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NCERT Solutions Class 6 Sanskrit Chapter 8 सः एव महान् चित्रकारः

AglaSem पर कक्षा 6 संस्कृत पाठ 8 सः एव महान् चित्रकारः (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 6 Sanskrit Chapter 8 (Deepakam).
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NCERT Solutions Class 6 Sanskrit Chapter 8 सः एव महान् चित्रकारः – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा6

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 8: सः एव महान् चत्रकारः

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

89 – 97 9 30 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 26 pages

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: सः एव महान् चत्रकारः
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के अष्टमः पाठः — सः एव महान् चत्रकारः के सम्पूण हल। यह पाठ एक संवाद-पाठ है —
शक्षक और श्रद्धा, मेधा, मनीषा, म ुल तथा आ दत्य नामक छात्र प्रकृ त म घूमते हुए वण (रंग ) के नाम संस्कृत म सीखते ह, और अन्त म सब एक
स्वर म कहते ह क इन सब रंग को भरने वाला महान् चत्रकार परमेश्वर ही है। पाठ का आरम्भ राष्ट्रप त भवन के अमृत-उद्यान के चत्र से होता है। पृष्ठ
89 से 97 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — पाठ-प्रवेश और पूरे संवाद का हन्द अनुवाद, वयं शब्दाथान् जानीमः क पूरी शब्द-ता लका, वयम्
अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–६ (सभी उपभाग (क)–(च) स हत, रंग- मलान, राष्ट्रध्वज और रेखा चत्र-भरण स हत), योग्यता वस्तरः का पद्य ‘सायङ् काले
त्वम्बरकोणे’ (अन्वय, अथ और भाव के साथ), अमरकोशे वणानां वग करणम् (धीवगः) के पाँच ोक तथा प रयोजनाकायम् के दोन काय।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 6) 89 – 97

खं ड प्रश्न

9 30

माध्यम

हन्द

अष्टमः पाठः — सः एव महान् चत्रकारः (पाठ-प्रवेशः) — पृष्ठ 89
उद्यानस्य चत्रम् — अमृत-उद्यानस्य प रचयः

पाठ-प्रवे शः

प्र.1 उद्यानस्य चत्रम् उप र प्रद शतम् । एतत् राष्ट्रप तभवनस्य प रसरे वद्यमानम् अमृत-उद्यानम् अ स्त । अत्र
शता धक-प्रकारका ण पाटलपुष्पा ण स न्त । सामान्यतः पञ्चसह ा धका न ऋतुपुष्पा ण च स न्त । रमणीयः
नसगः व वधैः वणः सवषां चत्तम् आकष त । अ स्मन् पाठे तादृशानां वणानां प रचयं प्रा ुमः । — अस्य
अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

पाठ के आरम्भ म दल्ली के अमृत-उद्यान का चत्र है और नीचे उसका संस्कृत प रचय। वाक्य-दर-वाक्य अनुवाद इस प्रकार है —

संस्कृतम् हन्द अनुवादः

उ द्य ानस्य िचत्रम् उपिर पदिशतम् । उ द्य ान का िचत्र ऊपर िदखाया गया है।

एतत् रा पितभवनस्य पिरसरे िवद्य मानम् अम ृत-उ द्य ानम् अिस्त । यह रा पित भवन के पिरसर में िस्थत अम ृत-उ द्य ान है।

अत्र शतािधक -पकारकािण पाटलपुष्पािण सिन्त । यहाँ सौ से भी अिधक पकार के गुल ाब के फू ल है।
ं

सामान्यतः पञ्चसह ािधकािन ऋतुपष्ु पािण च सिन्त । और साधारणतः पाँच हज़ ार से अिधक ऋतु-पुष्प (मौसमी फू ल ) है।
ं

रमणीयः िनसगः िविवधै ः वणः सवषां िचत्त म् आकषित । सुन्दर पकृ ित अपने अनेक रंगों से सबके मन को आकिषत करती है।

अिस्मन् पाठे तादृ शानां वण नां पिरचयं पाप्नमु ः । इस पाठ में हम वैसे ही रंगों का पिरचय पाप्त करते है।
ं

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान द जए — यहाँ ‘वणः’ का अथ अक्षर नह है: संस्कृत म वण शब्द के दो अथ ह — (१) अक्षर (अ, आ, क,
ख …) और (२) रंग। इस पूरे पाठ म हर जगह ‘वण’ का अथ रंग ही है। ‘ व वधैः वणः’ = अनेक रंग से।

व्याकरण-संकेतः: ‘ व वधैः वणः’ इ त तृतीया वभ क्तः बहुवचनम् (करण-अथ — ‘रंग के ारा’) । ‘सवषाम्’
इ त षष्ठी बहुवचनम् । ‘शता धक-प्रकारका ण’ = शतात् अ धका न प्रकारका ण, ‘पञ्चसह ा धका न’ =
पञ्चसह ात् अ धका न — े अ प नपुंसक लङ्गे प्रथमा बहुवचनम्, यतः ‘पुष्पा ण’ नपुंसक लङ्गम् ।

प्र.2 अमृत-उद्यानं कुत्र वद्यते ? तत्र क दृशा न पुष्पा ण स न्त ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 89)

दोन उत्तर पहले ही अनुच्छेद म ह।
संस्कृतेन उत्तरम् — अमृत-उद्यानं राष्ट्रप तभवनस्य प रसरे वद्यते । ( हन्द : अमृत-उद्यान राष्ट्रप त भवन के प रसर म है।)
संस्कृतेन उत्तरम् — तत्र शता धक-प्रकारका ण पाटलपुष्पा ण पञ्चसह ा धका न ऋतुपुष्पा ण च स न्त । ( हन्द : वहाँ सौ
से अ धक प्रकार के गुलाब और पाँच हज़ार से अ धक ऋतु-पुष्प ह।)

Did you know? यह उद्यान पहले ‘मुगल गाडन’ नाम से जाना जाता था; सन् 2023 म इसका नाम बदलकर
अमृत उद्यान कर दया गया। हर वष वसन्त ऋतु म यह कुछ सप्ताह के लए आम जनता के लए खोला जाता है —
तभी इसके सैकड़ रंग के गुलाब दे खे जा सकते ह। ‘पाटलपुष्पम्’ का अथ है गुलाब का फूल।

पाठः — शक्षकस्य छात्राणां च संवादः (प्रथमः भागः) — पृष्ठ 90
नसग वणानाम् अवलोकनम् — ह रतः, कृष्णः, रक्तः

पाठः

प्र.1 शक्षकः – वयम् अत्र क क पश्यामः ? श्र ा – सवत्र व वधा न पुष्पा ण, ह रता न पणा न, खगाः, जन्तवः च
स न्त इ त पश्यामः । शक्षकः – सत्यम् । एवमेव तेषां वणाः अ प व वधाः । यथा श्र ा वद त ‘ह रता न पणा न’
इ त, अत्र पणस्य कः वणः ? छात्राः – (सव) ह रतः । श्र ा – अत्र वृक्षस्य उप र शुकः अ स्त । सः अ प ह रतवणन
शोभते । शक्षकः – श्र े ! भवत्याः इष्टवणः ह रतः इ त चन्तया म । अत एव ह रतवणम् एव पश्य त खलु । मेधा –
आचाय ! अत्र काकः अ प अ स्त, यस्य वणः कृष्णः । एवं पकस्य अ प वणः कृष्णः । शक्षकः – आम् । उत्तमं
नरीक्षणं भवत्याः । छात्राः ! पश्यन्तु, अत्र पुष्पा ण अ प स न्त । मनीषे ! पश्यतु जपापुष्पम् । वदतु, अस्य वणः कः
? मनीषा – रक्तवणः आचाय ! शुकस्य चञ्चुः अ प रक्तवणा । पाटलपुष्पम् अ प रक्तवणन युक्तम् । शक्षकः –
शोभनम् । चत्रवणाः शुकाः अ प अत्र स न्त इ त जान न्त कम् ? आ दत्यः – आचाय ! ते क दृशाः भव न्त ? वयं
द्रष्टु म् इच्छामः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

यह कक्षा प्रकृ त के बीच लगी है। शक्षक कोई रंग बताते नह — वे पूछते ह, और छात्र स्वयं दे खकर रंग खोजते ह।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

कः संस्कृतम् हन्द अनुवादः
वद त

िशक्षकः वयम् अत्र क क पश्यामः ? हम यहाँ क्या-क्या दे खते है ं ?

श्र ा सवत्र व वधा न पुष्पा ण, ह रता न पणा न, खगाः, जन्तवः हम दे खते है ं िक सब जगह तरह-तरह के फू ल , हरे पत्ते , पक्षी
च स न्त इ त पश्यामः । और पाणी है। ं

िशक्षकः सत्यम् । एवमेव तेषां वणाः अ प व वधाः । यथा श्र ा सच है। इसी तरह उनके रंग भी अलग-अलग है। ं जैसे श्र ा
वद त ‘ह रता न पणा न’ इ त, अत्र पणस्य कः वणः ? कहती है ‘हरे पत्ते ’ — तो यहाँ पत्ते का रंग कौन-सा है ?

