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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: यः जाना त सः प डतः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
112 – 120 10 26 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: यः जाना त सः प ण्डतः
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के एकादशः पाठः — यः जाना त सः प ण्डतः के सम्पूण हल। यह पाठ कोई कथा नह , पाँच
प्रहे लकाओं (पहे लय ) का संग्रह है — संस्कृत-सा हत्य क वह वनोदकला जो हँसाते-हँसाते ता ककश क्त और चन्तनक्षमता बढ़ा दे ती है। उत्तर ह
— तक्रम्/शक्रस्य/दुलभम्, नयनम्, अनानसः, मृत्युञ्जयः तथा कुम्भकणः। व्याकरण क दृ ष्ट से यह पूरा पाठ षष्ठी वभ क्त (सम्बन्धकारक —
‘का/के/क ’) का है — तीन लङ्ग के शब्दरूप, सवनामपद, कुटु म्ब के सम्बन्धवाचक शब्द और श्रीराम-प रवार का रेखा चत्र। पृष्ठ 112 से 120 तक
का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — पाँच प्रहे लकाओं का अन्वय-अथ-भाव, हर ववरणम् का रक्त ान, वयं शब्दाथान् जानीमः, अवधेयांशः के
गुरु- शष्य/ग्रन्थ-ग्रन्थकता/प त-पत्नी सम्बन्ध, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–८ (सभी उपभाग, ता लकाएँ, रेखा चत्र तथा पुस्तकसू च स हत),
योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 112 – 120
खं ड प्रश्न
10 26
माध्यम
हन्द
एकादशः पाठः — यः जाना त सः प ण्डतः (पाठ-प्रवेशः तथा प्रहे लकाः १–३) — पृष्ठ 112
प्रहे लकानां महत्त्वम्, प्रहे लका १ (तक्रम्/शक्रस्य/दुलभम्), प्रहे लका २ (नयनम्) तथा प्रहे लका ३ (अनानसः)
पाठ-प्रवे शः
प्र.1 संस्कृत-सा हत्ये प्रहे लकानां व शष्टं ानम् अ स्त । प्रहे लकाः आबालवृद्धं मान सकम् उल्लासं जनय न्त । बुद्धेः
ता ककश क्तं वधय न्त । चन्तनक्षमतां वकासय न्त । पूवजानां कवीनां बु द्धमत्तां कल्पनाश क्तं च दशय न्त । —
अस्य पाठ-प्रवेशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पाठ आरम्भ होने से पहले पुस्तक बता दे ती है क प्रहे लका क्या है और उसे पढ़ने से क्या लाभ है।
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
संस्कृ त-सािहत्ये पहेिलकानां िविशष्टं स्थानम् अिस्त । संस्कृ त-सािहत्य में पहेिलयों का एक िवशेष स्थान है।
पहेिलकाः आबालवृद्धं मानिसकम् उ ल्लासं जनयिन्त । पहेिलयाँ बच्चों से ले क र बूढ़ों तक सबके मन में उ ल्लास (आनन्द ) उ त्पन्न करती है।ं
बुद्धेः तािक कशिक्तं वधयिन्त । वे बुिद्ध की तक करने की शिक्त को बढ़ ाती है।ं
िचन्तनक्षमतां िवकासयिन्त । वे सोचने की क्षमता का िवकास करती है।ं
पूवजानां कवीनां बुिद्धमत्तां क ल्पनाशिक्तं च दशयिन्त । और वे हमारे पूवज किवयों की बुिद्धमत्ता तथा क ल्पनाशिक्त को िदखाती है।ं
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
‘आबालवृद्धम्’ का अथ खो लए: आ + बाल + वृद्धम् = बालक से लेकर वृद्ध तक। यह अव्ययीभाव समास है,
इस लए रूप कभी नह बदलता। इसी तरह ‘आजन्म’ = जन्म से लेकर, ‘आसमुद्रम्’ = समुद्र तक।
Tip — पाठ के शीषक का अथ: यः जाना त सः प ण्डतः = ‘जो जानता है, वही प ण्डत है’। यह पं क्त तीसरी और
पाँचव प्रहे लका के अ न्तम चरण से ली गई है — यानी शीषक स्वयं पाठ के भीतर से आया है।
प्र.2 भोजनान्ते च क पेयं जयन्तः कस्य वै सुतः । कथं वष्णुपदं प्रोक्तं तक्रं शक्रस्य दुलभम् ॥ १ ॥ — ववरणम् –
भोजनस्य अन्ते क पानीयम् ? (......) । जयन्तः कस्य पुत्रः ? (......) । वष्णोः सा ध्यं कथम् उक्तम् ? (......) ।
तीन प्रश्न के उत्तर ोक के चौथे चरण म ही रख दए गए ह — यही इस प्रहे लका क चतुराई है।
भोजन के अन्त में पेय — त म् क्र
क्र
जयन्त का िपता — श ः (इन्द ः) → श स्य क्र
िवष्णुपद कै सा कहा गया — दुलभम्
क्र क्र
अिन्तम चरण = त ं श स्य दुलभम्
ववरणम् (प्रश्नः) उत्तरम् हन्द
भोजनस्य अन्ते िकं पानीयम् ? तक्रम् भोजन के अन्त म छाछ पीनी चा हए।
जयन्तः कस्य पुत्र ः ? शक्रस्य जयन्त इन्द्र का पुत्र है।
िवष्णोः सािन्नध्यं कथम् उक्तम् ? दुल भम् वष्णु का सा ध्य ( वष्णुपद) दुलभ कहा गया है।
अन्वयः तथा अथः: अन्वय — भोजनान्ते च क पेयम् ? जयन्तः वै कस्य सुतः ? वष्णुपदं कथं प्रोक्तम् ? (उत्तरम्
—) तक्रं, शक्रस्य, दुलभम् ।
अथ — भोजन के अन्त म क्या पीना चा हए? जयन्त कसका पुत्र है? वष्णुपद को कैसा कहा गया है? — उत्तर
क्रमशः छाछ, इन्द्र का, और दुलभ।
भाव — तीन अलग-अलग वषय (आहार, पुराण, अध्यात्म) के प्रश्न एक ही पं क्त म उत्तर पा जाते ह। क व पढ़ने
वाले से कहता है — ‘दे खो, उत्तर तुम्हारे सामने ही लखा है, पहचानो तो!’
शब्द-सङ् केत: शक्रः इन्द्र का पयाय है (शक् = समथ होना → श क्तशाली)। तक्रम् = मथा हुआ दही, छाछ;
आयुवद भी भोजन के बाद तक्र-पान को पाचक मानता है। वष्णुपदम् के दो अथ ह — आकाश, तथा वष्णु का
परम पद (मोक्ष) — दोन ही ‘दुलभ’ ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 न तस्या दन तस्यान्तो मध्ये यस्तस्य तष्ठ त । तवाप्य स्त ममाप्य स्त य द जाना स तद्वद ॥ २ ॥ — ववरणम् – तस्य
आ दः ‘न’ अ स्त, तस्य अन्तः अ प ‘न’ अ स्त, तस्य मध्ये ‘य’ तष्ठ त । तत् तव अ प अ स्त । मम अ प अ स्त ।
य द जाना स तत् वद – (......) ।
उत्तर है — नयनम् (आँख)।
न + य + न = नयनम्
आिद अक्षर = न · मध्य अक्षर = य · अन्त्य अक्षर = न
यह त म्ु हारे पास भी है, मेरे पास भी — आँख
अन्वयः तथा अथः: अन्वय — तस्य आ दः न (कारः), तस्य अन्तः (अ प) न (कारः), तस्य मध्ये यः (कारः) तष्ठ त;
तव अ प अ स्त, मम अ प अ स्त — य द जाना स तत् वद ।
अथ — उसका पहला अक्षर ‘न’ है, अ न्तम अक्षर भी ‘न’ है, और बीच म ‘य’ रहता है। वह तुम्हारे पास भी है और
मेरे पास भी। य द जानते हो तो बताओ।
भाव — यह अक्षर-प्रहे लका है — उत्तर वस्तु म नह , शब्द क बनावट म छपा है। क व पहले शब्द का ढाँचा दे ता
है, फर संकेत दे ता है क वह वस्तु सबके पास है — दोन संकेत मलाने पर ही ‘नयनम्’ नकलता है।
ध्यान द — ोक म स न्ध खुली क जए: ‘तस्या दः’ = तस्य + आ दः (द घ स न्ध)। ‘तस्यान्तः’ = तस्य + अन्तः।
‘तवाप्य स्त’ = तव + अ प + अ स्त। ‘ममाप्य स्त’ = मम + अ प + अ स्त। ‘तद्वद’ = तत् + वद। स न्ध खोलते ही
ोक ववरणम् जैसा सरल हो जाता है।
प्र.4 वृक्षस्याग्रे फलं दृष्टं फलाग्रे वृक्ष एव च । अकारा द सकारान्तं यो जाना त स प ण्डतः ॥ ३ ॥ — ववरणम् – वृक्षस्य
अग्रे फलं दृष्टं, फलस्य अग्रे वृक्षः एव च । अकारः यस्य आ दः, तथैव सकारः यस्य अन्ते अ स्त, तत् पदं यः जाना त
सः प ण्डतः – (......) ।
