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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 2: संयक्
ु त-व्यञ्जना न
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
25 – 30 7 22 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: संयक्
ु त-व्यञ्जना न
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के द्वतीयः पाठः — संयुक्त-व्यञ्जना न के सभी अभ्यास और ग त व धय के पूरे हल। यह पाठ
बताता है क दो या दो से अ धक व्यञ्जन बना स्वर के जुड़कर संयुक्त-व्यञ्जन कैसे बनाते ह — क् + ष = क्ष, त् + र = त्र, ज् + ञ = ज्ञ, द् + य =
द्य। पृष्ठ 25 से 30 तक के हर शीषक — वण- वयोगः, वण-संयोगः, वयं शब्दाथान् जानीमः और प रयोजनाकायम् — का हर खाना क्रम से भरा
गया है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 25 – 30
खं ड प्रश्न
7 22
माध्यम
हन्द
संयक्
ु त-व्यञ्जना न — पृष्ठ 25
पाठ-प रचयः
पाठ-प रचयः
प्र.1 द्वयोः बहूनां वा व्यञ्जन-वणानां मेलनेन संयुक्त-व्यञ्जना न भव न्त — क्ष, कक्षा, त्र, पत्रम्, ज्ञ, ज्ञानम्, द्य, वद्या ।
एतेषां वण- वयोगं पश्यन्तु, संयुक्त-व्यञ्जनस्य नमाणं च वदन्तु ।
उत्तरम् (संस्कृतम्): यदा एकं व्यञ्जनं स्वर-र हतं सत् अपरेण व्यञ्जनेन सह मल त, तदा संयुक्त-व्यञ्जनं भव त। ( हन्द : जब
एक व्यञ्जन बना स्वर के — यानी हलन्त के साथ — दूसरे व्यञ्जन से जुड़ जाता है, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनता है।)
पाठ के चार उदाहरण का नयम एक ही है —
क् + ष = क्ष
त् + र = त्र
ज् + ञ = ज्ञ
द् + य = द्य
पूरा वण- वयोग इस प्रकार है —
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पदम् / वणः वण- वयोगः संयुक्त-व्यञ्जनम् अथः
क्ष क् + ष् + अ क् + ष = क्ष ‘क्ष’ ध्व न
कक्षा क् + अ + क् + ष् + आ क् + ष = क्ष कक्षा, class
त्र त् + र् + अ त् + र = त्र ‘त्र’ ध्व न
पत्रम् प् + अ + त् + र् + अ + म् त् + र = त्र पत्ता / पत्र
ज्ञ ज् + ञ् + अ ज् + ञ = ज्ञ ‘ज्ञ’ ध्व न
ज्ञानम् ज् + ञ् + आ + न् + अ + म् ज् + ञ = ज्ञ ज्ञान
द्य द् + य् + अ द् + य = द्य ‘द्य’ ध्व न
वद्या व् + इ + द् + य् + आ द् + य = द्य वद्या
ऐसा क्य होता है: ‘क’ म ‘क् + अ’ छपा है। जब ‘अ’ हटा दया जाए तो बचता है केवल क् — और तब उसे
अगले व्यञ्जन का सहारा लेना पड़ता है। इसी सहारे से क् + ष् मलकर क्ष् बनता है, और उसके बाद जो स्वर आता
है (अ, आ, इ …) वह पूरे जोड़े को बोलने योग्य बना दे ता है — क्ष् + अ = क्ष, क्ष् + आ = क्षा।
ध्यान द जए: ‘कक्षा’ म दो बार ‘क्’ आया है — पहला ‘क् + अ’ (यानी ‘क’) और दूसरा संयुक्त-व्यञ्जन का
‘क्’। इसी तरह ‘ वद्या’ म ‘व् + इ’ से ‘ व’ बना और फर ‘द् + य् + आ’ से ‘द्या’। वण- वयोग करते समय हर मात्रा
को अलग स्वर के रूप म लखना है।
प्र.2 एवं सवषां व्यञ्जनानां — सवः व्यञ्जनैः सह मेलनं सम्भव त । तेन बहु वधा न संयुक्त-व्यञ्जना न भव न्त —
क्य, क्र, द्म, ण, न्द्र, ष्ट्र, न्त्र, ष्ठ्य, न्ध्य । एतेषां पदा न लखन्तु ।
पुस्तक क नौ-खान वाली ता लका इस प्रकार भरी जाएगी —
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संयुक्त-व्यञ्जनम् वण- वच्छे दः पदम् अथः
क्य क् + य = क्य चाणक्यः आचाय चाणक्य
क्र क् + र = क्र क्रमः क्रम, सल सला
द्म द् + म = द्म पद्मम् कमल
ण र् + ण = ण अणवः समुद्र
न्द्र न् + द् + र = न्द इन्द ः दे वराज इन्द्र
ष्ट्र ष् + ट् + र = उः ऊँट
न्त्र न् + त् + र = न्त्र मन्त्रः मन्त्र
ष्ठ्य ष् + ठ् + य = ष्ठ ओष्ठ ः ओष्ठ से बोला जाने वाला वण
न्ध्य न् + ध् + य = न्ध् य सन्ध्या सन्ध्या-वेला
तीन-तीन व्यञ्जन भी जुड़ सकते ह: ऊपर के नौ म से छह तो दो व्यञ्जन के जोड़े ह (क्य, क्र, द्म, ण), पर न्द्र, ष्ट्र,
न्त्र, ष्ठ्य, न्ध्य — इनम तीन-तीन व्यञ्जन जुड़े ह। संस्कृत म चार और पाँच व्यञ्जन के जोड़ भी मलते ह — जैसे
(धाष्ट्यम्) और त्स्न्य (कात्स्न्यम्), जो आगे पृष्ठ 28 पर आएँगे।
‘र्’ क दो शै लयाँ: ‘र्’ जब पहले आता है तो ऊपर छोटा-सा चह्न बन जाता है — इसे रेफ कहते ह: अ + र् + ण =
अणवः। और जब ‘र्’ बाद म आता है तो अक्षर के नीचे तरछ लक र बन जाती है — इसे रकार कहते ह: क् + र =
क्र, ष् + ट् + र = ष्ट्र।
प्र.3 * एता न संयुक्त-व्यञ्जना न नवीनाः वणाः न स न्त, अ पतु पृथक्-पृथक् संयुक्त-व्यञ्जन-वणानां व श ा
लेखन-शैली एव । एतैः सह आगतः स्वरः संयुक्त-व्यञ्जनेषु अन्तभूतः ना स्त । — अस्याः टप्पण्याः आशयं
स्प ीकुवन्तु ।
उत्तरम् (संस्कृतम्): संयुक्त-व्यञ्जना न नवीनाः वणाः न स न्त। वणमालायां ये एव व्यञ्जनाः प ठताः, तेषाम् एव मेलनस्य व शष्टा
लेखन-शैली संयुक्त-व्यञ्जनम् उच्यते। स्वरः तु तेषु अन्तभूतः न भव त; सः पृथक् एव योज्यते।
( हन्द : इस टप्पणी क दो बात ह —)
1. ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ कोई नए अक्षर नह ह। ये वणमाला के पुराने अक्षर — क्, ष्, त्, र्, ज्, ञ् — के जुड़ने का लखने का
तरीका भर ह। इस लए संस्कृत वणमाला म व्यञ्जन 33 ही ह, 36 नह ।
2. जोड़ म स्वर शा मल नह है। ‘क्ष’ लखने पर जो ‘अ’ सुनाई दे ता है, वह संयुक्त-व्यञ्जन का हस्सा नह — वह बाद म जोड़ा
गया अलग स्वर है। असली संयुक्त-व्यञ्जन तो क्ष् है। इसी लए वण- वयोग म हम लखते ह — क्ष = क् + ष् + अ, जहाँ ‘अ’
