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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 7: शूराः वयं धीराः वयम्
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
77 – 88 11 31 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: शूराः वयं धीराः वयम्
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के सप्तमः पाठः — शूराः वयं धीराः वयम् के सभी अभ्यास , चत्रपाठ, पाँच ोक , शब्दाथ-
ता लकाओं, गीतस्य भावाथः, अवधेयांशः (प्रा तप दकम् तथा तद्/एतद्/अस्मद्/युष्मद् के प्रथमा-रूप), योग्यता वस्तर और प रयोजनाकाय के पूरे हल।
यह पाठ एक दे शभ क्तगीत है, जसके रचनाकार ह आधु नक संस्कृत-क व ीधरः भास्करः वणकरः। पछले पाठ म दनचया और समय सीखा था;
अब वही ‘अहम्’ बदलकर ‘वयम्’ हो जाता है — पूरा गीत प्रथमा वभ क्त बहुवचन का अभ्यास है। पृष्ठ 77 से 88 तक का हर शीषक — चत्रपाठ का
वातालाप, ोक १–५, वयं शब्दाथान् जानीमः क दोन ता लकाएँ, गीतस्य भावाथः, अवधेयांशः, वयम् अभ्यासं कुमः (प्रश्न १–८, उपभाग (क)–
(झ) स हत), योग्यता वस्तरः (रचनाकार, शब्दरूप-ता लका, नौ महापुरुष के चत्र, मातृदेवता-स्तोत्र) तथा प रयोजनाकायम् — क्रम से हल कया
गया है, हर ोक के अन्वय, हन्द अथ और भाव के साथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 77 – 88
खं ड प्रश्न
11 31
माध्यम
हन्द
सप्तमः पाठः — शूराः वयं धीराः वयम् ( चत्रपाठः) — पृष्ठ 77
पाठ-प्रवेशः — कक्षायां छात्राणाम् आचायस्य च संवादः
पाठः
प्र.1 ीमन् ! अहम् अद्य ‘शूरा वयं धीरा वयम्’ इ त गीतं ुतवान् । अस्तु ! शोभनम् । ीमन् ! अहम प एतत् गीतं
ुतवान् । सुन्दरं गीतम् अ स्त । छात्राः ! “शूरा वयं धीरा वयम्” अत्र ‘वयम्’ इ त शब्दः केषां कृते प्रयुक्तः ? वयं
शब्दः भारतीयानां कृते अ स्त इ त चन्तया म । ीमन् ! वयं भारतीयाः शूराः वीराः च स्मः । सत्यम् । वयं भारतीयाः
शूराः वीराः च । एतत् एव सस्वरं म लत्वा गायामः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पाठ का पहला पृष्ठ तीन चत्र का एक कक्षा-संवाद है। आचाय और चार छात्र एक दे शभ क्त-गीत क चचा करते ह और अन्त म उसे
मलकर गाने का नश्चय करते ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
कः संस्कृतम् हन्द अनुवादः
वद त
छात्रः ीमन् ! अहम् अद्य ‘शूरा वयं धीरा वयम्’ इ त गीतं ीमान ् ! मैंने आज ‘शूर ा वयं धीरा वयम्’ यह गीत सुना।
ुतवान् ।
आचायः अस्तु ! शोभनम् । ठीक है ! बहुत सुन्द र।
छात्रः ीमन् ! अहम प एतत् गीतं ुतवान् । सुन्दरं गीतम् ीमान ् ! मैंने भी यह गीत सुना है। गीत सुन्द र है।
अ स्त ।
आचायः छात्राः ! “शूरा वयं धीरा वयम्” अत्र ‘वयम्’ इ त शब्दः छा त्र ! “
ो शूर ा वयं धीरा वयम्” — यहाँ ‘वयम्’ शब्द िकनके िल ए
केषां कृते प्रयुक्तः ? पयोग िकया गया है ?
छात्रा वयं शब्दः भारतीयानां कृते अ स्त इ त चन्तया म । मैं सोचती हू ँ िक ‘वयम्’ शब्द भारतीयों के िल ए है।
छात्रः ीमन् ! वयं भारतीयाः शूराः वीराः च स्मः । ीमान ् ! हम भारतीय शूर और वीर है ं।
आचायः सत्यम् । वयं भारतीयाः शूराः वीराः च । एतत् एव सस्वरं सच है। हम भारतीय शूर और वीर है ं। आओ , इसी को
म लत्वा गायामः । िमल कर स् वर के साथ गाएँ।
व्याकरण- ववेचनम् (संस्कृतम्): ‘ ीमन्’ इ त सम्बोधन एकवचनम् ( ीमत् → हे ीमन्!) । ‘छात्राः’ इ त अत्र सम्बोधन
बहुवचनम् (हे छात्रो!) । ‘ ुतवान्’ इ त क्तवतु-प्रत्ययान्तं भूतका लकं रूपम्, पुं लङ्गे एकवचने (= सुना; छात्रा चेत् वद त त ह
‘ ुतवती’) । ‘स्मः’, ‘ चन्तया म’, ‘गायामः’ — सवा ण लट् -लकारे उत्तमपुरुषे — क्रमशः बहुवचनम्, एकवचनम्, बहुवचनम् ।
‘ म लत्वा’ इ त क्त्वा-प्रत्ययान्तम् अव्ययम् (= मलकर) ।
‘अहम्’ से ‘वयम्’ तक: पछले पाठ म हर वाक्य ‘अहम्’ से शुरू होता था — अहं करो म, अहं गच्छा म। यहाँ
संवाद जान-बूझकर ‘अहम्’ से आरम्भ होकर ‘वयम्’ पर पहुँचता है। जैसे ही कता ‘वयम्’ हुआ, क्रया भी बदल गई
— अ स्म → स्मः, गाया म → गायामः। यही इस पूरे पाठ क कुंजी है।
शब्द जो काम आएँगे: अद्य = आज, अ प = भी, अत्र = यहाँ, कृते = के लए, चन्तया म = सोचता/सोचती ँ,
सस्वरम् = स्वर के साथ, अस्तु = ठ क है/भले ही, शोभनम् = सुन्दर, अच्छा।
प्र.2 छात्राः ! “शूरा वयं धीरा वयम्” अत्र ‘वयम्’ इ त शब्दः केषां कृते प्रयुक्तः ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 77)
पाठ म यह प्रश्न स्वयं आचाय पूछते ह और छात्रा उत्तर दे ती है।
संस्कृतेन उत्तरम् — ‘वयम्’ इ त शब्दः भारतीयानां कृते प्रयुक्तः । ( हन्द : ‘वयम्’ शब्द भारतीय के लए प्रयोग कया गया है।)
वस्तरेण — वयं भारतीयाः शूराः वीराः धीराः च स्मः । अतः गीते ‘वयम्’ इ त पदे न सव भारतीयाः गृह्यन्ते । ( हन्द : हम
भारतीय शूर, वीर और धीर ह। इस लए गीत म ‘वयम्’ पद से सभी भारतीय लए गए ह।)
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
यही गीत क सबसे बड़ी बात है: क व ने ‘अहं शूरः’ (म शूर ँ) नह लखा, ‘शूराः वयम्’ (हम शूर ह) लखा।
‘अहम्’ म एक व्य क्त है, ‘वयम्’ म पूरा दे श। इसी लए यह गीत अकेले नह , म लत्वा ( मलकर) गाया जाता है —
जैसे आचाय अन्त म कहते ह, ‘एतत् एव सस्वरं म लत्वा गायामः’।
व्याकरण-संकेतः: ‘केषाम्’ इ त प्रश्नवाचकस्य ‘ कम्’ शब्दस्य षष्ठी बहुवचनम् (= कनका/ कनके), ‘भारतीयानाम्’
इ त अ प षष्ठी बहुवचनम् । अतः प्रश्नस्य वभ क्तः उत्तरस्य वभक्त्या सह मल त — यह उत्तर मलाने का सरल
उपाय है।
प्र.3 ‘अहम्’, ‘वयम्’ — अनयोः पदयोः कः भेदः ? संवादे प्रयुक्ता न क्रयापदा न दृ ् वा स्प ीकुवन्तु । (पाठ्य-प्रश्नः,
पृष्ठ 77)
दोन अस्मद् शब्द के ही रूप ह — केवल वचन का अन्तर है।
अस्मद् (पथमा िवभिक्तः) —
एकवचनम् → अहम् (मै)ं
ि वचनम् → आवाम् (हम दोनों)
बहवु चनम् → वयम् (हम सब)
कता संवादे वाक्यम् क्रयापदम् वचनम्
अहम् अहम् अद्य गीतं ुतवान् । ुतवान ् एकवचनम्
अहम् … इ त चन्तया म । न्
िच तयािम एकवचनम्
वयम् वयं भारतीयाः शूराः वीराः च स्मः । स्
मः बहुवचनम्
वयम् एतत् एव सस्वरं म लत्वा गायामः । गायामः बहुवचनम्
संस्कृतेन उत्तरम् — ‘अहम्’ इ त अस्मद्-शब्दस्य प्रथमा- वभक्तेः एकवचनम्, ‘वयम्’ इ त तस्यैव बहुवचनम् । कतुः
वचनानुसारं क्रयापदस्य अ प वचनं प रवतते । ( हन्द : ‘अहम्’ अस्मद् शब्द क प्रथमा वभ क्त का एकवचन है और ‘वयम्’
उसी का बहुवचन। कता के वचन के अनुसार क्रया का वचन भी बदल जाता है।)
अस्मद् क एक वशेषता याद र खए: ‘बालकः/बा लका/फलम्’ जैसे शब्द के रूप लङ्ग बदलने पर बदल जाते ह,
पर अस्मद् और युष्मद् के रूप तीन लङ्ग म एक जैसे रहते ह — लड़का कहे तब भी ‘अहम्’, लड़क कहे तब भी
‘अहम्’। यही बात पृष्ठ 82 के अवधेयांशः म ता लका बनाकर दखाई गई है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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Check it yourself: ‘ ुतवान्’ लड़का बोलता है; लड़क बोले तो ‘ ुतवती’ होगा। यहाँ लङ्ग क्रया-जैसे रूप म
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दखता है, सवनाम म नह ।
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गीतम् — शूराः वयं धीराः वयम् ( ोकौ १–२) — पृष्ठ 78
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गीतस्य प्रथमः तीयश्च ोकः — अन्वयः, अथः, भावः
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गीतम्
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प्र.1 शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् । गुणशा लनो बलशा लनो जयगा मनो नतराम् ॥१॥ शूरा वयम् ॥ — अस्य
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ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।
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a अन्वयः — वयं सुतरां शूराः (स्मः), वयं धीराः (स्मः), वयं वीराः (स्मः) । वयं नतरां गुणशा लनः बलशा लनः जयगा मनः
यह गीत का मुखड़ा है — पूरा ोक ‘वयम्’ के वशेषण क माला है।
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(स्मः) ।
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पदम् अथः (संस्कृते) हन्द
शूर ाः वीराः क्र
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धीराः धैयशा लनः
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धीरज रखने वाले
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सुतराम् अत्य धकम् त्
अ यिधक रू प से पूर ी तरह
a गणु शािलनः
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बलशािलनः बलयुक्ताः
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बल वान
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जयगािमनः जयं गच्छन्तः िवजय की ओर बढ़ ने वाले
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हन्द अथ — हम शूर ह, हम धीर ह, हम अत्यन्त वीर ह। हम पूरी तरह गुणवान ह, बलवान ह और वजय क ओर बढ़ने वाले ह।
(टे क — शूरा वयम्॥ = हम शूर ह!)