उत्तर है — अनानसः (अन ास, pineapple)।
अनान सः → आिद में अ, अन्त में स
पौधे के ऊपर फल, और फल के ऊपर िफर पत्तों का मुकु ट = ‘वृक्ष’
उत्तरम् — अनानसः
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः
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अन्वयः तथा अथः: अन्वय — वृक्षस्य अग्रे फलं दृष्टम्, फलस्य अग्रे च वृक्षः एव (दृष्टः); अकारा द सकारान्तं (तत्
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पदं ) यः जाना त सः प ण्डतः ।
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अथ — पेड़ .कcे ऊपर फल दखाई दे ता है, और फल के ऊपर फर पेड़ ही दखाई दे ता है।agजस शब्द का आरम्भ ‘अ’
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g — यह प्रहे लका दे खने क आदत पर चोट करती है। साधारणतः फल पेड़ के ऊपर होता है — पर अन ास म
अन्त ‘स’ से होता है, उसे जो जान ले वही प ण्डत है।
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फल के ऊपर भी हरे पत्त का गुच्छा (मुकुट) होता है, जो छोटे पौधे जैसा दखता है। क व इसी उलट -सी बात को
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पहेली बना दे ता है और साथ म अक्षर-संकेत (अ…स) भी जोड़ दे ता है, ता क उत्तर एक ही नकले।
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Try this: इसी ढाँचे पर अपनी पहेली बनाइए — ‘क’ से आरम्भ, ‘म’ से अन्त, जो पीला होता है और गुच्छे म
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लगता है (उत्तरम् — कदलीफलम्)। फर एक नई पहेली स्वयं रचकर कक्षा म पू छए।
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semपाठः — यः जाना त सः प ण्डतः (प्रहे लकाः ४–५ तथा प्रहे लकानाम् उत्तरा ण) — पृष्ठ 113
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एकादशः
प्रहे लका ४ (मृत्युञ्जयः), प्रहे लका ५ (कुम्भकणः) तथा उत्तर-पे टका
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पाठः
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प्र.1
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क मच्छ त नरः काश्यां भूपानां कोglरणे हतः । को वन्द्यः सवदे वानां द यतामेकमुत्तरम् ॥ ४ ॥ — ववरणम् –
मनुष्यः काश्यां कम् इच्छ त ? (......) । युद्धे महाराजानां कः हतः ? (......) । कः सवदे वानां वन्दनीयः ? एकपदे न
उत्तरं ददातु – (......) ।
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तीन प्रश्न, पर उत्तर माँगा गया है एक ही — मृत्युञ्जयः।
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काश्यां नरः इच्छित → मृत्युम्
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रणे भूपानां िहतः → जयः
gl→ सवदे वानां वन्द्यः
मृत्युम् + जयः = मृत्युञ् जयः (िशवः)
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ववरणम् (प्रश्नः) उत्तरम् हन्द
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मनुष्यः काश्यां िकम् इच्छित ? काशी म मनुष्य मृत्यु चाहता है।
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agl युद्धे महाराजानां कः िहतः ? जयः युद्ध म राजाओं का हत वजय म है।
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मृत्युञ्जयः
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कः सवदे वानां वन्दनीयः ? (एकपदे न) सब दे वताओं के वन्दनीय मृत्युञ्जय ( शव) ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
अन्वयः तथा अथः: अन्वय — नरः काश्यां कम् इच्छ त ? रणे भूपानां कः हतः ? सवदे वानां कः वन्द्यः ? एकम्
उत्तरं द यताम् ।
अथ — काशी म मनुष्य क्या चाहता है? युद्ध म राजाओं का हतकारी क्या है? सब दे वताओं के वन्दनीय कौन ह?
— इन तीन का एक ही उत्तर द जए।
भाव — पहले दो उत्तर (मृत्युम्, जयः) जोड़ते ही तीसरा उत्तर बन जाता है — मृत्युञ्जयः, अथात् जसने मृत्यु को
जीत लया — भगवान् शव। ‘द यताम् एकम् उत्तरम्’ का यही रहस्य है। परम्परा म काशी को मोक्षदा यनी माना गया
है, इसी लए वहाँ मनुष्य मृत्यु से डरता नह ।
स न्ध-सङ् केत: मृत्युम् + जयः = मृत्युञ्जयः — यहाँ अनुस्वार ‘म्’ आगे आने वाले ‘ज’ के वग का अनुना सक
‘ञ्’ बन गया (परसवण-स न्ध)। इसी नयम से ‘सम् + चयः = सञ्चयः’ बनता है। पुस्तक क उत्तर-पे टका इसी लए
‘मृत्युम् / जयः’ अलग-अलग छापती है — जोड़ना वद्याथ को है।
प्र.2 कुलालस्य गृहे ह्यध तदध ह स्तनापुरे । द्वयं म लत्वा लङ् कायां यो जाना त स प ण्डतः ॥ ५ ॥ — ववरणम् –
कुम्भकारस्य गृहे तस्य अध कम् अ स्त ? (......) । ह स्तनापुरे तस्य अपरम् अधम् कम् अ स्त ? (......) । द्वयं
म लत्वा पूणरूपं लङ् कायां कम् अ स्त ? (......) उत्तरं यः जाना त सः प ण्डतः ।
उत्तर है — कुम्भकणः। एक ही नाम के दो आधे भाग तीन अलग-अलग जगह पर रखे गए ह।
कु लालस्य (कु म्हार के ) गृहे → कु म्भः (घड़ ा)
हिस्तनापुरे → कणः (महाभारत का दानवीर कण)
कु म्भः + कणः = कु म्भकणः → लङ् कायाम् (रावण का भाई)
ववरणम् (प्रश्नः) उत्तरम् हन्द
कु म्भकारस्य ग ृहे तस्य अध ं िकम् अिस्त ? कु म्भः कुम्हार के घर म उसका आधा भाग ‘कुम्भ’ (घड़ा) है।
हिस्तनापुरे तस्य अपरम् अध ं िकम् अिस्त ? कणः ह स्तनापुर म उसका दूसरा आधा भाग ‘कण’ है।
द्वयं िमिलत्वा पूणरूपं लङ् कायां िकम् अिस्त ? कु म्भकणः दोन मलकर लङ् का म ‘कुम्भकण’ बनता है।
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अन्वयः तथा अथः: अन्वय — कुलालस्य गृहे ह (तस्य) अधम् (अ स्त), तदध ह स्तनापुरे (अ स्त); द्वयं म लत्वा
लङ् कायाम् (अ स्त) — (तत्) यः जाना त सः प ण्डतः ।
अथ — उसका एक आधा भाग कुम्हार के घर म है, दूसरा आधा ह स्तनापुर म है; दोन मलकर लङ् का म ह — जो
यह जान ले वही प ण्डत है।
भाव — यह पद- वभाजन क प्रहे लका है। उत्तर एक व्य क्त का नाम है, पर उसे तीन प्र सद्ध सन्दभ — कुम्हार
का घर, महाभारत का ह स्तनापुर और रामायण क लङ् का — म तोड़कर बखेर दया गया है। बु द्ध तभी उत्तर
पकड़ती है जब वह तीन सन्दभ को एक साथ जोड़ना जानती हो।
स न्ध खो लए: ‘ह्यधम्’ = ह + अधम् (यण् स न्ध — इ → य्)। ‘तदधम्’ = तत् + अधम्। ‘ म लत्वा’ म क्त्वा
प्रत्यय है — ‘ मलकर’।
प्र.3 प्रहे लकानाम् उत्तरा ण — पाठे प्रदत्तायाः उत्तर-पे टकायाः आधारेण पञ्चानां प्रहे लकानाम् उत्तरा ण क्रमेण
लखन्तु ।
पुस्तक ने पृष्ठ 113 पर हरी पे टका म पाँच उत्तर स्वयं छाप दए ह। उन्ह व्याख्या के साथ यहाँ रखा गया है।
प्रहे लका पुस्तकस्य उत्तरम् पूणम् उत्तरम् कथम् ?
