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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 14: आलस्यं ह मनुष्याणां शरीर ः
महान् रपुः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
141 – 151 11 19 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 14: आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः
महान् रपुः
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के चतुदशः पाठः — आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः के सम्पूण हल। पाठ का
आरम्भ माँ और आलसी पुत्र के चत्रसंवाद से होता है, फर एक भक्षुक और ध नक क कथा आती है, और अन्त म वही ोक आता है जो पाठ का
शीषक है। व्याकरण क दृ ष्ट से यह पूरा पाठ तीया वभ क्त का अभ्यास कराता है। पृष्ठ 141 से 151 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है —
चत्रसंवाद तथा कथा का हन्द अनुवाद, ोक का पदच्छे द-अन्वय-भावाथ, वयं शब्दाथान् जानीमः क दस शब्द वाली ता लका, वयम् अभ्यासं
कुमः के प्रश्न १–७ (हर उपभाग तथा दोन चत्र-काय स हत), योग्यता वस्तरः के शब्दरूप-चाट एवं दो सुभा षत, तथा कायकलापः और
प रयोजनाकायम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 141 – 151
खं ड प्रश्न
11 19
माध्यम
हन्द
चतुदशः पाठः — आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः ( चत्रसंवादः) — पृष्ठ 141
पाठस्य प्रस्तावना — माता पुत्रं प रश्रमाय प्रेरय त
पाठः
प्र.1 मातः ! अद्य तु अवकाश दनम् अ स्त । अद्य अहं स ूण दने वश्रामं क रष्या म । … य द ातुम् इच्छ स, त ह एतां
कथां पठ । — अस्य स ूणस्य चत्रसंवादस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु ।
पाठ का पहला पृष्ठ तीन चत्र का एक छोटा-सा संवाद है। छु का दन है, पुत्र बस्तर पर लेटा है और माँ उसे उठा रही है। इसी
बातचीत से पाठ का वषय — आलस्य बनाम प रश्रम — खुल जाता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतम् (मूलः संवादः) हन्द अनुवादः
पुत्र ः — मातः ! अद्य तु अवकाशिदनम् अिस्त । अद्य अहं सम्पूणिदने पुत्र — माँ! आज तो छु ट्ट ी का िदन है। आज मैं पूरे िदन आराम
िवश्रामं किरष्यािम । क रूँ गा।
माता — अवकाशः िवद्यालयस्य अिस्त न तु स्वाध्यायस्य । बहु आलस्यं माँ — छु ट्ट ी िवद्य ालय की है, स्वाध् याय (अपनी पढ़ ाई) की नही ं। तुम
करोिष । उित्तष्ठ, पिरश्रमं कु रु । ु आल स्य करते हो। उठो, पिर श्रम करो।
बहत
पुत्र ः — अहम् उत्तीणः भिवष्यािम । िकम् अिधके न पिरश्रमेण ? पुत्र — मैं (परीक्षा में) उ त्त ीण तो हो ही जाऊँगा। अिधक पिर श्रम से
क्या लाभ?
माता — यः पिरश्रमं करोित, सः एव जीवने सफलतां पाप्नोित । पिरश्रमः माँ — जो पिर श्रम करता है, वही जीवन में सफलता पाता है। पिर श्रम
एव मनुष्यस्य िमत्रम् अिस्त । आलस्यं तु शत्र ःु इव अिस्त । ही मनुष्य का िम त्र है। आल स्य तो शत्र ु के समान है।
पुत्र ः — तत् कथं मातः ? पुत्र — वह कै से , माँ?