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भावः: क व पहले ही
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ोक म भारतीय का प रचय तीन जोड़ म दे ता है — शूर-धीर-वीर (स्वभाव), गुणशाली-
s e m बलशाली (योग्यता), जयगामी (लक्ष्य)। ध्यान द जए क बल अकेला नह आया — उससे पहले गुण आया है। क व
agla कहना चाहता है क बल तभी सराहनीय है जब उसके साथ गुण हो; गुणहीन बल वजय नह , उपद्रव बनता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण-संकेतः: गीते ‘शूरा’, ‘धीरा’, ‘वीरा’ इ त वसगर हता न दृश्यन्ते — छन्दोऽनुरोधात् । वस्तुतः एता न शूराः,
धीराः, वीराः इ त प्रथमा वभक्तेः बहुवचना न स न्त । ‘गुणशा लनः, बलशा लनः, जयगा मनः’ इ त नकारान्तानां
शब्दानां (गुणशा लन्, बलशा लन्, जयगा मन्) प्रथमा बहुवचनम्; एतेषाम् एकवचनं भव त गुणशाली, बलशाली,
जयगामी ।
प्र.2 दृढमानसा गतलालसाः प्रयसाहसाः सततम् । जनसेवका अ तभावुकाः शुभ चन्तका नयतम् ॥२॥ शूरा वयम् ॥
— अस्य ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।
पहला ोक श क्त बताता था, यह दूसरा ोक स्वभाव बताता है।
अन्वयः — वयं सततं दृढमानसाः गतलालसाः प्रयसाहसाः (स्मः) । वयं नयतं जनसेवकाः अ तभावुकाः शुभ चन्तकाः
(स्मः) ।
पदम् पदच्छे दः / अथः हन्द
दृ ढमानसाः दृढं मानसं येषां ते — दृढ चत्ताः दृ ढ़ मन वाले
गतलालसाः गता लालसा येषां ते — लोभर हताः ल ाल च रिहत
िपयसाहसाः प्रयं साहसं येषां ते — साहसयुक्ताः न्
िज हे ं साहस िपय है , साहसी
सततम् / िनयतम् नरन्तरम् / न श्चतम् सद ा / िनश्चय ही
जनसे वकाः जनानां सेवकाः ल ोगों की से वा करने वाले
अितभावुक ाः अतीव भावयुक्ताः त् न्
अ य त संवेद नशील
शुभिचन्तकाः शुभं चन्तय न्त ये ते सबका भल ा चाहने वाले
हन्द अथ — हम सदा दृढ़ मन वाले, लोभर हत और साहस प्रय ह। हम नश्चय ही जनसेवक, अत्यन्त संवेदनशील और सबका शुभ
सोचने वाले ह।
भावः: यहाँ क व वीरता क प रभाषा बदल दे ता है। वीर वही नह जो लड़ सके — वीर वह है जसका मन दृढ़ हो,
जसम लालच न हो, और जो दूसर क सेवा करे। ‘अ तभावुकाः’ शब्द वशेष है: वीर होने का अथ कठोर होना नह ,
दूसर का दुःख अनुभव कर सकना भी है। पृष्ठ 78 का नीचे वाला चत्र यही दखाता है — बाढ़ के पानी म युवक
बुजग को कन्धे और गोद म उठाकर पार करा रहे ह।
व्याकरण-संकेतः: ‘दृढमानसाः, गतलालसाः, प्रयसाहसाः, शुभ चन्तकाः’ — सव बहु ी ह-समासः, प्रथमा
बहुवचनम्, पुं लङ्गम् । ‘सततम्’ तथा ‘ नयतम्’ इ त अव्ययपदे ( क्रया वशेषणे) — अतः एतयोः रूपं कदा प न
प रवतते ।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 पृष्ठे 78 े चत्रे स्तः । चत्रयोः क दृश्यते ? गीतस्य का भः पङ् क्त भः सह एते चत्रे सम्बद्धे ? ( चत्र-आधा रतः
पाठ्य-प्रश्नः)
दोन चत्र गीत के दो अलग-अलग भाव को दखाते ह।
चत्रम् क दृश्यते सम्बद्धा पङ् क्तः
पथमम् भारतमात ुः पितमा , ित्र वणध् वजः, भारतस्य मानिचत्र ं, शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् — रक्षा और पराक्रम का
(उपिर) श स्त्र धारी सै िनकः च भाव
ि तीयम् जल ल ावनेप् (बाढ़ में) य ुवकाः वृद्धां मिहल ां वृद्धं परु
ु षं च जनसेवका अ तभावुकाः शुभ चन्तका नयतम् — सेवा और
(अधः) र क्षन्तः करुणा का भाव
संस्कृतेन उत्तरम् — प्रथमे चत्रे भारतमाता ध्वजः सै नकः च स न्त । एतत् चत्रं शौय वीरतां च सूचय त । तीये चत्रे
युवकाः जलप्लावने वृद्धान् जनान् रक्ष न्त । एतत् चत्रं जनसेवां शुभ चन्तनं च सूचय त । ( हन्द : पहले चत्र म भारतमाता,
ध्वज और सै नक ह — यह चत्र शौय और वीरता बताता है। दूसरे चत्र म युवक बाढ़ म बुजग को बचा रहे ह — यह चत्र जनसेवा
और शुभ चन्तन बताता है।)
दोन चत्र साथ क्य रखे गए: पुस्तक जान-बूझकर सै नक के ठ क नीचे बाढ़-राहत का चत्र दे ती है। सन्दे श यह है
क वीरता केवल सीमा पर नह होती — मुसीबत म पड़ोसी को बचाना भी उतनी ही बड़ी वीरता है। गीत क दोन
पं क्तयाँ — ‘वीरा वयं’ और ‘जनसेवका अ तभावुकाः’ — एक ही व्य क्त के दो रूप ह।
गीतम् — शूराः वयं धीराः वयम् ( ोकौ ३–४) — पृष्ठ 79
तृतीयः चतुथश्च ोकः — अन्वयः, अथः, भावः
गीतम्
प्र.1 धनकामना सुखवासना न च वञ्चना हृदये । ऊजस्वला वचस्वला अ त नश्चला वजये ॥३॥ शूरा वयम् ॥ — अस्य
ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।
यह ोक बताता है क हृदय म क्या नह है, और फर यह क क्या है।
अन्वयः — (अस्माकं) हृदये धनकामना (ना स्त), सुखवासना (ना स्त), वञ्चना च न (अ स्त) । (वयम्) ऊजस्वलाः
वचस्वलाः वजये च अ त नश्चलाः (स्मः) ।
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पदम् अथः (संस्कृते) हन्द
धनकामना धनस्य अ धका इच्छा धन की ल ाल सा
सुखवासना सुखस्य वषये वासना -
भोग सुख की चाह
वञ्चना कपटभावना छल , ठगी
ऊजस्वलाः ू तयुक्ताः फु त ले , ऊज से भरे
वचस्वलाः तेजोयुक्ताः तेज स् वी
अितिनश्चलाः अ वच लताः दृ ढ़ िनण य वाले , अटल
हन्द अथ — हमारे हृदय म न धन क कामना है, न भोग-सुख क वासना, और न कसी को ठगने का भाव। हम ऊजा से भरे,
तेजस्वी और वजय के प्र त पूरी तरह अटल ह।
भावः: क व पहले हृदय क सफ़ाई कराता है, तब श क्त क बात करता है। लोभ, भोग और छल — ये तीन नकल
जाएँ, तभी भीतर ऊजा और तेज बचता है। यही कारण है क इस ोक के साथ पृष्ठ 79 पर सन्त -मनी षय के चत्र
दए गए ह (स्वामी दयानन्द सरस्वती, शङ् कराचाय, भगवान् बुद्ध, स्वामी ववेकानन्द) — इन सबका जीवन इसी
नल भ तेज का उदाहरण है।
व्याकरण-संकेतः: ‘धनकामना, सुखवासना, वञ्चना’ — आकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दानां प्रथमा एकवचनम् । ‘हृदये’
इ त अ धकरणे सप्तमी एकवचनम् (= हृदय म) तथा ‘ वजये’ इ त अ प सप्तमी एकवचनम् (= वजय के वषय म)
। गीते ‘ऊजस्वला, वचस्वला, अ त नश्चला’ इ त वसगर हतरूपा ण — शुद्धा न रूपा ण स न्त ऊजस्वलाः,
वचस्वलाः, अ त नश्चलाः (प्रथमा बहुवचनम्), यथा पृष्ठे 80 शब्दाथता लकायाम् उक्तम् ।
प्र.2 गतभीतयो धृतनीतयो दृढशक्तयो न खला । यामो वयं समराङ्गणं वजया थनो बालाः ॥ ४ ॥ शूरा वयम् ॥ —
अस्य ोकस्य अन्वयं अथ भावं च लखन्तु ।
यह गीत का संकल्प- ोक है — यहाँ पहली बार क्रया आती है: ‘यामः’ (हम जाते ह)।
अन्वयः — न खलाः गतभीतयः धृतनीतयः दृढशक्तयः वजया थनः बालाः वयं समराङ्गणं यामः ।
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पदम् पदच्छे दः / अथः हन्द
गतभीतयः गता भी तः येषां ते — भी तर हताः भयरिहत
ध ृतनीतयः धृता नी तः यैः ते — नी तम् आचरन्तः नीित पर चल ने वाले
दृ ढशक्तयः दृढा श क्तः येषां ते — श क्तयुक्ताः दृ ढ़ शि क्
त वाले
िनिखलाः समग्राः, सव सब के सब
यामः गच्छामः हम जाते है ं
समराङ् गणम् युद्धक्षेत्रम् रणभ ूिम
िवजयािथनः वजयम् इच्छन्तः िवजय चाहने वाले
हन्द अथ — हम सब बालक भयर हत ह, नी त को थामे हुए ह और दृढ़ श क्त वाले ह; वजय के अ भलाषी होकर हम रणभू म
क ओर जाते ह।
भावः: ध्यान द जए, ‘गतभीतयः’ ( नभय) के तुरन्त बाद ‘धृतनीतयः’ (नी तवान्) आया है। नडर होना अकेले काफ़
नह — नी त के बना नभयता उद्दण्डता बन जाती है। क व यह भी कहता है क यह संकल्प बालाः — ब — का
है; दे श क रक्षा का भाव बचपन से ही जागना चा हए। पृष्ठ 79 का नीचे वाला चत्र इन्ह ‘गतभीतयः’ वीर का है —
सुभाषचन्द्र बोस, रानी लक्ष्मीबाई, शवाजी महाराज और भगत सह।
व्याकरण-संकेतः: ‘समराङ्गणम्’ इ त कम ण तीया एकवचनम् — ‘यामः’ (गच्छामः) इ त गत्यथकधातोः कम ।
‘गतभीतयः, धृतनीतयः, दृढशक्तयः’ — इकारान्तयोः स्त्री लङ्गशब्दयोः (भी त, नी त, श क्त) बहु ीहौ पुं लङ्गे प्रथमा
बहुवचनम् । ‘यामः’ इ त ‘या’ धातोः लट् -लकारे उत्तमपुरुषबहुवचनम् (या → या म, यावः, यामः) ।
प्र.3 पृष्ठे 79 उप र अधः च चत्रा ण स न्त । तेषु के के दृश्यन्ते ? ता न चत्रा ण केन ोकेन सह सम्बद्धा न ? ( चत्र-
आधा रतः पाठ्य-प्रश्नः)
पृष्ठ 79 पर दो पं क्तय म आठ मुख दखाए गए ह — ऊपर मनीषी, नीचे योद्धा।
पङ् क्तः चत्रा ण (वामतः द क्षणम्) ोकः तथा भावः
उपिर स् न्
वामी द यान द ः सर स् वती , शङ्कराचायः, भगवान ् बद्ध
ु ः, ोकः ३ — धनकामना, सुखवासना, वञ्चना च न — नल भ
स्वामी िववेक ान द ः न् तेजस्वी जीवनम्
अधः न्
सुभाषच द ः बोसः , रा क्ष्
ी ल म ीबाई , िशवािजः महाराजः, ोकः ४ — गतभीतयो धृतनीतयो … यामो वयं समराङ्गणम्
भगतिसंहः
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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संस्कृतेन उत्तरम् — उप रतने चत्रे सन्तः मनी षणः च स न्त । ते ऊजस्वलाः वचस्वलाः च आसन् । अधस्तने चत्रे वीराः
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योद्धारः स न्त । ते गतभीतयः धृतनीतयः दृढशक्तयः च आसन् । ( हन्द : ऊपर के चत्र म सन्त और मनीषी ह — वे ऊजावान्
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और तेजस्वी थे। नीचे के चत्र म वीर योद्धा ह — वे भयर हत, नी तवान् और दृढ़ श क्त वाले थे।)
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a दखाती है, फर नाम बताती है — ता क पढ़ते समय आप स्वयं पहचानने का प्रयास कर।
Did you know? यही चार -और-चार चेहरे पृष्ठ 87 पर फर लौटते ह, वहाँ नाम के साथ। पुस्तक पहले चत्र
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ोकः ५) तथा वयं शब्दाथान्aजानीमः — पृष्ठ 80
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प्राथना- ोकः तथा शब्दाथता लकायाः प्रथमः भागः
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गीतम् शब्दाथाः
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a s emजगद श हे ! परमेश हे ! सकलेश हे ! भगवन् । जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो दे ह परमात्मन् ॥ ५ ॥ शूरा वयम् ॥ —
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गीत का अ न्तम ोक प्राथना है — यहाँ पाँच सम्बोधन
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अन्वयः — हे जगद श ! हे परमेश ! हे सकले
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पदम् पदच्छे दः / अथः हन्द
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जगदीश जगतः ईश स् !