छात्राः (सव) ह रतः । (सब) हरा।

श्र ा अत्र वृक्षस्य उप र शुकः अ स्त । सः अ प ह रतवणन यहाँ पेड़ के ऊपर तोता है। वह भी हरे रंग से शोभा पाता है।
शोभते ।

िशक्षकः श्र े ! भवत्याः इष्टवणः ह रतः इ त चन्तया म । अत एव श्र ा ! मैं सोचता हू ँ िक तुम्हारा िपय रंग हरा है। इसीिलए तो
ह रतवणम् एव पश्य त खलु । तुम्हे ं हरा रंग ही िदखाई दे ता है।

मेध ा आचाय ! अत्र काकः अ प अ स्त, यस्य वणः कृष्णः । एवं आचाय ! यहाँ कौआ भी है, िजसका रंग काला है। इसी तरह
पकस्य अ प वणः कृष्णः । कोयल का रंग भी काला है।

िशक्षकः आम् । उत्तमं नरीक्षणं भवत्याः । छात्राः ! पश्यन्तु, अत्र हाँ। तुम्हारा िनरीक्षण बहुत अच्छा है। छात्रो ! दे खो, यहाँ फू ल
पुष्पा ण अ प स न्त । मनीषे ! पश्यतु जपापुष्पम् । वदतु, भी है।
ं मनीषा ! गुड़हल के फू ल को दे खो। बताओ, इसका
अस्य वणः कः ? रंग कौन-सा है ?

मनीषा रक्तवणः आचाय ! शुकस्य चञ्चुः अ प रक्तवणा । लाल रंग, आचाय ! तोते की चोंच भी लाल रंग की है। गुल ाब
पाटलपुष्पम् अ प रक्तवणन युक्तम् । का फू ल भी लाल रंग से युक्त है।

िशक्षकः शोभनम् । चत्रवणाः शुकाः अ प अत्र स न्त इ त जान न्त बहतु अच्छे । क्या तुम जानते हो िक रंग-िबरंगे तोते भी होते है ं
कम् ? ?

आिदत्यः आचाय ! ते क दृशाः भव न्त ? वयं द्रष्टु म् इच्छामः । आचाय ! वे कै से होते है ं ? हम उ न्हे ं दे खना चाहते है।
ं

शक्षक क एक सुन्दर बात: जब श्रद्धा दो बार हरा रंग बताती है, तो शक्षक डाँटते नह — मुस्कराकर कहते ह,
‘भवत्याः इष्टवणः ह रतः इ त चन्तया म’ (लगता है तुम्हारा प्रय रंग हरा है)। इससे कक्षा म हँसी भी आती है और यह
बात भी बन जाती है क हर व्य क्त को अपना प्रय रंग सबसे पहले दखता है।

व्याकरण-संकेतः: ‘ह रतवणन शोभते’, ‘रक्तवणन युक्तम्’ — अत्र तृतीया वभ क्तः (‘…से शो भत होना’, ‘…से
युक्त होना’) । ‘श्रद्धे !’, ‘मनीषे !’ इ त आकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दस्य सम्बोधन-एकवचनम् (श्रद्धा → हे श्रद्धे !) ।
‘पश्यन्तु, पश्यतु, वदतु’ इ त लोट् -लकारः — आदराथ प्रयुज्यते । ‘द्रष्टु म्’ इ त ‘दृश्’ धातोः तुमुन्-प्रत्ययान्तम्
अव्ययम् (= दे खने के लए) ।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः
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वयम् अत्र क क पश्यामः ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 90)
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a l का पहला प्रश्न है और श्रद्धा इसका उत्तर देती है।
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संस्कृतेन उत्तरम् — वयम् अत्र सवत्र व वधा न पुष्पा ण, ह रता न पणा न, खगाः, जन्तवः च पश्यामः । ( हन्द : हम यहाँ सब

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ओर तरह-तरह के फूल, हरे पत्ते, पक्षी और प्राणी दे खते ह।)

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व्याकरण-संकेतः: ‘ क कम्’ इ त वीप्सायां त्वम् — एकम् एव वस्तु न, अ प तु अनेका न वस्तू न पृच्छ्यन्ते, अतः
पदस्य रु क्तः (= क्या-क्या) । ‘पुष्पा ण, पणा न’ इ त नपुंसक लङ्गे प्रथमा बहुवचनम्; ‘खगाः, जन्तवः’ इ त पुं लङ्गे
प्रथमा बहुवचनम् — अतः क्रया अ प बहुवचने ‘स न्त’ ।
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a s emयथा श्र ा वद त ‘ह रता न पणा न’ इ त, अत्र पणस्य कः वणः ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 90)
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coरंगmहरा है।) agl

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संस्कृतेन उत्तरम् — पणस्य वणः ह रतः । ( हन्द : पत्ते का
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पाठ म सब छात्र एक साथ यही उत्तर दे ते ह — lछात्राः
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– (सव) ह रतः ।

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हरा रंग पत्त म क्य ? पत्त म ह रतद्रव्यम् (क्लोरो फल) होता है, जसक सहायता से पेड़ सूय के प्रकाश से अपना
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भोजन बनाते ह। संस्कृत म यही शब्द ‘ह रत्’ से बना है — इसी लए हरे रंग का नाम ‘ह रतः’ है।
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m This: उसी तरह पाठ से और जोड़े बनाइए — शुकस्य वणः ह रतः, काकस्य वणः कृष्णः, हंसस्य वणः
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agl श्वेतः, जपापुष्पस्य वणः रक्तः। ध्यान र खए क जसका रंग बताना है वह पद षष्ठी वभ क्त म आएगा —

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‘पणस्य’, ‘काकस्य’।

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मनीषे ! पश्यतु जपापुष्पम् । वदतु, अस्य वणः कः ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 90)

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emमनीषा केवल इतना ही नह कहती — वह दो और लाल वस्तुएँ भी बता देती है: शुकस्य चञ्चुः अ प रक्तवणा । पाटलपुष्पम् अ प
संस्कृतेन उत्तरम् — जपापुष्पस्य वणः रक्तः । ( हन्द : गुड़हल के फूल का रंग लाल है।)

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agl रक्तवणन युक्तम् । (तोते क च च भी लाल है; गुलाब का फूल भी लाल रंग वाला है।)
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शब्द-भेद याद र खए: जपापुष्पम् = गुड़हल (Hibiscus) और पाटलपुष्पम् = गुलाब (Rose) — दोन अलग

a s em अकेला शब्द रंग के अथ म गुलाबी (pink) होता है।
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फूल ह, दोन लाल हो सकते ह। ‘पाटलः’

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.5 चत्रवणाः शुकाः अ प अत्र स न्त इ त जान न्त कम् ? ते क दृशाः भव न्त ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 90–91)

शक्षक का प्रश्न पृष्ठ 90 पर है, उत्तर पृष्ठ 91 क पहली पं क्त म।
संस्कृतेन उत्तरम् — आम्, चत्रवणाः शुकाः अ प स न्त । तादृशान् शुकान् वयं प्रायः जन्तुशालायां पश्यामः । तेषां पक्षाः
नीलाः पीताः रक्ताः च भव न्त । ( हन्द : हाँ, रंग- बरंगे तोते भी होते ह। वैसे तोते हम प्रायः च ड़याघर म दे खते ह। उनके पंख नीले,
पीले और लाल होते ह।)

‘ चत्रवणः’ का अथ: ‘ चत्र’ यहाँ तस्वीर नह , व चत्र/अनेक रंग वाला है। पृष्ठ 96 का अमरकोश भी यही बताता है
— ‘ चत्रं कम रकल्माषशबलैताश्च कबुरे’ अथात् चत्रम्, कम रः, कल्माषः, शबलः, कबुरः — ये सब ‘रंग- बरंगा’ के
पयायवाची ह।

व्याकरण-संकेतः: ‘क दृशाः’ इ त प्रश्नवाचकं वशेषणम्, पुं लङ्गे प्रथमा बहुवचनम् (= कैसे) — तस्य उत्तरम् अ प
वशेषणेन एव दे यम्, यथा ‘ चत्रवणाः’, ‘नीलाः पीताः रक्ताः च’ । ‘तादृशान् शुकान्’ इ त तीया बहुवचनम्, यतः
‘पश्यामः’ इ त सकमक क्रयायाः कम एतत् ।

पाठः — शक्षकस्य छात्राणां च संवादः ( तीयः भागः) — पृष्ठ 91
श्वेतवणः, इन्द्रधनुः तथा ‘सः एव महान् चत्रकारः’

पाठः

प्र.1 शक्षकः – तादृशान् शुकान् वयं प्रायः जन्तुशालायां पश्यामः । तेषां पक्षाः नीलाः पीताः रक्ताः च भव न्त । म ुलः
– आचाय ! पाटलपुष्पा ण अ प व वधवणयुक्ता न भव न्त । मम उद्याने पीतवणा न, श्वेतवणा न,
नीललो हतवणा न, केसरवणा न च पाटलपुष्पा ण स न्त । शक्षकः – उत्तमम् । पश्यन्तु, हंसः श्वेतः । तथा अन्ये के
श्वेतवणाः ? मेधा – आचाय ! बकः शशः च । तथा भवतः प्रावारकम् अ प श्वेतम् । शक्षकः – आम् । सम्यक् । सव
स्वस्य अन्येषां च वस्त्राणां वणान् अवलोकयन्तु । म ुलः – आचाय ! इन्द्रधनुः तु बहुवणमयं खलु । तत्र सप्त
वणाः भव न्त । शक्षकः – आम् । सवः अ प नसगः बहुवणमयः । तेन संसारः सुन्दरः । वणः एव अस्माकं जीवनम्
अ प मनोरमं भव त । तत्र ‘वणयोजकः चत्रकारः कः’ इ त जान न्त कम् ? सव – (उ ैः) परमेश्वरः, परमेश्वरः ।
शक्षकः – आम् । सः एव महान् चत्रकारः । — अस्य संवादस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

संवाद का यह दूसरा भाग सफ़ेद रंग से शुरू होकर इन्द्रधनुष तक पहुँचता है और पाठ के शीषक-वाक्य पर समाप्त होता है।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

कः संस्कृतम् हन्द अनुवादः
वद त

िशक्षकः तादृशान् शुकान् वयं प्रायः जन्तुशालायां पश्यामः । तेषां पक्षाः वैसे तोते हम पायः िचिड़ याघर में दे खते है।
ं उनके पंख नीले ,
नीलाः पीताः रक्ताः च भव न्त । पीले और लाल होते है। ं

मञ्जुल ः आचाय ! पाटलपुष्पा ण अ प व वधवणयुक्ता न भव न्त । आचाय ! गुल ाब के फू ल भी अनेक रंगों वाले होते है। ं मेरे
मम उद्याने पीतवणा न, श्वेतवणा न, नीललो हतवणा न, बगीचे में पीले , सफ़े द , जामुनी और के सिरया रंग के गुल ाब
केसरवणा न च पाटलपुष्पा ण स न्त । है।
ं

िशक्षकः उत्तमम् । पश्यन्तु, हंसः श्वेतः । तथा अन्ये के श्वेतवणाः ? बहतु अच्छा। दे खो, हंस सफ़े द है। और कौन-कौन सफ़े द
रंग के है ं ?