माता — यिद ातुम ् इच्छिस, तिह एतां कथां पठ । माँ — यिद जानना चाहते हो, तो यह कहानी पढ़ ो।
माँ का उत्तर ही पाठ क कुंजी है: ‘अवकाशः वद्यालयस्य अ स्त न तु स्वाध्यायस्य’ — छु वद्यालय जाने से मली
है, पढ़ने से नह । यही बात आगे क कथा म एक कदम और आगे बढ़ती है — प रश्रम केवल पढ़ाई का नह , पूरे
जीवन का साधन है। ध्यान द जए क माँ ने ‘प रश्रम’ को मत्र और ‘आलस्य’ को शत्रु कहा — और पाठ का ोक
भी यही दो शब्द (बन्धुः, रपुः) लेकर आता है।
Tip — संवाद के चार पद ध्यान से दे खए:
• मातः ! — यह सम्बोधन है (मातृ → हे मातः = ‘हे माँ’)।
• क रष्या म — लृट् लकार (भ वष्यत् काल), उत्तमपुरुष, एकवचन = ‘म करूँगा’।
• उ त्तष्ठ, कुरु, पठ — तीन लोट् लकार (आ ा) के मध्यमपुरुष एकवचन रूप ह।
• अ धकेन प रश्रमेण — तृतीया वभ क्त, एकवचन = ‘अ धक प रश्रम से’।
पाठः — भक्षुकस्य कथा — पृष्ठ 142 – 143
वशाले ग्रामे कश्चन भक्षुकः … तस्माद् दनात् सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान्
कथा
प्र.1 एक स्मन् वशाले ग्रामे कश्चन भक्षुकः आसीत् … “आय ! अहं प्रभूतं धनम् इच्छा म” इ त सः स वनयम् उक्तवान्
। — अस्य गद्यांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु । (पृष्ठ 142)
कथा का पहला भाग भक्षुक का प रचय दे ता है और ध नक से उसक भट कराता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
संस्कृतम् हन्द अनुवादः
एकिस्मन् िवशाले ग ामे कश्चन िभक्षक
ु ः आसीत् । एक बड़े गाँव में कोई िभखारी था।
यद्यिप सः उन्नतः दृ ढकायः च युवकः आसीत् तथािप सः िभक्षाटनं करोित यद्य िप वह ल म् बा और मज़बूत शरीर वाला युवक था, िफर भी वह भीख
स्म । माँग ता िफरता था।
माग यः कोऽिप िमलित तं सः कथयित — “कृ पया िभक्षां यच्छतु । रास्ते में जो कोई िमलता, उससे वह कहता — “कृ पया िभक्षा दीिजए।
दिरद ाय दानं करोतु । पुण् यं पाप्नोतु ।” इित । दिरद को दान कीिजए। पुण् य पाप्त कीिजए। ”
के चन जनाः तस्मै धनं यच्छिन्त । के चन च तजयिन्त । कु छ लोग उसे पैसे दे ते थे और कु छ डाँट दे ते थे।
एकदा तेन मागण किश्चत् धिनकः आगच्छित । सः िभक्षक
ु ः मनिस एवं एक बार उसी रास्ते से कोई धनी व्यिक्त आता है। वह िभखारी मन में
िचन्तयित — “अहो मम भाग्यम् । अद्य अहं पभूतं धनं पाप्नोिम” इित । ऐसा सोचता है — “अहा, मेर ा भाग्य! आज मुझे ढे र सारा धन
िमले ग ा। ”
ु ः धिनकं वदित — “आय ! अहम् अतीव दिरद ः अिस्म । कृ पया
िभक्षक ँ कृ पया दान
िभखारी धनी से कहता है — “आय! मैं बहुत ही गरीब हू।
दानं करोतु” इित । कीिजए। ”
धिनकः तं पष्ृ टवान् — “त्वं िकम् इच्छिस ?” धनी ने उससे पूछा — “तुम क्या चाहते हो?”
“आय ! अहं पभूतं धनम् इच्छािम” इित सः सिवनयम् उक्तवान् । “आय! मैं ढे र सारा धन चाहता हू”ँ — ऐसा उसने िवनम ता से कहा।
कथा क चोट यह तैयार हो जाती है: लेखक ने जान-बूझकर ‘उन्नतः दृढकायः च युवकः’ लखा है। वह बूढ़ा नह ,
रोगी नह , अपंग नह — पूरा स्वस्थ जवान है। फर भी माँगता है। इसी लए आगे ध नक का प्रश्न इतना तीखा लगता
है — ‘ कमथ त्वम् आत्मानं दुबलं मन्यसे?’