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हे परम ई वर
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सकले श सवषाम् ईश हे सबके ईश !
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जयः च मङ्गलं च
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जयमङ् गलम् िवजय और मंग ल
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परमोज्ज्वलम् परम + उज्ज्वलम् — अत्यन्तं प्रकाशमानम् परम उ ज्ज् वल
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नः अस्मान् / अस्मभ्यम्
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दे िह यच्छ द ीिजए
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हन्द अथ — हे जगत् के स्वामी! हे परमे श! हे सबके ईश! हे भगवन् ! हे परमात्मन् !
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
भावः: चार ोक तक गीत अपने बल क बात करता रहा; अ न्तम ोक म वही गीत सर झुका दे ता है। यही
भारतीय परम्परा का ढं ग है — पराक्रम अपना, पर वजय का वरदान ईश्वर का। और माँगा भी क्या गया? केवल
‘जय’ नह , ‘जयमङ्गलम्’ — ऐसी वजय जसम सबका मंगल हो; और वह भी ‘परमोज्ज्वल’, यानी जसम कोई
का लख, कोई छल न हो। पृष्ठ 80 का चत्र भी यही दखाता है — कन्याकुमारी के समुद्र-तट पर ववेकानन्द- शला के
सामने हाथ जोड़े खड़े लोग।
व्याकरण-संकेतः: ‘जगद श, परमेश, सकलेश, भगवन्, परमात्मन्’ — सवा ण सम्बोधन-प्रथमा एकवचना न (हे
…!) । ‘दे ह’ इ त ‘दा’ धातोः लोट् -लकारे मध्यमपुरुष-एकवचनम् (= द जए) । ‘नः’ इ त अस्मद्-शब्दस्य
सं क्षप्तरूपम् — अस्मान् ( तीया) अथवा अस्मभ्यम् (चतुथ ) इत्यथ प्रयुज्यते । ‘जगद श’ = जगत् + ईश
(व्यञ्जनस न्धः: त् + ई = द् ई) ।
प्र.2 वयं शब्दाथान् जानीमः — नतराम्, दृढमानसाः, गतलालसाः, प्रयसाहसाः, नयतम्, ऊजस्वलाः, वचस्वलाः,
अ त नश्चलाः, शूराः । एतेषां पदानाम् अथ संस्कृते हन्द्यां आङ् ग्लभाषायां च लखन्तु, मातृभाषया अ प अथ
लखन्तु ।
पृष्ठ 80 क शब्दाथ-ता लका ज्य -क -त्य नीचे द गई है। अ न्तम खाना (मातृभाषया अथ लखन्तु) आपको स्वयं भरना है —
अपनी मातृभाषा म।
शब्दः अथः हन्द ENGLISH
िनतराम् सुतराम् त्
अ यिधक रू
प से Abundantly
दृ ढमानसाः दृढ चत्ताः दृ ढ़ मन वाले Determined
गतलालसाः लोभर हताः ल ाल च रिहत Without greed
िपयसाहसाः साहसयुक्ताः साहसी Brave
िनयतम् न श्चतम् श्
िनि चत Certainly / Definitely
ऊजस्वलाः ू तयुक्ताः फु त ले Energetic
वचस्वलाः तेजोयुक्ताः तेज स्
वी Radiant
अितिनश्चलाः अ वच लताः दृ ढ़ िनण य वाले Determined
शूर ाः वीराः परा क्र मी Brave
नमूना उत्तर (मातृभाषया अथः) — य द आपक मातृभाषा मराठ है तो — नतराम् = अत्यंत, दृढमानसाः = खंबीर मनाचे,
गतलालसाः = लोभर हत, शूराः = शूर। य द बांग्ला है तो — शूराः = बीर, नयतम् = न श्चतभाबे। अपनी भाषा का ठ क-ठ क शब्द
घर के बड़ से पूछकर ल खए।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
ता लका पढ़ने का ढं ग: दूसरा खाना ‘अथः’ केवल हन्द नह , संस्कृत का पयाय दे ता है — जैसे ‘गतलालसाः =
लोभर हताः’। इसका लाभ यह है क आप क ठन शब्द को आसान संस्कृत शब्द से समझते ह, और आपक संस्कृत
शब्द-सम्पदा दुगुनी हो जाती है।
Try This: ध्यान द जए — ‘दृढमानसाः’ और ‘अ त नश्चलाः’, दोन का अंग्रेज़ी अथ Determined है, पर
संस्कृत म भेद है: दृढमानस = मन दृढ़, अ त नश्चल = नणय से डगे नह । संस्कृत के दो शब्द का ठ क-ठ क भेद
पकड़ना ही भाषा सीखना है।
वयं शब्दाथान् जानीमः (शेषभागः) तथा गीतस्य भावाथः — पृष्ठ 81
शब्दाथता लकायाः तीयः भागः तथा स ूणगीतस्य भावाथः
शब्दाथाः भावाथः
प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — गतभीतयः, धृतनीतयः, दृढशक्तयः, न खलाः, यामः, समराङ्गणम्, वजया थनः,
सकलेश, परमोज्ज्वलम्, नः, दे ह । एतेषां पदानाम् अथ संस्कृते हन्द्यां आङ् ग्लभाषायां च लखन्तु ।
यह ता लका का दूसरा भाग है — इसम ोक ४ और ५ के शब्द ह।
शब्दः अथः हन्द ENGLISH
गतभीतयः भी तर हताः भयरिहत Fearless
ध ृतनीतयः नी तम् आचरन्तः नीितमान ् Righteous
दृ ढशक्तयः श क्तयुक्ताः शि क् तमान ् Powerful
िनिखलाः समग्राः स पूणम् All
यामः गच्छामः जाते / जाती है ं (We) are going
समराङ् गणम् युद्धक्षेत्रम् युद्ध का मैद ान Battlefield
िवजयािथनः वजयम् इच्छन्तः िवजय चाहने वाले Those who want victory
सकले श सवषाम् ईश सभी के ईश Supreme God
परमोज्ज्वलम् अत्यन्तं प्रकाशमानम् परम उ ज्ज् वल Extremely bright
नः अस्मान् हमें Us
दे िह यच्छ द ीिजए (You) Give
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
तीन शब्द जो एक ही साँचे के ह: गतभीतयः, धृतनीतयः, दृढशक्तयः — तीन म दूसरा भाग इकारान्त स्त्री लङ्ग
शब्द है (भी त, नी त, श क्त), और तीन बहु ी ह समास ह, इस लए तीन का रूप एक जैसा चलता है — एकवचन
गतभी तः, बहुवचन गतभीतयः। एक साँचा पकड़ लया तो तीन शब्द अपने-आप याद हो जाते ह।
Tip: ‘नः’ और ‘दे ह’ छोटे शब्द ह पर बहुत काम के — संस्कृत क अनेक प्राथनाओं म ये मलते ह, जैसे ‘सह
नाववतु’, ‘तेज स्वनावधीतमस्तु’ आ द म ‘नः’ (हम)।
प्र.2 गीतस्य भावाथः — वयं सव भारतीयाः शूराः, वीराः, धैयशा लनः च स्मः । सव गुणशा लनः बलशा लनः वजेतारः
च स्मः । वयं दृढसंकल्पयुक्ताः लोभर हताः साहसयुक्ताः च स्मः । वयं सव भारतवा सनः उत्तमभावेन जनानां सेवां
कुमः । सवषां शुभ चन्तनं कुमः । अस्माकं हृदये धनस्य अ धककामनाः, सुखस्य वषये वासना, कपटभावना च न
स न्त । तेजोयुक्ताः वयं भारतीयाः ऊजापूवकं दृढतया च काय कुमः । वयं भारतीयाः नभयाः दृढशक्त्या च युक्ताः
युद्धक्षेत्रे सवदा नी तपूवकं वजयम् इच्छामः । अतः इयं प्राथना अ स्त यत् - हे भगवन् ! हे संसारस्य स्वा मन् ! हे
परमेश ! हे सकलेश ! भवान् अस्माकं कृते सवषु कायषु उज्ज्वलं शुभं च वजयं प्रयच्छतु इ त । — अस्य
भावाथस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पुस्तक ने पूरे गीत का भावाथ स्वयं सरल संस्कृत म दया है। उसका हन्द अनुवाद वाक्य-दर-वाक्य नीचे है।
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
वयं सव भारतीयाः शूराः, वीराः, धैयशा लनः च स्मः । हम सब भारतीय शूर , वीर और धै यवान है ं।
सव गुणशा लनः बलशा लनः वजेतारः च स्मः । हम सब ग ुणवान , बल वान और िवजय पाने वाले है ं।
वयं दृढसंकल्पयुक्ताः लोभर हताः साहसयुक्ताः च स्मः । हम दृ ढ़ संक प वाले ल् , ल ोभरिहत और साहसी है ं।
वयं सव भारतवा सनः उत्तमभावेन जनानां सेवां कुमः । हम सब भारतवासी उ त्त म भाव से ल ोगों की से वा करते है ं।
सवषां शुभ चन्तनं कुमः । हम सबका भल ा सोचते है ं।
अस्माकं हृदये धनस्य अ धककामनाः, सुखस्य वषये वासना, हमारे हृ द य में न धन की अिधक कामना है , न सुख-भोग की
कपटभावना च न स न्त । वासना , और न कपट का भाव।
तेजोयुक्ताः वयं भारतीयाः ऊजापूवकं दृढतया च काय कुमः । तेज स्वी हम भारतीय ऊज और दृ ढ़ ता के साथ काम करते है ं।
वयं भारतीयाः नभयाः दृढशक्त्या च युक्ताः युद्धक्षेत्रे सवदा नी तपूवकं हम भारतीय िनभय और दृ ढ़ शि क् क्
त से य ु त होकर य ु द्धक्षत्र
े में
वजयम् इच्छामः । सद ा नीित के साथ िवजय चाहते है ं।
अतः इयं प्राथना अ स्त यत् — हे भगवन् ! हे संसारस्य स्वा मन् ! हे इसिल ए यह पाथना है िक — हे भगवन!् हे संस ार के स्वामी! हे
परमेश ! हे सकलेश ! भवान् अस्माकं कृते सवषु कायषु उज्ज्वलं शुभं परमेश ! हे सबके ईश! आप हमारे िल ए सब काय ं में उ ज्ज्वल
च वजयं प्रयच्छतु इ त । और श ुभ िवजय पद ान कीिजए।
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भावाथ पढ़ने का लाभ: गीत छन्द म है, इस लए वहाँ वसग गरते ह और क्रया छपी रहती है (‘शूरा वयम्’ म
‘स्मः’ अध्याहृत है)। भावाथ वही बात पूरी क्रया के साथ गद्य म कहता है — ‘वयं शूराः स्मः’। इसी लए ोक का
अन्वय करते समय भावाथ ही आपका सबसे अच्छा सहायक है।
