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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: वस्तु व नमय से मु ा तक
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
229 – 246 17 33 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 27 pages
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: वस्तु व नमय से मु ा तक
हमारे आस-पास का आ थक जीवन वषय का यह पहला अध्याय बताता है क व नमय वस्तु व नमय प्रणाली — वस्तु के बदले वस्तु — से चलकर
मु ा तक कैसे पहुँचा। कौड़ी, काषापण, कागजी मुद्रा और आज क ड जटल मुद्रा — यही मुद्रा क यात्रा है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 229 – 246
खं ड प्रश्न
17 33
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 229
अध्याय का आरंभ · वषय — हमारे आस-पास का आ थक जीवन
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 मु ा प्रचलन से पहले व नमय कैसे होता था?
मुद्रा से पहले लोग अपनी वस्तुओं और सेवाओं का व नमय सीधे अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं से करते थे। इस व्यवस्था को वस्तु
व नमय प्रणाली (बाटर सस्टम) कहते ह।
यह इस प्रकार चलती थी — जस व्य क्त के पास कोई वस्तु अ त रक्त होती, वह ऐसे व्य क्त को ढूँ ढ़ता जसके पास उसक
आवश्यकता क वस्तु अ त रक्त हो, और दोन आपस म अदला-बदली कर लेते। पुस्तक का उदाहरण सरल है — आपके पास
अ त रक्त रबर है और आपको प सल चा हए; आपके सहपाठ के पास अ त रक्त प सल है और उसे रबर चा हए। एक ही व नमय
से दोन क आवश्यकता पूरी हो जाती है।
व नमय के लए वही वस्तुएँ चुनी जाती थ जनक माँग सबको रहती थी —
कौड़ी और कवच — छोटे , गनने योग्य और नकली बनाना क ठन
नमक, चायपत्ती, तंबाकू — जनक माँग सदा बनी रहती थी
कपड़ा और बीज
पशुधन — गाय, बकरी, घोड़े, भेड़
वश्व के अन्य भाग म इससे भी व चत्र वस्तुएँ मुद्रा बन — माइक्रोने शया के याप प म च ान क वृहद डस्क ‘राई पत्थर’, मध्य
मै क्सको म एज्टे क ताँबे का ताजाड , और सोलोमन प पर प क्षय के पंख से बनी तेवाऊ कुंडली।
ऐसा क्य होता है: छोटे गाँव म, जहाँ हर व्य क्त कुछ न कुछ उगाता या बनाता है, सीधी अदला-बदली पयाप्त है।
वस्तु व नमय तभी असफल होता है जब व्यापार बड़ा हो जाए और दूर-दूर तक फैल जाए — और ठ क उसी समय
मुद्रा जन्म लेती है।
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प्र.2 मु ा प्रचलन म क्य आई?
मुद्रा इस लए आई क्य क व नमय क जाने वाली वस्तुओं के प्रकार बढ़े और वस्तु व नमय सुदूर क्षेत्र तक होने लगा। तब वस्तु
व नमय प्रणाली इस भार को नह सँभाल सक । पुस्तक के शब्द म — ‘आवश्यकता ही आ वष्कार क जननी है’।
वस्तु व नमय क पाँच सीमाएँ थ , और मुद्रा ने पाँच को दूर कया —
वस्तु व नमय क क ठनाई क्या थी मु ा से समाधान
समस्या
आवश्यकताओं का ि संयोग ऐसा व्य क्त चा हए जसे बैल भी चा हए और जसके बैल िकसी को भी बेचकर मुद ा लीिजए , जूते
पास आपके लए जूते भी ह िकसी से भी खरीिदए
मूल्य के सामान्य मानक माप एक स्वेटर कतने बोरे गे ँ के बराबर है — कोई नह बता हर वस्तु का मूल्य एक ही इकाई में अंिकत
का अभाव सकता
िवभाज्यता बैल का कुछ हस्सा स्वेटर के बदले नह दया जा सकता मुद ा ₹1, ₹2, ₹5, ₹10 में िवभािजत हो जाती है
सुवाह्यता बैल या गे ँ के बोरे हर जगह ले जाना क ठन िस क्के और नोट जेब में आ जाते है ं
िटकाऊपन संगृहीत गे ँ सड़ जाता है या चूहे खा जाते ह मुद ा लंबे समय तक अपना मूल्य बनाए रखती है
इस प्रकार मुद्रा एक सामान्य व नमय माध्यम बनी — एक ऐसी वस्तु जसे सब स्वीकार करते ह। जैसे-जैसे अ धक लोग इसे क्रय-
वक्रय म प्रयोग करने लगे, यह भुगतान क स्वीकृत व ध बन गई।
प्र.3 समय के साथ मु ा व भन्न रूप म कैसे प रव तत हुई?
चत्र 11.10 क समय-रेखा के अनुसार भारत म मुद्रा पाँच-छह बड़े चरण से गुजरी है।
लगभग कब मु ा का रूप क्या था
6000 सा.सं.पू. वस्तु िविनमय वस्तु के बदले सीधे वस्तु
लगभग 1000 सा.सं.पू. से कौड़ी गनकर द जाने वाली शंख-मुद्रा
लगभग 600 सा.सं.पू. से धातु िस क्के लोहे, चाँद , सोने व ताँबे के सक्के — काषापण
1861 सरकारी कागजी मुद ा सरकार ारा जारी नोट
1980 िडिजटल मुद ा डे बट काड और क्रे डट काड
2016 यू.पी.आई. यू नफाइड पेमट् स इंटरफेस — मोबाइल से भुगतान
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प रवतन क दशा स्पष्ट है — मुद्रा नरंतर हल्क , अ धक वभाज्य और अ धक सुवाह्य होती गई। कवच और पशुधन के स्थान
पर धातु आई, धातु के स्थान पर कागज, और कागज के स्थान पर ऐसी मुद्रा जसे छु आ ही नह जा सकता।
क्या आप जानते ह? इस समय-रेखा के दोन छोर आज साथ-साथ दखाई दे ते ह। अध्याय म कृष्णप्पा जैसे फल
वक्रेता अपने ठे ले पर छपा हुआ क्यू.आर.कोड रखते ह — मुद्रा कोई भौ तक रूप लेती ही नह , वह सीधे एक बक
खाते से दूसरे खाते म चली जाती है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 229
अध्याय के आरंभ का पाठ
प्र.1 पछली कक्षा म आपने ‘अतीत के चत्रपट’ वषय म पढ़ा था क लोग कस प्रकार क फसल उगाते थे, जैसे –
अनाज; या वे कारने लयन के मनके जैसी वस्तुए ँ कैसे बनाते थे। आपके वचार म, वे इन वस्तुओं का व नमय
अपनी आवश्यकता क वस्तुओं के लए कैसे करते ह गे?
वे इनका व नमय सीधे वस्तु के बदले वस्तु के रूप म करते ह गे, अथात् वस्तु व नमय प्रणाली से। उस समय न सक्के थे, न नोट।
अ त रक्त अनाज वाला कसान ऐसे मनका बनाने वाले को ढूँ ढ़ता जसे अनाज चा हए, और दोन तय कर लेते क कतना अनाज
एक माला के बराबर होगा।
अध्याय का पहला चत्र ( चत्र 11.1) यही दखाता है — खेत म दो व्य क्त टोकरी से अनाज एक-दूसरे के बोर म डाल रहे ह।
ऐसा व नमय तीन बात से संभव होता था —
अ त रक्त उत्पादन। प रवार अपनी आवश्यकता से अ धक उगाता या बनाता था, इस लए दे ने के लए कुछ बचता था।
मेले और हाट। न त दन पर लोग एक स्थान पर एकत्र होते थे, जससे उपयुक्त साथी मलना सरल हो जाता था।
सवस्वीकृत वस्तुए।ँ अनाज, पशुधन, नमक और कौड़ी क माँग लगभग सबको रहती थी, इस लए इन्ह आगे भी चलाया जा
सकता था।
ऐसा क्य होता है: मनके बनाने वाला मनके खा नह सकता। व नमय ही एक वशेष कौशल को पूरा जीवन बनाता
है — कुम्हार, बुनकर और कसान, हर कोई एक काम अ तरह करता है और शेष के लए व नमय करता है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 231
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हम मु ा क आवश्यकता क्य है?
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आइए पता लगाएँ
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a s em क जए क आप एक कसान ह और जहाँ आप रहते ह, वहाँ लोग वस्तु व नमय प्रणाली का प्रयोग करते
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कल्पना
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प्र.1
ह। आपको यहाँ अनेक प्रकार क वस्तुओं क आवश्यकता है, जैसे – एक जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और अपनी
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दाद के लए दवाइयाँ। परंतु आपके पास दे ने के लए केवल एक बैल है। इस बैल का व नमय करके आप कैसे
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व भन्न प्रकार क आवश्यक वस्तुओं को व भन्न लोग एवं स्थान से प्राप्त करगे?
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मुझे एक बड़े व नमय को छोटे -छोटे व नमय क श्रृंखला म बाँटना पड़ेगा, क्य क कसी एक व्य क्त के पास जूते, स्वेटर और
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दवाइयाँ — तीन एक साथ होने और उसे बैल क आवश्यकता होने क संभावना बहुत कम है।
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c ऐसा व्यिक्त ढू ँढ़ना िजसे वास्तव में बैल चािहए।
चरण 1 .— a g
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se 2 — एक जोड़ ी जूते बैल के मूल्य के बराबर नही ं, इसिलए बैल के बदले कई बोरे गेहँ लेना।
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चरण 3 — गेहूँ मोची तक ले जाना; तय करना िक िकतने बोरे एक जोड़ ी जूत ों के बराबर है।
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चरण 4 — शेष गेहूँ लेक र दू सरे व्यिक्त के पास स्वे.cटoर के िलए जाना।
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aglसे दवाइयाँ लेना।
चरण 5 — बचे हुए गेहूँ से तीसरे व्यिक्त
चरण 6 — बचे हुए बोरे घर लाकर सुरिक्षत भंडारण करना।
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अथात् बैल को पहले एक वभाज्य वस्तु — गे ँ — म बदला जाता है, तभी उसे टु कड़ म व्यय कया जा सकता है।
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a s eसंmकेत: ध्यान द जए क यहाँ गे ँ मुद्रा का काम कर रहा है। वह एक क ा व नमय माध्यम बन गया है। वास्त वक
agl मुद्रा का आरंभ ठ क इसी प्रकार हुआ था।
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प्र.2 इसम आपको कस प्रकार क चुनौ तय का सामना करना पड़ सकता है?