Tip — द्वतीया वभ क्त यह से आरम्भ: इस अंश के कम-पद दे खए — भक्षाटनं करो त, भक्षां यच्छतु, पुण्यं
प्राप्नोतु, धनं यच्छ न्त, ध नकं वद त, धनम् इच्छा म। सब तीया वभ क्त, एकवचन म ह। ‘करो त स्म’ म स्म लगने
से वतमान क्रया भूतकाल का अथ दे ती है — ‘करता था’।
प्र.2 तदा ध नकः वद त — “अहं तुभ्यं सह ं रूप्यका ण यच्छा म …” … तस्माद् दनात् भक्षुकः भक्षाटनं त्यक्त्वा
प रश्रमेण धनाजनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान् । — अस्य गद्यांशस्य हन्द -अनुवादं कुवन्तु । (पृष्ठ
143)
यह कथा का नणायक भाग है — यह ध नक भक्षुक को उसक अपनी सम्प त्त दखा दे ता है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः
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संस्कृतम् हन्द अनुवादः
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तव पादौ यच्छ ।”.c
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तदा धिनकः वदित — “अहं तुभ्यं सह ं रूप्यकािण यच्छािम । त्वं मह्यं
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तब धनी कहता है — “मैं तुम् हे ं एक हज़ार रुपये दे ता हू।
ँ तुम मुझे अपने
a s em दोनों पैर दे दो। ”
aिभक्षglकु ः वदित — “अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददािम ? िवना पादौ कथं वा िभखारी कहता है — “मैं अपने पैर तुम् हे ं कै से दे दू ँ? पैर ों के िबना चलूँग ा
चलािम ?” कै से ?”
. comधनी कहता है — “ठीक है, तुम पाँच हज़ार रुपये ले लो। मुझे अपने ag
धिनकः वदित — “अस्तु, त्वं पञ्चसह ं रूप्यकािण स्वीकु रु । मह्यं तव
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हस्तौ यच्छ ।”
g l as दोनों हाथ दे दो। ”
िभक्षक
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ु ः वदित — “हस्ताभ्यां िवना अहं कथं िभक्षां स्वीकरोिम ?” िभखारी कहता है — “हाथों के िबना मैं िभक्षा कै से लूँग ा?”
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एवमेव धिनकः सह ािधकै ः रूप्यकै ः तस्य अनेक ािन शरीराङ् गािन े तुम ्
चाहे। िक न्तु िभखारी ने मना कर िदया।em
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इसी पकार धनी ने हज़ारों रुपयों से उसके अनेक अङ् ग खरीदने
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ु ः िनराकृ तवान् ।
इष्टवान् । िकन्तु िभक्षक
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a s em उक्तवान् — “पश्य िमत्र ! तव समीपे एव तब धनी ने कहा — “दे खो िम त्र ! तुम् हारे पास ही हज़ारों से अिधक मूल्य
l ािधकमूल्यकािन वस्तूिन सिन्त । तथािप िकमथं त्वम् आत्मानं
तदा धिनकः
ag दुबलं मन्यसे ?
सह की वस्तुए ँ है।
ं िफर भी तुम स्वयं को दुबल क्यों मानते हो?
