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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: बु ः ◌ः सवाथसा धका
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
106 – 111 9 18 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: बु ः सवाथसा धका
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के दशमः पाठः — बु ः सवाथसा धका के स ूण हल। यह पञ्चतन्त्र-शैली क एक कथा है —
एक वन के सरोवर पर हा थय का झुंड आता है, उनके पैर के नीचे शशक (खरगोश ) के बल टू टते ह, और शशकराज केवल बु के बल पर, जल म
पड़ते चन्द्रमा के प्र त बम्ब को दखाकर, गजराज को वहाँ से हटा दे ता है। पाठ का सन्दे श एक ही पं क्त म है — ‘बु द्धः सवाथसा धका’ अथात् बु द्ध ही
सब काय सद्ध करने वाली है। व्याकरण क दृ से यह धातु तथा लट् लकार (वतमानकाल) का पाठ है — तीन पुरुष (प्रथम, मध्यम, उत्तम) और तीन
वचन (एक, , बहु)। पृष्ठ 106 से 111 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — पूरे पाठ का हन्द अनुवाद, वयं शब्दाथान् जानीमः क शब्द-
ता लका, अवधेयांशः के धातु, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–७ (सभी उपभाग , प का- रक्तस्थान, पुरुष-वचन ता लका, धातुरूप ता लका, चत्र-
वणन तथा पयायपद-मेलन स हत), योग्यता वस्तरः का लट् लकार-प रचय तथा प रयोजनाकायम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 106 – 111
खं ड प्रश्न
9 18
माध्यम
हन्द
दशमः पाठः — बु ः सवाथसा धका (पाठ-प्रवेशः तथा कथार ः) — पृष्ठ 106
बु बलस्य महत्त्वम्, सरोवरः, गजयूथम् तथा शशकानां सङ् कटम्
पाठ-प्रवे शः
प्र.1 संसारे उत्तमजीवनाय बु पूवकः व्यवहारः आवश्यकः भव त । बु पूवकेण व्यवहारेण क ठनम् अ प काय सहजं
भव त । वशेषतः स्पधायाः समये य द प्र तपक्षः अतीव प्रबलः, त ह बु बलेन वयं तं जेतुं शक्नुमः । शरीरबलात्
बु बलस्य महत्त्वं कथम् अ धकम् इ त एषा कथा प्र तपादय त । एतां कथां वयं पठामः । — अस्य पाठ-प्रवेशस्य
हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
यह पाठ-प्रवेश है — कथा से पहले पुस्तक बता दे ती है क पाठ कस बात को सद्ध करने जा रहा है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
संस ारे उ त्तमजीवनाय बुिद्धपूवकः व्यवहारः आवश्यकः भवित । संस ार में उ त्तम जीवन जीने के िलए बुिद्धपूवक व्यवहार करना आवश्यक होता
है।
बुिद्धपूवके ण व्यवहारे ण किठनम् अिप काय ं सहजं भवित । बुिद्धपूवक िकए गए व्यवहार से किठन काम भी सरल हो जाता है।
िवशेषतः स्पध याः समये यिद पितपक्षः अतीव पबलः, तिह िवशेष रूप से पितस्पध के समय यिद िवरोधी बहुत अिधक बलवान् हो, तो बुिद्ध
बुिद्धबले न वयं तं जेतं ु शक्नुमः । के बल से हम उसे जीत सकते है।ं
शरीरबलात् बुिद्धबल स्य महत्त्वं कथम् अिधकम् इित एषा कथा शरीर के बल से बुिद्ध के बल का महत्त्व कै से अिधक है — यही यह कथा िस द्ध
पितपादयित । करती है।
एतां कथां वयं पठामः । इस कथा को हम पढ़ ते है।ं
शीषक का अथ खो लए: बु द्धः सवाथसा धका = बु द्ध सव + अथ + सा धका — सब प्रयोजन को सद्ध कर दे ने
वाली। ‘सा धका’ स्त्री लङ्ग है क्य क ‘बु द्धः’ स्त्री लङ्ग शब्द है (साधकः → सा धका)। यही पूरे पाठ का सार-वाक्य है
और कथा के अन्त म फर दोहराया गया है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘शरीरबलात्’ म पञ्चमी वभ क्त, एकवचन है — तुलना करते समय जससे तुलना हो उसम
पञ्चमी आती है (‘X से Y बड़ा है’)। ‘बु द्धबलेन’ म तृतीया वभ क्त, एकवचन — साधन (करण) के अथ म।
प्र.2 एक स्मन् वने एकः नत्यजलपूणः महान् सरोवरः अ स्त । कदा चद् एकं पपासाकुलं गजयूथं वनान्तरात् तत्र
आगच्छ त । त स्मन् सरोवरे ते गजाः स्वेच्छया जलं पीत्वा, स्नात्वा, डत्वा च सूयास्तसमये नगच्छ न्त । तस्य च
सरोवरस्य तीरे समन्तात् सुकोमलभूमौ बहू न शशक- बला न स न्त, येषु बहवः शशकाः नवस न्त । गजानां
प रभ्रमणेन तेषु बलेषु नवसन्तः बहवः शशकाः क्षत वक्षताः भव न्त, केचन पुनः मृताः अ प भव न्त । अतः
शशकाः भीताः चन्तामग्नाः च भव न्त । ते ःखम् अनुभव न्त । स्वरक्षाथ च ते उपायं चन्तय न्त । — अस्य
ग ांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
यहाँ कथा क पृष्ठभू म और समस्या दोन रख द गई ह।
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
एकिस्मन् वने एकः िनत्यजलपूणः महान् सरोवरः अिस्त । िकसी एक वन में सदा जल से भरा हुआ एक बड़ ा तालाब है।
कदािचद् एकं िपपासाकु लं गजयूथं वनान्तरात् तत्र आगच्छित । िकसी समय प्यास से व्याकु ल हािथयों का एक झुंड दू स रे वन से वहाँ आता
है।
तिस्मन् सरोवरे ते गजाः स्वेच्छया जलं पीत्वा, स्नात्वा, ीिडत्वा च उस तालाब में वे हाथी अपनी इच्छा से जल पीकर, नहाकर और खेल कर
सूय स्तसमये िनगच्छिन्त । सूय स्त के समय बाहर िनकल जाते है।ं
तस्य च सरोवरस्य तीरे समन्तात् सुक ोमलभूमौ बहूिन शशक - और उस तालाब के िकनारे चारों ओर की बहुत कोमल भूिम में खरगोशों के
िबलािन सिन्त, येष ु बहवः शशकाः िनवसिन्त । अनेक िबल है,ं िजनमें बहुत-से खरगोश रहते है।ं
गजानां पिरभमणेन तेष ु िबले ष ु िनवस न्तः बहवः शशकाः क्षतिवक्षताः हािथयों के इधर-उधर घूमने से उन िबलों में रहने वाले बहुत-से खरगोश
भविन्त, के चन पुनः मृताः अिप भविन्त । घायल हो जाते है,ं और कु छ तो मर भी जाते है।ं
अतः शशकाः भीताः िचन्तामग्नाः च भविन्त । ते दुःखम् अनुभविन्त इसिलए खरगोश डरे हुए और िचन्ता में डू बे हुए रहते है।ं वे दुःख का अनुभव
। करते है।ं
स्वरक्षाथ ं च ते उपायं िचन्तयिन्त । और अपनी रक्षा के िलए वे उपाय सोचते है।ं
समस्या क्य बनी: हाथी शशक को मारना नह चाहते — वे तो केवल जल पीने आते ह। हा न अनजाने म होती है,
क्य क बल सुकोमलभूमौ (बहुत नरम म म) बने ह और हाथी के भारी पैर उन्ह दबा दे ते ह। इसी लए शशक को
लड़ाई नह , उपाय चा हए।
Tip — क्त्वा-प्रत्यय पहचा नए: ‘पीत्वा, स्नात्वा, क्र डत्वा’ — तीन म क्त्वा प्रत्यय है, अथ ‘-कर’ (पीकर,
नहाकर, खेलकर)। यह अव्यय है, इसका रूप कभी नह बदलता। नया वाक्य बनाइए — ‘सः पाठं प ठत्वा क्र ड त ।’
प्र.3 पाठे रक्तवणन मु द्रता न पदा न (अ स्त, आगच्छ त, नगच्छ न्त, नवस न्त, भव न्त, अनुभव न्त, चन्तय न्त)
क दृशा न पदा न स न्त ? तेषां क वै शष्ट्यम् ?