१. तक्रं / शक्रस्य / दुल भम् तीन पथृ क् उ त्तर तीन उत्तर ोक के चौथे चरण म ही ह।
२. नयनम् नयनम् न-य-न — आ द और अन्त म ‘न’, मध्य म ‘य’।
३. अनानसः अनानसः अकारा द, सकारान्त; फल के ऊपर फर पत्त का ‘वृक्ष’।
४. मृत्युम् / जयः मृत्युञ्जयः (िशवः) दोन आधे उत्तर जोड़ने पर ‘एकम् उत्तरम्’ बनता है।
५. कु म्भः / कणः कु म्भकणः कुम्हार का घड़ा + ह स्तनापुर का कण = लङ् का का कुम्भकण।
ध्यान र खए: पे टका म ४ और ५ के उत्तर टु कड़ म दए ह (मृत्युम् / जयः, कुम्भः / कणः)। परीक्षा म य द पूछा
जाए ‘सवदे वानां वन्द्यः कः ?’ तो उत्तर मृत्युञ्जयः ल खए, केवल ‘मृत्युम्’ नह — क्य क ोक स्वयं ‘द यताम्
एकम् उत्तरम्’ कहता है।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 113
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पाठस्य पञ्च शब्दाः, तेषां संस्कृत-अथः, हन्द , English तथा ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भः
शब्दाथाः
प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — अधो ल खतानां शब्दानाम् अथ (संस्कृते, हन्द्याम्, आङ् ग्लभाषायां च) लखन्तु,
मातृभाषया अ प अथ लखन्तु — पेयम्, सुतः, तक्रम्, कुलालस्य, रणे ।
पुस्तक क ता लका ज्य -क -त्य , साथ म वाक्य-प्रयोग जससे शब्द याद रह जाए।
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
पेयम् पातुं योग्यम् पीने के योग्य Fit for drinking
सुतः पुत्रः पुत्र Son
तक्रम् म थतम् छाछ, म ा Butter milk
कु लाल स्य कुम्भकारस्य कु म्हार का Of the potter
रणे युद्धे युद्ध में In war
‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भ कैसे भर: अ न्तम खाना खाली छोड़ा गया है क्य क हर वद्याथ क मातृभाषा
अलग है। उदाहरण के लए — तक्रम् : मराठ म ‘ताक’, गुजराती म ‘છાશ’, त मल म ‘ேமார் ’, बंगला म ‘ ঘাল’,
पंजाबी म ‘ਲੱ ਸੀ/ਛਾਹ’। अपनी भाषा का शब्द अपनी पुस्तक म ल खए।
वाक्य-प्रयोग करके दे खए:
• भोजनान्ते तक्रं पेयम् अ स्त ।
• जयन्तः इन्द्रस्य सुतः अ स्त ।
• कुलालस्य गृहे कुम्भाः स न्त ।
• रणे जयः रा ां हतः भव त ।
ध्यान द जए — ‘कुलालस्य’ म षष्ठी वभ क्त और ‘रणे’ म सप्तमी वभ क्त है।
अवधेयांशः — पृष्ठ 114
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पठन्तु अवगच्छन्तु लखन्तु च — गुरु- शष्यसम्बन्धः, ग्रन्थः ग्रन्थकता च, प त-पत्नीसम्बन्धः (षष्ठी वभक्तेः प्रयोगः)
अवधे यां शः
प्र.1 पठन्तु अवगच्छन्तु लखन्तु च — गुरु- शष्यसम्बन्धः : ीरामस्य गुरुः व सष्ठः । व सष्ठस्य शष्यः ीरामः । (आ द)
— एतेषु वाक्येषु कः नयमः कायरतः अ स्त ? सवा ण युग्मा न लखन्तु ।
नयम एक ही है — जहाँ सम्बन्ध है वहाँ षष्ठी वभ क्त है। ‘क का गुरु ख’ कहना हो तो ‘क’ म षष्ठी लगती है।
शष्यस्य दृ ा गुरोः दृ ा हन्द
ीराम स्य ग रु
ु ः विसष्ठः । विस ष्ठस्य िशष्यः ीरामः । श्रीराम के गुरु व सष्ठ ह।
कणस्य ग रु
ु ः परशुर ामः । परशुरामस्य िशष्यः कणः । कण के गुरु परशुराम ह।
अजुनस्य ग रु
ु ः द ोणः । द ोणस्य िशष्यः अजुनः । अजुन के गुरु द्रोण ह।
चन्द ग प्ु तस्य ग रु
ु ः चाणक्यः । चाणक्यस्य िशष्यः चन्द गुप्तः । चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य ह।
पद्मपाद स्य ग रु
ु ः शङ् कराचायः । शङ् कराचायस्य िशष्यः पद्मपादः । पद्मपाद के गुरु शङ् कराचाय ह।
िववेक ानन्द स्य ग रु
ु ः रामकृ ष्णः । रामकृ ष्णस्य िशष्यः िववेक ानन्दः । ववेकानन्द के गुरु रामकृष्ण ह।
दोन दशाओं म क्य लखवाया गया: हन्द म हम ‘राम का गुरु’ और ‘व सष्ठ का शष्य’ — दोन कह सकते ह।
संस्कृत म भी वही होता है, बस षष्ठी उसी शब्द पर लगती है जससे सम्बन्ध जोड़ा जा रहा है। इस लए एक ही जोड़ी
से दो वाक्य बन जाते ह।
प्र.2 ग्रन्थः ग्रन्थकता च — रामायणस्य रच यता वाल्मी कः । वाल्मीकेः काव्यं रामायणम् । (आ द) — सवा ण युग्मा न
लखन्तु ।
यही षष्ठी दूसरे वषय पर — ग्रन्थ और उसका रच यता।
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ग्रन्थस्य दृ ा रच यतुः दृ ा हन्द
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रामायणस्य रचियता वाल्मीिकः । वाल्मीके ◌ः काव्यं रामायणम् ।
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रामायण के रच यता वाल्मी क ह।
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महाभारतस्य रचियता व्यासः । व्यास स्य काव्यं महाभारतम् । महाभारत के रच यता व्यास ह।
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कणभार स्य रचियता भासः । भास स्य नाटकं कणभारम् । कणभार के रच यता भास ह।
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कािलदास स्य काव्यं.cरघु ag
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रघुवंशस्य रचियता कािलदासः । रघुवंश के रच यता का लदास ह।
णुशlमaण◌ः कृ ितः पञ्चतन्त्रम् ।
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पञ्चतन्त्र स्य रचियता िवष्णश
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a पञ्चतन्त्र के रच यता वष्णुशमा ह।
िहतोपदे शस्य रचियता नारायणपिण्डतः । नारायणपिण्डतस्य कृ ितः िहतोपदे शः ।
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हतोपदे श के रच यता नारायणप ण्डत ह।
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दो रूप ध्यान से दे खए: ‘वाल्मी क’ इकारान्त शब्द है, इस लए षष्ठी म वाल्मीकेः बनता है (वाल्मी कस्य नह )।
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a s emशमा’ नकारान्त (शमन्) शब्द है, इस लए षष्ठी म वष्णुशमणः बनता है। बाक सब अकारान्त ह, इस लए सीधा
gl ‘-स्य’ लगा।
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Did you know? ‘कणभारम्’ महाक व भास का एक अङ् क का नाटक है, जसम कण अपने कवच-कुण्डल agl
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दान कर दे ता है। ‘काव्यम्’, ‘नाटकम्’ और ‘कृ तः’ — तीन शब्द पुस्तक ने रचना के प्रकार के अनुसार बदले ह, यह
भी ध्यान दे ने योग्य है। a
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प त-पत्नीसम्बन्धः — अरुन्धत्याः प तः व सष्ठः । व सष्ठस्य पत्नी अरुन्धती । (आ द) — सवा ण युग्मा न लखन्तु
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यहाँ स्त्री लङ्ग शब्द के षष्ठी-रूप सीखने को मलते ह — यही आगे अभ्यास ५ म काम आएँगे।
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पत्न्याः दृ ा षष्ठी-रूपम्
अरुन्धत्याः पितः विसष्ठः । विस ष्ठस्य पत्नी अरुन्धती ।
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अरुन्धती → अरुन्धत्याः
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सीतायाः पितः ीरामः । ीरामस्य पत्नी सीता ।
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उिमलायाः पितः लक्ष्म णः । ल क्ष्मणस्य पत्नी उिमला । उ मला → उ मलायाः
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कुन्ती → कुन्त्याः
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कृ ष्णस्यmपत्नी रुिक्मणी । a
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रुिक्मण्याः पितः कृ ष्णः । रु क्मणी → रु क्मण्याः
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सुभद ायाः पितः अजुनः । सुभद्रा → सुभद्रायाः
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
नयम पक ड़ए: आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द म षष्ठी एकवचन का रूप -आयाः होता है (सीता → सीतायाः, सुभद्रा
→ सुभद्रायाः)। ईकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द म -याः होता है और ‘ई’ ‘य्’ बन जाती है (कुन्ती → कुन्त्याः, रु क्मणी →
रु क्मण्याः, नद → नद्याः)। यह भेद पहचान लेने पर अभ्यास ५ क पूरी स्त्री लङ्ग ता लका बना अटके भर जाएगी।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 115
प्रश्नाः १–३ : एकपदे न उत्तरम्, पूणवाक्येन उत्तरम् तथा षष्ठी- वभक्त्यन्ता न शब्दरूपा ण (पृष्ठ 115–116)
अभ्यासः
प्र.1 पाठस्य आधारेण नम्न ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरं लखन्तु — (क) भोजनान्ते पातुं योग्यं कम् ? (ख)
सवदे वानां वन्दनीयः कः ? (ग) जयन्तः कस्य सुतः ? (घ) लङ् कायां म लत्वा कस्य पूणरूपम् अ स्त ?