m सौभाग्य से ही हमें मनुष्य-जन्म िमला है। इसे सफल बनाने के िलए a s
.co पयत्न करो। यहाँ से जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।” agl
सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म पाप्तवन्तः । अस्य सफलताथं पयत्नं कु रु
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। इतः गच्छ, शुभं भवतु” इित ।
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ु ः िभक्षाटनं त्यक्त्वा पिरश्रमेण धनाजनं कृ त्वा
तस्माद् िदनात् िभक्षक उस िदन से िभखारी ने भीख माँग ना छोड़कर , पिर श्रम से धन कमाकर
स म् मानपूवक जीवन िबताना आर म् भ कर िदया। इसीिलए स ज्जन कहते
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सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान् । अतः एव सज्जनाः वदिन्त —
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है ं —
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gके बजाय यह दखा दया क
m .c ने पैसा नह , दृ द : उसने भक्षुक को दान दे कर एक दन का पेट भरने
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seउसके हाथ और पैर ही हज़ार रुपय से बड़ी सम्प त्त ह — जन्ह वह कसी भी दाम पर बेचने को तैयार नह । जब
ध नक
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agl भक्षुक ने स्वयं कहा ‘पैर के बना चलूँगा कैसे, हाथ के बना लूँगा कैसे’, तभी उसने अपने मुँह से मान लया क वह
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द रद्र नह है। सबसे सुन्दर पं क्त यही है — ‘तव समीपे एव सह ा धकमूल्यका न वस्तू न स न्त।’
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Tip — तीन व्याकरण- बन्दु:
• पादौ, हस्तौ — तीया वभ क्त, वचन (पैर और हाथ दो-दो होते ह, इस लए वचन)।
• तुभ्यं, मह्यं — चतुथ वभ क्त, एकवचन (‘तुम्ह’, ‘मुझे’) — दे ने के अथ म चतुथ आती है (‘सम्प्रदाने चतुथ ’)।
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• त्यक्त्वा, कृत्वा — क्त्वा-प्रत्ययान्त अव्यय (‘छोड़कर’, ‘करके’)। ये अव्यय ह, इस लए इनका रूप कभी नह
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बदलता।
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पाठस्य ोकः — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः — पृष्ठ 143 – 144
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीद त ॥
सु भा षतम्
प्र.1 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीद त ॥ — अस्य ोकस्य
पदच्छे दम् अन्वयं हन्द -अथ भावं च लखन्तु ।
यही ोक पाठ का शीषक भी है और उसका सार भी। कथा के अन्त म यह सज्जन के वचन के रूप म आता है।
पद च् छे द ः — आलस्यम् । िह । मनुष्याणाम् । शरीरस्थः । महान् । िरपुः । न । अिस्त । उद्यमसमः । बन्धुः ।
कृ त्वा । यम् । न । अवसीदित ।
अन्वयः — आलस्यं िह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् िरपुः (अिस्त) । उद्यमसमः बन्धुः न अिस्त, यं कृ त्वा (मनुष्यः) न
अवसीदित ।
हन्द अथ: आलस्य ही मनुष्य का, उनके शरीर म ही बैठा हुआ, सबसे बड़ा शत्रु है। प रश्रम के समान कोई बन्धु नह है, जसे
करके मनुष्य कभी दुखी नह होता।
भाव: शत्रु बाहर हो तो उससे बचा जा सकता है — ार बन्द कर ली जए, दूर चले जाइए। पर यह शत्रु शरीर के
भीतर ही बैठा है, इसी लए इसे ‘महान् रपुः’ कहा गया — इससे भागकर कह नह जाया जा सकता, इसे हराना ही