मेध ा आचाय ! बकः शशः च । तथा भवतः प्रावारकम् अ प श्वेतम् । आचाय ! बगुल ा और खरगोश। और आपका कोट भी
सफ़े द है।

िशक्षकः आम् । सम्यक् । सव स्वस्य अन्येषां च वस्त्राणां वणान् हाँ, ठीक है। सब लोग अपने और दू स रों के कपड़ ों के रंग
अवलोकयन्तु । दे खो।

मञ्जुल ः आचाय ! इन्द्रधनुः तु बहुवणमयं खलु । तत्र सप्त वणाः आचाय ! इन्द धनुष तो बहुत रंगों वाला होता ही है। उसमें
भव न्त । सात रंग होते है।
ं

िशक्षकः आम् । सवः अ प नसगः बहुवणमयः । तेन संसारः सुन्दरः । हाँ। सारी पकृ ित ही अनेक रंगों वाली है। उसी से संस ार
वणः एव अस्माकं जीवनम् अ प मनोरमं भव त । तत्र सुन्दर है। रंगों से ही हमारा जीवन भी मनोहर होता है। तो
‘वणयोजकः चत्रकारः कः’ इ त जान न्त कम् ? क्या तुम जानते हो िक ‘रंग भरने वाला िचत्रकार कौन है’ ?

सव (उ ैः) परमेश्वरः, परमेश्वरः । (ऊँचे स्वर में) परमेश्वर , परमेश्वर !

िशक्षकः आम् । सः एव महान् चत्रकारः । हाँ। वही महान् िचत्रकार है।

पाठ का शीषक अ न्तम वाक्य से आया है: पूरा संवाद रंग गनाता जाता है — हरा, काला, लाल, सफ़ेद, पीला,
जामुनी, केस रया — और अन्त म एक ही प्रश्न बचता है: ‘वणयोजकः चत्रकारः कः ?’ उत्तर है ‘परमेश्वरः’, और वही
वाक्य पाठ का नाम बन गया — सः एव महान् चत्रकारः।

व्याकरण-संकेतः: ‘भवतः प्रावारकम्’ इ त षष्ठी एकवचनम् (भवत् → भवतः = आपका) — आदराथ ‘तव’ इ त न
प्रयुक्तम् । ‘इन्द्रधनुः’ इ त उकारान्तं नपुंसक लङ्गम्, अतः वशेषणम् अ प ‘बहुवणमयम्’ । ‘वणः एव’ इ त तृतीया
बहुवचनम् (करणे) । ‘उ ैः’ इ त अव्ययम् (= ऊँचे स्वर म) ।

प्र.2 पश्यन्तु, हंसः श्वेतः । तथा अन्ये के श्वेतवणाः ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 91)

संस्कृतेन उत्तरम् — हंसात् अन्ये बकः शशः च श्वेतवण स्तः । तथा आचायस्य प्रावारकम् अ प श्वेतम् अ स्त । ( हन्द : हंस के
अ त रक्त बगुला और खरगोश सफ़ेद रंग के ह। और आचाय का कोट भी सफ़ेद है।)

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

पाठ म मेधा का उत्तर संक्षेप म है — ‘आचाय ! बकः शशः च । तथा भवतः प्रावारकम् अ प श्वेतम् ।’

संस्कृतम् हन्द

हंस ः हंस

बकः बगुल ा

शशः खरगोश

पावारकम् कोट (ऊपर पहनने का वस्त्र)

और भी श्वेत वस्तुए ँ (अभ्यास के लए): क्षीरं श्वेतम् (दूध), दन्ताः श्वेताः (दाँत), मेघः कदा चत् श्वेतः, म ल्लका श्वेता
(चमेली), चम्पकः श्वेतः। ध्यान द जए — दो के लए वचन (श्वेतौ स्तः) और अ धक के लए बहुवचन (श्वेताः स न्त)
प्रयुक्त होगा।

प्र.3 इन्द्रधनु ष क त वणाः भव न्त ? के के ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 91)

संस्कृतेन उत्तरम् — इन्द्रधनु ष सप्त वणाः भव न्त । ( हन्द : इन्द्रधनुष म सात रंग होते ह।) — पाठ म म ुल यही कहता है:
‘इन्द्रधनुः तु बहुवणमयं खलु । तत्र सप्त वणाः भव न्त ।’
सात रंग संस्कृत म इस प्रकार ह —

क्रमः संस्कृतम् हन्द

१ र क्तः लाल

२ नारङ् गः / के सरः नारंगी

३ पीतः पीला

४ हिरतः हरा

५ नीलः नीला

६ गाढनीलः गहरा नीला (आसमानी)

७ नीललोिहतः जामुनी, बगनी

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

इन्द्रधनुष क्य बनता है ? वषा के बाद हवा म लटक जल क सूक्ष्म बूँद सूय के श्वेत प्रकाश को तोड़ दे ती ह, और
वह सात रंग म बँट जाता है। इसी लए पाठ कहता है — ‘सवः अ प नसगः बहुवणमयः’। एक ही सफ़ेद प्रकाश म
सात रंग पहले से छपे रहते ह।

प्र.4 ‘वणयोजकः चत्रकारः कः’ इ त जान न्त कम् ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 91)

यह पाठ का सबसे महत्त्वपूण प्रश्न है — और सब छात्र एक साथ, ऊँचे स्वर म उत्तर दे ते ह।
संस्कृतेन उत्तरम् — वणयोजकः चत्रकारः परमेश्वरः अ स्त । सः एव महान् चत्रकारः । ( हन्द : रंग भरने वाला चत्रकार
परमेश्वर है। वही महान् चत्रकार है।)

भावः: शक्षक सीधे उपदे श नह दे ते। वे पहले पूरी कक्षा से पत्ते, तोता, कौआ, कोयल, गुड़हल, गुलाब, हंस, बगुला,
खरगोश और इन्द्रधनुष के रंग गनवाते ह — और तब पूछते ह क इतने रंग भरे कसने? ब को उत्तर स्वयं मल
जाता है। यही प्रश्न से नष्कष तक ले जाने वाली शक्षण-पद्ध त पाठ क वशेषता है।

व्याकरण-संकेतः: ‘वणयोजकः’ = वणान् योजय त इ त वणयोजकः (ण्वुल्-प्रत्ययः, कतृवाचकः) । ‘सः एव’ इ त
अवधारणाथ ‘एव’ — ‘वही’, कोई दूसरा नह । ‘जान न्त कम्’ इ त प्रश्ने आदराथकं प्रथमपुरुष-बहुवचनम् (= क्या
आप जानते ह ?) ।

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 92
पाठस्य शब्दाः, तेषां संस्कृत-अथः, हन्द तथा English

शब्दाथाः

प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — शब्दः / अथः / हन्द / English ( नसगः, ह रता न, पणा न, जन्तवः, खगाः,
वणमयः, शुकः, इष्टवणः, काकः, पकः, जपापुष्पम्, चञ्चुः, रक्तः, नीलः, पीतः, पक्षाः, जन्तुशालायाम्,
पाटलपुष्पम्, श्वेतम्, नीललो हतम्, केसरम्, पाटलम्, हंसः, बकः, शशः, प्रावारकम्)

पृष्ठ 92 क पूरी शब्दाथ-ता लका नीचे द गई है। यही शब्द अभ्यास के सभी प्रश्न म काम आते ह।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः
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शब्दः अथः (संस्कृते) हन्द ENGLISH

m प्रकृ तः as e
िनसगः
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पकृ ित
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Nature

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g l a ह रतवणा न हरे रंग के Green
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हिरतािन

पण िन पत्रा ण पत्ते Leaves

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e m ाणी
जन्तवः प्रा णनः Animals

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खगाः प क्षणः
a पक्षी Birds

com
वणमयः वणयुक्तः रंगीन Colourful

Parrotem
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शुक ः क रः तोता

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a Favourite Colour
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इष्टवणः प्रयवणः इष्ट रंग, िपय रंग

aglकाकः वायसः कौआ Crow

m कोयल a s
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िपकः को कलः Cuckoo

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g l a गुड़हल Hibiscus
a
जपापुष्पम् जपापुष्पम्

चञ्चुः खगतुण्डः चोंच Beak

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m .
se
रक्तः रक्तवणः लाल Red

नीलः .co
m l a
m ag Blue
ase
नीलवणः नीला

agl पीतः पीतवणः पीला Yellow

se m
com l a
पक्षाः पक्षसमूहः पंख Wings

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m
ase
िचिड़ याघर में In the zoo

agl
जन्तुशालायाम् जन्तुशालायाम्

पाटलपुष्पम् पाटलपुष्पम् गुल ाब Rose

co m
.
श्वेतम् शुक्लवणः / धवलवणः श्वेत / शुक्ल White

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se Purple
m l a
.co ag
नीललोिहतम् नीललो हतम् जामुनी

a s em केसरम्
gl
केसरवणः के सिरया Saffron
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गुल ाबी Pink
s
पाटलम् पाटलवणः

m a
हंस ः मरालः
e m . co हंस Swan
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बकः बकः
a बगुल ा Heron

