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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 13: पृ थ ां◌ां ी ण रत्ना न
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
130 – 140 13 26 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 13: पृ थ ां त्री ण रत्ना न
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के त्रयोदशः पाठः — पृ थ ां त्री ण रत्ना न के सम्पूण हल। यह पाठ कोई कहानी या संवाद नह ,
ब ल्क आठ सुभा षत का संग्रह है — कक्षा म शक्षक ोरकपत्र (पोस्टर) लाते ह और छात्र उन पर लखे ोक पढ़ते ह। हर सुभा षत के साथ
पुस्तक ने पदच्छे दः, अन्वयः और भावाथः — तीन दए ह। पृष्ठ 130 से 140 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — आर म्भक चत्रकथा का हन्द
अनुवाद, आठ सुभा षत का अन्वय-अथ-भाव, वयं शब्दाथान् जानीमः क बारह शब्द वाली ता लका, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–१० (हर
उपभाग, हर चत्र, वलय, प का और रक्तस्थान स हत), योग्यता वस्तरः म छह ग्रन्थ का प रचय तथा प रयोजनाकायम् के चार काय।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 130 – 140
खं ड प्रश्न
13 26
माध्यम
हन्द
त्रयोदशः पाठः — पृ थ ां त्री ण रत्ना न ( चत्रकथा) — पृष्ठ 130
पाठस्य प्रस्तावना — अध्यापकः ोरकपत्रा ण आनय त, छात्राः सुभा षता न पठ न्त
पाठः
प्र.1 छात्राः ! पश्यन्तु, अद्य मम हस्ते ोरकपत्रा ण स न्त । श्रीमन् ! ोरकपत्रे कम् अ स्त ? … श्रीमन् ! त ह वयं
सुभा षता न पठामः । — अस्य सम्पूणस्य चत्रसंवादस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पाठ का पहला पृष्ठ तीन चत्र क एक छोट -सी कथा है। शक्षक कक्षा म ोरकपत्र (poster) लाते ह, छात्र उन्ह द वार पर लगाते
ह, और उन पर लखे ोक पढ़कर पूछते ह क ये क्या ह। यह से पूरा पाठ आरम्भ होता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतम् (मूलः संवादः) हन्द अनुवादः
अध्यापकः — छात्राः ! पश्यन्तु, अद्य मम हस्ते स्फोरकपत्रािण सिन्त । अध्यापक — छात्रो! दे िखए, आज मेरे हाथ में पोस्टर (िभित्त-पत्र)
है।ं
छात्रः — श्रीमन् ! स्फोरकपत्रे िकम् अिस्त ? छात्र — श्रीमान्! पोस्टर पर क्या है?
अध्यापकः — छात्राः ! एतािन स्फोरकपत्रािण िभत्तौ स्थापयन्तु । तदनन्तरं अध्यापक — छात्रो! इन पोस्टरों को दीवार पर लगा दीिजए।
स्वयम् एव पश्यन्तु । उसके बाद स्वयं ही दे ख लीिजए।
छात्रा — श्रीमन् ! स्फोरकपत्रे तु सुन्दरं िचत्रम् अिस्त । श्लोकाः अिप सिन्त छात्रा — श्रीमान्! पोस्टर पर तो सुन्दर िचत्र है। श्लोक भी है।ं
।
अध्यापकः — सत्यम् ! एतािन सुभािषतािन सिन्त । सुन्दरवचनािन एव अध्यापक — ठीक है! ये सुभािषत है।ं सुन्दर वचन ही सुभािषत
सुभािषतािन भविन्त । एतािन अस्माकं कृ ते उत्तमकाय थं पेर णां यच्छिन्त । कहलाते है।ं ये हमें अच्छा काम करने के िलए पेरणा दे ते है।ं
छात्रः — श्रीमन् ! तिह वयं सुभािषतािन पठामः । छात्र — श्रीमान्! तो िफर हम सुभािषत पढ़ ते है।ं
‘सुभा षत’ शब्द ही अपना अथ बता दे ता है: सु (अच्छा) + भा षत (कहा हुआ) = अच्छ तरह कहा गया वचन।
पुस्तक क अपनी प रभाषा भी यही है — ‘सुन्दरवचना न एव सुभा षता न भव न्त।’ सुभा षत प्रायः दो पं क्तय
(एक ोक) म एक बड़ी सीख भर दे ता है, इसी लए वह याद रह जाता है।
Tip — तीन शब्द ध्यान से दे खए:
• ोरकपत्रम् = पोस्टर, भ त्त-पत्र (‘ ोरक’ = चमकाने/उभारने वाला)।
• भत्तौ = द वार पर — यह सप्तमी वभ क्त, एकवचन है ( भ त्तः → भत्तौ)।
• यच्छ न्त = दे ते ह — यह ‘दा’ धातु का ही रूप है (दा → यच्छ् ), लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन।
सुभा षता न (१ – २) — पृष्ठ 131
‘पृ थ ां त्री ण रत्ना न’ तथा ‘अयं नजः परो वे त’ — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः
सु भा षतम्
प्र.1 पृ थ ां त्री ण रत्ना न जलमन्नं सुभा षतम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसं ा वधीयते ।। — अस्य सुभा षतस्य
अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
पाठ का पहला ही सुभा षत पूरे अध्याय का नाम बन गया है। यह बताता है क असली रत्न क्या ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
पद च् छे द ः — पृिथव्याम् । त्रीिण । रत्नािन । जलम् । अन्नम् । सुभ ािषतम् । मूढैः । पाषाण-खण्डेष ु । रत्न-सं ा
। िवधीयते ।
अन्वयः — पृिथव्यां जलम् अन्नं सुभ ािषतम् (इित) त्रीिण रत्नािन (सिन्त) । मूढैः पाषाणखण्डेष ु रत्नसं ा िवधीयते
।
हन्द अथ: पृथ्वी पर तीन ही रत्न ह — जल, अन्न और सुभा षत। मूख लोग के ारा तो पत्थर के टु कड़ को ‘रत्न’ नाम दे दया
जाता है।
भाव: रत्न वही है जसके बना जीवन नह चलता। जल के बना कोई प्राणी जी नह सकता, अन्न के बना शरीर नह
टकता, और सुभा षत के बना बु द्ध तथा च रत्र नह बनते। हीरे-मोती तो चमक ले पत्थर भर ह — प्यास लगने पर
हीरा काम नह आता, पानी आता है। इसी लए क व कहता है क पत्थर को रत्न कहना मूख का काम है। पुस्तक का
भावाथ भी यही है — ‘ कन्तु मूखजनाः तु पाषाणखण्डान् रत्ना न इ त वद न्त।’
ाकरण क तीन बात:
• पृ थ ाम् — सप्तमी वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग (पृ थवी → पृ थव्याम्) = ‘पृथ्वी पर’।
• जलमन्नं = जलम् + अन्नम् — यहाँ स हुई है (म् + अ = मन्)।
• मूढैः — तृतीया वभ क्त, बहुवचन = ‘मूख के ारा’। ‘ वधीयते’ कमवाच्य क्रया है, इस लए कता तृतीया म
आया।
प्र.2 अयं नजः परो वे त गणना लघुचेतसाम् । उदारच रतानां तु वसुधैव कुटु म्बकम् ।। — अस्य सुभा षतस्य अन्वयं
हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह भारत का सबसे प्र सद्ध सुभा षत है — ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ आज भी हमारे सं वधान-भवन तथा अनेक राष्ट्रीय आयोजन का
वाक्य है।
पद च् छे द ः — अयम् । िनजः । परः । वा । इित । गणना । लघुचे त साम् । उदारचिरतानाम् । त ु । वसुधा ।
एव । कु टु म्बकम् ।
अन्वयः — अयं िनजः परः वा इित गणना लघुचे त सां (जनानां भवित) । उदारचिरतानां (जनानां) त ु वसुधा एव
कु टु म्बकम् (भवित) ।
हन्द अथ: ‘यह अपना है, यह पराया है’ — ऐसी गनती छोटे (संकु चत) हृदय वाल क होती है। उदार स्वभाव वाल के लए तो
सारी पृथ्वी ही एक कुटु म्ब है।
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भाव: मन क सबसे बड़ी सीमा ‘अपना-पराया’ का भेद है। जो व्य क्त दूसर को अपने से अलग गनता रहता है,
उसका संसार उतना ही छोटा हो जाता है जतना उसका मन। इसके वरुद्ध जसका हृदय उदार है,eवह
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co मानता है — पुस्तक के शब्द म, ‘सव जनाः मम प रवारस्य सदस्याः सagन्तl इ त ते चन्तय न्त।’
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प रवार का सदस्य
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aglस खोलकर दे खए:
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• परो वे त = परः + वा + इ त (‘वा + इ त’ = ‘वे त’ — गुणस
• वसुधैव = वसुधा + एव (वृ द्धस — आ + ए = ऐ)।.c ag
)।
a s emक्त, बहुवचन म ह — ‘छोटे मन वाल का’, ‘उदार च रत्र वाल
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• लघुचेतसाम् तथा उदारच रतानाम् दोन षष्ठी वभ
का’।
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सुभा षता न.c(३ om– ४) — पृष्ठ 132 g l as
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‘उद्यमेनas हeसद्ध्य न्त काया ण’ तथा ‘अ भवादनशीलस्य’ — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः
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उद्यमेन ह सद्ध्य न्त काया ण न मनोरथैः m
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अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु l।a
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प्र.1 । न ह सुप्तस्य सहस्य प्र वश न्त मुखे मृगाः ।। — अस्य सुभा षतस्य
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प रश्रम का सबसे सीधा और सबसे सुन्दर उदाहरण इसी
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ोक म है — सोया हुआ शेर।
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s mच्छे दः — उद्यमेन । िह । िस
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पिवशिन्त । मुखे । मृगाः ।
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अन्वयः — काय िण उद्यमेन िह िस
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िन्त, मनोरथै ः न (िस िन्त) । (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य िसंहस्य मुखे न
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पिवशिन्त ।
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हन्द अथ: काम प रश्रम से ही सद्ध होते ह, केवल मन के मनसूब (इच्छाओं) से नह । सोए हुए शेर के मुँह म हरण स्वयं तो नह
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घुस जाते।
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.cभाव: इच्छा करना सरल है, करना क ठन। क व कहता है — शेर जंगल काagराजा है, बलवान है, फर भी भोजन के
m लए उसे उठना, दौड़ना और शकार करना ही पड़ता है। य द इतने श क्तशाली प्राणी को भी प रश्रम से छू ट नह , तो
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ag हम कैसे मलेगी? पुस्तक का भावाथ भी यही कहता है — ‘कायस्य सद्ध्यथ प रश्रमः तु आवश्यकः एव।’
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
Did you know? पृष्ठ 132 के दो चत्र इसी बात के दो पहलू ह — ऊपर खेत म हल चलाते और बीज बोते
कसान (उद्यम), नीचे सोया हुआ सह जसके पास हरण आराम से बैठा है (मनोरथ)। उद्यमेन तृतीया वभ क्त,
एकवचन है = ‘प रश्रम के ारा’, और मनोरथैः तृतीया वभ क्त, बहुवचन = ‘मनोरथ से’।
प्र.2 अ भवादनशीलस्य नत्यं वृद्धोपसे वनः । चत्वा र तस्य वधन्ते आयु वद्या यशो बलम् ।। — अस्य सुभा षतस्य
अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह ोक बताता है क बड़ को प्रणाम करना केवल शष्टाचार नह , लाभ का सौदा है।
पद च् छे द ः — अिभवादनशीलस्य । िनत्यम् । वृ ोपसेिवनः । चत्वािर । तस्य । वधन्ते । आयुः । िवद्या । यशः
। बलम् ।
अन्वयः — तस्य िनत्यम् अिभवादनशीलस्य वृ ोपसेिवनः आयुः िवद्या यशः बलम् (च इित) चत्वािर वधन्ते ।
हन्द अथ: जो सदा अ भवादन (प्रणाम) करने के स्वभाव वाला है और बड़े-बुजुग क सेवा करता है, उसक चार वस्तुए ँ बढ़ती ह
— आयु, वद्या, यश और बल।
भाव: चार बात का बढ़ना अपने-आप नह होता, वनम्रता से होता है। जो झुकना जानता है वही सीख पाता है —
इस लए वद्या बढ़ती है; बड़ क सेवा म संयम और अनुशासन आता है — इस लए आयु और बल बढ़ते ह; और
वनम्र व्य क्त को सब सराहते ह — इस लए यश बढ़ता है। पुस्तक का भावाथ इसी को कहता है — ‘यः तान्
स वनयं प्रणम त, तस्य जनस्य आयुः वद्या यशः बलं च वधन्ते।’
Tip — शब्द तोड़कर दे खए:
• अ भवादनशीलः = अ भवादन + शील (प्रणाम करने के स्वभाव वाला)।
• वृद्धोपसेवी = वृद्ध + उपसेवी (बड़ क सेवा करने वाला); ोक म यह षष्ठी वभ क्त, एकवचन —
‘वृद्धोपसे वनः’ है।
• आयु वद्या यशो बलम् = आयुः + वद्या + यशः + बलम् — यहाँ वसगस हुई है (आयुः + व = आयु व, यशः +
ब = यशो ब)।
चत्र म भी गुरु का हाथ आशीवाद म उठा है और चार गोल म आयुः, वद्या, यशः, बलम् लखे ह।
सुभा षता न (५ – ६) — पृष्ठ 133
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‘उद्यमः साहसं धैयम्’ तथा ‘ वद्या ददा त वनयम्’ — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः
सु भा षतम्
प्र.1 उद्यमः साहसं धैय बु द्धः श क्तः पराक्रमः । षडेते यत्र वतन्ते तत्र दे वः सहायकृत् ।। — अस्य सुभा षतस्य अन्वयं
हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह ोक सफलता के छह औज़ार गनाता है — और बताता है क भगवान भी वह मदद करते ह जहाँ ये छह ह ।
पद च् छे द ः — उद्यमः । साहसम् । धैयम् । बुि ः । शिक्तः । पराक्रमः । षड् । एते । यत्र । वतन्ते । तत्र ।
दे वः । सहायकृ त् ।
अन्वयः — यत्र उद्यमः साहसं धैय ं बुि ः शिक्तः पराक्रमः च एते षड् वतन्ते , तत्र दे वः सहायकृ त् (भवित) ।
हन्द अथ: प रश्रम, साहस, धैय, बु द्ध, श क्त और पराक्रम — जहाँ ये छह होते ह, वहाँ ईश्वर भी सहायता करने वाले होते ह।
भाव: ईश्वर बना कुछ कए बैठे हुए को नह उठाते; वे उस हाथ को थामते ह जो पहले से चल रहा है। छह गुण एक
साथ चा हए — उद्यम काम शुरू कराता है, साहस डर हटाता है, धैय बीच म रुकने नह दे ता, बु द्ध सही रास्ता
दखाती है, श क्त और पराक्रम काम पूरा कराते ह। पृष्ठ 133 का चत्र इसी का है — तीन पवतारोही रस्सी बाँधकर
चढ़ाई कर रहे ह।
Tip: षडेते = षड् + एते (स )। ‘षष्’ (छह) का प्रथमा-रूप ‘षट् ’ होता है, पर स्वर से पहले आने पर वह षड् बन
जाता है। ‘सहायकृत्’ = सहायं करो त इ त = सहायता करने वाला।
प्र.2 वद्या ददा त वनयं वनयाद्या त पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमा ो त धनाद्धम ततः सुखम् ।। — अस्य सुभा षतस्य
अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह ोक एक सीढ़ है — वद्या से आरम्भ होकर सुख तक पहुँचती हुई। प्रश्न ७ का वलय भी इसी ोक का है।
पद च् छे द ः — िवद्या । ददाित । िवनयम् । िवनयात् । याित । पात्रताम् । पात्रत्वात् । धनम् । आप्नोित ।
धनात् । धमम् । ततः । सुखम् ।
अन्वयः — िवद्या िवनयं ददाित, (मनुष्यः) िवनयात् पात्रतां याित, पात्रत्वात् धनम् आप्नोित, धनात् धम ं ततः सुखम्
(च आप्नोित) ।
हन्द अथ: वद्या वनय दे ती है, वनय से मनुष्य योग्यता पाता है, योग्यता से धन पाता है, धन से धम और धम से सुख पाता है।
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चरणम् कससे क्या मलता है
१ वद्या िवनयः (नमता)
२ वनयः पात्रता (योग्यता)
३ पात्रत्वम् धनम्
४ धनम् धमः
५ धमः सुखम्
भाव: सच्ची पढ़ाई क पहली पहचान घमंड नह , वनम्रता है। वनम्र व्य क्त पर लोग भरोसा करते ह, इस लए उसे
अच्छा काम मलता है (पात्रता); काम से धन आता है; धन का सही उपयोग धम है — दान, सेवा, कतव्य; और धम
से मन को शा न्त मलती है, जो असली सुख है। ध्यान द जए — कड़ी टू टते ही सीढ़ टू ट जाती है: वद्या से घमंड आ
जाए तो आगे कुछ नह मलता।
स खो लए: वनयात् + या त = वनयाद्या त; पात्रत्वात् + धनम् = पात्रत्वाद्धनम्; धनात् + धमम् = धनाद्धमम्।
तीन म त् → द् हुआ है, क्य क आगे घोष वण (य्, ध्) है।
सुभा षता न (७ – ८) — पृष्ठ 134
‘अ प स्वणमयी लङ् का’ तथा ‘पुस्तकस्था तु या वद्या’ — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः
सु भा षतम्
प्र.1 अ प स्वणमयी लङ् का न मे लक्ष्मण रोचते । जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी ।। — अस्य सुभा षतस्य अन्वयं
हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह श्रीराम का वचन है — लङ् का जीतने के बाद, सोने क नगरी को छोड़कर अयोध्या लौटते समय।
पद च् छे द ः — अिप । स्वणमयी । लङ् का । न । मे । लक्ष्मण । रोचते । जननी । जन्मभूिमः । च । स्वग त्