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इस श्रृंखला के हर चरण म एक चुनौती छपी है।
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चुनौती कसान क कहानी म यह कैसी दखती है
उपयुक्त व्यिक्त ढू ँढ़ना पहले ऐसा व्य क्त चा हए जसे बैल क आवश्यकता ही हो
असमान मूल्य बैल के बदले केवल एक जोड़ी जूते उ चत व नमय नह
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लंबी श्रंख बैल → गे ँ → जूते, स्वेटर, दवाइयाँ : तीन अलग व्य क्तय से तीन सौदे
हर बार मोल-भाव हर जगह नई बातचीत क कतना गे ँ उस वस्तु के बराबर है
ढुल ाई गे ँ के बोरे कई स्थान पर ले जाने पड़गे
भंडारण बचा हुआ गे ँ सुर क्षत रखना पड़ेगा — वह सड़ भी सकता है और चूहे भी खा सकते ह
बार-बार ढोना अगली बार कुछ चा हए तो फर वही बोरे उठाने पड़गे
अगले पृष्ठ क भाषा म ये ही आवश्यकताओं का संयोग, मूल्य के सामान्य मानक माप का अभाव, वभाज्यता, सुवाह्यता और
टकाऊपन क समस्याएँ ह।
आइए वचार कर — पृष्ठ 232
हम मु ा क आवश्यकता क्य है?
आइए वचार कर
प्र.1 ऊपर द गई स्थ त म आपको कन- कन चुनौ तय का सामना करना पड़ा?
पाँच अलग-अलग प्रकार क चुनौ तयाँ, और आगे चलकर अध्याय हर एक को नाम भी दे ता है।
1. दोन क आवश्यकताओं का मेल। जसके पास जूते ह, उसे ठ क वही वस्तु भी चा हए जो आप दे रहे ह। यह आवश्यकताओं
का संयोग है।
2. उ चत दर तय करना। स्वेटर दो बोरे गे ँ के बराबर है या पाँच? कोई न त उत्तर नह , क्य क मूल्य का सामान्य मानक माप
उपलब्ध नह है।
3. वस्तु को बाँटना। बैल को जूते के बराबर टु कड़े म नह काटा जा सकता — यह वभाज्यता क समस्या है।
4. वस्तु को ले जाना। बैल और गे ँ के बोरे स्थान-स्थान पर ढोने पड़ते ह — यह सुवाह्यता क समस्या है।
5. वस्तु को सँभालकर रखना। गे ँ सड़ जाता है या चूहे खा जाते ह, इस लए संप त्त संगृहीत नह क जा सकती — यह
टकाऊपन क समस्या है।
इनके ऊपर समय और श्रम का व्यय भी है — कई यात्राएँ, कई बार मोल-भाव और एक सुर क्षत भंडार बनाने क चता।
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ऐसा क्य होता है: हर चुनौती क जड़ एक ही है — वस्तु व नमय म जो वस्तु द जा रही है, उसे दो काम एक साथ
करने पड़ते ह। वह स्वयं उपयोगी भी होनी चा हए और भुगतान का साधन भी। मुद्रा इन दोन काम को अलग कर
दे ती है, और हर चुनौती समाप्त हो जाती है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 232
हम मु ा क आवश्यकता क्य है?
प्र.1 कल्पना क जए क कसान क कहानी म, वह कोई ऐसा व्य क्त ढूँ ढ़ लेता है जो उसके बैल के बदले उसे एक
जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और दवाइयाँ दे ने को तैयार हो। क्या आप सोचते ह क ऐसी स्थ त आसानी से बन
सकती है?
नह , ऐसी स्थ त बहुत कम बनेगी। इसके लए एक साथ बहुत-सा संयोग चा हए।
एक ही व्य क्त म, एक ही दन, तीन शत पूरी होनी चा हए —
उसके पास जूते, स्वेटर और दवाइयाँ — तीन ह । ये तीन बल्कुल अलग व्यवसाय ह।
उसे बैल क आवश्यकता हो, और इतनी अ धक क वह तीन वस्तुएँ छोड़ने को तैयार हो जाए।
दोन पक्ष यह मान क एक बैल इन तीन का उ चत मूल्य है।
वास्त वक जीवन म जूते मोची से मलते ह, स्वेटर बुनकर से और दवाइयाँ वैद्य से। तीन को अलग-अलग वस्तुएँ चा हए और संभवतः
कसी को बैल नह चा हए। इसी लए कहानी म कसान को व नमय क श्रृंखला से गुजरना पड़ता है।
ऐसा क्य होता है: यह आवश्यकताओं के संयोग का सबसे क ठन रूप है। एक संयोग बनना ही क ठन है; यहाँ
कसान को तीन संयोग एक साथ चा हए।
आइए वचार कर — पृष्ठ 233
हम मु ा क आवश्यकता क्य है?
आइए वचार कर
प्र.1 उपयुक्त उदाहरण म आवश्यकताओं के संयोग के क्या दृष्टांत ह?
कसान क श्रृंखला के हर व नमय म आवश्यकताओं का संयोग चा हए। उदाहरण म ऐसे चार दृष्टांत ह।
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क्रम व नमय कन दो आवश्यकताओं का मेल आवश्यक है
1 बैल → गे ँ के बोरे गेहू ँ वाले को बैल चािहए और िकसान को गेहू ँ चािहए
2 गे ँ → जूते मोची को गेहू ँ चािहए और िकसान को वे जूते चािहए
3 गे ँ → स्वेटर स्वेटर बेचने वाले को गेहू ँ चािहए और िकसान को स्वेटर चािहए
4 गे ँ → दवाइयाँ दवा दे ने वाले को गेहू ँ चािहए और िकसान को दवाइयाँ चािहए
और पृष्ठ 232 पर क ल्पत सरल स्थ त — एक ही व्य क्त बैल के बदले जूते, स्वेटर और दवाइयाँ तीन दे दे — पाँचवाँ तथा सबसे
कम संभव दृष्टांत है।
स्वयं जाँ चए: य द मोची को गे ँ के स्थान पर दूध चा हए होता, तो कसान को एक और व नमय जोड़ना पड़ता (गे ँ
→ दूध → जूते)। हर बेमेल श्रृंखला म एक कड़ी और जोड़ दे ता है।
प्र.2 उपयुक्त स्थ त म वे कौन-से मामले ह जहाँ आपको मूल्य के सामान्य मानक माप क कमी का सामना करना पड़
सकता है?
जहाँ भी दोन पक्ष को दर पर बहस करनी पड़े, वहाँ मूल्य का सामान्य मानक माप नह है। कसान क कहानी म यह हर सौदे म
होता है।
बैल के बदले गे ँ। एक बैल कतने बोरे गे ँ के बराबर है — दस, बीस या तीस? इसका नणय केवल मोल-भाव से होता है।
गे ँ के बदले जूते। पुस्तक स्वयं कहती है क हर लेन-दे न म यह तय करना क ठन होगा क जूत के बदले गे ँ क कतनी मात्रा
उ चत रहेगी।
गे ँ के बदले स्वेटर। वही बहस दूसरे व्य क्त के साथ फर से।
गे ँ के बदले दवाइयाँ। और फर तीसरे व्य क्त के साथ — जो गे ँ का मूल्य पहले दोन से भन्न आँक सकता है।
बैल के बदले सीधे जूते। बैल को केवल एक जोड़ी जूत के लए बदलना उ चत व नमय नह होगा — पर सामान्य इकाई के
बना कोई यह सद्ध भी नह कर सकता।
ऐसा क्य होता है: सामान्य इकाई के बना मूल्य केवल एक राय बनकर रह जाता है। मोची को गे ँ सस्ता लग
सकता है; कसान को, जसने पूरी ऋतु प रश्रम कया, वही गे ँ अमूल्य लगता है। य द कसी एक को व नमय
लाभकारी न लगे तो सौदा टू ट जाता है। मुद्रा हर वस्तु का मूल्य एक ही इकाई म दे कर यह बहस समाप्त कर दे ती है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 233
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हम मु ा क आवश्यकता क्य है?
आइए वचार कर
प्र.1 ऐसे कुछ उपाय सुझाइए जससे मु ा के प्रयोग ारा कसान क स्थ त को सरल बनाया जा सके?