चार उत्तर एक-एक पद म — जैसा प्रश्न माँगता है।
प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द
(क) भोजनान्ते पातुं योग्यं िकम् ? तक्रम् भोजन के अन्त म पीने योग्य छाछ है।
(ख) सवदे वानां वन्दनीयः कः ? मृत्युञ्जयः सब दे वताओं के वन्दनीय मृत्युञ्जय ( शव) ह।
(ग) जयन्तः कस्य सुतः ? शक्रस्य जयन्त इन्द्र का पुत्र है।
(घ) लङ् कायां िमिलत्वा कस्य पूणरूपम् अिस्त ? कु म्भकणस्य लङ् का म मलकर ‘कुम्भकण’ का पूण रूप बनता है।
वभ क्त ठ क र खए: (ग) म प्रश्न ‘कस्य सुतः?’ है — प्रश्न ही षष्ठी म है, इस लए उत्तर भी षष्ठी एकवचन म —
‘शक्रस्य’, केवल ‘शक्रः’ नह । इसी प्रकार (घ) म ‘कस्य पूणरूपम्?’ का उत्तर कुम्भकणस्य (षष्ठी, एकवचन, पुं लङ्ग)
होगा। (क) का प्रश्न ‘ कम्?’ है, इस लए उत्तर प्रथमा म — ‘तक्रम्’ (नपुंसक लङ्ग, एकवचन)।
Check it yourself: उत्तर लखने के बाद प्रश्न और उत्तर जोड़कर प ढ़ए — ‘जयन्तः शक्रस्य सुतः’ — य द
वाक्य अपने आप सही बन जाए तो वभ क्त ठ क है।
प्र.2 पाठस्य आधारेण नम्न ल खतानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखन्तु — (क) वष्णुपदं कथं प्रोक्तम् ? (ख) कस्य
आ दः अन्तः च ‘न’ अ स्त ? (ग) नरः काश्यां कम् इच्छ त ? (घ) कुलालस्य गृहे अध कम् अ स्त ?
यहाँ पूरा वाक्य चा हए — प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म लौटाइए और प्रश्नवाचक पद क जगह उत्तर रख द जए।
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प्रश्नः उत्तरम् (पूणवाक्येन) हन्द
(क) िवष्णपु दं कथं पोक्तम् ? िवष्णुपदं दुल भम् इित पोक्तम् । वष्णुपद को दुलभ कहा गया है।
(ख) कस्य आिदः अन्तः च ‘न’ अिस्त नयनम् इित पद स्य आिदः अन्तः च ‘न’ अिस्त ‘नयनम्’ शब्द का आ द और अन्त ‘न’ है।
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(ग) नरः काश्यां िकम् इच्छित ? नरः काश्यां मृत्युम् इच्छित । मनुष्य काशी म मृत्यु चाहता है।
(घ) कु लालस्य ग ृहे अध ं िकम् अिस्त कु लाल स्य गृहे ‘कु म्भः’ अिस्त । कुम्हार के घर म (कुम्भकण का आधा भाग) ‘कुम्भ’
? है।
पूणवाक्येन उत्तर लखने क व ध: प्रश्न म जो प्रश्नवाचक पद है (कथम्, कस्य, कम्) उसे हटाकर वह उत्तर-पद
रख द जए, शेष वाक्य ज्य -का-त्य रहने द जए। जैसे — ‘नरः काश्यां कम् इच्छ त ?’ → ‘नरः काश्यां मृत्युम्
इच्छ त ।’ इससे वभ क्त और वचन अपने आप ठ क बैठ जाते ह।
Tip: (ख) म ‘कस्य’ का उत्तर दे ते समय ‘नयनम् इ त पदस्य’ ल खए — ‘इ त’ लगाने से स्पष्ट हो जाता है क हम
आँख क नह , शब्द क बात कर रहे ह।
प्र.3 अधो ल खता न शब्दरूपा ण पठन्तु अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — (षष्ठी- वभक्त्यन्ता न रूपा ण : अकारान्त-पुं लङ्गम्,
आकारान्त-स्त्री लङ्गम्, ईकारान्त-स्त्री लङ्गम्, अकारान्त-नपुंसक लङ्गम् तथा सवनामपदा न) ।
यह ता लका पृष्ठ 115 पर आरम्भ होकर पृष्ठ 116 पर पूरी होती है। पूरी ता लका नीचे एक साथ है — इसे केवल प ढ़ए नह , ज़ोर से
बोलकर याद क जए।
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लङ्गम् शब्दः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
अकारान्त- छात्रः छात्रस्य छात्रयोः छात्राणाम्
पुं लङ्गम्
िवद्यालयः िवद्यालयस्य िवद्यालययोः िवद्यालयानाम्
सुतः सुतस्य सुतयोः सुतानाम्
रामः रामस्य रामयोः रामाणाम्
आकारान्त- सीता सीतायाः सीतयोः सीतानाम्
स्त्री लङ्गम्
कथा कथायाः कथयोः कथानाम्
िपया िपयायाः िपययोः िपयाणाम्
ईकारान्त- नदी नद्याः नद्योः नदीनाम्
स्त्री लङ्गम्
दे वी दे व्याः दे व्योः दे वीनाम्
अकारान्त- पुस्तकम् पुस्तक स्य पुस्तकयोः पुस्तकानाम्
नपुंसक लङ्गम्
उद्यानम् उ द्यानस्य उ द्यानयोः उ द्यानानाम्
फलम् फल स्य फलयोः फलानाम्
भोजनम् भोजनस्य भोजनयोः भोजनानाम्
सवनामपदा न अहम् (अस्मद् ) मम आवयोः अस्माकम्
त्वम् (युष्मद् ) तव युवयोः युष्माकम्
तत् (पुंिलङ् गम्) तस्य तयोः तेषाम्
तत् (स्त्रीिलङ् गम्) तस्याः तयोः तासाम्
तत् (नपुंस किलङ् गम्) तस्य तयोः तेषाम्
एतत् (पुंिलङ् गम्) एतस्य एतयोः एतेषाम्
एतत् (स्त्रीिलङ् गम्) एतस्याः एतयोः एतासाम्
एतत् (नपुंस किलङ् गम्) एतस्य एतयोः एतेषाम्
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ता लका म जो चार बात छपी ह:
पुं लङ्ग और नपुंसक लङ्ग के षष्ठी-रूप बलकुल एक जैसे ह — स्य / योः / आनाम् (छात्रस्य ~ पुस्तकस्य)।
केवल प्रथमा म भेद दखता है।
बहुवचन म ‘न’ के पहले ‘ण’ कब बनता है — य द शब्द म पहले ‘र’ या ‘ऋ’ आ चुका हो : छात्र◌ाणाम्,
रामाणाम्, प् रयाणाम् — पर सुतानाम्, कथानाम् (यहाँ ‘र’ नह है)।
आकारान्त और ईकारान्त का भेद — सीता → सीतायाः, पर नद → नद्याः (‘ई’ ‘य्’ बन गई)।
सवनाम म ‘मम’ और ‘तव’ ही षष्ठी ह — ये ‘मेरा’ और ‘तुम्हारा’ के अथ म ह, इस लए इनम ‘-स्य’ नह
लगता।
ध्यान द: पुस्तक क मु द्रत ता लका म वद्यालययोः ( द्ववचन) तथा प्रयायाः / प्रययोः इसी रूप म छपे ह —
नयम भी यही कहता है, अतः इन्ह ऐसे ही स्मरण क जए।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 116
प्रश्नः ४ : उदाहरणानुसारं वाक्या न लखन्तु (षष्ठीरूपेण रक्त ानपू तः)
अभ्यासः
प्र.4 उदाहरणानुसारं वाक्या न लखन्तु — यथा – वद्यालयः, छात्रः → ‘ वद्यालयस्य’ ‘छात्रः’ गच्छ त । (क)
द्वच क्रका, चक्रम् — ......... ......... भ्रम त । (ख) वृक्षः, फलम् — ......... ......... खाद त । (ग) छात्रा, नाम —
......... ......... पृच्छ त । (घ) रामः, पुस्तकम् — ......... ......... आनय त । (ङ) म न्दरम्, शखरम् — .........