। अिप । गरीयसी ।
अन्वयः — हे लक्ष्मण ! स्वणमयी अिप लङ् का मे (म ं) न रोचते । यतो िह जननी जन्मभूिमः च स्वग त् अिप
गरीयसी (भवित) ।
हन्द अथ: हे लक्ष्मण! सोने क बनी हुई लङ् का भी मुझे अच्छ नह लगती। माता और जन्मभू म स्वग से भी बढ़कर ह।
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भाव: धन-वैभव कतना ही हो, अपनी माँ और अपनी जन्मभू म क जगह नह ले सकता। श्रीराम के सामने पूरी
स्वणनगरी थी, फर भी उन्ह ने अयोध्या को चुना — क्य क जो अपनापन जन्मभू म म है, वह सोने म नह । यही
दे शभ क्त का सबसे सरल पाठ है, और पृष्ठ 134 का चत्र भी यही कहता है — भारतमाता, तरंगा और भारत का
मान चत्र।
Tip: गरीयसी ‘गुरु’ शब्द का तरतमरूप है — गुरु (भारी/बड़ा) → गरीयस् (अ धक बड़ा) → स्त्री लङ्ग म गरीयसी।
इसी लए ता लका म इसका अथ ‘श्रेष्ठा — महान — Great’ दया है। स्वगात् पञ्चमी वभ क्त, एकवचन है —
तुलना म ‘से’ का अथ पञ्चमी ही दे ती है। जन्मभू मश्च = जन्मभू मः + च ( वसगस )।
प्र.2 पुस्तकस्था तु या वद्या परहस्तगतं धनम् । कायकाले समुत्पन्ने न सा वद्या न तद्धनम् ।। — अस्य सुभा षतस्य
अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यह सुभा षत हर वद्याथ के लए है — केवल कताब रख लेना पढ़ाई नह है।
पद च् छे द ः — पुस्तकस्था । त ु । या । िवद्या । परहस्तगतम् । धनम् । कायकाले । समुत् पन्ने । न । सा ।
िवद्या । न । तद् । धनम् ।
अन्वयः — पुस्तकस्था त ु या िवद्या (अिस्त), परहस्तगतं (च यद् ) धनम् (अिस्त), (तद् उभयम् अिप) कायकाले
समुत्पन्ने (सित) — न सा िवद्या, न (च) तद् धनम् (स्वस्य उपयोगाय भवित) ।
हन्द अथ: जो वद्या केवल पुस्तक म रखी है और जो धन दूसरे के हाथ म चला गया है — काम पड़ने पर न वह वद्या काम आती
है, न वह धन।
भाव: वद्या का स्थान पुस्तक नह , बु द्ध है। जो पढ़कर याद कर लया और समझ लया, वही परीक्षा म या जीवन म
काम आता है — अलमारी म सजी कताब नह । ठ क वैसे ही जो पैसा कसी और के पास चला गया है, ज़रूरत के
समय वह अपना नह रहता। पुस्तक का भावाथ भी यही कहता है — ‘अ पतु बु द्धस्था वद्या एव काय साधय त’।
Check it yourself: दो जोड़े शब्द याद र खए — पुस्तकस्था वद्या × बु द्धस्था वद्या, और परहस्तगतं धनम्
× स्वहस्तगतं धनम्। ‘तद्धनम्’ = तद् + धनम्। चत्र म कोषपाल (बक/खज़ाने वाला) को पैसे दे ते हुए व्य क्त
दखाया गया है — यही ‘परहस्तगतं धनम्’ का सङ् केत है।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 135
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पाठस्य ादश शब्दाः — संस्कृत-अथः, हन्द , English तथा ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भः
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शब्दाथाः
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— मूढैः, नजः, परः, लघुचेतसाम्, वसुधा, उद्यमेन, वृद्धोपसे वनः, सहायकृत्, पात्रताम्, आ ो त, गरीयसी,
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परहस्तेषु ।
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gहर शब्द कस सुभा षत से आया है — इससे शब्द अपने-आप याद रह जाता है।
पृष्ठ 135 क पूरी ता लका, और साथ म यह भीaक
शब्दः अथः हन्द ENGLISH
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(संस्कृतम्)
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मूढैः मूख ं के ारा By fools पृ थव्यां त्री ण रत्ना न
ag िनजःl स्वक यः अपना Own अयं नजः परो वे त
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परः अन्यः जनः अन्य Other अयं नजः परो वे त
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लघुचेतसाम् संकु चतहृदयानाम् Of narrow-minded अयं नजः परो वे त
वसुधा ध रत्री पथ्ृ वी Earth उदारच रतानां तु
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वृद्धानां सेवकस्य अ भवादनशीलस्य
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सहायकः One who helps उद्यमः साहसं धैयम्
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गरीयसी श्रेष्ठा महान Great जननी जन्मभू मश्च
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तेष ु अन्येषां हस्तेषु अन्यों के हाथ में In others hand पुस्तकस्था तु या वद्या
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agl ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भ कैसे भर: अ न्तम खाना जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है, क्य क हर वद्याथ
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क मातृभाषा अलग है। उदाहरण के लए वसुधा (पृथ्वी) — मराठ म ‘पृथ्वी’, गुजराती म ‘પૃથ્વી’, बंगला म
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‘পৃ িথবী’, त मल म ‘பூம ’, तेलुगु म ‘భూమి’, पंजाबी म ‘ਧਰਤੀ’। अपनी भाषा का शब्द अपनी पुस्तक म ल खए।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
Tip — वभ क्त भी दे ख ली जए: ता लका के शब्द अलग-अलग वभ क्तय म ह, यही उनका हन्द अथ तय
करता है —
• मूढैः, उद्यमेन — तृतीया (‘के ारा’, ‘से’)
• लघुचेतसाम्, वृद्धोपसे वनः — षष्ठी (‘का/के’)
• पात्रताम् — तीया (‘को’)
• परहस्तेषु — सप्तमी, बहुवचन (‘हाथ म’)
• नजः, परः, वसुधा, सहायकृत्, गरीयसी — प्रथमा।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 135
प्रश्नौ १–२ : उ ैः पठनम् तथा एकपदे न उत्तर-लेखनम् (क–च)
अभ्यासः
प्र.1 एता न सवा ण सुभा षता न उ ैः पठन्तु स्मरन्तु लखन्तु च ।
यह करने का काम है, लखने का नह — पर करने का तरीका ठ क होना चा हए। तीन चरण ह: उ ैः पठनम् (ऊँचे स्वर म पढ़ना),
स्मरणम् (कण्ठस्थ करना) और लेखनम् ( लखकर दे खना)।
क्र. सुभा षतम् (प्रथमः चरणः) एकपदे भावः
१ पिृ थव्यां त्रीिण रत्नािन जलमन्नं सुभािषतम् सच्चे रत्न
२ अयं िनजः परो वेित गणना लघुचेतसाम् वसुधैव कुटु म्बकम्
३ उ द्यमेन िह िस िन्त काय िण न मनोरथैः प रश्रम
४ अिभवादनशील स्य िनत्यं वृ ोपसे िवनः बड़ का आदर
५ उ द्यमः साहसं धै य ं बुि ः शिक्तः पराक्रमः सफलता के छह गुण
६ िवद्या ददाित िवनयं िवनयाद्याित पात्रताम् वद्या क सीढ़
७ अिप स्वणमयी लङ् का न मे ल क्ष्मण रोचते जन्मभू म
८ पुस्तकस्था तु या िवद्या परहस्तगतं धनम् पढ़ हुई वद्या ही काम क
ोक कण्ठस्थ करने का सरल क्रम: (1) पहले पूरा ोक एक बार धीरे प ढ़ए; (2) फर पदच्छे द दे खकर हर
शब्द अलग-अलग बो लए; (3) अन्वय पढ़कर अथ मन म बैठाइए; (4) अब बना दे खे तीन बार ऊँचे स्वर म बो लए;
(5) अन्त म बना दे खे लखकर मलान क जए — यह मात्राओं और वसग क भूल पकड़ म आती ह।
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Tip: ोक बोलते समय य त (ठहराव) का ध्यान र खए। अनुष्टुप् छन्द म हर चरण आठ अक्षर का होता है —
‘पृ थव्यां त्री ण रत्ना न’ (८) / ‘जलमन्नं सुभा षतम्’ (८)। इसी लय से बोलगे तो ोक अपने-आप याद हो जाएगा।
प्र.2 अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) पृ थ ां क त रत्ना न स न्त ? (ख) अयं नजः परो
वा इ त गणना केषां भव त ? (ग) काया ण केन सद्ध्य न्त ? (घ) वद्या क ददा त ? (ङ) जननी जन्मभू मश्च
कस्मात् गरीयसी ? (च) लङ् का क दृशी आसीत् ?
‘एकपदे न’ का अथ है — केवल एक पद, पूरा वाक्य नह । और वह पद उसी वभ क्त म होना चा हए जस वभ क्त का प्रश्न है।
क्र. प्रश्नः उत्तरम् (एकपदे न) हन्द वभ क्तः
(क) पृ थव्यां क त रत्ना न स न्त ? त्र ीिण तीन प्रथमा, बहुवचनम् (नपुं.)