व्याकरण-संकेतः: ‘कुमः, इच्छामः, स्मः’ — सवा ण उत्तमपुरुष बहुवचन रूपा ण । ‘प्रयच्छतु’ इ त लोट् -लकारे
प्रथमपुरुष-एकवचनम् (= दे , प्रदान करे) — प्राथनायाम् आ ाथः प्रयुज्यते । ‘अस्माकम्’ इ त अस्मद्-शब्दस्य षष्ठी
बहुवचनम् (= हमारा) ।
अवधेयांशः — पृष्ठ 82
प्रा तप दकम् तथा तद्-एतद्-अस्मद्-युष्मद् इत्येषां प्रथमा- वभक्तेः रूपा ण
अवधे यां शः
प्र.1 ‘रामः, सः, सीता, दे वालयः, पीतः, बलशा लनः’ इ त एता न पदा न नामपदा न स न्त । ‘रामः’ इ त पदस्य मूलम्
अ स्त ‘राम’ । नामपदस्य मूलरूपं ‘प्रा तप दकम्’ इ त कथ्यते । — ‘प्रा तप दकम्’ इ त कम् ? पाठे प्रयुक्तानां
पञ्चानां पदानां प्रा तप दकं लखन्तु ।
प्रा तप दकम् का अथ है — नामपद (सं ा/ वशेषण/सवनाम) का वह मूल रूप, जसम अभी कोई वभ क्त नह लगी है।
पाितपिदकम् राम + पथमा एकवचनम् → रामः
पाितपिदकम् शूर + पथमा बहुवचनम् → शूराः
पाितपिदकम् फल + पथमा बहवु चनम् → फलािन
पदम् (पाठे ) प्रा तप दकम् लङ्गम् वभ क्तः, वचनम्
शूर ाः शूर पुं लङ्गम् प्रथमा, बहुवचनम्
धीराः धीर पुं लङ्गम् प्रथमा, बहुवचनम्
बालाः बाल पुं लङ्गम् प्रथमा, बहुवचनम्
वञ्चना वञ् चना स्त्री लङ्गम् प्रथमा, एकवचनम्
समराङ् गणम् समराङ्गण नपुंसक लङ्गम् तीया, एकवचनम्
बलशािलनः बल शािल न ् पुं लङ्गम् प्रथमा, बहुवचनम्
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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प्रा तप दक पहचानने का सरल उपाय: पद के अन्त से वभ क्त-प्रत्यय हटा द जए — जो बचे, वही प्रा तप दक
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है। रामः से ‘◌ः’ हटा → राम। शूराः से ‘आः’ हटा → शूर। पर सावधान: आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द eमmप्रा तप दक
c o m एक जैसे दखते ह — वञ्चना (प्रा तप दक) और वञ्चना (प्रथमा एकवचन) g l as दोन एक ही रूप
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और प्रथमा एकवचन
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ह। इसी लए पृ ष्ठ 86 क ता लका म ‘कामना — कामना — कामने — कामनाः’ लखा है ।
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व्याकरण-संकेतः: ‘प्रा तप दकम्’ इ त पा णनेः सं ा — ‘अथवदधातुरप्रत्ययः प्रा तप दकम्’ । अथात् यत् अथवत्
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अ स्त, धातुः न अ स्त, प्रत्ययः च न अ स्त — तत् प्रा तप दकम् ।
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प्र.2 अधः वद्यमाने कोष्ठके प्रा तप दकस्य प्रथमा- वभक्तेः रूपा ण पठन्तु — ‘तद्’ तथा ‘एतद्’ शब्दयोः त्रषु लङ्गे षु
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प्रथमा- वभक्तेः रूपा ण लखन्तु ।
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a पुस्तक क दोन ता लकाएँ नीचे ह। ‘तद्’ का अथ है वह (दूर क वस्तु) और ‘एतद्’ का अथ है यह (पास क वस्तु)।
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तद् — प्रथमा वभ क्तः
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लङ्गम् एकवचनम्
l a se वचनम् बहुवचनम्
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पुंिलङ् गम् सः तौ ते
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स्त्रीिलङ् गम्
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नपुंस किलङ् गम् तत ् ते तािन
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agl एतद् — प्रथमा वभ क्तः
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लङ्गम् एकवचनम्
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वचनम् बहुवचनम्
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पुंिलङ् गम् एषः एतौ एते
स्त्रीिलङ् गम् एषा एते एताः
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नपुंस किलङ् गम्
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एतत ् एते एतािन
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m एक बात जो परीक्षा म काम आती है: ‘तद्’ के पुं लङ्ग-बहुवचन ‘ते’ और स्त्री लङ्ग- वचन ‘ते’ तथा नपुंसक-
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agla वचन ‘ते’ — तीन एक जैसे दखते ह! भेद केवल वाक्य के दूसरे पद से पता चलता है — ‘ते बालकाः पठ न्त’
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(बहुवचन) पर ‘ते बा लके पठतः’ ( वचन)। इस लए रूप याद करते समय क्रया भी साथ याद क जए।
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Tip: ‘एतद्’ के रूप ‘तद्’ के रूप sमe‘ए’ जोड़कर बन जाते ह — तत् → एतत्, तौ → एतौ, ताः → एताः। केवल
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agl बनते ह।
‘सः/सा’ अपवाद ह, जो ‘एषः/एषा’
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 ‘अस्मद्’ तथा ‘युष्मद्’ शब्दयोः प्रथमा- वभक्तेः रूपा ण लखन्तु । एतयोः का वशेषता ?
दोन सवनाम ह — ‘अस्मद्’ अथात् म/हम, ‘युष्मद्’ अथात् तू/तुम।
अस्मद् — प्रथमा वभ क्तः
लङ्गम् एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
ित्रषु िलङ् गेष ु समान-रूपािण अहम् आवाम् वयम्
युष्मद् — प्रथमा वभ क्तः
लङ्गम् एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
ित्रषु िलङ् गेष ु समान-रूपािण त्
वम् य ुवाम् यूयम्
वशेषता (संस्कृतेन) — अस्मद्-युष्मद्-शब्दयोः रूपा ण त्रषु अ प लङ्गे षु समाना न भव न्त । ( हन्द : अस्मद् और युष्मद् के
रूप तीन लङ्ग म एक जैसे होते ह।)
यह वशेषता क्य है: ‘सः/सा/तत्’ म लङ्ग दखाना ज़रूरी है, क्य क हम कसी और क बात कर रहे ह। पर जब
म अपनी बात क ँ (‘अहम्’) या आपसे क ँ (‘त्वम्’), तब सामने वाला दे ख ही रहा है क म लड़का ँ या लड़क —
लङ्ग बताने क आवश्यकता ही नह । इस लए संस्कृत ने इन दो सवनाम को लङ्ग से मुक्त रखा।
पाठे न सह सम्बन्धः: इसी कारण गीत ‘शूराः वयम्’ को लड़के और लड़ कयाँ, दोन एक साथ गा सकते ह — ‘वयम्’
कसी एक लङ्ग का नह है। और इसी लए पृष्ठ 84 के प्रश्न ६ म ‘अहम्, आवाम्, वयम्, त्वम्, युवाम्, यूयम्’ — छह
रूप अभ्यास के लए दए गए ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 83
प्रश्नाः १ – ४
अभ्यासः
प्र.1 एतत् स ूण गीतं सस्वरं गायन्तु, लखन्तु, कण्ठस्थं च कुवन्तु ।
यह करने योग्य काय है — गाइए, ल खए और याद क जए। नीचे पूरा गीत एक जगह दया है ता क अभ्यास सरल हो।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
क्रमः ोकः
१ शूरा वयं धीरा वयं वीरा वयं सुतराम् ।
गुणशा लनो बलशा लनो जयगा मनो नतराम् ॥ शूरा वयम् ॥
२ दृढमानसा गतलालसाः प्रयसाहसाः सततम् ।
जनसेवका अ तभावुकाः शुभ चन्तका नयतम् ॥ शूरा वयम् ॥
३ धनकामना सुखवासना न च वञ्चना हृदये ।
ऊजस्वला वचस्वला अ त नश्चला वजये ॥ शूरा वयम् ॥
४ गतभीतयो धृतनीतयो दृढशक्तयो न खला ।
यामो वयं समराङ्गणं वजया थनो बालाः ॥ शूरा वयम् ॥
५ जगद श हे ! परमेश हे ! सकलेश हे ! भगवन् ।
जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं नो दे ह परमात्मन् ॥ शूरा वयम् ॥
कण्ठस्थ करने का उपाय: हर ोक क पहली पं क्त म तीन-तीन वशेषण ह और दूसरी पं क्त म भी तीन। इसी
‘तीन-तीन’ क लय से गीत याद हो जाता है — शूरा/धीरा/वीरा, गुणशा लनो/बलशा लनो/जयगा मनो, दृढमानसा/
गतलालसाः/ प्रयसाहसाः, जनसेवका/अ तभावुका/शुभ चन्तका। पहले लय पक ड़ए, शब्द अपने-आप बैठ जाएँगे।
सस्वर गाने का लाभ: ‘सस्वरम्’ का अथ है स्वर के साथ। संस्कृत के छन्द ध्व न पर टके ह — जब आप गाकर
पढ़ते ह तो द घ-ह्रस्व अपने-आप ठ क बैठते ह और उ ारण क भूल घट जाती है। कक्षा म मलकर गाइए, जैसे
पाठ के आचाय ने कहा — ‘एतत् एव सस्वरं म लत्वा गायामः’।
प्र.2 पाठस्य आधारेण प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) शूराः के ? (ख) वयं क दृशमानसाः स्मः ? (ग) वयं
क दृश चन्तकाः स्मः ? (घ) वयं कुत्र अ त नश्चलाः स्मः ? (ङ) वयं वजया थनः कुत्र यामः ?
