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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 4: अहं च त्वं च
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
47 – 60 12 31 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 28 pages
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: अहं च त्वं च
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के चतुथः पाठः — अहं च त्वं च के सभी अभ्यास , चत्र-पे टकाओं, शब्दाथ-सार णय ,
योग्यता वस्तर और प रयोजनाकाय के पूरे हल। पछले पाठ म सः / एषा / एतत् जैसे तीसरे व्य क्त के सवनाम पढ़े थे; यह पाठ बात को अपने ऊपर
ले आता है — अहम् – आवाम् – वयम् (उत्तमपुरुषः) और त्वम् – युवाम् – यूयम् (मध्यमपुरुषः), इनके साथ लगने वाले अ स्म – स्वः – स्मः तथा
अ स – स्थः – स्थ क्रयापद, आदरसूचक भवान् / भवती, तथा ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार लखने का नयम। पृष्ठ 47 से 60 तक का हर शीषक —
आत्मप रचय- चत्र, पुं लङ्गम्, स्त्री लङ्गम्, वयं शब्दाथान् जानीमः, वयम् अभ्यासं कुमः (प्रश्न १–५, उपभाग (क)–(ठ) स हत), योग्यता वस्तरः,
गीतम् – अहं पठा म तथा प रयोजनाकायम् — क्रम से हल कया गया है, हर संवाद और ोक के हन्द अनुवाद के साथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 47 – 60
खं ड प्रश्न
12 31
माध्यम
हन्द
मम नाम … अहं … (आत्मप रचयः) — पृष्ठ 47–48
पाठ-प्रवेशः — चत्रपे टकाः
पाठः
प्र.1 पृष्ठ 47 — मम नाम भरतः । अहं छात्रः । मम नाम गणेशः । अहं शक्षकः । मम नाम गौतमः । अहं च कत्सकः ।
मम नाम राघवः । अहं कृषकः । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं कुवन्तु, व्याकरणं च स्प ीकुवन्तु ।
पाठ का पहला पृष्ठ चार चत्र से अपना प रचय दे ना सखाता है। हर प रचय म दो ही वाक्य ह — पहले नाम, फर काम।
चत्रम् संस्कृतम् हन्द
कक्षा म खड़ा वद्याथ मम नाम भरतः । अहं छात्रः । मेर ा नाम भरत है। मैं छात्र हू।
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श्यामपट के पास खड़ा अध्यापक मम नाम गणेशः । अहं शक्षकः । मेर ा नाम गणेश है। मैं िशक्षक हू।
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च कत्सालय म बैठा वैद्य मम नाम गौतमः । अहं च कत्सकः । मेर ा नाम गौतम है। मैं िचिक त्सक (डॉक्टर ) हू।
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खेत म घास काटता कसान मम नाम राघवः । अहं कृषकः । मेर ा नाम राघव है। मैं िकसान हू।
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व्याकरण- ववेचनम् (संस्कृतम्): ‘मम’ इ त अस्मद्-शब्दस्य षष्ठी- वभक्तेः एकवचनम् (= मेरा)। ‘अहम्’ इ त अस्मद्-शब्दस्य
प्रथमा- वभक्तेः एकवचनम्। ‘छात्रः, शक्षकः, च कत्सकः, कृषकः’ — सवा ण पुं लङ्गे प्रथमा-एकवचना न।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
क्रया कहाँ गई ? ‘अहं छात्रः।’ म ‘अ स्म’ ( ँ) कह दखता नह , फर भी अथ ‘म छात्र ँ’ ही है। संस्कृत म ‘अस्’
धातु का रूप ऐसे प रचय-वाक्य म छोड़ा जा सकता है — इसे व्याकरण म क्रयापद-अध्याहारः कहते ह। पृष्ठ 51
पर वही वाक्य क्रया के साथ भी दखाए गए ह — ‘अहम् आरक्षकः अ स्म।’ दोन शुद्ध ह।
अनुस्वार पर ध्यान: लखा है ‘अहं छात्रः’, ‘अहं शक्षकः’ — यहाँ मूल शब्द अहम् है, पर आगे ‘छ् ’, ‘श्’ जैसे
व्यञ्जन ह, इस लए ‘म्’ बदलकर अनुस्वार हो गया। यही नयम पृष्ठ 52 पर दया गया है।
प्र.2 पृष्ठ 48 — मम नाम मेनका । अहं छात्रा । मम नाम प्रयंवदा । अहं श क्षका । मम नाम सु मत्रा । अहं च क त्सका
। मम नाम रा धका । अहं सै नक । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पृष्ठ 48 पर वही चार प रचय ह, पर अब बोलने वाली स्त्रयाँ ह — इस लए हर व्यवसाय-वाचक शब्द स्त्री लङ्ग म आया है।
चत्रम् संस्कृतम् हन्द
कक्षा म खड़ी छात्रा मम नाम मेनका । अहं छात्रा । मेर ा नाम मेनका है। मैं छात्र ा हू।
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श्यामपट के पास खड़ी अध्या पका मम नाम प्रयंवदा । अहं श क्षका । मेर ा नाम िपयंवदा है। मैं िशिक्षका हू।
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च कत्सालय म बैठ वैद्या मम नाम सु मत्रा । अहं च क त्सका । मेर ा नाम सुिम त्र ा है। मैं िचिकित्सका (मिहला डॉक्टर ) हू।
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वद पहने खड़ी सै नक मम नाम रा धका । अहं सै नक । मेर ा नाम रािधका है। मैं सै िनक (मिहला सै िनक ) हू।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘छात्रा, श क्षका, च क त्सका’ इ त आकारान्त-स्त्री लङ्गे प्रथमा-एकवचना न; ‘सै नक ’ इ त ईकारान्त-
स्त्री लङ्गे प्रथमा-एकवचनम्। ‘अहम्’ तु पुं स स्त्रयां च समानम् एव — अस्मद्-शब्दः लङ्गभेदं न गृ ा त।
सबसे बड़ी बात यही है: ‘अहम्’ न पुं लङ्ग है, न स्त्री लङ्ग। लड़का भी ‘अहम्’ कहता है और लड़क भी ‘अहम्’।
लङ्ग का पता आगे लगने वाले संज्ञा-पद से चलता है — अहं छात्र◌ः (लड़का), अहं छात्र◌ा (लड़क )। यही बात ‘त्वम्,
आवाम्, वयम्, युवाम्, यूयम्’ पर भी लागू होती है।
‘मम नाम मेनका’ म ‘नाम’ नपुंसक लङ्ग है (नामन् शब्द), इसी लए ‘मम नाम’ म ‘मम’ का रूप नह बदला —
षष्ठी वभ क्त का ‘मम’ हर लङ्ग म एक-सा रहता है।
प्र.3 पृष्ठ 47–48 योः चत्रपे टकासु आगतानां व्यवसायवाचकशब्दानां पुं लङ्गरूपा ण स्त्री लङ्गरूपा ण च पृथक् लखन्तु
।
दोन पृष्ठ आमने-सामने रखकर दे खए — चार जोड़े साफ़ दखाई दगे।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
पुं लङ्गम् (पृष्ठ 47) स्त्री लङ्गम् (पृष्ठ 48) हन्द अथ स्त्री लङ्ग कैसे बना
छात्रः छात्र ा छात्र / छात्रा ‘◌ः’ हटाकर ‘आ’ (टाप्)
िशक्षकः िशिक्षका शक्षक / श क्षका ‘अक’ → ‘इका’
िचिक त्सकः िचिकित्सका डॉक्टर ‘अक’ → ‘इका’
सै िनकः सै िनकी सै नक ‘◌ः’ हटाकर ‘ई’ (ङ प्)
कृ षकः कृ िषका कसान ‘अक’ → ‘इका’ (पुस्तके न दत्तम्, अभ्यासाथम्)
दो साँचे, इस लए दो अन्त: जो शब्द ‘–अक’ पर समाप्त होते ह ( शक्षक, च कत्सक, गायक, पाचक, नतक)
उनका स्त्री लङ्ग प्रायः ‘–इका’ बनता है — श क्षका, च क त्सका, गा यका, पा चका। पर ‘नतक’ का स्त्री लङ्ग
पुस्तक म नतक दया है — यानी हर बार एक ही नयम नह चलता, शब्द को वैसा ही याद करना पड़ता है जैसा
पुस्तक म छपा है।
जाँचने का आसान तरीक़ा: स्त्री लङ्ग शब्द के आगे ‘एषा’ और पुं लङ्ग के आगे ‘एषः’ लगाकर बो लए — एषः
शक्षकः। एषा श क्षका। य द कान को अटपटा लगे तो लङ्ग ग़लत है।
पुं लङ्गम् — पृष्ठ 49
त्वं कः ? युवां कौ ? यूयं के ?
