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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 1: वयं वणमालां पठामः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
1 – 24 6 19 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 1: वयं वणमालां पठामः
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के प्रथमः पाठः — वयं वणमालां पठामः के सभी प्रश्न और ग त व धय के पूरे हल। यह पाठ
संस्कृत वणमाला का प रचय दे ता है — स्वर (समानाक्षर तथा सन्ध्यक्षर), व्यञ्जन (स्पश, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह), गु णताक्षर और वण के छह
उ ारण-स्थान। पृष्ठ 1 से 24 तक क हर ता लका और हर शीषक — वदामः लखामः च, अभ्यासं कुमः, वयं शब्दाथान् जानीमः, वयम् अभ्यासं
कुमः, योग्यता वस्तरः और प रयोजनाकायम् — क्रम से हल कया गया है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 1 – 24
खं ड प्रश्न
6 19
माध्यम
हन्द
वदामः लखामः च — पृष्ठ 4–9
गु णताक्षरा ण
गु णताक्षरा ण
प्र.1 व्यञ्जनैः सह सवषाम् अ प स्वराणां संयोजनं भव त । व्यञ्जनैः सह स्वराणां संयोजनेन गु णताक्षरा ण भव न्त —
क-वगस्य च-वगस्य च रक्तकोष्ठका न पूरयन्तु (पृष्ठ 4, 5)।
व्यञ्जन के साथ स्वर क मात्रा जोड़ने से गु णताक्षर बनता है। नयम एक ही है —
क् + अ = क
क् + आ (◌ा) = का
क् + इ (ि◌) = िक
क् + ऋ (◌ृ) = कृ
क् + औ (◌ौ) = कौ
इसी नयम से क-वगः और च-वगः क पूरी ता लका इस प्रकार बनेगी —
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व्यञ्जनम् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ए ऐ ओ औ
क् क का िक की कु कू कृ कॄ कॢ के कै को कौ
ख् ख खा िख खी खु खू खृ खॄ खॢ खे खै खो खौ
ग् ग गा िग गी गु गू गृ गॄ गॢ गे गै गो गौ
घ् घ घा िघ घी घु घू घृ घॄ घॢ घे घै घो घौ
ङ् ङ ङा िङ ङी ङु ङू ङृ ङॄ ङॢ ङे ङै ङो ङौ
च् च चा िच ची चु चू चृ चॄ चॢ चे चै चो चौ
छ् छ छा िछ छी छु छू छृ छॄ छॢ छे छै छो छौ
ज् ज जा िज जी जु जू जृ जॄ जॢ जे जै जो जौ
झ् झ झा िझ झी झु झू झृ झॄ झॢ झे झै झो झौ
ञ् ञ ञा िञ ञी ञु ञू ञृ ञॄ ञॢ ञे ञै ञो ञौ
ऐसा क्य होता है: ‘क्’ अकेला व्यञ्जन है — उसे बोलने के लए साँस को कह रोकना पड़ता है और छोड़ने के
लए स्वर चा हए। इसी लए पुस्तक कहती है — “व्यञ्जनानाम् उ ारणे कस्य चत् स्वरस्य सहायतायाः अपेक्षा
अवश्यं भव त।” वणमाला म हम ‘क’ लखते ह, पर असली व्यञ्जन तो केवल क् है; ‘अ’ केवल बोलने के लए
जोड़ा गया है।
ध्यान द: ‘अ’ क कोई मात्रा नह होती — इसी लए पृष्ठ 4 क ता लका म ‘अ’ के नीचे का मात्रा-कोष्ठक खाली छोड़ा
गया है।
प्र.2 ट-वगस्य त-वगस्य प-वगस्य च गु णताक्षरा ण लखन्तु (पृष्ठ 6, 7)।
वही नयम — व्यञ्जन + स्वर-मात्रा। तीन वग क पूरी ता लका —
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व्यञ्जनम् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ए ऐ ओ औ
ट् ट टा िट टी टु टू टृ टॄ टॢ टे टै टो टौ
ठ् ठ ठा िठ ठी ठु ठू ठृ ठॄ ठॢ ठे ठै ठो ठौ
ड् ड डा िड डी डु डू डृ डॄ डॢ डे डै डो डौ
ढ् ढ ढा िढ ढी ढु ढू ढृ ढॄ ढॢ ढे ढै ढो ढौ
ण् ण णा िण णी णु णू णृ णॄ णॢ णे णै णो णौ
त् त ता ित ती तु तू तृ तॄ तॢ ते तै तो तौ
थ् थ था िथ थी थु थू थृ थॄ थॢ थे थै थो थौ
द् द दा िद दी दु दू दृ दॄ दॢ दे दै दो दौ
ध् ध धा िध धी धु धू धृ धॄ धॢ धे धै धो धौ
न् न ना िन नी नु नू नृ नॄ नॢ ने नै नो नौ
प् प पा िप पी पु पू पृ पॄ पॢ पे पै पो पौ
फ् फ फा िफ फी फु फू फृ फॄ फॢ फे फै फो फौ
ब् ब बा िब बी बु बू बृ बॄ बॢ बे बै बो बौ
भ् भ भा िभ भी भु भू भृ भॄ भॢ भे भै भो भौ
म् म मा िम मी मु मू मृ मॄ मॢ मे मै मो मौ
लखते समय सावधानी: ‘ि◌’ क मात्रा अक्षर के पहले लखी जाती है पर बोली बाद म जाती है — इस लए ‘ ट’
को ‘इट् ’ नह , ट ही प ढ़ए। इसी तरह ‘◌ु’ और ‘◌ू’ अक्षर के नीचे तथा ‘◌े ◌ै ◌ो ◌ौ’ ऊपर लगती ह।
प्र.3 अन्तःस्थानाम् (य र ल व) ऊष्मणां (श ष स ह) च वणानां गु णताक्षरा ण लखन्तु (पृष्ठ 8, 9)।
अन्तःस्थ और ऊष्म वण क पूरी ता लका —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः
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व्यञ्जनम् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ए ऐ ओ
य m या ये lasयैe
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य् िय यी यु यू यृ यॄ यॢ यो यौ
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g l a रा िर री रु रू रृ रॄ रॢ रे रै रो रौ
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ल् ल ला िल ली लु लू लृ लॄ लॢ ले लै लो लौ
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व वा िव वी वु
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श् श शा िश aशीg शु शू शृ शॄ शॢ शे शै शो शौ