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शब्दः अथः (संस्कृते) हन्द ENGLISH

शशः शशकः खरगोश Rabbit

पावारकम् प्रावारः कोट Coat

Tip — दो जोड़े जो अक्सर उलझा दे ते ह: जपापुष्पम् (गुड़हल) ≠ पाटलपुष्पम् (गुलाब); और काकः (कौआ) ≠
पकः (कोयल) — दोन काले ह, पर पक क बोली मधुर होती है, इसी लए संस्कृत सा हत्य म वसन्त का दूत
‘ पक’ ही कहलाता है।

प्र.2 मातृभाषया अथ लखन्तु — (ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः)

ता लका का अ न्तम स्तम्भ खाली छोड़ा गया है, ता क हर वद्याथ अपनी मातृभाषा म अथ लख सके। यह कताब म भरने का
काम है — यहाँ केवल व ध और नमूना दया जा रहा है।
कैसे कर —

1. पहले संस्कृत शब्द प ढ़ए, फर उसका हन्द अथ दे खए।
2. अब सो चए क आपके घर म उसी वस्तु को क्या कहते ह — वही शब्द अ न्तम स्तम्भ म ल खए।
3. य द आपक मातृभाषा हन्द ही है, तो अपने क्षेत्र का बोलचाल का शब्द ल खए (जैसे ‘शशः’ के लए खरगोश / ससा)।

नमूना उत्तर (कुछ भाषाओं म) —

संस्कृतम् हन्द मराठ बाङ् ग्ला त मऴ्

शुक ः तोता पोपट ি য়া ( टया) க ள ( क ळ)

काकः कौआ कावळा কাক (काक) காகம் (कागम्)

हंस ः हंस हंस রাজহাঁস (राजहाँस) அன் னம் (अन्नम्)

पाटलपुष्पम् गुल ाब गुलाब গালাপ (गोलाप) ேராஜா (रोजा)

रक्तः लाल लाल / तांबडा লাল (लाल) ச வப் பு ( शवप्पु)

यह स्तम्भ रखा ही क्य गया है ? संस्कृत के अनेक शब्द भारत क सभी भाषाओं म थोड़े-बहुत बदले रूप म
जी वत ह — ‘हंस’ लगभग हर भाषा म ‘हंस’ ही है, ‘गुलाब/गोलाप/रोजा’ म भी समानता दखती है। अपनी भाषा
का शब्द लखते ही वद्याथ को यह पा रवा रक सम्बन्ध स्वयं दखने लगता है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 93

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प्रश्नाः १–३ : एकपदे न, पूणवाक्येन तथा वण-योजनम्

अभ्यासः

प्र.1 पाठस्य आधारेण प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) जपापुष्पस्य वणः कः ? (ख) शुकः केन वणन
शोभते ? (ग) श्र ायाः इष्टवणः कः ? (घ) कः महान् चत्रकारः ? (ङ) आ दत्यः कान् द्रष्टु म् इच्छ त ?

‘एकपदे न’ का अथ है — पूरा वाक्य नह , केवल एक शब्द। हर उत्तर वही वभ क्त लेगा जो प्रश्न माँग रहा है।

प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द वभ क्तः

(क) जपापुष्पस्य वणः कः ? र क्तः लाल प्रथमा, एकवचनम्

(ख) शुक ः के न वणन शोभते ? हिरतवणन हरे रंग से तृतीया, एकवचनम्

(ग) श्र ायाः इष्टवणः कः ? हिरतः हरा प्रथमा, एकवचनम्

(घ) कः महान् िचत्रकारः ? परमेश्वरः परमेश्वर प्रथमा, एकवचनम्

(ङ) आिदत्यः कान् द ष्टुम ् इच्छित ? िचत्रवणशुक ान् (िचत्रवण न् शुक ान्) रंग- बरंगे तोत को तीया, बहुवचनम्

प्रश्न का शब्द ही उत्तर क वभ क्त बता दे ता है: ‘कः ?’ पूछा है तो उत्तर प्रथमा म — ‘रक्तः’। ‘केन ?’ पूछा है तो
उत्तर तृतीया म — ‘ह रतवणन’। ‘कान् ?’ पूछा है तो उत्तर तीया बहुवचन म — ‘शुकान्’। यही संस्कृत म उत्तर
मलाने का सबसे भरोसेमन्द तरीका है।

Check it yourself: (ङ) म ‘शुकम्’ लखना ग़लत होगा — प्रश्न ‘कान्’ (बहुवचन) है, तो उत्तर भी बहुवचन
‘शुकान्’ ही होगा। आ दत्य के अपने शब्द थे — ‘ते क दृशाः भव न्त ? वयं द्रष्टु म् इच्छामः ।’

प्र.2 पाठस्य आधारेण प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखन्तु — (क) आचायस्य प्रावारकस्य वणः कः ? (ख) कुत्र
व वधेषु वणषु पाटलपुष्पा ण स न्त ? (ग) क बहुवणमयम् इ त म ुलस्य अ भप्रायः ? (घ) चत्रवणशुकाः
क दृशाः भव न्त ? (ङ) कस्य कस्य वणः कृष्णः ?

यहाँ पूरा वाक्य चा हए — कता, कम और क्रया तीन के साथ।
(क) — आचायस्य प्रावारकस्य वणः श्वेतः अ स्त । ( हन्द : आचाय के कोट का रंग सफ़ेद है।) — पाठ म मेधा कहती है, ‘तथा
भवतः प्रावारकम् अ प श्वेतम्’।
(ख) — म ुलस्य उद्याने व वधेषु वणषु पाटलपुष्पा ण स न्त । ( हन्द : म ुल के बगीचे म अनेक रंग के गुलाब ह।) — वहाँ
पीतवण, श्वेतवण, नीललो हतवण और केसरवण के गुलाब ह।

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(ग) — इन्द्रधनुः बहुवणमयम् इ त म ुलस्य अ भप्रायः । तत्र सप्त वणाः भव न्त । ( हन्द : म ुल का अ भप्राय है क
इन्द्रधनुष अनेक रंग वाला है। उसम सात रंग होते ह।)
(घ) — चत्रवणशुकाणां पक्षाः नीलाः पीताः रक्ताः च भव न्त । तान् वयं प्रायः जन्तुशालायां पश्यामः । ( हन्द : रंग- बरंगे
तोत के पंख नीले, पीले और लाल होते ह। उन्ह हम प्रायः च ड़याघर म दे खते ह।)
(ङ) — काकस्य पकस्य च वणः कृष्णः अ स्त । ( हन्द : कौए और कोयल का रंग काला है।)

व्याकरण-संकेतः: (ङ) म ‘कस्य कस्य’ इ त वीप्सायां रु क्तः — एकस्मात् अ धकानां वषये पृच्छ्यते, अतः उत्तरे
अ प े नामनी ‘काकस्य पकस्य च’ । (ख) म ‘ व वधेषु वणषु’ इ त सप्तमी बहुवचनम्, ‘उद्याने’ इ त सप्तमी
एकवचनम् (अ धकरणे) ।

प्र.3 उ चतवणन सह शब्दं योजयन्तु — रक्तवणः / नीलवणः / कृष्णवणः / ह रतवणः / केसरवणः / श्वेतवणः /
पाटलवणः / नीललो हतः (पुस्तके वामतः द क्षणतः च अष्ट वण- बन्दवः प्रदत्ताः स न्त)

पुस्तक म बीच म आठ वण-नाम लखे ह और दोन ओर आठ रंगीन धब्बे (blots) बने ह — बाईं ओर चार, दाईं ओर चार। पुस्तक ने
एक जोड़ा उदाहरण के रूप म पहले ही मला दया है — लाल धब्बे से रक्तवणः तक तीर ख चा है। शेष सात इस प्रकार जुड़गे —

चत्रे ानम् वण बन् ः (धब्बे का रंग) योजनीयः शब्दः हन्द

वामतः, पथमः गुलाबी पाटलवणः गुलाबी

वामतः, ि तीयः लाल (पुस्तके उदाहरणम्) र क्तवणः लाल

वामतः, ततृ ीयः हरा हिरतवणः हरा

वामतः, चतुथः बगनी / जामुनी नीललोिहतः जामुनी

दिक्षणतः, पथमः काला कृ ष्णवणः काला

दिक्षणतः, ि तीयः नीला नीलवणः नीला

दिक्षणतः, ततृ ीयः रेखामात्रेण अङ् कतः (भीतर से खाली) श्वेतवणः सफ़ेद

दिक्षणतः, चतुथः पीला-केस रया के सरवणः केस रया

सफ़ेद वाला धब्बा पहचानने क तरक ब: पुस्तक का पन्ना स्वयं सफ़ेद है, इस लए सफ़ेद रंग छापा नह जा सकता।
इसी लए वह धब्बा केवल बाहरी रेखा से बनाया गया है और भीतर से ख़ाली छोड़ा गया है — वही श्वेतवणः है।

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Tip: ‘नीललो हतः’ शब्द को टु कड़ म दे खए — नील (नीला) + लो हत (लाल)। नीले और लाल के मेल से जो रंग
बनता है, वही जामुनी/बगनी है। संस्कृत के रंग-नाम अक्सर इसी तरह अपना अथ स्वयं बता दे ते ह — जैसे
‘श्वेतरक्तः’ = सफ़ेद + लाल = पाटलः (गुलाबी), जो पृष्ठ 96 के अमरकोश- ोक म भी आया है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 94
प्रश्नाः ४–६ : राष्ट्रध्वजः, एकपदे न उत्तरा ण तथा रेखा चत्र-पूरणम्