पाठः
प्र.1 त्वं कः ? अहं सै नकः । युवां कौ ? आवां सै नकौ । यूयं के ? वयं सै नकाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु, वभ क्तं वचनं च लखन्तु ।
हन्द अनुवाद —
वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं कः ? अहं सै नकः । तुम कौन हो ? मैं सै िनक हू।
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वचनम् युवां कौ ? आवां सै नकौ । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों सै िनक है।
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बहुवचनम् यूयं के ? वयं सै नकाः । तुम सब कौन हो ? हम सब सै िनक है।
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व्याकरण- ववेचनम् (संस्कृतम्): ‘त्वम्, युवाम्, यूयम्’ इ त युष्मद्-शब्दस्य प्रथमा- वभक्तेः क्रमेण एकवचनं, वचनं, बहुवचनं च।
‘अहम्, आवाम्, वयम्’ इ त अस्मद्-शब्दस्य प्रथमा- वभक्तेः त्री ण वचना न। ‘कः – कौ – के’ इ त कम्-शब्दस्य पुं लङ्गे प्रथमा-
रूपा ण। ‘सै नकः – सै नकौ – सै नकाः’ इ त अकारान्त-पुं लङ्गे प्रथमा-रूपा ण।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च
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प्रश्न ‘तुम’ म, उत्तर ‘म’ म: ध्यान द जए — पूछा जाता है त्वं कः ? पर उत्तर आता है अहं सै नकः। पूछने वाला
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‘युष्मद्’ (मध्यमपुरुष) प्रयोग करता है और उत्तर दे ने वाला ‘अस्मद्’ (उत्तमपुरुष)। जोड़ा याद र खए
त्वम्→अहम्., cयुoवाम्→आवाम्, यूयम्→वयम्।
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agचत्रl से वचन मलाइए: पृष्ठ 49 क पहली पं क्त म एक सै नक, फर दो, फर तीन खड़े ह — इसी लए क्रमशः
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एकवचन, वचन, बहुवचन। संस्कृत म तीन से लेकर सौ तक सब के लए एक ही बहुवचन चलता है।
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त्वं कः ? अहं गायकः । युवां कौ ? आवां गायकौ । यूयं के ? वयं गायकाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
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हन्द अनुवाद —
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एकवचनम् त्वं कः ? अहं गायकः । तुम कौन हो ? मैं गायक हू।
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युवां कौ ? आवां गायकौ । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों गायक है।
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बहुवचनम् यूयं के ? वयं गायकाः । तुम सब कौन हो ? हम सब गायक है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘गायकः’ इ त गै (गाने) इ त धातोः ण्वुल्-प्रत्ययेन नष्पन्नं कतृवाचकं पदम् — यः गाय त सः गायकः। प्रथमा-
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s e क्तः, पुं लङ्गम्, एकवचनम्।
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‘–क’ वाले शब्द कता बताते ह: गायकः (जो गाए), पाचकः (जो पकाए), चालकः (जो चलाए), लेखकः (जो
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लखे), क्र डकः (जो खेले), शक्षकः (जो सखाए)। धातु म ‘अक’ जोड़ते ही ‘करने वाला’ बन जाता है — इसी लए
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इस पाठ के लगभग सारे व्यवसाय-शब्द इसी साँचे के ह।
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स्त्री लङ्ग रूप अगले पृष्ठ पर: पृष्ठ 50 पर यही संवाद स्त्रय के लए है — त्वं का ? अहं गा यका। यानी एक ही
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शब्द के दो रूप — गायकः और गा यका।
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agl प्र.3 त्वं कः ? अहं पत्रकारः । युवां कौ ? आवां पत्रकारौ । यूयं के ? वयं पत्रकाराः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
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वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं कः ? अहं पत्रकारः । तुम कौन हो ? मैं पत्र कार हू।
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वचनम् युवां कौ ? आवां पत्रकारौ । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों पत्र कार है।
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बहुवचनम् यूयं के ? वयं पत्रकाराः । तुम सब कौन हो ? हम सब पत्र कार है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘पत्रकारः’ = पत्रम् (समाचारपत्रम्) + कारः (यः करो त) इ त तत्पुरुष-समासः। अकारान्तं पुं लङ्गम्, प्रथमा-
वभ क्तः। पृष्ठ 52 दत्तः पयायः — वाताहरः (यः वाता हर त = समाचार लाने वाला)।
दो शब्द जुड़कर एक: संस्कृत नए काम-धन्ध के नाम ऐसे ही बनाती है — पत्र + कार = पत्रकार, चत्र + कार =
चत्रकार, तन्त्र + ज्ञ = तन्त्रज्ञ (टे क्नोलॉजी जानने वाला), अ ध + वक्तृ = अ धवक्ता (वक ल)। शब्द का अथ उसके
भीतर ही खुला रखा होता है — यही संस्कृत क सु वधा है।
वचन का चह्न ‘–औ’: पत्रकारः → पत्रकार◌ौ, सै नकः → सै नक◌ौ, गायकः → गायक◌ौ। और बहुवचन का
चह्न ‘–आः’ — पत्रकार◌ाः। अकारान्त पुं लङ्ग के ये तीन अन्त (◌ः / औ / आः) पूरे पाठ म काम आएँगे।
प्र.4 त्वं कः ? अहं पाचकः । युवां कौ ? आवां पाचकौ । यूयं के ? वयं पाचकाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
हन्द अनुवाद —
वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं कः ? अहं पाचकः । तुम कौन हो ? मैं रसोइया हू।
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वचनम् युवां कौ ? आवां पाचकौ । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों रसोइए है।
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बहुवचनम् यूयं के ? वयं पाचकाः । तुम सब कौन हो ? हम सब रसोइए है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘पाचकः’ = पच् (पकाना) इ त धातोः नष्पन्नम् — यः पच त सः पाचकः। एतेषु सवषु वाक्येषु क्रयापदं
(अ स्म / स्वः / स्मः) अध्याहृतम् अ स्त; पूणरूपेण — अहं पाचकः अ स्म। आवां पाचकौ स्वः। वयं पाचकाः स्मः।
चार संवाद का एक ही साँचा है: प्रश्न — त्वं कः ? / युवां कौ ? / यूयं के ? ; उत्तर — अहं …◌ः / आवां …औ /
वयं …◌ाः। केवल बीच का व्यवसाय-शब्द बदलता है। इस साँचे म अपना नाम-काम डालकर बो लए — अहं छात्रः।
आवां छात्रौ। वयं छात्राः। पूरा पाठ इसी अभ्यास पर टका है।
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पुं लङ्ग म ‘कः – कौ – के’ है, स्त्री लङ्ग म ‘का – के – काः’। इस लए पृष्ठ 49 पर ‘यूयं के ?’ (बहुवचन) है और
पृष्ठ 50 पर ‘युवां के ?’ ( वचन)। एक ही ‘के’ दो जगह — भेद केवल सवनाम (यूयं / युवां) से पहचा नए।
स्त्री लङ्गम् — पृष्ठ 50
त्वं का ? युवां के ? यूयं काः ?
पाठः
प्र.1 त्वं का ? अहं गा यका । युवां के ? आवां गा यके । यूयं काः ? वयं गा यकाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
हन्द अनुवाद —
वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं का ? अहं गा यका । तुम कौन हो ? मैं गाियका हू।
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वचनम् युवां के ? आवां गा यके । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों गाियकाएँ है।
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बहुवचनम् यूयं काः ? वयं गा यकाः । तुम सब कौन हो ? हम सब गाियकाएँ है।
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व्याकरण- ववेचनम् (संस्कृतम्): ‘का – के – काः’ इ त कम्-शब्दस्य स्त्री लङ्गे प्रथमा-रूपा ण। ‘गा यका – गा यके – गा यकाः’
इ त आकारान्त-स्त्री लङ्गे प्रथमा-रूपा ण। ‘त्वम्, युवाम्, यूयम्’ तथा ‘अहम्, आवाम्, वयम्’ — एता न रूपा ण स्त्री लङ्गे अ प
तान्येव तष्ठ न्त।
पूरा भेद अ न्तम वण का है: पुं लङ्ग म कः – कौ – के, स्त्री लङ्ग म का – के – काः। इसी तरह संज्ञा म पुं लङ्ग