ष षा िष षी षु षू षृ षॄ षॢ षे षै
co mषो षौ
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स् स सा िस सी सु सू सॄ सॢ सो सौ
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ह् ह हा िह ही हु हू हृ हॄ हे है हो हौ
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पुस्तक क टप्पणी (पृष्ठ 9): “ऋ, ॠ, र — एता न त्री ण गु णताक्षरा ण क्रमेण इत्येवम प प्रकारान्तरेण लख्यन्ते।”
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अथात् ‘र्’ म ऋ, ॠ और ऌ जोड़ने पर बने ये तीन अक्षर छपाई म दूसरे ढं ग से भी लखे जाते ह — ‘ऋ’ के ऊपर
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रेफ (र् का चह्न) लगाकर। दोन रूप शुद्ध ह।
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‘अन्तःस्थ’ नाम क्य : ये वण स्वर और व्यञ्जन के बीच म पड़ते ह, इस लए इन्ह ‘अध-स्वराः’ भी कहा जाता है। ये
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अकसर स्वर क जगह ले लेते ह — इ→य्, ऋ→र्, ऌ→ल्, उ→व्। इसी से बनता है: य द + अ प = यद्य प, पतृ +
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आ ा = पत्रा ा, ऌ + आकृ तः = लाकृ तः, सु + आगतम् = स्वागतम्।
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अयोगवाहानाम् — अनुस्वारेण (◌ं) वसगण (◌ः) च सह स्वराणां तथा ‘क् + स्वरः + ◌ं’, ‘ख् + स्वरः + ◌ः’
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प्र.4
इत्येतयोः रक्तकोष्ठका न पूरयन्तु (पृष्ठ 8)।
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पहले स्वर के साथ —
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अयोगवाहः अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऐ ओ औ
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◌ंc(अनुस्वारः)
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ॠंag ऌं
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अं आं इं ईं उं ऊं ऋं एं ऐं ओं औं
agl अः आः इः ईः उः ऊः ऋः ॠः ऌः एः ऐः ओः औः
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◌ः ( वसगः)
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m a
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अब पृष्ठ 8 क नीचे वाली दो पं क्तयाँ, जनम व्यञ्जन + स्वर + अयोगवाह जुड़ता है। पुस्तक म हर पं क्त के पहले दो खाने भरे हुए
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ह, शेष चार आपको भरने ह —
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पङ् क्तः अ आ इ ई उ ऊ
क् + स्वरः + ◌ं कं कां िकं की ं कुं कूं
ख् + स्वरः + ◌ः खः खाः िखः खीः खुः खूः
अयोगवाह क खूबी: बाक व्यञ्जन म उ ारण के लए ‘अ’ बाद म जोड़ा जाता है (क् + अ = क), पर अनुस्वार
और वसग म ‘अ’ पहले जुड़ता है — अ + ◌ं = अं और अ + ◌ः = अः। असली वण तो केवल ‘◌ं’ और ‘◌ः’ ही ह।
पुस्तक के शब्द म — “अत्र उ ारणाथ अ स्वरस्य संयोजनं पूव भव त, न तु प ात्।”
नाम का अथ: ‘अयोगवाह’ = जो कसी वग के योग म नह आता, फर भी अथ को वहन करता है। ये न स्वर ह, न
स्पश-अन्तःस्थ-ऊष्म म गने जाते ह।
अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 9
गु णताक्षरा ण
अभ्यासं कु मः
प्र.1 अभ्यासं कुमः — रक्तकोष्ठका न पूरयन्तु (पृष्ठ 9 के नीचे दए गए सात-सात खाने)।
ये खाली खाने पृष्ठ 8 क उन्ह दो पं क्तय को आगे बढ़ाते ह — ऊपर क बगनी पं क्त अनुस्वार क है (क् + स्वरः + ◌ं) और नीचे
क भूरी पं क्त वसग क (ख् + स्वरः + ◌ः)। ऊपर जो सात स्वर-स्तम्भ दए ह — ऋ ॠ ऌ ए ऐ ओ औ — उन्ह के अनुसार भ रए।
पङ् क्तः ऋ ॠ ऌ ए ऐ ओ औ
क् + स्वरः + ◌ं कं ृ कंॄ कं ॢ के ं कै ं कों कौं
ख् + स्वरः + ◌ः खृः खॄः खॢः खेः खैः खोः खौः
पुस्तक क एक असंग त: पृष्ठ 9 पर ‘ऌ’ वाले स्तम्भ म ॡं और ॡः छपा है, जब क पृष्ठ 1 का नयम कहता है —
“॥ ‘ऌ’-वणस्य द घाः न स न्त ॥”। नयम के अनुसार वहाँ ऌं और ऌः ही होना चा हए। परीक्षा म अपनी पुस्तक का
रूप ल खए और यह नयम भी साथ लख द जए।
अभ्यास का तरीका: हर खाना भरने के बाद उसे ज़ोर से बो लए — क् + ऋ + ◌ं = ‘कृं’। संस्कृत म लखना और
बोलना साथ-साथ चलता है; इसी लए पुस्तक का शीषक ही है ‘वदामः लखामः च’ — हम बोलते भी ह और
लखते भी ह।
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वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 10–11
शब्दाथाः
शब्दाथाः
प्र.1 मातृभाषया अथ लखन्तु — (शब्दः / अथः / हन्द / English ता लकायाः अ न्तमः स्त ः, पृष्ठ 10–11)।
यह स्तम्भ आपको अपनी मातृभाषा म भरना है — जो भाषा आप घर म बोलते ह ( हन्द , मराठ , त मल, बांग्ला, गुजराती,