अभ्यासः

प्र.4 राष्ट्रध्वजस्य समु चतैः वणः अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु रक्त ाना न पूरयन्तु — (क) उप र ............ वणः अ स्त ।
(ख) मध्ये ............ वणः अ स्त । (ग) अधः ............ वणः अ स्त । (घ) ध्वजस्य केन्द्रे ............ वणः अ स्त ।

प्रश्न के साथ पुस्तक म भारत के तरंगे का चत्र दया है। ऊपर से नीचे — केस रया, सफ़ेद, हरा; और बीच म नीला अशोक-चक्र।

वाक्यम् पूण वाक्यम् हन्द

(क) उपिर ______ वणः अिस्त । उपिर के सरः वणः अिस्त । ऊपर केस रया रंग है।

(ख) मध्ये ______ वणः अिस्त । म ध् ये श्वेतः वणः अिस्त । बीच म सफ़ेद रंग है।

(ग) अधः ______ वणः अिस्त । अधः हिरतः वणः अिस्त । नीचे हरा रंग है।

(घ) ध्वजस्य के न्दे ______ वणः अिस्त । ध्वजस्य केन्दे नीलः वणः अिस्त । ध्वज के केन्द्र म नीला रंग है।

तरंगे के रंग का अथ: केसरः त्याग और साहस का, श्वेतः सत्य और शा न्त का, और ह रतः ह रयाली, समृ द्ध तथा
भू म क उवरता का प्रतीक है। बीच का नीला चक्र अशोकचक्रम् कहलाता है, जसम चौबीस आरे (अराः) ह — यह
नरन्तर ग त और धम का चह्न है।

संस्कृतेन वाक्या न (अभ्यासाय): अस्माकं राष्ट्रध्वजः त्रवणः अ स्त । तस्य केन्द्रे नीलवणम् अशोकचक्रम्
अ स्त । त स्मन् चतु वश तः अराः स न्त । (हमारा राष्ट्रध्वज तीन रंग वाला है। उसके केन्द्र म नीले रंग का अशोक-
चक्र है। उसम चौबीस आरे ह।)

प्र.5 प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) केशानां वणः कः ? (ख) आकाशस्य वणः कः ? (ग) कदलीफलस्य
वणः कः ? (घ) तृणस्य वणः कः ? (ङ) म हषस्य वणः कः ? (च) मयूरस्य वणः कः ?

यह प्रश्न पाठ से बाहर, आस-पास क चीज़ पर है। हर उत्तर एक ही शब्द म, प्रथमा वभ क्त एकवचन म।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः
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प्रश्नः कस्य वषये उत्तरम् हन्द

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(क) के शानां वणः कः ? बाल कृ ष्णः
a g l काला

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g l a आकाश नीलः नीला
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(ख) आकाशस्य वणः कः ?

(ग) कदलीफलस्य वणः कः ? केला पीतः पीला

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seभसा
ृ स्य वणः कः ?
(घ) तण घास हिरतः हरा

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(ङ) मिहषस्य वणः कः ?
ag कृ ष्णः काला

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(च) मयूर स्य वणः कः ? मोर नीलः नीला

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Check it yourself: (च) म चत्रवणः (रंग- बरंगा) भी सही उत्तर माना जाएगा, क्य क मोर के पंख म नीले के

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gl सबसे उपयुक्त है। इसी तरह (क) म कुछ लोग के बाल भूरे भी होते ह — तब धूसरः या क पलः कहा जा सकता है।
साथ हरा और सुनहरा भी होता है — पर मोर क गदन का मुख्य रंग नीला ही है, इस लए एक-शब्द उत्तर म ‘नीलः’

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प्रश्न क बनावट दे खए: हर प्रश्न म जस वस्तु का रंग पूछा गया है वह षष्ठी वभ क्त म है — आकाशस्य, तृणस्य,

g l a
म हषस्य; और ‘केशानाम्’ षष्ठी बहुवचन म है, क्य क बाल एक नह , अनेक होते ह। उत्तर हर बार प्रथमा एकवचन म
ही रहेगा, क्य क वह ‘वणः’ का वशेषण है। a

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रेखा चत्रेषु न दष्टान् वणान् पूरयन्तु — ( चत्रा ण: शुकः, पाटलपुष्पम्, कञ्चुकम्, जपापुष्पम्, नारङ्गफलम्, धेनुः,

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प्र.6

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कदलीफलम्, काकः; न दष्टाः वणाः: ह रतः, पाटलः, नीलः, रक्तः, केसरः, श्वेतः, पीतः, कृष्णः)

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पुष्ठ 94 पर आठ रेखा चत्र (outline pictures) दए ह और हर चत्र के नीचे एक रंग का नाम लखा है। उसी रंग से वह चत्र भरना
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है। चत्र और उनके न दष्ट रंग इस क्रम म ह —

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क्रमः रेखा चत्रम् हन्द न दष्टः वणः अथात्

१ शुकः (शाखायाम् उप वष्टः) तोता हिरतः हरा

२ पाटलपुष्पम् गुलाब पाटलः गुलाबी

३ कञ्चुकम् / युतकम् कमीज़ नीलः नीला

४ जपापुष्पम् गुड़हल र क्तः लाल

५ नारङ्गफलम् नारंगी (सन्तरा) के सरः केस रया / नारंगी

६ धेनुः गाय श्वेतः सफ़ेद

७ कदलीफलम् केला पीतः पीला

८ काकः कौआ कृ ष्णः काला

रंग भरने के बाद हर चत्र पर एक संस्कृत वाक्य भी ल खए —

शुक ः हिरतवणः अिस्त । (तोता हरे रंग का है।)
पाटलपुष्पं पाटलवणम् अिस्त । (गुलाब गुलाबी रंग का है।)
क ञ् चुकं नीलवणम् अिस्त । (कमीज़ नीले रंग की है।)
जपापुष्पं रक्तवणम् अिस्त । (गुड़हल लाल रंग का है।)
नारङ् गफलं के सरवणम् अिस्त । (सन्तरा के सिरया रंग का है।)
धेनःु श्वेत वण अिस्त । (गाय सफ़ेद रंग की है।)
कदलीफलं पीतवणम् अिस्त । (के ला पीले रंग का है।)
काकः कृ ष्णवणः अिस्त । (कौआ काले रंग का है।)

व्याकरण-संकेतः: वशेषणस्य लङ्गं नाम्नः लङ्गानुसारं प रवतते — शुकः ह रतवण◌ः (पुं लङ्गम्), पुष्पं पाटलवणम्
(नपुंसक लङ्गम्), धेनुः श्वेतवण◌ा (स्त्री लङ्गम्) । रंग भरते समय यही तीन रूप याद र खए।

योग्यता वस्तरः — सायङ् काले त्वम्बरकोणे — पृष्ठ 95

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क व: कल्ल ड-कृष्णन् कु — चतुणा पद्यानाम् अन्वयः, अथः, भावः

योग्यता वस्तरः

प्र.1 सायङ् काले त्वम्बरकोणे व लख त प्रकृ तवणचयम् । रक्तं पीतं श्वेतं चत्रं नीलं शब लतदृ ग्वभवम् ॥१॥ — अस्य
पद्यस्य अन्वयम् अथ भावं च लखन्तु ।

पूरे पद्य का वषय एक ही है — सन्ध्या का आकाश। क व कहता है क हर शाम आकाश पर प्रकृ त स्वयं चत्र बनाती है। पद्य के
ऊपर पुस्तक ने उसका भाव भी लख दया है — ‘सवषां वणानां रच यता भगवान् परमेश्वरः एव’।
पदच्छे दः — सायङ् काले तु अम्बरकोणे व लख त प्रकृ तः वणचयम् । रक्तं पीतं श्वेतं चत्रं नीलं शब लत-दृक्- वभवम् ।
अन्वयः — सायङ् काले तु प्रकृ तः अम्बरकोणे रक्तं पीतं श्वेतं चत्रं नीलं शब लतदृ ग्वभवं वणचयं व लख त ।

पदम् अथः (संस्कृते) हन्द

सायङ् काले सन्ध्यासमये सायंक ाल में

अम्बरकोणे आकाशस्य कोणे आकाश के कोने में

वणचयम् वणानां समूहम् रंगों का समूह

िविलखित चत्रय त, आ लख त िचित्रत कर दे ती है

शबिलतदृ ि वभवम् शब लतं दृशः वभवं येन तत् जो दे खने वालों की दृ िष्ट के वैभव को रंग-िबरंगा कर दे

हन्द अथ — सायंकाल के समय प्रकृ त आकाश के एक कोने म रंग का ढे र च त्रत कर दे ती है — लाल, पीला, सफ़ेद, चतकबरा
और नीला; ऐसा रंग-समूह जो दे खने वाली आँख के वैभव को ही रंगीन बना दे ता है।

भावः: क व ने प्रकृ त को चत्रकार बना दया है — आकाश उसका कागज़ है, सन्ध्या उसका समय, और बादल के
रंग उसक तू लका। यह मानवीकरण (personification) है। ‘ व लख त’ क्रया वशेष है — इसका अथ केवल
‘रंगती है’ नह , ‘ लखती है/उकेरती है’ भी है, मानो आकाश पर कोई सन्दे श लखा जा रहा हो। यह पूरा पद्य पाठ के
मुख्य वाक्य ‘सः एव महान् चत्रकारः’ क ही काव्यमय व्याख्या है।