सब उत्तर एक पद म दे ने ह — इस लए पूरा वाक्य नह , केवल वही पद ल खए जो प्रश्न ने माँगा है।
प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द गीते आधारः
(क) शूर ाः के ? भारतीयाः (वयम्) भारतीय (हम) वयं भारतीयाः शूराः वीराः च स्मः
(ख) वयं कीदृ शमानसाः स्मः ? दृ ढमानसाः दृढ़ मन वाले दृढमानसा गतलालसाः …
(ग) वयं कीदृ शिचन्तकाः स्मः ? न्
श ुभिच तकाः शुभ सोचने वाले … शुभ चन्तका नयतम्
(घ) वयं कु त्र अितिनश्चलाः स्मः ? िवजये वजय म अ त नश्चला वजये
(ङ) वयं िवजयािथनः कु त्र यामः ? समराङ्गणम् रणभू म क ओर यामो वयं समराङ्गणं
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नशब्द ही उत्तर क वभ क्त बता दे ता है: ‘के’ पूछा गया — इस लए उत्तर प्रथमा बहुवचन म (भारतीयाः)।
‘क दृशाः’ पूछा गया — इस लए उत्तर वशेषण (दृढमानसाः, शुभ चन्तकाः)। ‘कुत्र’ पूछा गया — इस लए उत्तर स्थान
बताने वाला पद: (घ) म सप्तमी ‘ वजये’, और (ङ) म तीया ‘समराङ्गणम्’, क्य क वहाँ जाने क क्रया (यामः) है
और गत्यथक धातु का कम तीया म आता है।
Check it yourself: (घ) और (ङ) दोन म ‘कुत्र’ है, फर भी वभ क्त अलग है। कारण — ‘स्मः’ के साथ
स्थ त बताई जा रही है (सप्तमी), ‘यामः’ के साथ गन्तव्य ( तीया)।
प्र.3 उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां वचनप रवतनं कुवन्तु — (क) शूराः वयम् = शूरः अहम् ; वीराः वयम् =
……… (ख) ……… = बलशा लनः ; ……… = जयगा मनः (ग) दृढमानसाः = ……… ; प्रयसाहसाः = ……… (घ)
……… = अ तभावुकाः ; शुभ चन्तकाः = ……… (ङ) धनकामना = ……… ; वञ्चना = ……… (च) ……… =
वचस्स्वलाः ; ……… = अ त नश्चलाः
उदाहरण दे खए — शूराः वयम् = शूरः अहम्। यानी बहुवचन को एकवचन म बदलना है (और जहाँ एकवचन दया हो, वहाँ
बहुवचन म)।
क्रमः दत्तम् उत्तरम् वचनप रवतनम्
(क) शूराः वयम् = शूर ः अहम् (उदाहरणम्) बहुवचनात् एकवचनम्
(क) वीराः वयम् = वीरः अहम् बहुवचनात् एकवचनम्
(ख) बलशाली = बल शािल नः एकवचनात् बहुवचनम्
(ख) जयगामी = जयगािमनः एकवचनात् बहुवचनम्
(ग) दृढमानसाः = दृ ढमानसः बहुवचनात् एकवचनम्
(ग) प्रयसाहसाः = िपयसाहसः बहुवचनात् एकवचनम्
(घ) अ तभावुकः = अितभाव ुकाः एकवचनात् बहुवचनम्
(घ) शुभ चन्तकाः = श ुभिच तकः न् बहुवचनात् एकवचनम्
(ङ) धनकामना = धनकामनाः एकवचनात् बहुवचनम्
(ङ) वञ्चना = वञ् चनाः एकवचनात् बहुवचनम्
(च) वचस्वलः = वच स्
वल ाः एकवचनात् बहुवचनम्
(च) अ त नश्चलः = अितिन चल ाः श् एकवचनात् बहुवचनम्
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(ख) म ‘बलशा लनः’ का एकवचन ‘बलशाली’ क्य : ‘बलशा लन्’ नकारान्त पुं लङ्ग शब्द है — इसके रूप
‘गु णन्’ क तरह चलते ह: बलशाली, बलशा लनौ, बलशा लनः। यही बात ‘गुणशा लन्’ (गुणशाली) और
‘जयगा मन्’ (जयगामी) पर लागू है। ‘बलशा लनः’ को दे खकर एकवचन ‘बलशा लनः’ ही लख दे ना सबसे आम भूल
है।
पुस्तक क छपाई पर ध्यान: प्रश्न (च) म पुस्तक म ‘वचस्स्वलाः’ छपा है, जब क गीत म तथा पृष्ठ 80 क शब्दाथ-
ता लका म शुद्ध रूप ‘वचस्वलाः’ है। उत्तर लखते समय शुद्ध रूप वचस्वलः = वचस्वलाः ही ल खए। साथ ही याद
र खए क गीत म ये ‘ऊजस्वला, वचस्वला, अ त नश्चला’ रूप म मलते ह — वहाँ छन्द के कारण वसग लुप्त है।
प्र.4 स्त ौ मेलयन्तु उत्तरं च लखन्तु — (अ) (क) गतभीतयो धृतनीतयो (ख) यामो वयं समराङ्गणं (ग) जगद श हे !
परमेश हे ! (घ) जयमङ्गलं परमोज्ज्वलं (ङ) जनसेवका अ तभावुकाः (च) ऊजस्वला वचस्वला ; (ब) शुभ चन्तका
नयतम् / सकलेश हे भगवन् ! / वजया थनो बालाः / दृढशक्तयो न खलाः / नो दे ह परमात्मन् ! / अ त नश्चला
वजये
यहाँ गीत क आधी-आधी पं क्तयाँ जोड़नी ह। उदाहरण पुस्तक म दया है — (क) का मेल ‘दृढशक्तयो न खलाः’ से है।
(अ) (ब) उत्तरा ण (पूणा पङ् क्तः)
(क) गतभीतयो ध ृतनीतयो दृढशक्तयो न खलाः गतभीतयो ध ृतनीतयो दृ ढश क्तयो िनिखल ाः (उदाहरणम्)
(ख) यामो वयं समराङ् गणं वजया थनो बालाः यामो वयं समराङ्गणं िवजयािथनो बाल ाः
(ग) जगदीश हे ! परमेश हे ! सकलेश हे भगवन् ! जगद ीश हे ! परमेश हे ! सकले श हे भगवन ् !
(घ) जयमङ् गलं परमोज्ज्वलं नो दे ह परमात्मन् ! जयमङ्गल ं परमो ज्ज् त्
वल ं नो दे िह परमा मन ् !
(ङ) जनसे वका अितभावुक ाः शुभ चन्तका नयतम् जनसे वका अितभाव ुकाः श ुभिच तका िनयतम् न्
(च) ऊजस्वला वचस्वला अ त नश्चला वजये ऊज स्
वल ा वच स् श्
वल ा अितिन चल ा िवजये
मलान करने का पक्का तरीका — तुक (अन्त्यानुप्रास) दे खए: हर ोक क दोन पं क्तयाँ एक ही ध्व न पर
समाप्त होती ह — न खलाः/बालाः ( ोक ४), भगवन्/परमात्मन् ( ोक ५), सततम्/ नयतम् ( ोक २), हृदये/
वजये ( ोक ३)। जस वकल्प क तुक मल जाए, मेल वही है। इस एक यु क्त से सारे छह उत्तर बना गीत याद
कए भी मल जाते ह।
Check it yourself: मलाने के बाद हर पं क्त को गाकर दे खए — य द लय टू टती है तो मेल ग़लत है। छन्द
स्वयं अपनी जाँच कर लेता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 84
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प्रश्नौ ५ – ६
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अभ्यासः
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उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां वचनप रवतनं कुवन्तु — एकवचनम् / बहुवचनम् । यथा – शूरः – शूराः ।
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प्र.5
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(क) धीरः – ……… (ख) ……… – वीराः (ग) जनसेवकः – ……… (घ) ……… – धनकामनाः (ङ) न खलः –
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……… (च) ……… – बालाः
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यहाँ केवल एकवचन ↔ बहुवचन बदलना है। उदाहरण — शूरः – शूराः।
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क्रमः बहुवचनम् शब्दप्रकारः
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(क) धीरः अकारान्त पुं लङ्गम्
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धीराः
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(ख) वीराः अकारान्त पुं लङ्गम्
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वीरः
(ग) जनसेवकः जनसे वकाः अकारान्त पुं लङ्गम्
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(घ) धनकामना धनकामनाः आकारान्त स्त्री लङ्गम्
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(ङ) न खलः अकारान्त पुं लङ्गम्
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बालाः अकारान्त पुं लङ्गम्
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बाल ः
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m‘◌ः’ हटाइए, बस। पुं लङ्ग शब्द म एकवचन का चह्न ‘◌ः’ है l a
(घ) पर ध्यान द जए — यही एकमात्र स्त्री लङ्ग शब्द है: ‘धनकामना’ आकारान्त स्त्री लङ्ग है, इस लए इसका
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emचह्न के — यही दोन का भेद है।
एकवचन धनकामना ही रहता है — ‘धनकामनाः’
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(शूरः), पर स्त्री लङ्ग म एकवचन बना कसी
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सूत्र-रूप म याद क जए: अकारान्त पुं लङ्ग → -ः / -औ / -ाः (बालः, बालौ, बालाः)। आकारान्त स्त्री लङ्ग → -ा /
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-े / -ाः (कामना, कामने, कामनाः)। अकारान्त नपुंसक लङ्ग → -म् / -े / -ा न (शोभनम्, शोभने, शोभना न)। पूरी
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सूची पृष्ठ 86 क ता लका म है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.6 उदाहरणं दृ ् वा अधो ल खता न पदा न परस्परं संयोज्य वाक्या न रचयन्तु — (अ) (क) छात्रः (ख) छात्रौ (ग)
छात्राः (घ) अहम् (ङ) आवाम् (च) वयम् (छ) त्वम् (ज) युवाम् (झ) यूयम् ; (ब) पठा म / पठ स / पठ त / पठ न्त
/ पठथः / पठथ / पठतः / पठामः / पठावः
कता का पुरुष और वचन दे खए, फर उसी क क्रया चु नए। उदाहरण — छात्रः पठ त।
क्रमः कता क्रया वाक्यम् पुरुषः, वचनम्
(क) छात्रः पठ त छा त्र ः पठित । (उदाहरणम्) प्रथमपुरुषः, एकवचनम्
(ख) छात्रौ पठतः छा त्र ौ पठतः । प्रथमपुरुषः, वचनम्
(ग) छात्राः पठ न्त छा त्र न्
ाः पठि त । प्रथमपुरुषः, बहुवचनम्
(घ) अहम् पठा म अहं पठािम । उत्तमपुरुषः, एकवचनम्
(ङ) आवाम् पठावः आवां पठावः । उत्तमपुरुषः, वचनम्
(च) वयम् पठामः वयं पठामः । उत्तमपुरुषः, बहुवचनम्
(छ) त्वम् पठ स त्
वं पठिस । मध्यमपुरुषः, एकवचनम्
(ज) युवाम् पठथः य ुवां पठथः । मध्यमपुरुषः, वचनम्
(झ) यूयम् पठथ यूयं पठथ । मध्यमपुरुषः, बहुवचनम्
‘पठ् ’ धातु का पूरा न ा (लट् -लकारः):
पथमपुरु षः — पठित | पठतः | पठिन्त
मध्यमपुरु षः — पठिस | पठथः | पठथ
उत्तमपुरु षः — पठािम | पठावः | पठामः
दो जोड़े जो अक्सर उलझते ह: पठतः (छात्रौ — प्रथमपुरुष वचन) और पठथः (युवाम् — मध्यमपुरुष वचन);
तथा पठावः (आवाम्) और पठामः (वयम्)। ‘थ’ क ध्व न सुनते ही सम झए क कता ‘त्वम्/युवाम्/यूयम्’ म से है।
ध्यान द जए — लखते समय ‘अहम् + पठा म’ स न्ध होकर ‘अहं पठा म’ बनता है (म् → अनुस्वारः) ।
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प्रश्नौ ७ – ८
अभ्यासः
प्र.7 कोष्ठकात् उ चतं पदं स्वीकृत्य रक्तस्थाने लखन्तु — यथा – तद्, स्त्री लङ्गम्, प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम् – सा