अलग गना जाता है।
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
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यह बात ज़रूरी क्य है: य द ‘क्ष’ को एक नया वण मान ल, तो वण गनना ही गड़बड़ा जाएगा। ‘वृक्षः’ म तब 5 वण
m a s emस न्ध, समास
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गने जाएँगे, जब क सही गनती 6 है — व् + ऋ + क् + ष् + अ + ◌ः। इसी गनती पर आगे चलकर
o नयम टका है।
और छन्द का.cसारा
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aयाद रखने का सूत्र: व्यञ्जन + व्यञ्जन = संयुक्त-व्यञ्जन, और संयुक्त-व्यञ्जन + स्वर = बोलने योग्य
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अक्षर। दोन चरण अलग-अलग ह।
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वण- वयोगः — पृष्ठ 26
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वण- वयोगः
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वण- वयोगः
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a glप्र.1 वण- वयोगं कुवन्तु — अजः = अ + ज् + अ + ◌ः । (रामः, ह रः, सीता, गु ः, वधूः, ऋ षः तथा मातॄणम् = म् + आ
+ त् + ॠ + ण् + अ + म्, कप्तम् = क् + ऌ + प् + त् + अ + म्, ऌकारः, दे वाः, एकैकः, ओम्, औषधम्)
m a s
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a s
agl वण म तोड़ना। नयम यही है: हर व्यञ्जन हलन्त के साथ ल खए और हर
वण- वयोग का अथ है — पद को उसके अलग-अलग
मात्रा को उसका पूरा स्वर बनाकर अलग ल खए।
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वाम-भागः (बायाँ खाना) —
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पदम्
m .co वण- वयोगः वण-सङ् ख्या
a g अथः
a s eअजः
a gl अ + ज् + अ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) 4 बकरा
र् + आ + म् + अ + ◌ः
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रामः 5 राम
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ह रः ह् + अ + र् + इ + ◌ः 5 वष्णु / ह र
सीता स् + ई + त् + आ agl 4 सीता
m
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गु ः ग् + उ + र् + उ + ◌ः 5 गुरु, शक्षक
se m
com
वधूः व् + अ + ध् + ऊ + ◌ः 5
g l a ववा हता नारी
m .ऋ षः a
as e ऋ + ष् + इ + ◌ः
agl
4 तपस्वी, मन्त्रद्रष्टा
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द क्षण-भागः (दायाँ खाना) —
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पदम् वण- वयोगः वण-सङ् ख्या अथः
मातॄणम् म् + आ + त् + ॠ + ण् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) 7 माता का ऋण
कप्तम् क् + ऌ + प् + त् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) 6 क ल्पत, माना हुआ
ऌकारः ऌ + क् + आ + र् + अ + ◌ः 6 ‘ऌ’ वण
दे वाः द् + ए + व् + आ + ◌ः 5 दे वगण
एकैकः ए + क् + ऐ + क् + अ + ◌ः 6 प्रत्येक, हर एक
ओम् ओ + म् 2 प्रणव
औषधम् औ + ष् + अ + ध् + अ + म् 6 दवा
तीन बात ध्यान से: (1) ‘सीता’ म ‘सी’ = स् + ई है, ‘इ’ नह — मात्रा ‘◌ी’ द घ है। (2) ‘ओम्’ म केवल दो वण ह
— ओ और म् — क्य क ‘ओ’ स्वयं एक पूरा स्वर है, कोई मात्रा उसके साथ नह । (3) ‘एकैकः’ म पहला ‘ए’
अकेला स्वर है और बीच का ‘कै’ = क् + ऐ।
वसग और अनुस्वार भी वण ह: ‘अजः’ के अन्त का ‘◌ः’ अलग गना जाता है, इसी लए अजः के चार वण ह। इसी
तरह ‘हंसः’ म ‘◌ं’ भी एक अलग वण होगा (दे खए पृष्ठ 27)।
प्र.2 क्य – वाक्यम् = व् + आ + क् + य् + अ + म् । एवमेव — न्य – मूधन्यः, व्य – तालव्यः, ह्य – बाह्यम् — एतेषां वण-
वयोगं कुवन्तु ।
चार पद म ‘य्’ अ न्तम व्यञ्जन के रूप म जुड़ा है — यही ‘य’ वाले संयुक्त-व्यञ्जन क पहचान है।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
क्य वाक्यम् व् + आ + क् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) वाक्य
क् + य = क्य
न्य मूधन्यः म् + ऊ + र् + ध् + अ + न् + य् + अ + ◌ः मूधा से बोला जाने वाला
न् + य = न्य
व्य तालव्यः त् + आ + ल् + अ + व् + य् + अ + ◌ः तालु से बोला जाने वाला
व् + य = व्य
ह्य बाह्यम् ब् + आ + ह् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) बाहरी
ह् + य = ह्य
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‘मूधन्यः’ म नौ वण क्य : इसम दो संयुक्त-व्यञ्जन ह — पहला ध (र् + ध) और दूसरा न्य (न् + य)। बीच म ‘ध’
का अपना ‘अ’ भी गनना है, वरना ‘मूध्न्यः’ बन जाएगा जो ग़लत है। इसी लए — म् + ऊ + र् + ध् + अ + न् + य् +
अ + ◌ः।
अथ क बात: ये तीन — मूधन्यः, तालव्यः, ओष्ठ्यः — उ ारण- ान बताने वाले शब्द ह, जो पहले पाठ म पढ़े
थे। ‘बाह्यम्’ का अथ है ‘ब हः तम्’ यानी बाहरी।
प्र.3 क्र – क्र डा = क् + र् + ई + ड् + आ । एवमेव — ग्र – ग्रहणम्, ज्र – वज्रः, द्र – द्र ा, प्र – प्रग तः, ब्र – ब्रह्म — एतेषां
वण- वयोगं कुवन्तु ।
इन सब म दूसरा व्यञ्जन ‘र्’ है। लखते समय वह अक्षर के नीचे तरछ लक र बन जाता है — इसे रकारः कहते ह।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
क्र क्र डा क् + र् + ई + ड् + आ (पुस्तके दत्तम्) खेल
क् + र = क्र