ये सब यापदा न ह ( हन्द : क्रया-शब्द), और सब लट् लकार यानी वतमानकाल म ह।
अिस्त · आगच्छित · िनगच्छिन्त · िनवसिन्त
भविन्त · अनुभ विन्त · िचन्तयिन्त
सब पथमपुरु ष, लट् लकार (वत मानकाल)
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका
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पुस्तक इन्ह लाल क्य छापती है: इस पाठ का व्याकरण- वषय ही धातु और लट् लकार है। लाल रंग से आप तुरन्त
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दे ख लेते ह क हर वाक्य म एक क्रयापद है, और वह कता के वचन के अनुसार बदलता है — एकeहाथी
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‘आगच्छ त’,.c
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agयापदम् धातुः वचनम् अथः
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आगच्छित आ + गम् (गच्छ् )
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िनगच्छिन्त नर् + गम् (गच्छ् ) नकलते ह
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िनवसिन्त न + वस् बहुवचनम्
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भविन्त भू (भव्) बहुवचनम्
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ag अनुभविन्त अनु + भू (भव्) बहुवचनम् अनुभव करते ह
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िचन्तयिन्त चन्त् बहवु चनम् सोचते ह
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a gl होने वाला रूप एकवचन है, ‘अ न्त’ पर समाप्त होने वाला बहुवचन। यही
Check it yourself: ‘ त’ पर समाप्त
दो चह्न याद रख ली जए — पूरे पाठ का आधा व्याकरण हल हो जाएगा।
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दशमःmपाठःc o
. — बु ः सवाथसा धका (कथायाः उत्तराधः) — पृष्ठ 107 a g l
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as सभा, शशकराजस्य उपायः, गजराजस्य पलायनम् तथा सारवाक्यम्
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शशकानां
पाठः
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प्र.1 एक स्मन् दने सायङ् काले तेषां शशकानां सभा भव त । सव शशकाः स्वमतं प्रकाशय न्त । परं ते समाधानं न
प्रा ुव न्त । अन्ते शशकराजः वद त– “अहमेव उपायं चन्तया म । अधुना वयं सव स्वगृहं गच्छामः ।” — अस्य
ग ांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
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omका मोड़ है — सामू हक बहस से हल नह नकलता, नेतृत्व से नकलता हैa। glas
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
एकिस्मन् िदने सायङ् काले तेषां शशकानां सभा भवित । एक िदन सायंक ाल में उन खरगोशों की सभा होती है।
सव शशकाः स्वमतं पकाशयिन्त । सब खरगोश अपना-अपना मत पकट करते है।ं
परं ते समाधानं न पाप्नवु िन्त । परन्तु उ न्हे ं कोई समाधान नही ं िमलता।
अन्ते शशकराजः वदित– “अहमेव उपायं िचन्तयािम ।” अन्त में खरगोशों का राजा कहता है — ‘उपाय मैं ही सोचूँगा।’
“अधुना वयं सव स्वग ृहं ग च्छामः । ” ‘अभी हम सब अपने-अपने घर चलते है।
ं ’
‘अहमेव’ म क्या छपा है: अहम् + एव = अहमेव — ‘म ही’। ‘एव’ अवधारण का अव्यय है, जो शब्द पर ज़ोर
डालता है। शशकराज घबराए हुए झुंड को यह भरोसा दे रहा है क ज़म्मेदारी वह स्वयं लेता है। ध्यान द जए —
चन्तया म और गच्छामः उत्तमपुरुष के रूप ह (म / हम), जब क बाक पूरा पाठ प्रथमपुरुष म चल रहा है।
प्र.2 अन्य स्मन् दवसे रात्रौ सः शशकराजः यूथा धपस्य गजराजस्य समीपं गच्छ त । सः गजराजं कथय त– “हे गजराज
! एषः सरोवरः चन्द्रस्य वास ानम् अ स्त । वयं शशकाः तस्य प्रजाः स्मः, अत एव सः शशाङ् कः इ त नाम्ना
प्र स ः । यदा शशकाः जीव न्त तदा एव चन्द्रः प्रस ः भव त ।” — अस्य ग ांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
यह शशकराज क पूरी योजना है — और वह केवल शब्द से चलाई जा रही है।
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
अन्यिस्मन् िदवसे रात्रौ सः शशकराजः यूथािधपस्य गजराजस्य समीपं दू स रे िदन रात में वह खरगोशराज झुंड के मुिखया गजराज के पास
गच्छित । जाता है।
सः गजराजं कथयित– “हे गजराज ! एषः सरोवरः चन्द स्य वास स्थानम् वह गजराज से कहता है — ‘हे गजराज! यह तालाब चन्द मा का िनवास -
अिस्त ।” स्थान है।’
“वयं शशकाः तस्य पजाः स्मः, अत एव सः शशाङ् कः इित नाम्ना पिस द्धः ‘हम खरगोश उसकी पजा है,ं इसीिलए वह ‘शशाङ् क ’ नाम से पिस द्ध
।” है।’
“यदा शशकाः जीविन्त तदा एव चन्द ः पस न्नः भवित । ” ‘जब तक खरगोश जीिवत रहते है,ं तभी चन्द मा पस न्न रहता है। ’
तक क चाल दे खए: शशकराज झूठ नह गढ़ता, वह एक सव व दत नाम उठाकर उसका मनचाहा अथ लगा दे ता