(ख) अयं नजः परो वा इ त गणना केषां भव त ? लघुचेतसाम् छोटे मन वाल क षष्ठी, बहुवचनम्
(ग) काया ण केन सद्ध्य न्त ? उ द्यमेन प रश्रम से तृतीया, एकवचनम्
(घ) वद्या क ददा त ? िवनयम् वनय तीया, एकवचनम्
(ङ) जननी जन्मभू मश्च कस्मात् गरीयसी ? स्वग त् स्वग से पञ्चमी, एकवचनम्
(च) लङ् का क दृशी आसीत् ? स्वणमयी सोने क बनी हुई प्रथमा, एकवचनम् (स्त्री.)
प्रश्नवाचक शब्द ही उत्तर क वभ क्त बता दे ता है: ‘केन’ (तृतीया) पूछा है तो उत्तर ‘उद्यमेन’ ही होगा, ‘उद्यमः’
नह । ‘केषाम्’ (षष्ठी) पूछा है तो ‘लघुचेतसाम्’, ‘लघुचेतसः’ नह । ‘कस्मात्’ (पञ्चमी) पूछा है तो ‘स्वगात्’। यह
नयम याद रहे तो एकपदे न उत्तर म कभी भूल नह होगी।
Tip: ‘क दृशी’ का अथ है ‘कैसी’ — इसका उत्तर सदा वशेषण होता है, सं ा नह । इस लए (च) का उत्तर
‘लङ् का’ नह , स्वणमयी है। इसी तरह ‘क त’ का उत्तर सदा संख्या होती है — त्री ण।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 136
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प्रश्नौ ३–४ : एकवाक्येन उत्तरा ण (क–च) तथा चत्रं दृष्ट् वा वाक्यरचना (क–ङ)
अभ्यासः
प्र.3 अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तरा ण लखन्तु — (क) पृ थ ां त्री ण रत्ना न का न स न्त ? (ख)
उदारच रतानां भावः कः भव त ? (ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्र वश न्त ? (घ) अ भवादनशीलस्य नत्यं का न
वधन्ते ? (ङ) मनुष्यः धनात् कम् आ ो त ? (च) उत्पन्नेषु कायषु क दृशं धनम् उपयोगाय न भव त ?
‘एकवाक्येन’ का अथ है — पूरा एक वाक्य, जसम कता और क्रया दोन ह । सबसे सरल तरीका यह है क प्रश्न के शब्द को ही
उत्तर म दोहरा द और प्रश्नवाचक पद क जगह उत्तर रख द।
क्र. उत्तरम् (संस्कृतम्) हन्द अथः
(क) पिृ थव्यां जलम् अन्नं सुभािषतं च — एतािन त्रीिण रत्नािन सिन्त । पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभा षत — ये तीन रत्न ह।
(ख) उदारचिरतानां भावः ‘वसुधैव कु टुम्बकम्’ इित भवित । उदार च रत्र वाल का भाव ‘सारी पृथ्वी ही प रवार है’ — ऐसा
होता है।
(ग) मृगाः स्वयमेव सुप्तस्य िसंहस्य मुखे न पिवशिन्त । हरण स्वयं ही सोए हुए सह के मुँह म प्रवेश नह करते।
(घ) अिभवादनशील स्य िनत्यम् आयुः िवद्या यशः बलं च — एतािन अ भवादन करने वाले क आयु, वद्या, यश और बल — ये चार
चत्वािर वधन्ते । सदा बढ़ते ह।
(ङ) मनुष्यः धनात् धमम् आप्नोित । मनुष्य धन से धम प्राप्त करता है।
(च) उ त्पन्नेष ु कायषु परहस्तगतं धनम् उपयोगाय न भवित । काम आ पड़ने पर दूसरे के हाथ म गया हुआ धन उपयोग म नह
आता।
वचन का मलान सबसे ज़रूरी है: (क) और (घ) म उत्तर बहुवचन म है, इस लए क्रया भी ‘स न्त’ / ‘वधन्ते’
(बहुवचन) आई। (ग) म कता ‘मृगाः’ बहुवचन है, इस लए ‘प्र वश न्त’। (ङ) म कता ‘मनुष्यः’ एकवचन है, इस लए
‘आ ो त’। संस्कृत म कता और क्रया का वचन सदा एक रहता है।
Tip: (ङ) का पूरा उत्तर चाह तो ोक क लय म भी दे सकते ह — ‘मनुष्यः धनात् धम ततः सुखम् आ ो त।’ पर
प्रश्न ‘धनात् कम्’ का सीधा उत्तर धमम् ही है, इस लए वही मुख्य र खए।
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प्र.4 चत्रं दृष्ट् वा वाक्या न रचयन्तु — उदाहरणम् — वृक्षः फला न यच्छ त । त्वं फला न स्वीकरो ष । अहं फला न
स्वीकरो म । (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ) …
पृष्ठ 136 के चत्र म बीच म एक बड़ा वृक्ष है और उसके चार ओर वे चीज़ ह जो वृक्ष हम दे ता है — सेब (फल), गुलाब (पुष्प), पत्ते,
लकड़ी का ल ा, छाया और कागज़। उदाहरण म ‘फला न’ ले लया गया है, इस लए शेष पाँच से पाँच पं क्तयाँ बनगी। हर पं क्त म
तीन वाक्य ह — प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष, उत्तमपुरुष।
क्र. वृक्षः … यच्छ त त्वं … स्वीकरो ष अहं … स्वीकरो म
उदा. वृक्षः फला न यच्छ त । त्वं फला न स्वीकरो ष । अहं फला न स्वीकरो म ।
(क) वृ ः पुष्पािण यच्छित । वं पुष्पािण स्वीकरोिष ।
त् अहं पुष्पािण स्वीकरोिम ।
(ख) वृ ः पत्रािण यच्छित । वं पत्रािण स्वीकरोिष ।
त् अहं पत्रािण स्वीकरोिम ।
(ग) वृ ः काष्ठं यच्छित । वं काष्ठं स्वीकरोिष ।
त् अहं काष्ठं स्वीकरोिम ।
(घ) वृ ः छायां यच्छित । वं छायां स्वीकरोिष ।
त् अहं छायां स्वीकरोिम ।
(ङ) वृ ः कागदपत्रािण यच्छित । वं कागदपत्रािण स्वीकरोिष ।
त् अहं कागदपत्रािण स्वीकरोिम ।
क्रया-रूप कैसे बदले, यही इस प्रश्न का असली पाठ है:
• यच्छ त — ‘दा’ धातु, लट् लकार, प्रथमपुरुषः, एकवचनम् (वृक्षः = वह)।
• स्वीकरो ष — ‘स्वी + कृ’, मध्यमपुरुषः, एकवचनम् (त्वम् = तुम)।
• स्वीकरो म — ‘स्वी + कृ’, उत्तमपुरुषः, एकवचनम् (अहम् = म)।
कम (फला न, पुष्पा ण, काष्ठम्, छायाम्) सदा तीया वभ क्त म है — पु ल्लङ्ग/नपुंसक बहुवचन म रूप प्रथमा
जैसा ही दखता है, पर स्त्री लङ्ग म स्पष्ट बदल जाता है: छाया → छायाम्।
Try This: इन्ह वाक्य को बहुवचन म बनाकर दे खए — ‘वृक्षाः पुष्पा ण यच्छ न्त। यूयं पुष्पा ण स्वीकुरुथ। वयं
पुष्पा ण स्वीकुमः।’ और सो चए — वृक्ष हम इतना कुछ दे ता है, हम उसे क्या दे ते ह? यही इस चत्र का सन्दे श है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 137
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प्रश्नौ ५–६ : ‘आम्’ अथवा ‘न’ इ त लेखनम् तथा चत्रे द शतस्य नाम लङ्गं च नदशनम्
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अभ्यासः
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a s emल खता न वाक्या न प ठत्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इ त लखन्तु — यथा – क पृ थ ां त्री ण रत्ना न स न्त ? –
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आम् । (क) त्री ण रत्ना न जलम् अन्नं पाषाणः च स न्त ? (ख) क धमण सुखं प्राप्यते ? (ग) क वद्या वनयं
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ददा त ? (घ) कम् अ भवादनशीलस्य वद्या वधते ? (ङ) कम् उद्यमेन काया ण नश्य न्त ? (च) क जन्मभू मः
स्वगात् गरीयसी भव त ?
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इस प्रश्न म दो वाक्य जान-बूझकर गलत रखे गए ह — उन्ह म ‘न’ आएगा। हर उत्तर के साथ यहाँ कारण भी दया है।
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क्र. वाक्यम् उत्तरम् कारणम्
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यथा mक पृ थव्यां त्री ण रत्ना न स न्त ?