व्याकरण-संकेतः: ‘त्वम्बरकोणे’ = तु + अम्बरकोणे (यण् स न्धः — उ + अ = व्) । ‘प्रकृ तवणचयम्’ = प्रकृ तः +
वणचयम् ( वसग-स न्धः — ◌ः + व् = व्) । ‘शब लतदृ ग्वभवम्’ इ त बहु ी ह-समासः, ‘वणचयम्’ इत्यस्य
वशेषणम्, नपुंसक लङ्गे तीया एकवचनम् ।

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प्र.2 वण व चत्रं गगनं दृष्ट् वा बालास्सव तुष्य न्त । द्रष्टु ं सव तस्य समीपं वहगाः व वधाः गच्छ न्त ॥२॥ — अस्य पद्यस्य
अन्वयम् अथ भावं च लखन्तु ।

पहला पद्य चत्र बनाता है, यह दूसरा पद्य उस चत्र के दशक को दखाता है — ब े और पक्षी।
पदच्छे दः — वण व चत्रं गगनं दृष्ट् वा बालाः सव तुष्य न्त । द्रष्टु ं सव तस्य समीपं वहगाः व वधाः गच्छ न्त ।
अन्वयः — सव बालाः वण व चत्रं गगनं दृष्ट् वा तुष्य न्त । व वधाः वहगाः सव द्रष्टु ं तस्य समीपं गच्छ न्त ।

पदम् अथः हन्द

वणिविचत्रम् अनेकवणयुक्तम् रंग-िबरंगा

दृ ष्ट् वा अवलोक्य (क्त्वान्तम्) दे खकर

तुष्यिन्त प्रसन्नाः भव न्त पस होते है ं
न्न

िवहगाः खगाः, प क्षणः पक्षी

द ष्टुम ् दशनाथम् (तुमुन्नन्तम्) दे खने के िलए

हन्द अथ — रंग- बरंगे आकाश को दे खकर सब ब े प्रसन्न होते ह। और वह सब दे खने के लए तरह-तरह के पक्षी उसके पास
(आकाश क ओर) जाते ह।

भावः: क व क कल्पना बहुत सुन्दर है। सचमुच तो सन्ध्या के समय पक्षी अपने घ सल क ओर लौटते ह — पर
क व कहता है क वे आकाश का रंगीन चत्र दे खने के लए ऊपर उड़ रहे ह! इस एक कल्पना से पूरा दृश्य जी वत हो
उठता है और यह भाव जुड़ जाता है क प्रकृ त क सुन्दरता का आनन्द केवल मनुष्य नह , हर प्राणी लेता है।

व्याकरण-संकेतः: ‘बालास्सव’ = बालाः + सव ( वसग-स न्धः — ◌ः + स् = स्स्) । ‘दृष्ट् वा’ इ त क्त्वा-प्रत्ययान्तम्
अव्ययम् तथा ‘द्रष्टु म्’ इ त तुमुन्-प्रत्ययान्तम् अव्ययम् — े अ प ‘दृश्’ धातोः, परं अथभेदः अ स्त: ‘दे खकर’ तथा
‘दे खने के लए’ ।

प्र.3 प्र त न मषं स ह वण वशेषः नव्यं रूपं प्रा ो त । गन्धवाणां म न्दर मत्य प सव मत्याः कथय न्त ॥३॥ — अस्य
पद्यस्य अन्वयम् अथ भावं च लखन्तु ।

तीसरा पद्य बताता है क यह चत्र कभी एक-सा नह रहता — हर क्षण बदलता है।
पदच्छे दः — प्र त न मषं सः ह वण वशेषः नव्यं रूपं प्रा ो त । गन्धवाणां म न्दरम् इ त अ प सव मत्याः कथय न्त ।
अन्वयः — सः वण वशेषः ह प्र त न मषं नव्यं रूपं प्रा ो त । सव मत्याः (तत् गगनम्) ‘गन्धवाणां म न्दरम्’ इ त अ प
कथय न्त ।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः AglaSem · NCERT Solutions

पदम् अथः हन्द

पितिनिमषम् प्र तक्षणम् हर पल , पलक झपकते ही

नव्यं रूपम् नूतनम् आकारम् नया रूप

गन्धव णाम् दव्यगायकानाम् गन्धव ं का (दे वलोक के गायकों का)

मत्य ः मनुष्याः मरणशील मनुष्य

कथयिन्त वद न्त कहते है ं

हन्द अथ — वह रंग क वशेष छटा हर पल एक नया रूप धारण कर लेती है। सब मनुष्य उसे ‘गन्धव का म न्दर’ भी कहते ह।

भावः: यहाँ दो बात एक साथ कही गई ह। पहली — सन्ध्या का आकाश क्षण-क्षण बदलता है, इस लए उसक
सुन्दरता को रोका नह जा सकता, केवल उसी समय दे खा जा सकता है। दूसरी — मनुष्य उसे ‘गन्धवनगर’ या
‘गन्धव का म न्दर’ कहते ह। भारतीय परम्परा म आकाश म दखने वाले क्ष णक, सुन्दर, पर अ स्थर दृश्य को
गन्धवनगरम् कहा जाता है — जो दखता तो भव्य म न्दर-सा है, पर पल भर म मट जाता है।

व्याकरण-संकेतः: ‘म न्दर मत्य प’ = म न्दरम् + इ त + अ प (यण् स न्धः — इ + अ = य्) । ‘प्र त न मषम्’ इ त
अव्ययीभाव-समासः ( न मषं न मषं प्र त = प्र त न मषम्), अतः अव्ययम् । ‘मत्याः’ शब्दस्य अथः ‘मरणधमाणः’,
अथात् मनुष्याः — दे वाः तु ‘अमत्याः’ (अमराः) ।

प्र.4 प्र त दनमेवं गगने सायं र चता वणाः केनैते । तुभ्यं सवकलाकाराणां नायक! भगवन् नमो नमः ॥४॥ — अस्य
पद्यस्य अन्वयम् अथ भावं च लखन्तु ।

अ न्तम पद्य म क व प्रश्न पूछता है और तुरन्त स्वयं उत्तर भी दे दे ता है — प्रणाम करके।
पदच्छे दः — प्र त दनम् एवं गगने सायं र चताः वणाः केन एते । तुभ्यं सवकलाकाराणां नायक ! भगवन् ! नमः नमः ।
अन्वयः — एवं प्र त दनं सायं गगने एते वणाः केन र चताः ? हे सवकलाकाराणां नायक ! हे भगवन् ! तुभ्यं नमः नमः ।

पदम् अथः हन्द

पितिदनम् प्रत्यहम् हर िदन

रिचताः न मताः रचे गए , बनाए गए

के न केन जनेन (तृतीया) िकसके ारा

सवकलाकाराणां नायक सवषां कलाकाराणां स्वा मन् सब कलाकारों के नायक

तुभ्यं नमो नमः ते नमस्कारः पुनः पुनः तुम्हे ं बार -बार नम स्कार

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 8 सः एव महान् चत्रकारः
a g l AglaSem · NCERT Solutions

हन्द अथ — इस प्रकार प्र त दन सायंकाल आकाश म ये रंग कसके ारा रचे गए ह ? हे सब कलाकार के नायक ! हे भगवन् !
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तुम्ह बार-बार नमस्कार है।
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भावः: क व प्रश्न का उत्तर शब्द म नह दे ता — प्रणाम म दे ता है। ‘केन एते र चताः ?’ पूछने के तुरन्त बाद ‘भगवन्
a
gl नमः’ कह दे ना ही उत्तर है। ठ क वैसे ही जैसे पाठ के संवाद म शक्षक ने पूछा था ‘वणयोजकः चत्रकारः कः ?’
aऔर
नमो
सब ब ने कहा था ‘परमेश्वरः’। पूरे पाठ और इस पद्य का नष्कष एक ही है — सः एव महान् चत्रकारः।

. com ag
व्याकरण-संकेतः: ‘केनैते’ = केन + एते (वृ -सem
a s
agl — ‘नमः’ इत्यनेन सह सदै व चतुथ एव प्रयुज्यते (नमः + चतुथ ) ।
न्धः — अ + ए = ऐ) । ‘प्र त दनमेवं’ = प्र त दनम् + एवम् ।
‘तुभ्यम्’ इ त युष्मद्-शब्दस्य चतुथ एकवचनम्
‘भगवन्’, ‘नायक’ इ त सम्बोधन एकवचनम् । ‘र चताः’ इ त क्त-प्रत्ययान्तं कमवाच्यरूपम्, अतः कता ‘केन’ इ त

co m
m.
तृतीयायाम् — छन्दोऽनुरोधात् पद्ये ‘र चता’ इ त वसगर हतं मु द्रतम् ।

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m .c इस पद्य के रच यता ह कल्ल ड-कृष्णन् कु — केरल के आधु नकaसंgस्कृत-क व। सरल शब्द, छोटे
se और ब के अनुभव से जुड़े दृश्य इनक रचनाओं क वशेषता ह।
क वप रचयः:
aवाक्य
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m (धीवगः) — पृष्ठ 96
योग्यता वस्तरः — अमरकोशे वणानां वगeकरणम्
.co agl
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अमरकोशस्य पञ्च ोकाः तथा वण-पयायाः agl

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योग्यता वस्तरः

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प्र.1
.coलखन्तु । अत्र के वणपयायाः प्रदत्ताः ? a g l
शुक्लशुभ्रशु चश्वेत वशदश्येतपाण्डराः । अवदातः सतो गौरो वलक्षो धवलोऽजुनः ॥ — अस्य ोकस्य अथ

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यह अमरकोश का ोक है। अमरकोश संस्कृत का सबसे प्र सद्ध पयायवाची-कोश है, जसके रच यता ह अमर सहः। इसका
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‘धीवगः’ नामक भाग रंग के नाम गनाता है।
अथः — यह
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ोक श्वेत (सफ़ेद) वण के तेरह पयायवाची दे ता है।

