या’ संबंधी प्रश्न

प्र.1 हम यह कैसे सु न त कर क प्रत्येक वयस्क नाग रक को मतदान का अ धकार मले?

सावभौ मक वयस्क मता धकार को सं वधान म ही लखकर, और उसके चार ओर एक नवाचन तंत्र खड़ा करके।

सं वधान ऐसा नवाचन तंत्र नधा रत करता है “ जससे दे श के प्रत्येक पात्र नाग रक को मतदान का अवसर सु न त हो सके।”
यह अ धकार कसी सत्ताधारी क कृपा पर नभर नह है।
एकमात्र शत है वयस्कता और नाग रकता — जा त, लग, धम, धन, संप त्त या शक्षा नह ।
चुनाव एक स्वतंत्र संस्था कराती है, ता क सत्ता म बैठा दल चुनाव को अपने पक्ष म न चला सके।
चूँ क राष्ट्र का अध्यक्ष नवा चत होता है और सरकार नवा चत प्र त न धय से बनती ह, इस लए मत ही वह साधन है जससे लोग
“अपने प्र त न धय का चुनाव करते ह और उन्ह जवाबदे ह रखते ह।”

ऐसा क्य : जो अ धकार केवल वचन हो, वह वापस लया जा सकता है; जो अ धकार सं वधान म लखा हो, उसक
रक्षा न्यायालय म क जा सकती है। सं वधान नमाताओं का लक्ष्य यही अंतर था।

प्र.2 हम यह कैसे सु न त कर क कायपा लका, वधा यका और न्यायपा लका क श क्तयाँ अलग-अलग रखी जाएँ?

श क्तय के पृथक्करण के सद्धांत से, जसके पीछे संतुलन और नयंत्रण क व्यव ा है — दोन सं वधान म लखे ह।

अंग अपना काय दूसर पर नयंत्रण

िवधाियका कानून बनाती है कायपािलका से पश्न पूछती है, बहस करती है; उसके पस्ताव
स्वीकार या अस्वीकार करती है

कायपािलका कानून को लागू करती है; प्रधानमंत्री इसके प्रमुख ह िवधाियका के पित उ त्तरदायी और न्यायालयों के िनणयों से बाध्य

न्यायपािलका तय करती है क कानून का उल्लंघन हुआ या नह यह सुिनिश्चत करती है िक बनाए गए सभी कानून संिवधान के
और क्या दं ड दया जाए अनुरूप हों

सं वधान “सरकार के प्रत्येक अंग क भू मका, काय, उत्तरदा यत्व और जवाबदे ही क व्यव ा को स्पष्ट रूप से प रभा षत करता
है”, जससे कोई अंग चुपचाप दूसरे का काय अपने हाथ म न ले सके।

क्या आप जानते ह? स्वतंत्र न्यायपा लका क अवधारणा — ऐसी अदालत जो तत्कालीन सरकार के बनाए कानून
को भी रद्द कर सके — सं वधान नमाताओं ने अमे रका के सं वधान का अध्ययन करने के बाद भारत के लए
अपनाई थी।

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हम प्रत्येक व्य क्त के मौ लक अ धकार के सम्मान क गारंट कैसे कर?
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प्र.3

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a gl अ धकार को न्यायालय म माँगे जाने योग्य बनाकर। अध्याय यह अंतर स्पष्ट करता है — नी त- नदशक तत्व लक्ष्य ह,
मौ लक
जब क “मूल अ धकार वे प्र त ाएँ ह, जन्ह नभाना अ नवाय है। य द आपके साथ केवल आपक पहचान के कारण कोई

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अनु चत व्यवहार करता है, तो आप न्यायालय क सहायता ले सकते ह।”

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इस गारंट के तीन भाग ह —
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ag अ धकार (अनुच्छेद 14, कानून के समक्ष समानता), स्वतंत्रता का अ धकार
अ धकार सं वधान म लखे ह — समानता का
(अनुच्छेद 21, जीवन और व्य क्तगत स्वतंत्रता क रक्षा), शोषण के वरुद्ध अ धकार, शक्षा का अ धकार (अनुच्छेद 21-ए);

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अ धकार छनने पर स्वतंत्र न्यायपा लका का ार खुला है, जसके शीष पर उच्चतम न्यायालय है;
न्यायपा लका कसी भी कानून को सं वधान क कसौट पर परख सकती है, इस लए मौ लक अ धकारmका हनन करने वाला
कानून टकoनहm l a se
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सकता।
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a ऐसा क्य : अ धकार उतना ही सशक्त होता है जतना उसके पीछे का उपाय। हर व्य क्त को न्यायालय जाने क
क्षमता दे कर सं वधान एक सुंदर वाक्य को उस साधन म बदल दे ता है, जसे व ाथ , कसान या श्र मक भी वास्तव
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म काम म ला सके।

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प्र.4 य द हम सं वधान म संशोधन करना हो, तो क्या प्र क्रया होनी चा हए?

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जानबूझकर बनाई गई एक सावधानीपूण और सावज नक प्र क्रया — इतनी सरल क सं वधान बढ़ सके, और इतनी क ठन क

agl यूँ ही न बदला जा सके।
उसे

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पिरवतन (संशोधन ) पस्तािवत होता है
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→ स्वीकार होने से पहले संसद में गहन च च औ र िवच ार-िवमश

→ कु छ मामलों में राज्यों की िवधान सभाओ ं में भी चच

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→ अने क बार आ म जनता से भी राय ली जाती है

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→ कु छ संशोधन जन आं द ोलनों से पारंभ होते है ं
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अध्याय म दो संशोधन इस प्र क्रया को दखाते ह — भाग 4-ए मूल कतव्य (1976) और 73वाँ सं वधान संशोधन अ ध नयम,
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1992, जससे पंचायती राज व्यव ा सं वधान म आई।

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सुझाव: सरकार प्रस्ता वत कानून या नयम म प रवतन पर नाग रक से सुझाव भी माँगती है — पृष्ठ 224 पर
इसका वास्त वक उदाहरण है, जसम सुझाव भेजने क आरंभ और अं तम त थ दोन द गई ह।

प्र.5 कद्र और राज्य सरकार के बीच क्या संबंध होना चा हए? आ द।

ऐसा संबंध जसम दा यत्व बँटे हुए ह पर तालमेल बना रहे, और यह बँटवारा ल खत हो, ता क कसी स्तर को अनुमान न लगाना
पड़े।