अस मया…)। नीचे पूरी सूची संस्कृत अथ और हन्द अथ के साथ द गई है; अ न्तम स्तम्भ म अपनी भाषा का शब्द ल खए।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
पत्रा ा िपतुः आदे शः पता का आदे श Father’s order
लाकृ तः ‘ऌ’-वणस्य आकृ ितः ‘ऌ’-वण का रूप Shape of letter ‘ऌ’
एकैकः पत्येकम् हर एक Each one
अजः छागः बकरा Goat
वधूः पिरणीता ववा हता नारी Married woman
मातॄणाम् मातुः ऋणम् माता का ऋण Indebtedness to Mother
कप्तम् कि पतम् माना हुआ Supposed
ऌकारः ‘ऌ’-वणः ‘ऌ’ वण Letter ‘ऌ’
ओम् पणवः एकाक्षर ब्रह्म Name of Brahma
औषधम् भेषजम् औषध, दवा Medicine
ज ा रसना जीभ Tongue
नामधेयम् नाम नाम Name
भ गनी स्वसा बहन Sister
ाता अनुजः / अगजः भाई Brother
पतामही िपतुः माता दाद Paternal Grandmother
पतामहः िपतुः िपता दादा Paternal Grandfather
मातामही मातुः माता नानी Maternal Grandmother
मातामहः मातुः िपता नाना Maternal Grandfather
सु ीः कु मारी कुमारी Miss
ीः ल क्ष्मीः, सुन्दरता लक्ष्मी, सौन्दय Goddess of prosperity
उपा धः िविशष्टता वशेषता Title
प्रथम-नाम मुख्यं नाम पहला नाम First Name
मध्य-नाम मध्यवि नाम बीच का नाम Middle Name
अन्त्य-नाम अिन्तम-नाम अ न्तम नाम Last Name
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
कुल-नाम कु ल स्य गोत्रस्य वंशस्य वा नाम कुल, गोत्र या वंश का नाम Family Name
नमूना उत्तर (मातृभाषा — मराठ ): अजः = बोकड, वधूः = नवरी/ ववा हत स्त्री, ज ा = जीभ, भ गनी = बहीण,
ाता = भाऊ, पतामहः = आजोबा, मातामही = आजी, औषधम् = औषध।
नमूना उत्तर (मातृभाषा — त मल): अजः = ஆடு, ज ा = நாக்கு, भ गनी = சேகாதர , ाता =
சேகாதரன் , औषधम् = மருந் து।
इन शब्द को यह क्य रखा गया: ध्यान द जए — पत्रा ा, लाकृ तः, मातॄणाम्, कप्तम्, ऌकारः, ओम्,
औषधम्, एकैकः — इन सबम वही क ठन स्वर आते ह जो अभी-अभी सीखे: ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ। यानी
शब्दावली भी वणमाला का ही अभ्यास करा रही है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 11–14
अभ्यासः
अभ्यासः
प्र.1 कस्य चत्रम् ? वदन्तु लखन्तु च — (प्रथमं चत्रम् — गणेशः)
पृष्ठ 11 पर दस चत्र दो स्तम्भ म ह। पहला उत्तर पुस्तक ने दे दया है — गणेशः। शेष इस प्रकार ह —
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क्रमः चत्रम् उत्तरम् (संस्कृतम्) हन्द
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1 (वामे)
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गणेश जी गणेशः
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गणेश ( दया हुआ)
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2 (द क्षणे) नाक नािसका नाक (‘ ाणम्’ भी कह सकते ह)
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3 (वामे) कबूतर कपोतः कबूतर (‘पारावतः’ भी शुद्ध है)
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4 (द क्षणे) भारत का मान चत्र भारतम् भारत (‘भारतस्य मान चत्रम्’)
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5 (वामे) धनुष-बाण धारण कए ीराम
agl रामः राम (‘ ीरामः’)
com
6 (द क्षणे) डमरू डमरुः डमरू
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मृगः
a s emभी शुद्ध है)
com agl(‘दव ’ भी कह सकते ह)
7 (वामे) हरन हरन (‘ह रणः’
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8 (द क्षणे) चम्मच चमसः चम्मच
agl9 (वामे) अ ग्न म आहु त दे ता हाथ हवनम् हवन (‘य ः’ भी शुद्ध है)
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10 (द क्षणे) पैर पादः पैर (‘चरणः’ भी शुद्ध है)
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पूरे वाक्य म उत्तर दे ना हो तो —
इदं गणेशस्य िचत्रम्। (यह गणेश जी का िच त्र है।)
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इदं कपोत स्य िचत्रम्। (यह कबूत र का िच त्र है।)
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s e m मृगस्य िचत्रम्। (यह िहरन का िचत्र है।)
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इदं
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omरहता है — ‘गणेशस्य’, ‘कपोतस्य’। य द केवल नाम बताना हो
व्याकरण क बात: प्रश्न है ‘कस्य चत्रम्?’ — ‘कस्य’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग है (‘ कम्’ का रूप), अथ
— ‘ कसका’। इसी लए उत्तर भी षष्ठी म दे ना .ठcक g l a
m दे ना भी पयाप्त है, और पुस्तक ने वैसा ही कया है।
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तो प्रथमा वभ क्त म ‘गणेशः’, ‘कपोतः’
ध्यान द जए: ‘ना सका’ और ‘ ज ा’ स्त्री लङ्ग ह, ‘भारतम्’ और ‘हवनम्’ नपुंसक लङ्ग, तथा ‘कपोतः, रामः,
co m
m .