गायकः – गायकौ – गायकाः, स्त्री लङ्ग गा यका – गा यके – गा यकाः। सवनाम अहम्/त्वम् नह बदलते, बदलते
ह संज्ञा और प्रश्नवाचक।
आकारान्त स्त्री लङ्ग का वचन ‘–ए’ होता है — गा यका → गा यक◌े, पा चका → पा चक◌े, बा लका →
बा लक◌े। बहुवचन म ‘–आः’ — गा यक◌ाः। यह ‘लता’ शब्द का साँचा है।
प्र.2 त्वं का ? अहं तन्त्रज्ञा । युवां के ? आवां तन्त्रज्ञे । यूयं काः ? वयं तन्त्रज्ञाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
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वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं का ? अहं तन्त्रज्ञा । तुम कौन हो ? मैं तन्त्रज्ञ ा (क म्प्यूटर इंजीिनयर ) हू।
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वचनम् युवां के ? आवां तन्त्रज्ञे । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों तन्त्रज्ञ ा है।
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बहुवचनम् यूयं काः ? वयं तन्त्रज्ञाः । तुम सब कौन हो ? हम सब तन्त्रज्ञ ा है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘तन्त्रज्ञा’ = तन्त्रम् (यन्त्र वद्या) + ज्ञा (या जाना त) — उपपद-तत्पुरुषः। स्त्री लङ्गे आकारान्तम्; पुं लङ्गे तु
तन्त्रज्ञः। पृष्ठ 52 दत्तः पयायः — सङ्गणकज्ञः (सङ्गणकम् = कम्प्यूटर)।
दो रूप एक जैसे दखते ह, सावधान: स्त्री लङ्ग का बहुवचन तन्त्रज्ञाः और पुं लङ्ग का बहुवचन भी तन्त्रज्ञाः —
दोन एक-से! भेद साथ लगे सवनाम और चत्र से पहचा नए — पृष्ठ 50 पर स्त्रयाँ कम्प्यूटर पर काम कर रही ह,
इस लए यहाँ स्त्री लङ्ग है।
नई तकनीक के संस्कृत नाम: सङ्गणकम् = कम्प्यूटर, दूरवाणी = टे लीफ़ोन, चलदूरवाणी = मोबाइल, अन्तजालम् =
इण्टरनेट, वद्युत्पत्रम् = ई-मेल। इन्ह अपनी कॉपी म लखकर याद क जए।
प्र.3 त्वं का ? अहं नतक । युवां के ? आवां नतक्यौ । यूयं काः ? वयं नतक्यः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु, रूपभेदं च स्प ीकुवन्तु ।
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वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं का ? अहं नतक । तुम कौन हो ? मैं नतकी हू।
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वचनम् युवां के ? आवां नतक्यौ । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों नतिकयाँ है।
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बहुवचनम् यूयं काः ? वयं नतक्यः । तुम सब कौन हो ? हम सब नतिकयाँ है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘नतक ’ इ त ईकारान्त-स्त्री लङ्गम् (नद -शब्दवत्)। अतः अस्य रूपा ण — नतक (एकवचनम्), नतक्यौ
( वचनम्), नतक्यः (बहुवचनम्)। पृष्ठ 52 दत्तः पयायः — नृत्याङ्गना।
यहाँ रूप क्य बदल गया ? ‘गा यका’ आकारान्त थी, इस लए उसके रूप बने गा यके / गा यकाः। पर ‘नतक ’
ईकारान्त है — इसम ‘ई’ बदलकर ‘य्’ हो जाती है और फर प्रत्यय जुड़ता है : नतक + औ → नतक्यौ; नतक +
अः → नतक्यः। यही नयम ‘नद → नद्यौ → नद्यः’ और ‘लेखनी → लेखन्यौ → लेखन्यः’ म भी चलता है।
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पाठ क तीन स्त्री लङ्ग-श्रे णयाँ एक साथ याद क जए: आकारान्त — गा यका, पा चका, च क त्सका, छात्रा,
तन्त्रज्ञा, आर क्षका, धा वका, क्र डका, अनुवैद्या; ईकारान्त — नतक , सै नक , गृ हणी, अ धवक्त्री। पहली ेणी म
वचन ‘–ए’, दूसरी म ‘–यौ’।
प्र.4 त्वं का ? अहं पा चका । युवां के ? आवां पा चके । यूयं काः ? वयं पा चकाः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
हन्द अनुवाद —
वचनम् संस्कृतम् हन्द
एकवचनम् त्वं का ? अहं पा चका । तुम कौन हो ? मैं रसोइया (पािचका) हू।
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वचनम् युवां के ? आवां पा चके । तुम दोनों कौन हो ? हम दोनों पािचकाएँ है।
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बहुवचनम् यूयं काः ? वयं पा चकाः । तुम सब कौन हो ? हम सब पािचकाएँ है।
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व्याकरण- ववेचनम्: ‘पा चका’ इ त ‘पाचकः’ इत्यस्य स्त्री लङ्गरूपम् — ‘अक’ इत्यस्य स्थाने ‘इका’। प्रथमा- वभ क्तः, आकारान्त-
स्त्री लङ्गम्।
पृष्ठ 49 और 50 आमने-सामने र खए: दोन पृष्ठ क चौथी पं क्त एक ही व्यवसाय क है — पुं लङ्ग म पाचकः–
पाचकौ–पाचकाः, स्त्री लङ्ग म पा चका–पा चके–पा चकाः। इसी तरह दूसरी पं क्त गायक/गा यका क है। पूरा पाठ
इसी जोड़- मलान पर बना है।
प्रश्नवाचक क पूरी सारणी एक बार म:
लङ्गम् एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
पुं लङ्गम् कः कौ के
स्त्री लङ्गम् का के काः
अस्- क्रयापदयुक्ता न वाक्या न — पृष्ठ 51
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च
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पाठः — अ स / अ स्म / स्थः / स्वः / स्थ / स्मः
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त्वं चत्रकारः अ स । युवां चत्रकारौ स्थः । यूयं चत्रकाराः स्थ । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं कुवन्तु,
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क्रयापदा न च स्प ीकुवन्तु ।
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संस्कृतम् हन्द पुरुषः / वचनम्
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त्वं चत्रकारः अ स । तुम िचत्र कार हो।
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aglयूयं चत्रकाराः स्थ । तुम सब िचत्र कार हो। मध्यमपुरुषः, बहुवचनम्
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व्याकरण- ववेचनम् (संस्कृतम्): ‘अ स – स्थः – स्थ’ इ त अस्-धातोः लट् -लकारे मध्यमपुरुषस्य त्री ण वचना न। ‘ चत्रकारः’ =
चत्रम् + कारः; पृष्ठ 52 दत्तः पयायः आलेख्यकारः।
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अब क्रया दख रही है: पृष्ठ 49–50 पर वाक्य केवल दो पद के थे — ‘अहं सै नकः।’ यहाँ तीसरा पद जुड़ गया —
क्रयापद। तीन पद एक ही वचन म ह : युवां ( वचन) + चत्रकारौ ( वचन) + स्थः ( वचन)। यही वाक्य-शु द्ध
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का नयम है — कता, वशेष्य और क्रया, तीन का वचन एक।
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m और ‘स्थ’ म केवल वसग का अन्तर है — स्थ◌ः = तुम दोन हो ( वचन), स्थ = तुम सब हो (बहुवचन)।
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agl लखते समय वसग छू ट जाए तो अथ ही बदल जाता है, इस लए वसग ध्यान से लगाइए।
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अहम् आरक्षकः अ स्म । आवाम् स्वः । वयम् आरक्षकाः स्मः । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं कुवन्तु
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हन्द अनुवाद —
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अहम् आरक्षकः अ स्म । मैं आर क्षक (पुिलसकम ) हू।
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mहम दोनों आरक्षक है।ं agl
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आवाम् आरक्षकौ स्वः । उत्तमपुरुषः, वचनम्
वयम् आरक्षकाः स्मः । a g l हम सब आर क्षक है।
ं उत्तमपुरुषः, बहुवचनम्
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण- ववेचनम्: ‘अ स्म – स्वः – स्मः’ इ त अस्-धातोः लट् -लकारे उत्तमपुरुषस्य त्री ण वचना न। ‘आरक्षकः’ इत्यस्य पयायः
आरक्षी (पृष्ठ 52)।
यहाँ ‘अहम्’ लखा है, ‘अहं’ नह — क्य ? क्य क आगे आरक्षकः है, यानी स्वर। अनुस्वार का नयम केवल
व्यञ्जन से पहले लगता है। इसी लए — अहम् आरक्षकः, पर अहं चत्रकारः; वयम् आरक्षकाः, पर वयं गायकाः। यही
अन्तर पृष्ठ 52 का नयम सखाता है।
छह रूप, एक ही पं क्त म याद क जए: अ स्म–स्वः–स्मः (म/हम दोन /हम सब), अ स–स्थः–स्थ (तुम/तुम दोन /
तुम सब)। ये बारह म से छह ह; शेष तीन (अ स्त–स्तः–स न्त) प्रथमपुरुष के ह और पृष्ठ 59 क सारणी म मलगे।
प्र.3 त्वं गा यका अ स । युवां गा यके स्थः । यूयं गा यकाः स्थ । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