भारत म सरकार क त्र-स्तरीय व्यवस्था है — कद्र, राज्य और ानीय (पंचायती राज व्यव ा)।
कुछ काय और दा यत्व कद्र सरकार के लए आर क्षत ह, जब क अन्य काय राज्य सरकार को स पे गए ह।
सं वधान “इन बदुओं को व्यापक रूप से नधा रत करता है” और प्रत्येक के लए भू मका, काय, उत्तरदा यत्व तथा जवाबदे ही
प रभा षत करता है।
दोन स्तर एक ही सं वधान से बँधे ह, और उनके बीच ववाद न्यायपा लका तय कर सकती है।

ऐसा क्य : भारत बहुत बड़ा और बहुत व वध है। रक्षा और वदे श नी त जैसे वषय राष्ट्रीय स्तर पर ही साथक ह;
व ालय, ानीय सड़क, जल-आपू त और स्वच्छता लोग के नकट रहकर ही ठ क से चल सकती ह। बँटवारा
ल खत होने से दोन एक-दूसरे के काम म टकराते नह — और तीसरा स्तर जोड़कर गाँव या नगर को अपने ानीय
वषय स्वयं तय करने का अवसर मलता है।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 221
बेगम ऐजाज रसूल का वक्तव्य, 22 नवंबर 1949

आइए पता लगाएँ

प्र.1 नीचे दए गए उद्धरण को प ढ़ए। आपके वचार से यह सं वधान के कस अनु े द का संदभ दे रहा है।

वे समानता के अ धकार — अनु े द 14, ‘कानून के समक्ष समानता’ क बात कर रही थ । अध्याय का सूचना- चत्र ( चत्र
10.14) मौ लक अ धकार म सबसे पहले इसी को गनाता है।
उनके शब्द को दे खए — “भारत क म हलाएँ जीवन के सभी क्षेत्र म पुरुष के साथ पूण समानता के अपने वैध अ धकार को
लेकर प्रसन्न ह” तथा “भारतीय गणराज्य म म हलाओं के अ धकार का व ध के अनुसार पूण सम्मान कया जाएगा।” दो शब्द
नणायक ह — समानता और व ध के अनुसार। यही अनुच्छेद 14 है।

सुझाव: यही वचार उद्दे शका म भी है, जहाँ सं वधान सभी नाग रक को “प्र तष्ठा और अवसर क समता” दे ता है।
चत्र 10.16 के उद्दे शका-पट म ‘समानता’ क व्याख्या इस प्रकार है — कानून के समक्ष सभी समान ह, सामा जक
असमानताओं को समाप्त कया जाना चा हए, और सभी को समान अवसर दे ना सरकार का कतव्य है।

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एक नष्पक्ष बात: यहाँ एक से अ धक उत्तर दए जा सकते ह। जो व ाथ व्यापक समानता के अ धकार
(अनुच्छेद 14–18) का नाम लेता है — जसम धम, मूलवंश, जा त, लग या जन्म ान के आधार पर भेदभाव का
नषेध भी स म्म लत है — वह उनके वाक्य “जीवन के सभी क्षेत्र म” को उतनी ही उ चत री त से पढ़ रहा है।
महत्वपूण यह है क आप समानता क गारंट क ओर संकेत कर और अपने चुनाव के समथन म उद्धरण क पं क्त
द।

प्र.2 आपके अनुसार उन्ह ने ऐसा क्य कहा क म हलाओं क समानता भारत के लए कोई नई अवधारणा नह है?
कक्षा म इस पर चचा क जए।

क्य क वे भारत के पुराने आदश और उस आदश से दूर हो चुके सामा जक व्यवहार के बीच अंतर कर रही थ । उनके शब्द
ध्यान से प ढ़ए — “यह कोई नया सद्धांत नह है जसे वशेष रूप से इस सं वधान के लए प्रस्ता वत कया गया है, ब ल्क यह एक
आदश है जसे भारत ने लंबे समय से सँजोकर रखा है। यद्य प कुछ समय तक सामा जक प र स्थ तय ने दुभाग्यवश इसे
व्यावहा रक रूप से वफल कर दया था।”
उनके तक के दो भाग ह —

आदश पुराना है। अध्याय “हमारी संस्कृ त म गूढ़ रूप से समा हत” मौ लक सद्धांत म म हलाओं के प्र त सम्मान को गनाता
है — मत वै भन्य क स्वीकृ त, प्रकृ त को प वत्र मानना और ान क खोज के साथ। पछले अध्याय म आप शा सकाओं,
कव य त्रय , दाश नक , दानदाताओं और व्यापा रय से मल चुके ह।
व्यवहार पछड़ गया था। वे स्वयं कहती ह क सामा जक प र तय ने इसे “व्यावहा रक रूप से वफल” कर दया था। वे
यह दावा नह कर रह क भारतीय समाज ने सदा म हलाओं के साथ समान व्यवहार कया; उनका कहना है क सं वधान म
लखी जा रही समानता वापसी है, आयात नह ।

उन्ह ने इसे इसी रूप म क्य कहा। जस अ धकार को लोग बाहरी मानते ह, उसका वरोध होता है; जसे वे अपना मानते ह, उसे
स्वीकार कर लेते ह। समानता को पुनः ा पत होता भारतीय आदश बताकर उन्ह ने उसका वरोध क ठन बना दया — और
सं वधान का वचन कसी आदे श के बजाय घर लौटने जैसा लगने लगा।

कक्षा-चचा के लए: सं वधान सभा के 299 सदस्य म 15 म हलाएँ थ । सो चए क इन उपबंध को लखते समय
म हलाओं का वहाँ उप त होना क्या अंतर लाया — और आज आपके आस-पास ‘आदश और व्यवहार के अंतर’
का क्या रूप दखाई दे ता है।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 223

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सं वधान एक जीवंत प्रलेख है

आइए पता लगाएँ

प्र.1 क्या आप पता कर सकते ह क पछले दस वष म सं वधान म कौन-कौन से संशोधन कए गए ह?