ग्र ग्रहणम् ग् + र् + अ + ह् + अ + ण् + अ + म् स्वीकार करना / पकड़ना
ग् + र = ग्र
ज्र वज्रः व् + अ + ज् + र् + अ + ◌ः इन्द्र का शस्त्र / हीरा
ज् + र = ज्र
द्र द्र ा द् + र् + अ + ष् + ट् + आ (पुस्तके दत्तम्) दे खने वाला
द् + र = द्र
प्र प्रग तः प् + र् + अ + ग् + अ + त् + इ + ◌ः उन्न त, वकास
प् + र = प्र
ब्र ब्रह्म ब् + र् + अ + ह् + म् + अ (पुस्तके दत्तम्) परमात्मा
ब् + र = ब्र
‘ग्रहणम्’ म आठ वण क्य : ग्र के बाद ‘ह’ का ‘अ’ और ‘ण’ का ‘अ’ — दोन गनने ह। ग् + र् + अ + ह् + अ +
ण् + अ + म्। जतने ‘अ’ दखाई नह दे ते, उतने ही वण छात्र भूल जाते ह — यही इस अभ्यास क असली परीक्षा
है।
‘ब्रह्म’ के अन्त म ‘म्’ नह , ‘अ’ है: ब् + र् + अ + ह् + म् + अ — यह नपुंसक लङ्ग का प्रथमा-एकवचन रूप है
(ब्रह्म, अथ — परमात्मा)। य द अन्त म हलन्त ‘म्’ होता तो शब्द ‘ब्रह्म’ बन जाता, जो कोई पद नह ।
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प्र.4 ध्व – ध्व नः = ध् + व् + अ + न् + इ + ◌ः । एवमेव — ह्म – ब्रह्मचारी, ह्न – जाह्नवी, स्व – सरस्वती — एतेषां वण-
वयोगं कुवन्तु ।
यहाँ ‘ह्’ और ‘स्’, ‘ध्’ पहले आकर अगले व्यञ्जन से जुड़ते ह।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
ह्म ब्रह्मचारी ब् + र् + अ + ह् + म् + अ + च् + आ + र् + ई वद्या-संयम-व्रती
ह् + म = ह्म
ह्न जाह्नवी ज् + आ + ह् + न् + अ + व् + ई जह्न ऋ ष क पुत्री — गङ्गा
ह् + न = ह्न
ध्व ध्व नः ध् + व् + अ + न् + इ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) आवाज़
ध् + व = ध्व
स्व सरस्वती स् + अ + र् + अ + स् + व् + अ + त् + ई वद्या क दे वी
स् + व = स्व
‘ह्म’ और ‘ह्न’ पहचानना: ‘ब्रह्मचारी’ म ह् + म् जुड़े ह और ‘जाह्नवी’ म ह् + न्। दोन लखने म लगभग एक-से
दखते ह, पर नीचे लगे व्यञ्जन को ध्यान से दे खए — ‘ह्म’ म ‘म’ का पेट गोल है, ‘ह्न’ म ‘न’ क खड़ी लक र है।
शब्द-कथा: जाह्नवी = जह्नोः ऋषेः पुत्री। कथा है क जह्न ऋ ष ने गङ्गा को पी लया था, फर भगीरथ क प्राथना पर
कान से छोड़ दया — तभी से गङ्गा उनक पुत्री ‘जाह्नवी’ कहलाईं। सरस्वती = सरस् (जल/वाणी) + वती, यानी
‘ जसम प्रवाह हो’ — वद्या और वाणी क दे वी।
वण- वयोगः — पृष्ठ 27
वण- वयोगः
वण- वयोगः
प्र.1 ण – वणः = व् + अ + र् + ण् + अ + ◌ः । एवमेव — म – कम, ष – सप्त षः — एतेषां वण- वयोगं कुवन्तु ।
इन तीन म ‘र्’ पहले आता है और अगले अक्षर के ऊपर छोटा-सा चह्न बनकर बैठ जाता है — इसे रेफः कहते ह।
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संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
ण वणः व् + अ + र् + ण् + अ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) वण, अक्षर
र् + ण = ण
म कम क् + अ + र् + म् + अ काय
र् + म = म
ष सप्त षः स् + अ + प् + त् + अ + र् + ष् + इ + ◌ः सात महान् ऋ षय का समूह
र् + ष = ष
रेफ का नयम: रेफ जस अक्षर के ऊपर दखता है, उ ारण म वह उससे पहले बोला जाता है। ‘वणः’ म रेफ ‘ण’
के ऊपर है, पर पढ़ा जाता है ‘व-र्-ण’। इसी लए वण- वयोग म ‘र्’ को ‘ण्’ से पहले लखा जाता है।
स न्ध क झलक: सप्त षः = सप्त + ऋ षः। यहाँ ‘अ + ऋ = अर्’ हुआ है — यह गुण-स न्ध है। इसी से सात
ऋ षय का समूह ‘सप्त ष’ कहलाता है — मरी च, अ त्र, अ ङ्गरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, व सष्ठ।
प्र.2 क्क – ढक्का = ढ् + अ + क् + क् + आ । द्म – पद्मम् = प् + अ + द् + म् + अ + म् । एवमेव — त्त – वत्तम्, द्ध –
सद्धाथः, ब्द – शब्दः — एतेषां वण- वयोगं कुवन्तु ।
‘क्क’ और ‘त्त’ म एक ही व्यञ्जन दो बार आया है — इसे त्व कहते ह।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
क्क ढक्का ढ् + अ + क् + क् + आ (पुस्तके दत्तम्) ढोल, डंका, नगाड़ा
क् + क = क्क
त्त वत्तम् व् + इ + त् + त् + अ + म् धन
त् + त = त्त
द्ध सद्धाथः स् + इ + द् + ध् + आ + र् + थ् + अ + ◌ः सद्धाथ (गौतम बुद्ध)
द् + ध = द्ध
द्म पद्मम् प् + अ + द् + म् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) कमल
द् + म = द्म
ब्द शब्दः श् + अ + ब् + द् + अ + ◌ः शब्द
ब् + द = ब्द
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
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‘ सद्धाथः’ म नौ वण: इसम भी दो संयुक्त-व्यञ्जन ह — द्ध (द् + ध) और थ (र् + थ)। स् + इ + द् + ध् + आ +
m गौतम बुद्ध
र् + थ् + अ + ◌ः। शब्द का अथ है ‘ सद्धः अथः यस्य सः’ — जसका प्रयोजन सद्ध हो चुका हो;eयही
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cनाम gl a
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का बचपन का
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agl द्वत्व सुनकर पहचा नए: ‘ढक्का’ बोलते समय ‘क’ पर ज़रा रुकना पड़ता है — यही दोहरे व्यञ्जन क पहचान है।
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हन्द के ‘पक्का’, ‘स ा’, ‘अ ा’ म भी यही होता है।
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ङ् क – पङ् कजम्, ञ्ज – व्यञ्जनम्, ण्ठ – कण्ठः, न्ध – स न्धः, म्भ – प्रारम्भः — एतेषां वण- वयोगं कुवन्तु ।
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प्र.3
co
se m.