मुद्रा कसान क पूरी व नमय-श्रृंखला को एक वक्रय और तीन क्रय म बदल दे गी।
वस्त ु िविनमय से : बैल → गेहूँ → जूते , िफर स्वेट र, िफर दवाइयाँ (4 िविनमय, बोरों के साथ 3 यात्राएँ)
मुद ा से : बैल → ₹ → जूते , स्वेट र, दवाइयाँ (1 िव क्र य, िफर सरल क्र य)
वस्तु व नमय क हर सीमा के लए मुद्रा के पास एक उपाय है —
मु ा का काय कसान के लए इसका अथ
िविनमय का माध्यम बैल िकसी को भी बेिचए और जूते िकसी से भी खरीिदए — आवश्यकताओं के ि संयोग की आवश्यकता ही नही ं
मूल्य का सामान्य जूते, स्वेटर और दवाइयों का मूल्य रुपयों में अंिकत है, इसिलए तुल ना सरल और मोल -भाव अनावश्यक
माप
िवभाज्यता बैल एक धनरािश बन जाता है िजसे ठीक -ठीक बाँटा जा सकता है — कु छ जूतों के िलए , कु छ स्वेटर के िलए , शेष दवाइयों
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सुवाह्यता िस क्के और नोट जेब में आ जाते है;ं गाँव-गाँव बोरे ढोने की आवश्यकता नही ं
मूल्य का संग हण जो बच जाए वह अपना मूल्य बनाए रखता है। न सड़ेग ा, न चूहे खाएँग े — महीनों बाद भी व्यय िकया जा सकता है
मुद्रा से कसान आज खरीदकर बाद म भुगतान भी कर सकता है, क्य क यह स्थ गत भुगतान का मानक भी है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 236
आज का वस्तु व नमय · जोन बील मेला, पुस्तक व नमय और कपड़ के बदले बतन के बाद
आइए पता लगाएँ
प्र.1 पहले दए गए चत्रण म वस्तु व नमय प्रणाली के कुछ तरीके दशाए गए ह। क्या आपने अपने क्षेत्र म इस तरह के
प्रयोग का अवलोकन कया है?
हाँ — वस्तु व नमय समाप्त नह हुआ है। जहाँ लोग म परस्पर वश्वास हो या नकद कम हो, वहाँ यह आज भी जी वत है। अपने
आस-पास इन्ह दे खए —
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बतन वाले। वक्रेता घर-घर आकर पुराने कपड़ के बदले स्ट ल के बतन दे ता है — ठ क वैसे ही जैसे चत्र 11.7 म है।
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कबाड़ी वाला। पुराने अखबार और र के बदले बाल्ट , मग या प्ला स्टक का सामान।
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पुस्तक और खलौन का आदान-प्रदान वद्यालय और कॉलो नय म, जैसे चत्र 11.6 का पुस्तक व नमय क्लब।
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गाँव म सहयोग। कसान एक दन के लए बैल या ै क्टर दे ता है और बदले म फसल का हस्सा या एक दन का श्रम पाता है।
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स ब्जयाँ, फल, जड़ी-बू टयाँ और मसाले लाते ह और मैदानी लोग से चावल के पठा के बदले उनका व नमय करते ह।
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यह क जए: एक सप्ताह तक अपनी गली म हुए हर लेन-दे न क डायरी बनाइए और हर एक पर ‘मुद्रा’ या ‘वस्तु
व नमय’ ल खए। नकद भुगतान के बीच दो-तीन वस्तु व नमय प्रायः छपे मल जाएँगे।
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इस प्र कया म लोग को कस- कस प्रकार के अनुभव होते ह?
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अनुभव मले-जुले होते ह — मानवीय पक्ष म मधुर, हसाब के पक्ष म क ठन।
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लोग को क्या अ ा लगता है
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नकद क आवश्यकता नह , इस लए पैसे क कमी म भी काम चल
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दर तय करना — िकतनी पुर ानी सािड़याँ एक बाल्टी के बराबर ?
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घर क अनुपयोगी वस्तुएँ उपयोगी वस्तुओं म बदल जाती ह लंबा मोल -भाव; बाद में कोई एक पक्ष स्वयं को ठगा हुआ अनुभव कर
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िव े ता महीनों बाद आता है — जब चाहे ं तब नही ं खरीद सकते
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कुछ व्यथ नह जाता : कपड़े फर बकते, पुनः प्रयुक्त या पुनच क्रत मूल्य िनिश्चत न होने से दो िव े ताओं की तुल ना संभव नही ं
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aृ sतक आयोजन बन
जोन बील जैसे मेले म यह एक सामा जक-सांlस्क
जाता है a g वस्तुए ँ िविनमय-स्थल तक ढोकर ले जानी पड़ती है ं
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ऐसा क्य होता है: सुखद अनुभव इस लए ह क वस्तु व नमय व्य क्तगत होता है; क ठन अनुभव इस लए क उसम
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मूल्य का सामान्य मानक माप नह होता। एक ही ार पर हुए व नमय म दोन पक्ष दखाई दे ते ह।
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agl नमूना उत्तर: “हमारी कॉलोनी म महीने म दो बार एक वक्रेता पुराने कपड़ के लए आवाज लगाता है। माताजी ने चार पुरानी कमीज
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और दो सा ड़याँ द और बदले म एक स्ट ल क बाल्ट तथा दो गलास लए। उन्ह ने कहा क सौदा उ चत लगा क्य क बतन अ े
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थे, परंतु यह भी कहा क दस मनट मोल-भाव करना पड़ा — मुद्रा होती तो मूल्य पहले से ात होता।”
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आइए वचार कर — पृष्ठ 237
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मु ा के मूलभूत काय
आइए वचार कर
प्र.1 मान ली जए क आपको एक पुस्तक खरीदनी है। आपक जेब म ₹50 ह। आप अपने पड़ोस क पुस्तक क
दुकान पर जाते ह और वहाँ दुकानदार आपको पुस्तक क क मत ₹100 बताता है। आपके पास आज पुस्तक
खरीदने के क्या वकल्प ह?
अंतर को कसी न कसी प्रकार पूरा करना ही होगा।
पुस्तक का मूल्य = ₹100
जेब में मुद ा = ₹50
कमी = ₹100 − ₹50 = ₹50
व्यावहा रक वकल्प ये ह —
1. आज ₹50 द जए और शेष ₹50 बाद म — य द दुकानदार सहमत हो जाए। यह स्थ गत भुगतान है।
2. ₹50 उधार ली जए — माता- पता, बड़े भाई-बहन या मत्र से — और आज ही पूरा भुगतान कर द जए।
3. दुकानदार से पुस्तक अलग रखवा ली जए और कल शेष रा श लेकर आइए।
4. ₹50 या उससे कम मूल्य क कोई अन्य पुस्तक आज खरीद ली जए।
5. प्रतीक्षा क जए और बचत क जए — जेब खच से शेष ₹50 जोड़कर बाद म खरी दए।
6. ड जटल भुगतान क जए — य द प रवार के बक खाते म रा श हो तो यू.पी.आई. से ₹100 तुरंत चुकाए जा सकते ह।
संकेत: ध्यान द जए क पहला वकल्प केवल इस लए संभव है क्य क मुद्रा है। वस्तु व नमय म आप ‘आधा बैल
आज और आधा अगले महीने’ नह दे सकते।
प्र.2 क्या आप दुकानदार को शेष भुगतान बाद म करने क अनुम त दे ने का अनुरोध करगे?
हाँ, यह अनुरोध उ चत है — और अध्याय इसी अनुरोध से एक महत्वपूण अवधारणा समझाता है।
यह अनुरोध तभी काम करता है जब दो शत पूरी ह —
वश्वास। पड़ोस का दुकानदार, जो प रवार को जानता है, प्रायः मान जाएगा; कसी बड़े स्टोर का अप र चत वक्रेता नह ।
ऐसा वचन जसे नभाया जा सके। मुझे न त होना चा हए क बताई गई त थ तक मेरे पास ₹50 ह गे, और उस त थ पर
जाकर मुझे भुगतान करना ही होगा।
य द वे मान जाते ह तो पुस्तक आज घर आ जाती है और ₹50 बाद म दए जाते ह। दुकानदार मुद्रा के स्थान पर मुद्रा का वचन
स्वीकार कर लेता है।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक AglaSem · NCERT Solutions
ऐसा क्य होता है: मुद्रा को भ वष्य म भुगतान के माध्यम के रूप म स्वीकार कया जाता है, इसी लए वह स्थ गत
भुगतान का एक मानक बन जाती है — व नमय का माध्यम, मूल्य का माप और मूल्य के संग्रहण के साथ मुद्रा का
चौथा मूलभूत काय। यह इस लए चलता है क्य क सबको वश्वास है क ₹50 अगले महीने भी लगभग उतना ही
खरीद सकगे।
क्या आप जानते ह? भारत म दुकानदार स दय से ऐसा उधार खाता या बही म लखते आए ह। उधार लेकर महीने
के अंत म हसाब चुकाना, दै नक जीवन म स्थ गत भुगतान ही है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 237
मु ा क यात्रा · चत्र 11.10
आइए पता लगाएँ
प्र.1 चत्र 11.10 म द गई समय-रेखा को दे ख। आपने मु ा म क्या-क्या बदलाव दे खे?