कैसे पता कर: संशोधन क्रम से गने जाते ह और हर एक ‘सं वधान (…संशोधन) अ ध नयम’ के नाम से उसके वष के साथ जाना
जाता है। पुस्तकालय क कसी नई नाग रक-शास्त्र संदभ पुस्तक म, या व ध मंत्रालय के वधायी वभाग तथा संसद क वेबसाइट
पर सूची दे खए; फर प्रत्येक के लए क्रमांक, वष और एक पं क्त म क्या बदला — यह ल खए।
अ े उत्तर म क्या होना चा हए: पछले दस वष के कम से कम तीन-चार संशोधन, प्रत्येक के साथ क्रमांक, वष, प्रभा वत भाग या
अनुच्छेद, प रवतन क एक पं क्त और ोत। ऐसी कोई सूची मत उता रए जसे आप जाँच न सक — संशोधन अ भलेख का वषय
है, इस लए हर प्र व ष्ट प्रमा णत होनी चा हए।
नमूना उत्तर (यही प्रारूप र खए और जाँची हुई प्र व ष्टयाँ भ रए) —

संशोधन वष क्या बदला प्रयुक्त ोत

…वाँ संशोधन अिधिनयम … अनुच्छेद … जोड़ा/बदला, जससे … वधायी वभाग क वेबसाइट

…वाँ संशोधन अिधिनयम … … क अव ध बढ़ाई गई व ालय पुस्तकालय क संदभ पुस्तक

…वाँ संशोधन अिधिनयम … भाग … म नया खंड जोड़ा गया संसद क वेबसाइट

अध्याय आपको दो पुराने उदाहरण दे ता है, जन्ह आदश मानकर च लए। दोन इसी बॉक्स म ह —

घर पर राष्ट्रीय ध्वज। एक समय था जब नाग रक को अपने घर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने क अनुम त नह थी। 2004 म एक
नाग रक ने इसे न्यायालय म चुनौती द और उच्चतम न्यायालय ने माना क तरंगा फहराना अ भव्य क्त क स्वतंत्रता का भाग
है। अब हम गव के साथ तरंगा फहरा सकते ह, बशत उसका अपमान न हो।
पंचायती राज। कक्षा 6 म पढ़ यह व्यव ा सं वधान का मूल भाग नह थी; इसे 73व सं वधान संशोधन अ ध नयम,
1992 ारा जोड़ा गया।

ऐसा क्य : इन दोन उदाहरण म प रवतन के माग अलग-अलग ह — एक संसद से आया, दूसरा नाग रक क
न्यायालय-या चका से। दोन ही तरीके सं वधान को दे श के साथ चलने योग्य बनाए रखते ह। व्यवहार म ‘जीवंत
प्रलेख’ का यही अथ है।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 226

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दै नक जीवन म उ े शका क वशेषताएँ

आइए पता लगाएँ

प्र.1 प्रस्तावना म उ ल्ल खत वशेषताओं क सूची नीचे द गई है। इन्ह दए गए चत्र म ध्यान से प ढ़ए और अपने
आस-पास के दै नक जीवन म इन मूल्य के पालन के उदाहरण ल खए। दो उदाहरण दए गए ह, जससे आपको
अभ्यास पूण करने म सहायता मलेगी।

पहले उद्दे शका का पट ( चत्र 10.16) ध्यान से प ढ़ए, फर अपने आस-पास वह मूल्य घ टत होते हुए ढूँ ढ़ए। भरी हुई दो पं क्तयाँ
बता दे ती ह क उत्तर कस स्तर का चा हए — एक रोजमरा क त, एक वाक्य म।
चत्र 10.16 म उद्दे शका उसी हस्त ल खत पृष्ठ के रूप म छपी है, जो मूल सं वधान का भाग है। जैसा वहाँ मु द्रत है, ठ क वैसा पाठ
—

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a

SOVEREIGN DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity;

and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do

HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

पुस्तक का नोट: “‘समाजवाद ’, ‘पंथ नरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द को 42व सं वधान संशोधन, 1976 ारा
सं वधान क उद्दे शका म जोड़ा गया है।” चत्र 10.16 1949 के मूल पृष्ठ का छाया चत्र है, इस लए वे तीन शब्द उस
हस्त ल प म नह दखते। आज क उद्दे शका म आरंभ है — “संप्रभु समाजवाद पंथ नरपेक्ष लोकतां त्रक गणराज्य”,
और अं तम उपबंध म “राष्ट्र क एकता और अखंडता”। इसी लए नीचे के अभ्यास म पंथ नरपेक्ष भी एक वशेषता
के रूप म दया गया है।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय
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प्रस्तावना क हम इन्ह अपने दै नक जीवन म कैसे दे खते ह

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वशेषताएँ

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.c भारत के भीतर के सभी िनणय हमारी अपनी िनव िचत सरकार करती है — कोई बाहरीaशिgक्त हमारे कानून, हमारा
संपभु
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पाठ क्रम या हमारे कर तय नही ं कर सकती। िकसी दू स रे दे श से समझौता भी भारत बराबरी के आधार पर , अपने िनणय
से करता है।

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पंथिनरपेक्ष पुस्तक म दया गया: कसी व्य क्त को य द अपने धम के री त- रवाज का पालन करना है और वह दूसरे के जीवन म

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बाधा नह डालता, तो उसे इसके लए राज्य से अनुम त लेने क आवश्यकता नह है।

गणतंत्र
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हमारे रा के अध्यक्ष, रा पितa,gिनव िचत होते है ं और िनयत अविध तक पद पर रहते है ं — यह पद िकसी के पुत्र या पुत्री को
िवरासत में नही ं िमलता। इसी पकार सरपंच, िवधायक और सांस द भी इसिलए पद पर है ं क्योंिक लोगों ने उ न्हे ं चुना।

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न्याय पुस्तक म दया गया: राज्य नौक रय और अवसर म सभी नाग रक को जा त, धम, लग आ द के आधार पर भेदभाव

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कए बना समान अवसर प्रदान करता है।

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हम जो सोचते है ं वह कह सकते है,ं अपनी पसंद का धम मान सकते है,ं अपनी रुिच की पुस्तकें पढ़ सकते है ं और संगठन बना
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स्वतंत्र ता

a g सकते है ं — बशत िकसी और को हािन न पहचु ँ े। नागिरक सरकार को न्यायालय में भी ले जा सकता है, जैस ा 2004 के
ध् वज-पकरण में हआु ।