हन्द अनुवाद —
संस्कृतम् हन्द पुरुषः / वचनम्
त्वं गा यका अ स । तुम गाियका हो। मध्यमपुरुषः, एकवचनम्
युवां गा यके स्थः । तुम दोनों गाियकाएँ हो। मध्यमपुरुषः, वचनम्
यूयं गा यकाः स्थ । तुम सब गाियकाएँ हो। मध्यमपुरुषः, बहुवचनम्
व्याकरण- ववेचनम्: क्रयापदम् लङ्गं न पश्य त — ‘अ स’ पुं स स्त्रयां च समानम्। तुलयन्तु — त्वं चत्रकारः अ स (पुं लङ्गम्), त्वं
गा यका अ स (स्त्री लङ्गम्)। क्रया केवल पुरुषं तथा वचनं पश्य त।
यह सबसे उपयोगी नयम है: हन्द म क्रया लङ्ग भी दे खती है — ‘तुम गायक हो’ / ‘वह गाती है’। संस्कृत म ऐसा
नह । ‘अ स’ लड़के के लए भी और लड़क के लए भी। बदलती है संज्ञा (गायकः/गा यका), क्रया नह ।
ध्यान द जए: ‘गा यका अ स’ म स न्ध नह क गई — दोन पद अलग-अलग लखे ह। कक्षा 6 म स न्ध करना
अ नवाय नह ; पुस्तक भी पद अलग-अलग ही रखती है ता क रूप स्पष्ट दख।
प्र.4 अहं च क त्सका अ स्म । आवां च क त्सके स्वः । वयं च क त्सकाः स्मः । — एतेषां वाक्यानां हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
हन्द अनुवाद —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतम् हन्द पुरुषः / वचनम्
अहं च क त्सका अ स्म । मैं िचिकित्सका (मिहला डॉक्टर ) हू।
ँ उत्तमपुरुषः, एकवचनम्
आवां च क त्सके स्वः । हम दोनों िचिकित्सकाएँ है।
ं उत्तमपुरुषः, वचनम्
वयं च क त्सकाः स्मः । हम सब िचिकित्सकाएँ है।
ं उत्तमपुरुषः, बहुवचनम्
व्याकरण- ववेचनम्: ‘ च क त्सका’ — आकारान्त-स्त्री लङ्गम्; पयायः वै ा (पृष्ठ 52)। ‘ च क त्सके’ वचनम्, ‘ च क त्सकाः’
बहुवचनम्। ‘अ स्म – स्वः – स्मः’ उत्तमपुरुषस्य रूपा ण।
पूरे पृष्ठ 51 का सार एक सारणी म:
सवनाम पुरुषः क्रयापदम् वाक्य-उदाहरणम्
त्वम् मध्यमपुरुषः अिस त्वं चत्रकारः अ स।
युवाम् मध्यमपुरुषः स्थः युवां गा यके स्थः।
यूयम् मध्यमपुरुषः स्थ यूयं चत्रकाराः स्थ।
अहम् उत्तमपुरुषः अिस्म अहं च क त्सका अ स्म।
आवाम् उत्तमपुरुषः स्वः आवाम् आरक्षकौ स्वः।
वयम् उत्तमपुरुषः स्मः वयं च क त्सकाः स्मः।
अगले पृष्ठ के अभ्यास इसी सारणी से हल ह गे — प्रश्न २ म क्रया दे खकर सवनाम भरना है, प्रश्न ३ म सवनाम
दे खकर क्रया लखनी है। इस लए इन छह जोड़ को कण्ठस्थ कर ली जए।
‘म्’ इत्यस्य अनुस्वारस्य च लेखन नयमः — पृष्ठ 52
लेखन नयमः
योग्यता वस्तरः
प्र.1 ‘म्’ इत्यस्य अनुस्वारस्य च लेखन नयमं लखन्तु । यथा — पुस्तकं ना स्त । पुस्तकम् अ स्त ।
नयमः (पुस्तकस्य शब्दे षु): व्यञ्जनवणात् पूव पदान्तस्य ‘म्’ इत्यस्य स्थाने ‘अनुस्वारः’ लेखनीयः ।
हन्द म नयम — य द कसी पद के अन्त म म् हो और उसके तुरन्त बाद कोई व्यञ्जन आए, तो उस ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार
(◌ं) लखा जाता है। य द आगे स्वर हो, तो ‘म्’ ज्य का त्य रहता है।
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वाक्यम् आगे क्या है ? क्या लखा जाएगा हन्द
पुस्तकम् + न अ स्त ‘न्’ = व्यञ्जन पुस्तकं नािस्त । पुस्तक नह है।
पुस्तकम् + अ स्त ‘अ’ = स्वर पुस्तकम् अिस्त । पुस्तक है।
यह नयम बनाया क्य गया ? ‘म्’ को बोलने म ह ठ पूरे बन्द करने पड़ते ह। य द आगे व्यञ्जन आ जाए तो ह ठ
बन्द करके तुरन्त दूसरा व्यञ्जन बोलना क ठन हो जाता है, इस लए उ ारण नाक से नकलने वाली हल्क ध्व न म
बदल जाता है — वही अनुस्वार है। स्वर से पहले ऐसी क ठनाई नह होती, इस लए वहाँ ‘म्’ बना रहता है।
दो-तीन बार बोलकर दे खए: ‘पुस्तकम् ना स्त’ — जीभ और ह ठ अटकते ह; ‘पुस्तकं ना स्त’ — बहता हुआ
नकलता है। संस्कृत के स न्ध- नयम अ धकतर बोलने क सु वधा से ही बने ह।
प्र.2 अ स्मन् पाठे आगता न ‘म्’-अन्ता न पदा न गृहीत्वा नयमस्य प्रयोगं दशयन्तु — अहम्, त्वम्, वयम्, यूयम्,
आवाम्, युवाम् ।
यही नयम पूरे पाठ म हर वाक्य पर लागू हुआ है। नीचे पाठ के अपने ही उदाहरण दे खए —
मूलपदम् आगे व्यञ्जनः (अनुस्वारः) आगे स्वरः (‘म्’ यथावत्)
अहम् अहं छात्र ः । अहं गायकः । अहं िचिकित्सका अिस्म । अहम् आर क्षकः अिस्म । अहम् अनुवै ा अिस्म ।
त्वम् त्वं कः ? त्वं छात्रः अिस । त्वं धािवका अिस । त्वम् अिधवक्त्री अिस ।
वयम् वयं सै िनकाः । वयं िशक्षकाः स्मः । वयम् आर क्षकाः स्मः । वयम् अभ्यासं कु म ः ।
यूयम् यूयं के ? यूयं िचत्र काराः स्थ । यूयम् अिधवक्त्र्यः स्थ ।
आवाम् आवां सै िनकौ । आवां गाियके स्वः । आवाम् आर क्षकौ स्वः । आवाम् अनुवै े स्वः ।
युवाम् युवां कौ ? युवां ीिडके स्थः । युवाम् अिधवक्त्र्यौ स्थः ।
पुस्तक क छपाई ही उत्तर है: पृष्ठ 51 पर छपा है — ‘अहम् आरक्षकः अ स्म’ पर ‘अहं च क त्सका अ स्म’। पहले
म आगे ‘आ’ (स्वर) है, दूसरे म ‘च्’ (व्यञ्जन)। पुस्तक म जहाँ भी ‘म्’ दखे, आगे दे खए — वहाँ स्वर ही मलेगा।
अभ्यास क जए (उत्तर स हत): (1) अहम् + गच्छा म → अहं गच्छा म (आगे ग् = व्यञ्जन)। (2) वयम् + स्मः
→ वयं स्मः (आगे स् = व्यञ्जन)। (3) त्वम् + अ स → त्वम् अ स (आगे अ = स्वर)। (4) यूयम् + काः → यूयं काः
(आगे क् = व्यञ्जन)। (5) आवाम् + आर क्षके → आवाम् आर क्षके (आगे आ = स्वर)।
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वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 52–53
शब्दः – अथः – हन्द – English
शब्दाथाः
प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 52–53 दत्तानां सवषां शब्दानाम् अथान् लखन्तु ।
पुस्तक क सारणी म चार स्तम्भ ह — शब्दः (पाठ का शब्द), अथः (उसी का संस्कृत पयाय), हन्द और English। पाँचवाँ स्तम्भ
खाली छोड़ा गया है — ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’।
1. सवनाम तथा क्रयापदा न (पृष्ठ 52) —
शब्दः अथः (संस्कृतपयायः) हन्द ENGLISH
मम मदीयम् मेर ा / मेर ी My / Mine
नाम अिभधानम् नाम Name
अहम् अहम् मैं I
आवाम् आवाम् हम दोनों We both
वयम् वयम् हम लोग We all
त्वम् त्वम् तुम You
युवाम् युवाम् तुम दोनों You both
यूयम् यूयम् तुम लोग You all
अ स्त वतते है Is
स्तः वतते (दो) है ं (Both) Are
स न्त वतन्ते है ं Are
2. व्यवसायवाचकाः शब्दाः (पृष्ठ 52) —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च
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शब्दः अथः (संस्कृतपयायः) हन्द ENGLISH
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सै नकः
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सै िनक
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Soldier
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तन्त्रज्ञः तन्त्रज्ञ Computer Engineer
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सङ् गणकज्ञः
पत्रकारः वात हरः पत्र कार Journalist
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नतक नत्ृ याङ् गना Female Dancer
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चत्रकारः आले ख्यकारः
a िचत्र कार Illustrator
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आरक्षकः आरक्षी आर क्षक Policeman
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च क त्सका िचिकित्सका वै ा Female Doctor
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3. शेषाः शब्दाः (पृष्ठ 53) —
ENGLISH
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शब्दः अथः (संस्कृतपयायः) हन्द
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छात्रः िव ाथ छात्र Student
लेखकः ले खनकत
agl ले खक Writer
क्र डकः खेल कः िखलाड़ी
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Player
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गायकः गायनः गायक Singer
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चालकः चालकः चालक Driver
ag छात्र ा Girl Student
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छात्रा िव ािथनी
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द्र वणम् िवत्तम्