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आम्
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‘पृ थव्यां त्री ण रत्ना न…’ — ोक स्वयं कहता है।
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ag (क) त्री ण रत्ना न जलम् अन्नं पाषाणः च न तीसरा रत्न पाषाण नह , सुभा षतम् है। पाषाणखण्ड तो मूख लोग रत्न
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स न्त ? कहते ह।
com‘धनाद्धम ततः सुखम्’ — धम से सुख मलता है। a
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(ख) क धमण सुखं प्राप्यते ? आम्
(ग) क वद्या वनयं ददा त ? agl आम् ‘ वद्या ददा त वनयम्’ — ोक का पहला ही चरण।
कम् अ भवादनशीलस्य वद्या वधते ? आम्
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चार वस्तुएँ बढ़ती ह — आयुः, वद्या, यशः, बलम्।
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(ङ) कम् उद्यमेन काया ण नश्य न्त ? उद्यम से काम नष्ट नह , सद्ध होते ह — ‘उद्यमेन ह सद्ध्य न्त
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काया ण’।
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agl (च) क जन्मभू मः स्वगात् गरीयसी भव त ? आम् ‘जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी’।
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com म आया ‘ कम् / क’ कसी वस्तु का नाम नह पूछ रहा — g l a
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‘ कम्’ यहाँ प्रश्नवाचक चह्न भर है: वाक्य के आरम्भ
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a s emहै, जैसे अंग्रेज़ी म ‘Is it that…?’। इसी लए उत्तर म ‘आम्’ (हाँ) या
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वह पूरे वाक्य को हाँ-ना वाला प्रश्न बना रहा
‘न’ (नह ) ही लखना है।
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Check it yourself: जन दो वाक्य म ‘न’ आया, उन्ह सही करके ल खए — (क) ‘त्री ण रत्ना न जलम् अन्नं
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सुभा षतं च स न्त।’ (ङ) ‘उद्यमेन काया ण सद्ध्य न्त।’ गलत वाक्य को सही करके लखना ही सबसे अच्छा
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प्र.6 चत्रे द शतस्य नाम लङ्गं च न दशन्तु — (यथा) पुष्पम् – नपुंसक लङ्गम् । ( चत्रा ण — गुलाबपुष्पम्, सहः,
सेवफलम्, नारी, वृक्षः, पुस्तका न)
पृष्ठ 137 पर छह चत्र ह। पहला (गुलाब) उदाहरण के रूप म भरा हुआ है — शेष पाँच भरने ह। हर पं क्त म नाम प्रथमा वभ क्त
एकवचन म ल खए, फर उसका लङ्ग।
क्र. चत्रम् नाम लङ्गम् पहचान
यथा गुलाब का फूल पुष्पम् नपुंसक लङ्गम् अन्त म ‘-म्’
२ सह िसंहः पुं ल्लङ्गम् अन्त म वसग ‘-ः’
३ सेब फलम् (से वफलम्) नपुंसक लङ्गम् अन्त म ‘-म्’
४ स्त्री नारी (मिहला) स्त्री लङ्गम् अन्त म ‘-ई’ / ‘-आ’
५ छायादार वृक्ष वृ ः पुं ल्लङ्गम् अन्त म वसग ‘-ः’
६ पुस्तक का ढे र पुस्तकम् (पुस्तकािन) नपुंसक लङ्गम् अन्त म ‘-म्’
लङ्ग पहचानने का काम-चलाऊ सूत्र (प्रथमा एकवचन म): शब्द के अन्त म वसग (◌ः) हो तो प्रायः पुं लङ्ग —
सहः, वृक्षः, बालकः। अन्त म म् हो तो प्रायः नपुंसक लङ्ग — पुष्पम्, फलम्, पुस्तकम्, जलम्। अन्त म आ / ई हो
तो प्रायः स्त्री लङ्ग — नारी, बा लका, नद , लता। ‘प्रायः’ इस लए, क्य क अपवाद भी ह — जैसे ‘बु द्धः’ और
‘श क्तः’ वसगान्त होकर भी स्त्री लङ्ग ह।
Tip: पाँचव चत्र म वृक्ष के नीचे उसक काली छाया भी दखाई गई है। य द आप उसका उत्तर छाया — स्त्री लङ्गम्
लख तो वह भी ठ क है; पर चत्र म मुख्य वस्तु वृक्ष है, इस लए वृक्षः — पुं लङ्गम् ही सव त्तम उत्तर है। छठे चत्र म
पुस्तक अनेक ह — चाह तो ‘पुस्तका न — नपुंसक लङ्गम्’ (बहुवचन) भी लख सकते ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 138
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प्रश्नौ ७–८ : वलये पदा न व लख्य सुभा षतपू तः तथा प कातः लङ्गानुसारं पदचयनम्
अभ्यासः
प्र.7 वलये पदा न व लख्य सुभा षतं पूरयन्तु — वद्या – ददा त – ……… – वनयात् – ……… ↓ पात्रताम् – ……… –
धनम् – ……… – धनात् ↓ ……… – ततः – ……… ।
वलय (गोल क ंखला) साँप-सीढ़ क तरह चलता है — पहली पं क्त बाएँ से दाएँ, दूसरी पं क्त दाएँ से बाएँ, तीसरी फर बाएँ से
दाएँ। जो ोक भरना है वह पृष्ठ 133 वाला है — ‘ वद्या ददा त वनयं वनयाद्या त पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमा ो त धनाद्धम
ततः सुखम्॥’
पं क्तः वलयेषु पदा न (क्रमेण)
पथमा (वाम् → दि णम्) िवद्या → ददाित → िवनयम् → िवनयात् → याित
ि तीया (दि णम् → वाम्) पात्रताम् → पात्रत्वात् → धनम् → आप्नोित → धनात्
ततृ ीया (वाम् → दि णम्) धमम् → ततः → सुखम्
अतः िरक्तवलयेष ु लेखनीयािन षट् पदािन —
पंिक्त १ का तीसरा वलय = िवनयम्
पंिक्त १ का पाँच वाँ वलय = याित
पंिक्त २ का चौथा वलय (पात्रताम् के बाईं ओर) = पात्रत्वात्
पंिक्त २ का दू सरा वलय (धनात् के दाईं ओर) = आ प्नोित
पंिक्त ३ का पहला वलय = धमम्
पंिक्त ३ का तीसरा वलय = सुखम्
क्रम कैसे पकड़: हर वलय के कनारे एक काला बन्दु है — वही अगले वलय क ओर इशारा करता है। दूसरी पं क्त
के अ न्तम वलय ‘पात्रताम्’ के ऊपर बन्दु है, यानी वह पहली पं क्त से जुड़ा है; और ‘धनात्’ के नीचे बन्दु है, यानी
वहाँ से तीसरी पं क्त शुरू होती है। इसी से पता चलता है क दूसरी पं क्त दाएँ से बाएँ पढ़ जाएगी।
Tip: वलय म पद स खोलकर लखे गए ह — ोक म ‘ वनयाद्या त’ है, पर वलय म ‘ वनयात्’ और ‘या त’
अलग-अलग ह। इसी तरह ‘पात्रत्वाद्धनमा ो त’ = पात्रत्वात् + धनम् + आ ो त, और ‘धनाद्धम’ = धनात् + धमम्।
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प्र.8 प कातः पदा न चत्वा नदशानुसारं पदा न लखन्तु — (प का : जननी, धैयम्, वद्या, वनयः, नजः, पत्रम्,
बु द्धः, मूलम्, पराक्रमः, श क्तः, धनम्, उद्यमः) (क) प्रथमान्त-पुं लङ्गपदा न स न्त – १. उद्यमः २. … ३. … ४. …
(ख) प्रथमान्त-स्त्री लङ्गपदा न स न्त – १. वसुधा २. … ३. … ४. … (ग) प्रथमान्त-नपुंसक लङ्गपदा न स न्त – १.