डम ः, मृगः, चमसः, पादः’ पुं लङ्ग। लङ्ग याद रखने से आगे वभ क्त के रूप बनाने म आसानी होगी।
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चत्रं पश्यन्तु । प कातः समु चतान् वणसमूहान् चत्वा रक्तस्थाना न पूरयन्तु — प का : क्का, त्र, ण्डः, ञ्चुः,
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प्र.2
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क्षः, ङ् क, ङ् खः, न्ताः, न्द्रः, ष्ट (प…जम् = पङ् कजम्)
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agरक्त स्थान म बैठते ह। पहला उत्तर पुस्तक ने दया है — प + ङ् क + जम् = पङ् कजम्।
प का के दस वणसमूह ठ क दस
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चत्रम् रक्तस्थानम् प कातः वणसमूहः पूण पदम् हन्द
कमल प……जम् ङ् क पङ् कजम् कमल (जो क चड़ से जन्मे)
रात के आकाश म चाँद च……… न्द ः चन्द ः चन्द्रमा
हाथी क सूँड़ शु……… ण्डः शुण्डः सूँड़
पेड़ वृ……… क्षः वृक्षः पेड़
दाँत वाला मुख द……… न्ताः द न्ताः दाँत (बहुवचन)
च ड़या क च च च……… ञ्चुः चञ्चुः चच
त्रशूल ………शूलम् ित्र ित्रशूल म् त्रशूल
दे वनागरी अङ् क ‘८’ अ……… ष्ट अष्ट आठ (‘अष्टौ’ भी)
ढोल/डमरू ढ……… क्का ढक्का ढोल, एक वाद्य
शङ् ख श……… ङ् खः शङ् खः शङ् ख
ये सब संयुक्त-व्यञ्जन ह। जब एक व्यञ्जन बना स्वर के दूसरे व्यञ्जन से जुड़ता है तो संयुक्ताक्षर बनता है — ङ्
+ क = ङ् क, न् + द् + र = न्द्र, क् + ष = क्ष, ष् + ट = ष्ट। ध्यान द जए क हर वग का पञ्चम वण (ङ ञ ण न म)
अपने ही वग के वण से जुड़ता है — ङ् +क (पङ् कजम्), ञ्+च (चञ्चुः), ण्+ड (शुण्डः), न्+त (दन्ताः)। यही स्पश-
वण के पाँच वग का व्यावहा रक उपयोग है।
शब्दाथ: ‘पङ् कजम्’ = पङ् के (क चड़ म) जायते इ त पङ् कजम् — जो क चड़ म उत्पन्न हो, अथात् कमल। ऐसे
शब्द को यौ गक शब्द कहते ह, क्य क इसका अथ इसके अवयव से ही नकल आता है।
प्र.3 प्रथम-वणन पदं वदन्तु लखन्तु च — अ : अ ग्नः, अस्त्रम् ; न : नद , नौका ; क, म, च, ह, प, त, र, व, इ, श
हर वण से आरम्भ होने वाले दो-दो शुद्ध संस्कृत पद —
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वणः प्रथमं पदम् द्वतीयं पदम् हन्द अथ
अ अि नः अस्त्रम् आग / ह थयार ( दया हुआ)
क कमलम् कपोतः कमल / कबूतर
च चन्द ः चटकः चन्द्रमा / गौरैया
प पुस्तकम् पवतः पुस्तक / पहाड़
र रथः रिवः रथ / सूय
इ इन्द ः इक्षःु इन्द्र / गन्ना
न नदी नौका नद / नाव ( दया हुआ)
म मयूरः िमत्रम् मोर / मत्र
ह हस्तः हिरणः हाथ / हरन
त तरुः तडागः पेड़ / तालाब
व वृक्षः वानरः पेड़ / बन्दर
श शङ् खः िशशुः शङ् ख / ब ा
और भी वकल्प: क — कुक्कुटः, कन्दुकम्; च — चमसः, चषकः; प — पङ् कजम्, पतामहः; र — रामः, राजा; इ
— इदम्, इ त; म — मृगः, माता; ह — हवनम्, हमालयः; त — तलः, त्रशूलम्; व — वधूः, वस्त्रम्; श — शुकः,
शीतम्।
यह अभ्यास क्य : इससे दो चीज़ एक साथ सधती ह — वण क पहचान और शब्द-भण्डार। पद लखते समय अन्त
का चह्न भी दे खए — पुं लङ्ग म प्रायः ‘…◌ः’ (अ ग्नः, कपोतः), नपुंसक लङ्ग म ‘…म्’ (अस्त्रम्, कमलम्) और
स्त्री लङ्ग म ‘…आ/ई’ (नद , नौका)।
प्र.4 स्व-प रवारस्य सदस्यानां पूण-नामा न लखन्तु — (उपा धः / प्रथम-नाम / मध्य-नाम* / अन्त्य-नाम-कुल-
नाम**) । * मध्य-नाम अ स्त चेद ् पूण नाम लखन्तु । ना स्त चेद ् रक्तं त्यजन्तु । ** केवलं प्रथमवण (Initial)
न लखन्तु । पूण नाम लखन्तु ।
यह अपने घर के बारे म भरने वाली ता लका है, इस लए इसका उत्तर हर वद्याथ का अलग होगा। पुस्तक ने ‘उपा धः’ का स्तम्भ
पहले ही भर दया है — माता/ पतामही/मातामही के लए ीमती, पता/ ाता/ पतामहः/मातामहः के लए ीमान् और भ गनी के
लए सु ीः।
भरने का ढं ग:
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः AglaSem · NCERT Solutions
नाम दे वनागरी ल प म ल खए और संस्कृत रूप दे ने के लए पुं लङ्ग नाम के अन्त म प्रायः ‘◌ः’ लगाइए — जैसे ‘रमेश’ →
रमेशः।
मध्य-नाम हो तभी ल खए; न हो तो खाना खाली छोड़ द जए (पुस्तक क टप्पणी*)।
अन्त्य-नाम केवल पहला अक्षर (Initial) न ल खए — पूरा ल खए ( टप्पणी**)।
नमूना उत्तरम् (केवल दखाने के लए; अपने घर के असली नाम भ रए):
सम्ब ः उपा धः प्रथम-नाम मध्य-नाम अन्त्य-नाम / कुल-नाम
माता ीमती सुनीता — शम
पता ीमान् रमेशः कु मारः शम
भ गनी सु ीः अनन्या — शम
ाता ीमान् अिनरु ः — शम
पतामही ीमती कमला — शम
पतामहः ीमान् हिरशंकरः — शम
मातामही ीमती सरोजा — िम ा