o m l a
.c वण (ङ ञ ण न म) अपने ही वग के कसी वण से जुड़ा है — यह संस्कृतaकाg बहुत बड़ा नयम है।
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इन पाँच म पञ्चम
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a संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
प् + अ +oङ्m a s
.c agl
ङ् क पङ् कजम् + क् + अ + ज् + अ + म् कमल
se m
a
ङ् + क = ङ् क
ञ्ज व्यञ्जनम् ag l व् + य् + अ + ञ् + ज् + अ + न् + अ + म् व्यञ्जन वण
ञ् + ज = ञ्ज
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coगला
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क् + अ + ण् + ठ् + अ + ◌ः
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ण्ठ कण्ठः
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ण् + ठ = ण्ठ
eन्धm a
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gl न् + ध = न्ध
स न्धः स् + अ + न् + ध् + इ + ◌ः दो वण का मेल
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म्भ प्रारम्भः
com
प् + र् + आ + र् + अ + म् + भ् + अ + ◌ः आरम्भ, शुरुआत
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m . a
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म् + भ = म्भ
agl
नयम — ‘अपने वग का पञ्चम वण’: क-वग के पहले ङ् आएगा (पङ् कजम्), च-वग के पहले ञ् (व्यञ्जनम्),
ट-वग के पहले ण् (कण्ठ◌ः), त-वग के पहले न् (स न्ध◌ः), प-वग के पहले म् (प्रारम्भ◌ः)। यही कारण है क
co m
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वणमाला म हर वग का पाँचवाँ वण ना सक्य रखा गया है।
m l as
.co a g
m ‘प्रारम्भः’ म नौ वण: दो संयुक्त-व्यञ्जन ह — प्र (प् + र्) और म्भ (म् + भ्) — और बीच म ‘र’ का ‘अ’ भी
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गनना है: प् + र् + आ + र् + अ + म् + भ् + अ + ◌ः।
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प्र.4 स्क – सँस्कता = स् + अँ + स् + क् + अ + र् + त् + आ । एवमेव — स्क – काँस्कान्, स्म – क स्म द् — एतेषां
वण- वयोगं कुवन्तु ।
इन तीन म स्वर के ऊपर चन्द्र बन्दु ( ◌ँ ) है — इसे अनुना सकः कहते ह। यह अलग वण नह , स्वर का ही नाक से बोला जाने वाला
रूप है, इस लए वण- वयोग म उसे स्वर के साथ ही लखा जाता है — ‘अँ’, ‘आँ’, ‘इँ’।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
स्क सँस्कता स् + अँ + स् + क् + अ + र् + त् + आ (पुस्तके दत्तम्) संस्कार करने वाला
स् + क = स्क
स्क काँस्कान् क् + आँ + स् + क् + आ + न् कन- कन को
स् + क = स्क
स्म क स्म द् क् + अ + स् + म् + इँ + श् + च् + इ + द् कह पर / कसी म
स् + म = स्म
अनुस्वार और अनुना सक का अन्तर: अनुस्वार ( ◌ं ) एक अलग वण है, इस लए ‘संयमः’ म उसे अलग गना
जाता है (स् + अ + ◌ं + य् …)। पर अनुना सक ( ◌ँ ) अलग वण नह — वह स्वर पर ही लगता है, इस लए
‘सँस्कता’ म ‘अँ’ एक ही वण है। दोन क गनती अलग-अलग होती है — यही इस अभ्यास क सूक्ष्म बात है।
अथ: सँस्कता = यः संस्कारं करो त (संस्कार करने वाला), काँस्कान् = कान् कान् ( कन- कन को), क स्म द् =
कुत्र चद् (कह पर, कसी म)।
प्र.5 ◌ंय – संयमः = स् + अ + ◌ं + य् + अ + म् + अ + ◌ः । एवमेव — ◌ंव – संवादः, ◌ंस – हंसः — एतेषां वण- वयोगं
कुवन्तु ।
यहाँ जुड़ने वाला पहला अंश अनुस्वार ( ◌ं ) है। वह अपने-आप म एक पूरा वण है (अयोगवाहः), इस लए वण- वयोग म अलग गना
जाता है।
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संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
◌ंय संयमः स् + अ + ◌ं + य् + अ + म् + अ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) आत्म- नयन्त्रण
◌ं + य = ◌ंय
◌ंव संवादः स् + अ + ◌ं + व् + आ + द् + अ + ◌ः परस्पर बातचीत
◌ं + व = ◌ंव
◌ंस हंसः ह् + अ + ◌ं + स् + अ + ◌ः हंस
◌ं + स = ◌ंस
अनुस्वार यहाँ कसका रूप है: ‘संयमः’ मूलतः सम् + यमः है, ‘संवादः’ = सम् + वादः। जब ‘म्’ के बाद कोई
व्यञ्जन आता है तो वह ‘◌ं’ बन जाता है — यह मोऽनुस्वारः नयम है। इसी लए तीन म ‘◌ं’ के बाद व्यञ्जन ही है,
स्वर नह ।
बोलकर दे खए: ‘संयमः’ म ‘◌ं’ का उ ारण आगे आने वाले वण के अनुसार बदल जाता है — ‘संयम’ म वह ‘य’
जैसा ना सक्य, ‘हंस’ म ‘न’ जैसा सुनाई दे ता है। लखा एक ही चह्न जाता है, पर मुँह अलग-अलग काम करता है।
प्र.6 ◌ःख – दुःखम् = द् + उ + ◌ः + ख् + अ + म् । एवमेव — ◌ःक – प्रातःकालः — अस्य वण- वयोगं कुवन्तु ।
यहाँ पहला अंश वसगः ( ◌ः ) है — वह भी अयोगवाह वण है और अलग गना जाता है।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
◌ःख दुःखम् द् + उ + ◌ः + ख् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) दुःख
◌ः + ख = ◌ःख
◌ःक प्रातःकालः प् + र् + आ + त् + अ + ◌ः + क् + आ + ल् + अ + ◌ः सुबह का समय
◌ः + क = ◌ःक
‘प्रातःकालः’ म ग्यारह वण: यह सबसे लम्बा वण- वयोग है — प् + र् + आ + त् + अ + ◌ः + क् + आ + ल् + अ
+ ◌ः। इसम वसग दो बार आया है — एक बीच म (प्रातः) और एक अन्त म (कालः)। बीच वाला वसग समास म
भी बना रहता है, यही इस पद क वशेषता है।
अथ: प्रातःकालः = प्रभात-वेला, सुबह का समय। दुःखम् — इसम ‘दुः’ उपसग है, जसका अथ है ‘बुरा’; ‘दुः +
ख’ यानी बुरी अव ा।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
प्र.7 न्द्र – इन्द्रः = इ + न् + द् + र् + अ + ◌ः — त्रयाणां व्यञ्जनानां मेलनं कथं भव त ?