(एषा/अहम्/सा) । (क) अस्मद्, प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम् – ……… (वयम्/त्वम्/अहम्) (ख) युष्मद्, प्रथमा
वभ क्तः, वचनम् – ……… (त्वम्/सः/युवाम्) (ग) तद्, पुं लङ्गम्, प्रथमा वभ क्तः, बहुवचनम् – ……… (एषः/
ते/सा) (घ) एतद्, नपुंसक लङ्गम्, प्रथमा वभ क्तः, बहुवचनम् – ……… (एता न/वयम्/तत्) (ङ) एतद्,
स्त्री लङ्गम्, प्रथमा वभ क्तः, एकवचनम् – ……… (अहम्/एषा/एतत्) (च) तद्, स्त्री लङ्गम्, प्रथमा वभ क्तः,
वचनम् – ……… (ते/अहम्/एषा)
हर पं क्त म तीन बात द ह — शब्द, लङ्ग, वचन। तीन से मलने वाला ही रूप सही है। पृष्ठ 82 क ता लकाएँ सामने रखकर
मलाइए।
क्रमः दत्तम् उत्तरम् कारणम्
यथा तद्, स्त्री लङ्गम्, प्रथमा, एकवचनम् सा तद् का स्त्री लङ्ग एकवचन
(क) अस्मद्, प्रथमा, एकवचनम् अहम् अस्मद् = अहम्, आवाम्, वयम्
(ख) युष्मद्, प्रथमा, वचनम् य ुवाम् युष्मद् = त्वम्, युवाम्, यूयम्
(ग) तद्, पुं लङ्गम्, प्रथमा, बहुवचनम् ते सः – तौ – ते
(घ) एतद्, नपुंसक लङ्गम्, प्रथमा, बहुवचनम् एतािन एतत् – एते – एता न
(ङ) एतद्, स्त्री लङ्गम्, प्रथमा, एकवचनम् एषा एषा – एते – एताः
(च) तद्, स्त्री लङ्गम्, प्रथमा, वचनम् ते सा – ते – ताः
(ग) और (च) का उत्तर एक ही — ‘ते’ — पर अथ अलग: (ग) म ‘ते’ का अथ है वे सब (पुरुष), और (च) म ‘ते’
का अथ है वे दोन ( स्त्रयाँ)। संस्कृत म यह ‘रूप-साम्य’ खूब मलता है; अथ वाक्य के बाक पद और क्रया से तय
होता है — ‘ते बालकाः गच्छ न्त’ बनाम ‘ते बा लके गच्छतः’।
वकल्प काटने का तरीका: हर पं क्त म कोष्ठक के तीन वकल्प म से दो जान-बूझकर ग़लत रखे गए ह — या तो
दूसरा शब्द (अस्मद् क जगह युष्मद्) या दूसरा वचन। पहले शब्द से वकल्प का टए, फर वचन से; एक ही बचेगा।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.8 उदाहरणमनुसृत्य उ चतेन पदे न रक्तस्थानं पूरयन्तु — यथा – ना यका नृत्य त । (नृत्) । (क) बालकः ………
( लख्) (ख) छात्रौ ……… (क्र ड् ) (ग) अहम् ……… (गच्छ् ) (घ) क वः ……… (रचय्) (ङ) म हलाः ……… (वद्)
(च) दे वाः ……… (आगच्छ् ) (छ) फला न ……… (पत्) (ज) गृ हण्यः ……… (उप वश्)
कोष्ठक म धातु द है; कता का वचन दे खकर लट् -लकार का ठ क रूप बनाइए।
क्रमः वाक्यम् धातुः कतुः वचनम् हन्द
यथा ना यका नृत्य त । नृत् एकवचनम् ना यका नाचती है।
(क) बाल कः िल खित । लख् एकवचनम् बालक लखता है।
(ख) छा त्र क्र
ौ ीडतः । क्र ड् वचनम् दोन छात्र खेलते ह।
(ग) च्
अहं ग छािम । गच्छ् उत्तमपुरुष एकवचनम् म जाता/जाती ँ।
(घ) किवः रचयित । रचय् एकवचनम् क व रचना करता है।
(ङ) मिहल ाः वद ि त । न् वद् बहुवचनम् म हलाएँ बोलती ह।
(च) दे वाः आग छि त ।च् न् आगच्छ् बहुवचनम् दे वता आते ह।
(छ) फ ल ािन पति त । न् पत् बहुवचनम् फल गरते ह।
(ज) ण्
ग ृिह यः उ पिवशि त । न् उप वश् बहुवचनम् गृ ह णयाँ बैठती ह।
क्रया कता के लङ्ग से नह , वचन से बदलती है: ‘म हलाः वद न्त’ और ‘दे वाः वद न्त’ — कता स्त्री लङ्ग हो या
पुं लङ्ग, बहुवचन म क्रया एक ही रहती है — वद न्त। इसी तरह ‘फला न पत न्त’ म कता नपुंसक लङ्ग है, फर भी
क्रया वही ‘पत न्त’। हन्द म क्रया लङ्ग से बदलती है ( गरता है / गरती है), संस्कृत म नह — यह बड़ा भेद है।
पहचा नए क कता बहुवचन है: (ङ) म हलाः, (च) दे वाः, (ज) गृ हण्यः — तीन के अन्त म ‘◌ाः / यः’ है, यानी
बहुवचन; (छ) फला न — नपुंसक लङ्ग बहुवचन का चह्न ‘-ा न’। और (ख) ‘छात्रौ’ का ‘औ’ वचन का पक्का
संकेत है।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 85 – 88
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
गीतस्य रचनाकारः, शब्दरूपा ण, महापुरुषाणां चत्रा ण, मातृदेवता-स्तोत्रम्
योग्यता वस्तरः
प्र.1 गीतस्य रचनाकारः — अस्य गीतस्य रचनाकारः ीधरः भास्करः वणकरः अ स्त । एषः सुप्र सद्धः आधु नकः क वः
अ स्त । वणकरमहोदयस्य जन्म महाराष्ट्र-राज्ये नागपुरनगरे अभवत् । एषः अनेका न काव्या न नाटका न गीता न
च र चतवान् । वणकरमहोदयः राष्ट्रप तपुरस्कारेण अ प सम्मा नतः अ स्त । — अस्य अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु, रचनाकारस्य वषये च लखन्तु ।
पुस्तक का अनुच्छेद वाक्य-दर-वाक्य नीचे अनू दत है।
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
अस्य गीतस्य रचनाकारः ीधरः भास्करः वणकरः अ स्त । इस गीत के रचनाकार ीधर भा स्
कर वण कर है ं।
एषः सुप्र सद्धः आधु नकः क वः अ स्त । वे सुपिस द्ध आध ुिनक किव है ं।
वणकरमहोदयस्य जन्म महाराष्ट्र-राज्ये नागपुरनगरे अभवत् । वण कर महोद य का ज म महारा न् रा ज् य के नागप ुर नगर में हआ
ु ।
एषः अनेका न काव्या न नाटका न गीता न च र चतवान् । न्
उ होंने अनेक का य व् , नाटक और गीत रचे।
वणकरमहोदयः राष्ट्रप तपुरस्कारेण अ प सम्मा नतः अ स्त । वण कर महोद य रा पित प ुर - स् म्
कार से भी स मािनत है ं।
संस्कृतेन सारः — ीधरः भास्करः वणकरः आधु नकसंस्कृतसा हत्यस्य सुप्र सद्धः क वः आसीत् । सः महाराष्ट्रस्य
नागपुरनगरे अजायत । सः बहू न काव्या न नाटका न गीता न च अ लखत् । ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ इ त दे शभ क्तगीतम्
अ प तेन एव र चतम् ।
व्याकरण-संकेतः: ‘अभवत्’ इ त ‘भू’ धातोः लङ् -लकारः (भूतकालः), प्रथमपुरुष-एकवचनम् (= हुआ) ।
‘र चतवान्’ इ त क्तवतु-प्रत्ययान्तम् (= रचा) । ‘राष्ट्रप तपुरस्कारेण’ इ त तृतीया एकवचनम् — करणे तृतीया
(पुरस्कार से सम्मा नत) । ‘अस्य’, ‘वणकरमहोदयस्य’ — षष्ठी एकवचनम् ।
Did you know? आधु नक युग म भी संस्कृत म नए काव्य, नाटक और गीत नरन्तर लखे जा रहे ह — वणकर
महोदय उसी परम्परा के क व ह। यह गीत इसका प्रमाण है क संस्कृत केवल पुराने ग्र क भाषा नह ; उसम आज
के भाव — दे शभ क्त, जनसेवा, सामू हक संकल्प — भी उतनी ही सहजता से कहे जा सकते ह।
प्र.2 अधो ल खता न शब्दरूपा ण पठन्तु अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — भारतीय, धीर, शूर, जनसेवक, शुभ चन्तक, बाल,
न खल, कामना, वासना, वञ्चना, समराङ्गण, शोभन, नयत ।
पृष्ठ 86 क पूरी ता लका नीचे है। ध्यान द जए — ता लका तीन साँच म बँट है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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शब्दः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
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भारतीय
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भारतीयः भारतीयौ
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भारतीयाः
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धीरः धीरौ
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धीर धीराः
शूर शूरः शूरौ
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शूर ाः
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जनसे वक जनसेवकः
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जनसे वकाः
शुभिचन्तक शुभ चन्तकः
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श ुभिच तकाः
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बाल बालः बालौ
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बाल ाः
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िनिखल न खलः न खलौ
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कामना कामना कामने
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कामनाः
वासना वासने वासनाः
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वञ्चना वञ्चना वञ्चने ञ्
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व चनाः
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समराङ् गण समराङ्गणम् समराङ्गणे समराङ्गणािन
शोभन शोभनम् शोभने
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शोभनािन
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िनयत नयतम् नयते
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िनयतािन
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a s eतेmरह शब्द नह , केवल तीन साँचे:
agl अकारान्त पुं लङ्गम् (भारतीय, धीर, शूर, जनसेवक, शुभ चन्तक, बाल, न खल) → -ः / -ौ / -ाः
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comनयत) → -म् / -े / -ा न
आकारान्त स्त्री लङ्गम् (कामना, वासना, वञ्चना) → -ा / -े / -ाः
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अकारान्त नपुंसक लङ्गम् (समराङ्गण, शोभन,
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a l लका के सभी शब्द और इनके जैसे सैकड़ और शब्द अपने-आप आ जाएँगे।
जो एक साँचा पकड़ लेगा, उसे इसgता
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Try This: इसी साँचे पर पाठ के तीन और शब्द क ता लका बनाइए — वीर (पुं लङ्ग), प्राथना (स्त्री लङ्ग), गीत
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(नपुंसक लङ्ग)। उत्तर: वीरः-वीरौ-वीराः, प्राथना-प्राथने-प्राथनाः, गीतम्-गीते-गीता न।
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महापुरुषाणां राष्ट्रनायकानां च चत्रा ण अधः स न्त । एते शूराः वीराः धीराः च आसन् । गीते ल खतान् सवान्
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प्र.3
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भावान् एतेषां महापुरुषाणां जीवने वयं पश्यामः । — चत्रेषु के के स न्त ? तेषु गीतस्य कः भावः दृश्यते ?