मातामहः ीमान् गोिवन्दः पसादः िम ा
शब्द का अथ फर से: पतामहः = पतुः पता (दादा), पतामही = पतुः माता (दाद ), मातामहः = मातुः पता
(नाना), मातामही = मातुः माता (नानी), भ गनी = स्वसा (बहन), ाता = अग्रजः/अनुजः (बड़ा/छोटा भाई)।
‘उपा धः’ का अथ है आदर-सूचक पद — Title।
प्र.5 कक्षायाः श क्षकाणां शक्षकाणां च पूण-नामा न लखन्तु — (उपा धः / प्रथम-नाम / मध्यम-नाम / अन्त्य-नाम)
यह भी अपनी कक्षा के अनुसार भरने वाली ता लका है। कक्षा- श क्षका से पूछकर या समय-सारणी (Time Table) दे खकर हर
वषय के शक्षक- श क्षका का पूरा नाम ल खए।
अच्छे उत्तर म यह ज़रूर हो —
श क्षका के लए उपा ध ीमती अथवा सु ीः, शक्षक के लए ीमान्; डॉक्टरेट हो तो डॉ. (आचायः/आचाया)।
नाम दे वनागरी म, और पूरा — केवल Initial नह ।
चाह तो एक स्तम्भ और जोड़ ली जए — ‘ वषयः’ (संस्कृतम्, ग णतम्, व ानम्, आङ् ग्लभाषा, हन्द , समाज व ानम्)।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः AglaSem · NCERT Solutions
नमूना उत्तरम्:
उपा धः प्रथम-नाम मध्यम-नाम अन्त्य-नाम वषयः
ीमती मीरा — दे शपाण्डे संस्कृतम्
ीमान् अजयः कु मारः वम ग णतम्
सु ीः फ़ ाितमा — ख़ान आङ् ग्लभाषा
ीमान् वेङ्कटः — अय्यर व ानम्
संस्कृत म प रचय दे ना भी सी खए: “मम संस्कृत- श क्षका ीमती मीरा दे शपाण्डे अ स्त।” / “मम ग णत-
शक्षकः ीमान् अजयः वमा अ स्त।”
प्र.6 मत्राणां पूण-नामा न लखन्तु — (प्रथम-नाम / मध्यम-नाम / अन्त्य-नाम)
अपने मत्र से स्वयं पूछकर ता लका भ रए। ध्यान रहे क यहाँ ‘उपा धः’ का स्तम्भ नह है — मत्र के नाम के आगे ीमान्/ ीमती
नह लगाया जाता।
करने का ढं ग: कक्षा म एक-दूसरे से संस्कृत म पू छए — “भवतः/भवत्याः नाम कम्?” उत्तर मलेगा — “मम नाम … अ स्त।”
फर वही नाम तीन स्तम्भ म बाँटकर ल खए।
नमूना उत्तरम्:
प्रथम-नाम मध्यम-नाम अन्त्य-नाम
रोिहतः — पाटील
सारा बानो अंसारी
तेजस्वी — नायर
हरपीतः िसंहः बेद ी
इशानः — बरुआ
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः
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प्रश्न 4, 5, 6 का एक ही उ े श्य है: जो वण अभी सीखे, उन्ह से अपने आस-पास के असली नाम दे वनागरी म
m कनम
लखना। नाम लखते समय ध्यान द जए क कन नाम म संयुक्ताक्षर आते ह (हरप्रीतः, तेजस्वी)eऔर
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co ( सह◌ः, रो हत◌ः)।
अनुस्वार या .वसग gl a
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योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 15–22
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उ ारण-स्थाना न
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योग्यता वस्तरः a g l
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वणानाम् उ ारणं कथं भव त ? इ त ास्यामः —
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प्र.1
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l (संस्कृतम्): वणानाम् उ ारणे मुखस्य मुख्या भू मका भव त। कदा चत् मुखेन सह ना सकायाः अ प उपयोगः भव त —
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यथा ‘अं’, ‘न्’, ‘म्’, ‘अँ’ इत्या दषु ना सक्य-वणषु। मुखं ना सका च — उभे अ प आस्ये भवतः।
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( हन्द : कसी भी ध्व न या वण को बोलने म मुख क मुख्य भू मका होती है। कभी-कभी मुख के साथ नाक का भी उपयोग होता है,
s e m नाक — दोन ही सर के भीतर ह।)
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जैसे ‘अं’, ‘न’, ‘म’, ‘अँ’ जैसे ना सक्य वण म। मुख और
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स्वयं करके दे खए: उँ गली नाक पर रखकर पहले ‘क’ बो लए, फर ‘ङ’ बो लए। ‘ङ’ बोलते समय नाक म कँपकँपी
महसूस होगी, ‘क’ म नह । यही अन्तर मुख-वण और ना सक्य-वण का है।
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m .c आस्यम् = Head ( सर का भीतरी भाग), मुखम् = Mouth, ना सकाag= Nose, ज ा = Tongue,
aseस्थानम् = Place of articulation।
शब्दाथ:
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प्र.2 आस्यस्य (Head) आभ्यन्तरे वणानाम् उत्प त्तः कुत्र-कुत्र भवती त पश्यामः — (आस्ये वणानां षट् उ ारण-
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स्थाना न)
