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NCERT Solutions Class 6 Sanskrit Chapter 9 अतिथिदेवो भव

AglaSem पर कक्षा 6 संस्कृत पाठ 9 अतिथिदेवो भव (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 6 Sanskrit Chapter 9 (Deepakam).
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NCERT Solutions Class 6 Sanskrit Chapter 9 अतिथिदेवो भव – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा6

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 9: अ त थदे वो भव

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

98 – 105 10 24 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 28 pages

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 9: अ त थदे वो भव
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के नवमः पाठः — अ त थदे वो भव के सम्पूण हल। यह एक छोट -सी कहानी है — रा धका के
घर क छत पर एक माजारी ( बल्ली) और उसके चार शावक आ बसे ह। रा धका उन्ह ‘ व शष्ट अ त थ’ मानकर उनक सेवा करती है, और पतामही
उसे उप नषद् का वचन ‘अ त थदे वो भव’ समझाती ह। व्याकरण क दृ ष्ट से यह पाठ अव्ययपद का — वशेषकर अत्र, तत्र, कुत्र, सवत्र, अन्यत्र,
एकत्र, उप र, अधः, अन्तः, ब हः जैसे स्थानवाचक अव्यय का — पाठ है। पृष्ठ 98 से 105 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — पूरे पाठ का हन्द
अनुवाद, वयं शब्दाथान् जानीमः क शब्द-ता लका, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–८ (सभी उपभाग स हत, उत्पी ठका- चत्र, ‘कुत्र ?’ रेखा चत्र और
‘कः कुत्र अ स्त’ ता लका स हत), योग्यता वस्तरः का गीत ‘माजाल ! रे माजाल !’, अव्ययलक्षण- ोक तथा प रयोजनाकायम् के दोन काय और
‘ बडालः कुत्र अ स्त ?’ चत्र-सङ् ग्रह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 6) 98 – 105

खं ड प्रश्न

10 24

माध्यम

हन्द

नवमः पाठः — अ त थदे वो भव (पाठ-प्रवेशः तथा कथार ः) — पृष्ठ 98
‘अ त थदे वो भव’ इ त उप नषद्-वचनम् तथा रा धकायाः नूतनाः अ तथयः

पाठ-प्रवे शः

प्र.1 भारतीयसंस्कृतौ अ तथीनां नतरां महत्त्वम् अ स्त । ‘अ त थदे वो भव’ इ त उप नषदः वचनम् अ स्त । अस्माकं दे शे
न केवलं मनुष्याः, अ प तु अन्ये प्रा णनः अ प अ त थरूपेण प्री तपात्रा ण भव न्त । अ त थसेवा पञ्चमहाय ेषु
अन्तभव त । ‘अ त थदे वो भव’ इ त वचनेन अ त थसेवायाः भावः सवषु जाग रतः भव त । तादृशः कश्चन प्रसङ्गः
अत्र पाठे द शतः । — अस्य अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

यह पाठ-प्रवेश है — कहानी से पहले पुस्तक बताती है क पाठ का वषय क्या है।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

संस्कृतम् हन्द अनुवादः

भारतीयसंस्कृ तौ अितथीनां िनतरां महत्त्वम् अिस्त । भारतीय संस्कृ ित में अितिथयों का बहुत अिधक महत्त्व है।

‘अितिथदे वो भव’ इित उपिनषदः वचनम् अिस्त । ‘अितिथ को दे वता मानो’ — यह उपिनषद् का वचन है।

अस्माकं दे शे न के वलं मनुष्याः, अिप तु अन्ये पािणनः अिप अितिथरूपेण हमारे दे श में के वल मनुष्य ही नही,ं बिल्क दू स रे पाणी भी अितिथ के रूप
पीितपात्रािण भविन्त । में पेम के पात्र होते है।
ं

अितिथसे वा पञ्चमहाय े ष ु अन्तभवित । अितिथ-से वा पाँच महाय ों में सिम्मिलत है।

‘अितिथदे वो भव’ इित वचनेन अितिथसे वायाः भावः सवषु जागिरतः भवित ‘अितिथदे वो भव’ इस वचन से सबके मन में अितिथ-से वा का भाव जाग
। जाता है।

तादृ शः क श्चन पसङ् गः अत्र पाठे दिशतः । वैस ा ही एक पसंग इस पाठ में िदखाया गया है।

‘अ त थः’ शब्द का अथ ही सुन्दर है: न वद्यते त थः यस्य सः अ त थः — जसके आने क कोई त थ (तारीख़)
तय न हो, वह अ त थ है। इसी लए पतामही आगे कहती ह — ‘अ तथयः कदा आगच्छ न्त इ त न जानीमः’। बन
बुलाए, बना ख़बर दए जो आ जाए — उसी का स्वागत करना असली अ त थ-सत्कार है।

Did you know? — पञ्चमहाय ाः: गृहस्थ के पाँच नत्य कतव्य — (१) ब्रह्मय ः — अध्ययन-अध्यापन,
(२) दे वय ः — दे व-पूजन, (३) पतृय ः — पतर का तपण, (४) भूतय ः — पशु-पक्षी आ द प्रा णय को अन्न
दे ना, (५) नृय ः / अ त थय ः — अ त थ क सेवा। इस पाठ म रा धका बल्ली और उसके ब को दूध दे कर
वस्तुतः भूतयज्ञ और अ त थयज्ञ दोन एक साथ कर रही है।

मूल वचन कहाँ से है ? तै त्तरीयोप नषद् क शक्षावल्ली म गुरु शष्य को वदा करते समय कहते ह — ‘मातृदेवो
भव । पतृदेवो भव । आचायदे वो भव । अ त थदे वो भव ।’ अथात् माता, पता, आचाय और अ त थ — चार को
दे वता के समान मानो।

प्र.2 रा धका एषु दनेषु कूदमाना एव चल त । यतः गृहे नूतनाः अ तथयः स न्त । ते च व शष्टाः स न्त । माता, पुत्रौ,
पुत्र्यौ च म लत्वा ते तत्र पञ्च स न्त । अहोरात्रं तस्याः चन्ता एकत्र एव । गृहस्य छ ाः उप र । तत्र एव तस्याः मनः
अ स्त । कुतूहलम् अ स्त, के ते इ त ? ते न अन्ये, का चत् माजारी तस्याः चत्वारः शावकाः च । आम्, ते एव
व शष्टाः अ तथयः । सा तु तेषां नामा न अ प च न्ततवती – तन्वी, मृद्व , शबलः, भीमः च इ त । — अस्य
अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

कहानी यहाँ से शुरू होती है। ध्यान द जए — लेखक पहले रहस्य बनाता है (‘के ते इ त ?’) और फर खोलता है।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

संस्कृतम् हन्द अनुवादः

रािधका एषु िदनेष ु कू द माना एव चलित । रािधका इन िदनों कू दती हुई ही चलती है।

यतः गृहे नूतनाः अितथयः सिन्त । ते च िविशष्टाः सिन्त । क्योंिक घर में नए अितिथ आए है।
ं और वे ख़ास (िवशेष) है।
ं

माता, पुत्रौ, पुत्र्यौ च िमिल त्वा ते तत्र पञ्च सिन्त । माता, दो बेटे और दो बेिटयाँ — सब िमलाकर वे वहाँ पाँच है।
ं

अहोरात्रं तस्याः िचन्ता एक त्र एव । िदन-रात उसका ध् यान एक ही जगह लगा रहता है।

गृहस्य छ ाः उपिर । तत्र एव तस्याः मनः अिस्त । घर की छत के ऊपर। वही ं उसका मन लगा है।

कु तूहलम् अिस्त, के ते इित ? िज ासा होती है — वे कौन है ं ?

ते न अन्ये, कािचत् माज री तस्याः चत्वारः शावकाः च । वे और कोई नही ं — कोई एक िबल्ली और उसके चार बच्चे है।
ं

आम्, ते एव िविशष्टाः अितथयः । हाँ, वे ही तो िवशेष अितिथ है।
ं

सा तु तेषां नामािन अिप िचिन्ततवती – तन्वी, म ृ ी, शबलः, भीमः च इित । उसने तो उनके नाम भी सोच िलए है ं — तन्वी, म ृ ी, शबल और भीम।

‘कूदमाना एव चल त’ म पूरी कहानी छपी है: रा धका चलती नह , उछलती-कूदती चलती है — यानी वह बहुत
ख़ुश है। लेखक ने यह नह कहा ‘सा प्रसन्ना अ स्त’; उसने उसका चलना दखा दया। यही अच्छे लेखन का ढं ग है —
भाव बताना नह , दखाना।

व्याकरण-संकेतः: ‘कूदमाना’ इ त शानच्-प्रत्ययान्तं स्त्री लङ्गरूपम् (कूद् धातोः, = कूदती हुई) । ‘पुत्रौ, पुत्र्यौ’ इ त
वचनम् — अतः दो बेटे और दो बे टयाँ; माता के साथ कुल पाँच । ‘अहोरात्रम्’ इ त अव्ययीभावसमासः (अहश्च
रा त्रश्च = दन-रात) । ‘एषु दनेषु’ इ त सप्तमी बहुवचनम् ।

प्र.3 कुतूहलम् अ स्त, के ते इ त ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 98)

यह प्रश्न लेखक स्वयं पाठक से पूछता है, और अगली ही पं क्त म उत्तर दे दे ता है।
संस्कृतेन उत्तरम् — ते न अन्ये, का चत् माजारी तस्याः चत्वारः शावकाः च । ते एव रा धकायाः व शष्टाः अ तथयः स न्त ।
( हन्द : वे और कोई नह — एक बल्ली और उसके चार ब े ह। वे ही रा धका के वशेष अ त थ ह।)
पाँच के नाम रा धका ने स्वयं सोचे — तन्वी, मृद्व , शबलः, भीमः (चार शावक) और उनक माता माजारी।

व्याकरण-संकेतः: ‘के ते ?’ — ‘ कम्’ शब्दस्य पुं लङ्गे प्रथमा बहुवचनम् ‘के’ (= कौन लोग)। एकवचने ‘कः’,
वचने ‘कौ’, बहुवचने ‘के’ । ‘का चत् माजारी’ — ‘का’ + ‘ चत्’ = कोई एक (स्त्री लङ्गे ); पुं लङ्गे ‘क श्चत्’,
नपुंसक लङ्गे ‘ क ञ्चत्’ ।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव
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नवमः पाठः — अ त थदे वो भव (कथायाः उत्तराधः) — पृष्ठ 99
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शावकानां वणनम्, पताम ाः उपदे शः तथा ‘अ त थदे वो भव’ इ त मन्त्रः
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पाठः

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तन्वी आकृत्या सुन्दरी, मृद्व स्पशन अतीव कोमला । शबलः चत्रवणः तथा च भीमः क ञ्चत् ूलः । माजारी
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प्र.1