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श्वेत वणस्य पय याः (१३ ) —
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शुक्लः, शुभ ः, शुिचः, श्वेत ः, िवशदः, श्येत ः, पाण्डरः,
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se m अवदातः, िसतः, गौरः, वलक्षः, धवलः, अजुनः ।
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( हन्द : इन सब शब्द का अथ ‘सफ़ेद’ है।)
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. com a gla
Did you know? ‘अजुनः’ भी सफ़
a s emे द रंग का ही नाम है — इसी लए महाभारत के अजुन का एक अथ ‘गौरवण
aglन वृक्ष का नाम भी उसक सफ़ेद छाल के कारण पड़ा। इसी तरह ‘शु चः’ का अथ
वाला’ माना जाता है, और अजु
‘प वत्र’ भी है — सफ़ेद और प वत्रता का सम्बन्ध संस्कृत म शब्द के भीतर ही बैठा है।

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m ase
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पयायवाची इतने क्य ? संस्कृत काव्य म छन्द नभाना पड़ता है। कसी पं क्त म दो अक्षर चा हए तो ‘ सतः’, चार
चा हए तो ‘पाण्डरः’ या ‘अवदातः’ — अथ वही रहता है, पर छन्द बन जाता है। इसी लए अमरकोश ने एक ही अथ
के इतने शब्द एक साथ संग्रहीत कर दए।

प्र.2 ह रणः पाण्डु रः पाण्डु रीषत्पाण्डु स्तु धूसरः । कृष्णे नीला सतश्यामकालश्यामलमेचकाः ॥ — अस्य ोकस्य अथ
लखन्तु ।

यह ोक दो वग के नाम दे ता है — पहले धूसर/पीलापन लए हल्के रंग, फर कृष्ण (काले) रंग।

वगः पयायाः हन्द

धूस रवणः हिरणः, पाण्डुर ः, पाण्डुः, ईषत्पाण्डुः, धूस रः भूरा, पाण्डु (हल्का पीला-सफ़ेद), धूल जैसा रंग

कृ ष्णवणः कृ ष्णः, नीलः, अिसतः, श्यामः, कालः, श्यामलः, मेचकः काला, साँवला

अथः — ह रण, पाण्डु र, पाण्डु , ईषत्पाण्डु और धूसर — ये धूसर (भूरे/फ के) रंग के नाम ह। तथा कृष्ण, नील, अ सत, श्याम, काल,
श्यामल और मेचक — ये सब काले रंग के नाम ह।

Tip: ‘ईषत्पाण्डु ः’ को टु कड़ म दे खए — ईषत् (थोड़ा-सा) + पाण्डु (पीलापन लए सफ़ेद) = ‘हल्का पाण्डु ’। संस्कृत
म ‘ईषत्’ जोड़ते ही रंग हल्का हो जाता है, जैसे ‘ईषद्रक्तः’ = हल्का लाल (अगले ोक म आएगा)।

ध्यान द जए — यहाँ ‘नीलः’ काले वग म है! संस्कृत म गहरा नीला और काला बहुत पास-पास माने जाते ह।
इसी लए श्रीकृष्ण को कभी ‘कृष्ण’, कभी ‘श्याम’ और कभी ‘नीलमेघश्याम’ कहा जाता है। पाठ म मयूर का रंग भी
इसी कारण ‘नीलः’ भी कहा जा सकता है और गहरा साँवला भी।

प्र.3 पीतो गौरो ह रद्राभः पलाशो ह रतो ह रत् । लो हतो रो हतो रक्तः शोणः कोकनदच्छ वः ॥ — अस्य ोकस्य अथ
लखन्तु ।

इस ोक क पहली पं क्त पीत (पीले) तथा हरे रंग के नाम दे ती है, दूसरी पं क्त रक्त (लाल) के।

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वगः पयायाः हन्द

पीतवणः पीतः, गौरः, हिरद ाभः, पालाशः पीला (हल्द जैसा, पलाश-पुष्प जैसा)

हिरतवणः हिरतः, हिरत् हरा

रक्तवणः लोिहतः, रोिहतः, र क्तः, शोणः, कोकनद च्छिवः लाल

अथः — पीत, गौर, ह रद्राभ और पालाश — ये पीले रंग के नाम ह; ह रत तथा ह रत् — हरे रंग के। लो हत, रो हत, रक्त, शोण और
कोकनदच्छ व — ये लाल रंग के नाम ह।

शब्द क जड़ दे खए: ह रद्राभः = ह रद्रा (हल्द ) + आभा — ‘हल्द जैसी आभा वाला’। पालाशः = पलाश
(ढाक/टे सू) के फूल जैसा। कोकनदच्छ वः = कोकनद (लाल कमल) क छ व वाला। संस्कृत के रंग-नाम अक्सर
कसी वस्तु के नाम से बने ह — ठ क वैसे ही जैसे हन्द म ‘ सन्दूरी’, ‘गुलाबी’ और ‘केस रया’।

एक भ्रम दूर क जए: ‘गौरः’ पछले ोक म सफ़ेद के अथ म आया था और यहाँ पीले के अथ म। संस्कृत म कुछ
शब्द अनेकाथ ह — गौर का अथ ‘उजला’ भी है और ‘हल्का पीलापन लए उजला’ भी। ऐसे शब्द का ठ क अथ
प्रसंग (context) से ही तय होता है।

प्र.4 अव्यक्तरागस्त्वरुणः श्वेतरक्तस्तु पाटलः । श्यावः स्यात्क पशो धूम्रधूमलौ कृष्णलो हते ॥ — अस्य ोकस्य अथ
लखन्तु ।

यह ोक म श्रत रंग के नाम दे ता है — गुलाबी, अरुण और धुएँ जैसे रंग।

पुस्तके पदत्ताः पय याः —

रक्तोत्पलाभः, शोणः, अव्यक्तरागः, ईषद क्तः, अरु णः,
श्वेत रक्तः, पाटलः, श्यावः, किपशः, धूमः, धूमलः, कृ ष्णलोिहतः ।

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पदम् पदच्छे दः / व्युत्प त्तः अथः

अव्यक्तरागः न व्यक्तः रागः यस्य िजसका रंग स्पष्ट न हो — हल्का लाल

ईषद क्तः ईषत् + रक्तः थोड़ ा-सा लाल

अरुणः — लािलमा िलए हुए , उषा जैस ा रंग

श्वेतरक्तः / पाटलः श्वेतः + रक्तः गुल ाबी (सफ़े द और लाल का मेल )

श्यावः, किपशः — क त्थई, भूर ा-काला

धूम ः, धूम लः धूमस्य वणः ध एु ँ जैस ा रंग

कृ ष्णलोिहतः कृष्णः + लो हतः काला-लाल , गहरा मटमैल ा लाल

यह ोक पाठ से सीधे जुड़ता है: अभ्यास के प्रश्न ३ म ‘पाटलवणः’ (गुलाबी) मलाना था — और यहाँ अमरकोश
स्वयं उसक प रभाषा दे दे ता है: ‘श्वेतरक्तस्तु पाटलः’ — सफ़ेद और लाल मलकर पाटल (गुलाबी) बनता है। इसी
तरह प्रश्न ३ का ‘नीललो हतः’ = नीला + लाल = जामुनी। संस्कृत के रंग-नाम अपनी बनावट म ही रंग- मश्रण का
नयम बता दे ते ह।

व्याकरण-संकेतः: ‘अव्यक्तरागस्त्वरुणः’ = अव्यक्तरागः + तु + अरुणः, ‘श्वेतरक्तस्तु’ = श्वेतरक्तः + तु ( वसग-
स न्धः — ◌ः + त् = स्त्) । ‘धूम्रधूमलौ’ तथा ‘कृष्णलो हते’ इ त वचन-रूपे — यतः क्रमशः ौ शब्दौ े च रूपे
न दष्टे ।

प्र.5 कडारः क पलः पङ्ग पशङ्गौ कद्रु पङ्गलौ । चत्रं कम रकल्माषशबलैताश्च कबुरे ॥ — अस्य ोकस्य अथ लखन्तु ।

यह अ न्तम ोक भूरे/ पगल रंग तथा कबुर (रंग- बरंगे) के नाम गनाता है।

वगः पयायाः हन्द

िपङ् गलवणः कडारः, किपलः, िपङ् गः, िपशङ् गः, कद ः, िपङ् गलः भूरा, क पश, सुनहरा-भूरा

कबुरवणः (िविचत्रवणः) िचत्रम्, िकम रः, क ल्माषः, शबलः, कबुरः रंग- बरंगा, चतकबरा

अथः — कडार, क पल, पङ्ग, पशङ्ग, कद्रु और पङ्गल — ये भूरे रंग के नाम ह। तथा चत्र, कम र, कल्माष, शबल और कबुर — ये
व चत्रवण अथात् अनेक रंग वाले के नाम ह।

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अब पाठ का एक शब्द पूरी तरह खुल जाता है: संवाद म शक्षक ने कहा था — ‘ चत्रवणाः शुकाः अ प अत्र
स न्त’। यहाँ ‘ चत्र’ का अथ तस्वीर नह , अनेकरंगी है — और वही बात यह ोक प्रमाण के साथ बता दे ता है,
क्य क यहाँ ‘ चत्रम्’ को ‘कबुरः’ (रंग- बरंगा) का पयायवाची कहा गया है। इसी तरह पद्य म आया
‘शब लतदृ ग्वभवम्’ भी ‘शबल’ ( चतकबरा) से ही बना है।