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उत्तरम्: आस्ये सामान्यतः षट् स्थाना न भव न्त — मुखे पञ्चसु स्थानेषु, ना सकायाम् एक स्मन् स्थाने च।
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( हन्द : सर के भीतर सामान्यतः छह उ ारण-स्थान होते ह — पाँच मुख म और एक नाक म।)
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क्रमः स्थानम् हन्द तत्र उत्प ाः वणाः (एकस्थानीयाः)
१. कण्ठः गला अ आ · क ख ग घ · ह · अः
२. तालु तालू इई·चछजझ·य·श
३. मूधा तालू का ऊपरी/ पछला भाग ऋॠ·टठडढ·र·ष
४. दन्तः दाँत ऌ·तथदध·ल·स
५. ओष्ठः हठ उऊ·पफ बभ
६. ना सका नाक अं (अनुस्वारः)
क्रम याद रखने क कुंजी: कण्ठ से ओष्ठ तक स्थान गले से ह ठ क ओर बढ़ते ह — गला → तालू → मूधा → दाँत
→ ह ठ। इसी लए वणमाला का क्रम भी यही है: क-वग (कण्ठ) → च-वग (तालु) → ट-वग (मूधा) → त-वग (दन्त)
→ प-वग (ओष्ठ)। संस्कृत वणमाला बेतरतीब नह , वै ा नक क्रम म है।
प्र.3 द्वस्थानीय-वणानाम् उ ारण-स्थाना न — एकस्थानीयाः द्वस्थानीयाः च वणाः के ? (पृष्ठ 19, 20, 22)
कुछ वण एक ही स्थान से बोले जाते ह (एकस्थानीयाः), और कुछ दो स्थान से ( स्थानीयाः)। पुस्तक के पृष्ठ 19 और 20 के चत्र
यही बताते ह।
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वणः स्थानद्वयम् नाम कैसे बनता है
ए कण्ठः + तालु कण्ठतालव्यः अ (कण्ठ्य) + इ (तालव्य) = ए
ऐ कण्ठः + तालु कण्ठतालव्यः अ+ए=ऐ
ओ कण्ठः + ओष्ठः कण्ठोष्ठ्यः अ (कण्ठ्य) + उ (ओष्ठ्य) = ओ
औ कण्ठः + ओष्ठः कण्ठोष्ठ्यः अ+ओ=औ
व द न्तः + ओष्ठः दन्त्योष्ठ्यः ऊपर के दाँत नीचे के ह ठ को छू ते ह
ङ कण्ठः + नािसका कण्ठ्यः ना सक्यः अपना स्थान + नाक
ञ तालु + नािसका तालव्यः ना सक्यः अपना स्थान + नाक
ण मूध + नािसका मूधन्यः ना सक्यः अपना स्थान + नाक
न द न्तः + नािसका दन्त्यः ना सक्यः अपना स्थान + नाक
म ओष्ठः + नािसका ओष्ठ्यः ना सक्यः अपना स्थान + नाक
इन्ह जोड़कर पृष्ठ 22 क “सवषां वणानाम् उ ारण-स्थाना न” वाली पूरी ता लका बनती है —
स्थानम् स्वराः स्पशाः अन्तःस्थाः / ऊष्माणः / अयोगवाहौ
१. कण्ठ्याः अ आ, ए ऐ, ओ औ कखगघङ ह, अः
२. तालव्याः इ ई, ए ऐ चछजझञ य, श
३. मूधन्याः ऋॠ टठडढण र, ष
४. दन्त्याः ऌ तथदधन ल , व, स
५. ओष्ठ्याः उ ऊ, ओ औ पफ बभम व
६. ना सक्याः — ङञणनम अं
ध्यान द जए: ‘ए ऐ ओ औ’ और ‘व’ तथा ‘ङ ञ ण न म’ — ये वण ता लका म दो-दो जगह आते ह, क्य क इनका
उ ारण दो स्थान से होता है। ‘ए’ अ और इ क स से बना है, इस लए वह कण्ठ (अ का स्थान) और तालु (इ का
स्थान) — दोन का है। यही बात ‘ओ’ क — अ + उ, इस लए कण्ठ और ओष्ठ दोन ।
प्रयोग करके दे खए: ‘व’ बो लए — ऊपर के दाँत नीचे के ह ठ को छू एँगे; इसी लए वह दन्त्योष्ठ्य है। ‘ओ’ बो लए
— ह ठ गोल हो जाएँगे और आवाज़ गले से आएगी; इसी लए कण्ठोष्ठ्य।
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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 23–24
प रयोजना
प रयोजनाकायम्
प्र.1 चत्रा ण ध्यानेन पश्यन्तु । शक्षकस्य साहाय्येन एतेषां चत्राणां वै शष्ट्यम् अवगच्छन्तु लखन्तु च । (क) कुक्कुटः
वरौ त — उ (एक-मात्रः, ह्रस्वः) → उ (एक-मात्रः, ह्रस्वः) → ऊ ( द्व-मात्रः, द घः) → उ३ ( त्र-मात्रः, प्लुतः)
चत्रस्य वै शष्ट्यम्: कुक्कुटः (मुगा) यदा वरौ त, तदा तस्य ध्वनौ त्रयः अ प मात्रा-भेदाः ूयन्ते — ह्रस्वः, द घः, प्लुतः च।
( हन्द : मुगा जब बाँग दे ता है — “उ-उ-ऊ-उ३” — तो उसी एक बाँग म स्वर क तीन लम्बाइयाँ सुनाई दे ती ह। यही इस चत्र क
वशेषता है।)
ध्व नः मात्रा नाम कतना समय
उ एक-मात्रः ह्रस्वः सबसे छोटा — 1 मात्रा
उ एक-मात्रः ह्रस्वः फर उतना ही — 1 मात्रा
ऊ ि -मात्रः द घः दुगुना — 2 मात्रा
उ३ ित्र-मात्रः प्लुतः तगुना — 3 मात्रा
‘मात्रा’ क्या है: आँख क एक पलक झपकने म जतना समय लगता है, उतना समय एक मात्रा कहलाता है। ह्रस्व
स्वर (अ इ उ ऋ ऌ) = 1 मात्रा, द घ स्वर (आ ई ऊ ॠ ए ऐ ओ औ) = 2 मात्रा, प्लुत = 3 मात्रा और अकेला व्यञ्जन
= आधी मात्रा।
‘उ३’ म ३ क्य : संस्कृत म प्लुत स्वर के आगे अङ् क ३ लखने क परम्परा है — जैसे दूर से कसी को पुकारते समय
“हे राम३!”। यह चह्न बताता है क यहाँ स्वर तीन मात्रा तक ख चना है।
प्र.2 (ख) चाषस्तु वदते मात्रां द्वमात्रं त्वेव वायसः । शखी रौ त त्रमात्रं तु नकुलस्त्वधमात्रकम् ॥ १. चाषः (नीलकण्ठः)
पक्षी — एक-मात्रं ध्व न करो त । (ह्रस्व-स्वरः इव) २. वायसः (काकः) पक्षी — द्व-मात्रं ध्व न करो त । (द घ-स्वरः