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कदा गच्छ त, कदा आगच्छ त एतत् सवम् अ प रा धका जाना त । सा माजाय क्षीरं ददा त । माजारी पब त ।

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अनन्तरं सा सधन्यवादं रा धकां पश्य त । कन्तु
s emशावकानां समीपं रा धका गच्छ त चेत् मन्दं मन्दं पृष्ठतः आगच्छ त
। रा धकां दृष्ट् वा शावकाः भीताः न भव lन्त । पतामही रा धकायाः कायकलापान् दृष्ट् वा हस त । — अस्य
अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
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यहाँ चार शावक का प रचय है और यह भी क रा धका उनक दनचया तक जानती है।
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a glसंस्कृतम् हन्द अनुवादः

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com agl
तन्वी आकृ त्या सुन्दरी, म ृ ी स्पशन अतीव कोमला । तन्वी आकृ ित (रूप) से सुन्दर है, म ृ ी छू ने में बहतु कोमल है।

m .
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शबलः िचत्रवणः तथा च भीमः िकिञ्चत् स्थूल ः । शबल रंग-िबरंगा है और भीम कु छ मोटा है।

agl
माज री कदा गच्छित, कदा आगच्छित एतत् सवम् अिप रािधका िबल्ली कब जाती है, कब आती है — यह सब भी रािधका जानती है।

m
जानाित ।

वह िबल्ली को दू ध दे ती है। िबल्ली पीती है।m . c o
se
सा माज य क्षीरं ददाित । माज री िपबित ।

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m . agसे रािधका को दे खती है।
se
अनन्तरं सा सध न्यवादं रािधकां पश्यित । उसके बाद वह ध न्यवाद के भाव

l a
ag िकन्तु शावकानां समीपं रािधका गच्छित चेत ् मन्दं मन्दं पष्ृ ठतः िक न्तु यिद रािधका बच्चों के पास जाती है, तो (िबल्ली) धीरे -धीरे पीछे -पीछे
आगच्छित । आ जाती है।
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com रािधका को दे खकर बच्चे डरते नही ं है।ं g l a
m . a
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रािधकां दृ ष्ट् वा शावकाः भीताः न भविन्त ।

agl
िपतामही रािधकायाः कायकलापान् दृ ष्ट् वा हसित । दादी रािधका की ये सब हरकते ं दे खकर हँस ती है।
ं

co m
बल्ली का पीछे -पीछे आना क्य ? वह रा धका पर अ वश्वास नह करती — दूध पीकर वह ‘सधन्यवादं ’ दे खती है।
m .
m के पास कसी के जाने पर सतक हो जाती है। s
a e लए वह रोकती नह , बस
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पर हर माँ क तरह वह अपने ब इसी
g सद्ध होता है क रा धका ने उन्ह
.c‘मन्दं मन्दं पृष्ठतः’ चली आती है। दूसरी ओर शावक ‘भीताः न भव न्त’ —aइससे
se m कभी सताया नह ।
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व्याकरण-संकेतः: ‘माजाय क्षीरं ददा त’ — दे ने के अथ म जसे दया जाए वह चतुथ वभ क्त म आता है;
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‘माजारी’ (ङ प्-अन्त स्त्री लङ्ग) का चतुm
a s e थ एकवचन माजाय । ‘आकृत्या, स्पशन’ इ त तृतीया एकवचनम् (‘…क

agl
दृ ष्ट से’) । ‘दृष्ट् वा’ इ त क्त्वा-प्रत्ययान्तम् अव्ययम् (= दे खकर) । ‘चेत्’ अव्ययम् = य द ।

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m .
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 सा रा धकां वद त – रा धके ! अ तथयः कदा आगच्छ न्त इ त न जानीमः । कन्तु यदा ते अत्र आगच्छ न्त तदा
तेषाम् एतादृशी सेवा करणीया । रा धका पताम ाः कण्ठं प रतः मालाम् इव हस्तौ ापयन्ती पृच्छ त – अस्तु,
करो म । कन्तु कमथम् ? पतामही वद त – ‘अ त थदे वो भव’ । अथात् अ त थः अस्माकं दे वः अ स्त इ त
चन्तयतु । तस्य आदरेण सेवां करोतु । रा धका आ दनं मन्त्रम् इव वारं वारं वद त – ‘अ त थदे वो भव’,
‘अ त थदे वो भव’ । अनन्तरं सा तन्व मृद्व शबलं भीमं च वात्सल्येन वद त – जान न्त कम् ‘अ त थदे वो भव’ ?
भवन्तः अ प वदन्तु – ‘अ त थदे वो भव’ । — अस्य अनुच्छेदस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।

यही पाठ का सबसे सुन्दर भाग है — पतामही का उपदे श और रा धका का उसे तुरन्त आगे बढ़ा दे ना।

संस्कृतम् हन्द अनुवादः

सा रािधकां वदित – रािधके ! अितथयः कदा आगच्छिन्त इित न वे (दादी) रािधका से कहती है ं — रािधका ! अितिथ कब आते है,ं यह हम नही ं
जानीमः । जानते।

िक न्तु यदा ते अत्र आगच्छिन्त तदा तेषाम् एतादृ शी से वा करणीया पर न्तु जब वे यहाँ आ जाएँ, तब उनकी ऐसी ही से वा करनी चािहए।
।

रािधका िपताम ाः क ण्ठं पिरतः मालाम् इव हस्तौ स्थापयन्ती रािधका दादी के गले के चारों ओर माला की तरह अपने दोनों हाथ डालती
पच्ृ छित – अस्तु, करोिम । िक न्तु िकमथम् ? हईु पूछती है — ठीक है, क रूँ गी। पर िकसिलए ?

िपतामही वदित – ‘अितिथदे वो भव’ । अथ त् अितिथः अस्माकं दादी कहती है ं — ‘अितिथदे वो भव’। अथ त् यह सोचो िक अितिथ हमारा
दे वः अिस्त इित िचन्तयतु । दे वता है।

तस्य आदरे ण से वां करोतु । उसकी आदर के साथ से वा करो।

रािधका आिदनं म न्त्रम् इव वारं वारं वदित – ‘अितिथदे वो भव’, रािधका िदन भर म न्त्र की तरह बार -बार कहती है — ‘अितिथदे वो भव’,
‘अितिथदे वो भव’ । ‘अितिथदे वो भव’।

अनन्तरं सा तन्वी ं म ृ ी ं शबलं भीमं च वात्स ल्येन वदित – जानिन्त उसके बाद वह तन्वी, म ृ ी, शबल और भीम से स्नेह के साथ कहती है — क्या
िकम् ‘अितिथदे वो भव’ ? आप जानते है ं ‘अितिथदे वो भव’ ?

भवन्तः अिप वद न्तु – ‘अितिथदे वो भव’ । आप भी किहए — ‘अितिथदे वो भव’।

‘मालाम् इव हस्तौ ापयन्ती’ — एक चत्र-सा उपमा: रा धका दाद के गले म हाथ डालती है, और लेखक
कहता है मानो माला पहना रही हो। यह उपमा अलङ् कार है (इव = क तरह)। इससे दो बात एक साथ कही गईं —
पोती का स्नेह, और दाद के प्र त आदर, क्य क माला आदरणीय को ही पहनाई जाती है।

अन्त क पं क्त सबसे प्यारी है: रा धका जो सीखी, उसे तुरन्त बल्ली के ब को सखाने लगती है — और वह
भी ‘भवन्तः’ कहकर, यानी आदर-सूचक बहुवचन से! जन्ह उसने अ त थ माना है, उन्ह वह ‘तुम’ नह , ‘आप’
कहती है। पूरा उपदे श इस एक शब्द म उतर आया है।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण-संकेतः: ‘रा धके !’ इ त आकारान्त-स्त्री लङ्गस्य सम्बोधन-एकवचनम् (रा धका → हे रा धके !) ।
‘करणीया’ इ त अनीयर्-प्रत्ययान्तं कृत्य-रूपम् (= करनी चा हए) — कम ण प्रयोगः, अतः ‘सेवा’ (स्त्री लङ्गम्) के
अनुसार ‘करणीया’ । ‘ चन्तयतु, करोतु, वदन्तु’ इ त लोट् -लकारः आदराथ । ‘कण्ठं प रतः’ — ‘प रतः’ इ त
अव्ययस्य योगे तीया वभ क्तः भव त ।

प्र.3 अस्तु, करो म । कन्तु कमथम् ? (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 99)

यह रा धका का प्रश्न है — ‘सेवा तो कर दूँ गी, पर करूँ क्य ?’ पतामही का उत्तर ही पाठ का सार है।
संस्कृतेन उत्तरम् — ‘अ त थदे वो भव’ इ त उप नषदः वचनम् । अथात् अ त थः अस्माकं दे वः अ स्त इ त चन्तनीयम् ।
अतः तस्य आदरेण सेवा करणीया । ( हन्द : ‘अ त थदे वो भव’ उप नषद् का वचन है। अथात् यह सोचना चा हए क अ त थ हमारा
दे वता है। इसी लए उसक आदर के साथ सेवा करनी चा हए।)

रा धका का ‘ कमथम् ?’ पूछना ग़लत नह , अच्छा है: वह आज्ञा मान भी रही है (‘अस्तु, करो म’) और कारण भी
जानना चाहती है। पतामही डाँटती नह — कारण बता दे ती ह। जो काम कारण समझकर कया जाए, वही आदत
बनता है — इसी लए रा धका दन भर वही वाक्य दोहराती रह जाती है।

व्याकरण-संकेतः: ‘ कमथम्’ = क न मत्तम् = कस लए, क्य — यह अव्ययपदम् है, इसके रूप कभी नह
बदलते । ‘अस्तु’ इ त ‘अस्’ धातोः लोट् -लकारे प्रथमपुरुषे एकवचनम् (= हो जाए, ठ क है) ।

प्र.4 जान न्त कम् ‘अ त थदे वो भव’ ? भवन्तः अ प वदन्तु – ‘अ त थदे वो भव’ । (पाठ्य-प्रश्नः, पृष्ठ 99)

यह प्रश्न रा धका शावक से पूछती है — और सचमुच पुस्तक के पाठक से भी।
संस्कृतेन उत्तरम् — आम्, वयं जानीमः । ‘अ त थदे वो भव’ इत्यस्य अथः — अ त थः दे वः इ त मत्वा तस्य आदरेण सेवां
कुरु । ( हन्द : हाँ, हम जानते ह। ‘अ त थदे वो भव’ का अथ है — अ त थ को दे वता मानकर आदरपूवक उसक सेवा करो।)

व्याकरण-संकेतः — ‘भवन्तः’ बहुत काम का शब्द है: ‘भवत्’ शब्द आदराथक (आप) है और क्रया सदा
प्रथमपुरुष म लगती है, मध्यमपुरुष म नह । इसी लए ‘भवन्तः वद न्त’ (आप कहते ह), ‘भवन्तः जान न्त कम् ?’
(क्या आप जानते ह ?) । एकवचने ‘भवान् वद त’ (पुं.), ‘भवती वद त’ (स्त्री.) ।

Try This: इसी साँचे से अपने वाक्य बनाइए — भवन्तः अ प पठन्तु । (आप भी प ढ़ए।) भवान् अत्र उप वशतु
। (आप यहाँ बै ठए।) भवती क जाना त ? (आप क्या जानती ह ?)