उत्तरम् (संस्कृतम्): अत्र त्री ण व्यञ्जना न म लता न — न् + द् + र् = न्द्र। तेषु प्रथमे े स्वर-र हते, तृतीयेन सह स्वरः योज्यते।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
न्द्र इन्द्रः इ + न् + द् + र् + अ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) दे वराज इन्द्र
न् + द् + र = न्द्र
( हन्द : यहाँ तीन व्यञ्जन एक साथ जुड़े ह — न्, द् और र्। पहले दोन बना स्वर के ह; स्वर ‘अ’ केवल अ न्तम ‘र्’ के साथ जुड़कर
पूरे जोड़े को बोलने योग्य बनाता है।)
जोड़ का क्रम: पहले न् + द् = न्द्, फर न्द् + र् = न्द्र्, और अन्त म न्द्र् + अ = न्द्र। इसी सीढ़ से चार और पाँच
व्यञ्जन के जोड़ भी बनते ह, जो अगले पृष्ठ पर आएँगे।
और उदाहरण: न्द्र से बने पद — इन्द्रः, चन्द्रः, नरेन्द्रः, महेन्द्रः, उपेन्द्रः, समुद्रः (यहाँ म्द्र नह , द्र है)। कक्षा म ऐसे पाँच
पद और खो जए।
वण- वयोगः — पृष्ठ 28
त्र-चतुः-पञ्च-व्यञ्जन-मेलनम्
वण- वयोगः
प्र.1 न्त्र – मन्त्री, ष्ट्र – राष्ट्रम् — एतयोः वण- वयोगं कुवन्तु ।
दोन म तीन-तीन व्यञ्जन जुड़े ह और तीसरा व्यञ्जन दोन म ‘र्’ ही है।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
न्त्र मन्त्री म् + अ + न् + त् + र् + ई मन्त्री
न् + त् + र = न्त्र
ष्ट्र राष्ट्रम् र् + आ + ष् + ट् + र् + अ + म् राष्ट्र, दे श
ष् + ट् + र = ष्ट्र
‘मन्त्री’ के अन्त म ‘ई’: मूल शब्द ‘म न्त्रन्’ है; उसका प्रथमा-एकवचन रूप मन्त्री बनता है। इसी लए वण- वयोग म
अन्त म हलन्त ‘न्’ नह , द घ स्वर ई लखा जाता है — म् + अ + न् + त् + र् + ई।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
अथ: राष्ट्रम् = दे शः (राष्ट्र, दे श) — नपुंसक लङ्ग। मन्त्री = यः मन्त्रं ददा त सः — जो सलाह दे ता है। दोन पद आज
भी हन्द म ज्य के त्य चलते ह।
प्र.2 ण्ठ्य – कण्ठ्यः = क् + अ + ण् + ठ् + य् + अ + ◌ः । एवमेव — न्त्य – दन्त्यः, त्स्य – मत्स्यः, ष्ठ्य – ओष्ठ्यः —
एतेषां वण- वयोगं कुवन्तु ।
चार म तीसरा व्यञ्जन ‘य्’ है। ऐसे जोड़ प्रायः त द्धत प्रत्यय ‘य’ से बनते ह — जसका अथ होता है ‘उससे सम्ब न्धत’।
संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् वण- वयोगः अथः
ण्ठ्य कण्ठ्यः क् + अ + ण् + ठ् + य् + अ + ◌ः (पुस्तके दत्तम्) कण्ठ से बोला जाने वाला
ण् + ठ् + य = ण्ठ्य
न्त्य दन्त्यः द् + अ + न् + त् + य् + अ + ◌ः दन्त से बोला जाने वाला
न् + त् + य = न्त्य
त्स्य मत्स्यः म् + अ + त् + स् + य् + अ + ◌ः मछली
त् + स् + य = त्स्य
ष्ठ्य ओष्ठ्यः ओ + ष् + ठ् + य् + अ + ◌ः ओष्ठ से बोला जाने वाला
ष् + ठ् + य = ष्ठ्य
‘ओष्ठ्यः’ म केवल छह वण: क्य क शब्द ‘ओ’ स्वर से आरम्भ होता है — उसके आगे कोई व्यञ्जन नह । ओ + ष्
+ ठ् + य् + अ + ◌ः। तुलना क जए ‘कण्ठ्यः’ से, जसम आरम्भ म क् + अ जुड़कर वण सात हो जाते ह।
अथ जोड़कर याद क जए: कण्ठ + य = कण्ठ्यः (कण्ठ से बोला जाने वाला), दन्त + य = दन्त्यः, ओष्ठ + य =
ओष्ठ्यः, मूधा + य = मूधन्यः, तालु + य = तालव्यः — पहले पाठ के उ ारण- ान इन्ह पद से बने ह। ‘मत्स्यः’
का अथ है मीनः — मछली।
प्र.3 न्ध्य – सन्ध्यक्षरम् = स् + अ + न् + ध् + य् + अ + क् + ष् + अ + र् + अ + म् । एवमेव — ◌ंस्क – संस्कृतम् —
अस्य वण- वयोगं कुवन्तु ।
इन दोन पद म दो-दो संयुक्त-व्यञ्जन ह, इसी लए ये सबसे लम्बे बनते ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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संयुक्त- पदम् वण- वयोगः अथः
m a se
व्यञ्जनम्
.co सन्ध्यक्षरम् l
ag सन्ध्यक्षर (ए ऐ ओ
न्ध्य
a s em स् + अ + न् + ध् + य् + अ + क् + ष् + अ + र् + अ + म् (पुस्तके
ag l
न् + ध् + य = न्ध्य दत्तम्) औ)
◌ंस्क संस्कृतम् स् + अ + ◌ं + स् + क् + ऋ + त् + अ + म् संस्कृत भाषा
co m
. ag
◌ं + स् + क = ◌ंस्क
se m
l a
‘संस्कृतम्’ म नौ वण: स् + अ + ◌ं + स्a+gक् + ऋ + त् + अ + म्। दो बात ध्यान क ह — (1) ‘◌ं’ अनुस्वार एक
अलग वण है, और (2) ‘कृ’ म जो नीचे क मात्रा है वह ऋ स्वर है, ‘र’ नह । ‘ऋ’ को ‘ र’ पढ़ना सबसे आम भूल है।
co m
se m.