इव) ३. शखी (मयूरः) पक्षी — त्र-मात्रं ध्व न करो त । (प्लुत-स्वरः इव) ४. नकुलः पशुः — अध-मात्रं ध्व न करो त
। (व्यञ्जनम् इव)
अन्वयः — चाषः तु मात्रां वदते। वायसः तु एव मात्रं (वदते)। शखी त्रमात्रं रौ त। नकुलः तु अधमात्रकम् (रौ त)॥
स - वच्छे दः: चाषस्तु = चाषः + तु · त्वेव = तु + एव · नकुलस्त्वधमात्रकम् = नकुलः + तु + अधमात्रकम्। (‘◌ः’ के बाद ‘त’ आने
पर वसग ‘स्’ बन जाता है — यह वसग-स है।)
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हन्द अथ: नीलकण्ठ पक्षी एक मात्रा जतनी लम्बी आवाज़ नकालता है, कौआ दो मात्रा जतनी, मोर तीन मात्रा जतनी और
नेवला आधी मात्रा जतनी।
प्राणी संस्कृत नाम ध्व न क लम्बाई व्याकरण म उसका जोड़ा
नीलकण्ठ (पक्षी) चाषः एक-मात्रम् ह्रस्व-स्वरः — अ, इ, उ, ऋ, ऌ
कौआ वायसः (काकः) ि -मात्रम् द घ-स्वरः — आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
मोर िशखी (मयूर ः) ित्र-मात्रम् प्लुत-स्वरः — उ३, राम३
नेवला नकु लः अध-मात्रम् व्यञ्जनम् — क्, ख्, ग्…
भावः: यह ोक पा णनीय शक्षा का है और उसम एक सुन्दर शक्षण-यु क्त छपी है — मात्रा नापने के लए कोई घड़ी नह
चा हए, प्रकृ त ही हमारी घड़ी है। जो बालक ‘मात्रा’ शब्द नह समझता, वह भी कौए और मोर क आवाज़ क लम्बाई का अन्तर
तुरन्त पहचान लेता है। आचाय ने इसी अनुभव को व्याकरण का माप बना दया। यही कारण है क संस्कृत का उ ारण इतना नपा-
तुला और सु न त है।
करके दे खए: कक्षा म चार आवाज़ बारी-बारी नका लए — चाष जैसी छोट ‘क ऽ’, कौए क ‘काऽऽ’, मोर क
‘केऽऽऽका’ और नेवले क बहुत छोट ‘क्’। फर इन्ह के सहारे अ / आ / आ३ बोलकर दखाइए।
प्र.3 (ग) नामान्त्याक्षरी क्र डा — श क्षका / शक्षकः छात्रान् समूहद्वयेन वभज्य प्रथमगणस्य छात्रां / छात्रं स्व-नामधेयं
वक्तुं न दश त । छात्रा / छात्रः स्व-नामधेयं वद त । तदनन्तरं द्वतीयगणस्य छात्रा / छात्रः उ त्तष्ठ त । उक्तस्य
नामधेयस्य अ न्तमं व्यञ्जनवण ( वसगा त रक्तम्) स्वीकृत्य तेन वणन आरभ्यमाणं क ञ्चद् नाम वद त ।
यह कक्षा म खेला जाने वाला खेल है — ‘अन्त्याक्षरी’ का ही संस्कृत रूप, पर गीत क जगह नाम से।
खेल के नयम (पुस्तक के अनुसार):
1. शक्षक कक्षा को दो गण (टो लय ) म बाँटते ह।
2. पहले गण का एक वद्याथ खड़ा होकर अपना नाम बोलता है।
3. दूसरे गण का वद्याथ उठकर उस नाम के अ न्तम व्यञ्जन-वण से — वसग को छोड़कर — शुरू होने वाला कोई नाम बोलता
है।
4. फर पहला गण उस नए नाम के अ न्तम व्यञ्जन से नया नाम बोलता है। इसी क्रम से खेल चलता रहता है।
‘ वसगा त रक्तम्’ का अथ सम झए: ‘रमेशः’ का अ न्तम चह्न वसग (◌ः) है, पर उसे छोड़ना है। उससे पहले का
व्यञ्जन है श्। इस लए अगला नाम ‘श’ से शुरू होगा — जैसे शारदा। यही इस खेल क असली सीख है — नाम के
अन्त म कौन-सा व्यञ्जन है, यह पहचानना।
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नमूना क्र डा:
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क्रमः गणः नामधेयम् अ न्तमः व्यञ्जनवणः
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a g प्रथमगणः रमेशः श्
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2 तीयगणः द् (शारदा का अिन्तम व्यञ्जन ‘द् ’)
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शारदा
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3 प्रथमगणः दीपकः
4 तीयगणः कमला agl ल्
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5 प्रथमगणः लक्ष्म णः ण्
m तीयगणः ल् (‘ण’ से नाम न िमले तो िशक्षक की अनुमित सेa‘नs’eलीिजए)
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सुझाव: जस गण को 10 सेकंड म नाम न सूझे, उसका एक अङ् क कट जाए। नाम केवल व्य क्तय के ही नह ,
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नगर और न दय के भी लए जा सकते ह — गङ्गा, यमुना, अयोध्या, ना सक — इससे खेल और रोचक हो जाता है।
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(घ) उ ारण-स्थानानां पा णनीय- शक्षा-सूत्रा ण — सूत्रा ण तेषाम् अथ च लखन्तु ।
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m शक्षा के ये सूत्र संस्कृत उ ारण क सबसे पुरानी और सबसे सं क्षप्त ता लका ह। हर सूत्र म पहले वण गनाए जाते ह,
पाeणनीय-
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gl फर उनका स्थान बता दया जाता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः AglaSem · NCERT Solutions