चत्र 11.10 को बाएँ से दाएँ प ढ़ए — मुद्रा छह बार बदलती है, और हर बार पहले से अ धक सु वधाजनक हो जाती है।
समय-रेखा पर मु ा का रूप क्या बदला
तथ
6000 सा.सं.पू. वस्तु िविनमय वस्तु के बदले सीधे वस्तु — मुद्रा थी ही नह
1000 सा.सं.पू. से कौड़ी एक कवच मुद्रा बन गया : गनने योग्य, हल्का, नकल करना क ठन
600 सा.सं.पू. से धातु िस क्के — लोहा, चाँद ी, सोना, मुद्रा पर अब अं कत और प्रमा णत मूल्य
ताँबा
1861 सरकारी कागजी मुद ा मूल्य सामग्री से अलग हुआ; कागज धातु से कह हल्का
1980 क्र
िडिजटल मुद ा — डेिबट व े िडट मुद्रा बना ढोए एक स्थान से दूसरे स्थान जाने लगी
काड
2016 यू.पी.आई. अब केवल मोबाइल और क्यू.आर.कोड पयाप्त; मुद्रा पूणतया
इलेक् ॉ नक
चार बात स्पष्ट दखती ह —
भारी से भारहीन क ओर। पशुधन और अनाज → कवच → धातु → कागज → ऐसी मुद्रा जसे छु आ नह जा सकता।
प्राकृ तक से मानव- न मत क ओर। कवच मलता है; सक्का ढाला जाता है; यू.पी.आई. भुगतान सॉफ्टवेयर बनाता है।
नजी से आ धका रक क ओर। वस्तु व नमय कोई भी कर सकता था; सक्के राजा ढालते थे; आज केवल भारतीय रजव
बक मुद्रा जारी कर सकता है।
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ग त बढ़ती जाती है। वस्तु व नमय से सक्क तक हजार वष लगे; काड से यू.पी.आई. तक केवल लगभग 36 वष।
स्वयं जाँ चए: समय-रेखा यह नह कहती क पुराने रूप समाप्त हो गए। सक्क के बाद भी भारत के कुछ भाग म
कौड़ी लंबे समय तक चलती रही, और आज सक्के, नोट और यू.पी.आई. — तीन साथ-साथ प्रयोग म ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 238
सक्का-प्रणाली
प्र.1 क्या यह शब्द वतमान भारत म मु ा के लए प्रयोग कए जाने वाले शब्द से मलता-जुलता है?
हाँ। यहाँ जस शब्द क बात है वह है रुपा — प्राचीन सक्क पर अं कत चह्न — और यही आज के प्र त दन प्रयुक्त शब्द रुपया का
मूल है।
रुपा (िचह्न / रूप) → रूप्य (िचह्नांिकत चाँद ी) → रु पया
उसी अनु े द का दूसरा शब्द भी जी वत है। प्राचीन सक्क को काषापण या पण कहा जाता था, और आज भी —
त मल, तेलुगु और मलयालम म मुद्रा के लए पणं कहा जाता है;
कन्नड़ म हण कहा जाता है।
ऐसा क्य होता है: मुद्रा के नाम मुद्रा से भी अ धक समय तक जी वत रहते ह। सक्के स दय पहले लुप्त हो गए,
परंतु लोग बोलचाल म नाम प्रयोग करते रहे, इस लए वह नाम एक पीढ़ क मुद्रा से अगली पीढ़ क मुद्रा तक पहुँच
गया।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 239
सक्का-प्रणाली · चत्र 11.12
आइए पता लगाएँ
प्र.1 चत्र 11.12 म दशाए गए सक्के त मलनाडु म स्थत पुड्डूकोटाई म उत्खनन के समय मले ह। उनके ‘शीष’ पर
रोमन राजाओं क आकृ त उकेरी हुई है। इस तरह क जानका रय के ारा हम क्या नष्कष नकाल सकते ह?
त मलनाडु क म म मले रोमन स्वण सक्के द क्षण भारत और रोमन वश्व के बीच दूरगामी व्यापार का ठोस प्रमाण ह।
इस खोज से चार नष्कष नकलते ह —
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1. संपक था। द क्षण भारत अलग-थलग नह था; वह अरब सागर और भूमध्य सागर पार के दे श से नय मत संपक म था।
2. व्यापार समु था। सक्क के प्रयोग से भारत को समुद्र व्यापार बढ़ाने म सहायता मली, और ऐसे ही सक्के केरल तथा
त मलनाडु के तट य व्यापा रक क्षेत्र म मलते ह।
3. व्यापार भारत के पक्ष म था। यही नष्कष अध्याय स्वयं नकालता है। रोमन स्वण भारत म आ रहा था, अथात् भारतीय रोम
को जतना बेच रहे थे (काली मच, मसाले, वस्त्र, मनके, मोती) उससे कम खरीद रहे थे।
4. श क्तशाली शासक के सक्के दूर तक स्वीकृत होते थे। अध्याय पहले ही बता चुका है क श क्तशाली शासक के सक्के
उनके अपने राज्य के अलावा अन्य राज्य म भी स्वीकृत होने लगे। रोमन स्वण सक्के इसका प्रमाण ह।
ऐसा क्य होता है: स्वण सक्के का मूल्य उसक धातु म भी उतना ही था जतना शासक क मुहर म। पुड्डूकोटाई के
व्यापारी को कसी रोमन स ाट क प्रजा बनने क आवश्यकता नह थी — सोना स्वयं ही गारंट था।
संकेत: जब प्रश्न पूछे क कोई पुराता त्वक खोज क्या बताती है, तो तीन बात दे खए — वस्तु क्या है, कहाँ मली,
और कस दशा म चली। यहाँ : सोना, अपने दे श से बहुत दूर, भारत क ओर आता हुआ।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 241
वतमान सक्का प्रणाली · सामू हक प रयोजना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 आप अपने आप को पाँच-पाँच व ा थय के समूह म संग ठत कर। एक सामू हक प रयोजना आरंभ कर जसम
प रवार के सदस्य , पड़ो सय , दुकानदार आ द से पुराने सक्के एक त्रत कर। उनक व भन्न वशेषताओं को
लख — वे कस धातु से बने ह, सक्क पर अं कत वष क्या है, सक्क के शीष और पृष्ठ भाग पर आप क्या
दे खते ह। अपने अवलोकन से आप क्या अनुमान लगा सकते ह? आपको कैसे पता चलेगा क आपके अनुमान
सही ह?
प रयोजना कैसे चलाएँ। पाँच काम बाँट ली जए — दो संग्रहकता, एक छायाकार, एक लेखक, एक प्रस्तुतकता। सक्क को कभी
रगड़कर साफ मत क जए — सफाई से वही प्रमाण नष्ट हो जाता है जसे आप एकत्र कर रहे ह। हर उधार लया सक्का लौटाइए।
हर सक्के को इस ता लका म दज क जए —
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक
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क्रम अं कत वष धातु / आकार शीष पृष्ठ ( रवस)
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मूल्य रंग (ऑबवस)
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1
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1/4 आना 1918 ताँबा, भूरा गोल, मोटा शासक का शीष “ONE अंग्रेजी +
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ANNA INDIA” उदू
2 1 पैसा 1945 काँसा बीच म छे द “INDIA” मूल्य अंग्रेजी +
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चाँद जैसा gl
3 ₹1 2002 स्ट ल, गोल अशोक स्तंभ का मूल्य + अनाज क हद +
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4 ₹20 स्मृ त- 2021 धातु बारह कोन सह शीष
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स्वतंत्रता के 75 वष काहद +
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चह्न वाला प्रतीक
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अ े अनुमान कैसे होते ह। हर अनुमान कसी वास्त वक अवलोकन से जुड़ा होना चा हए —
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“सबसे पुराने सक्क पर केवल अंग्रेजी और उदू है, नए पर हद और अंग्रेजी — अथात् स्वतंत्रता के बाद मुद्रा क भाषा
बदली।”
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“पुराने सक्के भारी और ताँबे या काँसे के ह, आज के हल्के स्ट ल के — अथात् महँगी धातुओं का स्थान सस्ती धातुओं ने ले
लया।”
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“सभी आधु नक सक्क पर अशोक स्तंभ का सह शीष है — अथात् अब एक ही रा ीय प्रा धकरण, भारतीय रजव बक, इन्ह
जारी करता है, न क प्राचीन काल के अनेक राज्य।” a
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“2021 के ₹20 सक्के पर स्वतंत्रता के 75 वष का प्रतीक है — अथात् रा ीय आयोजन के उपलक्ष्य म वशेष सक्के ढाले
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जाते ह।”
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अनुमान सही ह या नह , यह कैसे पता चलेगा। अनुमान जाँच के बाद ही ान बनता है —
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gl 2. भारतीय रजव बक तथा भारत सरकार टकसाल क आ धका रक सू चयाँ पुस्तकालय म या उनक वेबसाइट पर दे खए।
1. अध्याय के चत्र 11.13 और चत्र 11.14 से मलान क जए।
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3. स्थानीय संग्रहालय या मुद्राशास्त्र (न्यू मस्मै टक्स) क्लब जाइए या पत्र ल खए।
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4. दादा-दाद से पू छए क उनके बचपन म कस सक्के से क्या मलता था।
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5. नमूना बढ़ाइए — 30 सक्क म दखा पैटन 4 सक्क के पैटन से कह अ धक वश्वसनीय है।
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संकेत: कोई एक अनोखा सक्का कुछ सद्ध नह करता। इ तहासकार उसी पैटन पर वश्वास करते ह जो अनेक
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खोज म दोहराया जाए — इसी लए पुरातत्व वद् सक्के गनते ह, केवल नहारते नह ।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक AglaSem · NCERT Solutions
कागजी मु ा
आइए पता लगाएँ
प्र.1 आपके वचार म क्या हुआ होगा जब सक्क का प्रयोग हर प्रकार के लेन-दे न के लए शुरू हुआ होगा, चाहे वह
स ब्जयाँ ह या जमीन खरीदना हो?
सक्के छोटे क्रय के लए उत्तम थे और बड़े क्रय के लए अत्यंत असु वधाजनक, इस लए आवश्यक सक्क क संख्या बहुत बढ़
गई।
एक ग ी पालक ≈ कु छ छोटे िसक्के — सरल
जमीन का एक टु क ड़ ा ≈ हजारों िसक्के — धातु के बोरे
अथ त् : सौदा िजतना बड़ ा, भुगतान उतना भारी
इसके प रणाम —
बड़े भुगतान बोर या गा ड़य म ले जाने पड़ते, कभी-कभी पहरेदार के साथ।
बड़ी रा श गनने म लंबा समय लगता, और हर सक्के का भार व शुद्धता जाँचनी पड़ती।
राज्य के बीच जाने वाले व्यापा रय को लंबी दूरी तक भारी भार ढोना पड़ता।
घर म संप त्त रखने का अथ था धातु का वशाल ढे र रखना।
अध्याय का अपना नष्कष यही है — बड़ी मात्रा म सक्के ले जाना क ठन होता होगा और सक्क को संगृहीत करना भी एक
समस्या बन गई होगी। इसी खोज का अंत कागजी मु ा पर हुआ।
प्र.2 ऐसी क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई ह गी?