है। शश + अङ् कः = शशाङ् कः — ‘ जसके शरीर पर शश (खरगोश) का चह्न हो’, यह चन्द्रमा का प्र सद्ध नाम है
(चाँद के धब्ब म लोग खरगोश क आकृ त दे खते ह)। इसी नाम से वह सद्ध कर दे ता है क खरगोश चन्द्रमा क प्रजा
ह। यही बु का बल है — सामने पड़े तथ्य का उपयोग।
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व्याकरण: ‘स्मः’ = अस् धातु, लट् लकार, उत्तमपुरुष बहुवचन (हम ह)। ‘नाम्ना’ = नामन् शब्द, तृतीया वभ क्त
एकवचन, नपुंसक लङ्ग — ‘नाम से’। ‘रात्रौ’ = सप्तमी एकवचन, स्त्री लङ्ग — ‘रात म’।
प्र.3 गजराजः पृच्छ त– “कथम् अहं व ासं करो म ? क सत्यमेव चन्द्रः सरोवरे तष्ठ त ?” य द सरोवरः चन्द्रदे वस्य
वास ानं त ह तत् प्रदशयतु । शशकः कथय त- “आम्, चन्द्रस्य दशनाय आवाम् अधुना एव सरोवरं प्र त चलावः
।” — अस्य ग ांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
गजराज मूख नह है — वह प्रमाण माँगता है। और शशकराज को यही चा हए था।
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
गजराजः पच्ृ छित– “कथम् अहं िवश्वासं करोिम ?” गजराज पूछता है — ‘मैं कै से िवश्वास क रूँ ?’
“िकं स त्यमेव चन्द ः सरोवरे ितष्ठित ?” ‘क्या सचमुच चन्द मा तालाब में रहता है?’
“यिद सरोवरः चन्द दे वस्य वास स्थानं तिह तत् पदशयतु । ” ‘यिद तालाब चन्द दे व का िनवास -स्थान है, तो वह मुझे िदखाइए। ’
शशकः कथयित- “आम्, चन्द स्य दशनाय आवाम् अधुना एव खरगोश कहता है — ‘हाँ, चन्द मा के दशन के िलए हम दोनों अभी ही तालाब
सरोवरं पित चलावः ।” की ओर चलते है।ं ’
‘आवाम्’ और ‘चलावः’ यहाँ क्य : दो ही जा रहे ह — गजराज और शशकराज। इस लए वचन प्रयुक्त हुआ है।
आवाम् = ‘हम दोन ’ (अस्मद् शब्द, प्रथमा वचन), चलावः = चल् धातु, लट् लकार, उत्तमपुरुष वचन। हन्द
म वचन नह होता, इसी लए इसे ‘हम दोन चलते ह’ कहकर अनुवाद करना पड़ता है।
Tip: ‘प्रदशयतु’ लोट् लकार (आ ा/प्राथना) का रूप है, लट् लकार का नह — ‘ दखाइए’। ‘ कम्’ वाक्य के आरम्भ
म आए तो प्रश्नवाचक बन जाता है — ‘क्या...?’
प्र.4 गजराजः शशकराजेन सह सरोवरस्य समीपं गच्छ त । सः जले चन्द्रस्य प्र त बम्बं पश्य त, च कतः च भव त । सः
भयेन चन्द्रं नम त । ततः सः गजयूथेन सह अन्यत्र गच्छ त । सः गजयूथः पुनः कदा प तस्य सरोवरस्य समीपं न
आगच्छ त । शशकाः तत्र सुखेन तष्ठ न्त । सत्यम् एव उक्तम् – ‘बु ः सवाथसा धका’ । — अस्य ग ांशस्य
हन्द -अनुवादं कुवन्तु, सारवाक्यस्य भावं च लखन्तु ।
कथा का अन्त और सार-वाक्य — दोन यह ह।
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
गजराजः शशकराजेन सह सरोवरस्य समीपं गच्छित । गजराज खरगोशराज के साथ तालाब के पास जाता है।
सः जले चन्द स्य पितिबम्बं पश्यित, चिकतः च भवित । वह जल में चन्द मा का पितिबम्ब दे खता है और चिकत हो जाता है।
सः भयेन चन्द ं नमित । वह डर से चन्द मा को पणाम करता है।
ततः सः गजयूथेन सह अन्यत्र गच्छित । उसके बाद वह हािथयों के झुंड के साथ कही ं और चला जाता है।
सः गजयूथः पुनः कदािप तस्य सरोवरस्य समीपं न आगच्छित । वह हािथयों का झुंड िफर कभी उस तालाब के पास नही ं आता।
शशकाः तत्र सुखेन ितष्ठिन्त । खरगोश वहाँ सुख से रहते है।ं
स त्यम् एव उ क्तम् – ‘बुिद्धः सव थसािधका’ । सच ही कहा गया है — ‘बुिद्ध ही सब काय ं को िस द्ध करने वाली है’।
सारवाक्यस्य अथः — बु द्धः सवाथसा धका (बु द्ध सब प्रयोजन को साध दे ने वाली है)।
भावः: गजराज शशक से हज़ार गुना बलवान् है। य द लड़ाई होती तो शशक एक क्षण भी नह टकते। पर
शशकराज ने लड़ाई क ही नह — उसने जल म पड़ते चन्द्रमा के प्र त बम्ब को ‘चन्द्रदे व का दशन’ बना दया। बल
का उत्तर बल से दे ना ही आवश्यक नह ; जहाँ शरीरबल हार जाता है वहाँ बु बल जीत जाता है। यही पाठ-प्रवेश म
कहा गया था — ‘बु द्धबलेन वयं तं जेतुं शक्नुमः’।
Did you know? यह कथा पञ्चतन्त्र के काकोलूक यम् तन्त्र क प्र सद्ध कथा ‘शशक और गजराज’ का सरल
संस्कृत रूप है। वहाँ चतुर शशक का नाम वजयः है और वह स्वयं को चन्द्रमा का दूत बताता है। पञ्चतन्त्र के
रच यता आचाय वष्णुशमा माने जाते ह।
Try This: कथा को अपने शब्द म पाँच संस्कृत वाक्य म ल खए — ‘वने सरोवरः अ स्त । गजाः तत्र आगच्छ न्त
। शशकाः ः खताः भव न्त । शशकराजः उपायं चन्तय त । गजाः अन्यत्र गच्छ न्त ।’
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 108
पाठस्य शब्दाः, तेषां संस्कृत-अथः, हन्द , English तथा अवधेयांशः (धातुप रचयः)
शब्दाथाः
प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — शब्दः / अथः / हन्द / English / मातृभाषया अथ लखन्तु — (सरोवरः, गजः,
शशकः, मृताः, भीताः, प्र त बम्बम्, चन्तामग्नः, शशाङ् कः, नाम्ना) ।
पुस्तक क पूरी शब्दाथ-ता लका, अ न्तम स्तम्भ (मातृभाषया अथः) हन्द म भरा हुआ —
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथः
सरोवरः जलाशयः तालाब Pond / Lake तालाब, सरोवर
गजः हस्ती हाथी Elephant हाथी
शशकः शशः खरगोश Rabbit खरगोश
मृताः हताः मरे हुए Dead मरे हएु
भीताः भययुक्ताः डरे हुए Scared डरे हुए , भयभीत
पितिबम्बम् प्र त बम्बम् प्र त बम्ब Reflection परछाईं, पितिबम्ब
िचन्तामग्नः चन्ताकुलः च न्तत Worried िचन्ता में डू बा हुआ
शशाङ् कः चन्द्रः चन्द्रमा Moon चाँद , चन्द मा
नाम्ना नामधेयेन नाम से By name नाम से
पाठ के कुछ और उपयोगी शब्द: पपासाकुलम् = प्यास से व्याकुल · वनान्तरात् = दूसरे वन से · समन्तात् =
चार ओर · क्षत वक्षताः = घायल · यूथा धपः = झुंड का मु खया · स्वरक्षाथम् = अपनी रक्षा के लए · च कतः =
च कत, हैरान · कदा प न = कभी नह ।
शब्द-रचना सम झए: चन्तामग्नः = चन्तायाम् मग्नः — चन्ता म डू बा हुआ (जैसे जल म डू बना, वैसे ही चन्ता म
डू बना)। क्षत वक्षताः = क्षत (घाव) + वक्षत (गहरा घाव) — बुरी तरह घायल। संस्कृत म ऐसे समस्त पद तोड़कर
दे खने से अथ अपने-आप खुल जाता है।
प्र.2 अवधेयांशः — यापदानां मूलं धातुः अ स्त । यथा – पठ त इ त यापदस्य मूलं – ‘पठ् ’ इ त धातुः अ स्त ।
नवस न्त, भव न्त, गच्छ त, प्रकाशय न्त, नम त, तष्ठ न्त — एतेषां धातून् लखन्तु ।
पुस्तक का ‘अवधेयांशः’ एक ही बात कहता है — हर यापद के पीछे एक मूल शब्द होता है, उसे ‘धातु’ कहते ह।
पठित → मूलम् = पठ् (धात ःु )
पठ् + ित = पठित, पठ् + अिन्त = पठिन्त
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका
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यापदम् धातुः अथः
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गच्छित गम् (गच्छ् ) जाता है
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कोष्ठक म दूसरा रूप क्य : कुछ धातुओं का रूप चलते समय बदल जाता है — गम् लट् लकार म गच्छ् बन जाता
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gl चलता हुआ रूप भी दे दे ती है।
बनता है भव्, और ा बनता है तष्ठ् । इसे अङ्ग-प रवतन कहते ह। इसी लए पुस्तक धातु के आगे कोष्ठक म
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Tip — उपसग अलग क जए: ‘ न + वस्’, ‘प्र + काश्’, ‘ नर् + गम्’, ‘आ + गम्’, ‘अनु + भू’ — यहाँ पहला agl
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भाग उपसग है, जो धातु का अथ बदल दे ता है। जैसे — गम् (जाना) → आगम् (आना) → नगम् ( नकलना)। एक
ही धातु, तीन अथ। a
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वयम् अभ्यासं
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agl अभ्यासः
प्रश्नः १ : पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु
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बलेषु के नवस न्त ? (ख) केषांaपs रभ्रमणेन शशकाः क्षत वक्षताः मृताः च भव न्त ? (ग) शशकराजः कस्य समीपं
प्र.1 पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) सरोवरस्य तीरे सुकोमलभूमौ
agl न्त ? (ङ) कः चन्द्रं नम त ? (च) के सुखेन तष्ठ न्त ?
गच्छ त ? (घ) के स्वमतं प्रकाशय
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‘एकपदे न’ का अथ है — केवल एक पद म उत्तर, और उस पद क वभ क्त वही होगी जो प्रश्नवाचक शब्द क है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द अथः
(क) सरोवरस्य तीरे सुक ोमलभूम ौ िबले ष ु के िनवसिन्त ? शशकाः खरगोश (रहते ह)
(ख) के षां पिरभमणेन शशकाः क्षतिवक्षताः मृताः च भविन्त ? गजानाम् हा थय के (घूमने से)
(ग) शशकराजः क स्य समीपं गच्छित ? गजराजस्य गजराज के (पास)
(घ) के स्वमतं पकाशयिन्त ? शशकाः खरगोश
(ङ) कः चन्द ं नमित ? गजराजः गजराज
(च) के सुखेन ितष्ठिन्त ? शशकाः खरगोश
वभ क्त मलाइए — यही पूरा नयम है: प्रश्न म जो वभ क्त है, उत्तर भी उसी वभ क्त म आएगा।
• कः / के — प्रथमा (कता) → उत्तर प्रथमा म : गजराजः (एकवचन), शशकाः (बहुवचन)
• कस्य / केषाम् — षष्ठी (सम्बन्ध) → उत्तर षष्ठी म : गजराजस्य (एकवचन), गजानाम् (बहुवचन)
Check it yourself: ‘कः’ एकवचन है और ‘के’ बहुवचन — इस लए (ङ) का उत्तर एक ही प्राणी ‘गजराजः’ है,
जब क (क), (घ), (च) के उत्तर बहुवचन ‘शशकाः’ ह। य द आपने (ख) म ‘गजाः’ लख दया तो वभ क्त ग़लत हो
गई — वहाँ गजानाम् चा हए।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 109
प्रश्नाः २–४ : पूणवाक्येन उत्तरा ण, प कातः यापद-चयनम् तथा पुरुष-वचन- नधारणम्
अभ्यासः
प्र.2 पूणवाक्येन उत्तरा ण लखन्तु — (क) चन्द्रः कदा प्रस ः भव त ? (ख) सायङ् काले केषां सभा भव त ? (ग)
शशकाः कमथम् उपायं चन्तय न्त ? (घ) चन्द्रः केन नाम्ना प्र स ः अ स्त ? (ङ) “आम्, चन्द्रस्य दशनाय आवाम्
अधुना एव सरोवरं प्र त चलावः” इ त कः कथय त ?