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 100
पाठस्य शब्दाः, तेषां संस्कृत-अथः, हन्द तथा English

शब्दाथाः

प्र.1 शब्दः / अथः / हन्द / English — कूदमाना, नूतनाः, म लत्वा, अहोरात्रम्, छ ाः उप र, शावकाः, मन्दं मन्दम्,
पृष्ठतः, कायकलापान्, दृष्ट् वा, एतादृशाः, ापयन्ती, कमथम्, आ दनम्, वारं वारम् ।

पुस्तक क पूरी शब्द-ता लका, साथ म यह भी क शब्द पाठ म कहाँ आया है।

शब्दः अथः (संस्कृते) हन्द ENGLISH

कू द माना उच्छलनं कुवती कू दती हुई Jumping (Female)

नूतनाः नवीनाः नये New

िमिल त्वा स म्मल्य िमलकर Together

अहोरात्रम् अह नशम् िदन-रात Day and night

छ ाः उपिर गृहस्य उप रतने भागे छत के ऊपर On the roof

शावकाः माजारस्य शशवः िबल्ली के बच्चे Kitten

म न्दं म न्दम् शनैः शनैः धीरे -धीरे Slowly

पष्ृ ठतः पृष्ठभागतः पीछे -पीछे From the back

कायकलापान् ग त वधीन् गितिविधयों को Activities

दृ ष्ट् वा अवलोक्य दे खकर Having Seen

एतादृ शाः एतैः समानाः इस तरह के Like these

स्थापयन्ती स्थापनं कुवती डालती हईु Putting

िकमथम् क न मत्तम् क्यों / िकसिलए Why

आिदनम् सम्पूण दनम् िदन भर Whole day

वारं वारम् पुनः पुनः बार -बार Again and again

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

ता लका म एक छपा हुआ पैटन है: पन्द्रह म से आठ शब्द अव्यय ह — म लत्वा, अहोरात्रम्, उप र, मन्दं मन्दम्,
पृष्ठतः, दृष्ट् वा, कमथम्, आ दनम्, वारं वारम्। यही इस पाठ का व्याकरण- वषय है। दो शब्द ‘कूदमाना’ और
‘स्थापयन्ती’ स्त्री लङ्ग के कृदन्त रूप (शानच्/शतृ) ह — दोन रा धका के लए ही आए ह।

Tip — दो जोड़े याद र खए: ‘मन्दं मन्दम्’ और ‘वारं वारम्’ म एक ही शब्द दो बार आया है। संस्कृत म इसे
द्वरु क्त कहते ह और इससे ‘लगातार / धीरे-धीरे / बार-बार’ का भाव बनता है — जैसे ‘शनैः शनैः’, ‘पुनः पुनः’।

प्र.2 मातृभाषया अथ लखन्तु (शब्दाथ-ता लकायाः अ न्तमः स्त ः, पृष्ठ 100)

ता लका का पाँचवाँ खाना ख़ाली छोड़ा गया है — उसम आपको अपनी मातृभाषा म अथ लखना है। यह हर वद्याथ का अपना
उत्तर होगा।
कैसे भर: पहले संस्कृत शब्द को पाठ म उसी वाक्य म प ढ़ए, फर हन्द अथ दे खए, और तब अपनी भाषा का सबसे स्वाभा वक
शब्द ल खए — शब्दकोश वाला क ठन शब्द नह , घर म बोला जाने वाला शब्द।
नमूना उत्तर (मराठ तथा गुजराती भाषासु) —

शब्दः हन्द मराठ गुजराती

कू दमाना कूदती हुई उड ा मारत કૂ દતી

नूतनाः नये नवीन નવા

शावकाः बल्ली के ब े मांजरीची िपल्ले બલાડીનાં બ ચાં
ચ્

मन्दं मन्दम् धीरे-धीरे हळू हळू ધીમે ધીમે

वारं वारम् बार-बार पुन्हा पुन्हा વારંવાર

यह खाना क्य दया गया है ? क्य क संस्कृत के अ धकांश शब्द भारत क सभी भाषाओं म कसी न कसी रूप म
मौजूद ह। ‘नूतन’ मराठ -गुजराती-बाङ् ला तीन म लगभग वैसा ही है; ‘वारं वारम्’ से गुजराती का ‘વારંવાર’ बना है।
अपनी भाषा म अथ लखते ही संस्कृत वदे शी नह , अपनी लगने लगती है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 100

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव
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प्रश्नः १ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु
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अभ्यासः

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a s emल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) रा धका कथं चल त स्म ? (ख) गृहे क त अ तथयः
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अधो
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स न्त ? (ग) कां दृष्ट् वा शावकाः भीताः न भव न्त ? (घ) माजायाः क त शावकाः ? (ङ) रा धका माजाय क ददा त

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? (च) चत्रवणः कः अ स्त ?

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g शब्द। और वह शब्द उसी वभ क्त-वचन म होगा जो प्रश्न माँग रहा है।
‘एकपदे न’ का अथ है — पूरा वाक्य नह , केवलaएक

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प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द वभ क्तः / वचनम्

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(क) रािधका कथं चलित स्म ? कू द माना कूदती हुई
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प्रथमा, एकवचनम्, स्त्री लङ्गम्

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g l a(ख) ग ृहे कित अितथयः सिन्त ? पञ्च पाँच सङ् ख्यावाचकम्, बहुवचनम्
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(ग) कां दृ ष्ट् वा शावकाः भीताः न भविन्त ? रािधकाम् रा धका को तीया, एकवचनम्

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(घ) माज य ः कित शावकाः ? चत्वारः चार प्रथमा, बहुवचनम्, पुं लङ्गम्

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gक्षीरम्
(ङ) रािधका माज य िकं ददाित ?
a दूध तीया, एकवचनम्, नपुंसक लङ्गम्

(च) िचत्रवणः कः अिस्त ? शबलः शबल (एक शावक)
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प्रथमा, एकवचनम्, पुं लङ्गम्

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eतोmउत्तर तीया म — ‘रा धकाम्’ (‘रा धका’ लखना ग़लत होगा)। ‘ कम् ?’ यहाँ कम पूछ रहा है, इस लए ‘क्षीरम्’।
प्रश्न का शब्द ही उत्तर क वभ क्त बता दे ता है: ‘कः ?’ पूछा है तो उत्तर प्रथमा म — ‘शबलः’। ‘काम् ?’ पूछा है

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a gl यही संस्कृत म उत्तर मलाने का सबसे भरोसेमन्द तरीका है।
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Check it yourself: (घ) म ‘चत्वा र’ लखना
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र’e(जैसे — चत्वा र फला न) और स्त्री लङ्ग म ‘चत ः’ (जैसे — चत ः
ग़लत होगा — ‘शावकाः’ पुं लङ्ग है, अतः ‘चतुर्’ का पुं लङ्ग रूप
चत्वारः चा हए। नपुंसक लङ्ग म ‘चत्वाas
बा लकाः) होता है। ag l

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om कुमः — पृष्ठ 101
वयम् cअभ्यासं
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्नाः २–४ : पूणवाक्येन उत्तरा ण, प्रश्न-सूचक-वाक्या न तथा उत्पी ठका- चत्रम्

अभ्यासः

प्र.2 अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखन्तु — (क) माजारीशावकानां नामा न का न ? (ख) रा धका
माजारीशावकान् क पाठय त ? (ग) व शष्टाः अ तथयः के ? (घ) पतामही रा धकां क वद त ? (ङ) माजारी कदा
रा धकायाः पृष्ठतः आगच्छ त ? (च) माजायाः शावकाः क दृशाः स न्त ?

यहाँ पूरा वाक्य चा हए — कता, कम और क्रया तीन के साथ। प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म लौटा दे ना सबसे सुर क्षत तरीका है।
(क) — माजारीशावकानां नामा न तन्वी, मृद्व , शबलः, भीमः च स न्त । ( हन्द : बल्ली के ब के नाम तन्वी, मृ , शबल
और भीम ह।) — ये नाम रा धका ने स्वयं सोचे थे: ‘सा तु तेषां नामा न अ प च न्ततवती’।
(ख) — रा धका माजारीशावकान् ‘अ त थदे वो भव’ इ त पाठय त । ( हन्द : रा धका बल्ली के ब को ‘अ त थदे वो भव’
पढ़ाती है।) — पाठ क अ न्तम पं क्त यही है: ‘भवन्तः अ प वदन्तु – अ त थदे वो भव’।
(ग) — का चत् माजारी तस्याः चत्वारः शावकाः च रा धकायाः व शष्टाः अ तथयः स न्त । ते सव म लत्वा पञ्च स न्त ।
( हन्द : एक बल्ली और उसके चार ब े रा धका के वशेष अ त थ ह। वे सब मलाकर पाँच ह।)
(घ) — पतामही रा धकां वद त — ‘अ त थदे वो भव’ । अथात् अ त थः अस्माकं दे वः अ स्त इ त चन्तयतु, तस्य आदरेण
सेवां करोतु । ( हन्द : दाद रा धका से कहती ह — ‘अ त थदे वो भव’। अथात् यह सोचो क अ त थ हमारा दे वता है, और आदर के
साथ उसक सेवा करो।)
(ङ) — यदा रा धका शावकानां समीपं गच्छ त, तदा माजारी मन्दं मन्दं रा धकायाः पृष्ठतः आगच्छ त । ( हन्द : जब रा धका
ब के पास जाती है, तब बल्ली धीरे-धीरे रा धका के पीछे -पीछे आ जाती है।)
(च) — तन्वी आकृत्या सुन्दरी अ स्त, मृद्व स्पशन अतीव कोमला अ स्त, शबलः चत्रवणः अ स्त, भीमः च क ञ्चत् ूलः
अ स्त । ( हन्द : तन्वी रूप से सुन्दर है, मृ छू ने म बहुत कोमल है, शबल रंग- बरंगा है और भीम कुछ मोटा है।)

(ङ) का ‘कदा’ ‘यदा-तदा’ से जुड़ता है: जब प्रश्न म कदा (कब) हो, तो उत्तर म यदा … तदा … का जोड़ा बहुत
सुन्दर बैठता है। संस्कृत म ऐसे जोड़े कई ह — यत्र-तत्र, यथा-तथा, यावत्-तावत्, यः-सः। एक आए तो दूसरा साथ
लाइए।