चार स्पष्ट समस्याएँ — और ये वस्तु व नमय क पुरानी समस्याएँ ही नए रूप म लौट आई थ ।
समस्या व्यवहार म इसका अथ
सुवाह्यता िस क्कों में बड़ी रािश भारी और भारी-भरकम — बाजार तक या राज्य के पार ले जाना किठन
भंडारण धातु में रखी संपि के िलए स्थान और मजबूत कोठरी चािहए
सुर क्षा धातु के िदखाई दे ने वाले बोरे माग में चोरों को आमंित्र त करते है ं
िगनना और परखना हजारों िस क्के िगनने, तौलने और नकली या कटे-छँटे िस क्कों की जाँच करने पड़ते है ं
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समाधान यह नकला क धातु ढोने के स्थान पर हल्के कागज पर मूल्य लख दया जाए। कागजी मुद्रा पहली बार चीन म प्रयोग क
गई और भारत म 18व शताब्द के अंत म आई। तब से सक्के छोटे अं कत मूल्य के लए और कागजी मुद्रा बड़े अं कत मूल्य के
लए प्रयोग होने लगी।
ऐसा क्य होता है: मुद्रा म मूल्य भी होना चा हए और सु वधा भी। धातु ने मूल्य दया पर सु वधा छ न ली। कागज
सामग्री का मूल्य पूरी तरह छोड़ दे ता है और केवल जारीकता पर वश्वास के बल पर चलता है — इसी लए आज
केवल भारतीय रजव बक ही इसे जारी कर सकता है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 242
कागजी मु ा · चत्र 11.16 और चत्र 11.17
आइए पता लगाएँ
प्र.1 ₹50 और ₹100 के नोट को दे खए। क्या आप नोट के पृष्ठ भाग पर दशाई गई भारत क सांस्कृ तक वरासत से
संबं धत आकृ तय को पहचान पा रहे ह? इनके बारे म और अ धक जानकारी प्राप्त क जए।
दोन आकृ तयाँ यूनेस्को क वश्व धरोहर ह, और दोन नोट के पृष्ठ भाग (पीछे क ओर) छपी ह।
नोट पृष्ठ भाग क कहाँ है कसने बनवाया और क्या जानने योग्य है
आकृ त
₹50 हंपी का पाषाण रथ हंपी, वजयनगर वट्ठल मं दर प रसर म रथ के आकार म तराशा गया मं दर, 16व शताब्द म
जला, कनाटक वजयनगर शासक के काल म बना। हंपी वजयनगर सा ाज्य क राजधानी
थी।
₹100 रानी की वाव — पाटन, सरस्वती नद के 11व शताब्द म सोलंक नरेश भीमदे व प्रथम क स्मृ त म रानी उदयमती ारा
‘रानी की बावड़ी’ तट पर, गुजरात बनवाई गई सात मं जला उलट बावड़ी; इसक द वार पर 500 से अ धक
बड़ी मू तयाँ ह।
इसी श्रृंखला के अन्य नोट पर भी यही भावना है — ₹10 पर कोणाक का सूय मं दर, ₹20 पर एलोरा क गुफाएँ, ₹200 पर साँची
स्तूप और ₹500 पर लाल कला।
ऐसा क्य होता है: मुद्रा ही वह एकमात्र छपी हुई वस्तु है जो दे श के हर व्य क्त तक पहुँचती है। नोट के पृष्ठ भाग पर
स्मारक छापकर रोजमरा क मुद्रा भारत क सांस्कृ तक वरासत का एक छोटा, चलता- फरता पाठ बन जाती है।
संकेत: अपना ₹50 का नोट पुस्तक के चत्र 11.16 के पास रखकर दे खए। चत्र के नीचे छपे शब्द स्वयं स्मारक का
नाम बता दे ते ह।
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प्र.2 नोट क सतह को छू कर महसूस क जए। क्या दृ ष्टबा धत लोग के लए नोट पर अं कत मूल्य को पहचानने हेतु
कोई वशेष लक्षण ह?
हाँ, भारतीय नोट पर उभरी हुई छपाई होती है, जसे उँ गली से छू कर अं कत मूल्य पहचाना जा सकता है।
इंटै ग्लयो (उभरी हुई) छपाई। महात्मा गांधी का चत्र, अशोक स्तंभ का प्रतीक और रजव बक क मुहर इतनी मोट छपती है
क कागज से ऊपर उभरी अनुभव होती है।
ब्लीड लाइन। नोट के बाएँ और दाएँ कनारे पर उभरी तरछ रेखाओं के समूह, जनक संख्या हर नोट पर भन्न होती है। जैसे
₹100 पर हर ओर 4 रेखाएँ और ₹500 पर 5 — उँ गली से गनी जा सकती ह।
पहचान चह्न। बाएँ कनारे के पास एक उभरी ज्या मतीय आकृ त, हर अं कत मूल्य के लए अलग — ₹500 पर त्रभुज,
₹200 पर वृत्त, इत्या द।
भन्न आकार। हर अं कत मूल्य क लंबाई-चौड़ाई अलग है, इस लए नोट क आपस म या कसी काड से तुलना क जा सकती
है।
बड़े, मोटे अंक और गहरे वपरीत रंग अल्पदृ ष्ट वाले व्य क्तय क सहायता करते ह।
क्या आप जानते ह? भारतीय रजव बक ने ‘मनी’ (MANI — मोबाइल एडेड नोट आइड टफायर) नामक ऐप भी
बनाया है, जो कैमरा नोट पर करते ही अं कत मूल्य बोलकर बता दे ता है।
ऐसा क्य होता है: य द कोई व्य क्त यह न त न कर सके क वह क्या दे रहा है, तो मुद्रा उसके लए व्यथ है। स्पश
से पहचाने जाने वाले लक्षण दृ ष्टबा धत व्य क्त को कसी अजनबी पर नभर हुए बना स्वयं भुगतान करने और शेष
लेने क स्वतंत्रता दे ते ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 243
मु ा के नए रूप
प्र.1 क्या आपने अपने आस-पास के अन्य व्य क्तय को सक्क और नोट का प्रयोग कए बना भुगतान करते या
भुगतान प्राप्त करते हुए दे खा है?
हाँ — नकद र हत भुगतान अब प्र त दन का दृश्य है, और केवल बड़ी दुकान म ही नह ।
फल या सब्जी वक्रेता जसके ठे ले पर छपा हुआ क्यू.आर.कोड बँधा है, ठ क अध्याय के कृष्णप्पा क तरह।
ऑटो- र ा चालक जो यात्रा के अंत म क्यू.आर.कोड का काड दखा दे ता है।
दवा क दुकान या सुपर बाजार म डे बट या क्रे डट काड लगाते हुए व्य क्त।
नेट ब कग से वद्यालय क फ स या बजली का बल भरते माता- पता।
मत्र जो कुछ ही क्षण म मोबाइल पर यू.पी.आई. से बल आपस म बाँट लेते ह।
इनम से कसी म भी कोई सक्का या नोट हाथ नह बदलता। यह ड जटल मुद्रा है — इलेक् ॉ नक रूप म मुद्रा, जो अमूत है, अथात्
जसे न छू सकते ह और न महसूस कर सकते ह। वह सीधे भुगतानकता के बक खाते से प्राप्तकता के बक खाते म चली जाती है।
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ऐसा क्य होता है: क्यू.आर.कोड म प्राप्तकता के बक खाते क जानकारी होती है। उसे स्कैन करते ही आपके बक
को पता चल जाता है क रा श कहाँ भेजनी है, इस लए छोटे वक्रेता को न काड मशीन चा हए और न गल्ला —
केवल एक मोबाइल।
यह क जए: घर से वद्यालय तक के रास्ते म कतने क्यू.आर.कोड दखते ह, ग नए। यह संख्या बता दे गी क
आपके अपने क्षेत्र म ड जटल मुद्रा कतनी दूर तक पहुँच चुक है।
प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 244
अध्याय के अंत का अभ्यास
प्रश्न और क्रयाकलाप
प्र.1 वस्तु व नमय प्रणाली कैसे काय करती थी और इस प्रणाली म कस प्रकार क वस्तुओं का प्रयोग व नमय हेतु
कया जाता था?
वस्तु व नमय प्रणाली म लोग वस्तुओं और सेवाओं का व नमय सीधे अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं से करते थे, मुद्रा का प्रयोग
कए बना।
यह कैसे काय करती थी। दो व्य क्त मलते, जनम से हर एक के पास वह वस्तु होती जो दूसरे को चा हए। वे तय करते क एक
वस्तु क कतनी मात्रा दूसरी वस्तु क कतनी मात्रा के बराबर है, और अदला-बदली कर लेते। अध्याय का उदाहरण — आपके पास
अ त रक्त रबर है और प सल चा हए; सहपाठ के पास अ त रक्त प सल है और रबर चा हए — एक व नमय से दोन क
आवश्यकता पूरी।
कौन-सी वस्तुए ँ प्रयोग होती थ । वही वस्तुएँ चुनी जात जनक माँग बहुत को हो और जन्ह सँभालना सरल हो —
प्रकार अध्याय म दए उदाहरण
कवच कौड़ी, कवच
खाद्य एवं उ े जक नमक , चायप ी, तंबाकू
पदाथ
कपड़ा और बीज बुना हुआ कपड़ा, बीज
पशुध न गाय, बकरी, घोड़े, भेड़
िवश्व की िविशष्ट मुद ाएँ क्र
याप ीप (माइ ोनेिशया) के ‘राई पत्थर ’; म ध् य मैिक्सको का ए ज्टेक ताँबे का ताजाड ; सोलोमन ीप की तेवाऊ लाल
पंख कुं डली
वस्तु व नमय आज भी लुप्त नह हुआ है। असम के मोरीगांव जले का जोन बील मेला आज भी तीन दवसीय वस्तु व नमय मेला है,
और घर-घर पुराने कपड़ के बदले नए बतन आज भी दए जाते ह।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक
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वस्तु व नमय प्रणाली क क्या सीमाएँ थ ?