साहसम् २. … ३. … ४. …
प का म बारह पद ह और वे ठ क चार-चार के तीन वग म बँट जाते ह। सबसे पहले पूरा वग करण दे ख ली जए।
वगः प कातः पदा न (चत्वा र) हन्द अथ
(क) पथमान्त-पुंिलङ् ग पदािन उ द्यमः, िवनयः, िनजः, पराक्रमः प रश्रम, वनय, अपना, पराक्रम
(ख) पथमान्त-स्त्र ीिलङ् ग पदािन जननी, िवद्या, बुि ः, शिक्तः माता, वद्या, बु द्ध, श क्त
(ग) पथमान्त-नपुंस किलङ् ग पदािन धै यम्, पत्रम्, मूल म्, धनम् धैय, पत्ता/पत्र, जड़, धन
पुस्तक ने हर वग का पहला खाना नमूने के रूप म भर दया है — उद्यमः, वसुधा, साहसम्। उसी क्रम को मानकर उत्तर इस प्रकार
बनेगा —
(क) १. उद्य मः (दत्तम्) २. िवनयः ३. िनजः ४. परा मः क्र
(ख) १. वसुधा (दत्तम्) २. जननी ३. िवद्य ा ४. बुि ः / शिक्तः
(ग) १. साहसम् (दत्तम्) २. धैयम् ३. पत्रम् ४. मूलम् / धनम्
ध्यान द जए — एक छोट -सी पुस्तक-सम्ब ी बात: नमूने म दए गए ‘वसुधा’ और ‘साहसम्’ प का के
भीतर नह ह; वे पाठ के सुभा षत से लए गए ह (‘वसुधैव कुटु म्बकम्’, ‘उद्यमः साहसं धैयम्’)। इस लए य द आप
केवल प का के पद लख तो हर वग म ठ क चार पद आते ह — 4 + 4 + 4 = 12। दोन ही उत्तर स्वीकाय ह; ऊपर
दोन रास्ते दखा दए गए ह।
Tip — ‘प्रथमान्त’ का अथ: ‘प्रथमा वभ क्त म समाप्त होने वाला’ पद। प का के सभी पद प्रथमा एकवचन म
ही ह, इसी लए उनका लङ्ग अन्त्य अक्षर से पहचाना जा सकता है — वसगान्त प्रायः पुं ल्लङ्ग (उद्यमः, वनयः), ‘म्’-
अन्त नपुंसक लङ्ग (धैयम्, पत्रम्), और ‘आ/ई’-अन्त स्त्री लङ्ग (जननी, वद्या)। पर बु द्धः तथा श क्तः वसगान्त
होकर भी स्त्री लङ्ग ह — इन्ह अलग से याद रखना पड़ेगा।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 138–139
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प्रश्नौ ९–१० : पाठगता न सुभा षता न स्मृत्वा रक्तस्थानपू तः (क–छ) तथा चत्रा ण दृष्ट् वा उ चतानां ोकांशानां लेखनम्
अभ्यासः
प्र.9 पाठगता न सुभा षता न स्मृत्वा रक्तस्थाना न पूरयन्तु — (क) पृ थ ां त्री ण रत्ना न ……… सुभा षतम् । (ख)
उदारच रतानां तु ……… कुटु म्बकं भव त । (ग) उद्यमेन ह ……… सद्ध्य न्त । (घ) अ भवादनशीलस्य
वृद्धोपसे वनः ……… वधन्ते । (ङ) उद्यमः ……… पराक्रमः । (च) वद्या ……… ददा त । (छ) जननी जन्मभू मश्च
……… गरीयसी भव त ।
सात रक्तस्थान पाठ के ोक से ही भरने ह। नीचे पूरा वाक्य भी दया है ता क मलान सरल हो।
क्र. पूण वाक्यम् रक्तस्थाने पदम्
(क) पृ थव्यां त्री ण रत्ना न जलमन्नं सुभा षतम् । जलमन्नं (जलम् + अन्नम्)
(ख) उदारच रतानां तु वसुधैव कुटु म्बकं भव त । वसुधैव (वसुधा + एव)
(ग) उद्यमेन ह काया ण सद्ध्य न्त । काय िण
(घ) अ भवादनशीलस्य वृद्धोपसे वनः चत्वा र वधन्ते । चत्वािर (अथवा — आयुिवद्या यशो बलम्)
(ङ) उद्यमः साहसं धैय बु द्धः श क्तः पराक्रमः । साहसं धै य ं बुि ः शिक्तः
(च) वद्या वनयं ददा त । िवनयम् / िवनयं
(छ) जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी भव त । वग दिप (स्वग त् + अिप)
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(घ) पर एक स्पष्टीकरण: मूल ोक है — ‘अ भवादनशीलस्य नत्यं वृद्धोपसे वनः। चत्वा र तस्य वधन्ते
आयु वद्या यशो बलम्॥’ अभ्यास का वाक्य ‘… वृद्धोपसे वनः ……… वधन्ते।’ है, इस लए यहाँ चत्वा र लखना
सबसे उपयुक्त है। य द कोई वद्याथ ‘आयु वद्या यशो बलम्’ लखे तो अथ क दृ ष्ट से वह भी ठ क है — क्य क
बढ़ने वाली चार वस्तुएँ वही ह।
Tip: तीन उत्तर म स है — जलमन्नं, वसुधैव, स्वगाद प। रक्तस्थान म स -स हत रूप ही ल खए, क्य क
ोक उसी रूप म छपा है। स - वच्छे द अलग से कोष्ठक म लख दे ना अच्छा अभ्यास है।
प्र.10 चत्रा ण दृष्ट् वा उ चतान् ोकांशान् लखन्तु — (पञ्च चत्रा ण : पाषाणखण्डान् भञ्जन् जनः; जलम् अन्नं
पुस्तकं च; भारतस्य मान चत्रम्; अन्यस्मै धनं ददत् जनः; पृथ्वीगोलकम्)
पृष्ठ 139 के पाँच चत्र पाठ के पाँच अलग-अलग सुभा षत क ओर सङ् केत करते ह। हर चत्र के नीचे उसी ोक का उ चत अंश
लखना है।
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के रंग- .बरं g l
मूढैः पाषाणखण्डेष ु रत्नसं ा
कहते ह। a
१ हथौड़े से पत्थर तोड़ता हुआ व्य क्त (पत्थर चत्र म पाषाणखण्ड ही ह, जन्ह मूख ‘रत्न’
e m िवधीयते ।
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टु कड़े)
a२gl नल से गरता जल, थाली म रोट -दाल-चावल पिृ थव्यां त्रीिण रत्नािन जलमन्नं तीन रत्न एक साथ — जल, अन्न और
तथा एक पुस्तक सुभािषतम् । (पुस्तक = ) सुभा षत।
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जननी ज.न्cमभूoिमश्च स्वग दिप
३ भारत का मान चत्र
em ।
मान चत्र जन्मभू म का सङ् केत है। ag
sगरीयसी
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४ एक व्य क्त दूसरे को धन क पोटली दे ता पु तक था तु या िव ा
स् स् द्य धन दूसरे के हाथ म जा रहा है —
com
हुआ परहस्तगतं धनम् । ‘परहस्तगतं धनम्’।
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a s emकुटुम्ब — गोला उसी का
com
उदारचिरतानां तु वसुधैव
प्रतीक है।l
५ पृथ्वी का गोला (globe) पूरी वसुधा ही एक
m . कु टुम्बकम् ।
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agl चत्र से ोक कैसे पहचान: चत्र म जो मुख्य वस्तु दखे, उसी का नाम ोक म खो जए — पत्थर →
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पाषाणखण्ड, जल-अन्न-पुस्तक → त्री ण रत्ना न, मान चत्र → जन्मभू म, धन क पोटली → परहस्तगतं धनम्, पृथ्वी
का गोला → वसुधा। पाँच बार
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ोक का वही आधा भाग (चरण) ल खए जसम वह शब्द आया है — पूरा ोक
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लखने क आवश्यकता नह , प्रश्न म ‘ ोकांशान्’ ही कहा गया है।
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Check it yourself: चौथे और पाँचव चत्र म भूल होना सहज है। ध्यान र खए — धन का लेन-दे न दखे तो
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‘परहस्तगतं धनम्’, और पूरी पृथ्वी दखे तो ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’। तीसरा चत्र भारत का मान चत्र है (केवल एक
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दे श), इस लए वहाँ ‘वसुधा’ नह , ‘जन्मभू म’ वाला ोक आएगा।
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comग्रन्थानां प रचयः a
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 140
‘एता न सुभा षता न व वधग्रन्थेभ्यः स्वीकृता न स न्त’ — .षण्णां a g l
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योग्यता वस्तरः
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एता न सुभा षता न व वधग्रन्थेभ्यः स्वीकृता न स न्त । तेषां ग्रन्थानां प रचयः अत्र व णतः अ स्त, यथा — (क)
m सुभा षतरत्नभाण्डागारः । —
प्र.1
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comएषां ग्रन्थानां प रचयस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु । gla
चाणक्यनी तः (ख) मनुस्मृ तः (ग) पञ्चतन्त्रम् (घ) हतोपदे शः (ङ) रामायणम् (च)
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पुस्तक कहती है — ये सुभा षत अलग-अलग ग्रन्थ से लए गए ह। छह ग्रन्थ का प रचय यहाँ संस्कृत और हन्द दोन म है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
ग्रन्थः रचनाकारः प रचयः ( हन्द )
(क ) चाणक्यनीितः चाणक्यः यह एक नी तग्रन्थ है। इस ग्रन्थ म सूत्ररूप म धम, संस्कृ त, न्यायव्यवस्था, शा न्त, सु शक्षा
आ द वषय का सुन्दर ववरण है।
(ख) मनुस्म ृितः महिषः मनुः मनुस्मृ त एक प्र सद्ध नी तग्रन्थ और धमग्रन्थ है। इसम बारह अध्याय ह। इस ग्रन्थ म संसार
क उत्प त्त, धम, संस्कृ त तथा मनुष्य के कतव्य आ द का वणन है।
(ग ) पञ्चतन्त्र म् पिण्डतः पञ्चतन्त्र एक कथाग्रन्थ है। इसम पाँच तन्त्र ह — मत्रभेदः, मत्रलाभः, काकोलूक यम्,
िवष्णुशम लब्धप्रणाशः और अपरी क्षतकारकम्।
(घ ) िहतोपदे शः नारायणपिण्डतः हतोपदे श के रचनाकार नारायण प ण्डत ह। इसम पशु-प क्षय क कहा नय के ारा बच्च
के लए नी त क शक्षा प्रस्तुत क गई है।
(ङ) रामायणम् महिषः वाल्मीिकः यह ग्रन्थ भारतीय संस्कृ त का आदश स्वरूप दखाता है। इसम भगवान् श्रीराम का च रत
व णत है। यह ग्रन्थ ‘आ दकाव्य’ नाम से प्र सद्ध है।
(च) सङ् कलनगन्थः इस ग्रन्थ म सुभा षत का संग्रह है। व वध संस्कृत-ग्रन्थ से सुभा षत चुनकर इस ग्रन्थ म
सुभािषतरत्नभाण्डागारः उनका सङ् कलन कया गया है।
ग्रन्थ के तीन प्रकार समझ ली जए: नी तग्रन्थ सीधे उपदे श दे ता है (चाणक्यनी त, मनुस्मृ त); कथाग्रन्थ कहानी
के बहाने सीख दे ता है (पञ्चतन्त्र, हतोपदे श); और सङ् कलनग्रन्थ दूसर के अच्छे वचन एक जगह इक े कर दे ता है
(सुभा षतरत्नभाण्डागार)। रामायण महाकाव्य है — इसे ‘आ दकाव्य’ इस लए कहते ह क यह संस्कृत का सबसे
पहला काव्य माना जाता है, और वाल्मी क ‘आ दक व’।
Did you know? ‘भाण्डागार’ का अथ है भण्डार / खज़ाना। तो ‘सुभा षतरत्नभाण्डागारः’ का अथ हुआ —
‘सुभा षतरूपी रत्न का खज़ाना’। पाठ के पहले ोक से जोड़कर दे खए — जब सुभा षत ही रत्न है, तो सुभा षत
का संग्रह सचमुच रत्न का भण्डार ही हुआ!