o m l a
g ण’)।
c दो स्वर क स न्ध से बना अक्षर, यानी ए, ऐ, ओ, औ (पहला पाठ, ‘सन्ध्यक्षरा
शब्द का अथ: संस्कृतम् = सम् + कृत — ‘भली-भाँ त संस्का रत, सँवारी हुई’ भाषा। सन्ध्यक्षरम् = स न्ध +
अक्षरम् .— a
se m
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.co agl
– धा म् = ध् + आ + र् + ष् + ट् + य् + अ + म् । त्स्न्य – कात्स्न्यम् = क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ +
m
प्र.4
म् — एतयोः वै श ं वदन्तु ।
l a se
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. c om
उत्तरम् (संस्कृतम्): एतयोः पदयोः वै शष्ट्यम् इदम् — ‘धाष्ट्यम्’ इत्यत्र चत्वा र व्यञ्जना न (र् + ष् + ट् + य्) म लता न,
‘कात्स्न्यम्’ इत्यत्र तु पञ्च व्यञ्जना न (र् + त् + स् + न् + य्) म लता न। एतत् संस्कृतस्य द घतमं संm
s e
om gla
युक्त-व्यञ्जनम् अ स्त।
. c a
a s eसंmयुक्त-व्यञ्जनम्
gl
पदम् वण- वयोगः अथः
a
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धा म् ध् + आ + र् + ष् + ट् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) धृष्टता, ढठाई
a se
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र् + ष् + ट् + य =
.क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् (पुस्तके दत्तम्) a g
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त्स्न्य कात्स्न्यम् स ूणता
agl
र् + त् + स् + न् + य = त्स्न्य
m
( हन्द : ‘धाष्ट्यम्’ म चार व्यञ्जन एक साथ जुड़े ह और ‘कात्स्न्यम्’ म पाँच — यह संस्कृत का सबसे लम्बा संयुक्त-व्यञ्जन है।)
. co
se m
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.cधा म्। पढ़ते समय उसे ‘आ’ के तुरन्त बाद बो लए: धा-र्-ष्-ट्-य-म्। यहीagबात ‘कात्स्न्यम्’ क भी है — का-र्-त्-
लखने का ढं ग: ‘र्’ सबसे पहले है, इस लए वह रेफ बनकर पूरे जोड़े के ऊपर, सबसे अन्त म दखाई दे ता है —
se m
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स्-न्-य-म्।
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. c agl
शब्दाथ (पृष्ठ 30): धा म् = धृष्टता, ढठाई (Audacity) — यह ‘धृष्ट’ से बना भाववाचक पद है। कात्स्न्यम् =
स ूणता (Entirety) — यह ‘कृत्स्न’m
a s e (स ूण) से बना है।
agl
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m as e
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वण-संयोगः — पृष्ठ 28
वण-संयोगः
वण-सं योगः
प्र.1 वण-संयोगं कुवन्तु, पदं च लखन्तु — दाशर थः = द् + आ + श् + अ + र् + अ + थ् + इ + ◌ः । (…… = ह् + इ + म्
+ आ + ल् + अ + य् + अ + ◌ः ; …… = क् + ऋ + ष् + ण् + अ + ◌ः ; …… = न् + अ + र् + ए + न् + द् + र् + अ
+ ◌ः ; …… = म् + अ + ञ् + ज् + उ + ल् + अ + ◌ः ; …… = प् + उ + ष् + क् + अ + र् + अ + ◌ः ; …… = क् +
उ + क् + क् + उ + ट् + अ + ◌ः)
वण-संयोगः वण- वयोग का ठ क उल्टा काम है — बखरे वण को जोड़कर पूरा पद बनाना।
वणाः संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् अथः
द् + आ + श् + अ + र् + अ + थ् + इ + ◌ः — दाशरिथः (पुस्तके दत्तम्) दशरथ का पुत्र ( ीराम)
ह् + इ + म् + आ + ल् + अ + य् + अ + ◌ः — िहमालयः हमालय पवत
क् + ऋ + ष् + ण् + अ + ◌ः ष् + ण = ष्ण कृष्णः ीकृष्ण
न् + अ + र् + ए + न् + द् + र् + अ + ◌ः न् + द् + र = न्द्र नरे न्द ः राजा, स ाट्
म् + अ + ञ् + ज् + उ + ल् + अ + ◌ः ञ् + ज = ञ्ज मञ्जुल ः सुन्दर, रमणीय
प् + उ + ष् + क् + अ + र् + अ + ◌ः ष् + क = ष्क पुष्करः कमल
क् + उ + क् + क् + उ + ट् + अ + ◌ः क् + क = क्क कु क्कु टः मुगा
जोड़ने का क्रम: पहले हर व्यञ्जन के साथ उसका अगला स्वर जो ड़ए (क् + ऋ = कृ), और जहाँ दो व्यञ्जन
लगातार बना स्वर के आएँ, वहाँ संयुक्त-व्यञ्जन बनाइए (ष् + ण् = ष्ण)। अन्त म सब मलाकर — कृ + ष्ण + अ
+ ◌ः = कृष्णः।
सावधानी: ‘क् + ऋ’ से कृ बनता है, ‘ क्र’ नह । ‘ऋ’ एक स्वर है, इस लए वह व्यञ्जन के नीचे मात्रा बनकर लगता
है। इसी तरह ‘न् + अ + र् + ए’ म ‘र् + ए’ = रे — नरेन्द्रः।
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प्र.2 …… = स् + व् + अ + स् + त् + इ + क् + अ + ◌ः ; …… = श् + इ + क् + ष् + अ + क् + अ + ◌ः ; …… = स् + अ
+ ङ् + ग् + अ + ण् + अ + क् + अ + म् ; …… = क् + अ + न् + द् + उ + क् + अ + ◌ः ; …… = ध् + आ + र् + ष्
+ ट् + य् + अ + म् ; …… = क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् — पदा न लखन्तु ।
शेष छह पद —
वणाः संयुक्त-व्यञ्जनम् पदम् अथः
स् + व् + अ + स् + त् + इ + क् + अ + ◌ः स् + त = स्त स्विस्तकः मङ्गल- चह्न
श् + इ + क् + ष् + अ + क् + अ + ◌ः क् + ष = क्ष िशक्षकः अध्यापक
स् + अ + ङ् + ग् + अ + ण् + अ + क् + अ + म् ङ् + ग = ङ्ग सङ् गणकम् सङ्गणक-यन्त्र (Computer)
क् + अ + न् + द् + उ + क् + अ + ◌ः न् + द = न्द कन्दुकः गद
ध् + आ + र् + ष् + ट् + य् + अ + म् र् + ष् + ट् + य = धाष्ट म् धृष्टता, ढठाई
क् + आ + र् + त् + स् + न् + य् + अ + म् र् + त् + स् + न् + य = त्स्न्य कात्स्न्यम् स ूणता
‘स्व स्तकः’ म दो संयुक्त-व्यञ्जन: आरम्भ म स्व (स् + व्) और बीच म स्त (स् + त्)। जोड़ने पर — स्व + स्त +
क + ◌ः = स्व स्तकः। शब्द का अथ है ‘सु + अ स्त’ = ‘भला हो’, इसी लए यह मङ्गल- चह्नम् कहलाता है।
पुस्तक क एक छोट असंग त: पृष्ठ 28 का वण-संयोग ‘प् + उ + ष् + क् + अ + र् + अ + ◌ः’ दे ता है, जससे पद