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क क्षा का हर बच्चा एक ही कमरे में बैठता है, एक ही पुस्तकालय का उपयोग करता है और एक ही मध्याह्न भोजन खाता है
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समानता

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— चाहे उसके पिरवार की जाित, धम या आय कु छ भी हो। राशन की दुक ान या रे ल वे िटकट िखड़ की की पंिक्त में भी यही

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िनयम है — धनी या पभावशाली होने के कारण िकसी को पहले नही ं िनपटाया जाता।

अलग-अलग समुद ायों के पड़ ोसी एक -दू स रे के त्योहारों में सिम्मिलत होते है,ं और बाढ़ , बीमारी या मृत्यु के समय पूर ा
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बंध त्ु व
मोहल्ला साथ खड़ ा होता है। िकसी को उसकी पहचान के कारण कम नागिरक नही ं माना जाता।
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सुझ.c
ाव: आपके अपने उदाहरण इनसे बेहतर ह गे, य द वे आपक गली, आपकa े g
e m व ालय या आपक पंचायत से
as आएँ। हर पं क्त के लए पू छए — “मने यह होते हुए कहाँ दे खा है?”, न क “इस शब्द का अथ क्या है?”
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प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 227
अध्याय के अंत का अभ्यास
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प्रश्न और क्रयाकलाप

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e थे।’ आपके अनुसार ऐसा होना
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प्र.1 ‘सं वधान सभा म भारत के व भन्न क्षेत्र और पृष्ठभू मय के प्र त न ध स म्म

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क्य क सं वधान को पूरे भारत के लए काम करना था, और कसी क्षेत्र का जीवन वही व्य क्त बता सकता है जो उसे जानता हो।

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अध्याय बताता है क सदस्य “भारत के व भन्न क्षेत्र , व्यवसाय और सामा जक वग का प्र त न धत्व करते थे” और 299 सदस्य म
15 म हलाएँ थ ।
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व वध सभा क्य आवश्यक थी — चार कारण —

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कसी क्षेत्र क आवश्यकता छू टती नह । पहाड़ी राज्य, तट य जला, मरुभू म और घनी बस्ती वाला नगर — सबक समस्याएँ
एक जैसी नह होत । हर क्षेत्र के सदस्य नयम बनते समय ही अपनी बात रख सके।
कोई वग अ धकार से बाहर नह रहा। जब समानता और भेदभाव- नषेध के उपबंध लखे जा रहे थे, तब म हलाएँ, कसान,
श्र मक, वक ल, शक्षक और लंबे समय से उपे क्षत समुदाय के लोग उसी कक्ष म उप त थे।
प्रलेख स्वीकाय बना। जस नयम-पु स्तका को बनाने म लोग स म्म लत रहे ह , उसे वे मानते ह। कसी सी मत समूह का लखा
सं वधान ‘एक वग का कानून’ कहलाता।
नणय बेहतर हुए। भन्न दृ ष्टकोण एक-दूसरे को परखते ह। डॉ. राजद्र प्रसाद ने कहा था क लोकतां त्रक सं ाओं के लए
“दूसरे के वचार का सम्मान” तथा “लचीलेपन और समन्वय” क आवश्यकता है — इसके लए भन्न वचार का उप त
होना पहली शत है।

यह क्य महत्वपूण है: उद्दे शका का आरंभ है — ‘हम, भारत के लोग’। यह वाक्य तभी सच है जब लखने वाले
लोग वास्तव म भारत के लोग को दशाते ह । सभा क व वधता ने ही इस पहली पं क्त को ईमानदार बनाया।

प्र.2 नीचे दए गए कथन को ध्यान से प ढ़ए और पहचा नए क इनम भारतीय सं वधान क कौन-कौन सी प्रमुख
वशेषताएँ या मूल्य दखाई दे ते ह — (क) शीना, रजत और हष एक पं क्त म खड़े ह। वे आम चुनाव म अपना
पहला वोट डालने के लए उत्सा हत ह। (ख) राधा, इमोन और हरप्रीत एक ही वद्यालय क एक ही कक्षा म पढ़ते
ह। (ग) माता- पता को अपने बच्च क शक्षा सु न त करने के लए व्यवस्था करनी चा हए। (घ) गाँव के कुएँ का
उपयोग सभी जा त, धम और लग के लोग कर सकते ह।

प्रत्येक कथन को उसक वशेषता से मलाइए —

कथन सं वधान क वशेषता / मूल्य यह कहाँ से आता है

(क ) शीना, रजत और हष सावभौिमक वयस्क मतािधकार — और वह प्रत्येक वयस्क नाग रक को मतदान का अ धकार; नवाचन
पहला वोट डालने को लोकतांित्रक गणराज्य, िजसमें लोग अपने तंत्र ऐसा क हर पात्र नाग रक मतदान कर सके
उत्सािहत पितिनिध चुनते है ं

(ख) राधा, इमोन और समानता का अिधकार और राज्य का अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता); अनुच्छेद 21-ए
हरपीत एक ही कक्षा में पंथिनरपेक्ष स्वरूप; साथ ही िशक्षा का ( शक्षा का अ धकार)
अिधकार

(ग ) माता-िपता बच्चों की एक मौिलक कतव्य कतव्य (च) — “य द माता- पता या अ भभावक ह, तो 6 से
िशक्षा सुिनिश्चत करे ं 14 वष क आयु के अपने बच्चे या आ श्रत को शक्षा प्रदान
करने का प्रयास करना।”

(घ ) गाँव के कु एँ का समानता और न्याय, तथा बंध त्ु व का मूल्य नाग रक के साथ जा त, धम और लग के आधार पर भेदभाव
उपयोग सभी कर सकते है ं नह ; सामा जक असमानताओं को समाप्त कया जाना चा हए

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सुझाव: एक कथन म एक से अ धक मूल्य दख सकते ह, और यह ठ क है — कथन (ख) म समानता, पंथ नरपेक्षता
और शक्षा का अ धकार, तीन एक साथ ह। प्रश्न यह चाहता है क आप मूल्य का नाम ल और कारण बताएँ।
केवल नाम नह , कारण भी अवश्य ल खए।

प्र.3 यह कहा जाता है क ‘भारत म सभी नाग रक कानून के समक्ष समान है।’ क्या आपको लगता है क यह एक
सच्चाई है? य द हाँ, तो क्य ? य द नह , तो क्य नह ? तक के साथ उत्तर द जए।