‘पूणवाक्येन’ अथात् पूरा वाक्य — प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म लौटाइए और प्रश्नवाचक शब्द क जगह उत्तर रख द जए।
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उत्तरम् (संस्कृतम्) हन्द अथः
(क) यदा शशकाः जीविन्त तदा एव चन्द ः पस ः भवित ।
न्न जब खरगोश जीिवत रहते है,ं तभी चन्द मा पस होता है।
न्न
(ख) सायङ् काले शशकानां सभा भवित । सायंक ाल में खरगोशों की सभा होती है।
(ग) शशकाः स्वरक्षाथम् उपायं िचन्तयिन्त । खरगोश अपनी रक्षा के िलए उपाय सोचते है।ं
(घ) चन्द ः ‘शशाङ् कः’ इित नाम्ना पिस द्धः अिस्त । चन्द मा ‘शशाङ् क ’ नाम से पिस द्ध है।
(ङ) इित शशकराजः कथयित । यह खरगोशों का राजा कहता है।
प्रश्नवाचक शब्द ही बताता है क उत्तर म क्या डालना है:
• कदा (कब) → समय : ‘यदा … तदा …’
• केषाम् ( कनक ) → षष्ठी बहुवचन : ‘शशकानाम्’
• कमथम् ( कस लए) → प्रयोजन : ‘स्वरक्षाथम्’
• केन नाम्ना ( कस नाम से) → तृतीया : ‘शशाङ् कः इ त नाम्ना’
• कः (कौन) → प्रथमा एकवचन : ‘शशकराजः’
Tip: (ङ) म पाठ म ‘शशकः कथय त’ छपा है, पर बोलने वाला वही शशकराज है जो गजराज के पास गया था —
इस लए शशकः लखना भी सही है और शशकराजः लखना भी। ‘यदा’ के साथ ‘तदा’ और ‘य द’ के साथ ‘त ह’
— ये जोड़े हमेशा साथ चलते ह।
प्र.3 पाठस्य आधारेण प कातः यापदा न चत्वा वाक्या न पूरयन्तु — [ नवस न्त · चन्तय न्त · भव त · कथय त ·
तष्ठ त ] (क) क चन्द्रः सरोवरे ..................... ? (ख) सव शशकाः उपायं ..................... । (ग) सायंकाले
शशकानां सभा ..................... । (घ) शशकाः सरोवरस्य तीरे ..................... । (ङ) सः गजराजं
..................... ।
पहले हर वाक्य का कता दे खए — कता एकवचन है या बहुवचन, उसी से क्रयापद तय हो जाएगा।
पूण वाक्यम् कता / वचनम् हन्द अथः
(क) िकं चन्द ः सरोवरे ितष्ठित ? चन्द ः — एकवचनम् क्या चन्द्रमा तालाब म रहता है?
(ख) सव शशकाः उपायं िचन्तयिन्त । शशकाः — बहुवचनम् सब खरगोश उपाय सोचते ह।
(ग) सायंक ाले शशकानां सभा भवित । सभा — एकवचनम् सायंकाल म खरगोश क सभा होती है।
(घ) शशकाः सरोवरस्य तीरे िनवसिन्त । शशकाः — बहुवचनम् खरगोश तालाब के कनारे रहते ह।
(ङ) सः गजराजं कथयित । सः — एकवचनम् वह गजराज से कहता है।
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Why it happens: संस्कृत म क्रया कता के अनुसार चलती है, कम के अनुसार नह । (ग) म कता ‘सभा’ है
(एकवचन), ‘शशकानाम्’ नह — इसी लए ‘भव न्त’ नह , भव त आएगा। यही इस प्रश्न का सबसे बड़ा जाल है।
Check it yourself: प का म पाँच पद और वाक्य भी पाँच — इस लए हर पद एक ही बार प्रयुक्त होगा।
बहुवचन के दो पद ( नवस न्त, चन्तय न्त) बहुवचन कता वाले दो वाक्य (ख, घ) म गए, और एकवचन के तीन पद
(भव त, कथय त, तष्ठ त) शेष तीन म।
प्र.4 उदाहरणानुसारं नम्न ल खतानां पदानां वचनं पुरुषं च लखन्तु — [उदाहरणम् : चन्तय त — प्रथमपुरुषः,
एकवचनम्] — तष्ठ न्त, जीव न्त, नम त, कथय त, गच्छ त ।
अ न्तम अक्षर दे खए — त = प्रथमपुरुष एकवचन, अ न्त = प्रथमपुरुष बहुवचन।
पदम् पुरुषः वचनम् धातुः हन्द अथः
िचन्तयित (उदाहरणम्) प्रथमपुरुषः एकवचनम् चन्त् सोचता है
ितष्ठिन्त पथमपुरुषः बहुवचनम् स्था ( तष्ठ्) ठहरते ह
जीविन्त पथमपुरुषः बहुवचनम् जीव् जीते ह
नमित पथमपुरुषः एकवचनम् नम् प्रणाम करता है
कथयित पथमपुरुषः एकवचनम् कथ् कहता है
गच्छित पथमपुरुषः एकवचनम् गम् (गच्छ् ) जाता है
पाँच प्रथमपुरुष के ही क्य : संस्कृत म प्रथमपुरुष वह है जसक बात हो रही हो (सः / सा / तत्, ते) — हन्द
का ‘अन्य पुरुष’। मध्यमपुरुष के रूप स, थः, थ पर और उत्तमपुरुष के म, वः, मः पर समाप्त होते ह। यहाँ कसी
भी पद के अन्त म वे चह्न नह ह, इस लए सब प्रथमपुरुष के ह।
सावधान: संस्कृत का ‘प्रथमपुरुष’ हन्द /अंग्रेज़ी के ‘first person’ (म) से उलटा है। संस्कृत म ‘म’ वाला रूप
उत्तमपुरुष कहलाता है — जैसे पाठ का ‘ चन्तया म’, ‘करो म’।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 110
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प्रश्नाः ५–६ : धातुरूप-ता लकायाः पूरणम् तथा चत्रस्य आधारेण पञ्च वाक्या न
अभ्यासः
प्र.5 उदाहरणानुसारं समु चतैः यापदै ः रक्त ाना न पूरयन्तु — धातुः / एकवचनम् / वचनम् / बहुवचनम् —
[उदाहरणम् : गम् — गच्छ त, गच्छतः, गच्छ न्त] — कथ् (कथय त, ....., .....), ा (....., ....., तष्ठ न्त), कृ
(करो म, कुवः, .....), जीव् (....., ....., जीव न्त), चल् (....., चलावः, .....) ।
पूरी ता लका, भरे हुए रक्तस्थान रँगे हुए —
धातुः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम् पुरुषः
गम् गच्छ त गच्छतः गच्छ न्त प्रथमपुरुषः
कथ् कथय त कथयतः कथयिन्त प्रथमपुरुषः
स्था ितष्ठित ितष्ठतः तष्ठ न्त प्रथमपुरुषः
कृ करो म कुवः कु मः उत्तमपुरुषः
जीव् जीवित जीवतः जीव न्त प्रथमपुरुषः
चल् चलािम चलावः चलामः उत्तमपुरुषः