......... पश्य त ।
हर पं क्त म पहला शब्द षष्ठी म बदलना है, दूसरा शब्द ज्य -का-त्य रहेगा।
क्रमः प्रदत्तौ शब्दौ पूण वाक्यम् हन्द
यथा वद्यालयः, छात्रः िवद्यालयस्य छात्रः गच्छित । वद्यालय का छात्र जाता है।
(क) द्वच क्रका, चक्रम् िद्वचिक्रकायाः चक्रं भमित । साइ कल का प हया घूमता है।
(ख) वृक्षः, फलम् वृक्षस्य फलं खादित । (वह) पेड़ का फल खाता है।
(ग) छात्रा, नाम छात्रायाः नाम पच्ृ छित । (वह) छात्रा का नाम पूछता है।
(घ) रामः, पुस्तकम् रामस्य पुस्तकम् आनयित । (वह) राम क पुस्तक लाता है।
(ङ) म न्दरम्, शखरम् मिन्दरस्य िशखरं पश्यित । (वह) म न्दर का शखर दे खता है।
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कौन-सा रूप कहाँ से आया:
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द्वच क्रका — आकारान्त स्त्री लङ्ग → द्वच क्रकायाः
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वृक्षः, रामः, म न्दरम्, वद्यालयः — अकारान्त → -स्य (वृक्षस्य, रामस्य, म न्दरस्य)
a gl छात्रा — आकारान्त स्त्री लङ्ग → छात्रायाः (छात्रस्य नह ! ‘छात्रः’ का षष्ठी ‘छात्रस्य’, पर ‘छात्रा’ का ‘छात्रायाः’)
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सब रूप षष्ठी वभ क्त, एकवचन म ह।
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एक बारीक बात: उदाहरण-वाक्य म ‘छात्रः’ स्वयं कता है (छात्र जाता है)। पर (ख), (ग), (घ), (ङ) म कता वाक्य म
लखा नह है — वहाँ ‘सः’ (वह) अध्याहृत है और ‘फलम्, नाम, पुस्तकम्, शखरम्’ कम ह। चाह तो कता जोड़कर
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पूरा वाक्य भी लख सकते ह — ‘बालकः वृक्षस्य फलं खाद त ।’ (क) म ‘चक्रम्’ ही कता है, इस लए वहाँ कुछ
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जोड़ने क आवश्यकता नह ।
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a अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 117
वयम्
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प्रश्नाः ५–६ : ता लकायां प्रदत्तानां शब्दानां षष्ठी वभक्तेः रूपा ण तथा कुटु म्बस्य प रचयः
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अभ्यासः
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ता लकायां प्रदत्तानां शब्दानां षष्ठी वभक्तेः रूपा ण रक्त ानेषु लखन्तु — पुं लङ्गम् : दे वः (दे वस्य), वृक्षः,
प्र.5
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द्वारपालः, स्यूतः, अनुजः, अग्रजः, पतामहः, मातुलः, प्राचायः, वद्यालयः, पतृव्यः । स्त्री लङ्गम् : रमा (रमायाः),
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छात्रा, दोला, उपासना, पु स्तका, भ्रातृजाया, अग्रजा, स्नुषा, लेखनी, पत्नी, पुत्री । नपुंसक लङ्गम् : भवनम्
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(भवनस्य), उद्यानम्, वनम्, सूत्रम्, पत्रम्, यन्त्रम्, वातायनम्, पुष्पम्, सङ्गणकम्, गृहम्, वातापत्रम् ।
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agl उत्तर
तीन स्तम्भ पूरे भरे हुए, अथ स हत। पुस्तक म दे वस्य, रमायाः और भवनस्य पहले ही लाल स्याही म दए ह।
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पुं लङ्गम् षष्ठी-रूपम् स्त्री लङ्गम् षष्ठी-रूपम् नपुंसक लङ्गम् षष्ठी-रूपम्
दे वः दे वस्य रमा रमायाः भवनम् भवनस्य
वृक्षः वृक्षस्य छात्रा छात्रायाः उद्यानम् उ द्यानस्य
द्वारपालः द्वारपाल स्य दोला दोलायाः वनम् वनस्य
स्यूतः स्यूतस्य उपासना उपासनायाः सूत्र म् सूत्रस्य
अनुजः अनुजस्य पुिस्तका पुिस्तकायाः पत्रम् पत्रस्य
अग जः अगजस्य ृ ाया
भातज भातजृ ायायाः यन्त्रम् यन्त्रस्य
िपतामहः िपतामहस्य अग जा अगजायाः वातायनम् वातायनस्य
मातुल ः मातुल स्य स्नुषा स्नुषायाः पुष्पम् पुष्पस्य
पाचायः पाचायस्य ले खनी ले खन्याः सङ् गणकम् सङ् गणक स्य
िवद्यालयः िवद्यालयस्य पत्नी पत्न्याः ग ृहम् गृहस्य
िपतव्ृ यः िपतव्ृ यस्य पुत्र ी पुत्र्याः वात पत्रम् वात पत्रस्य
तीन नयम, ततीस उत्तर:
अकारान्त पुं लङ्ग तथा नपुंसक लङ्ग → अन्त का ‘◌ः’/‘म्’ हटाकर -स्य जो ड़ए। (वृक्षः → वृक्षस्य, गृहम् →
गृहस्य)
आकारान्त स्त्री लङ्ग → -आयाः। (दोला → दोलायाः, स्नुषा → स्नुषायाः)
ईकारान्त स्त्री लङ्ग → अ न्तम ‘ई’ को ‘य्’ करके -याः। (लेखनी → लेखन्याः, पत्नी → पत्न्याः, पुत्री → पुत्र्याः)
अथ भी साथ याद क जए — स्यूतः थैला, द्वारपालः दरबान, अनुजः छोटा भाई, अग्रजः बड़ा भाई, पतामहः
दादा, मातुलः मामा, पतृव्यः चाचा, दोला झूला, भ्रातृजाया भाभी, स्नुषा बहू, लेखनी कलम, वातायनम् खड़क ,
सङ्गणकम् कम्प्यूटर, वातापत्रम् समाचार-पत्र। एक ही अभ्यास म षष्ठी भी और कुटु म्ब-शब्दावली भी।
प्र.6 रक्त ानेषु कुटु म्बस्य प रचयं लखन्तु — यथा – मम नाम दनेशः । मम पतुः नाम सुरेशः । मम मातुः नाम
......... । मम अग्रजस्य नाम ......... । मम अनुजायाः नाम ......... । मम पतामहस्य नाम ......... । मम पतामह्याः
नाम ......... । मम पतृव्यस्य नाम ......... । मम पतृव्यायाः नाम ......... । एतत् मम कुटु म्बकम् ।
यह अपने प रवार का प रचय है, इस लए नाम आपके अपने ह गे। पहले व ध सम झए, फर नीचे दया नमूना दे खकर अपनी पुस्तक
म भ रए।
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व ध — कस सम्बन्धी के लए कौन-सा षष्ठी-रूप:
मातुः (माता का) तथा पतुः ( पता का) — ये ऋकारान्त शब्द के षष्ठी-रूप ह, इनम ‘-स्य’ नह लगता।
अग्रजस्य (बड़े भाई का), पतामहस्य (दादा का), पतृव्यस्य (चाचा का) — अकारान्त पुं लङ्ग → -स्य।
अनुजायाः (छोट बहन का), पतृव्यायाः (चाची का) — आकारान्त स्त्री लङ्ग → -आयाः।
पतामह्याः (दाद का) — ईकारान्त स्त्री लङ्ग ( पतामही) → -याः।
नमूना उत्तर:
मम नाम िदने शः । मम िपत ःु नाम सुरेशः ।
मम मात ःु नाम सुन ीता । मम अगजस्य नाम महेशः ।
मम अनुजायाः नाम अनीता । मम िपतामहस्य नाम रमेशः ।
मम िपताम ाः नाम सरोजा । मम िपत ृव्यस्य नाम गणेशः ।
मम िपत ृव्यायाः नाम कमला । एतत् मम कु टु म्बकम् ।
Try this: नमूने के नाम क जगह अपने घर के नाम र खए। य द आपके कुटु म्ब म कोई सदस्य न हो (जैसे
अनुजा), तो उस पं क्त के ान पर दूसरी पं क्त ल खए — ‘मम भ गन्याः नाम ......... ।’ या ‘मम मातुलस्य नाम
......... ।’ नाम संस्कृत-रूप म ल खए, जैसे ‘सुनीता’, ‘रमेशः’, ‘अनीता’।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 118
प्रश्नाः ७–८ : ीरामस्य कुटु म्बस्य रेखा चत्रात् वाक्यरचना तथा पुस्तकसूच्याः आधारेण ‘कस्य उप र कम्’
अभ्यासः
प्र.7 अधः ीरामस्य कुटु म्बस्य रेखा चत्रम् अ स्त । चत्रं दृष्ट् वा उदाहरणानुसारं वाक्या न रचयन्तु — यथा – रामस्य पता
दशरथः । ( चत्रे — रामः, सीता, दशरथः, कौशल्या, जनकः, सुनयना, लक्ष्मणः, लवः तथा सम्बन्धवाचका न पदा न
— पता, माता, पुत्रः, पुत्री, प तः, पत्नी, श्वशुरः, श्व ूः, स्नुषा, जामाता, अग्रजः, अनुजः, दे वरः, भ्रातृजाया ।)
रेखा चत्र म बीच म छह चत्र ह — दशरथः, कौशल्या, जनकः, सुनयना, लक्ष्मणः, लवः। बाईं ओर रामः, दाईं ओर सीता। बाईं
ओर के तीर बताते ह क राम का उससे क्या सम्बन्ध है, दाईं ओर के तीर सीता का। हर जोड़ी से दो-दो वाक्य बनते ह।