ईमानदार उत्तर के दो भाग ह, और अच्छे उत्तर म दोन आने चा हए — कानून क दृ ष्ट से यह सच्चाई है; दै नक व्यवहार म यह
अभी लक्ष्य है।

‘हाँ, यह सच्चाई है’ के तक ‘व्यवहार म अभी नह ’ के तक

अनु े द 14 कानून के समक्ष समानता को मौ लक अ धकार के रूप जो व्यिक्त अपने अिधकार नही ं जानता, या िजसके पास मुक दमे का
म सु न त करता है — अध्याय के सूचना- चत्र म यही पहला समय और व्यय नही,ं वह उनका उपयोग नही ं कर पाता।
अ धकार है।

उद्दे शका दे श को सभी नाग रक के लए प्र तष्ठा और अवसर क पुर ानी सामािजक असमानताएँ समाप्त नही ं हुई है;ं उ े िशका-पट स्वयं
समता सु न त करने से बाँधती है। कहता है िक “सामािजक असमानताओं को समाप्त िकया जाना
चािहए ”, अथ त् काय अधूर ा है।

अ धकार माँगे जाने योग्य ह — “य द आपके साथ केवल आपक जागरूकता असमान है — बहुत से लोग यह जानते ही नही ं िक
पहचान के कारण कोई अनु चत व्यवहार करता है, तो आप न्यायालय न्यायालय उनके िलए भी खुल ा है।
क सहायता ले सकते ह।”

कोई कानून से ऊपर नह : राष्ट्रप त, प्रधानमंत्री, मंत्री और न्यायाधीश, असमानता घटाने वाले कु छ नीित-िनद शक तत्व — अच्छा जीवन-स्तर ,
सभी सं वधान के पालन क शपथ या संकल्प लेते ह। पोषण, सावजिनक स्वास्थ् य — ल क्ष्य है,ं िजनकी माँग न्यायालय में नही ं
की जा सकती।

अपना तक कैसे गढ़। पहले एक वाक्य म अपना पक्ष र खए, फर दो प्रमाण द जए, और अंत म अपने वरुद्ध सबसे मजबूत
आप त्त का उत्तर द जए। जैसे — “कानून के समक्ष समानता उस अथ म सच्चाई है जो सबसे महत्वपूण है — कानून स्वयं
नाग रक म भेद नह करता और हर नाग रक न्यायालय जा सकता है। परंतु कागज पर लखा अ धकार तभी वास्त वक बनता है जब
लोग उसे जान और न्यायालय तक सरलता से पहुँच सक; इस लए अब काय है वचन और अनुभव के बीच क दूरी को पाटना।”

दोन भाग साथ क्य : सं वधान नमाताओं ने इस दूरी को ध्यान म रखकर ही व्यव ा बनाई थी। उन्ह ने तुरंत माँगे
जा सकने वाले मौ लक अ धकार दए और अलग से द घका लक नी त- नदशक तत्व — “कुछ बड़े लक्ष्य ऐसे ह
जन्ह दे श क प्रग त के साथ धीरे-धीरे प्राप्त कया जा सके।” यह कहना क आदश अभी पूरी तरह प्राप्त नह हुआ,
सं वधान क आलोचना नह है; सं वधान स्वयं अपने बारे म यही कहता है।

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प्र.4 आपने पढ़ा क ‘भारत एकमात्र ऐसा दे श है, जसने आरंभ से ही अपने नाग रक को सावभौ मक वयस्क
मता धकार प्रदान कया।’ क्या आप बता सकते ह क भारत ने ऐसा क्य कया?

भारत ने ऐसा इस लए कया क्य क इससे कम कुछ भी उस स्वतंत्रता संग्राम के वरुद्ध जाता, जसे वह अभी-अभी जीता
था। अध्याय बताता है क नमाताओं का एक प्रश्न यही था — “हम यह कैसे सु न त कर क प्रत्येक वयस्क नाग रक को मतदान
का अ धकार मले?” — और फर ऐसा नवाचन तंत्र बनाया गया जससे हर पात्र नाग रक मतदान कर सके।
कारण, क्रम से —

स्वतंत्रता आंदोलन जन-आंदोलन था। कसान, श्र मक, म हलाएँ और व ाथ — सब स म्म लत थे। स्वतंत्रता मलने पर
उन्ह से यह कहना क मत केवल धनी या श क्षत लोग को मलेगा, अनु चत होता।
सं वधान क न व समानता है। य द सभी कानून के समक्ष समान ह, तो जा त, लग, धन या साक्षरता के आधार पर
मता धकार नह बाँटा जा सकता। सावभौ मक मता धकार चुनाव पर लागू क गई समानता ही है।
औप नवे शक शासन ने भारतीय क आवाज छ नी थी। बना सहम त के शा सत होने का सीधा वलोम यही है क सबको
आवाज मले।
‘हम, भारत के लोग’। उद्दे शका कहती है क सं वधान लोग ने अपने प्र त न धय के माध्यम से बनाया और अपनाया।
प्र त न ध लोग के लए तभी बोल सकते ह जब उन्ह सब लोग चुन।
साधारण भारतीय पर वश्वास। उस समय अनेक लोग को लगता था क नधन और बड़े पैमाने पर नरक्षर दे श पूण
मता धकार नह सँभाल सकेगा। सं वधान नमाताओं ने असहम त जताई — सहम त से शा सत होने का अ धकार शक्षा या
आय पर नभर नह करता।

एक सावधान टप्पणी: यह कथन इसी अध्याय का नह , आपके पूव अध्ययन का है, इस लए इसे ठ क-ठ क कहना
उ चत है। 1950 से पहले कुछ दे श म भी पूण वयस्क मता धकार दया जा चुका था, पर वे छोटे और कह अ धक
एकरूप दे श थे। भारत क वशेषता यह है क उसने अपने पहले ही आम चुनाव से प्रत्येक वयस्क नाग रक को
मत दया — इतने बड़े, नधन और व वध दे श म, जो कसी तुलनीय राष्ट्र ने नह कया था और जहाँ तक पुराने
लोकतंत्र भी धीरे-धीरे, चरण म ही पहुँचे थे।