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‘अथः’ वाला स्तम्भ पयायवाची सखाता है: सै नकः = भटः, पत्रकारः = वाताहरः (जो वाता = समाचार लाए),
आरक्षकः = आरक्षी, नतक = नृत्याङ्गना, अ स्त = वतते। परीक्षा म ‘पयायपदं लखत’ पूछा जाए तो उत्तर इसी
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स्तम्भ से आएगा।
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a s em अ न्तम शब्द ‘द्र वणम्’ यहाँ क्य है ? वह पाठ के चत्र म नह , ब ल्क पृष्ठ 53 के ोक म आया है — ‘त्वमेव
agl वद्या द्र वणं त्वमेव’। इसी लए उसका अथ (धन) सारणी म जोड़ दया गया है।
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प्र.2 मातृभाषया अथ लखन्तु — (सारण्याः अ न्तमः स्तम्भः, पृष्ठ 52–53)
यह अपने हाथ से भरने वाला स्तम्भ है, इस लए हर वद्याथ का उत्तर अलग होगा — जसक मातृभाषा हन्द है वह हन्द म,
जसक मराठ है वह मराठ म लखेगा।
करने का ढं ग —
1. पहले हन्द और English स्तम्भ पढ़कर शब्द का अथ पक्का सम झए।
2. फर वही अथ अपनी मातृभाषा के रोज़ बोले जाने वाले शब्द म ल खए — कताबी शब्द ढूँ ढ़ने क आवश्यकता नह ।
3. जहाँ आपक भाषा म शब्द संस्कृत जैसा ही हो (जैसे ‘नाम’, ‘सै नक’), वहाँ वही लख द जए और नीचे रेखा ख च द जए —
इससे पता चलेगा क आपक भाषा म संस्कृत के कतने शब्द ज्य के त्य चलते ह।
नमूना उत्तर (कुछ शब्द, चार भाषाओं म):
शब्दः हन्द मराठ बाङ् ला त मऴ्
अहम् मैं मी आिम नान्
त्वम् तुम तू तुिम नी
वयम् हम लोग आ म्ही आमरा नाङ् गळ्
नाम नाम नाव नाम पेयर्
सै नकः सै िनक सै िनक सै िनक वीरन्
छात्रः छात्र िव ाथ छात्र माणवन्
अच्छे उत्तर म यह ज़रूर हो: (1) सारणी के सभी शब्द का अथ भरा हो, कोई खाना छू टा न हो; (2) अथ आपक
अपनी भाषा म हो, अं ेज़ी क नक़ल नह ; (3) जो शब्द संस्कृत से ज्य का त्य आया हो, उसे च ह्नत कया गया हो।
यह काम मज़ेदार क्य है: भरने के बाद ग नए क कतने शब्द आपक मातृभाषा म लगभग वैसे ही ह — नाम,
सै नक, छात्र, चालक, लेखक, चत्रकार, पत्रकार। भारत क अ धकांश भाषाओं क शब्द-सम्पदा संस्कृत से आई है,
यही इस स्तम्भ का असली पाठ है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 53
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अभ्यासः (प्रश्नौ १–२)
अभ्यासः
प्र.1 उ ैः पठन्तु अवगच्छन्तु च — त्वमेव माता च पता त्वमेव, त्वमेव ब ुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव व ा द्र वणं त्वमेव,
त्वमेव सव मम दे वदे व ॥
यह एक परम्परागत प्राथना- ोक है, जो प्रायः पूजा और वद्यालय क प्राथना-सभा म गाया जाता है। पुस्तक ने नीचे इसका पद-
वच्छे द भी दे दया है।
अन्वयः (पदक्रमः) —
दे वदे व ! त्वम् एव माता, त्वम् एव च िपता,
त्वम् एव बन्धुः, त्वम् एव च सखा,
त्वम् एव िव ा, त्वम् एव द िवणम्,
त्वम् एव मम सवम् (अिस) ।
हन्द अथ —
संस्कृतम् हन्द
त्वमेव माता च पता त्वमेव तुम ही माता हो और तुम ही िपता हो।
त्वमेव ब ुश्च सखा त्वमेव तुम ही भाई-बन्ध ु हो और तुम ही िम त्र हो।
त्वमेव व ा द्र वणं त्वमेव तुम ही िव ा हो और तुम ही धन हो।
त्वमेव सव मम दे वदे व हे दे वों के दे व ! तुम ही मेर ा सब कु छ हो।
भावः — भक्त कहता है क संसार म जतने भी सम्बन्ध और जतनी भी सम्प त्तयाँ ह — माता, पता, भाई, मत्र, वद्या, धन — वे
सब मुझे एक ही ईश्वर म मल जाते ह। जसे भगवान् मल गया, उसे कसी और सहारे क आवश्यकता नह । यह पूण समपण का
ोक है — इसी लए हर पं क्त म ‘त्वम् एव’ (तुम ही) बार-बार दोहराया गया है।
पाठ से जो ड़ए: पूरे ोक म एक ही शब्द बार-बार आता है — त्वम्, यानी युष्मद्-शब्द का प्रथमा एकवचन, जो
इसी पाठ का मुख्य वषय है। और अन्त म ‘मम सवम्’ म अस्मद्-शब्द क षष्ठी वभ क्त है। यानी ोक पाठ के
दोन शब्द — अहम् और त्वम् — का सुन्दर उदाहरण है।
तीन स याँ पहचा नए: (1) त्वमेव = त्वम् + एव — आगे स्वर ‘ए’ है, इस लए ‘म्’ बना रहा और जुड़ गया। (2)
ब ुश्च = बन्धुः + च — वसग के बाद ‘च’ आने पर वसग ‘श्’ हो गया। (3) सव मम = सवम् + मम — आगे ‘म्’
(व्यञ्जन) है, इस लए अनुस्वार। तीसरी स न्ध ठ क वही है जो पृष्ठ 52 पर पढ़ ।
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‘उ ैः पठन्तु’ का अथ है ‘ज़ोर से प ढ़ए’। यह ोक कण्ठस्थ करने योग्य है — लय के साथ तीन-चार बार
बो लए, याद अपने-आप हो जाएगा। ‘अवगच्छन्तु’ = सम झए भी, केवल र टए मत।
प्र.2 उदाहरणानुगुणम् अधो ल खतेषु वाक्येषु प कातः उ चतैः पदै ः रक्तस्थाना न पूरयन्तु — (प का : त्वं, युवां, यूयं,
अहम्, आवां, वयं) यथा – त्वं छात्रः अ स । (क) ……… शक्षकौ स्वः । (ख) मञ्चे ……… नतक्यः स्थ । (ग) अत्र
……… अ स्म । (घ) सभायां ……… गा यके स्थः । (ङ) व ालये ……… स्मः । (च) वै ालये ……… च क त्सका
अस।
भरने का तरीक़ा एक ही है — पहले क्रयापद दे खए, उसी से पुरुष और वचन पक्का हो जाता है, और फर उसी का सवनाम भर
द जए।
क्रमः क्रयापदम् पुरुषः / वचनम् पूण वाक्यम् हन्द
यथा अिस मध्यमपुरुषः, एकवचनम् त्वं छात्रः अिस । (पुस्तके दत्तम्) तुम छात्र हो।
(क) स्वः उत्तमपुरुषः, वचनम् आवां िशक्षकौ स्वः । हम दोन शक्षक ह।
(ख) स्थ मध्यमपुरुषः, बहुवचनम् म ञ्चे यूयं नतक्यः स्थ । मंच पर तुम सब नत कयाँ हो।
(ग) अिस्म उत्तमपुरुषः, एकवचनम् अत्र अहम् अिस्म । यहाँ म ँ।
(घ) स्थः मध्यमपुरुषः, वचनम् सभायां युवां गाियके स्थः । सभा म तुम दोन गा यकाएँ हो।
(ङ) स्मः उत्तमपुरुषः, बहुवचनम् िव ालये वयं स्मः । वद्यालय म हम सब ह।
(च) अिस मध्यमपुरुषः, एकवचनम् वै ालये त्वं िचिकित्सका अिस । च कत्सालय म तुम च क त्सका हो।
जाँच का पक्का तरीक़ा: प का म ठ क छह पद ह और रक्तस्थान भी छह — इस लए हर पद ठ क एक बार ही
आएगा। भरने के बाद गन ली जए : त्वं, युवां, यूयं, अहम्, आवां, वयं — छह एक-एक बार आ गए तो उत्तर न त
रूप से ठ क है।
दो सहारे और: (1) संज्ञा का वचन भी सङ् केत दे ता है — ‘ शक्षक◌ौ’ वचन है, ‘नतक्यः’ बहुवचन। (2) (ग) म
‘अहम् अ स्म’ लखा है, ‘अहं अ स्म’ नह — क्य क आगे ‘अ’ स्वर है। यह पृष्ठ 52 का अनुस्वार- नयम है।
शब्दाथ: मञ्चे = मंच पर, अत्र = यहाँ, सभायाम् = सभा म, वद्यालये = वद्यालय म, वैद्यालये = च कत्सालय म। ये
सब सप्तमी वभ क्त के रूप ह, जनका अथ ‘म / पर’ होता है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 54–57
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अभ्यासः (प्रश्नः ३ — उपभागाः (क)–(ठ))
अभ्यासः
प्र.3 चत्रं दृ ् वा उदाहरणस्य अनुगुणं वाक्या न लखन्तु — (पृष्ठ 54–57, उपभागाः (क) तः (ठ) पयन्तम्)
चार पृष्ठ पर एक ही काम है — दए गए एकवचन वाक्य को दे खकर उसी अथ के वचन और बहुवचन वाक्य लखना। चत्र म
गनकर दे खए — पहले खाने म एक व्य क्त, दूसरे म दो, तीसरे म तीन ह।
पृष्ठ 54 — अहम् / आवाम् / वयम् (पुं लङ्गम्)
यथा – अहं शक्षकः अ स्म । आवां शक्षकौ स्वः । वयं शक्षकाः स्मः ।
क्रमः एकवचनम् (दत्तम्) वचनम् बहुवचनम्
(क) अहं तन्त्रज्ञः अिस्म । आवां तन्त्रज्ञ ौ स्वः । वयं तन्त्रज्ञ ाः स्मः ।
(ख) अहं नतकः अिस्म । आवां नतकौ स्वः । वयं नतकाः स्मः ।
(ग) अहं चालकः अिस्म । आवां चालकौ स्वः । वयं चालकाः स्मः ।
पृष्ठ 55 — अहम् / आवाम् / वयम् (स्त्री लङ्गम्)
यथा – अहम् आर क्षका अ स्म । आवाम् आर क्षके स्वः । वयम् आर क्षकाः स्मः ।
क्रमः एकवचनम् (दत्तम्) वचनम् बहुवचनम्
(घ) अहं छात्रा अिस्म । आवां छात्र े स्वः । वयं छात्र ाः स्मः ।
(ङ) अहं गाियका अिस्म । आवां गाियके स्वः । वयं गाियकाः स्मः ।
(च) अहम् अनुवै ा अिस्म । आवाम् अनुवै े स्वः । वयम् अनुवै ाः स्मः ।
पृष्ठ 56 — त्वम् / युवाम् / यूयम् (पुं लङ्गम्)
यथा – त्वं च कत्सकः अ स । युवां च कत्सकौ स्थः । यूयं च कत्सकाः स्थ ।
क्रमः एकवचनम् (दत्तम्) वचनम् बहुवचनम्
(छ) त्वं ले खकः अिस । युवां ले खकौ स्थः । यूयं ले खकाः स्थ ।
(ज) त्वं सै िनकः अिस । युवां सै िनकौ स्थः । यूयं सै िनकाः स्थ ।
(झ) त्वं ीडकः अिस । युवां ीडकौ स्थः । यूयं ीडकाः स्थ ।
पृष्ठ 57 — त्वम् / युवाम् / यूयम् (स्त्री लङ्गम्)