बनता है पुष्करः (पुं लङ्ग)। पर पृष्ठ 30 क शब्दाथ-ता लका म वही शब्द पुष्करम् (नपुंसक लङ्ग) छपा है। संस्कृत म
दोन रूप शुद्ध ह और अथ एक ही है — कमल। संयोग-अभ्यास म पुष्करः ल खए, क्य क वण वही कहते ह।
नया शब्द: सङ्गणकम् = सङ्गणक-यन्त्रम् (Computer) — ‘सम् + गणक’ यानी ‘जो अ तरह गणना करे’। यह
आधु नक वस्तु के लए बनाया गया नया संस्कृत पद है।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 29–30
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
शब्दाथाः
शब्दाथाः
प्र.1 मातृभाषया अथ लखन्तु — (शब्दः / अथः / हन्द / English ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः, पृष्ठ 29–30) ।
अ न्तम स्तम्भ आपको अपनी मातृभाषा म भरना है — जो भाषा आप घर म बोलते ह। नीचे पूरी सूची संस्कृत तथा हन्द अथ के
साथ द गई है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
अणवः समुद ः सागर Sea / Ocean
उष्ट्रः क्रमेल कः ऊँट Camel
बाह्यम् बिहः िस्थतम् बाहरी External
ग्रहणम् स्वीकरणम् / धारणम् स्वीकार करना / पकड़ना Taking / holding
वज्रम् इन्द स्य आयुधम् / हीरकम् इन्द्र का शस्त्र / हीरा Indra’s weapon / Diamond
द्र ा यः पश्यित दे खने वाला Spectator
ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर Ultimate Reality / One Supreme God
दे वाः सृष्टेः पूज्याः शक्तयः, संसार क पूजनीय श क्तयाँ एवं Divine forces, powers & entities of the
िवभूतयः च वभू तयाँ Universe
ऋ षः मन्त्रद ष्टा तपस्वी Sage / Seer
प्रग तः उ न्नितः वकास Development
ब्रह्मचारी िवद्या-संयम-वती वद्या व संयम व्रत रखने वाला Celibate
जाह्नवी जह्न ोः ऋषेः पुत्री – गङ् गा जह्न ऋ ष क पुत्री – गङ्गा Rishi Jahnu’s daughter – Ganga
सप्त षः सप्तानाम् ऋषीणां समूहः सात महान् ऋ षय का समूह Group of Seven Great Sages
ढक्का डम ः ढोल, डंका, नगाड़ा Drum
वत्तम् धनम् धन / पैसे Money / prosperity
पङ् कजम् पद्मम् कमल Lotus
स न्धः द्वयोः वणयोः मेल नम् दो वण का मेल Joining of two letters
सँस्कता यः संस्कारं करोित संस्कार करने वाला Performer of Samskaras
काँस्कान् कान् कान् कन- कन को To whom all
क स्म द् कु त्रिचद् कह पर / कसी म Somewhere
संयमः आत्मानुशासनम् आत्म- नयन्त्रण Self-control
संवादः परस्पर-सम्भाषणम् सौहादपूण चचा Discussion / interaction
प्रातःकालः पभात-वेल ा सुबह का समय Morning Time
राष्ट्रम् दे शः राष्ट्र / दे श Nation
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
मीनःom as e
मत्स्यः
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मछली Fish
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धा म्se
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g l a धृष्टता ढठाई Audacity
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कात्स्न्यम् सम्पूणता संपूणता Entirety
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दाशर थः दशरथस्य पुत्रः
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दशरथ का पुत्र
m . Dasharatha’s Son ag
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नरेन्द्रः नपृ ः / समाट् a
राजा / स ाट् King / Emperor
सुन्दरः
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मञ्जुलः रमणीय Lovely / charming
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पद्मम्
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पुष्करम् कमल Lotus
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स्व स्तकः मङ् गल -िचह्न म् शुभ चह्न Auspicious symbol
aglसङ्गणकम् सङ् गणक-यन्त्रम् सङ्गणक Computer
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कन्दुकः गेन्दुकः गद Ball
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नमूना उत्तर (मातृभाषा — मराठ ): अणवः = समुद्र, उष्ट्रः = उं ट, वत्तम् = धन, मत्स्यः = मासा, कन्दुकः = चडू ,
प्रातःकालः = सकाळ, राष्ट्रम् = राष्ट्र, सङ्गणकम् = संगणक।
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नमूना उत्तर (मातृभाषा — त मल): अणवः = கடல் , उष्ट्रः = ஒட்டகம் , मत्स्यः = மீ ன் , कन्दुकः = பந் து,
m
m
प्रातःकालः = கா ல, सङ्गणकम् = கண ன ।
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g = বল, प्रातःकालः = সকাল।
नमू.नcा उत्तर (मातृभाषा — बांग्ला): अणवः = সমুদ , उष्ट्रः = উট, मत्स्यः = মাছ, कन्दुकः
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ये शब्द यह क्य रखे गए: ध्यान द जए — हर शब्द म कोई-न-कोई संयुक्त-व्यञ्जन है, और वही शब्द पृष्ठ 26–
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28 के वण- वयोग-अभ्यास म भी आया है। यानी शब्दावली और व्याकरण एक साथ चल रहे ह: अर्णवः (ण), उष्ट्र◌ः
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(ष्ट्र), वत्तम् (त्त), मत्स्य◌ः (त्स्य), सङ्गणकम् (ङ्ग)।
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दो सुन्दर शब्द-कथाएँ: अणवः = ‘अण’ यानी जल; जसम जल भरा हो वह अणव — समुद्र। पङ् कजम् = पङ् के
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(क चड़ म) जायते इ त — जो क चड़ म उत्पन्न हो, यानी कमल। ऐसे शब्द को यौ गक कहते ह, क्य क अथ उनके
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अवयव से ही नकल आता है।
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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 30