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चत्रे व्य क्तः रामेण सह सम्बन्धः सीतया सह सम्बन्धः
दशरथः रामस्य िपता दशरथः । सीतायाः श्वशुरः दशरथः ।
दशरथस्य पुत्रः रामः । दशरथस्य स्नुषा सीता ।
कौशल्या रामस्य माता कौशल्या । सीतायाः श्व ूः कौशल्या ।
कौशल्यायाः पुत्रः रामः । कौशल्यायाः स्नुषा सीता ।
जनकः रामस्य श्वशुरः जनकः । सीतायाः िपता जनकः ।
जनक स्य जामाता रामः । जनक स्य पुत्री सीता ।
सुनयना रामस्य श्व ूः सुनयना । सीतायाः माता सुनयना ।
सुनयनायाः जामाता रामः । सुनयनायाः पुत्री सीता ।
ल क्ष्मणः रामस्य अनुजः ल क्ष्मणः । सीतायाः दे वरः ल क्ष्मणः ।
ल क्ष्मणस्य अगजः रामः । ल क्ष्मणस्य भातजृ ाया सीता ।
लवः रामस्य पुत्रः लवः । सीतायाः पुत्रः लवः ।
लवस्य िपता रामः । लवस्य माता सीता ।
रामः – सीता सीतायाः पितः रामः । रामस्य पत्नी सीता ।
सम्बन्धवाचक शब्द के अथ: श्वशुरः = ससुर, श्व ूः = सास, स्नुषा = बहू, जामाता = दामाद, दे वरः = दे वर (प त
का छोटा भाई), भ्रातृजाया = भाभी (भाई क पत्नी), अग्रजः = बड़ा भाई, अनुजः = छोटा भाई। ध्यान द जए —
सीता के लए लक्ष्मण दे वरः है और लक्ष्मण के लए सीता भ्रातृजाया है; एक ही रश्ते के दो नाम, दशा के अनुसार।
Check it yourself: जसका सम्बन्ध बताना है, षष्ठी उसी पर लगेगी — ‘रामस्य पता दशरथः’ पर ‘दशरथस्य
पुत्रः रामः’। स्त्री लङ्ग नाम म रूप बदलेगा — सीता → सीतायाः, कौशल्या → कौशल्यायाः, सुनयना →
सुनयनायाः।
प्र.8 नम्नाङ् कत-पुस्तकसू च-मध्ये कस्य उप र कम् अ स्त इ त लखन्तु — यथा – १. लीलावत्याः उप र पञ्चतन्त्रम्
अ स्त । २. भगव तायाः उप र लीलावती अ स्त । (सूची — (क) पञ्चतन्त्रम्, (ख) लीलावती, (ग) भगव ता,
(घ) रामायणम्, (ङ) हतोपदे शः, (च) योगशास्त्रम्, (छ) रघुवंशम्, (ज) मनुस्मृ तः, (झ) अमरकोषः, (ञ)
अष्टाध्यायी, (ट) महाभारतम्, (ठ) अथशास्त्रम् ।)
बारह ग्रन्थ ऊपर से नीचे क्रम म रखे ह, इस लए ग्यारह वाक्य बनते ह। पहले दो पुस्तक ने स्वयं दे दए ह।
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क्रमः वाक्यम् हन्द
१. लीलावत्याः उपिर पञ्चतन्त्रम् अिस्त । (उदाहरणम्) लीलावती के ऊपर पञ्चतन्त्र है।
२. भगवद् गीतायाः उपिर लीलावती अिस्त । (उदाहरणम्) भगव ता के ऊपर लीलावती है।
३. रामायणस्य उपिर भगवद् गीता अिस्त । रामायण के ऊपर भगव ता है।
४. िहतोपदे शस्य उपिर रामायणम् अिस्त । हतोपदे श के ऊपर रामायण है।
५. योगशास्त्रस्य उपिर िहतोपदे शः अिस्त । योगशास्त्र के ऊपर हतोपदे श है।
६. रघुवंशस्य उपिर योगशास्त्रम् अिस्त । रघुवंश के ऊपर योगशास्त्र है।
७. मनुस्मृतेः उपिर रघुवंशम् अिस्त । मनुस्मृ त के ऊपर रघुवंश है।
८. अमरकोषस्य उपिर मनुस्मृितः अिस्त । अमरकोष के ऊपर मनुस्मृ त है।
९. अष्टाध्याय्याः उपिर अमरकोषः अिस्त । अष्टाध्यायी के ऊपर अमरकोष है।
१०. महाभारतस्य उपिर अष्टाध्यायी अिस्त । महाभारत के ऊपर अष्टाध्यायी है।
११. अथशास्त्रस्य उपिर महाभारतम् अिस्त । अथशास्त्र के ऊपर महाभारत है।
‘उप र’ के साथ षष्ठी क्य : संस्कृत म उप र, अधः, पुरतः, पृष्ठतः, समीपे जैसे अव्यय जस वस्तु के सन्दभ म
प्रयुक्त ह , उस शब्द म षष्ठी वभ क्त लगती है — ‘वृक्षस्य उप र’, ‘पयङ् कस्य अधः’। इसी लए इस अभ्यास म सब
पुस्तक-नाम षष्ठी म आए ह।
क ठन षष्ठी-रूप एक जगह: लीलावती → लीलावत्याः · भगव ता → भगव तायाः · मनुस्मृ तः → मनुस्मृतेः
(इकारान्त स्त्री लङ्ग) · अष्टाध्यायी → अष्टाध्याय्याः (ईकारान्त) · शेष सब अकारान्त, अतः -स्य।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 119
प्रहे लकाशब्दस्य नवचनम्, षष्ठी वभक्तेः प रचयः, ‘हस्तकुटु म्बकम्’ गीतम् तथा द्वौ सुभा षत ोकौ
योग्यता वस्तरः
प्र.1 प्रकृष्टा हे लका – प्रहे लका । हेला इत्यस्य क्र डा इत्यथः अ स्त । प्र हल त अ भप्रायं सूचय त इ त प्रहे लका ।
वनोदकलासु प्रहे लका अन्तगता भव त । — ‘प्रहे लका’ इ त शब्दस्य नवचनं स्पष्टीकुवन्तु ।
‘प्रहे लका’ शब्द कैसे बना, पुस्तक तीन तरीक़ से बताती है।
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प (पकृ ष्ट = ेष्ठ) + हेिलका → पहेिलका
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omल) → पहेिलका = ‘ ेष्ठ खेल’
हेला = क्रीडाc(खे
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l as = अिभपायं सूचयित (संकेत से अथ बताती है)
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
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पकृ ष्टा हेिलका – पहेिलका ।
g l as ेष्ठ ‘हेिलका’ ही ‘पहेिलका’ है।
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हेल ा इत्यस्य क्रीडा इत्यथः अिस्त । ‘हेल ा’ शब्द का अथ खेल है।
जो संके त से अपना अिभपाय सुझा दे , वह पहेिलका है।.co
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पिहलित अिभपायं सूचयित इित पहेिलका ।
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मनोरंजन की कलाओं में पहेिलका भी सिgम्मिलत
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िवनोदकलासु िलका अन्तगता भवित ।
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ag इसका मतलब क्या नकला: प्रहे लका केवल हँसी-मज़ाक़ नह है — वह खेल भी है और संकेत क कला भी।
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उत्तर सीधे नह बताया जाता, केवल इशारा कया जाता है; उस इशारे को पकड़ना ही बु द्ध का व्यायाम है। इसी लए
इसे ‘ वनोदकला’ क श्रेणी म रखा गया है।
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प्र.2 षष्ठी वभक्तेः प रचयं प्रा ुवन्तु — यत्र सम्बन्धः भव त तत्र षष्ठी वभ क्तः भव त । यथा – ‘बालकस्य पुस्तकम्’
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अत्र पुस्तकस्य सम्बन्धः बालकेन सह अ स्त अतः ‘बालक’ इ त शब्दे षष्ठी वभ क्तः अ स्त । — नयमं स्पष्टीकृत्य
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पञ्च उदाहरणा न लखन्तु ।
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पूरे पाठ का व्याकरण- नयम यही एक वाक्य है — यत्र सम्बन्धः भव त तत्र षष्ठी वभ क्तः भव त।
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बालक स्य पुस्तकम् = बालक का पुस्तक
पुस्तक का सम्बन्ध बालक से है → ‘बालक’ में षष्ठी
िहन्दी-िचह्न : का · के · की · रा · रे · री
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 11 यः जाना त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions
उदाहरणम् षष्ठ्यन्तं पदम् हन्द
रामस्य िपता दशरथः । रामस्य राम के पता दशरथ ह।
सीतायाः माता सुनयना । सीतायाः सीता क माता सुनयना ह।
कु लालस्य ग ृहे कु म्भः अिस्त । कु लाल स्य कुम्हार के घर म घड़ा है।
छात्राणां पुस्तकािन सिन्त । छात्राणाम् छात्र क पुस्तक ह।
मम मातुः नाम सुनीता । मम, मातुः मेरी माता का नाम सुनीता है।
सावधानी — हर ‘का/के/क ’ षष्ठी नह : ‘वृक्षस्य उप र’ म भी षष्ठी है, पर वहाँ अथ ‘का’ नह , ‘के ऊपर’ है —
उप र, अधः, समीपे, पुरतः, पृष्ठतः जैसे अव्यय के साथ भी षष्ठी आती है। षष्ठी का मूल काम एक ही है — दो पद
को जोड़ना।