यथा – त्वं क्र डका अ स । युवां क्र डके स्थः । यूयं क्र डकाः स्थ ।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च
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क्रमः एकवचनम् (दत्तम्) वचनम् बहुवचनम्
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त्वम् अिधवक्त्री अिस । युवाम् अिधवक्त्र्यौ स्थः ।
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यूयम् अिधवक्त्र्यः स्थ ।
se m त्वं छात्रा अिस ।
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(ठ) त्वं धािवका अिस । युवां धािवके स्थः । यूयं धािवकाः स्थ ।
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तीन चीज़ एक साथ बदलती ह: (1) सवनाम — अहम्→आवाम्→वयम् अथवा त्वम्→युवाम्→यूयम्; (2) संज्ञा
ag— अ स्म→स्वः→स्मः अथवा अ स→स्थः→स्थ। तीन म से कोई एक
— तन्त्रज्ञः→तन्त्रज्ञौ→तन्त्रज्ञाः; (3) क्रया
भी छू ट गया तो वाक्य अशुद्ध है।
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.cअ धवक्त्री ईकारान्त स्त्री लङ्ग है (नद -शब्दवत्), इस लए इसका वचनa‘अg धवक्त्रीे’ नह ब ल्क
दो सावधा नयाँ जहाँ अ धकतर व ाथ चूकते ह:
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(1) (ञ)
agl (2) (च) अनुवै ा और (ञ) अ धवक्त्री स्वर से शुरू होते ह, इस लए इनसे पहले ‘अहं / त्वं’ नह , अहम् / त्वम् /
अ धवक्त्र्यौ और बहुवचन अ धवक्त्र्यः होगा — ठ क वैसे ही जैसे नतक → नतक्यौ → नतक्यः।
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आवाम् / युवाम् / वयम् / यूयम् — पूरा ‘म्’ लखा जाएगा।
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agl नतकः = नाचने वाला, चालकः = वाहन चलाने वाला, अनुवैद्या =
शब्दाथ: तन्त्रज्ञः = तकनीक जानने वाला,
प रचा रका (नस), अ धवक्त्री = म हला वक ल, धा वका = दौड़ने वाली, क्र डका = खलाड़ी (म हला)।
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s e अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 58
la (प्रश्नौ ४–५)
agअभ्यासः
अभ्यासः
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प्र.4 उदाहरणानुगुणं वाक्या न परस्परं योजयन्तु — यथा – त्वं बा लका अ स । – युवां बा लके स्थः । – यूयं बा लकाः
स्थ । (क) त्वं बा लका अ स । (ख) अहं गायकः अ स्म । (ग) त्वं छात्रः अ स । (घ) अहं शक्षकः अ स्म । (ङ) अहं
नतक अ स्म । (च) त्वं गृ हणी अ स । (छ) अहम् आरक्षकः अ स्म । (ज) त्वं सै नकः अ स । (झ) त्वं च कत्सकः
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अ स । (ञ) अहं तन्त्रज्ञः अ स्म ।
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emमलान का नयम सीधा है — वही व्यवसाय-शब्द और वही पुरुष तीन खान म रहना चा हए। ‘अहम्’ वाली पं क्त ‘आवाम्–
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वयम्’ से जुड़ेगी और ‘त्वम्’ वाली ‘युवाम्–यूयम्’ से।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 4 अहं च त्वं च AglaSem · NCERT Solutions
क्रमः एकवचनम् (प्रथमः स्तम्भः) वचनम् ( तीयः स्तम्भः) बहुवचनम् (तृतीयः स्तम्भः)
यथा त्वं बािलका अिस । युवां बािलके स्थः । यूयं बािलकाः स्थ ।
(क) त्वं बािलका अिस । युवां बािलके स्थः । यूयं बािलकाः स्थ ।
(ख) अहं गायकः अिस्म । आवां गायकौ स्वः । वयं गायकाः स्मः ।
(ग) त्वं छात्रः अिस । युवां छात्र ौ स्थः । यूयं छात्र ाः स्थ ।
(घ) अहं िशक्षकः अिस्म । आवां िशक्षकौ स्वः । वयं िशक्षकाः स्मः ।
(ङ) अहं नतकी अिस्म । आवां नतक्यौ स्वः । वयं नतक्यः स्मः ।
(च) त्वं ग ृिहणी अिस । युवां गृिहण् यौ स्थः । यूयं गृिहण् यः स्थ ।
(छ) अहम् आरक्षकः अिस्म । आवाम् आर क्षकौ स्वः । वयम् आर क्षकाः स्मः ।
(ज) त्वं सै िनकः अिस । युवां सै िनकौ स्थः । यूयं सै िनकाः स्थ ।
(झ) त्वं िचिकत्सकः अिस । युवां िचिक त्सकौ स्थः । यूयं िचिक त्सकाः स्थ ।
(ञ) अहं तन्त्रज्ञः अिस्म । आवां तन्त्रज्ञ ौ स्वः । वयं तन्त्रज्ञ ाः स्मः ।
दो कसौ टयाँ, और उत्तर पक्का: (1) पुरुष-कसौट — अहम् से आरम्भ हुई पं क्त का दूसरा खाना ‘आवाम् …
स्वः’ और तीसरा ‘वयं … स्मः’ ही होगा; त्वम् से आरम्भ हुई पं क्त का ‘युवां … स्थः’ और ‘यूयं … स्थ’। (2) शब्द-
कसौट — तीन खान म एक ही व्यवसाय-शब्द रहे। दोन मल जाएँ तो जोड़ा ठ क है।
दो ईकारान्त शब्द ध्यान से: नतक → नतक्यौ / नतक्यः और गृ हणी → गृ हण्यौ / गृ हण्यः। शेष सब अकारान्त
पुं लङ्ग (–ः / –औ / –आः) या आकारान्त स्त्री लङ्ग (बा लका → बा लके / बा लकाः) ह।
गनकर जाँ चए: दूसरे और तीसरे स्तम्भ के दस वाक्य ठ क एक-एक बार प्रयुक्त होने चा हए — कोई भी वाक्य
बचे नह और कोई दो बार न लगे।
प्र.5 उदाहरणानुगुणम् उत्तराणां प्रश्न नमाणं कुवन्तु — यथा – त्वं च कत्सकः । → कः च कत्सकः ? / त्वं कः ? (क) त्वं
तन्त्रज्ञः । (ख) युवां बालकौ । (ग) यूयं छात्राः । (घ) अहं न्यायाधीशः । (ङ) आवां गा यके । (च) वयं श क्षकाः ।
उदाहरण दखाता है क हर उत्तर से दो प्रश्न बनते ह — एक बार सवनाम क जगह प्रश्नवाचक र खए, दूसरी बार व्यवसाय-शब्द क
जगह। प्रश्नवाचक का लङ्ग और वचन उसी पद जैसा रहेगा जसे वह हटा रहा है।
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क्रमः उत्तरम् प्रश्नः १ (सवनामस्य स्थाने) प्रश्नः २ (संज्ञायाः स्थाने)
यथा त्वं िचिकत्सकः । कः िचिकत्सकः ? त्वं कः ?
(क) त्वं तन्त्रज्ञः । कः तन्त्रज्ञ ः ? त्वं कः ?
(ख) युवां बालकौ । कौ बालकौ ? युवां कौ ?
(ग) यूयं छात्राः । के छात्र ाः ? यूयं के ?
(घ) अहं न्यायाधीशः । कः न्यायाधीशः ? अहं कः ? (संवादे — त्वं कः ?)
(ङ) आवां गाियके । के गाियके ? आवां के ? (संवादे — युवां के ?)
(च) वयं िशिक्षकाः । काः िशिक्षकाः ? वयं काः ? (संवादे — यूयं काः ?)
प्रश्नवाचक का रूप कैसे चुन: जस पद को हटा रहे ह, उसी का लङ्ग-वचन ली जए —
• पुं लङ्गम् : कः (एक), कौ (दो), के (बहुत) — तन्त्रज्ञः → कः, बालकौ → कौ, छात्राः → के।
• स्त्री लङ्गम् : का (एक), के (दो), काः (बहुत) — गा यके → के, श क्षकाः → काः।
इसी लए (ग) म ‘के छात्राः ?’ (पुं लङ्ग बहुवचन) और (ङ) म ‘के गा यके ?’ (स्त्री लङ्ग वचन) — एक ही ‘के’, पर
दो अलग-अलग काम।
(घ), (ङ), (च) म दो उत्तर क्य दए ह ? उदाहरण के साँचे को ज्य का त्य लगाएँ तो सवनाम वही रहेगा जो उत्तर
म है — अहं कः ? / आवां के ? / वयं काः ? — और यह व्याकरण-दृ ष्ट से पूणतः शुद्ध है। पर बातचीत म ‘अहं
न्यायाधीशः’ उत्तर तब मलता है जब कोई पूछे ‘त्वं कः ?’। इस लए दोन रूप स्वीकाय ह; कॉपी म उदाहरण-अनुगुण
रूप ल खए और कोष्ठक म संवाद-रूप जोड़ द जए।
शब्दाथ: न्यायाधीशः = जज, न्याय करने वाला।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 58–59
पुरुषः, ‘अस्’ तथा ‘गम्’ धात्वोः लट् -लकारः
योग्यता वस्तरः
प्र.1 भवान् / भवती, भवन्तौ / भवत्यौ, भवन्तः / भवत्यः — एतेषां प्रयोगः प्रथमपुरुषस्य क्रयापदे न सह भव त । —
एतं नयमं सोदाहरणं स्प ीकुवन्तु ।
नयम — ‘भवान् / भवती’ का अथ ‘आप’ है, फर भी संस्कृत व्याकरण म यह प्रथमपुरुष का शब्द माना जाता है। इस लए इसके
साथ ‘अ स’ नह , अ स्त लगेगा।
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वचनम् पुं लङ्गम् स्त्री लङ्गम् क्रयापदम् हन्द
एकवचनम् भवान् भवती अिस्त / गच्छित आप ह / आप जाते ह
वचनम् भवन्तौ भवत्यौ स्तः / गच्छतः आप दोन ह / जाते ह
बहुवचनम् भवन्तः भवत्यः सिन्त / गच्छिन्त आप सब ह / जाते ह
उदाहरणा न — भवान् शक्षकः अ स्त । (आप शक्षक ह।) भवती च क त्सका अ स्त । (आप च क त्सका ह।) भवन्तः छात्राः
स न्त । (आप सब छात्र ह।) भवती वद्यालयं गच्छ त । (आप वद्यालय जाती ह।)
अशुद्ध बनाम शुद्ध: अशुद्धम् — भवान् अ स । शुद्धम् — भवान् अ स्त । कारण यह है क ‘भवान्’ अथ म ‘आप’ है
पर रूप म ‘वह’ जैसा है — जैसे हन्द म हम आदर से कहते ह ‘ ीमान् जी आए ह’, ‘आप आए हो’ नह । संस्कृत
म यही आदर-भाव व्याकरण के नयम म बँधा हुआ है।
व्यवहार म उपयोग: गुरुजी या कसी बड़े से बात करते समय ‘त्वं कः ?’ नह , ‘भवान् कः ?’ या ‘भवती का ?’