सूत्रम् कौन-से वण उ ारण-स्थानम्
अकु हिवसजनीयाः क ण् ठ ाः ‘अ आ’, ‘क ख ग घ ङ’, ‘ह’, वसगः ‘अः’ कण्ठ-स्थाने
इचय
ु शास् ताल व्याः ‘इ ई’, ‘च छ ज झ ञ’, ‘य’, ‘श’ तालु-स्थाने
ऋटुर षा मूध न्याः ‘ऋ ॠ’, ‘ट ठ ड ढ ण’, ‘र’, ‘ष’ मूध-स्थाने
ऌतुल सा द न्त्याः ‘ऌ’, ‘त थ द ध न’, ‘ल’, ‘स’ द न्त-स्थाने
उपूपध् मानीया ओ ष्ठ ाः ‘उ ऊ’, ‘प फ ब भ म’, [उपध्मानीयः*] ओष्ठ-स्थाने
ङञणनमाः स्वस्थान-नािसकास्थानाः ‘ङ’, ‘ञ’, ‘ण’, ‘न’, ‘म’ अपने-अपने स्थान और नािसका — दोनों जगह
ए ऐ क ण् ठताल व्यौ ‘ए’, ‘ऐ’ कण्ठ + तालु
ओ औ क ण् ठोष्ठ ौ ‘ओ’, ‘औ’ कण्ठ + ओष्ठ
वकारो द न्त्योष्ठ ः ‘व’ द न्त + ओष्ठ
अनुस्वारयमा नािस क्याः अनुस्वारः ‘अं’, [यमाः* च] नािसका-स्थाने
* पुस्तक क टप्पणी — ‘उपध्मानीयः’ और ‘यमाः’ व शष्ट अ त रक्त अयोगवाह-वण ह; सामान्य संस्कृत भाषा म इनका प्रयोग
प्रायः नह दखता।
सूत्र का ढाँचा कैसे पढ़: सूत्र का नाम ही वण क सूची है। जैसे अ-कु-ह- वसजनीयाः = ‘अ’ (अ आ) + ‘कु’
(कवग — क ख ग घ ङ) + ‘ह’ + ‘ वसजनीय’ ( वसग) — और अन्त म ‘कण्ठ्याः’ यानी ये सब गले से बोले जाते
ह। इसी तरह इ-चु-य-शाः = इ + चवग + य + श। ‘कु’, ‘चु’, ‘टु ’, ‘तु’, ‘पु’ — इन छोटे रूप से पूरे वग का बोध
होता है; यह पा ण न क संक्षेप-कला है।
करने योग्य प रयोजना: एक चाट-पेपर पर सर का चत्र बनाइए, उसम छह स्थान (कण्ठ, तालु, मूधा, दन्त, ओष्ठ,
ना सका) दखाइए और हर स्थान के पास उससे बोले जाने वाले वण तथा उसका पा णनीय सूत्र लख द जए। कक्षा
क द वार पर लगाने के लए यह सबसे अ ा प रयोजना-काय है।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ क पहली बात — वणाः द्व वधाः भव न्त — स्वराः व्यञ्जना न च। स्वर का उ ारण स्वतन्त्र रूप से होता है, व्यञ्जन
का उ ारण करने के लए कसी स्वर क सहायता लेनी ही पड़ती है।
स्वर दो प्रकार के ह। (1) समानाक्षरा ण — अ/आ, इ/ई, उ/ऊ, ऋ/ॠ, ऌ (इनके ह्रस्व और द घ जोड़े बनते ह; ‘ऌ’ का द घ
नह होता)। (2) सन्ध्यक्षरा ण — दो स्वर क स से बने नए स्वर: अ+इ=ए, अ+ए=ऐ, अ+उ=ओ, अ+ओ=औ (इनका
ह्रस्व नह होता)। मुख के साथ नाक से भी बोले जाने वाले स्वर अनुना सक कहलाते ह — अँ आँ इँ इ उँ ऊँ ऌँ एँ ए आ आ।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 1 वयं वणमालां पठामः AglaSem · NCERT Solutions
व्यञ्जन के चार भेद ह। (1) स्पशाः (वग्याः) — क-वग, च-वग, ट-वग, त-वग, प-वग (कुल 25)। (2) अन्तःस्थाः — य र
ल व, इन्ह ‘अध-स्वर’ भी कहते ह (य द+अ प=यद्य प, पतृ+आ ा= पत्रा ा, ऌ+आकृ तः=लाकृ तः, सु+आगतम्=स्वागतम्)।
(3) ऊष्माणः — श ष स ह, इनके उ ारण म मुख से गरम हवा नकलती है। (4) अयोगवाहौ — अं (अनुस्वारः) और अः
( वसगः); इनम ‘अ’ स्वर पहले जुड़ता है, बाद म नह ।
गु णताक्षरा ण — व्यञ्जन के साथ स्वर क मात्रा जोड़ने से बने अक्षर, जैसे क्+आ=का, च्+ई=ची, क्+ऋ=कृ, क्+औ=कौ।
पृष्ठ 4 से 9 तक इन्ह क ता लकाएँ भरनी ह।
आस्ये वणानां षट् उ ारण-स्थाना न — 1. कण्ठः, 2. तालु, 3. मूधा, 4. दन्तः, 5. ओष्ठः (ये पाँच मुख म) और 6.
ना सका। इसी से वण कण्ठ्य, तालव्य, मूधन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य और ना सक्य कहलाते ह।
कुछ वण द्वस्थानीय ह — ए ऐ (कण्ठ-तालव्यौ), ओ औ (कण्ठोष्ठ्यौ), व (दन्त्योष्ठ्यः) तथा ङ ञ ण न म (अपने-अपने स्थान
के साथ ना सका से भी)। प रयोजना-काय म मात्रा का माप सखाया गया है — ह्रस्व = 1 मात्रा, द घ = 2 मात्रा, प्लुत = 3
मात्रा और व्यञ्जन = आधी मात्रा।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH
पत्रा ा िपतुः आदे शः पता का आदे श Father’s order
लाकृ तः ‘ऌ’-वणस्य आकृ ितः ‘ऌ’-वण का रूप Shape of letter ‘ऌ’
अजः छागः बकरा Goat
वधूः पिरणीता ववा हता नारी Married woman
मातॄणाम् मातुः ऋणम् माता का ऋण Indebtedness to Mother
कप्तम् कि पतम् माना हुआ Supposed
औषधम् भेषजम् औषध, दवा Medicine
भ गनी स्वसा बहन Sister
ाता अनुजः / अग जः भाई Brother
पतामहः / पतामही िपतुः िपता / िपतुः माता दादा / दाद Paternal Grandfather / Grandmother
मातामहः / मातामही मातुः िपता / मातुः माता नाना / नानी Maternal Grandfather / Grandmother
कुल-नाम कु लस्य गोत्रस्य वंशस्य वा नाम कुल, गोत्र या वंश का नाम Family Name
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