व्याकरण-संकेतः: ‘माजारीशावकानाम्’ इ त षष्ठी बहुवचनम् । ‘शावकान्’ इ त तीया बहुवचनम् — ‘पाठय त’
( सखाना) कमक क्रया है, अतः ‘शावकान्’ और ‘अ त थदे वो भव इ त’ दोन कम ह । ‘क दृशाः’ इ त प्रश्नवाचकं
वशेषणम्, पुं लङ्गे प्रथमा बहुवचनम् — तस्य उत्तरम् अ प वशेषणैः एव दे यम् (सुन्दरी, कोमला, चत्रवणः, स्थूलः) ।

प्र.3 अधो ल खतानां वाक्यानां प्रश्न-सूचक-वाक्या न लखन्तु — यथा – लेखनी अत्र अ स्त । → लेखनी कुत्र अ स्त ?
(क) वृक्षः तत्र अ स्त । (ख) दे वालयः अन्यत्र अ स्त । (ग) वायुः सवत्र अ स्त । (घ) बालकाः एकत्र तष्ठ न्त । (ङ)
माता अत्र अ स्त ।

नयम एक ही है — वाक्य म जो ानवाचक अव्यय (अत्र / तत्र / अन्यत्र / सवत्र / एकत्र) है, उसे हटाकर उसक जगह कुत्र रख
द जए और अन्त म प्रश्न चह्न लगा द जए। बाक़ वाक्य ज्य का त्य रहेगा।

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वाक्यम् प्रश्न-सूचक-वाक्यम् हन्द

यथा – ले खनी अत्र अिस्त । ले खनी कु त्र अिस्त ? कलम कहाँ है ?

(क) वृक्षः तत्र अिस्त । वृक्षः कु त्र अिस्त ? पेड़ कहाँ है ?

(ख) दे वालयः अन्यत्र अिस्त । दे वालयः कु त्र अिस्त ? म न्दर कहाँ है ?

(ग) वायुः सवत्र अिस्त । वायुः कु त्र अिस्त ? हवा कहाँ है ?

(घ) बालकाः एक त्र ितष्ठिन्त । बालकाः कु त्र ितष्ठिन्त ? बालक कहाँ ठहरे ह ?

(ङ) माता अत्र अिस्त । माता कु त्र अिस्त ? माँ कहाँ है ?

ध्यान द जए — क्रया नह बदलती: (घ) म ‘ तष्ठ न्त’ ही रहेगा, ‘अ स्त’ नह । बहुत वद्याथ हर प्रश्न के अन्त म
‘अ स्त ?’ लगा दे ते ह — यह ग़लत है। प्रश्नवाचक वाक्य बनाते समय केवल एक पद बदलता है, कता और क्रया
वही रहते ह।

व्याकरण-संकेतः: अत्र, तत्र, कुत्र, सवत्र, अन्यत्र, एकत्र — इन सबम ‘त्र’ प्रत्यय लगा है, जो ‘…स्थान म’ का अथ
दे ता है (सप्तमी वभ क्त का काम करता है)। इदम् → अत्र, तद् → तत्र, कम् → कुत्र, सव → सवत्र, अन्य →
अन्यत्र, एक → एकत्र । ये सब अव्यय ह, इस लए इनके रूप कभी नह बदलते।

प्र.4 उत्पी ठकायां कम् अ स्त ? क ना स्त ? इ त चत्रं दृष्ट् वा लखन्तु — (सूचकपदा न — पुस्तकम्, घट , लेखनी,
चषकः, कूपी, स्यूतः, सङ्गणकम्, वृक्षः, फलम्, कन्दुकः) यथा – उत्पी ठकायां पुस्तकम् अ स्त । उत्पी ठकायां घट
ना स्त ।

पुस्तक के चत्र म एक लकड़ी क मेज़ (उत्पी ठका) है। उस पर दखाई दे ते ह — पानी क बोतल, कम्प्यूटर (मॉ नटर, क बोड,
माउस), हरा थैला, लाल गद और एक नीली कताब। दए गए दस शब्द म से पाँच चत्र म ह और पाँच नह ह।

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सूचकपदम् हन्द चत्रे ? वाक्यम्

पुस्तकम् कताब अ स्त ✓ उ त्पीिठकायां पुस्तकम् अिस्त । (यथा)

कू पी बोतल अ स्त ✓ उ त्पीिठकायां कू पी अिस्त ।

स्यूतः थैला अ स्त ✓ उ त्पीिठकायां स्यूतः अिस्त ।

सङ् गणकम् कम्प्यूटर अ स्त ✓ उ त्पीिठकायां सङ् गणकम् अिस्त ।

कन्दुक ः गद अ स्त ✓ उ त्पीिठकायां क न्दुक ः अिस्त ।

घटी घड़ी ना स्त ✗ उ त्पीिठकायां घटी नािस्त । (यथा)

ले खनी कलम ना स्त ✗ उ त्पीिठकायां ले खनी नािस्त ।

चषकः गलास / प्याला ना स्त ✗ उ त्पीिठकायां चषकः नािस्त ।

वृक्षः पेड़ ना स्त ✗ उ त्पीिठकायां वृक्षः नािस्त ।

फलम् फल ना स्त ✗ उ त्पीिठकायां फलं नािस्त ।

‘उत्पी ठकायाम्’ सप्तमी वभ क्त है: उत्पी ठका (मेज़) + सप्तमी एकवचन = उत्पी ठकायाम् — अथात् ‘मेज़
पर’। जहाँ कोई वस्तु हो, वह स्थान संस्कृत म सदा सप्तमी म आता है — जैसे ‘गृहे’, ‘ वद्यालये’, ‘वने’। ‘अ स्त’ का
नषेध ‘न + अ स्त’ = ना स्त बनता है।

Tip — ‘फलम् ना स्त’ नह , ‘फलं ना स्त’: पदान्त का म् य द कसी व्यञ्जन से पहले आए तो वह अनुस्वार (◌ं)
बन जाता है। इसी लए ‘फलम् + ना स्त’ = फलं ना स्त, पर ‘पुस्तकम् + अ स्त’ = पुस्तकम् अ स्त (आगे स्वर है,
अतः म् वैसा ही रहा)।

Try This: अब अपनी मेज़ का चत्र मन म लाइए और पाँच वाक्य ल खए — उत्पी ठकायां द पः अ स्त ।
उत्पी ठकायां जलपात्रम् अ स्त । उत्पी ठकायां दूरवाणी ना स्त । — इसी साँचे से जतने चाह वाक्य बनते
जाएँगे।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 102

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प्रश्नाः ५–७ : ‘कुत्र ?’ रेखा चत्रम्, भोजनशाला तथा अव्ययपद-चयनम्

अभ्यासः

प्र.5 रेखा चत्रं दृष्ट् वा उदाहरणानुसारं वाक्या न लखन्तु — यथा — माजारः कुत्र अ स्त ? माजारः अत्र अ स्त । सेवकः
कुत्र अ स्त ? सेवकः तत्र अ स्त । [रेखा चत्रे केन्द्रे ‘कुत्र ?’ इ त, चतुषु कोष्ठकेषु — अत्र : छात्रः, माजारः, काकः,
द पकः, घटः, सुधाखण्डः, शक्षकः, बा लका, लेखनी, माला । तत्र : सेवकः, व ालयः, गायकः, घट , फलम्,
गृहम्, वा टका, ह रणः, अजः, मूषकः । सवत्र : प्रकाशः, परमेश्वरः, ानम्, आकाशः, अणवः, प्रकृ तः, पुष्पा ण,
वायुः, प्रेम । अन्यत्र : बालकः, मयूरः, मत्रम्, पुत्रः, म हला, से वका, चटका, दोला ।]

बीच म ‘कुत्र ?’ लखा है और चार ओर चार डब्बे — अत्र, तत्र, सवत्र, अन्यत्र। हर डब्बे के शब्द से उसी अव्यय का जोड़ा बनाना
है। नीचे चार डब्ब के सब शब्द के वाक्य दए ह।
(१) ‘अत्र’ (यहाँ) — दश शब्दाः

प्रश्नः उत्तरम् हन्द

छात्रः कु त्र अिस्त ? छात्रः अत्र अिस्त । छात्र यहाँ है।

माज रः कु त्र अिस्त ? माज रः अत्र अिस्त । (यथा) बल्ला यहाँ है।

काकः कु त्र अिस्त ? काकः अत्र अिस्त । कौआ यहाँ है।

दीपकः कु त्र अिस्त ? दीपकः अत्र अिस्त । द पक यहाँ है।

घटः कु त्र अिस्त ? घटः अत्र अिस्त । घड़ा यहाँ है।

सुध ाखण्डः कु त्र अिस्त ? सुध ाखण्डः अत्र अिस्त । चॉक यहाँ है।

िशक्षकः कु त्र अिस्त ? िशक्षकः अत्र अिस्त । शक्षक यहाँ ह।

बािलका कु त्र अिस्त ? बािलका अत्र अिस्त । लड़क यहाँ है।

ले खनी कु त्र अिस्त ? ले खनी अत्र अिस्त । कलम यहाँ है।

माला कु त्र अिस्त ? माला अत्र अिस्त । माला यहाँ है।

(२) ‘तत्र’ (वहाँ) — दश शब्दाः

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव
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प्रश्नः उत्तरम् हन्द

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से वकः कु त्र अिस्त ?
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से वकः तत्र अिस्त । (यथा)
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सेवक वहाँ है।

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g l a िव ालयः तत्र अिस्त । वद्यालय वहाँ है।
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िव ालयः कु त्र अिस्त ?

गायकः कु त्र अिस्त ? गायकः तत्र अिस्त । गायक वहाँ है।

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घटी कु त्र अिस्त ? घटी तत्र अिस्त । घड़ी वहाँ है।

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फलं कु त्र अिस्त ?
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ग ृहं कु त्र अिस्त ? गृहं तत्र अिस्त । घर वहाँ है।

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वािटका कु त्र अिस्त ? वािटका तत्र अिस्त । बगीचा वहाँ

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हिरणः कु त्र अिस्त ? हिरणः तत्र अिस्त । हरन वहाँ है।

aglअजः कु त्र अिस्त ? अजः तत्र अिस्त । बकरा वहाँ है।

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मूषकः कु त्र अिस्त ? मूषकः तत्र अिस्त । चूहा वहाँ है।

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(३) ‘सवत्र’ (सब जगह) — नव शब्दाः

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प्रश्नः उत्तरम् हन्द

प्रकाश e
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पकाशः कु त्र अिस्त ? पकाशः सवत्र अिस्त । सब

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परमेश्वरः सवत्र अिस्त । श्वर सब जगह है।

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परमे श्वरः कु त्र अिस्त ?