क हए — यही शष्ट संस्कृत है। ‘त्वम्’ का प्रयोग मत्र और समवयस्क के लए होता है।
प्र.2 त्वं, युवां, यूयम् – एतेषां प्रयोगः मध्यमपुरुषस्य क्रयापदे न सह भव त । अहम्, आवां, वयम् – एतेषां प्रयोगः
उत्तमपुरुषस्य क्रयापदे न सह भव त । — नयमम् उदाहरणैः सह लखन्तु ।
संस्कृत म तीन पुरुष होते ह और तीन क क्रया अलग-अलग रूप लेती है।
पुरुषः सवनामा न अथः ‘अस्’ धातुः उदाहरणम्
प्रथमपुरुषः सः / सा, भवान् / भवती वह, आप अिस्त – स्तः – सिन्त सः छात्रः अ स्त ।
मध्यमपुरुषः त्वम् – युवाम् – यूयम् तुम अिस – स्थः – स्थ त्वं छात्रः अ स ।
उत्तमपुरुषः अहम् – आवाम् – वयम् म / हम अिस्म – स्वः – स्मः अहं छात्रः अ स्म ।
हन्द -संस्कृत म नाम उलटे ह — यही सबसे बड़ी भूल क जगह है। हन्द व्याकरण म ‘म’ को उत्तम पुरुष और
‘वह’ को अन्य पुरुष कहते ह; संस्कृत म ‘वह’ को प्रथमपुरुष कहा जाता है और ‘म’ को उत्तमपुरुष। अं ेज़ी म
उलटा — ‘I’ = First person। इस लए संस्कृत का ‘प्रथमपुरुष’ पढ़ते ही मन म ‘वह / सः’ लाइए, ‘म’ नह ।
पहचानने का सरल सूत्र: क्रया के अन्त म – म / –वः / –मः हो तो उत्तमपुरुष (अ स्म, गच्छा म, स्मः, गच्छावः); –
स / –थः / –थ हो तो मध्यमपुरुष (अ स, गच्छ स, स्थः, गच्छथ); – त / –तः / – न्त हो तो प्रथमपुरुष (अ स्त,
गच्छ त, स्तः, गच्छ न्त)।
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प्र.3 ‘अस्’ धातोः लट् -लकारस्य सारण पूरयन्तु — (पुरुषः / एकवचनम् / वचनम् / बहुवचनम्, पृष्ठ 59)
पृष्ठ 59 क पहली सारणी — ‘अस्’ (होना) धातु, लट् -लकारः (वतमान काल)।
पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः भवान् / भवती अिस्त भवन्तौ / भवत्यौ स्तः भवन्तः / भवत्यः सिन्त
मध्यमपुरुषः त्वम् अिस युवां स्थः यूयं स्थ
उत्तमपुरुषः अहम् अिस्म आवां स्वः वयं स्मः
वाक्य-प्रयोगः — भवान् चालकः अ स्त । भवत्यौ गा यके स्तः । भवन्तः सै नकाः स न्त । त्वं लेखकः अ स । युवां छात्रौ स्थः । यूयं
क्र डकाः स्थ । अहं तन्त्रज्ञा अ स्म । आवां नतक्यौ स्वः । वयं शक्षकाः स्मः ।
‘अस्’ के रूप इतने अ नय मत क्य ह ? अ स्त, स्तः, स न्त, अ स, स्थः, स्थ, अ स्म, स्वः, स्मः — इनम धातु कह
‘अस्’ दखती है और कह केवल ‘स्’। यह संस्कृत क सबसे प्राचीन और सबसे अ धक प्रयुक्त धातु है; अ धक
प्रयोग से रूप घसकर छोटे हो जाते ह — ठ क जैसे अं ेज़ी म am, is, are, was, were। इस लए इन्ह नयम से
नह , कण्ठस्थ करके ही सीखा जाता है।
दो-दो का जोड़ा बनाकर याद क जए: अ स्म–अ स–अ स्त (तीन एकवचन), स्वः–स्थः–स्तः (तीन वचन),
स्मः–स्थ–स न्त (तीन बहुवचन)। इस क्रम म बोलने पर नौ रूप जल्द बैठ जाते ह।
प्र.4 ‘गम्’ (गच्छ) धातोः लट् -लकारस्य सारण पूरयन्तु — (पुरुषः / एकवचनम् / वचनम् / बहुवचनम्, पृष्ठ 59)
पृष्ठ 59 क दूसरी सारणी — ‘गम्’ (जाना) धातु, लट् -लकारः। ध्यान द जए, यहाँ प्रथमपुरुष म ‘भवान् / भवती’ के साथ-साथ
‘सः / सा’ भी दए गए ह।
पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः भवान् / भवती, सः / सा गच्छित भवन्तौ / भवत्यौ, तौ / ते गच्छतः भवन्तः / भवत्यः, ते / ताः गच्छिन्त
मध्यमपुरुषः त्वं गच्छिस युवां गच्छथः यूयं गच्छथ
उत्तमपुरुषः अहं गच्छािम आवां गच्छावः वयं गच्छामः
वाक्य-प्रयोगः — सः वद्यालयं गच्छ त । ते ामं गच्छ न्त । त्वं क्र डाक्षेत्रं गच्छ स । यूयं म न्दरं गच्छथ । अहं गृहं गच्छा म । वयं वनं
गच्छामः ।
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यह सारणी ‘अस्’ से आसान है: यहाँ धातु का रूप गच्छ् हर बार वही रहता है, केवल अन्त बदलता है — – त, –
तः, – न्त / – स, –थः, –थ / – म, –वः, –मः। ये नौ प्रत्यय लट् -लकार के परस्मैपद के ह और इन्हem
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वद्, खाद्, क्र.cड्oआ द सैकड़ धातुओं के रूप बनते ह — पठ त, पठ स, पठा म… इस लएgयेl नौ अन्त एक बार ठ क
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e mली जए, आगे का सारा काम आसान हो जाएगा। a
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‘गम्’ का ‘गच्छ् ’ कैसे बना ? लट् -लकार म ‘गम्’ धातु के स्थान पर ‘गच्छ् ’ आदे श होता है, इस लए ‘गम त’ नह ,
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गच्छ त लखा जाता है। ऐसी ही कुछ और धातुएँ — पा → पब त (पीता है), दृश् → पश्य त (दे खता है), स्था →
तष्ठ त (खड़ा होता है)।
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गीतम् – अहं पठा म — पृष्ठ 59
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गीतम्
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प्र.1 गीतम् – अहं पठा म — अहं पठा म संस्कृतम् । अहं वदा म संस्कृतम् । अहं लखा म संस्कृतम् । सदै व सुन्दराक्षरम्
s e m । अहं नमा म मातरम् । सदै व भ क्तपूवकम् ॥ — अस्य गीतस्य
॥ अहं स्मरा म मातरम् । अहं भजा म मातरम्
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हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
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हन्द अनुवाद —
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स्कृतम् हन्द
ag मैं संस्कृ त पढ़ ता / पढ़ ती हू।
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अहं पठा म संस्कृतम् । ँ
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अहं वदा म संस्कृतम् ।
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मैं संस्कृ त बोलता / बोलती हू।
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अहं लखा म संस्कृतम् । मैं संस्कृ त िलखता / िलखती हू।
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सदै व सुन्दराक्षरम् ॥ — और सदा सुन्दर अक्षरों में।
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मैं माता का स्मरण करता हू।
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मैं माता का भजन (आराधना) करता हू ।
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अहं नमा म मातरम् । मैं माता को नमन करता हू।
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सदै व भ क्तपूवकम् ॥ — और सदा भिक्तपूवक (श्र ा के साथ)।
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g माता का स्मरण, आराधना और नमन सदा भ क्त के साथ करूँगा। गीत के साथ छपे चत्र म
भावः — पहला पद्य भाषा का संकल्प है — म संस्कृत केवल प ँ गा नह , बोलूँगा और लखूँगा भी, और लखूँगा भी सुन्दर अक्षर
म। दूसरा पद्य श्रद्धा का संकल्प हैa—
वीणावा दनी सरस्वती ह, इस लए यहाँ ‘माता’ का अथ वाग्दे वी सरस्वती तथा अपनी जननी — दोन लया जा सकता है।
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गीत पाठ का अभ्यास भी है: आठ पं क्तयाँ ‘अहम्’ से शुरू होती ह और हर क्रया उत्तमपुरुष एकवचन म है —
पठा म, वदा म, लखा म, स्मरा म, भजा म, नमा म। सबका अन्त –आ म पर है — यही पृष्ठ 59 क सारणी म
‘गच्छा म’ के रूप म पढ़ा था। पाठ का व्याकरण गीत बनकर याद हो जाता है।
व्याकरण क तीन बात: (1) संस्कृतम् और मातरम् कम ह, इस लए तीया वभ क्त एकवचन म ह (‘मातृ’ शब्द
का तीया एकवचन = मातरम्)। (2) सदै व = सदा + एव (वृ द्ध-स न्ध : आ + ए = ऐ)। (3) सुन्दराक्षरम् = सुन्दर
+ अक्षरम् (द घ-स न्ध : अ + अ = आ) तथा भ क्तपूवकम् — दोन यहाँ क्रया वशेषण क तरह प्रयुक्त ह, अथात्
‘सुन्दर अक्षर म’, ‘भ क्त के साथ’।
करके दे खए: गीत को ‘अहम्’ क जगह ‘वयम्’ रखकर गाइए — वयं पठामः संस्कृतम्। वयं वदामः संस्कृतम्।
पूरी कक्षा एक साथ गा सकेगी, और बहुवचन का अभ्यास भी हो जाएगा।
प्र.2 गीते आगतानां क्रयापदानां पुरुषं वचनं च लखन्तु, तेषां च मध्यमपुरुषे उत्तमपुरुषे च रूपा ण लखन्तु ।