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पृष्ठ 87 पर नौ चत्र ह। पुस्तक म दए नाम और उनके साथ गीत का जो भाव जुड़ता है, वह नीचे है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
चत्रम् नाम (संस्कृते) प रचयः ( हन्द ) गीतस्य भावः
१ शङ् कराचायः अ न्
ैत वेद ा त के आचाय , चारों िद शाओं में मठ स्थािपत िकए धीराः, वचस्वलाः
२ शवा जः महाराजः मराठा साम ा ज् य के सं स्
थापक , स्वराज्य के पतीक शूराः, धृतनीतयः
३ स्वामी दयानन्दः सरस्वती आयसमाज के सं स्
थापक , वेद ों की ओर ल ौटने का आ ान अ त नश्चलाः, दृढमानसाः
४ मदनमोहनः मालवीयः महामना , काशी िहन्दू िवश्विव ाल य के सं स्थापक जनसेवकाः, शुभ चन्तकाः
५ रा ी लक्ष्मीबाई झाँस ी की रानी , 1857 की वीरांग ना गतभीतयः, वजया थनः
६ स्वामी ववेकानन्दः य ुवाओं के पेर णा ोत , िशकागो-व्याख्यान से िवश्विवख्यात ऊजस्वलाः, वचस्वलाः
७ मह षः अर वन्दः क्र न्
ाि तकारी , द ाशिनक और योगी दृढशक्तयः, गतलालसाः
८ सुभाषचन्द्रः बोसः नेताजी , आज़ाद िहन्द फ़ ौज के नायक शूराः, समराङ्गणं यामः
९ ए.पी.जे. अब्दुलः कलामः वै ािनक तथा भारत के रा पित, ‘जनता के रा पित’ गुणशा लनः, जनसेवकाः
संस्कृतेन उत्तरम् — एतेषु चत्रेषु शङ् कराचायः, शवा जः महाराजः, स्वामी दयानन्दः सरस्वती, मदनमोहनः मालवीयः, रा ी
लक्ष्मीबाई, स्वामी ववेकानन्दः, मह षः अर वन्दः, सुभाषचन्द्रः बोसः, ए.पी.जे. अब्दुलः कलामः च स न्त । एते सव शूराः
वीराः धीराः च आसन् । ( हन्द : इन चत्र म शङ् कराचाय, शवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द सरस्वती, मदनमोहन मालवीय, रानी
लक्ष्मीबाई, स्वामी ववेकानन्द, मह ष अर वन्द, सुभाषचन्द्र बोस और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ह। ये सब शूर, वीर और धीर थे।)
नौ चत्र म एक बड़ा सन्दे श छपा है: इनम सन्त भी ह और सै नक भी; शक्षा वद् भी और वै ा नक भी; पुरुष भी
और रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना भी। पुस्तक बताना चाहती है क ‘शूर’ होने का एक ही रूप नह होता — वचार
से, सेवा से, व ान से और युद्ध से, चार प्रकार से दे श क सेवा होती है। इसी लए वाक्य म ‘आसन्’ (लङ् -लकार,
बहुवचन — ‘थे’) प्रयुक्त है — यह इ तहास क बात है, और गीत उसे वतमान म जीने को कहता है।
व्याकरण-संकेतः: ‘आसन्’ इ त ‘अस्’ धातोः लङ् -लकारे प्रथमपुरुष-बहुवचनम् (आसीत् – आस्ताम् – आसन्) ।
‘पश्यामः’ इ त लट् -लकारे उत्तमपुरुष-बहुवचनम् । ‘एतेषां महापुरुषाणाम्’ इ त षष्ठी बहुवचनम् ।
प्र.4 एतत् स्तोत्रं ध्यानेन पठन्तु, अवगच्छन्तु स्मरन्तु च । भारतवषस्य केषाञ्चन धीराणां वीराणां कासाञ्चन वीराङ्गनानां
च नामोल्लेखः अधोदत्तेषु ोकेषु अ स्त । एतान् ोकान् सस्वरं गायन्तु स्मरन्तु च । — अरुन्धत्यनसूया च
सा वत्री जानक सती । द्रौपद कण्णगी गाग मीरा दुगावती तथा ॥ लक्ष्मीरहल्या चन्नम्मा रुद्रमाम्बा सु वक्रमा ।
नवे दता सारदा च प्रणम्याः मातृदेवताः ॥ अगस्त्यः कम्बुकौ ण्डन्यौ राजेन्द्रश्चोलवंशजः । अशोकः पुष्य मत्रश्च
खारवेलः सुनी तमान् ॥ रामकृष्णो दयानन्दो रवीन्द्रो राममोहनः । रामतीथ ऽर वन्दश्च ववेकानन्द उद्यशाः ॥
यह स्तोत्र नाम क माला है। हर नाम भारत के कसी धीर, वीर या वीरांगना का है। पहले दो ोक मातृदेवताओं के ह, अगले दो
महापुरुष के।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
ोकः १–२ का अन्वयाथः — अरुन्धती, अनसूया, सा वत्री, जानक (सीता), सती, द्रौपद , कण्णगी, गाग , मीरा तथा दुगावती;
(और) लक्ष्मी (लक्ष्मीबाई), अहल्या (अहल्याबाई), चन्नम्मा, सु वक्रमा (महापराक्रमी) रुद्रमाम्बा, नवे दता और सारदा — ये (सब)
प्रणाम करने योग्य मातृदे वयाँ ह।
नाम कः / का
अरुन्धती, अनसूया, सािवत्री, जानकी, सती -
प ुराण रामायण की पितवता एवं तेजि स् वनी नािरयाँ
द ौपदी, गाग महाभारत की महारानी ; उ पिनषद् की बह्मवािद नी िवद ुषी
कण्णगी तिमल महाका य व् ‘ प्
िशल पिद कारम् ’ की नाियका, न्याय के िल ए खड़ी होने वाल ी नारी
मीरा ष् - क्
कृ ण भ त कविय त्र ी
दुग वती, लक्ष्म ीबाई, अहल्या, चन्नम्मा, रुद माम्बा गोंड वाना , झाँस ी, इन्द ौर , िक त्त ूर और काकतीय राज्यों की वीर शािसकाएँ
िनवेिदता, सारदा भिगनी िनवेिद ता तथा ी सारद ा दे वी
ोकः ३ का अन्वयाथः — अगस्त्य, कम्बु और कौ ण्डन्य (दोन ), चोलवंश म उत्पन्न राजेन्द्र, अशोक, पुष्य मत्र, तथा सुनी तमान्
(उत्तम नी त वाला) खारवेल — (ये स्मरणीय ह)।
ोकः ४ का अन्वयाथः — रामकृष्ण, दयानन्द, रवीन्द्र, राममोहन, रामतीथ, अर वन्द तथा उज्ज्वल यश वाले (उद्यशाः) ववेकानन्द
— (ये भी स्मरणीय ह)।
भावः: स्तोत्र का मूल भाव है — भारत क महानता कसी एक युग, एक प्रान्त या एक लङ्ग क नह है। इसम उत्तर
क गाग के साथ द क्षण क कण्णगी ह, प्राचीन अशोक के साथ आधु नक ववेकानन्द, और भारतीय सारदा दे वी के
साथ वदे श से आईं भ गनी नवे दता। पाठ का गीत जो ‘वयम्’ कहता है, यह स्तोत्र उसी ‘वयम्’ क सूची बना दे ता
है।
व्याकरण-संकेतः: ‘अरुन्धत्यनसूया’ = अरुन्धती + अनसूया (यण् स न्धः — ई + अ = य्) । ‘राजेन्द्रश्चोलवंशजः’ =
राजेन्द्रः + चोलवंशजः तथा ‘पुष्य मत्रश्च’ = पुष्य मत्रः + च ( वसगस न्धः — ◌ः + च = श्च) । ‘रामतीथ ऽर वन्दश्च’ =
रामतीथः + अर वन्दः + च (पूवरूपस न्धः — ओ + अ = ओऽ) । ‘प्रणम्याः’ इ त कृत्य-प्रत्ययान्तं वशेषणम्, प्रथमा
बहुवचनम् — प्रणाम करने योग्य ।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
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प रयोजनाकायम्
प्र.1 अधः प्रदत्तेषु महापुरुषेषु एकस्य लघुजीवनवृत्तं लखन्तु — स्वामी ववेकानन्दः / शवा जः / राणाप्रतापः
यह आपका अपना लेखन-काय है। तीन म से एक चु नए और लगभग आठ–दस सरल संस्कृत वाक्य ल खए।
अच्छे उत्तर म ये बात होनी चा हए —
जन्म: कदा, कुत्र (जन्मः … नगरे अभवत्)
माता पतरौ: तस्य पतुः नाम … मातुः नाम …
बाल्यम् / शक्षा: सः बाल्ये एव …
प्रमुखं कायम्: सः … अकरोत् / अस्थापयत्
गुणाः: सः शूरः धीरः जनसेवकः च आसीत् (पाठ के शब्द यहाँ काम आएँगे)
अ न्तम पं क्त: वयं तस्मात् … शक्षां लभामहे
नमूना उत्तर (स्वामी ववेकानन्दः) —
स्वामी िववेक ानन्दः भारतस्य महान् सन्तः आसीत् ।
तस्य बाल्यकाले नाम नरेन्द नाथः आसीत् ।
तस्य जन्म कोलकातानगरे अभवत् ।
सः रामकृ ष्णपरमहंसस्य िशष्यः आसीत् ।
सः अमेिरकादे शे िशकागोनगरे भारतीयसंस्कृ ते ः िवषये भाषणम् अकरोत् ।
तत्र सः ‘भिगन्यः भ ातरः च’ इित सम्बोध्य सव न् जनान् आकिषतवान् ।
सः रामकृ ष्णिमशनम् अस्थापयत् ।
सः युवकानां पेरणा ोतः आसीत् ।
सः ऊजस्वलः वचस्वलः दृ ढमानसः च आसीत् ।
वयं तस्मात् िनभयतां सेवाभावं च िशक्षामहे ।
( हन्द : स्वामी ववेकानन्द भारत के महान सन्त थे। बचपन म उनका नाम नरेन्द्रनाथ था। उनका जन्म कोलकाता नगर म हुआ। वे
रामकृष्ण परमहंस के शष्य थे। उन्ह ने अमे रका के शकागो नगर म भारतीय संस्कृ त पर भाषण दया। वहाँ उन्ह ने ‘बहनो और
भाइयो’ कहकर सब लोग को मोह लया। उन्ह ने रामकृष्ण मशन क स्थापना क । वे युवाओं के प्रेरणा ोत थे। वे ऊजावान, तेजस्वी
और दृढ़ मन वाले थे। हम उनसे नभयता और सेवाभाव सीखते ह।)
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम् AglaSem · NCERT Solutions
Tip: जीवनवृत्त भूतकाल म लखा जाता है, इस लए लङ् -लकार के रूप याद र खए — आसीत् (था), अभवत्
(हुआ), अकरोत् ( कया), अगच्छत् (गया), अ लखत् ( लखा), अस्थापयत् (स्था पत कया)। य द शवाजी पर लख
तो — ‘ शवा जः महाराजः शूरः योद्धा आसीत् । तस्य माता जीजाबाई आसीत् । सः स्वराज्यम् अस्थापयत् ।’
प्र.2 अ स्मन् पाठे प्रयुक्तानां प्रथमा वभक्तेः बहुवचनान्त-पदानां सङ् ग्रहणं कुवन्तु । दशशब्दानां वाक्ये प्रयोगम् अ प
कुवन्तु ।
पहले संग्रह, फर वाक्य-प्रयोग। पाठ म प्रथमा वभ क्त बहुवचन के पद बहुत ह — नीचे मुख्य सूची है।
ोकः / स्थानम् प्रथमा-बहुवचनान्त-पदा न
िचत्रपाठः (प.ृ 77) भारतीयाः , शूर ाः, वीराः, छात्र ाः