ानं सवत्र अिस्त ।
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ानं कु त्र अिस्त ? ज्ञान सब जगह है।

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आकाशः कु त्र अिस्त ?
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आकाशः सवत्र अिस्त । आकाश सब जगह है।
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asअणवः सवत्र सिन्त ।
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अणवः कु त्र सिन्त ? परमाणु सब जगह ह।

पकृ ितः कु त्र अिस्त ? पकृ ितः सवत्र अिस्त । प्रकृ त सब जगह है।

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पुष्पािण कु त्र सिन्त ? पुष्पािण सवत्र सिन्त । फूल सब जगह ह।

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वायुः सवत्र अिस्त ।

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agl पेम कु त्र अिस्त ? पेम सवत्र अिस्त । प्रेम सब जगह है।
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(४) ‘अन्यत्र’ (और कह ) — अष्ट शब्दाः

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प्रश्नः उत्तरम् हन्द

बालकः कु त्र अिस्त ? बालकः अन्यत्र अिस्त । बालक कह और है।

मयूर ः कु त्र अिस्त ? मयूर ः अन्यत्र अिस्त । मोर कह और है।

िमत्रं कु त्र अिस्त ? िम त्रम् अन्यत्र अिस्त । मत्र कह और है।

पुत्र ः कु त्र अिस्त ? पुत्रः अन्यत्र अिस्त । पुत्र कह और है।

मिहला कु त्र अिस्त ? मिहला अन्यत्र अिस्त । म हला कह और है।

से िवका कु त्र अिस्त ? से िवका अन्यत्र अिस्त । से वका कह और है।

चटका कु त्र अिस्त ? चटका अन्यत्र अिस्त । गौरैया कह और है।

दोला कु त्र अिस्त ? दोला अन्यत्र अिस्त । झूला कह और है।

‘सवत्र’ वाले डब्बे को ध्यान से दे खए: उसम कोई ऐसी वस्तु नह जसे उँ गली से छू कर दखाया जा सके —
प्रकाश, परमेश्वर, ज्ञान, आकाश, अणु, प्रकृ त, वायु, प्रेम। ये सब हर जगह मौजूद ह, इसी लए इनके लए ‘अत्र’ या
‘तत्र’ नह , ‘सवत्र’ ही सही बैठता है। डब्ब का बँटवारा मनमाना नह — अथ के अनुसार है।

व्याकरण-संकेतः — क्रया वचन से मलेगी: ‘अणवः’ और ‘पुष्पा ण’ बहुवचन ह, अतः इनके साथ ‘अ स्त’ नह ,
‘स न्त’ आएगा — और प्रश्न भी ‘कुत्र स न्त ?’ बनेगा। ‘प्रेम’ (प्रेमन्, नपुंसक लङ्गम्) का प्रथमा एकवचन ‘प्रेम’ ही है,
इस लए ‘प्रेम सवत्र अ स्त’ ।

प्र.6 भोजनशालायां क कम् अ स्त ? इ त पञ्च भः वाक्यैः लखन्तु — यथा – भोजनशालायां पाचकः अ स्त ।
(सूचकपदा न – पाचकः, पात्रम्, तण्डु लाः, शाका न, अ ग्नः, जलम्)

‘भोजनशाला’ = रसोई-घर। दए गए सूचकपद से पाँच वाक्य बनाने ह। ध्यान र खए — एकवचन म ‘अ स्त’, बहुवचन म ‘स न्त’।

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सूचकपदम् वचनम् वाक्यम् हन्द

पाचकः एकवचनम् भोजनशालायां पाचकः अिस्त । (यथा) रसोई म रसोइया है।

पात्रम् एकवचनम् भोजनशालायां पात्रम् अिस्त । रसोई म बतन है।

तण्डुल ाः बहुवचनम् भोजनशालायां तण्डुल ाः सिन्त । रसोई म चावल ह।

शाकािन बहुवचनम् भोजनशालायां शाकािन सिन्त । रसोई म स ब्ज़याँ ह।

अि नः एकवचनम् भोजनशालायाम् अि नः अिस्त । रसोई म आग है।

जलम् एकवचनम् भोजनशालायां जलम् अिस्त । रसोई म पानी है।

‘भोजनशालायाम् अ ग्नः’ म अनुस्वार क्य नह लगा ? क्य क आगे ‘अ’ है — स्वर। पदान्त का म् केवल
व्यञ्जन से पहले अनुस्वार बनता है। इसी लए ‘भोजनशालायां जलम्’ (ज् व्यञ्जन) पर ‘भोजनशालायाम् अ नः’ (अ
स्वर)। यही नयम प्रश्न ४ म भी लगा था।

Try This: उसी तरह अपने घर क रसोई के पाँच और वाक्य बनाइए — भोजनशालायां लवणम् अ स्त ।
भोजनशालायां दुग्धम् अ स्त । भोजनशालायां चमसाः स न्त । (चमसः = चम्मच) — बस सप्तमी
‘भोजनशालायाम्’ को स्थर र खए और वस्तु का नाम बदलते जाइए।

प्र.7 अधो ल खतेभ्यः वाक्येभ्यः अव्ययपदा न चत्वा लखन्तु — (क) अ मतः गृहात् ब हः गच्छ त । (ख) एकः वानरः
वृक्षस्य उप र तष्ठ त । (ग) सः फला न अधः क्षप त । (घ) तत्र एकः बडालः अ स्त । (ङ) बडालः गृहस्य अन्तः
प्र वश त ।

अव्यय पहचानने क सबसे आसान कसौट — जस शब्द का रूप कभी नह बदलता, वही अव्यय है। नीचे हर वाक्य का अव्यय
और उसका अथ दया है।

वाक्यम् अव्ययपदम् अथः हन्द

(क) अिमतः ग ृहात् बिहः गच्छित । बिहः ब हभागे बाहर

(ख) एकः वानरः वृक्षस्य उपिर ितष्ठित । उपिर उप रतने भागे ऊपर

(ग) सः फलािन अधः िक्षपित । अधः अधोभागे नीचे

(घ) तत्र एकः िबडालः अिस्त । तत्र त स्मन् स्थाने वहाँ

(ङ) िबडालः ग ृहस्य अन्तः पिवशित । अन्तः अभ्यन्तरे अन्दर

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पाँच वाक्य मलकर एक छोट कहानी बनाते ह: अ मत घर से बाहर जाता है → एक बन्दर पेड़ के ऊपर बैठा है
→ वह फल नीचे फकता है → वहाँ एक बल्ला है → बल्ला घर के अन्दर घुस जाता है। पाँच अव्यय, पाँच दशाएँ
— और एक पूरा दृश्य!

व्याकरण-संकेतः — अव्यय के साथ वभ क्त: ‘उप र’ और ‘अन्तः’ के योग म जसका ऊपर/अन्दर हो, वह पद
षष्ठी वभ क्त म आता है — ‘वृक्षस्य उप र’, ‘गृहस्य अन्तः’। परन्तु ‘ब हः’ के साथ यहाँ पञ्चमी है — ‘गृहात् ब हः’
(घर से बाहर), क्य क नकलने का भाव है।

Check it yourself: (घ) म कुछ वद्याथ ‘एकः’ को भी अव्यय मान लेते ह — यह ग़लत है। ‘एकः’
सङ् ख्यावाचक वशेषण है और इसके रूप बदलते ह (एकः, एका, एकम्, एकस्य…)। ‘तत्र’ का कोई दूसरा रूप नह
होता — इसी लए वही अव्यय है।

वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 103
प्रश्नः ८ : उदाहरणानुसारं कः कुत्र अ स्त ? कुत्र ना स्त ?

अभ्यासः

प्र.8 उदाहरणानुसारं कः कुत्र अ स्त ? कुत्र ना स्त ? इ त लखन्तु । — सहः / वने / कायालये → सहः वने अ स्त ।
कायालये ना स्त । छात्रः / आकाशे / व ालये → छात्रः आकाशे ना स्त । छात्रः व ालये अ स्त । शेषाः —
मत्स्यः / समुद्रे / वृक्षे ; मधुरता / मोदके / कषाये ; उष्णता / सूय / चन्द्रे ; वानरः / न ाम् / वृक्षे ; नौका / जले /
पवते ; अ ानम् / प ण्डते / मूख ; चन्द्रः / अमावस्यायाम् / पू णमायाम् ; अवकाशः / सोमवासरे / र ववासरे ।

ता लका म हर पं क्त म एक कता और दो स्थान ह। सोचना यह है क वह वस्तु कस ान म सचमुच होती है और कसम नह ।
पुस्तक ने पहली दो पं क्तयाँ भर द ह — ध्यान द जए, दूसरी पं क्त म क्रम उलटा है, क्य क छात्र आकाश म नह होता।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

कः / का / कम् ानम् १ ानम् २ वाक्यद्वयम्

िसंहः वने कायालये िसंहः वने अिस्त । काय लये नािस्त । (यथा)

छात्रः आकाशे वद्यालये छात्रः आकाशे नािस्त । छात्रः िव ालये अिस्त । (यथा)

मत्स्यः समुद्रे वृक्षे म त्स्यः समुदे अिस्त । वृक्षे नािस्त ।

मध रु ता मोदके कषाये मध रु ता मोदके अिस्त । कषाये नािस्त ।

उष्णता सूय चन्द्रे उ ष्णता सूय अिस्त । चन्दे नािस्त ।

वानरः नद्याम् वृक्षे वानरः न ां नािस्त । वानरः वृक्षे अिस्त ।

नौका जले पवते नौका जले अिस्त । पवते नािस्त ।

अ ानम् प ण्डते मूख अ ानं पिण्डते नािस्त । अ ानं मूख अिस्त ।

चन्द ः अमावस्यायाम् पू णमायाम् चन्द ः अमावस्यायां नािस्त । चन्द ः पूिणमायाम् अिस्त ।

अवकाशः सोमवासरे र ववासरे अवकाशः सोमवासरे नािस्त । अवकाशः रिववासरे अिस्त ।

चार पं क्तय म क्रम उलटना पड़ा: ‘वानरः’, ‘अज्ञानम्’, ‘चन्द्रः’ और ‘अवकाशः’ — इनम पहला स्थान ग़लत है
और दूसरा सही। अभ्यास यही परखता है क आप दए गए क्रम को आँख मूँदकर तो नह भर रहे। बन्दर नद म नह ,
पेड़ पर रहता है; अज्ञान प ण्डत म नह , मूख म होता है।

दो पं क्तयाँ सोचने वाली ह: मधुरता मोदके अ स्त, कषाये ना स्त — ‘कषायः’ का अथ है कसैला रस/काढ़ा,
जसम मठास नह होती। चन्द्रः अमावस्यायां ना स्त — इसका अथ यह नह क चन्द्रमा मट गया; अमावस्या को
वह दखाई नह दे ता, क्य क उसका प्रका शत भाग पृथ्वी क ओर नह होता। संस्कृत वाक्य दखने क बात कह रहा
है।