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a l , और इनम से हर एक मुद्रा के आ वष्कार का कारण बनी।
पाँचgसीमाएँ
1. आवश्यकताओं का संयोग। आपको ऐसा व्य क्त चा हए जसे ठ क वही वस्तु चा हए जो आप दे रहे ह और जो ठ क वही
वस्तु दे सके जो आपको चा हए। ऐसा मेल दुलभ है।
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s mका व नमय कस अनुपात म कया जाए? कोई स्वीकृत इकाई नह
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l करना क ठन है — और य द कसी एक को व नमय लाभकारी न लगे तो
2. मूल्य के सामान्य मानक माप का अभाव। दोन वस्तु
है, इस लए एक वस्तु के मूल्य क तुलना दूसरीgसे
सौदा टू ट जाता है।
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3. वभाज्यता। बैल का कुछ हस्सा स्वेटर के बदले नह दया जा सकता। अनेक मूल्यवान वस्तुएँ बाँट नह जा सकत ।
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4. सुवाह्यता। बैल — या गे ँ के बोर का ढे र — हर उस स्थान पर ले जाना पड़ता है जहाँ कुछ खरीदना हो।
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5. टकाऊपन। अनाज के रूप म रखी संप त्त अ धक समय तक संगृहीत नह रह सकती; वह सड़ जाती है या चूहे खा जाते ह।
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भ वष्य के लए मूल्य बचाया नह जा सकता।
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ऐसा क्य होता है: वस्तु व नमय म एक ही वस्तु को उपयोगी सामग्री भी बनना पड़ता है और भुगतान का साधन
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भी। उपयोगी सामग्री भारी, नाशवान और केवल कुछ लोग को वां छत होती है, इस लए वह भुगतान का बुरा साधन
है। मुद्रा जान-बूझकर ऐसी बनाई गई है क वह भुग.तान
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के अ त रक्त कुछ न करे — और इसी लए वह यह काम
पूणता से करती है।
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प्राचीन भारतीय सक्क क मुख्य वशेषताएँ क्या थ ?
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अध्याय छह मुख्य वशेषताएँ बताता है।
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महँगी धातुए।ँ ये सोना, चाँद और ताँबा अथवा उनक मश्रधातु से बनाए जाते थे, जससे सक्का सशक्त बनता था।
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नाम। इन्ह काषापण या पण कहा जाता था।
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अं कत चह्न। इन पर चह्न अं कत होता था जसे रुपा कहा जाता था — बहुत संभव है क यही ‘रुपया’ शब्द का मूल हो।
शासक य नयंत्रण। सक्के ढालना एवं जारी करना पूणतया शासक के नयंत्रण म था, इस लए हर राज्य क अपनी सक्का-
प्रणाली होती थी।
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दोन सजे हुए पहलू। शीष (ऑबवस) और पृष्ठ ( रवस) पर अलग-अलग चह्न और आकृ तयाँ उकेरी जाती थ — जानवर,
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agसामान्य संवत) पर बाघ का राज चह्न।
.cसजाया गया त्रस्तरीय राजसी छत्र मलता है; चोल चाँद के सक्क (850–1279
वृक्ष, पहाड़, राजा-रानी और दे वी-दे वता। कल्याण के चालुक्य सक्क पर एक ओर वराह ( वष्णु अवतार) और दूसरी ओर
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व्यापक स्वीकृ त। समय के साथ श क्तशाली शासक के सक्के उनके अपने राज्य के अलावा अन्य राज्य म भी स्वीकृत होने
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लगे, जससे व भन्न क्षेत्र और समुद्र पार व्यापार सुगम हुआ।
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क्या आप जानते ह? ‘पण’ शब्द आज भी जी वत है — त मल, तेलुगु और मलयालम म पणं और कन्नड़ म हण का agl
अथ मुद्रा ही है।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 11 वस्तु व नमय से मुद्रा तक AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 समय के साथ मु ा व नमय के माध्यम के रूप म कैसे प रव तत हुई?
वह खाई-पहनी जाने वाली वस्तुओं से धातु, फर कागज और अंततः ऐसी वस्तु तक पहुँची जसे छु आ ही नह जा सकता।
चरण रूप पछले चरण से बेहतर क्य
1. वस्तु िविनमय (लगभग 6000 सा.सं.पू. से ) पशुध न, अनाज, नमक , —
कपड़ा
2. वस्तु-मुद ा (लगभग 1000 सा.सं.पू. से ) कौड़ी हल्क , गनने योग्य, टकाऊ, नकल करना
क ठन
3. धातु िसक्के (लगभग 600 सा.सं.पू. से ) लोहे, चाँद ी, सोने व ताँबे के अं कत और प्रमा णत मूल्य; अं कत मूल्य म
िस क्के वभाज्य
4. कागजी मुद ा (भारत में 18वी ं शताब्दी के अंत से ; सरकारी बैक
ं नोट धातु से कह हल्क ; बड़ी रा श ले जाना और
कागजी मुद ा 1861) रखना सरल
5. िडिजटल मुद ा (1980 से ) क्र
डेिबट व े िडट काड, नेट मुद्रा बना ढोए स्थानांत रत होती है
बैिं कं ग
6. यू.पी.आई. (2016 से ) मोबाइल भुग तान, तत्काल, नकद र हत, छोटे -से-छोटे वक्रेता के
क्यू.आर .कोड लए भी सुलभ
रूप के साथ-साथ मु ा के पीछे का अ धकार भी बदला। प्राचीन सक्के अलग-अलग शासक जारी करते थे; आज केवल भारतीय
रजव बक मुद्रा जारी कर सकता है और कसी अन्य के लए ऐसा करना वैधा नक नह है।
प्र.5 प्राचीन काल म कौन-से कदम उठाए गए ह गे जससे भारतीय सक्के व भन्न दे श म व नमय का माध्यम बन
सक?
दूर के बंदरगाह म कसी अजनबी को सक्के पर वश्वास हो, इसके लए शासक को उसे वश्वसनीय, पहचानने योग्य और
वांछनीय बनाना पड़ता। संभा वत कदम —
1. धातु क मात्रा स्थर रखना। हर पण म चाँद या सोने का भार और शुद्धता समान हो, ता क वदे शी व्यापारी हर सक्का परखे
बना स्वीकार कर सके।
2. सक्के ढालने पर कड़ा नयंत्रण। चूँ क यह पूणतया शासक के नयंत्रण म था, नकली सक्क पर दं ड दे कर सक्के क प्र तष्ठा
बचाई जा सकती थी।
3. स्पष्ट और सुप्र सद्ध चह्न का प्रयोग। अं कत रुपा — राज चह्न, वराह, बाघ — हस्ताक्षर जैसा काम करता, जसे हर व्यापारी
पहचानना सीख लेता।
4. टकाऊ मश्रधातु का प्रयोग। मश्रधातु से सक्का इतना कठोर बनता क वष क यात्रा म घसे नह ।
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5. मानक अं कत मूल्य जारी करना। छोटे और बड़े सक्क का प रवार होने से मसाले क छोट बक्र और जहाज भर माल —
दोन का भुगतान एक ही मुद्रा म हो पाता।
6. सक्क के पीछे वास्त वक व्यापार। सक्के वदे श म तभी स्वीकार होते ह जब दे श के पास वां छत वस्तुएँ ह । भारत क काली
मच, मसाले, वस्त्र, मनके और मोती ही उसके सक्क क श क्त थे।
7. व्यापार-माग और बंदरगाह क सुरक्षा। सुर क्षत बंदरगाह और अन्य राज्य से सं ध या मैत्रीपूण संबंध व्यापा रय को
आक षत रखते।
8. बदले म वदे शी सक्के स्वीकार करना। पुड्डूकोटाई म मले रोमन स्वण सक्के दखाते ह क व नमय दोन दशाओं म चलता
था — पारस्प रक स्वीकृ त से ही सीमा-पार मुद्रा चलती है।
ऐसा क्य होता है: सक्का एक वचन है। वचन उतनी ही दूर जाता है जतनी दूर वचन दे ने वाले क प्र तष्ठा। जन
श क्तशाली शासक क सक्का-प्रणाली स्थर और ईमानदार थी, उनके सक्के ‘अपने राज्य के अलावा अन्य राज्य
म भी’ स्वीकृत हुए।
प्र.6 अथशास्त्र क नम्न ल खत पं क्तयाँ पढ़ — ‘60 पण का एक वष का वेतन प्र त दन एक अधक अनाज से
प्र तस्था पत हो सकता था, जो चार बार के भोजन के लए पयाप्त था...’ (एक अधक लगभग 3 कलो ाम के
बराबर होता है)। यह एक पण के मूल्य के वषय म क्या बताता है? पड़ोसी क सहायता न करने क दं ड 100 पण
था। इसक तुलना वा षक वेतन से कर। इससे आप मानवीय मूल्य के बारे म क्या नष्कष नकाल सकते ह, जो
इसके माध्यम से प्रोत्सा हत कए जा रहे थे?