अमरकोश के बारे म: पूरा नाम है नाम लङ्गानुशासनम्, पर लोक प्रय नाम ‘अमरकोशः’ है। यह तीन काण्ड म बँटा
है और इसके ोक कण्ठस्थ करने क परम्परा रही है — क्य क छन्द म होने से हज़ार पयायवाची सरलता से याद
रह जाते ह। ‘धीवगः’ प्रथम काण्ड का वह भाग है जसम बु द्ध, गुण, वाणी और वण (रंग) सम्बन्धी शब्द संगृहीत ह।

प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 97
पुष्पा ण — चत्राणां नामा न वणाः च; कक्षायाः वस्तू न

प रयोजनाकायम्

प्र.1 उप रतनानां चत्राणां नामा न वणाः च के इ त अ भजानन्तु लखन्तु च । ( चत्रा ण — पाटलम्, गन्धपुष्पम्,
सूयका न्तः, कमलम्, चम्पकः, कण रः, अपरा जता, जपाकुसुमम्, म ल्लका)

पृष्ठ 97 पर नौ फूल के रंगीन चत्र ह और हर चत्र के नीचे उसका संस्कृत नाम लखा है। आपको केवल रंग जोड़ना है। चत्र म
दखने वाले रंग इस प्रकार ह —

चत्रम् (संस्कृतम्) हन्द चत्रे वणः संस्कृत-वाक्यम्

पाटलम् गुलाब र क्तः (गाढ़ ा लाल ) पाटलं रक्तवणम् अ स्त ।

गन्धपुष्पम् गदा पीतः गन्धपुष्पं पीतवणम् अ स्त ।

सूयकािन्तः सूरजमुखी पीतः सूयका न्तः पीतवणा अ स्त ।

कमलम् कमल पाटलः (गुल ाबी) कमलं पाटलवणम् अ स्त ।

चम्पकः चम्पा श्वेतः (मध्ये पीतः) चम्पकः श्वेतवणः अ स्त ।

कण रः कनेर पीतः कण रः पीतवणः अ स्त ।

अपरािजता अपरा जता (शंखपुष्पी) नीललोिहतः / नीलः अपरा जता नीललो हतवणा अ स्त ।

जपाकु सुम म् गुड़हल र क्तः जपाकुसुमं रक्तवणम् अ स्त ।

मिल्लका चमेली / मोगरा श्वेतः म ल्लका श्वेतवणा अ स्त ।

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व्याकरण-संकेतः: वाक्य बनाते समय वशेषण को नाम के लङ्ग से मलाइए — नपुंसक लङ्गे ‘पाटलं रक्तवणम्’,
. com
m a s emलङ्ग ह।
gl
पुं लङ्गे ‘चम्पकः श्वेतवण◌ः’, स्त्री लङ्गे ‘म ल्लका श्वेतवण◌ा’। ‘सूयका न्तः’ और ‘अपरा जता’ भी स्त्री
. co a
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agl
नाम कैसे बने, यह भी दे खए: सूयका न्तः = सूय क का न्त क ओर मुड़ने वाला (सूरजमुखी); अपरा जता =
‘जो परा जत न हो’ — दे वी का ही एक नाम; जपाकुसुमम् वही गुड़हल है जो पाठ के संवाद म मनीषा ने पहचाना

co m
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था। ध्यान द जए क यहाँ ‘पाटलम्’ फूल (गुलाब) के अथ म है, जब क अभ्यास ३ म ‘पाटलवणः’ रंग (गुलाबी) के

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अथ म था।

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प्र.2 कक्षायां वद्यमानानां १० वस्तूनां नामा न वणान् च अ भजानन्तु लखन्तु च ।

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a कैसे कर —
यह आपक अपनी कक्षा म करने का काम है — इस लए आपक सूची इस नमूने से अलग हो सकती है, और होनी भी चा हए।

om a s
. c agl
1. कक्षा म चार ओर दे खए और दस वस्तुएँ चु नए — प ट्टका, ार, वातायन, कपाटम् आ द।
mजए या शब्दकोश दे खए)।
2. हर वस्तु का संस्कृत नाम ल खए ( शक्षक से पूछeली
s
a
agl— ‘… वणः/वणा/वणम् अ स्त ।’
3. अब उसका रंग जोड़कर पूरा वाक्य बनाइए
4. ध्यान र खए क वशेषण वस्तु के लङ्ग से मले।

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नमूना उत्तर —
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क्रमः वस्तु (संस्कृतम्) हन्द वाक्यम्

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agl १ श्यामपट्टः श्यामपट्ट श्यामप ः कृष्णवणः अिस्त ।

se m
com a
खिटका श्वेतवण अिस्त ।
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२ ख टका चॉक

. पुस्तक a g
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ase
३ पुस्तकम् पुस्तकं पीतवणम् अिस्त ।

४ लेखनी agl कलम ले खनी नीलवण अिस्त ।

co m
ारं किपलवणम् अिस्त । (भूर ा)
.
५ ारम् दरवाज़ा

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वातायनं श्वेतवणम् अिस्त ।
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६ वातायनम् खड़क

a s em ७
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भ त्तः द वार िभित्त ः हिरतवण अिस्त ।
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आस न्दः र क्तवणः अिस्त ।
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८ आसन्दः कुस

m घड़ी a s
९ घट
e m . co घटी कृ ष्णवण अिस्त ।
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१० ध्वजः
a ध्वज ध्वजः ित्रवणः अिस्त ।

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Tip — तीन रूप याद कर ली जए: पुं लङ्गे …वणः अ स्त, स्त्री लङ्गे …वणा अ स्त, नपुंसक लङ्गे …वणम् अ स्त।
इन्ह तीन साँच से आप कक्षा क कोई भी वस्तु संस्कृत म बता सकते ह — और यही अभ्यास प्रश्न ६ म रंग भरते
समय भी काम आया था।

यह काय पाठ को पूरा कर दे ता है: पाठ के आरम्भ म शक्षक ने कहा था — ‘सव स्वस्य अन्येषां च वस्त्राणां वणान्
अवलोकयन्तु’। यह प रयोजना उसी आदे श को आगे बढ़ाती है: रंग कताब म नह , चार ओर ह — केवल दे खना
और नाम दे ना सीखना है।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का पूरा वषय एक ही शब्द है — ‘वणः’ (रंग)। यहाँ ‘वण’ का अथ अक्षर नह , रंग है। पाठ ह रतः, रक्तः, कृष्णः,
श्वेतः, नीलः, पीतः, केसरः, पाटलः और नीललो हतः — नौ रंग के संस्कृत नाम प्रकृ त के उदाहरण से सखाता है।
यह पाठ संवाद-रूप म है। बोलने वाले ह शक्षकः तथा पाँच छात्र — श्र ा, मेधा, मनीषा, म ुलः और आ दत्यः। शक्षक
प्रश्न पूछते ह, छात्र चार ओर दे खकर उत्तर दे ते ह — इसी लए पूरा पाठ लगभग वैसा ही है जैसा कक्षा म सचमुच बोला जाता
है।
पाठ का पहला चत्र अमृत-उद्यान का है — राष्ट्रप त भवन के प रसर म स्थत यह उद्यान सौ से अ धक प्रकार के गुलाब और
लगभग पाँच हज़ार से अ धक ऋतु-पुष्प के लए प्र सद्ध है। पाठ का प्रार म्भक अनुच्छेद यही प रचय दे ता है।
व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ ‘तृतीया वभ क्त’ और आदराथक क्रयारूप का अभ्यास कराता है — ‘ह रतवणन शोभते’,
‘रक्तवणन युक्तम्’ म तृतीया, और ‘पश्यन्तु, वदतु, अवलोकयन्तु, जान न्त कम्’ म आदरसूचक लोट् -लकार तथा ‘भवत्याः’
जैसे भवत्-रूप।
अभ्यास पूरी तरह ग त व ध-आधा रत है — प्रश्न ३ म रंग के धब्ब को नाम से जोड़ना, प्रश्न ४ म राष्ट्रध्वज के रंग भरना, प्रश्न
६ म शुक, गुलाब, कमीज़, जपापुष्प, नारंगी, गाय, केला और काक के रेखा चत्र म न दष्ट रंग भरना।
पाठ का अ न्तम सन्दे श आध्या त्मक है। ‘वणयोजकः चत्रकारः कः ?’ — सब छात्र ऊँचे स्वर म उत्तर दे ते ह ‘परमेश्वरः’।
योग्यता वस्तर का पद्य ‘सायङ् काले त्वम्बरकोणे’ इसी भाव को दोहराता है — सन्ध्या के आकाश के रंग कसी और ने नह ,
सवकलाकाराणां नायक भगवान् ने रचे ह।

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त्व रत पुनरावृ त्त

वणः (संस्कृते ) अथः हन्द पाठे उदाहरणम्

ह रतः हिरतवणः हरा पणा न, शुकः, तृणम्

रक्तः रक्तवणः लाल जपापुष्पम्, शुकस्य चञ्चुः

कृष्णः कृ ष्णवणः काला काकः, पकः, केशाः, म हषः

श्वेतः शुक्लवणः / धवलवणः सफ़ेद, श्वेत हंसः, बकः, शशः, प्रावारकम्

नीलः नीलवणः नीला आकाशः, शुकस्य पक्षाः, अशोकचक्रम्

पीतः पीतवणः पीला कदलीफलम्, शुकस्य पक्षाः

केसरः के सरवणः केस रया पाटलपुष्पा ण, ध्वजस्य उप रतनः भागः

पाटलः पाटलवणः गुलाबी पाटलपुष्पम् (गुलाबः), कमलम्

नीललो हतम् नीललोिहतः जामुनी, बगनी म ुलस्य उद्याने पाटलपुष्पा ण

चत्रवणः िविचत्रवणः, कबुरः रंग- बरंगा चत्रवणाः शुकाः, इन्द्रधनुः

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Board / OrgNCERT
ExamClass 6
TypeSolution
Pages27
Updated19 Sep 2026