व्याकरण-संकेतः: सब स्थानवाची पद सप्तमी वभ क्त (अ धकरणे) म ह — वने, कायालये, समुद्रे, मोदके, सूय,
जले, मूख, सोमवासरे (अकारान्त पुं./नपुं.); नद्याम्, अमावस्यायाम्, पू णमायाम् (ईकारान्त/आकारान्त स्त्री लङ्ग)।
ध्यान रहे — ‘नद्याम् + ना स्त’ = न ां ना स्त (म् → अनुस्वार), पर ‘पू णमायाम् + अ स्त’ = पू णमायाम् अ स्त ।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 103

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव
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गीतम् — ‘माजाल ! रे माजाल ! कुत्र गतोऽ स त्वम्’
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योग्यता वस्तरः

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a s emगीतं सवऽ प म लत्वा पठन्तु आलपन्तु च । — माजाल ! रे माजाल ! कुत्र गतोऽ स त्वम् । अत्रैवा स्म
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एतत्
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प्र.1
आगतोऽ स्म राजगृहादे वम् । माजाल ! रे माजाल ! क दृष्टं तत्र ? ताव घः मूषकपुत्रः न ह दृष्टोऽन्यत्र ।

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यह गीत बल्ले और कसी पूछने वाले के बीच का छोटा-सा संवाद है — दो प्रश्न, दो उत्तर। पहले स खोल ली जए, फर पूरा गीत
अपने आप खुल जाएगा। a
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स - वच्छे दः —

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गीते पदम् स - वच्छे दः स ेः स्वरूपम्

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aglअत्रैवािस्म
गतोऽिस गतः + अिस वसगस ः (अः + अ = ओऽ)

अत्र + एव + अिस्म वृ द्धस ः (अ + ए = ऐ); द घस ः (अ + अ = आ)

m ः (अः + अ = ओऽ) a s
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आगतोऽिस्म आगतः + अिस्म वसगस

a s emव्यञ्जनस ः (त् + ए = दे)
राजगृहादे वम् राजगृहात् + एवम्
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ताव ीघ ः तावत् + दीघ ः व्यञ्जनस ः (त् + द् = द्द)

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दृ ष्टोऽन्यत्र दृ ष्टः + अन्यत्र वसगस ः (अः + अ = ओऽ)

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अन्वयः

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रे माज ल ! माज ल ! त्वं कु त्र गतः अिस ?
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(अहम्) अत्र एव अिस्म, राजगृहात् एवम् आगतः

रे माज ल ! माज ल ! तत्र िकं दृ ष्टम्la?s
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तावत् दीघः मूषकपुत्रः अन्यत्र न िह दृ ष्टः ।

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हन्द अथः —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

संस्कृतम् हन्द अथः

माज ल ! रे माज ल ! कु त्र गतोऽिस त्वम् । िबल्ले ! ओ िबल्ले ! तू कहाँ गया था ?

अत्रैवािस्म आगतोऽिस्म राजगृहादे वम् । मैं तो यही ं हू ँ — अभी-अभी राजा के महल से ही आया हू।
ँ

माज ल ! रे माज ल ! िकं दृ ष्टं तत्र ? िबल्ले ! ओ िबल्ले ! वहाँ तूने क्या दे खा ?

ताव ीघ ः मूषकपुत्रः न िह दृ ष्टोऽन्यत्र । इतना ल म्बा चूहे का बच्चा ! वैस ा तो और कही ं दे खा ही नही ं।

भावः — गीत हँसी-मज़ाक का है। बल्ला राजमहल तक हो आया, पर वहाँ का वैभव, राजा, सहासन — कुछ भी उसे याद नह
रहा। याद रहा तो बस एक लम्बा-सा चूहा! भाव यह है क हर प्राणी संसार को अपनी ही रु च क आँख से दे खता है — बल्ले के
लए राजमहल क सबसे बड़ी बात वहाँ का चूहा ही है।

गीत को पाठ से जो ड़ए — यही इसका असली काम है: चार पं क्तय म इस पाठ के चार स्थानवाचक अव्यय आ
गए ह — कुत्र (कहाँ), अत्र (यहाँ), तत्र (वहाँ), अन्यत्र (और कह )। इसी लए पुस्तक कहती है ‘सव म लत्वा पठन्तु
आलपन्तु च’ — सब मलकर प ढ़ए और गाइए; तो ये चार अव्यय बना रटे याद हो जाएँगे।

Did you know? यह अंग्रेज़ी क प्र सद्ध बालक वता “Pussy cat, pussy cat, where have you been ?
— I’ve been to London to visit the Queen” का संस्कृत रूपान्तर है। ‘राजगृहम्’ = राजा का घर,
राजमहल; ‘मूषकपुत्रः’ = चूहे का ब ा। पाठ के चत्र म भी बा लका बल्ली को सहला रही है और पास ही एक चूहा
बैठा है।

व्याकरण-संकेतः: ‘माजाल !’, ‘रे माजाल !’ इ त सम्बोधन-प्रथमा एकवचनम् (माजालः → हे माजाल !) । ‘गतः
अ स’, ‘आगतः अ स्म’, ‘दृष्टः’ — एता न क्त-प्रत्ययान्ता न (भूतका लका न) वशेषणा न; ‘दृष्टम्’ इ त नपुंसक लङ्गे ,
यतः ‘ कम्’ नपुंसक लङ्गम् । ‘ ह’ इ त अव्ययम् — नश्चय-अथ (= ही, नश्चय ही) । ‘तावत्’ अ प अव्ययम् (= इतना)
।

योग्यता वस्तरः — अव्ययप रचयः — पृष्ठ 104
‘अत्र’ इत्यस्य प रशीलनम्, अव्ययलक्षणम् तथा अव्यययुक्ता न वाक्या न

योग्यता वस्तरः

प्र.2 पाठे ूलाक्षरैः ल खताः शब्दाः अव्ययपदा न स न्त । ‘अत्र’ इ त अव्ययं प रशीलयामः । — • अत्र बालकः अ स्त
। • अत्र बालकाः स न्त । (द्वयोः वाक्ययोः ‘अत्र’ इ त पदे वचनभेदः ना स्त) • अत्र गा यका गाय त । • अत्र गायकः
गाय त । (द्वयोः वाक्ययोः ‘अत्र’ इ त पदे लङ्गभेदः ना स्त) • अत्र सुधाखण्डेन लेखनं भव त । • अत्र गृहेषु स्वच्छता
भव त । (द्वयोः वाक्ययोः ‘अत्र’ इ त पदे वभ क्तभेदः ना स्त)

पुस्तक ने तीन जोड़े दए ह और हर जोड़े म एक ही बात बदली है — फर भी ‘अत्र’ ज्य का त्य रहा। यही अव्यय क पहचान है।

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वाक्य-युग्मम् क प रव ततम् ? ‘अत्र’ इ त पदे प रणामः

अत्र बालकः अिस्त । कता एकवचनात् बहुवचनं जातः (बालकः → बालकाः), क्रया अ प वचनभेद ः नािस्त — ‘अत्र’
अत्र बालकाः सिन्त । (अ स्त → स न्त) अपिरविततम्

अत्र गाियका गायित । कता स्त्री लङ्गात् पुं लङ्गं जातः (गा यका → गायकः) िलङ् गभेद ः नािस्त — ‘अत्र’
अत्र गायकः गायित । अपिरविततम्

अत्र सुध ाखण्डेन ले खनं वभ क्तः प रव तता — ‘सुधाखण्डेन’ (तृतीया) → ‘गृहेषु’ (सप्तमी) िवभिक्तभेद ः नािस्त — ‘अत्र’
भवित । अपिरविततम्
अत्र गृहेष ु स्वच्छता भवित ।

नष्कषः — अत्र (अव्ययम्) सवदा ‘अत्र’ एव तष्ठ त । ( हन्द : ‘अत्र’ हर हाल म ‘अत्र’ ही रहता है — न वचन से बदलता है, न
लङ्ग से, न वभ क्त से।)
पाठे ूलाक्षरैः (नीलाक्षरैः) ल खता न अव्ययपदा न —

अव्ययम् अथः पाठे वाक्यम्

एव ही रािधका … कू द माना एव चलित ।

यतः क्य क यतः गृहे नूतनाः अितथयः सिन्त ।

च और ते च िविशष्टाः सिन्त ।

तत्र / अत्र वहाँ / यहाँ ते तत्र पञ्च सिन्त । यदा ते अत्र आगच्छिन्त …

एक त्र एक ही जगह अहोरात्रं तस्याः िचन्ता एक त्र एव ।

उपिर ऊपर गृहस्य छ ाः उपिर ।

इित यह (उद्धरण-सूचक) के ते इित ? … भीमः च इित ।

न / आम् नह / हाँ ते न अन्ये । आम्, ते एव िविशष्टाः अितथयः ।

तु / अिप तो / भी सा तु तेषां नामािन अिप िचिन्ततवती ।

अतीव / िकिञ्चत् बहुत / थोड़ा म ृ ी … अतीव कोमला । भीमः िकिञ्चत् स्थूल ः ।

कदा / यदा / तदा कब / जब / तब माज री कदा गच्छित … यदा ते अत्र आगच्छिन्त तदा …

िक न्तु / चेत ् परन्तु / य द िक न्तु … रािधका गच्छित चेत ् …

म न्दं म न्दम् / पष्ृ ठतः धीरे-धीरे / पीछे -पीछे म न्दं म न्दं पष्ृ ठतः आगच्छित ।

पिरतः / इव चार ओर / क तरह क ण्ठं पिरतः मालाम् इव हस्तौ स्थापयन्ती ।

अनन्तरम् / वारं वारम् / आिदनम् उसके बाद / बार-बार / दन भर अनन्तरं सा … आिदनं म न्त्रम् इव वारं वारं वदित ।

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यह अभ्यास इतना क्य दोहराया गया ? क्य क संस्कृत म हर संज्ञा-सवनाम- वशेषण के 21 रूप (3 वचन × 7
वभ क्त) बनते ह और छात्र वही रटते-रटते थक जाते ह। अव्यय वह वग है जहाँ एक ही रूप याद कर लेना काफ़
है। इसी लए पुस्तक तीन तरह से — वचन, लङ्ग, वभ क्त — बदलकर दखाती है क ‘अत्र’ फर भी नह बदला।

Tip: ‘सुधाखण्डेन’ = चॉक से (तृतीया, करण), ‘गृहेषु’ = घर म (सप्तमी बहुवचन, अ धकरण)। इन दोन वाक्य
म वभ क्त बदली, इसी लए पुस्तक ने इन्ह को जोड़ा बनाया।