यह सबसे ज़्यादा भूल होती है — ध्यान से प ढ़ए: ता लका क हर पं क्त प्रथमपुरुष क नह है। दए हुए रूप
दे खकर पुरुष पहचा नए —
• कृ क पं क्त म दया है करो म ( म- चह्न) और कुवः (वः- चह्न) — दोन उत्तमपुरुष के ह। इस लए बहुवचन म
‘कुव न्त’ नह , कुमः आएगा।
• चल् क पं क्त म दया है चलावः (वः- चह्न) — यह भी उत्तमपुरुष वचन है। इस लए एकवचन चला म और
बहुवचन चलामः ह गे।
पथमपुरु ष-िच ािन : ित · तः · अिन्त
मध्यमपुरु ष-िच ािन : िस · थः · थ
उत्तमपुरु ष-िच ािन : िम · वः · मः
Tip: ‘कृ’ धातु के रूप वशेष ह — करो त, कुरुतः, कुव न्त / करो ष, कुरुथः, कुरुथ / करो म, कुवः, कुमः। ये
अन्य धातुओं क तरह सीधे नह चलते, इस लए इन्ह कण्ठस्थ करना ही अच्छा है। ‘चल्’ के प्रथमपुरुष रूप ह —
चल त, चलतः, चल न्त।
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चत्रस्य आधारेण पञ्च वाक्या न लखन्तु —
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प्र.6
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फलो ानस्य चत्रम् ।
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पहले दे ख ली जए क चत्र म कौन है और क्या कर रहा है.c— फर हर बात के लए एक वाक्य।
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क्षsहै। वृक्ष क डाल पर एक वानर बैठा है और फल नीचे गरा रहा है। वृक्ष के नीचे
चत्र म क्या है: बीच म फल से लदा एक बड़ा lवृa
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बाईं ओर एक बालक बैठकर गरे हुए फलaउठा रहा है, बीच म खड़ी एक बा लका गरता हुआ फल हाथ से पकड़ रही है, और दाईं
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ओर एक अन्य बा लका शला पर बैठकर फल खा रही है; उसके पास फल से भरी एक पे टका (टोकरी) रखी है। पीछे पवताः और
एक छोटा वृक्ष दखाई दे ते ह।
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.coवाक्यम् (संस्कृतम्) हन्द अथः agl
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agl (क) िचत्रे एकः महान् फलवृक्षः अिस्त । िचत्र में एक बड़ ा फलदार वृक्ष है।
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(ख) वृक्षस्य उपिर एकः वानरः उपिवशित ।
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वृक्ष के ऊपर एक बन्दर बैठा है।
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वानरः वृक्षात् फलािन अधः िक्षपित । बन्दर वृक्ष से फल नीचे िगराता है।
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(ग)
(घ) एका बािलका हस्तेन फलं गृ a
ाित । एक लड़ की हाथ से फल पकड़ ती है।
लड़ का ज़ मीन पर िगरे फल बीनताoहैm
बालकः भूमौ पिततािन फलािन िचनोित, अपरा बािलका च फलं
. c , और दू सरी लड़ की फल
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(ङ)
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खादित । खाती है।
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m नमूना उत्तर (सरलतरम्) — य द उपयुक्त वाक्य क ठन लग तो ये ल खए: agl
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ag (क) अत्र एकः वृक्षः अ स्त । (यहाँ एक वृक्ष है।)
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(ख) वृक्षे बहू न फला न स न्त । (वृक्ष पर बहुत फल ह।)
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(ग) वृक्षे एकः वानरः तष्ठ त । (वृक्ष पर एक बन्दर बैठा है।)
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agन्त । (ब े फल खाते ह।)
(घ) त्रयः बालकाः वृक्षस्य अधः स न्त । (तीन ब े वृक्ष के नीचे ह।)
(ङ) बालकाः फला न खाद
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अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए: पाँच वाक्य पूण ह (कता + कम + क्रया), सब लट् लकार म ह , और क्रया
कता के वचन से मले — एक वानर हो तो तष्ठ त, तीन बालक ह तो स न्त / खाद न्त। उपयोगी शब्द — वृक्षः,
फलम्/फला न, वानरः, बालकः, बा लका, पे टका, उप र, अधः, हस्तेन।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 111
प्रश्नः ७ : अधो ल खतानां पयायपदानां मेलनं कृत्वा रक्त ाना न पूरयन्तु
अभ्यासः
प्र.7 अधो ल खतानां पयायपदानां मेलनं कृत्वा रक्त ाना न पूरयन्तु — (क) गजः / जलाशयः (ख) पदम् / शशाङ् कः
(ग) चन्द्रः / जनता (घ) सरोवरः / चरणः (ङ) प्रजा / हस्ती । [उदाहरणम् : गजः — हस्ती]
दोन स्तम्भ जान-बूझकर आगे-पीछे छापे गए ह। सही जोड़े ये बनते ह —
शब्दः पयायपदम् हन्द अथः
(क) गजः हस्ती हाथी
(ख) पदम् चरणः पैर
(ग) चन्द ः शशाङ् कः चन्द्रमा
(घ) सरोवरः जलाशयः तालाब
(ङ) पजा जनता प्रजा, जनता
पयायपद कैसे पहचान: ‘पयाय’ का अथ है समानाथक शब्द। हर जोड़े का सूत्र शब्द के भीतर ही छपा है — हस्ती
= ‘हस्तः (सूँड़) यस्य अ स्त सः’, इस लए हाथी; शशाङ् कः = ‘शशः अङ् के यस्य’, इस लए चन्द्रमा; जलाशयः =
‘जलम् आशय त य स्मन्’, इस लए तालाब। बचा हुआ जोड़ा अपने-आप मल जाता है।