गीत के छह क्रयापद लट् -लकार, उत्तमपुरुष, एकवचन के ह। नीचे उन्ह धातुओं के अन्य रूप भी दए गए ह —
धातुः गीते रूपम् (उत्तम., मध्यमपुरुषः प्रथमपुरुषः उत्तमपुरुषः अथः
एक.) (त्वम्) (सः) (वयम्)
पठ् पठािम पठिस पठित पठामः पढ़ना
वद् वदािम वदिस वदित वदामः बोलना
लख् िलखािम िलखिस िलखित िलखामः लखना
स्मृ स्मरािम स्मरिस स्मरित स्मरामः स्मरण करना
भज् भजािम भजिस भजित भजामः भजना, सेवा
करना
नम् नमािम नमिस नमित नमामः नमन करना
एक साँचा, छह धातुए:ँ छह म धातु के आगे वही तीन प्रत्यय लगे ह — –आ म (म), – स (तुम), – त (वह)।
इस लए कसी भी नई धातु का रूप बनाना हो तो यही साँचा लगाइए : खाद् → खादा म, खाद स, खाद त; क्र ड् →
क्र डा म, क्र ड स, क्र ड त।
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दो धातुओं म हल्का प रवतन: ‘स्मृ’ क ‘ऋ’ बदलकर ‘अर्’ हो जाती है — स्मृ → स्मर त (गुण-प रवतन)। ‘नम्’
म कुछ नह बदलता — नम त। पहले दन ही सब नयम याद करने क आवश्यकता नह ; अभी केवल रूप
पहचा नए।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 60
प रयोजना — अस्मद्-युष्मद्-शब्दरूपा ण
प रयोजनाकायम्
प्र.1 अस्मद्-युष्मद्-शब्दयोः सवा ण रूपा ण ोरकपत्रे लखन्तु — (अस्मद्-शब्दरूपा ण तथा युष्मद्-शब्दरूपा ण,
सप्तसु वभ क्तषु त्रषु वचनेषु च)
पृष्ठ 60 पर दो कोरे ोरकपत्र (चाट) छपे ह — एक ‘अस्मद्-शब्दरूपा ण’ का और एक ‘युष्मद्-शब्दरूपा ण’ का। दोन म सात
वभ क्तयाँ और तीन वचन ह, यानी हर सारणी म इक्क स खाने। नीचे दोन सार णयाँ भरी हुई द गई ह — इन्ह बड़े चाट-पेपर पर
सुन्दर अक्षर म उता रए।
1. अस्मद्-शब्दरूपा ण (म / हम) — त्रषु लङ्गे षु समानम्
वभ क्तः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम् हन्द अथ
प्रथमा अहम् आवाम् वयम् म / हम दोन / हम सब
तीया माम् (मा) आवाम् (नौ) अस्मान् (नः) मुझको / हम दोन को / हम सबको
तृतीया मया आवाभ्याम् अस्मािभः मेरे ारा / हम दोन के ारा / हम सबके ारा
चतुथ म ह्यम् (मे) आवाभ्याम् (नौ) अस्म भ्यम् (नः) मेरे लए / हम दोन के लए / हम सबके लए
पञ्चमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् मुझसे / हम दोन से / हम सबसे
षष्ठी मम (मे) आवयोः (नौ) अस्माकम् (नः) मेरा / हम दोन का / हम सबका
सप्तमी मिय आवयोः अस्मासु मुझम / हम दोन म / हम सबम
2. युष्मद्-शब्दरूपा ण (तुम / आप) — त्रषु लङ्गे षु समानम्
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वभ क्तः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम् हन्द अथ
प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम् तुम / तुम दोन / तुम सब
तीया त्वाम् (त्वा) युवाम् (वाम्) युष्म ान् (वः) तुमको / तुम दोन को / तुम सबको
तृतीया त्वया युवाभ्याम् युष्म ािभः तुम्हारे ारा / तुम दोन के ारा / तुम सबके ारा
चतुथ तुभ्यम् (ते) युवाभ्याम् (वाम्) युष्म भ्यम् (वः) तुम्हारे लए / तुम दोन के लए / तुम सबके लए
पञ्चमी त्वत् युवाभ्याम् युष्म त् तुमसे / तुम दोन से / तुम सबसे
षष्ठी तव (ते) युवयोः (वाम्) युष्म ाकम् (वः) तुम्हारा / तुम दोन का / तुम सबका
सप्तमी त्विय युवयोः युष्म ासु तुमम / तुम दोन म / तुम सबम
चाट बनाने का ढं ग —
1. चाट-पेपर को बीच से मोड़कर दो भाग क जए — बाएँ ‘अस्मद्-शब्दरूपा ण’, दाएँ ‘युष्मद्-शब्दरूपा ण’।
2. प्रत्येक भाग म 4 स्तम्भ × 8 पं क्तयाँ क सारणी ख चए (पहली पं क्त शीषक क , फर सात वभ क्तयाँ)।
3. पहले प सल से ल खए, जाँच के बाद ही पेन या स्केच-पेन फे रए। वसग (◌ः) और अनुस्वार (◌ं) कह छू टने न पाएँ — मम /
माम् और अस्मान् / अस्माकम् जैसे रूप इन्ह से अलग पहचाने जाते ह।
4. कोष्ठक वाले रूप (मे, नौ, नः, ते, वाम्, वः) लाल रंग से ल खए और नीचे लख द जए — ‘एता न वैक ल्पका न रूपा ण’।
अच्छे चाट म यह ज़रूर हो: (1) दोन सार णय म सात वभ क्तयाँ और तीन वचन ह — इक्क स-इक्क स खाने
पूरे भरे ह ; (2) शीषक संस्कृत म हो; (3) कह भी सम्बोधन (हे …!) न लखा हो — अस्मद् और युष्मद् का
सम्बोधन नह होता, क्य क अपने-आपको या ‘तुम’ को पुकारा नह जाता; (4) नीचे एक पं क्त म यह नयम लखा
हो — ‘अस्मद्-युष्मद्-शब्दौ त्रषु लङ्गे षु समानौ भवतः’।
पाठ से जो ड़ए: पूरे पाठ म आपने केवल प्रथमा क पं क्त दे खी है (अहम्–आवाम्–वयम्, त्वम्–युवाम्–यूयम्) और
एक बार षष्ठी — ‘मम नाम भरतः’ तथा ोक म ‘त्वमेव सव मम’। शेष पाँच वभ क्तयाँ आगे क कक्षाओं म
वस्तार से पढ़ जाएँगी; अभी चाट बनाकर आँख म बसा ली जए।
वाक्य म दे खए तो रूप जल्द बैठते ह: मम पुस्तकम् (मेरी पुस्तक)। म ं पुस्तकं ददातु (मुझे पुस्तक द जए)।
मया ल खतम् (मेरे ारा लखा गया)। म य वश्वासः (मुझम वश्वास)। तव नाम कम् ? (तुम्हारा नाम क्या है ?)। तुभ्यं
धन्यवादः (तुम्ह धन्यवाद)। त्वया कृतम् (तुम्हारे ारा कया गया)।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का नाम ही पाठ का नयम है — ‘अहं च त्वं च’ = ‘म भी और तुम भी’। पूरा पाठ केवल दो शब्द के प रवार पर टका है
— अस्मद् (अहम्, आवाम्, वयम्) और युष्मद् (त्वम्, युवाम्, यूयम्)। इन्ह से अपना और दूसरे का प रचय दया जाता है —
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मम नाम भरतः। अहं छात्रः।
क्रया पुरुष और वचन दोन दे खकर बदलती है। ‘अस्’ धातु के छह रूप इसी पाठ म याद करने ह — अहम् अ स्म /
आवां स्वः / वयं स्मः (उत्तमपुरुषः) तथा त्वम् अ स / युवां स्थः / यूयं स्थ (मध्यमपुरुषः)। कता बदलते ही क्रया बदलेगी —
यही वाक्य क शु द्ध क पहली कसौट है।
भवान् / भवती आदर का शब्द है, पर व्याकरण म ‘वह’ के साथ चलता है (योग्यता वस्तरः, पृष्ठ 58–59)। अथ ‘आप’
होते हुए भी इसके साथ प्रथमपुरुष क क्रया लगती है — भवान् अ स्त, भवन्तौ स्तः, भवन्तः स न्त; ‘भवान् अ स’ कहना
अशुद्ध है।
लङ्ग के साथ शब्द का रूप भी बदलता है (पृष्ठ 49–50) — पुं लङ्ग म सै नकः–सै नकौ–सै नकाः, आकारान्त स्त्री लङ्ग म
गा यका–गा यके–गा यकाः और ईकारान्त स्त्री लङ्ग म नतक –नतक्यौ–नतक्यः। एक ही व्यवसाय के दो रूप बनते ह —
गायकः / गा यका, च कत्सकः / च क त्सका, छात्रः / छात्रा।
‘म्’ का अनुस्वार- नयम (पृष्ठ 52) — व्यञ्जनवणात् पूव पदान्तस्य ‘म्’ इत्यस्य स्थाने ‘अनुस्वारः’ लेखनीयः। यानी पद के
अन्त का ‘म्’ य द आगे व्यञ्जन हो तो अनुस्वार बन जाता है — पुस्तकम् अ स्त, पर पुस्तकं ना स्त। इसी नयम से अहम् →
अहं छात्रः, त्वम् → त्वं कः।
पाठ म तीन याद रखने योग्य पाठ्यांश ह — प्राथना- ोक ‘त्वमेव माता च पता त्वमेव…’ (पृष्ठ 53), गीतम् – अहं
पठा म (पृष्ठ 59) जसम ‘अहं पठा म/वदा म/ लखा म’ से उत्तमपुरुष का अभ्यास होता है, और प रयोजनाकायम् (पृष्ठ 60)
जसम अस्मद्-युष्मद् के सात वभ क्तय के रूप ोरकपत्र पर लखने ह।
त्व रत पुनरावृ त्त
पुरुषः / शब्दः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
उत्तमपुरुषः (अस्मद्) अहम् — मैं आवाम् — हम दोन वयम् — हम सब
मध्यमपुरुषः (युष्मद्) त्वम् — तुम युवाम् — तुम दोन यूयम् — तुम सब
प्रथमपुरुषः (आदराथ) भवान् / भवती — आप भवन्तौ / भवत्यौ भवन्तः / भवत्यः
‘अस्’ धातुः — उत्तमपुरुषः अिस्म स्वः स्मः
‘अस्’ धातुः — मध्यमपुरुषः अिस स्थः स्थ
‘अस्’ धातुः — प्रथमपुरुषः अिस्त स्तः स न्त
‘गम्’ धातुः — उत्तमपुरुषः गच्छािम गच्छावः गच्छामः
‘गम्’ धातुः — मध्यमपुरुषः गच्छिस गच्छथः गच्छथ
‘गम्’ धातुः — प्रथमपुरुषः गच्छित गच्छतः गच्छ न्त
अकारान्त-पुं लङ्गम् (सै नक) सै िनकः सै नकौ सै नकाः
आकारान्त-स्त्री लङ्गम् (गा यका) गाियका गा यके गा यकाः
ईकारान्त-स्त्री लङ्गम् (नतक ) नतकी नतक्यौ नतक्यः
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