Tip — पहचान का सरल तरीक़ा: वाक्य म उस पद को ढूँ ढ़ए जसके बाद हन्द म ‘का/के/क ’ आता है। संस्कृत
म उसी पद पर -स्य / -आयाः / -याः / -योः / -आनाम् लगेगा।
प्र.3 अधो ल खतं गीतं सस्वरं गायन्तु स्मरन्तु च — हस्तकुटु म्बकम् : एषः स्नेहालुः तातः – अङ्गष्ठः ॥ नकटे नवस त ननु
माता – तजनी ॥ ज्येष्ठा पुत्री द घतमा – मध्यमा ॥ तस्याः भ गनी मनोरमा – अना मका ॥ क नष्ठबाला अन्ते च –
क न ष्ठका ॥ हस्तकुटु म्बं मम पश्य । हस्तद्वयेन प्रणमा म । आशीवादं वन्दा म ॥
यह एक प्यारा-सा गीत है जसम हाथ क पाँच अँगु लयाँ एक कुटु म्ब बन जाती ह — इसी बहाने कुटु म्ब-शब्द और अँगु लय के
संस्कृत नाम दोन याद हो जाते ह।
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गीतपङ् क्तः अङ्ग लः हन्द अथः
एषः स्नेहालुः तातः अङ् गुष्ठः यह स्नेह करने वाले पता ह — अँगूठा।
िनकटे िनवसित ननु माता तजनी पास म ही तो माता रहती ह — तजनी (पहली अँगुली)।
ज्येष्ठा पुत्र ी दीघतमा मध्यमा सबसे लम्बी बड़ी बेट — मध्यमा (बीच क अँगुली)।
तस्याः भिगनी मनोरमा अनािमका उसक सुन्दर बहन — अना मका।
किनष्ठबाला अन्ते च किनिष्ठका और अन्त म सबसे छोट ब ी — क न ष्ठका।
हस्तकु टुम्बं मम पश्य । — मेरे हाथ के इस कुटु म्ब को दे खो।
हस्तद्वयेन पणमािम । — दोन हाथ से प्रणाम करता हूँ।
आशीव दं िवन्दािम ॥ — और आशीवाद पाता हूँ।
गीत क सुन्दरता: अँगु लयाँ आकार के क्रम से ही कुटु म्ब म बाँट गई ह — मोटा और अलग खड़ा अँगूठा ‘तात’,
उससे लगी हुई तजनी ‘माता’, सबसे लम्बी मध्यमा ‘ज्येष्ठा पुत्री’ (द घतमा = सबसे लम्बी), और अन्त म सबसे छोट
क न ष्ठका ‘क नष्ठबाला’। अन्त क तीन पं क्तयाँ बताती ह क यही पाँच मलकर प्रणाम क मुद्रा बनाती ह और
आशीवाद पाती ह — कुटु म्ब का असली अथ ‘साथ रहना’ ही है।
Try this: गाते समय हर पं क्त पर वही अँगुली उठाइए। पाँच पं क्तय म पाँच नाम याद हो जाएँगे — अङ्गष्ठः,
तजनी, मध्यमा, अना मका, क न ष्ठका।
प्र.4 अधो ल खतान् ोकान् पठन्तु अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — (१) अलसस्य कुतो वद्या अ वद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मत्रम् अ मत्रस्य कुतः सुखम् ॥ (२) हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । ोत्रस्य भूषणं
शास्त्रं भूषणैः क प्रयोजनम् ॥
दोन सुभा षत इसी पाठ के व्याकरण से जुड़े ह — हर चरण म एक षष्ठ्यन्त पद है।
ोकः १ — अलसस्य कुतो वद्या अ वद्यस्य कुतो धनम् । अधनस्य कुतो मत्रम् अ मत्रस्य कुतः सुखम् ॥
अन्वयः — अलसस्य िवद्या कु तः ? अिवद्यस्य धनं कु तः ? अधनस्य िमत्रं कु तः ? अिमत्रस्य सुखं कु तः ?
हन्द अथ — आलसी को वद्या कहाँ से मले? जसके पास वद्या नह , उसे धन कहाँ से मले? जसके पास धन नह , उसे मत्र
कहाँ से मले? और जसका कोई मत्र नह , उसे सुख कहाँ से मले?
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भावः — यह एक ृंखला है — आलस्य → अ वद्या → नधनता → मत्रहीनता → दुःख। क व सीधे ‘आलस्य मत
करो’ नह कहता; वह दखा दे ता है क एक ही दोष से कैसे चार हा नयाँ जन्म लेती ह। सुख क जड़ म प रश्रम है —
यही सन्दे श है।
ोकः २ — हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः क प्रयोजनम् ॥
अन्वयः — हस्तस्य भूषणं दानम् (अिस्त), सत्यं कण्ठस्य भूषणम् (अिस्त), शास्त्रं ोत्रस्य भूषणम् (अिस्त);
(अन्यैः) भूषणैः िकं पयोजनम् ?
हन्द अथ — हाथ का गहना दान है, कण्ठ (गले) का गहना सत्य वचन है, और कान का गहना शास्त्र-श्रवण है। फर (सोने-चाँद
के) गहन से क्या प्रयोजन?
भावः — क व शरीर के तीन अङ्ग के ‘असली गहने’ गनाता है — हाथ शोभा पाता है दे ने से, कण्ठ सच बोलने से,
कान अच्छ बात सुनने से। अ न्तम चरण प्रश्न बनकर पूरे ोक को धार दे दे ता है — जब गुण ही सबसे बड़ा
आभूषण है, तो बाहरी गहन क क्या आवश्यकता?
व्याकरण-सङ् केत: दोन ोक के हर चरण म षष्ठी एकवचन के रूप ह — अलसस्य, अ वद्यस्य, अधनस्य,
अ मत्रस्य, हस्तस्य, कण्ठस्य, श्रोत्रस्य (सब अकारान्त → -स्य)। दूसरे ोक के अन्त म ‘भूषणैः’ तृतीया बहुवचन है
— ‘गहन से’।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 120
स्वप रवार- मत्रप रवारयोः प रचयः, मातृभाषया प्रहे लकानां सङ् ग्रहः तथा ‘क्र डा’ इ त गद्यांशः
प रयोजनाकायम्
प्र.1 स्वप रवारस्य मत्रप रवारस्य च प रचयं प्रत्येकं दश भः-दश भः वाक्यैः लखन्तु ।
यह आपका अपना काय है, इस लए नीचे पहले व ध द है, फर एक नमूना उत्तर जसे दे खकर आप अपने प रवार के नाम भर
सकते ह।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए:
दस वाक्य दोन के लए अलग-अलग — कुल बीस वाक्य।
हर वाक्य म षष्ठी वभ क्त का प्रयोग हो — मम, मम पतुः, मम मातुः, मम अग्रजस्य, मम सख्युः …
नाम, सम्बन्ध, काय (व्यवसाय), नवास ान और एक गुण — इन पाँच बात को छू ते च लए।
वाक्य छोटे र खए और क्रयापद प्रथमपुरुष एकवचन म — अ स्त, वस त, पठ त, काय करो त।
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नमूना उत्तर — (क) स्वप रवारस्य प रचयः
१. मम नाम अिनलः अिस्त ।
२. अहं जयपुरनगरे वसािम ।
३. मम कु टु म्बे षट् जनाः सिन्त ।
४. मम िपत ःु नाम रमेशः अिस्त ।
५. सः अध्यापकः अिस्त ।
६. मम मात ःु नाम सुन ीता अिस्त ।
७. सा िचिकित्सका अिस्त ।
८. मम अगजस्य नाम सुन ीलः अिस्त ।
९. मम अनुजायाः नाम रीता अिस्त, सा चत थ
ु कक्षायां पठित ।
१०. मम िपतामहस्य नाम मोहनः, िपताम ाः च नाम शान्ता अिस्त । एतत् मम कु टु म्बकम् ।
नमूना उत्तर — (ख) मत्रप रवारस्य प रचयः
१. मम िमत्रस्य नाम काितकः अिस्त ।
२. सः मम िवद्यालयस्य छात्रः अिस्त ।
३. तस्य गृहं मम गृहस्य समीपे अिस्त ।
४. तस्य िपत ःु नाम गोपालः अिस्त ।
५. सः कृ षकः अिस्त ।
६. तस्य मात ःु नाम लता अिस्त ।
७. सा गृहकाय ं करोित ।
८. काितकस्य अनुजः राहुलः अिस्त ।
९. ते षां गृहे एकः शुन कः अिप अिस्त ।
१०. काितकस्य कु टु म्बम् अतीव स्ने हशीलम् अिस्त ।
Tip: नमूने के नाम को अपने नाम से बदल द जए। य द वाक्य बनाने म क ठनाई हो तो पहले हन्द म ल खए,
फर हर ‘का/के/क ’ के ान पर षष्ठी लगाकर संस्कृत म बद लए।
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मातृभाषया एतादृशानां पञ्चानां प्रहे लकानां सङ् ग्रहं कुवन्तु ।
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प्र.2
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aglमातृभाषा क पाँच पहे लयाँ इक क जए — दाद -नानी से, मत्र से या लोककथाओं क पुस्तक से।
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सङ् ग्रह कैसे बनाएँ:
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प्रत्येक पहेली अपनी भाषा म ल खए, नीचे उत्तर उलटा करके या अगले पृष्ठ पर ल खए।
ag मली — यही उसे ‘सङ् ग्रह’ बनाता है।
साथ म यह भी ल खए क पहेली कससे
य द हो सके तो हर पहेली का संस्कृत उत्तर भी ल खए (जैसे ‘आँख’ = नयनम्)।
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सुन्दर पृष्ठ बनाकर चत्र भी जो ड़ए — कक्षा म प्रदशनी लगाई जा सकती है।
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नमूना उत्तर ( हन्द क पाँच पहे लयाँ):
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m.co आकाश और तारे