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
प रयोजना
प रयोजनाकायम्
प्र.1 प्रथम-पाठद्वयं वहाय अ स्मन् पुस्तके आगतानां दशानां संयुक्त-व्यञ्जन-पदानां संग्रहणं कुवन्तु । तेषां वण-
वयोगम् अ प कुवन्तु । यथा — वृक्षः (तृतीय-पाठे ) = व् + ऋ + क् + ष् + अ + ◌ः ; वैद्या (तृतीय-पाठे ) = व् + ऐ +
द् + य् + आ ।
यह अपनी पुस्तक म खोजकर करने वाला काम है, इस लए हर वद्याथ क सूची थोड़ी अलग होगी। पुस्तक ने दो उदाहरण दे दए
ह — वृक्षः और वैद्या — आपको ऐसे दस पद और जुटाने ह, पहले दो पाठ को छोड़कर।
करने का ढं ग —
1. तीसरे पाठ से आगे के पन्ने पल टए और जहाँ भी कोई अक्षर दो मं ज़ल का दखे (ऊपर-नीचे या आगे-पीछे जुड़ा हुआ), उस पद
पर नशान लगाइए।
2. कॉपी म चार खाने बनाइए — पदम् / पाठः / वण- वयोगः / संयुक्त-व्यञ्जनम्।
3. वण- वयोग करते समय हर व्यञ्जन हलन्त के साथ और हर मात्रा को पूरा स्वर बनाकर ल खए।
4. अन्त म यह भी लख द जए क उस पद म कौन-कौन से व्यञ्जन जुड़े — जैसे क् + ष = क्ष।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
नमूना उत्तर (अपनी पुस्तक से पाठ-सङ् ख्या स्वयं मलाइए):
क्रमः पदम् वण- वयोगः संयुक्त-व्यञ्जनम् अथः
— वृक्षः व् + ऋ + क् + ष् + अ + ◌ः क् + ष = क्ष पेड़ (पुस्तके दत्तम्)
— वैद्या व् + ऐ + द् + य् + आ द् + य = द्य वैद्या (पुस्तके दत्तम्)
1 पुष्पम् प् + उ + ष् + प् + अ + म् ष् + प = ष्प फूल
2 मत्रम् म् + इ + त् + र् + अ + म् त् + र = त्र मत्र
3 वद्यालयः व् + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ + ◌ः द् + य = द्य वद्यालय
4 छात्रः छ् + आ + त् + र् + अ + ◌ः त् + र = त्र वद्याथ
5 शक्षकः श् + इ + क् + ष् + अ + क् + अ + ◌ः क् + ष = क्ष अध्यापक
6 पुस्तकम् प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ + म् स् + त = स्त पुस्तक
7 सूयः स् + ऊ + र् + य् + अ + ◌ः र् + य = य सूय
8 चन्द्रः च् + अ + न् + द् + र् + अ + ◌ः न् + द् + र = न्द्र चन्द्रमा
9 पवतः प् + अ + र् + व् + अ + त् + अ + ◌ः र् + व = व पहाड़
10 गच्छ त ग् + अ + च् + छ् + अ + त् + इ च् + छ = च्छ जाता है
अच्छे उत्तर म यह ज़रूर हो: (1) दस पद तीसरे पाठ या उसके बाद के ह — पहले दो पाठ के नह ; (2) हर पद
के आगे पाठ-सङ् ख्या लखी हो, जैसे पुस्तक ने ‘(तृतीय-पाठे )’ लखा है; (3) कम-से-कम दो पद ऐसे ह जनम
तीन व्यञ्जन जुड़े ह (जैसे चन्द्रः, राष्ट्रम्); (4) वण- वयोग म हर छपा हुआ ‘अ’ भी गना गया हो।
आगे बढ़कर क जए: एक चाट-पेपर पर बीच म बड़े अक्षर म क्ष, त्र, ज्ञ, द्य, न्द्र, ष्ट्र ल खए और हर एक के चार
ओर उससे बने पद तथा उनके चत्र चपकाइए। यह कक्षा क द वार के लए सबसे अ ा प रयोजना-काय बनेगा।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ क पहली बात — द्वयोः बहूनां वा व्यञ्जन-वणानां मेलनेन संयुक्त-व्यञ्जना न भव न्त। जब एक व्यञ्जन अपना
स्वर छोड़कर (हलन्त के साथ) दूसरे व्यञ्जन से जुड़ता है, तब संयुक्त-व्यञ्जन बनता है — क् + ष = क्ष, त् + र = त्र, ज् + ञ
= ज्ञ, द् + य = द्य।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 2 संयुक्त-व्यञ्जना न AglaSem · NCERT Solutions
ये नए वण नह ह। पुस्तक क टप्पणी स्पष्ट कहती है — “एता न संयुक्त-व्यञ्जना न नवीनाः वणाः न स न्त, अ पतु …
व शष्टा लेखन-शैली एव।” और “एतैः सह आगतः स्वरः संयुक्त-व्यञ्जनेषु अन्तभूतः ना स्त।” — यानी ‘क्ष’ म सुनाई दे ने वाला
‘अ’ जोड़े का हस्सा नह , अलग वण है।
वण- वयोगः (पृष्ठ 26–28) — पद को उसके वण म तोड़ना: अजः = अ + ज् + अ + ◌ः। हर व्यञ्जन हलन्त के साथ, हर
मात्रा पूरा स्वर बनकर, और अनुस्वार (◌ं) तथा वसग (◌ः) अलग वण गनकर लखे जाते ह। छपे हुए ‘अ’ को गनना ही इस
अभ्यास क असली परीक्षा है।
जोड़ दो से पाँच व्यञ्जन तक होता है — दो: क्ष, त्र, ङ् क, ञ्ज; तीन: न्द्र, ष्ट्र, ण्ठ्य, न्ध्य; चार: (धाष्ट्यम्); पाँच: त्स्न्य
(कात्स्न्यम्) — यह संस्कृत का सबसे लम्बा संयुक्त-व्यञ्जन है।
‘र्’ क दो शै लयाँ — ‘र्’ पहले हो तो ऊपर रेफ बनता है (अ + र् + ण = अणवः), और बाद म हो तो नीचे रकार (क् + र =
क्र)। तथा पञ्चम-वण- नयम — हर वग के व्यञ्जन से पहले उसी वग का पञ्चम वण आता है: ङ् क, ञ्ज, ण्ठ, न्ध, म्भ।
अनुस्वार ( ◌ं ) और अनुना सक ( ँ ) क गनती अलग है — ‘◌ं’ स्वतन्त्र वण है (संयमः = स् + अ + ◌ं + य् + अ + म् + अ
+ ◌ः), पर ‘◌ँ’ स्वर पर ही लगता है, इस लए ‘सँस्कता’ म ‘अँ’ एक ही वण गना जाता है। वण-संयोगः इसका उल्टा काम है
— बखरे वण से पद बनाना।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ सं युक्त-व्यञ्जनम्
अणवः समुद ः सागर र् + ण = ण
उष्ट्रः क्रमेल कः ऊँट ष् + ट् + र = ष्ट्र
वज्रम् इन्द स्य आयुध म् / हीरकम् इन्द्र का शस्त्र / हीरा ज् + र = ज्र
द्रष्टा यः पश्यित दे खने वाला द् + र = द्र
जाह्नवी जह्नोः ऋषेः पुत्र ी – गङ् गा जह्न ऋ ष क पुत्री – गङ्गा ह् + न = ह्न
सप्त षः सप्तानाम् ऋषीणां समूहः सात महान् ऋ षय का समूह र् + ष = ष
स न्धः द्वयोः वणयोः मेल नम् दो वण का मेल न् + ध = न्ध
क स्म श्चद् कु त्रिचद् कह पर / कसी म स् + म = स्म, श् + च = श्च
प्रातःकालः पभात-वेल ा सुबह का समय ◌ः + क = ◌ःक
मत्स्यः मीनः मछली त् + स् + य = त्स्य
धाष्ट्यम् ध ृष्टता ढठाई र् + ष् + ट् + य = ष्ट्य
कात्स्न्यम् सम्पूणता स ूणता र् + त् + स् + न् + य = त्स्न्य
सङ्गणकम् सङ् गणक-यन्त्रम् सङ्गणक (Computer) ङ् + ग = ङ्ग
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