प्र.3 अव्ययलक्षणम् — सदृशं त्रषु लङ्गे षु सवासु च वभ क्तषु । वचनेषु च सवषु यन्न व्ये त तदव्ययम् ॥ (अव्ययपदे षु
वचनभेदः, वभ क्तभेदः लङ्गभेदः च न भव त । एता न अव्ययपदा न सवदा समानरूपेण वाक्ये भव न्त ।)

यह ोक अव्यय क प रभाषा है — और संस्कृत व्याकरण क सबसे प्र सद्ध पं क्तय म से एक।
स - वच्छे दः — ‘यन्न’ = यत् + न (व्यञ्जनस ः, त् + न = न्न) । ‘तदव्ययम्’ = तत् + अव्ययम् (त् + अ = द) ।
अन्वयः —

यत् ित्रषु िलङ् गेष,ु सव सु च िवभिक्तषु,

सवषु च वचने ष ु सदृ शं (भवित),

(यत्) न व्येित, तत् अव्ययम् (कथ्यते ) ।

हन्द अथः — जो शब्द तीन लङ्ग म (पुं लङ्ग, स्त्री लङ्ग, नपुंसक लङ्ग), सभी वभ क्तय म और सभी वचन म एक-सा ही रहता है,
अथात् जसम कोई प रवतन नह होता, उसे अव्यय कहते ह।
भावः — ‘अव्यय’ शब्द ही अपना अथ बता दे ता है — न व्ययः यस्य तत् अव्ययम्, जसका कभी ‘व्यय’ (क्षय, घटना-बढ़ना) न
हो। संसार म हर वस्तु बदलती है, पर व्याकरण म कुछ शब्द अटल ह। छात्र के लए यह बड़ी राहत क बात है — इन शब्द के रूप
याद नह करने पड़ते।

पदम् अथः

सदृ शम् समान, एक -जैस ा

ित्रषु िलङ् गेष ु तीनों िलङ् गों में (स प्तमी बहुवचनम्)

सव सु िवभिक्तषु सभी िवभिक्तयों में (स प्तमी बहुवचनम्, स्त्रीिलङ् गम्)

यत् न व्येित जो नष्ट/पिरवितत नही ं होता (िव + इण् धातुः)

तत् अव्ययम् वह अव्यय है

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तुलना से सम झए: ‘बालक’ शब्द के रूप बदलते ह — बालकः, बालकौ, बालकाः, बालकम्, बालकेन, बालकाय,
बालकात्, बालकस्य, बालके … कुल इक्क स। पर ‘अत्र’ का एक ही रूप है — अत्र। इसी प्रकार च, वा, तु, ह, एव,
अ प, इ त, अद्य, श्वः, ः, कुत्र, यत्र, सवत्र, उ ैः, शनैः, नमः, धक्, वना, सह — सब अव्यय ह।

Check it yourself: कसी शब्द के अव्यय होने क परीक्षा एक वाक्य म हो जाती है — उसे बहुवचन म
डालकर दे खए। ‘बालकः अत्र अ स्त’ → ‘बालकाः अत्र स न्त’। ‘बालकः’ बदला, ‘अ स्त’ बदला, पर ‘अत्र’ नह
बदला — अतः वही अव्यय है।

प्र.4 नम्न ल खता न वाक्या न सावधानं पठन्तु लखन्तु च । — • छात्रः अत्र अ स्त । • क्र डाङ्गणं तत्र अ स्त । • कन्दुकः
कुत्र अ स्त ? • नगरम् अन्यत्र अ स्त । • परमेश्वरः सवत्र अ स्त । • भोजनम् अत्र ना स्त ।

छह वाक्य ध्यान से पढ़कर लखने ह। हर वाक्य म एक ानवाचक अव्यय है — नीचे वही, उसका अथ और वाक्य का हन्द
अनुवाद।

वाक्यम् अव्ययम् हन्द अनुवादः

छात्रः अत्र अिस्त । अत्र (अिस्मन् स्थाने) छात्र यहाँ है।

ीडाङ् गणं तत्र अिस्त । तत्र (तिस्मन् स्थाने) खेल का मैदान वहाँ है।

कन्दुक ः कु त्र अिस्त ? कु त्र (किस्मन् स्थाने) गद कहाँ है ?

नगरम् अन्यत्र अिस्त । अन्यत्र (अन्यिस्मन् स्थाने) नगर कह और है।

परमेश्वरः सवत्र अिस्त । सवत्र (सवषु स्थानेष)ु परमेश्वर सब जगह है।

भोजनम् अत्र नािस्त । अत्र + न (िनषेधे ) भोजन यहाँ नह है।

पाँच अव्यय, एक ही साँचा: अत्र – तत्र – कुत्र – अन्यत्र – सवत्र, सबम ‘त्र’ प्रत्यय है, जो ‘…स्थान म’ का अथ दे ता
है। इदम् → अत्र, तद् → तत्र, कम् → कुत्र, अन्य → अन्यत्र, सव → सवत्र, एक → एकत्र, यद् → यत्र। एक बार
यह साँचा पकड़ लया तो सात शब्द एक साथ याद हो जाते ह।

Tip — लखते समय दो बात ध्यान र खए: (१) ‘क्र डाङ्गणम् + तत्र’ म म् से पहले व्यञ्जन ‘त्’ आया, अतः
क्र डाङ्गणं तत्र; पर ‘नगरम् + अन्यत्र’ म आगे स्वर है, अतः नगरम् अन्यत्र। (२) ‘न + अ स्त’ मलकर ना स्त बनता
है (द घस ः, अ + अ = आ)।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव
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Try This: इन्ह छह वाक्य को उलटकर प्रश्न बनाइए — छात्रः कुत्र अ स्त ? क्र डाङ्गणं कुत्र अ स्त ? नगरं कुत्र

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अ स्त ? परमेश्वरः कुत्र अ स्त ? — यही अभ्यास प्रश्न ३ (पृष्ठ 101) म भी माँगा गया था।

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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 105

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नामकरणस्य चन्तनम्, व ालयप रसरस्य वणनम् तथा ‘ बडालः कुत्र अ स्त ?’ इ त चत्रावली

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प रयोजनाकायम्
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प्र.1 पाठे माजारशावकानां नामा न पश्यन्तु । तेषां नामकरणे रा धकायाः क चन्तनम् आसीत् ? तदनुसारं स्वनामधेये

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कम् उ े श्यं स्यात् इ त वमश कुवन्तु ।

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a पाठ क एक ही पं क्त इसका प्रमाण है: ‘तन्वी आकृत्या सुन्दरी, मृ स्पशन अतीव कोमला । शबलः चत्रवणः तथा च भीमः
रा धका ने नाम य ही नह रख दए — उसने हर शावक को ध्यान से दे खा और जो गुण सबसे पहले दखा, वही नाम बना दया।

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क ञ्चत् स्थूलः ।’

a s emपाठे तस्य गुणः
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नाम शब्दस्य अथः अतः नाम कमथम् ?

तन्वी
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कृशा, सुन्दरी (तनु = पतला, सुडौल) आकृत्या सुन्दरी रूप-आकृ ित से सुन्दर थी, इसिलए ‘तन्वी’

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मृ ी
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छू ने में बहुत मुल ायम थी, इसिलए ‘म ृ ी’
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कोमला (मृदु = मुलायम) स्पशन अतीव कोमला

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.co चत्रवणः, कबुरः (रंग- बरंगा) a g
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शबलः चत्रवणः उसका रंग िचतकबरा था, इसिलए ‘शबलः’

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agl भीमः वशालः, स्थूलः (ह ा-क ा) क ञ्चत् स्थूलः वह कु छ मोटा-तगड़ ा था, इसिलए ‘भीमः’

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संस्कृतेन उत्तरम् — रा धका शावकानां गुणान् दृष्ट् वा तेषां नामा न अकरोत् । यस्य यः गुणः प्रधानः आसीत्, तदनुसारम् एव
के गुण.cदे खकर उनके नाम रखे। जसम जो गुण प्रमुख था, उसी के अनुसार उसका g l a
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तस्य नाम अभवत् । ( हन्द : रा धका ने ब

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नाम पड़ा।)

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यही भारतीय नामकरण क परम्परा है: संस्कृत म नाम प्रायः अथवान् होते ह — नाम सुनते ही व्य क्त का गुण,

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गोत्र, दे वता या जन्म-नक्षत्र पता चल जाता है। महाभारत का भीम भी बल के कारण ही ‘भीम’ कहलाया, और द्रौपद

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‘कृष्णा’ अपने वण के कारण। रा धका अनजाने म वही परम्परा नभा रही है।
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a s emअपने नाम पर वचार — नमूना उत्तर (जैसा कक्षा म सुनाया जा सकता है):
agl “मम नाम अनन्या । ‘अनन्या’ इत्यस्य अथः — ‘या अन्या न, अ तीया’ । मम पतरौ इच्छतः यत् अहं स्वकाय अ तीया भवेयम् ।
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s e m
m a
अतः मम नाम्नः उद्दे श्यम् अ स्त — स्वकम ण नष्ठा ।” ( हन्द : मेरा नाम अनन्या है। इसका अथ है — जो दूसरी जैसी न हो,

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अ तीय। मेरे माता- पता चाहते ह क म अपने काम म अ तीय बनूँ। इस लए मेरे नाम का उद्दे श्य है — अपने कम म नष्ठा।)
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

यह काय कैसे कर: (१) घर म पू छए क आपका नाम कसने और क्य रखा। (२) शब्दकोश या संस्कृत- शक्षक से
उसका मूल अथ जान ली जए। (३) दो-तीन वाक्य म ल खए — नाम, अथ, और वह गुण जो नाम आपसे चाहता
है। (४) कक्षा म संस्कृत म सुनाइए — ‘मम नाम … । अस्य अथः … । मम नाम्नः उद्दे श्यम् … ।’ इसी साँचे से हर
वद्याथ अपना उत्तर बना सकता है।

प्र.2 व ालयप रसरे कम् अ स्त, क ना स्त इ त लखन्तु कक्षायां च ावयन्तु ।

यह पूरा काय प्रश्न ४ (उत्पी ठका) और प्रश्न ८ (कः कुत्र अ स्त) का ही वस्तार है — बस अब स्थान आपका अपना वद्यालय है।
साँचा वही रहेगा:

िव ालयपिरसरे + वस्त ु (पथमा) + अिस्त / नािस्त ।

बहुवचने — िव ालयपिरसरे + वस्तूिन + सिन्त / न सिन्त ।

नमूना उत्तर — ‘अ स्त’ इ त वाक्या न:

व ालयप रसरे वशालं क्र डाङ्गणम् अ स्त । ( वद्यालय-प रसर म बड़ा खेल का मैदान है।)
व ालयप रसरे पुस्तकालयः अ स्त । (पुस्तकालय है।)
व ालयप रसरे बहवः वृक्षाः स न्त । (बहुत-से पेड़ ह।)
व ालयप रसरे लघु वा टका अ स्त । (छोट ब गया है।)
व ालयप रसरे जल नकायः (नलः) अ स्त । (पानी का नल है।)
व ालयप रसरे व ानप्रयोगशाला अ स्त । ( वज्ञान क प्रयोगशाला है।)

नमूना उत्तर — ‘ना स्त’ इ त वाक्या न:

व ालयप रसरे तरणतालः ना स्त । (तैरने का तालाब नह है।)
व ालयप रसरे चल त्रगृहं ना स्त । ( सनेमाघर नह है।)
व ालयप रसरे आपणः ना स्त । (दुकान नह है।)
व ालयप रसरे कोलाहलः ना स्त । (शोर-गुल नह है।)

अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए: (१) कम-से-कम पाँच ‘अ स्त’ और तीन ‘ना स्त’ वाक्य; (२) एकवचन-बहुवचन
का ध्यान — ‘वृक्षाः स न्त’, ‘वृक्षः अ स्त’ नह ; (३) जो सचमुच आपके वद्यालय म है वही ल खए — यह कल्पना
नह , नरीक्षण का काय है; (४) कक्षा म सुनाते समय ठहर-ठहरकर स्पष्ट उ ारण क जए।

व्याकरण-संकेतः: ‘ वद्यालयप रसरे’ इ त सप्तमी एकवचनम् (अ धकरणे — ‘…म’) । जस वस्तु के होने-न-होने
क बात है, वह प्रथमा वभ क्त म आएगी — ‘क्र डाङ्गणम्’, ‘पुस्तकालयः’, ‘वा टका’ । ‘न + अ स्त’ = ना स्त,
कन्तु बहुवचने ‘न स न्त’ अलग ही लखा जाता है (‘नस न्त’ नह ) ।

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प्र.3 बडालः कुत्र अ स्त ? — चत्रा ण दृष्ट् वा अव्ययपदा न अभ्यस्यन्तु । (उप र, अधः, कोणे, केन्द्रे , समीपे, दूरे, अन्तः,
ब हः, पुरतः, पृष्ठतः, द क्षणतः, वामतः)

पृष्ठ 105 पर बारह छोटे चत्र ह और हर चत्र के नीचे एक अव्यय। हर चत्र म एक ही बल्ला है — बस उसक जगह बदलती जाती
है। नीचे हर चत्र का वणन और उसका पूरा वाक्य दया है।

अव्ययम् हन्द चत्रे कम् दृश्यते ? वाक्यम्

उपिर ऊपर बल्ला मेज़ के ऊपर बैठा है िबडालः उ त्पीिठकायाः उपिर अिस्त ।

अधः नीचे बल्ला मेज़ के नीचे लेटा है िबडालः उ त्पीिठकायाः अधः अिस्त ।

कोणे कोने म बल्ला मेज़ के एक कोने पर बैठा है िबडालः उ त्पीिठकायाः कोणे अिस्त ।

के न्दे बीच म बल्ला गोल दरी के ठ क बीच म बैठा है िबडालः आस्तरणस्य के न्दे अिस्त ।

समीपे पास म बल्ला डब्बे के बलकुल पास बैठा है िबडालः म ञ्जूषायाः समीपे अिस्त ।

दू रे दूर बल्ला डब्बे से दूर बैठा है िबडालः म ञ्जूषायाः दू रे अिस्त ।

अन्तः अन्दर बल्ला डब्बे के भीतर बैठा है िबडालः म ञ्जूषायाः अन्तः अिस्त ।

बिहः बाहर बल्ला डब्बे से बाहर नकल रहा है िबडालः म ञ्जूषायाः बिहः अिस्त ।

पुर तः आगे गद पीछे है, बल्ला उसके आगे है िबडालः क न्दुक स्य पुर तः अिस्त ।

पष्ृ ठतः पीछे गद आगे है, बल्ला उसके पीछे है िबडालः क न्दुक स्य पष्ृ ठतः अिस्त ।

दिक्षणतः दा हनी ओर बालक बैठा है और बल्ला उसके दा हनी ओर है िबडालः बालक स्य दिक्षणतः अिस्त ।

वामतः बाईं ओर बालक बैठा है और बल्ला उसके बाईं ओर है िबडालः बालक स्य वामतः अिस्त ।

ये बारह शब्द जोड़ म याद क जए: उप र–अधः (ऊपर–नीचे), अन्तः–ब हः (अन्दर–बाहर), समीपे–दूरे (पास–
दूर), पुरतः–पृष्ठतः (आगे–पीछे ), द क्षणतः–वामतः (दाएँ–बाएँ), और कोणे–केन्द्रे (कोने म–बीच म)। वपरीत जोड़े
बनाकर याद करने से बारह शब्द छह म समट जाते ह।

व्याकरण-संकेतः — इनके साथ कौन-सी वभ क्त ? ‘उप र, अधः, अन्तः, समीपे, दूरे, पुरतः, पृष्ठतः, द क्षणतः,
वामतः’ के योग म जसका ऊपर/नीचे/पास हो वह पद षष्ठी वभ क्त म आता है — ‘उत्पी ठकाया◌ः उप र’,
‘कन्दुकस्य पुरतः’ । केवल ‘ब हः’ के साथ प्रायः पञ्चमी भी दखती है — ‘गृहात् ब हः’ (प्रश्न ७ का वाक्य) ।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

Tip: ‘कोणे, केन्द्रे , समीपे, दूरे’ मूलतः सप्तमी वभ क्त के रूप ह (कोणः → कोणे), अव्यय नह ; कन्तु ये सदा
इसी एक रूप म स्थान बताने के लए आते ह, इसी लए पुस्तक ने इन्ह भी इसी चत्रावली म रख दया है। परीक्षा म
य द ‘अव्ययपदं चनुत’ पूछा जाए तो उप र, अधः, अन्तः, ब हः, पुरतः, पृष्ठतः, द क्षणतः, वामतः — ये ही चु नए।

Try This: अपनी कक्षा म खड़े होकर पाँच वाक्य बो लए — अध्यापकः मम पुरतः अ स्त । मत्रं मम वामतः
अ स्त । कन्दुकः उत्पी ठकायाः अधः अ स्त । स्यूतः म ूषायाः अन्तः अ स्त । क्र डाङ्गणं व ालयस्य ब हः
अ स्त ।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का मूल वाक्य उप नषद् से आया है — ‘अ त थदे वो भव’ (तै त्तरीयोप नषद्, शक्षावल्ली)। अथ है — ‘अ त थ को
दे वता मानो’। पाठ-प्रवेश बताता है क भारतीय संस्कृ त म अ त थ-सेवा पञ्चमहायज्ञ म गनी जाती है, और यहाँ केवल मनुष्य
ही नह , अन्य प्राणी भी अ त थ के रूप म प्री त के पात्र होते ह।
कहानी बहुत सरल है। रा धका के घर क छत पर एक बल्ली और उसके चार ब े आ गए ह। रा धका उनके नाम रखती है
— तन्वी, मृद्व , शबलः, भीमः — और हर नाम उनके अपने गुण से जुड़ा है। वह बल्ली को दूध दे ती है, शावक के पास जाती
है, और शावक उससे डरते नह ।
पतामही का उपदे श ही पाठ का केन्द्र है। वे कहती ह — ‘अ तथयः कदा आगच्छ न्त इ त न जानीमः, कन्तु यदा ते अत्र
आगच्छ न्त तदा तेषाम् एतादृशी सेवा करणीया’ — अथात् अ त थ कब आएगा यह पता नह , पर जब आए तब उसक ऐसी ही
सेवा करनी चा हए।
पाठ का अन्त बहुत प्यारा है — रा धका दन भर मन्त्र क तरह ‘अ त थदे वो भव’ दोहराती है और फर बल्ली के ब से ही
वात्सल्य के साथ कहती है — ‘भवन्तः अ प वदन्तु — अ त थदे वो भव’। जो सीखा है उसे तुरन्त और को सखा दे ना ही स ा
सीखना है।
व्याकरण का वषय है ‘अव्ययम्’। पाठ म मोटे (नीले) अक्षर म छपे शब्द — एव, यतः, च, तत्र, एकत्र, उप र, इ त, न, आम्,
तु, अ प, अतीव, तथा, क ञ्चत्, कदा, कन्तु, चेत्, पृष्ठतः, प रतः, इव — सब अव्यय ह। ोक ‘सदृशं त्रषु लङ्गे षु…’ अव्यय
का लक्षण बताता है: जो लङ्ग, वभ क्त और वचन तीन म कभी नह बदलता, वही अव्यय है।
अभ्यास पूरी तरह ‘कुत्र ?’ के इद- गद घूमता है। प्रश्न ३ म प्रश्नवाचक वाक्य बनाना, प्रश्न ४ म मेज़ के चत्र से ‘अ स्त /
ना स्त’, प्रश्न ५ म अत्र-तत्र-सवत्र-अन्यत्र का रेखा चत्र, प्रश्न ७ म अव्यय छाँटना और प्रश्न ८ म ‘कः कुत्र अ स्त ? कुत्र ना स्त ?’
क ता लका — सब एक ही व्याकरण- बन्दु का अभ्यास ह।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 9 अ त थदे वो भव AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

अव्ययपदम् संस्कृत-अथः हन्द पाठे / अभ्यासे वाक्यम्

अत्र अिस्मन् स्थाने यहाँ अत्र बालकः अ स्त ।

तत्र तिस्मन् स्थाने वहाँ क्र डाङ्गणं तत्र अ स्त ।

कुत्र किस्मन् स्थाने कहाँ कन्दुकः कुत्र अ स्त ?

सवत्र सवषु स्थानेष ु सब जगह परमेश्वरः सवत्र अ स्त ।

अन्यत्र अन्यिस्मन् स्थाने और कह , दूसरी जगह नगरम् अन्यत्र अ स्त ।

एकत्र एकिस्मन् स्थाने एक ही जगह बालकाः एकत्र तष्ठ न्त ।

उप र उपिरतने भागे ऊपर एकः वानरः वृक्षस्य उप र तष्ठ त ।

अधः अधोभागे नीचे सः फला न अधः क्षप त ।

अन्तः अभ्यन्तरे अन्दर बडालः गृहस्य अन्तः प्र वश त ।

ब हः बिहभ गे बाहर अ मतः गृहात् ब हः गच्छ त ।

पुरतः अग भागे आगे बडालः कन्दुकस्य पुरतः अ स्त ।

पृष्ठतः पष्ृ ठभागतः पीछे -पीछे माजारी मन्दं मन्दं पृष्ठतः आगच्छ त ।

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 6
TypeSolution
Pages29
Updated19 Sep 2026