भाग 1 — एक पण का मूल्य। पहले वष भर के वेतन के बराबर अनाज नका लए, फर भाग द जए।
एक वष का अनाज = 1 अधक × 365 िदन = 365 अधक
365 अधक × 3 िकगा = 1,095 िकगा अनाज पित वष
यही 60 पणों के बराबर है।
अतः 1 पण = 365 ÷ 60 = ≈ 6.08 अधक
= 6.08 × 3 िकगा = ≈ 18.25 िकगा अनाज
अथात् एक पण लगभग 18 कलो ाम अनाज के बराबर था — लगभग छह दन का भोजन (एक अधक एक व्य क्त के चार
बार के भोजन, अथात् एक पूरे दन के लए पयाप्त था)। स्पष्ट है क पण कोई छोटा सक्का नह , ब ल्क पयाप्त मूल्य का सक्का
था।
भाग 2 — दं ड क वा षक वेतन से तुलना।
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पड़ ोसी की सहायता न करने का दंड = 100 पण
वािषक वेत न = 60 पण
अनुपात = 100 ÷ 60 = ≈ 1.67
अथ त् दंड ≈ 1 वष 8 महीने का पूरा वेत न
अनाज में : 100 × 18.25 िकगा ≈ 1,825 िकगा — लगभग दो टन
मानवीय मूल्य के बारे म नष्कष। वष भर क कमाई से लगभग दोगुना दं ड कमर तोड़ दे ने वाला है — इससे पूरा प रवार उजड़
सकता था। दं ड इतना ऊँचा रखना जान-बूझकर कया गया नणय है और अथशास्त्र के समाज के वषय म बहुत कुछ कहता है —
पड़ोसी क सहायता कतव्य थी, कृपा नह । यह कर या ऋण क भाँ त कानून से लागू क जा सकती थी।
समाज व्य क्त से पहले था। जहाँ न पु लस थी, न अस्पताल, न बीमा — वहाँ पड़ोसी क सहायता ही एकमात्र सुरक्षा-कवच
थी; उसे नकारना सबके लए संकट था।
दं ड का आकार मूल्य का आकार बताता है। राज्य ने उदासीनता को संप त्त के अनेक अपराध से भी अ धक महँगा बना
दया।
करुणा, सहयोग और सामा जक उत्तरदा यत्व को सुव्यव स्थत राज्य क न व माना गया।
स्वयं जाँ चए: यही भावना आधु नक भारतीय कानून म भी जी वत है — दुघटना पी ड़त क सहायता से इनकार
करना या च कत्सक ारा आपात उपचार से मना करना दं डनीय है। मूल्य सक्के से भी अ धक टकाऊ नकला।
प्र.7 एक नाटक ल खए और उसका मंचन क जए जसम यह दखाया जाए क लोग एक-दूसरे को कौड़ी, कवच
(और ऐसी अन्य वस्तुओं) को व नमय के माध्यम के रूप म प्रयोग करने के लए कैसे तैयार कर सके ह गे?
अ े नाटक म क्या होना चा हए। पहले समस्या, फर वचार, फर आप त्त, फर सहम त। दशक नाटक दे खकर वस्तु व नमय क
कम से कम तीन सीमाएँ बता सक। पाँच-छह पात्र, पाँच से सात मनट, और एक सूत्रधार।
पात्र: सूत्रधार · मीरा (कुम्हार) · कान्हा (मछु आरा) · दे वी (बुनकर) · बूढ़े गोपाल (गाँव के बुजुग) · तट से आया ना वक।
नमूना नाटक — “वह कौड़ी जो सबको चा हए थी”
दृश्य 1 — प्रात:काल का हाट। वस्तु व नमय असफल होता है।
सूत्रधार: बहुत पहले, नद कनारे एक गाँव था जहाँ सक्के नह थे। जो चा हए, उसके बदले कुछ दे ना पड़ता था।
मीरा: मछली के बदले एक घड़ा ले लो, कान्हा! एक अ ा घड़ा, दो मछ लय के बदले।
कान्हा: पर मुझे घड़ा नह चा हए, मीरा। मुझे कपड़ा चा हए। मेरा कुरता फट गया है।
मीरा: तो मेरा घड़ा दे वी को दे आओ और उसका कपड़ा मुझे ला दो!
दे वी: कपड़ा मेरे पास है, पर मुझे घड़ा भी नह चा हए। मुझे अनाज चा हए — और फसल से पहले कसी के पास अनाज नह
है।
कान्हा (दशक से): तो साँझ तक मेरी मछ लयाँ सड़ जाएँगी, और कुरता वैसे ही फटा रहेगा।
दृश्य 2 — ना वक एक वचार लेकर आता है।
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ना वक: बंदरगाह के नगर म कोई ऐसा झगड़ा नह करता। हम कौड़ी का प्रयोग करते ह। (मुट्ठ भर कौ ड़याँ दखाता है) जो
बेचो, कौड़ी लो। जो खरीदो, कौड़ी दो।
दे वी: पर कौड़ी न खाई जा सकती है, न पहनी। इसका क्या लाभ?
ना वक: यही तो इसका लाभ है। यह इतनी छोट है क सौ कौ ड़याँ एक हाथ म आ जाती ह। यह सड़ती नह , इस लए वष भर
रखी जा सकती है। और सब एक-सी ह, इस लए बहस के बदले गनती से काम चल जाता है।
दृश्य 3 — आप त्त और उसका उत्तर।
बूढ़े गोपाल: और य द म अनाज के बदले कौड़ी ले लूँ और कल कोई इसे स्वीकार ही न करे? तब तो मने अपनी पूरी फसल
कंकड़ के बदले बेच द !
ना वक: तो आइए, आज पूरे गाँव के सामने हम सब मलकर वचन द। जब सब इसे स्वीकार करगे, तो कसी क हा न नह
होगी।
मीरा: मुझे स्वीकार है। एक घड़े क दस कौड़ी।
कान्हा: एक मछली क तीन कौड़ी।
दे वी: एक थान कपड़े क बीस कौड़ी।
बूढ़े गोपाल: तो यह तय रहा। आज से इस गाँव का व्यापार कौ ड़य म होगा। (वे कान्हा को मछली के बदले कौ ड़याँ दे ते ह;
कान्हा दे वी को कपड़े के बदले कौ ड़याँ दे ता है; दे वी फसल के बाद अनाज के लए कौ ड़याँ सँभालकर रखती है।)
सूत्रधार: हाट म कुछ नह बदला था — वही मछली, वही घड़े, वही कपड़ा। बस अब एक ऐसी वस्तु थी जसे हर कोई लेने को
तैयार था। मुद्रा का आरंभ इसी प्रकार होता है।
संकेत: पूरे नाटक क सबसे महत्वपूण पं क्त बूढ़े गोपाल क आप त्त है। मुद्रा केवल इस लए चलती है क्य क सब
उसे स्वीकार करने पर सहमत ह — इस लए नाटक का नणायक क्षण कौ ड़य का दखना नह , ब ल्क गाँव का
मलकर सहमत होना होना चा हए।
प्र.8 भारत म भारतीय रजव बक (आर.बी.आई.) ही कागजी मु ा को छापने व वतरण करने का एकमात्र वैधा नक
ोत है। नोट क अवैध छपाई और उनके दुरुपयोग को रोकने के लए भारतीय रजव बक ने कई सुरक्षा कदम
उठाए ह। पता लगाइए क ऐसे कुछ उपाय कौन-से ह और अपनी कक्षा म उनक चचा क जए।
पता कैसे लगाएँ: असली नोट को प्रकाश के सामने रखकर और तरछा करके दे खए; भारतीय रजव बक के ‘अपने बक नोट
पहचा नए’ चाट से मलाइए (यह अनेक बक पासबुक के पीछे भी छपा होता है); बक के खजांची से प्रदशन कराइए।
भारतीय बक नोट क मुख्य सुरक्षा वशेषताएँ —
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वशेषता कैसे जाँच यह नकल क्य रोकती है
mपकाश के सामने रिखए — कागज के भीतर महात्मा गांधी का as e
वॉटरमाक
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यह कागज पर छपा नह , कागज म बना होता
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aसुgरक्षाl धागा नोट में से ग ज
ु रती धातु की प ी, िजस पर ‘भारत’ और ‘RBI’ कसी प्रटर या फोटोकॉपी से नह बनाया जा
िलखा है; ितरछा करने पर रंग बदलता है सकता
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रंग बदलने वाली
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नोट ितरछा कीिजए — अंक हरे से नीला हो जाता है स्कैन क गई नकल म रंग एक-सा ही रहता है ag
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नोट को आँख के स्तर पर सीधा रिखए — िछपा हुआ अंक िदखाई इसके लए वशेष इंटै ग्लयो छपाई चा हए
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नकल करने पर येeधब्बे
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सूक्ष्म अक्षर आवध क ले ंस से ‘RBI’ और अंिकत मूल्य बहत
ु छोटे अक्षरों में
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िदखते है ं
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इंaटैिग्लयो (उभरी)
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िचत्र और पतीक पर उँ ग ली फे िरए — वे उभरे हुए लगते है ं साधारण छपाई सपाट होती है
छपाई
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पितदीिप्त पराबैगं नी पकाश में संख्या प ी और रे शे चमकते है ं इसके लए वशेष स्याही और कागज चा हए
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आर-पार िमलान अंक का आधा भाग आगे और आधा पीछे है; पकाश में दोनों ठीक आगे-पीछे क छपाई का बल्कुल सट क
िमल जाते है ं मलान क ठन है
क्रम संख्या
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िवशेष कागज व क्रम कपास आधािरत कागज; हर नोट पर अलग बढ़ ती हुई यह कागज बाजार म बकता ही नह ; दोहरी
संख्या
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संख्या तुरंत पकड़ी जाती है
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m क. चचा के बदु: नकली नोट केवल लेने वाले के वरुद्ध नह , पूरे समाज के वरुद्धaअपराध क्य है? नोट नकली लगे तो क्या
se चा हए? कानून केवल एक ही संस्था — भारतीय रजव बक — को मुद्रा जारी करने क अनुम त क्य देता है?