प्र.5 स्वतंत्रता संग्राम ने भारतीय सं वधान के नमाण को कैसे प्रे रत कया? भारतीय सभ्यता क वरासत ने सं वधान
क कन प्रमुख वशेषताओं को कस प्रकार प्रे रत कया? स्पष्ट क जए।

स्वतंत्रता संग्राम ने दो प्रकार से सं वधान को आकार दया — अपने आदश से और अपनी व्यावहा रक शक्षा से।

आदश। अध्याय इन्ह गनाता है — सभी के लए समानता और न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व, भारत क सांस्कृ तक वरासत का
संरक्षण — तथा सं वधान को इन आदश क प्रा प्त का साधन मानना। यही शब्द उद्दे शका म लौटते ह।
व्य क्त। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक प्रमुख नेता सं वधान सभा के सदस्य थे, इस लए उन्ह ने “अपने अनुभव और वचार सं वधान
म स म्म लत कए।” अध्याय के शब्द म, स्वतंत्र भारत के लए सं वधान न व का पत्थर था।
व्यावहा रक उत्तर। संग्राम के अनुभव ने ‘कैसे’ और ‘क्या’ वाले प्रश्न के उत्तर दए — प्रत्येक वयस्क को मता धकार,
कायपा लका- वधा यका-न्यायपा लका क श क्तय का पृथक्करण, मौ लक अ धकार क गारंट , संशोधन क प्र क्रया और
कद्र-राज्य संबंध।

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भारतीय सभ्यता क वरासत ने इन वशेषताओं को प्रे रत कया —

वरासत से सं वधान म क्या बना

मत वैिभन्य की स्वीकृ ित; वसुधै व कु टुम्बकम् (संपूण िवश्व एक िवचार और अिभव्यिक्त की स्वतंत्रता, राज्य का पंथिनरपेक्ष स्वरूप, तथा उ े िशका
पिरवार है); सव भवन्तु सुिखनः (सभी सुखी हों) में बंध तु ा का मूल्य

शासन में जनता की भूिमका और कतव्यों पर पुर ाना बल — मौिलक कतव्य (भाग 4-ए ), और यह भाव िक शासन िवशेषािधकार नही,ं
जनपद, संघ , राजा और उनकी सभाएँ, कौिटल्य का सप्तांग , उ त्तरदाियत्व है
राजधम

पकृ ित को पिवत्र मानना; ान और िशक्षा की िनरंतर खोज; वन, झील , नदी और वन्य जीव की र क्षा तथा जीवमात्र के पित दया का कतव्य;
मिहलाओं के पित सम्मान अनुच्छे द 48-ए (पय वरण और वन्यजीव संर क्षण); िशक्षा का अिधकार ; मिहलाओं
की समानता

िविवधता के भीतर भारत के एक रा होने का भाव — ‘एक में रा की एकता, जो उ े िशका में और संघ की संर चना में िलखी है
अनेक ’

नमाताओं ने “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु वश्वतः” क भावना से बाहर भी दे खा — ांस से ‘स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व’, आयरलड
से नी त- नदशक सद्धांत, और अमे रका से स्वतंत्र न्यायपा लका।

ऐसा क्य : सं वधान कोरे कागज पर नह लखा जाता। उसे वे लोग लखते ह जनके पास स्मृ त होती है — उस
संघष क , जसे वे अभी-अभी जी चुके थे, और उस सभ्यता क , जसम वे पले-बढ़े थे। तैयार पाठ म दोन स्मृ तयाँ
दखाई दे ती ह।

प्र.6 क्या आपको लगता है क हम एक समाज के रूप म सं वधान के सभी आदश को प्राप्त कर चुके ह? य द नह , तो
एक नाग रक के रूप म हम म से प्रत्येक क्या कर सकता है जससे क हमारा दे श इन आदश के और नकट पहुँच
सके?

सभी आदश अभी नह — और सं वधान ने कभी यह माना भी नह था क सब तुरंत प्राप्त हो जाएँगे। उसक अपनी बनावट
यही कहती है : मौ लक अ धकार “वे प्र त ाएँ ह, जन्ह नभाना अ नवाय है” और आज माँगी जा सकती ह, जब क नी त- नदशक
तत्व वे “बड़े लक्ष्य” ह “ जन्ह दे श क प्रग त के साथ धीरे-धीरे प्राप्त कया जा सके।” इनम से कई लक्ष्य — सबके लए अच्छा
जीवन-स्तर (अनुच्छेद 47), सामा जक, राजनी तक और आ थक न्याय (अनुच्छेद 38), पयावरण संरक्षण (अनुच्छेद 48-ए) —
अभी साधे जा रहे ह।
साथ ही बहुत कुछ प्राप्त भी हुआ है : हर वयस्क मतदान करता है, सरकार चुनाव से शां तपूवक बदलती ह, न्यायालय सं वधान के
वरुद्ध कानून को रद्द करते ह, शक्षा अ धकार बन चुक है, और छु आछू त तथा भेदभाव अवैध ह।
एक नाग रक के रूप म हम क्या कर सकते ह — छोटे , वास्त वक काय —

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आदश वद्याथ वास्तव म क्या कर सकता है

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समानता
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क क्षा, खेल के मैद ान या पानी की टंक ी पर िकसी को जाित, धम, िलंग या आय के कारण अलग न होने दे ं — और ऐसा होने पर
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aन्याय अपने अिधकार जाने ं और दू स रों को बताएँ; अन्याय पर चुप रहने के बजाय िशक्षक या िकसी बड़ े को बताएँ

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िजस िवचार से असहमत हों, उसे पहले पूर ा सुन,े ं िफर उ त्तर दे ं; िकसी की आवाज न दबाएँ
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स्वतंत्र ता

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बंध त्ु व
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हर समुद ाय के पड़ ोिसयों के सुख-दुख में सिम्मिलत हों; िकसी सहनागिरक को नीचा न िदखाएँ
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मौिलक
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संिवधान, रा -ध्वज और रा गान का आदर करे ं; पेड़, झील , नदी और जीव-जंतओ
ु ं की र क्षा करे ं; सावजिनक संपित्त स्वच्छ रखें;

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कतव्य अपने काय में उ त्कृ ष्टता का पयत्न करे ं

िवद्यालय या गाम सभा में भाग ले ं; अठारह वष के होते ही नाम दज कराकर मतदान करे ं — और घरem
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m a s के बड़ ों को भी मतदान के
co िलए पेिरत करे ं gl
लोकतंत्र