प्र.2 पाठगता न अष्ट सुभा षता न कस्मात् कस्मात् ग्रन्थात् गृहीता न इ त परम्परया प्र सद्धम् — तत् लखन्तु ।
पुस्तक ने ग्रन्थ क सूची तो द है, पर यह नह लखा क कौन-सा ोक कस ग्रन्थ का है। नीचे परम्परा से प्र सद्ध ोत दए ह —
इन्ह ‘सामान्यतया माना जाता है’ इसी भाव से प ढ़ए, क्य क सुभा षत एक ग्रन्थ से दूसरे म जाते रहते ह और अनेक ोक कई
संग्रह म मलते ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
क्र. सुभा षतम् प्रायः यस्मात् ग्रन्थात्
१ पृ थव्यां त्री ण रत्ना न… चाणक्यनीितः
२ अयं नजः परो वे त… िहतोपदे शः / महोपिनषद्
३ उद्यमेन ह सद्ध्य न्त… िहतोपदे शः (िमत्रलाभः)
४ अ भवादनशीलस्य… मनुस्मृितः
५ उद्यमः साहसं धैयम्… िहतोपदे शः / सुभािषतसंगहाः
६ वद्या ददा त वनयम्… िहतोपदे शः
७ अ प स्वणमयी लङ् का… रामायणम् (श्रीरामस्य वचनम्)
८ पुस्तकस्था तु या वद्या… चाणक्यनीितः / सुभािषतरत्नभाण्डागारः
ध्यान र खए: पुस्तक के पृष्ठ 130 पर बने ोरकपत्र (पोस्टर ) पर ोक के नीचे छोटे अक्षर म ग्रन्थ का नाम छपा
है, पर वह चत्र म इतना छोटा है क पढ़ा नह जाता। इस लए परीक्षा म य द ोत पूछा जाए तो वही ल खए जो
आपक पुस्तक के पोस्टर पर दख रहा हो; ऊपर क ता लका केवल सामान्य जानकारी के लए है।
Try This: पुस्तकालय से हतोपदे श या पञ्चतन्त्र लेकर उसम से पाँच नए सुभा षत चु नए और उनका अथ
ल खए। यही प रयोजनाकाय के प्रश्न १ म भी काम आएगा।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 140
चत्वा र काया ण — ोरकपत्र नमाणम्, क्रयापदसूची, महापुरुषाणां जीवनप रचयः तथा भाषणप्र तयो गता
प रयोजनाकायम्
प्र.1 पाठस्य सवा ण सुभा षता न बृहत्- ोरकपत्रे स चत्रं ल खत्वा कक्षायाः भत्तौ स्थापयन्तु ।
यह करने का काम है — ठ क वैसा ही जैसा पाठ के पहले पृष्ठ पर शक्षक ने कक्षा म कया था।
अच्छे पोस्टर म क्या-क्या हो: (1) ोक बड़े और साफ़ अक्षर म, दो पं क्तय म, बीच म दण्ड ( । ) और अन्त म
दण्ड ( ।। ) स हत; (2) नीचे छोटे अक्षर म हन्द अथ; (3) ोक के भाव से मेल खाता एक चत्र; (4) कोने म
ग्रन्थ का नाम; (5) आठ ोक के लए आठ अलग पोस्टर, ता क पूरी द वार पर एक ंखला बन जाए।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
सुभा षतम् चत्रस्य सुझावः
पिृ थव्यां त्रीिण रत्नािन… जल का घड़ ा, भोजन की थाली और खुल ी पुस्तक
अयं िनजः परो वेित… पथ्ृ वी का गोला िजसके चारों ओर िविभन्न दे शों के बच्चे हाथ पकड़ े हुए
उद्यमेन िह िस िन्त… खेत जोतता िकसान, और पास में सोया हुआ िसंह
अिभवादनशीलस्य… बालक गुरु/दादा-दादी के चरण छू ता हआ
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उद्यमः साहसं धै यम्… पवत पर चढ़ ते हुए पवतारोही
िवद्या ददाित िवनयम्… सीढ़ ी — िवद्या → िवनय → पात्रता → धन → धम → सुख
अिप स्वणमयी लङ् का… भारत का मानिचत्र और ितरंगा
पुस्तकस्था तु या िवद्या… अलमारी में बन्द पुस्तके ं , और सामने पढ़ ता हआ
ु िवद्याथ
Tip: पोस्टर बनाते समय ोक पहले प सल से ल खए, मात्राएँ और वसग जाँ चए, तब स्केच-पेन से गहरा
क जए। संस्कृत म एक वसग या अनुस्वार छू ट जाने से अथ बदल जाता है।
प्र.2 सुभा षतेषु प्रयुक्तानां क्रयापदानां सूच कुवन्तु । तेषाम् आधारेण वाक्यरचनां कुवन्तु ।
पहले सूची, फर उन्ह क्रयापद से अपने नए वाक्य। आठ सुभा षत क सारी क्रयाएँ यहाँ एक जगह ह।
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क्रयापदम् धातुः पुरुषः / वचनम् नूतनं वाक्यम्
िवधीयते व + धा (कमवाच्ये) पथमपुरुषः, एकवचनम् वद्यालये नयमः वधीयते ।
िस िन्त सध् पथमपुरुषः, बहुवचनम् प रश्रमेण सवा ण काया ण सद्ध्य न्त ।
पिवशिन्त प्र + वश् पथमपुरुषः, बहुवचनम् छात्राः कक्षां प्र वश न्त ।
वधन्ते वृध् पथमपुरुषः, बहवु चनम् उद्याने वृक्षाः वधन्ते ।
वतन्ते वृत् पथमपुरुषः, बहुवचनम् ग्रामे बहवः जनाः वतन्ते ।
ददाित दा पथमपुरुषः, एकवचनम् माता पुत्राय दुग्धं ददा त ।
याित या पथमपुरुषः, एकवचनम् सः प्र त दनं वद्यालयं या त ।
आप्नोित आप् पथमपुरुषः, एकवचनम् प रश्रमी छात्रः यशम् आ ो त ।
रोचते रुच् पथमपुरुषः, एकवचनम् म ं संस्कृतभाषा रोचते ।
भवित / सिन्त भू / अस् एकवचनम् / बहुवचनम् सत्यम् एव श्रेष्ठं भव त । ग्रन्थे बहू न सुभा षता न स न्त ।
वाक्य बनाते समय दो बात जाँ चए: (1) कता और क्रया का वचन एक हो — ‘वृक्षाः वधन्ते’ (बहुवचन), ‘वृक्षः
वधते’ (एकवचन); (2) कम तीया वभ क्त म हो — ‘दुग्धं ददा त’, ‘ वद्यालयं या त’। ‘रोचते’ के साथ वशेष
नयम है — जसे अच्छा लगता है वह चतुथ वभ क्त म आता है: ‘म ं संस्कृतं रोचते’, ‘बालकाय क्र डा रोचते’।
Check it yourself: सूची म सबसे क ठन पद वधीयते है — यह कमवाच्य (passive) का रूप है, इसी लए
ोक म कता ‘मूढैः’ तृतीया वभ क्त म आया। कतृवाच्य म यही वाक्य होता — ‘मूढाः पाषाणखण्डेषु रत्नसं ां
वदध त।’
प्र.3 वद्या, उद्यमः, अ भवादनशीलः इत्या दगुणाः येषु स न्त तादृशानां पञ्चानां महापुरुषाणां जीवनप रचयं पठन्तु
लखन्तु च ।
यह पढ़कर लखने का काम है। हर महापुरुष के लए चार बात ल खए — जन्म-स्थान और काल, मुख्य काय, कौन-सा गुण
दखा, और एक ऐसी घटना जो उस गुण को सद्ध करती हो। तभी यह ‘जीवनप रचय’ बनेगा, केवल नाम क सूची नह ।
नमूना उत्तर (पञ्च महापुरुषाः) —
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महापुरुषः कः गुणः जीवनप रचयः (संक्षेपेण)
omउद्यमः, l a se
अब्दुल कलामm.c िवद्या g न द’ — यह उन्ह का वाक्य
डॉ. ए.पी.जे.