Tip — कुछ और पयायपद जो इसी पाठ से बनते ह: शशकः = शशः · मृतः = हतः · भीतः = भययुक्तः ·
चन्तामग्नः = चन्ताकुलः · नाम्ना = नामधेयेन · वनम् = अरण्यम्/काननम् · जलम् = पयः/नीरम्।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 111
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वतमानकालः, लट् लकारः, त्रयः पुरुषाः, त्री ण वचना न तथा ‘पठ् ’ धातोः रूपा ण
योग्यता वस्तरः
प्र.1 योग्यता वस्तरः — १. कायार ात् कायप रसमाप्तेः कालः वतमानकालः उच्यते । २. वतमान-कालस्य कृते
लट् लकारः भव त । ३. लकारेषु त्रयः पुरुषाः (प्रथमः मध्यमः उत्तमः) एवञ्च त्री ण वचना न (एकवचनम्,
वचनम्, बहुवचनम्) भव न्त । लट् लकारस्य यापदे अधो ल खता न चह्ना न भव न्त — [ चह्न-ता लका तथा
‘पठ् ’ धातोः रूप-ता लका] । एतत् सव व्याख्यायताम् ।
तीन वाक्य का सीधा अथ पहले —
संस्कृतम् हन्द अथः
१. काय रम्भात् कायपिरसमाप्तेः कालः वतमानकालः काम के आरम्भ से ले क र काम की समािप्त तक का समय ‘वतमानकाल ’
उच्यते । कहलाता है।
२. वतमान-कालस्य कृ ते लट् ल कारः भवित । वतमानकाल के िलए ‘लट् ल कार’ होता है।
३. लकारे ष ु त्रयः पुरुषाः एवञ्च त्रीिण वचनािन भविन्त । लकारों में तीन पुरुष (पथम, मध्यम, उ त्तम) और तीन वचन (एक , ि , बहु) होते
है।ं
लट् लकारस्य चह्ना न —
पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः (सः/ते) ित तः अिन्त
मध्यमपुरुषः (त्वम्/यूयम्) िस थः थ
उ त्तमपुरुषः (अहम्/वयम्) िम वः मः
‘पठ् ’ धातोः लट् लकारे रूपा ण —
पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः पठित पठतः पठिन्त
मध्यमपुरुषः पठिस पठथः पठथ
उ त्तमपुरुषः पठािम पठावः पठामः
‘लकार’ शब्द कहाँ से आया: संस्कृत म काल और अथ बताने वाले दस प्रत्यय-समूह ह, और सबके नाम ल् से शुरू
होते ह — लट् , लट् , लुट्, लृट्, लोट् , लङ् , लङ् , लुङ्, लृङ्, लेट्। इसी लए इन्ह लकार कहते ह। कक्षा 6 म तीन काम
के ह — लट् (वतमान — पठ त), लृट् (भ वष्य — प ठष्य त), लङ् (भूत — अपठत्)।
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Check it yourself — नौ रूप, एक सूत्र: धातु का अङ्ग + चह्न। पठ् + त = पठ त; पठ् + अ न्त = पठ न्त;
पठ् (आ) + म = पठा म। ध्यान द जए, उत्तमपुरुष म चह्न से पहले आ जुड़ जाता है — पठा म, पठावः, पठामः।
इसी नयम से गच्छा म, गच्छावः, गच्छामः बनते ह।
Tip — पाठ से मलान क जए: ‘वयं पठामः’ (उत्तम बहु), ‘अहमेव उपायं चन्तया म’ (उत्तम एक), ‘आवां
चलावः’ (उत्तम ), ‘शशकाः नवस न्त’ (प्रथम बहु), ‘गजराजः पृच्छ त’ (प्रथम एक) — नौ म से पाँच खाने पाठ ने
ही भर दए ह।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 111
पाठे प ठतानां धातुरूपाणां सङ् ग्रहणं, तेषां पुरुषः वचनं च
प रयोजनाकायम्
प्र.1 पाठे प ठतानां धातुरूपाणां संग्रहणं कुवन्तु । तेषां पुरुषं वचनं च लखन्तु ।
करने का तरीक़ा: पाठ को पं क्त-दर-पं क्त प ढ़ए, हर वाक्य का यापद छाँ टए (पुस्तक ने वे लाल रंग म छाप ही दए ह), फर
हर पद के आगे धातु, पुरुष और वचन ल खए। नीचे पूरा तैयार सङ् ग्रह है — इसे अपनी प रयोजना-पु स्तका म उतार ली जए।
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यापदम् धातुः पुरुषः वचनम् हन्द अथः
भवित भू पथमपुरुषः एकवचनम् होता है
शक्नुम ः शक् उ त्तमपुरुषः बहुवचनम् हम सकते ह
पितपादयित प्र त + पद् ( णच्) पथमपुरुषः एकवचनम् प्र तपा दत करती है
पठामः पठ् उ त्तमपुरुषः बहवु चनम् हम पढ़ते ह
अिस्त अस् पथमपुरुषः एकवचनम् है
आगच्छित आ + गम् पथमपुरुषः एकवचनम् आता है
िनगच्छिन्त नर् + गम् पथमपुरुषः बहुवचनम् नकलते ह
सिन्त अस् पथमपुरुषः बहवु चनम् ह
िनवसिन्त न + वस् पथमपुरुषः बहुवचनम् रहते ह
भविन्त भू पथमपुरुषः बहुवचनम् होते ह
अनुभविन्त अनु + भू पथमपुरुषः बहुवचनम् अनुभव करते ह
िचन्तयिन्त चन्त् पथमपुरुषः बहवु चनम् सोचते ह
पकाशयिन्त प्र + काश् पथमपुरुषः बहुवचनम् प्रकट करते ह
पाप्नुविन्त प्र + आप् पथमपुरुषः बहुवचनम् प्राप्त करते ह
वदित वद् पथमपुरुषः एकवचनम् कहता है
िचन्तयािम चन्त् उ त्तमपुरुषः एकवचनम् म सोचता हूँ
गच्छामः गम् उ त्तमपुरुषः बहुवचनम् हम जाते ह
गच्छित गम् पथमपुरुषः एकवचनम् जाता है
कथयित कथ् पथमपुरुषः एकवचनम् कहता है
स्मः अस् उ त्तमपुरुषः बहवु चनम् हम ह
जीविन्त जीव् पथमपुरुषः बहुवचनम् जीते ह
पच्ृ छित प्रच्छ् पथमपुरुषः एकवचनम् पूछता है
करोिम कृ उ त्तमपुरुषः एकवचनम् म करता हूँ
ितष्ठित स्था पथमपुरुषः एकवचनम् ठहरता है
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यापदम् धातुः पुरुषः वचनम् हन्द अथः
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उ त्तमपुरुषः ि वचनम्
a g lहम दोन चलते ह
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g l a दृश् (पश्य्) पथमपुरुषः एकवचनम् दे खता है
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नमित नम् पथमपुरुषः एकवचनम् प्रणाम करता है
पथमपु.रुcषःo