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agl यह क्य काम करता है: उद्दे शका के पाठ म कहा गया है क नाग रक से भी अपेक्षा है क वे अपनी क्षमता के

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अनुसार इन मूल्य का पालन कर। सं वधान अ धकार क गारंट दे सकता है; उसे आदत केवल नाग रक बना सकते

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ह। ऊपर लखा हर काय नःशुल्क है और कक्षा 7 के व ाथ के लए आज ही संभव है।

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अगले पृष्ठ पर द गई शब्द-पहेली को भारतीय सं वधान क महत्वपूण अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए हल
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प्र.7

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gl यह रही हल क हुई शब्द-पहेली। खाक क संख्या गनकर हर उत्तर जाँच ली जए — प्रत्येक खाने म एक अक्षर आता है।

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क्रम संकेत उत्तर खाने

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ऊपर से नीचे 1
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वह गैस जसम मूल सं वधान क प्र त सुर क्षत रखी गई है। हीिलयम 4

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ऊपर से नीचे 2 वे अ धकार जो हर नाग रक को मलते ह, जैसे — स्वतंत्रता और समानता का अ धकार। मूल अिधकार 6

. com संिवधान सभा
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ऊपर से नीचे 4 लोग का वह समूह जसने भारतीय सं वधान तैयार कया। 6

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ऊपर से नीचे 7 सं वधान का आरं भक कथन, जो वे मूल्य व आदश बताता है, जनका वह संरक्षण करता है। उ े िशका 4

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agl बाएँ से दाएँ 3 सं वधान का वह भाग जो नाग रक के कतव्य को दशाता है। मूल कतव्य 6

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िवधाियका
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बाएँ से दाएँ 5 सरकार का अंग, जो कानून बनाता है। 4

वह प्र क्रया जो सं वधान म m . c 4 a
s e संशोधन
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बाएँ से दाएँ 6 प रवतन के लए प्रयोग क जाती है।

बाएँ से दाएँ 8 सरकार का अंaग, जो कानून को क्रया न्वत करता है। कायपािलका 5

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काटने वाले अक्षर, जनसे उत्तर जाँचे जा सकते ह —

वधा यका का पहला अक्षर ‘ व’ सं वधान सभा के दूसरे अक्षर से मलता है।
वधा यका का अं तम अक्षर ‘का’ मूल अ धकार के पाँचव अक्षर से मलता है।
संशोधन का अं तम अक्षर ‘न’ सं वधान सभा के चौथे अक्षर से मलता है।
कायपा लका का अं तम अक्षर ‘का’ उ े शका के अं तम अक्षर से मलता है।

सुझाव: पहले वे उत्तर भ रए जन पर पूरा वश्वास हो — ही लयम, वधा यका, संशोधन — और फर काटने वाले
अक्षर क सहायता से लंबे उत्तर भ रए। पुस्तक म इन्ह अवधारणाओं के लए ‘मौ लक अ धकार’ और ‘मौ लक
कतव्य’ शब्द भी प्रयुक्त हुए ह ( चत्र 10.14), पर पहेली के खान क संख्या मूल अ धकार और मूल कतव्य से मेल
खाती है — वही रूप पृष्ठ 221 और 223 पर भी आया है।

ये आठ ही क्य : इन्ह एक साथ प ढ़ए तो यही पूरा अध्याय है — सं वधान कसने बनाया (सं वधान सभा), वह कैसे
आरंभ होता है (उद्दे शका), वह क्या दे ता है (मूल अ धकार), हमसे क्या माँगता है (मूल कतव्य), शासन कैसे चलता है
( वधा यका, कायपा लका), वह कैसे बढ़ता है (संशोधन), और मूल प्र त कैसे सुर क्षत है (ही लयम)।

अध्याय — एक नज़र म
सं वधान दे श क नयम-पु स्तका है। यह वह प्रलेख है जो कसी दे श के मूल सद्धांत और कानून को नधा रत करता है —
सरकार के तीन अंग ( वधा यका, कायपा लका, न्यायपा लका) क संरचना, भू मका और उत्तरदा यत्व; इन तीन के बीच
संतुलन और नयंत्रण; नाग रक के अ धकार और कतव्य; तथा राष्ट्र के द घका लक लक्ष्य और आकांक्षाओं क रूपरेखा।
अ धकांश सं वधान दे श के मूल्य और आदश को भी स्पष्ट रूप से दशाते ह।
भारतीय सं वधान क रचना सं वधान सभा ने क । यह सभा 9 दसंबर 1946 को ग ठत हुई, प्रारंभ म 389 सदस्य
( वभाजन के बाद घटकर 299), जनम 15 म हलाएँ थ ; अध्यक्ष थे डॉ. राजद्र प्रसाद। सदस्य प्रांतीय वधा यकाओं ारा चुने
गए थे। प्रारं भक मसौदा डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर क अध्यक्षता वाली प्रारूप स म त ने तैयार कया। सं वधान 26
नवंबर 1949 को पूण हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ — इसी लए वह दन गणतंत्र दवस है।
तीन धाराओं ने इसे आकार दया। (क) स्वतंत्रता संग्राम — समानता, न्याय, स्वतंत्रता, बंधुत्व और भारत क सांस्कृ तक
वरासत का संरक्षण; (ख) भारत क सभ्यतागत वरासत — मत वै भन्य क स्वीकृ त, प्रकृ त को प वत्र मानना, ान क
खोज, म हलाओं के प्र त सम्मान, वसुधैव कुटु म्बकम् और सव भवन्तु सु खनः, तथा कतव्य पर बल, जो मौ लक कतव्य के
रूप म सामने आया; (ग) वश्व से मला ान — ांस से ‘स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व’, आयरलड से नी त- नदशक तत्व,
अमे रका से स्वतंत्र न्यायपा लका।
मुख्य वशेषताएँ। तीन अंग म श क्तय का पृथक्करण, सरकार क त्र-स्तरीय व्यवस्था (कद्र, राज्य और ानीय), ऐसा
नवाचन तंत्र जससे प्रत्येक पात्र नाग रक मतदान कर सके, तथा तीन स्तंभ — मौ लक अ धकार (वे प्र त ाएँ जन्ह नभाना
अ नवाय है और जनके लए न्यायालय जाया जा सकता है), मौ लक कतव्य और राज्य के नी त- नदशक तत्व (वे लक्ष्य
जन्ह सरकार को प्राप्त करने का प्रयास करना चा हए; कठोर नयम नह , दशा- नदश)।
यह एक जीवंत प्रलेख है। प रवतन, जन्ह संशोधन कहा जाता है, संसद म गहन चचा के बाद ही स्वीकार होते ह; कुछ पर
राज्य क वधान सभाओं म भी चचा होती है और अनेक बार आम जनता से राय ली जाती है। भाग 4-ए मूल कतव्य वष
1976 म जोड़े गए; पंचायती राज व्यव ा 73व सं वधान संशोधन अ ध नयम, 1992 से जुड़ी; 2004 म एक नाग रक क
या चका पर घर पर तरंगा फहराने का अ धकार मला। सं वधान 22 भाग और 8 अनुसू चय से बढ़कर 25 भाग और 12
अनुसू चय तक पहुँचा है।