कक्षा
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करना
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omवश्वास पर आक्रमण करते ह, इस लए नोट पर ऐसी अनेक
ऐसा क्य होता है: कागज स्वयं म लगभग मूल्यहीन है; ₹500 का नोट केवल इस लए मूल्यवान है क्य क लोग को
रजव बक के वचन पर वश्वास है। नकली नोट.c g l a
emे लए सरल और नकल करना अपराधी के लए अत्यंत महँगा हो।
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वशेषताएँ रखी जाती ह जन्ह जाँचनाaआपक
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s e m उनसे पू छए क वे भुगतान
comकरने या प्राप्त करने म नकद या यू.पी.आई. म कसको वरीयता दगे और a?
अपने प रवार के कुछ सदस्य और स्थानीय दुकानदार का साक्षात्कार ली जए और
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साक्षात्कार कैसे ल। अलग-अलग आयु और व्यवसाय के छह-आठ व्य क्त चु नए — दादा-दाद , माता- पता, सब्जी वक्रेता, चाय
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क दुकान वाले, दवा क दुकान, ऑटो चालक। पहले अनुम त ली जए, टप्पणी लखते जाइए और सबसे एक जैसे प्रश्न पू छए ता क
s e m ऐसा क्य पसंद करते ह?”), संकेत देने वाले नह ।
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उत्तर क तुलना हो सके। खुले प्रश्न पू छए (“आप
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एक अ भलेख-पत्र इस प्रकार बनाइए
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व्य क्त आयु वग वरीयता मुख्य कारण मुख्य चता
दादी 70+ नकद दे ख और गन सकती ह; अभ्यास है गलत बटन दब जाने का भय
सब्जी िवक्रेता 40 वष के आस- दोनों यू.पी.आई. से खुले पैसे ढूँ ढ़ने क परेशानी मंडी म नेटवक कमजोर
पास नह
दवा की 30 वष के आस- यू.पी.आई. अपने आप हसाब दज; नकली नोट का भय व्यस्त समय म सवर बंद
दुक ान पास नह
ऑटो चालक 50 वष के आस- नकद ईंधन के लए हाथ म पैसा चा हए बक से नकालने म समय लगता
पास है
लोग प्रायः क्या कहते ह —
यू.पी.आई. पसंद करने के कारण नकद पसंद करने के कारण
वषम रा श पर खुले पैसे क समस्या नह मोबाइल , नेटवक या िबजली के िबना भी चलता है
सुर क्षत — दुकान म बड़ी रा श नह रखनी पड़ती बुजगु ं और मोबाइल से अपिरिचत लोगों के िलए सरल
हर भुगतान अपने आप दज हो जाता है गलत खाते में भेजने या ले न-दे न असफल होने का डर नही ं
तत्काल, और ₹10 के लए भी काम आता है पैस ा तुर ंत अगले क्रय के िलए उपल ब्ध
नकली नोट का कोई भय नह व्यय आँखों के सामने िदखता है, इसिलए िनयंत्र ण सरल
नमूना उत्तर: “मने छह व्य क्तय से बात क । उनम चालीस वष से कम आयु के चार ने यू.पी.आई. को वरीयता द , मुख्यतः इस लए
क खुले पैसे क समस्या नह रहती और हसाब अपने आप दज हो जाता है। दो बुजुग ने नकद चुना; दाद ने कहा क वे अपना पैसा
दे खना चाहती ह, और ऑटो चालक ने कहा क उन्ह पे ोल के लए हाथ म नकद चा हए। लगभग सभी दोन का प्रयोग करते ह।
यू.पी.आई. क सबसे आम शकायत नेटवक का न चलना थी और नकद क सबसे आम शकायत खुले पैसे क ।”
संकेत: नष्कष प्रस्तुत करते समय उत्तर को आयु के अनुसार समूह म बाँ टए। अ धकांश कक्षाओं म सबसे स्पष्ट
प्रवृ त्त यही मलती है क वरीयता आयु और स्माटफोन होने पर नभर करती है, आय पर नह ।
अध्याय — एक नज़र म
मुद्रा के अ स्तत्व म आने से पहले लोग वस्तुओं और सेवाओं का व नमय सीधे अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं से करते थे। इसे वस्तु
व नमय प्रणाली (बाटर सस्टम) कहते ह। कौड़ी, कवच, नमक, चायपत्ती, तंबाकू, कपड़ा, पशुधन और बीज इसम प्रयोग
होते थे।
वस्तु व नमय क पाँच सीमाएँ थ — आवश्यकताओं का संयोग, मूल्य के सामान्य मानक माप का अभाव, वभाज्यता,
सुवाह्यता और टकाऊपन।
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मुद्रा ने इन पाँच समस्याओं का समाधान कया। यह व नमय का माध्यम है, मूल्य मापने का सामान्य अं कत मूल्य है, मूल्य के
संग्रहण का साधन है और स्थ गत भुगतान का मानक भी है।
प्राचीन भारतीय सक्के सोने, चाँद , ताँबे या उनक मश्रधातु से बनते थे। उन्ह काषापण या पण कहा जाता था और उन पर
अं कत चह्न को रुपा कहते थे। सक्के ढालना पूणतया शासक के नयंत्रण म था।
कागजी मुद्रा पहली बार चीन म प्रयोग हुई और भारत म 18व शताब्द के अंत म आई। आज भारत म केवल भारतीय रजव
बक ही मुद्रा जारी कर सकता है।
यह यात्रा आज भी जारी है — लगभग 1980 से डे बट व क्रे डट काड और 2016 से यू.पी.आई. ने मुद्रा को अमूत बना दया है,
जसे हम छू भी नह सकते।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म कहाँ उदाहरण
वस्तु व नमय प्रणाली मुद ा का पयोग िकए िबना वस्तुओ ं और पृष्ठ 230, व नमय का आपका अ त रक्त रबर, सहपाठ क
से वाओं का आदान-पदान सबसे प्रारं भक रूप अ त रक्त प सल के बदले
वस्तुएँ व्यापार योग्य उत्पाद जो क्रय या िवक्रय पृष्ठ 230, मुद्रा से पहले कौड़ी, कवच, नमक, चायपत्ती, तंबाकू, कपड़ा,
की जा सकती है ं प्रयुक्त वस्तुएँ पशुधन, बीज
आवश्यकताओं का दोनों व्यिक्तयों के पास ठीक वही वस्तु हो पृष्ठ 233, कसान क बैल वाले को ऐसा मोची चा हए जसे बैल क
संयोग जो दू स रे को चािहए क ठनाई आवश्यकता हो
मूल्य का सामान्य मूल्य का ऐसा मानक िजस पर सभी पृष्ठ 233, व नमय क्य एक स्वेटर कतने बोरे गे ँ के बराबर है?
मानक माप सहमत हों टू ट जाता है
वभाज्यता िकसी वस्तु का टुक ड़ों या भागों में पृष्ठ 233, बैल क बैल का कुछ हस्सा स्वेटर के बदले नह दया
िवभािजत हो सकने का ग ण
ु समस्या जा सकता
सुवाह्यता िकसी वस्तु को सरलता से एक स्थान से पृष्ठ 233, बैल को हर गे ँ के बोरे तीन अलग-अलग वक्रेताओं तक
दू स रे स्थान ले जाने की समथता जगह ले जाना ढोना
टकाऊपन क्षित सहकर लंबे समय तक संग ृहीत रह पृष्ठ 233, गे ँ सड़ जाता अनाज खराब हो जाता है, सक्का नह
सकने का ग ण
ु है या चूहे खा जाते ह
सक्के ढालना वह पिक्रया िजससे िसक्कों का उत्पादन पृष्ठ 237, सक्का- प्राचीन भारत म यह पूणतया शासक के
( म टग) होता है प्रणाली नयंत्रण म था
मश्रधातु दो या दो से अिधक धातु तत्वों के िमश्रण पृष्ठ 238, सक्के कससे आज के सक्के अ धकतर लोहे क मश्रधातु
से बनी धातु बनते ह के, जनम क्रो मयम, स लकॉन व काबन ह
काषापण / पण सोने, चाँद ी, ताँबे या उनकी िमश्रधातु से पृष्ठ 238, सक्का- त मल, तेलुगु व मलयालम म ‘पणं’ और कन्नड़
बने पाचीन भारतीय िसक्के प्रणाली म ‘हण’ आज भी प्रच लत
रुपा पाचीन िसक्कों पर अंिकत िचह्न पृष्ठ 238 संभवतः ‘रुपया’ शब्द का मूल
शीष / पृष्ठ (ऑबवस िसक्के का मुख्यिचत्र वाला भाग और पृष्ठ 239 चालुक्य सक्के — एक ओर वराह, दूसरी ओर
/ रवस) उसका िपछला भाग त्रस्तरीय छत्र
करसी िकसी दे श में पयोग की जाने वाली मुद ा पृष्ठ 241 भारत म रुपये के सक्के और नोट
की पणाली
अं कत मूल्य वह इकाई िजसमें िसक्कों एवं नोटों को पृष्ठ 240 50 पैसे, ₹1, ₹2, ₹5, ₹10 के सक्के; ₹10
वग कृ त िकया जाता है से ₹500 तक के नोट
क्यू.आर.कोड काले -सफे द वग ं का संग ह िजसमें पृष्ठ 243, कृष्णप्पा का स्कैन क जए और सीधे वक्रेता के बक खाते म
पाप्तकत के बैक
ं खाते की जानकारी फल का ठे ला भुगतान क जए
होती है
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