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ितष्ठिन्त स्था बहवु चनम् रहते ह
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इस प रयोजना से क्या सीखना है: पूरे पाठ म प्रथमपुरुष के रूप सबसे अ धक ह, क्य क कथा कसी और क
कही जा रही है। उत्तमपुरुष के रूप केवल वहाँ आए ह जहाँ पात्र स्वयं बोल रहे ह — ‘ चन्तया म’, ‘गच्छामः’,
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‘स्मः’, ‘करो म’, ‘चलावः’। मध्यमपुरुष (पठ स, पठथः, पठथ) का एक भी रूप इस पाठ म नह है — क्य क
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संवाद म कसी ने ‘तुम करते हो’ जैसा वाक्य नह कहा।
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a अपनी पु स्तका को और अच्छा बनाइए: ऊपर क ता लका म धातुः के अनुसार क्रम लगाकर एक दूसरी सूची
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बनाइए — जैसे गम् के तीन रूप (आगच्छ त, नगच्छ न्त, गच्छामः) एक साथ; अस् के तीन रूप (अ स्त, स न्त,
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स्मः) एक साथ; भू के तीन (भव त, भव न्त, अनुभव न्त) एक साथ। इससे दख जाएगा क एक ही धातु से कतने
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रूप बनते ह। नीचे ‘पाठे न प्रयुक्ताः कन्तु मया ाताः’ शीषक से मध्यमपुरुष के रूप भी जोड़ द जए — जैसे त्वं
पठ स, यूयं गच्छथ। a g
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a s em — एक नज़र म
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अध्याय
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कथा का ढाँचा बहुत साफ़ है। वन म एक नत्यजलपूणः महान् सरोवरः है। प्यास से व्याकुल हा थय का झुंड दूसरे वन से
omधँसते ह, बहुत-से शशक क्षत वक्षताः हो जाते ह, कुछ मर भी जाते ह।
वहाँ आता है, दन भर जल पीता, नहाता, खेलता है और सूयास्त के समय लौट जाता है। सरोवर के कनारे क कोमल भू म म
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शशक के बल ह — हा थय के चलने- फरने से.cबल a g
emव्य क्त से नकलता है। सायंकाल शशक क सभा होती है, सब अपना-
समस्या का हल सभा से नह , एक बुasमान्
aglन्त) पर समाधान नह मलता। अन्त म शशकराज कहता है — ‘अहमेव उपायं
अपना मत रखते ह (स्वमतं प्रकाशय
चन्तया म’ — उपाय म ही सोचूँगा।
. c om
उपाय क्या है? शशकराज रात म गजराज के पास जाकर कहता है क यह सरोवर चन्द्रमा का नवास-स्थान है, शशक उसक
प्रजा ह, इसी लए चन्द्रमा का नाम शशाङ् कः (शश + अङ् क = जसके चह्न म शश हो) हैe।m
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l अन्यत्र चला जाता है।
गजराज प्रमाण माँगता है, और जल
.cमoचन्द्रमा का प्र त बम्ब देखकर च कत होकर भय से प्रणाम करता है और झुंडaसgहत
m सन्दे श शीषक म ही है — ‘बु ः सवाथसा धका’। पाठ-प्रवेश इसे पहले ही कह देता है — प्र तपक्ष चाहे कतना ही प्रबल
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हो (हाथी शशक से हज़ार गुना बलवान् है), बु द्धबलेन वयं तं जेतुं शक्नुमः। शरीरबल से बु द्धबल बड़ा है।
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व्याकरण का वषय है ‘धातुः’ तथा ‘लट् लकारः’। अवधेयांशः बताता है — क्रयापद का मूल धातु होता है (पठ त → पठ् )।
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योग्यता वस्तरः म लट् लकार (वतमानकाल) के नौ रूप ह — प्रथम/मध्यम/उत्तम पुरुष × एक/ /बहुवचन; चह्न ह त, तः,
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अ न्त / स, थः, थ / म, वः, मः।
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अभ्यास म सात प्रश्न ह। एकपदे न उत्तर (६ उपभाग), पूणवाक्येन उत्तर (५), प का से क्रयापद चुनकर वाक्यपू त (५),
पुरुष-वचन ता लका (५), धातुरूप-ता लका (गम्, कथ्, स्था, कृ, जीव्, चल्), चत्र के आधार पर पाँच वाक्य, तथा पयायपद-
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 10 बु द्धः सवाथसा धका AglaSem · NCERT Solutions
मेलन (५)। ध्यान रहे — ता लका क कृ तथा चल् पं क्तयाँ उत्तमपुरुष क ह, प्रथमपुरुष क नह ।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः संस्कृत-अथः हन्द ENGLISH
सरोवरः जलाशयः तालाब Pond / Lake
गजः हस्ती हाथी Elephant
शशकः शशः खरगोश Rabbit
मृताः हताः मरे हुए Dead
भीताः भययुक्ताः डरे हुए Scared
प्र त बम्बम् पितिबम्बम् प्र त बम्ब Reflection
चन्तामग्नः िचन्ताकु लः च न्तत Worried
शशाङ् कः चन्द ः चन्द्रमा Moon
नाम्ना नामधे येन नाम से By name
पपासाकुलम् तषृ ातम् प्यास से व्याकुल Thirsty, restless
क्षत वक्षताः आहताः घायल, लहूलुहान Injured, wounded
यूथा धपः गजयूथस्य नायकः झुंड का मु खया Leader of the herd
स्वरक्षाथम् आत्मरक्षणाय अपनी रक्षा के लए For self-protection
सवाथसा धका सवषाम् अथ नां सािधका सब काय सद्ध करने वाली That accomplishes every purpose
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