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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 10 भारत का सं वधान — एक प रचय AglaSem · NCERT Solutions

उ े शका म मागदशक मूल्य ह। ‘हम, भारत के लोग’ — संप्रभु, समाजवाद , पंथ नरपेक्ष, लोकतां त्रक, गणराज्य —
न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता। ‘समाजवाद ’, ‘पंथ नरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ शब्द 42व सं वधान संशोधन, 1976
ारा जोड़े गए। मूल पाठ प्रेम बहारी नारायण रायजादा ने हस्त ल प म लखा और नंदलाल बोस तथा उनके सहयो गय ने
पृष्ठ सजाए; मूल प्र त संसद म ही लयम से भरे काँच के डब्बे म सुर क्षत है।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्द अथ अध्याय म याद रखने योग्य
कहाँ

सं वधान वह पले ख जो िकसी दे श के मूल िस ांतों और पृष्ठ 211 भारत का सं वधान वश्व का सबसे बड़ा ल खत
कानूनों को तथा शासन की व्यवस्था को िनध िरत सं वधान है
करता है

सं वधान सभा वह िनकाय िजसने भारत के संिवधान की रचना पृष्ठ 214 गठन 9 दसंबर 1946; 389 → 299 सदस्य; 15
की और उसे अंग ीकृ त िकया म हलाएँ; अध्यक्ष डॉ. राजद्र प्रसाद

प्रारूप स म त वह सिमित िजसने संिवधान का पारंिभक मसौदा पृष्ठ 214, चत्र अध्यक्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर, स्वतंत्र भारत के
तैयार िकया 10.3 पहले कानून मंत्री

गणतंत्र दवस 26 जनवरी — वष 1950 में इसी िदन संिवधान पृष्ठ 210 एवं अंगीकृत 26 नवंबर 1949, लागू 26 जनवरी 1950
लागू हुआ 214

श क्तय का िवधाियका, कायपािलका और न्यायपािलका की पृष्ठ 211 एवं वधा यका कानून बनाती है · कायपा लका लागू
पृथक्करण शिक्तयों को अलग-अलग रखना, साथ में 220 करती है · न्यायपा लका सं वधान क कसौट पर
संतल
ु न और िनयंत्र ण परखती है

मौ लक अ धकार पत्येक नागिरक को िमलने वाले वे मूल अिधकार, पृष्ठ 220–222, समानता का अ धकार (अनु. 14), स्वतंत्रता का
िजनके िलए न्यायालय जाया जा सकता है चत्र 10.14 अ धकार (अनु. 21), शोषण के वरुद्ध अ धकार,
शक्षा का अ धकार (अनु. 21-ए)

मौ लक कतव्य वे काय िजनकी अपेक्षा पत्येक नागिरक से रा पृष्ठ 222, चत्र भाग 4-ए के रूप म 1976 म जोड़े गए; सूचना- चत्र
और सहनागिरकों के पित की जाती है 10.14 म छह कतव्य दए ह

राज्य के नी त- वे लक्ष्य िजन्हे ं सरकार को पाप्त करने का पयास पृष्ठ 220–222 न्यायालय म इनक माँग नह क जा सकती; ये
नदशक तत्व करना चािहए — संिवधान िनम ताओं का कठोर नयम नह , दशा- नदश ह (अनु. 38, 41,
सामािजक-आिथक दृ िष्टकोण 44, 47, 48-ए, 49)

उद्दे शका संिवधान का आरंिभक कथन, जो उसके मूल्यों पृष्ठ 225, चत्र संप्रभु · समाजवाद · पंथ नरपेक्ष · लोकतां त्रक ·
और आदश ं को बताता है 10.16 गणराज्य; न्याय · स्वतंत्रता · समानता · बंधुता

संशोधन संस द में गहन चच के बाद संिवधान में िकया पृष्ठ 223 42वाँ (1976) — ‘समाजवाद ’, ‘पंथ नरपेक्ष’,
गया पिरवतन ‘अखंडता’; 73वाँ (1992) — पंचायती राज

भाग और वे खंड िजनमें संिवधान संग िठत है इसे अनदे खा न आज 25 भाग और 12 अनुसू चयाँ; 1950 म 22
अनुसू चयाँ कर, पृष्ठ 212 भाग और 8 अनुसू चयाँ

ही लयम वह गैस जो कागज या स्याही से कोई रासायिनक हा शया, पृष्ठ मूल प्र त संसद म ही लयम से भरे काँच के डब्बे म
अिभिक्रया नही ं करती, इसीिलए मूल संिवधान के 210, चत्र सुर क्षत है
संर क्षण में पयुक्त 10.2

प्रेम बहारी वह सुले खक िजसने संिवधान का मूल पाठ अपनी इसे अनदे खा न नंदलाल बोस एवं उनके सहयो गय ने पृष्ठ सजाए
नारायण रायजादा हस्तिलिप में िलखा कर, पृष्ठ 223 ( चत्र 10.6 से 10.13)

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शब्द अथ अध्याय म याद रखने योग्य
कहाँ

सावभौ मक पत्येक वयस्क नागिरक को मतदान का पृष्ठ 216 एवं भारत ने यह अ धकार आरंभ से ही सभी नाग रक
वयस्क अिधकार — जाित, िलंग , संपित्त या िशक्षा से परे 220 को दया
मता धकार

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 7
TypeSolution
Pages29
Languagehindi
Updated19 Sep 2026