श्लोकः १ , धीराः, वीराः, ग ुणशािल नः, बल शािल नः, जयगािमनः
शूर ाः
श्लोकः २ दृ ढमानसाः , गतल ाल साः, िपयसाहसाः, जनसे वकाः, अितभाव ुकाः, श ुभिचन्तकाः
श्लोकः ३ ऊज स् वल ाः, वचस्वल ाः, अितिनश्चल ाः
श्लोकः ४ गतभीतयः , ध ृतनीतयः, दृ ढशक्तयः, िनिखल ाः, िवजयािथनः, बाल ाः
अभ्यासे मिहल ाः , दे वाः, ग ृिहण् यः, फ ल ािन
दश शब्दानां वाक्यप्रयोगः (नमूना उत्तर) —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 शूराः वयं धीराः वयम्
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पदम् वाक्यम् हन्द
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शूर ाः
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न् भारतीय सै नक शूर ह।
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भारतीयाः सै िनकाः शूर ाः सि त ।
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हम संकट म भी धीरज रखते ह।
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धीराः वयं संक टे अिप धीराः भवामः ।
बालाः क्र क्षत्र क्र न् बालक खेल के मैदान म खेलते ह।
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बाल ाः ीडा े े ीडि त ।
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छात्राः छात्र सुबह प्राथना करते ह।
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छा ाः पातःकाले पाथनां कु वि त ।
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जनसे वकाः त्
िचिक सकाः स याः जनसे वकाः सि त । त्
a च कत्सक स े जनसेवक ह।
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शुभिचन्तकाः गुरु सदा शष्य का भला चाहने वाले होते ह।
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ग ुरवः सवद ा िश याणां श ुभिच तकाः भवि त ।
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गतभीतयः वीर सै नक भयर हत ह।
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वीराः सै िनकाः गतभीतयः सि त ।
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दृ ढशक्तयः भ् क् योगाभ्यास से हम श क्तमान् होते ह।
aglिवजयािथनः
योगा यासे न वयं दृ ढश तयः भवामः ।
क्र ीडकाः िवजयािथनः क्र ीडाङ्गणं ग छि त । च् न् खलाड़ी वजय चाहते हुए मैदान म जाते ह।
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िनिखलाः त्र स् न् सभी छात्र गीत स्वर के साथ गाते ह।
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िनिखल ाः छा ाः गीतं स वरं गायि त ।
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वाक्य बनाते समय एक नयम मत भू लए: कता बहुवचन है तो क्रया भी बहुवचन होगी — ‘बालाः क्र ड न्त’ (न
क ‘क्र ड त’), ‘छात्राः कुव न्त’, ‘वयं भवामः’। वशेषण भी कता के लङ्ग-वचन- वभ क्त से मलेगा — ‘वीराः
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सै नकाः गतभीतयः स न्त’ म तीन पद प्रथमा बहुवचन म ह।
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a gl प्र.3 अन्यत् संस्कृतदे शभ क्तगीतम् अ न्वष्य तस्य सामू हकं वाचनं कुवन्तु ।
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यह सामू हक काय है — पहले खो जए, फर कक्षा म मलकर गाइए।
कैसे कर —
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1. वद्यालय के पुस्तकालय से संस्कृत गीत-संग्रह ली जए, या अपने संस्कृत- शक्षक से पू छए।
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2. गीत क प्र त सबके लए ल खए/छा पए, और क ठन शब्द के अथ कनारे लख ली जए।
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भीgचलगी।
4..cप्राथना-सभा म सामू हक वाचन क जए। ताल के लए मृदङ्ग या केवल ता लयाँ a
3. पहले शक्षक एक पं क्त गाएँ, फर पूरी कक्षा दोहराए — इसी तरह गीत कण्ठस्थ क जए।
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agl कौन-से गीत चुन सकते ह (सुझाव) —
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वन्दे मातरम् — बं कमचन्द्र च ोपाध्याय ारा र चत; इसका आर म्भक भाग शुद्ध संस्कृत म है।
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वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरो हताः — वै दक वाक्य पर आधा रत राष्ट्र-प्राथना।
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पाठ्यपुस्तक ‘द पकम्’ तथा अन्य कक्षाओं क संस्कृत पुस्तक म दए दे शभ क्त-गीत।
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नमूना (वन्दे मातरम् — प्रथमः भागः) — a
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वन्दे मातरम् ।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् ॥
शुभ ज्योत्स्नापुलिकतयािमनीम्
फु ल्लकु सुिमतद मदलशोिभनीम्
सुहािसनी ं सुमधुरभािषणीम्
सुखदां वरदां मातरम् ॥
( हन्द भाव: हे माता, म तुम्ह प्रणाम करता ँ — तुम सुन्दर जल वाली, उत्तम फल दे ने वाली, मलय-पवन से शीतल और फ़सल से
हरी-भरी हो। तुम्हारी रात चाँदनी से पुल कत ह, वृक्ष खले फूल से शो भत ह; तुम सुन्दर हँसी वाली, मधुर बोलने वाली, सुख और वर
दे ने वाली माता हो।)
सामू हक वाचन का लाभ: पाठ का आचाय यही कहता है — ‘एतत् एव सस्वरं म लत्वा गायामः’। मलकर गाने से
उ ारण सुधरता है, लय पकड़ म आती है, और गीत का ‘वयम्’ वाला भाव सचमुच अनुभव होता है — क्य क तब
सचमुच ‘वयम्’ गा रहे होते ह, ‘अहम्’ नह ।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का नाम ही उसका मुख्य वाक्य है — ‘शूराः वयं धीराः वयम्’ = ‘हम शूर ह, हम धीर ह’। पूरा गीत उत्तमपुरुष बहुवचन
म है — वयम् (हम), स्मः (ह), यामः (जाते ह), कुमः (करते ह) — इस लए यह पाठ मलकर, सामू हक स्वर म गाने के लए
बना है।
गीत म पाँच ोक ह और हर ोक के बाद टे क है — ‘शूरा वयम्॥’। ोक १ गुण गनाता है, ोक २ स्वभाव, ोक ३
बताता है क हृदय म क्या नह है, ोक ४ संकल्प है और ोक ५ ईश्वर से प्राथना।
गीत म वसग बार-बार लुप्त दखता है — ‘शूराः’ का ‘शूरा’, ‘ न खलाः’ का ‘ न खला’, ‘गतभीतयः’ का ‘गतभीतयो’। यह
छन्द और गायन के कारण होता है; व्याकरण क दृ से सब प्रथमा वभ क्त बहुवचन ही ह।
अवधेयांशः दो नई बात सखाता है — नामपद का मूलरूप प्रा तप दकम् कहलाता है (‘रामः’ का प्रा तप दक ‘राम’), और
तद्, एतद्, अस्मद्, युष्मद् के प्रथमा-रूप। अस्मद् और युष्मद् के रूप तीन लङ्ग म एक जैसे रहते ह — अहम्/आवाम्/वयम्
और त्वम्/युवाम्/यूयम्।
अभ्यास का आधा भाग वचन-प रवतन का है — प्रश्न ३ बहुवचन से एकवचन बनवाता है, प्रश्न ५ एकवचन से बहुवचन,
और प्रश्न ६ कता को उसक सही क्रया से जोड़ना सखाता है (छात्रः पठ त, छात्रौ पठतः, छात्राः पठ न्त)।
योग्यता वस्तर गीत को इ तहास से जोड़ दे ता है — नौ महापुरुष के चत्र (शङ् कराचाय से अब्दुल कलाम तक) और एक
मातृदेवता-स्तोत्र जसम अरुन्धती, गाग , मीरा, दुगावती, लक्ष्मीबाई, चन्नम्मा, रुद्रमाम्बा, नवे दता जैसे नाम गनाए गए ह।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृते) हन्द गीते प्रयोगः
शूराः वीराः पराक्रमी शूरा वयं धीरा वयम्
नतराम् / सुतराम् अत्यिधकम् अत्य धक रूप से वीरा वयं सुतराम्
गतलालसाः लोभरिहताः लालच र हत दृढमानसा गतलालसाः
प्रयसाहसाः साहसयुक्ताः साहसी प्रयसाहसाः सततम्
नयतम् िनिश्चतम् न श्चत रूप से शुभ चन्तका नयतम्
ऊजस्वलाः स्फू ितयुक्ताः फुत ले ऊजस्वला वचस्वला
वचस्वलाः तेजोयुक्ताः तेजस्वी ऊजस्वला वचस्वला
अ त नश्चलाः अिवचिलताः दृढ़ नणय वाले अ त नश्चला वजये
गतभीतयः भीितरिहताः भयर हत गतभीतयो धृतनीतयो
धृतनीतयः नीितम् आचरन्तः नी तमान् गतभीतयो धृतनीतयो
न खलाः समग ाः सम्पूण, सब दृढशक्तयो न खला
समराङ्गणम् युद्धक्षेत्र म् युद्ध का मैदान यामो वयं समराङ्गणं
वजया थनः िवजयम् इच्छन्तः वजय चाहने वाले वजया थनो बालाः
नः / दे ह अस्मान् / यच्छ हम / द जए नो दे ह परमात्मन्
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