भारत के राष्ट्रप त बने। ‘सपने वे नह जो न द म आएँ, सपने वे ह जोaसोने
रामेश्वरम् के एक साधारण प रवार म जन्म। समाचार-पत्र बाँटकर पढ़ाई क , आगे चलकर वै ा नक और
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महिष वाल्मीिक िवद्या, तपः रामायण के रच यता, ‘आ दक व’ कहलाते ह। तपस्या और अध्ययन से उन्ह ने अपना जीवन पूरी तरह
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बदल लया — यही उनके च रत्र क सबसे बड़ी सीख है।
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वामी िववेकानन्दः धै यम्,
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agक संस्कृ त पूरे संसार के सामने रखी।
स् अपार स्मरणश क्त और अध्ययन के धनी। शकागो क धमसभा (1893) म ‘भाइयो और बहनो’
साहसम् कहकर भारत
ी रामकृष्णः /
श्र िवनयः,
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‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ को जीवन म उतारने वाले सन्त — जन्ह ने जा त और मत के भेद मटाकर सबको
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स न्त कबीरः उदारता
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एक बताया।
om उद्यमः,
ीमती सािवत्रcीबाई g l as
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भारत क पहली म हला श क्षकाओं म से एक। वरोध सहकर भी बा लकाओं के लए वद्यालय खोले
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िवद्या — ‘ वद्या ददा त वनयम्’ का जी वत उदाहरण।
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Tip: पाँच म से कम-से-कम दो नाम अपने राज्य या नगर के चु नए — कोई शक्षक, वै ा नक, स्वतन्त्रता-सेनानी
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या समाजसेवी। प रयोजना तब अ धक अच्छ बनती है जब उसम अपने आस-पास का कोई व्य क्त भी हो। चाह तो
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दो-दो पं क्तयाँ संस्कृत म भी ल खए — ‘कलाम-महोदयः महान् वै ा नकः आसीत्। सः अतीव प रश्रमी आसीत्।’
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‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ इ त वषये एकां भाषणप्र तयो गताम् आयोजयन्तु ।
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gl यह कक्षा म मलकर करने का काम है। पहले आयोजन का ढाँचा, फर एक नमूना भाषण।
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आयोजन कैसे कर: (1) कक्षा को समूह म बाँ टए, हर समूह से एक वक्ता; (2) समय — प्रत्येक को तीन मनट;
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(3) भाषा — संस्कृत अथवा हन्द , पर आरम्भ और अन्त संस्कृत म; (4) नणय के आधार — वषयवस्तु, उच्चारण,
आत्म वश्वास और समय-पालन; (5) नणायक — दो वद्याथ और एक शक्षक।
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नमूना भाषण (संस्कृतम्) —
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
सम्माननीयाः गुरु जनाः, िपयाः सुहृदः च !
अद्य अहं ‘वसुधैव कु टु म्बकम्’ इित िवषये िकिञ्चत् वदािम ।
‘अयं िनजः परो वेित गणना लघुचे त साम् । उदारचिरतानां त ु वसुधैव कु टु म्बकम् ॥’
अस्य अथः — यः जनः ‘एषः मम, एषः अन्यस्य’ इित िचन्तयित, तस्य हृदयं लघु भवित ।
यस्य हृदयम् उदारं भवित, तस्य कृ ते सम्पूण वसुधा एव कु टु म्बकम् ।
अस्माकं भारतदे शः सदा एतम् एव सन्दे शं ददाित ।
अतः वयं सव िमिलत्वा वदामः — सव भवन्त ु सुिखनः ।
धन्यवादः ।
भाषण म क्या-क्या रख ( हन्द म बोल तब भी): (1) आरम्भ म ोक; (2) उसका सरल अथ; (3) एक
उदाहरण — जैसे को वड-काल म भारत ने अनेक दे श को औष ध भेजी, अथवा कसी आपदा म दूर-दूर से आई
सहायता; (4) एक प्रश्न श्रोताओं से — ‘क्या पड़ोसी का दुःख हमारा नह ?’; (5) अन्त म सन्दे श — ‘सव भवन्तु
सु खनः’। तीन मनट के भाषण के लए लगभग 250–300 शब्द पयाप्त ह।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का आरम्भ एक चत्रकथा से होता है (पृष्ठ 130)। शक्षक कहते ह — ‘छात्राः ! पश्यन्तु, अद्य मम हस्ते ोरकपत्रा ण
स न्त।’ छात्र पूछते ह क पोस्टर पर क्या है, और शक्षक बताते ह — ‘सुन्दरवचना न एव सुभा षता न भव न्त। एता न
अस्माकं कृते उत्तमकायाथ प्रेरणां यच्छ न्त।’ इसी से पाठ का वषय खुलता है।
पाठ म आठ सुभा षत ह। (१) पृ थव्यां त्री ण रत्ना न, (२) अयं नजः परो वे त, (३) उद्यमेन ह सद्ध्य न्त, (४)
अ भवादनशीलस्य, (५) उद्यमः साहसं धैयम्, (६) वद्या ददा त वनयम्, (७) अ प स्वणमयी लङ् का, (८) पुस्तकस्था तु या
वद्या। हर ोक के नीचे पुस्तक ने पदच्छे दः, अन्वयः और भावाथः — तीन छापे ह, इस लए अथ समझना सरल है।
पाठ का मूल भाव — प रश्रम, उदारता और वद्या। केवल इच्छा से काम नह बनते (‘न ह सुप्तस्य सहस्य प्र वश न्त मुखे
मृगाः’); जसका हृदय बड़ा है उसके लए सारी पृथ्वी ही प रवार है (‘वसुधैव कुटु म्बकम्’); और वद्या वनय दे ती है, वनय से
योग्यता, योग्यता से धन, धन से धम और धम से सुख।
ाकरण क दृ ष्ट से यह पाठ ‘ लङ्ग’ का अभ्यास कराता है। प्रश्न ६ म चत्र दे खकर नाम और लङ्ग बताना है, और प्रश्न ८
म प का के बारह पद को प्रथमान्त-पुं लङ्ग / स्त्री लङ्ग / नपुंसक लङ्ग — इन तीन वग म बाँटना है। साथ ही ‘आम्/न’
वाले प्रश्न ५ म पूरे ोक का अथ ठ क-ठ क समझा है या नह , इसक परीक्षा होती है।
अभ्यास म दस प्रश्न ह (पृष्ठ 135–139)। उच्च स्वर म पाठ, एकपदे न उत्तर (६), एकवाक्येन उत्तर (६), चत्र दे खकर वाक्य-
रचना (५×३), आम्/न (६), चत्र से नाम- लङ्ग (६), वलय भरकर सुभा षत पूरा करना (६ रक्त), प का से लङ्गानुसार चयन
(१२ पद), रक्तस्थान-पू त (७) तथा चत्र दे खकर उ चत ोकांश लखना (५)।
योग्यता वस्तरः और प रयोजनाकायम् (पृष्ठ 140)। पुस्तक बताती है क ये सुभा षत व भन्न ग्रन्थ से लए गए ह और छह
ग्रन्थ का प रचय दे ती है — चाणक्यनी तः, मनुस्मृ तः, पञ्चतन्त्रम्, हतोपदे शः, रामायणम् तथा
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 13 पृ थव्यां त्री ण रत्ना न AglaSem · NCERT Solutions
सुभा षतरत्नभाण्डागारः। प रयोजना म पोस्टर बनाना, क्रयापद क सूची, पाँच महापुरुष का जीवन-प रचय और ‘वसुधैव
कुटु म्बकम्’ पर भाषण-प्र तयो गता है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
मूढैः मूखजनैः मूख के ारा By fools
नजः स्वकीयः अपना Own
परः अन्यः जनः अन्य Other
लघुचेतसाम् संकु िचतहृदयानाम् क्षुद्र हृदय वाल का Of narrow-minded
वसुधा धिरत्री पृथ्वी Earth
उद्यमेन पिरश्रमेण प रश्रम से Effort
वृद्धोपसे वनः वृ ानां से वकस्य बुजुग क सेवा करने वाले का Of the person who serves elders
सहायकृत् सहायकः सहायता करने वाला One who helps
पात्रताम् योग्यताम् योग्यता को Ability
आ ोत पाप्तं करोित प्राप्त करता है Receives
गरीयसी श्रेष्ठा महान Great
परहस्तेषु अन्येषां हस्तेष ु अन्य के हाथ म In others hand
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