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एक थाल मोती से भरा, सबके िसर पर औंध ा धरा। आकाशः, तारकाः
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काला घोड़ा भागता जाए, पानी पीते ही मर जाए।
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िबन पैर ों के दौड़ती जाए, रुक जाए तो सागर पाए। नद
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हरी थी, मन भरी थी, लाख मोती जड़ी थी। भु ा
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दो अक्षर नयनम्
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ध्यान द जए: अ न्तम पहेली इसी पाठ क दूसरी प्रहे लका का हन्द रूप है — यही दखाता है क पहे लयाँ भाषा
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बदलकर भी यात्रा करती रहती ह।
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क्र डा — एकदा सव गोपनागोपनं क्र ड न्त स्म । त स्मन् दवसे ना जयायाः क्रमः आसीत् । ना जया शतं यावत्
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गण यत्वा सवान् अन्वेष्टुं प्र
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आरब्धवती । बबली कपा टकायाः पृष्ठे प्राप्ता । उमा पयङ् कस्य अधः प्राप्ता । तदनन्तरम्
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co गच्छ त । मीता पतामह्याः पृष्ठे लब्धा । ना जया अ जतं क्र डाङ्गणे अaन्वष्य
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agl अ जतः उप रष्टात् कू दत्वा त स्मन् ‘धप्पा’ इ त अकरोत् । ना जया पुनः अङ् कान् गण यतुं गच्छ त । — अस्य
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गद्यांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु, षष्ठीप्रयोगान् च चनुत ।
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यह ‘छु पन-छु पाई’ (गोपनागोपनम्) के खेल का वणन है — और पूरा गद्यांश षष्ठी वभ क्त का सजीव अभ्यास है, क्य क हर छपने
क जगह ‘…के पीछे ’, ‘…के नीचे’ है।
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
एकदा सव गोपनागोपनं क्रीडिन्त स्म । एक बार सब छु पन-छु पाई खेल रहे थे।
तिस्मन् िदवसे नािजयायाः क्रमः आसीत् । उस िदन नािजया की बारी थी।
नािजया शतं यावत् गणियत्वा सव न् अन्वेष्टुं पिस्थता । नािजया सौ तक िगनकर सबको खोजने चल पड़ ी।
मोिहतः द्वारस्य पष्ृ ठे एव पाप्तः । मोिहत दरवाज़ े के पीछे ही िमल गया।
नािजया पकोष्ठे अन्यान् सव न् अन्वेष्टुम् आरब्धवती । नािजया ने कमरे में बाक़ ी सबको खोजना शुरू िकया।
बबली कपािटकायाः पष्ृ ठे पाप्ता । बबली अलमारी के पीछे िमली।
उमा पयङ् क स्य अधः पाप्ता । उमा पलंग के नीचे िमली।
तदनन्तरम् नािजया क्रीडाङ् गणं गच्छित । इसके बाद नािजया खेल के मैद ान में जाती है।
मीता िपताम ाः पष्ृ ठे ल ब्धा । मीता दादी के पीछे िमल गई।
नािजया अिजतं क्रीडाङ् गणे अिन्वष्यित । नािजया अिजत को मैद ान में खोजती है।
नािजया अिजतं यविनकायाः पष्ृ ठे अिप अिन्वष्टवती । नािजया ने अिजत को परदे के पीछे भी खोजा।
नािजया अिजतम् अन्वेष्टुं बिहः गच्छित । नािजया अिजत को खोजने बाहर जाती है।
सा वृक्षस्य अधः िस्थत्वा पुनः िवचारयित स्म । वह पेड़ के नीचे खड़ ी होकर िफर सोचने लगी।
अिजतः उपिरष्टात् कू िद त्वा तिस्मन् ‘धप्पा’ इित अकरोत् । अिजत ऊपर से कू दकर उस पर ‘धप्पा’ कर बैठा।
नािजया पुनः अङ् कान् गणियतुं गच्छित । नािजया िफर से िगनती िगनने चली जाती है।
गद्यांश म षष्ठी के प्रयोग (चुन ली जए): ना जयायाः क्रमः · द्वारस्य पृष्ठे · कपा टकायाः पृष्ठे · पयङ् कस्य अधः ·
पतामह्याः पृष्ठे · यव नकायाः पृष्ठे · वृक्षस्य अधः। ध्यान द जए — ‘पृष्ठे’ और ‘अधः’ के पहले वाला शब्द सदा
षष्ठी म है।
शब्द-भण्डार: गोपनागोपनम् = छु पन-छु पाई · प्रकोष्ठः = कमरा · कपा टका = अलमारी · पयङ् कः = पलंग ·
यव नका = परदा · क्र डाङ्गणम् = खेल का मैदान · उप रष्टात् = ऊपर से · कू दत्वा = कूदकर · अ न्वष्य त = खोजती
है।
Try this: अपनी कक्षा म यही खेल खेलकर पाँच वाक्य संस्कृत म ल खए — ‘र व मेजस्य अधः प्राप्तः ।’, ‘सीमा
द्वारस्य पृष्ठे प्राप्ता ।’
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अध्याय — एक नज़र म
पाठ का वषय है ‘प्रहे लका’। पाठ-प्रवेश स्वयं कहता है — संस्कृत-सा हत्ये प्रहे लकानां व शष्टं ानम् अ स्त। प्रहे लकाएँ
ब से लेकर बूढ़ तक (आबालवृद्धम्) सबको मान सक उल्लास दे ती ह, बु द्ध क ता ककश क्त बढ़ाती ह, चन्तनक्षमता का
वकास करती ह और पूवज क वय क बु द्धमत्ता तथा कल्पनाश क्त दखाती ह।
पाँच प्रहे लकाएँ, पाँच चतुर उत्तर। (१) भोजन के अन्त म पीने योग्य क्या? — तक्रम्; जयन्त कसका पुत्र? — शक्रस्य;
वष्णुपद कैसा कहा गया? — दुलभम् (तीन उत्तर ोक के चौथे चरण म ही छपे ह)। (२) जसका आ द ‘न’, अन्त ‘न’,
बीच म ‘य’ — नयनम्। (३) वृक्ष के आगे फल और फल के आगे फर वृक्ष, ‘अ’ से आरम्भ और ‘स’ से अन्त — अनानसः।
चौथी और पाँचव प्रहे लका ‘जोड़कर बनने वाले’ उत्तर क ह। (४) काशी म मनुष्य मृत्युम् चाहता है, राजाओं का युद्ध म
हतकारी जयः है — दोन जो ड़ए तो सब दे वताओं के वन्दनीय मृत्युञ्जयः ( शव) नकलते ह, यही ‘एकम् उत्तरम्’ है। (५)
कुम्हार के घर कुम्भः, ह स्तनापुर म कणः, दोन मलकर लङ् का म कुम्भकणः।
व्याकरण का वषय है षष्ठी वभ क्त। योग्यता वस्तरः का नयम एक पं क्त का है — यत्र सम्बन्धः भव त तत्र षष्ठी
वभ क्तः भव त। ‘बालकस्य पुस्तकम्’ म पुस्तक का सम्बन्ध बालक से है, इस लए ‘बालक’ शब्द म षष्ठी लगी। हन्द म यही
‘का, के, क ’ है।
तीन लङ्ग के षष्ठी-रूप याद कराए गए ह। अकारान्त पुं लङ्ग — छात्रस्य/छात्रयोः/छात्राणाम्; आकारान्त स्त्री लङ्ग —
सीतायाः/सीतयोः/सीतानाम्; ईकारान्त स्त्री लङ्ग — नद्याः/नद्योः/नद नाम्; अकारान्त नपुंसक लङ्ग — पुस्तकस्य/पुस्तकयोः/
पुस्तकानाम्; तथा सवनामपद — मम/तव/तस्य/तस्याः/एतस्य आ द।
अभ्यास म आठ प्रश्न ह। एकपदे न उत्तर (४), पूणवाक्येन उत्तर (४), शब्दरूप-ता लका पढ़ना-स्मरण करना, उदाहरणानुसार
पाँच वाक्य, ३३ शब्द क षष्ठीरूप-ता लका, अपने कुटु म्ब का प रचय, श्रीराम-कुटु म्ब के रेखा चत्र से वाक्य-रचना (२६ वाक्य)
तथा पुस्तकसू च से ‘कस्य उप र कम्’ के ११ वाक्य।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः संस्कृत-अथः हन्द ENGLISH
पेयम् पातुं योग्यम् पीने के योग्य Fit for drinking
सुतः पुत्र ः पुत्र Son
तक्रम् मिथतम् छाछ, म ा Buttermilk
कुलालस्य कु म्भकारस्य कुम्हार का Of the potter
रणे युद्धे युद्ध म In war
शक्रः इन्द ः इन्द्र Indra
भूपानाम् रा ाम् राजाओं का Of the kings
वन्द्यः वन्दनीयः, नमस्करणीयः वन्दना के योग्य Worthy of worship
नयनम् नेत्र म्, चक्षःु आँख Eye
प्रहे लका पहेल ी, गूढपश्नः पहेली Riddle
स्नुषा पुत्र वधूः बहू Daughter-in-law
जामाता दुिहतुः पितः दामाद Son-in-law
ातृजाया भातुः पत्नी भाभी Brother’s wife
दे वरः पत्युः अनुजः दे वर Husband’s younger brother
पतृव्यः िपतुः भाता चाचा Father’s brother
स्यूतः िशक्यम्, वस्त्रपात्रम् थैला Bag
वातायनम् गवाक्षः खड़क Window
सङ्गणकम् गणकयन्त्रम् संगणक, कम्प्यूटर Computer
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