पड़ता है। पुस्तक का भावाथ भी यही कहता है — ‘यतो ह आलस्यस्य कारणात् काय न सद्ध्य त।’ दूसरी पं क्त
उपाय बताती है — उद्यम। प रश्रम को ‘बन्धु’ कहना बहुत सुन्दर है: बन्धु वही जो क ठन समय म साथ न छोड़े, और
प रश्रम कभी धोखा नह दे ता — ‘प रश्रमं कृत्वा कोऽ प दुःखं न आप्नो त।’ कथा का भक्षुक इसी ोक का जी वत
उदाहरण बन जाता है।
स न्ध खोलकर दे खए:
• शरीरस्थो महान् = शरीरस्थः + महान् ( वसगस न्ध — वसग का ‘ओ’)।
• नास्त्युद्यमसमो बन्धुः = न + अ स्त + उद्यमसमः + बन्धुः (दो स न्धयाँ — ‘अ स्त + उद्यम’ म यण् स न्ध से
‘अस्त्युद्यम’, और ‘उद्यमसमः + बन्धुः’ म वसगस न्ध)।
• नावसीद त = न + अवसीद त (द घस न्ध — अ + अ = आ)।
वभ क्त: ‘मनुष्याणाम्’ — षष्ठी, बहुवचन; ‘आलस्यम्, रपुः, बन्धुः’ — प्रथमा, एकवचन; ‘यम्’ — तीया,
एकवचन (‘उद्यम’ के लए आया है)।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 144
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पाठस्य दश शब्दाः — संस्कृत-अथः, हन्द , English तथा ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भः
शब्दाथाः
प्र.1 अधो ल खतानां शब्दानाम् अथ (संस्कृते, हन्द्याम्, आङ् ग्लभाषायां च) लखन्तु, मातृभाषया अ प अथ लखन्तु
— दृढकायः, भक्षाटनम्, प्रभूतम्, अतीव, मह्यम्, शरीराङ्गा न, नराकृतवान्, दुबलम्, त्यक्त्वा, नावसीद त ।
पृष्ठ 144 क पूरी ता लका, और साथ म यह भी क हर शब्द पाठ के कस वाक्य म आया है — इससे शब्द अपने-आप याद रह
जाता है।
शब्दः अथः हन्द ENGLISH पाठे प्रयोगः
(संस्कृतम्)
दृ ढकायः दृढशरीरः दृ ढ शरीर वाला A person with strong सः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत् ।
body
िभक्षाटनम् भक्षाथ भ्रमणम् भीख के िलए Roaming for begging सः भक्षाटनं करो त स्म ।
घूम ना
पभूतम् पयाप्तम् / ढे र सारा A lot of अहं प्रभूतं धनम् इच्छा म ।
अ धकम्
अतीव अत्य धकम् बहुत सारा Excessive अहम् अतीव द रद्रः अ स्म ।
म ह्यम् मम कृते मुझे For me मह्यं तव हस्तौ यच्छ ।
शरीराङ् गािन शरीरस्य अङ्गा न शरीर के अङ् ग Body parts तस्य अनेका न शरीराङ्गा न क्रेतुम्
इष्टवान् ।
िनराकृ तवान् न स्वीकृतवान् अस्वीकार िकया Refused कन्तु भक्षुकः नराकृतवान् ।
दुबलम् बलहीनम् िनबल Weak त्वम् आत्मानं दुबलं मन्यसे ?
त्यक्त्वा त्यागं कृत्वा त्याग करके Having left भक्षाटनं त्यक्त्वा प रश्रमेण धनाजनं
कृत्वा …
नावसीदित दुः खतः न भव त दुःखी नही ं होता है Doesn’t feel sad कृत्वा यं नावसीद त ॥
‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ स्तम्भ कैसे भर: अ न्तम खाना जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है, क्य क हर वद्याथ
क मातृभाषा अलग है। उदाहरण के लए दुबलम् ( नबल) — मराठ म ‘अशक्त’, गुजराती म ‘નબળું’, बंगला म
‘দ ুবল’, त मल म ‘பலவனம் ’, तेलुगु म ‘బలహీనం’, पंजाबी म ‘ਕਮਜ਼ੋਰ’। अपनी भाषा का शब्द अपनी पुस्तक म
ल खए।
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Tip — शब्द तोड़कर दे खए:
• दृढकायः = दृढ + काय (शरीर) — बहु ी ह समास, ‘ जसका शरीर दृढ़ है वह’।
• भक्षाटनम् = भक्षा + अटनम् (घूमना), ‘अट् ’ धातु से ‘अटन’ बना है।
• शरीराङ्गा न = शरीर + अङ्गा न (द घस न्ध — अ + अ = आ)।
• नराकृतवान् = नः + आ + कृ + क्तवतु — भूतकाल का कतृवाचक रूप, ‘उसने अस्वीकार कया’।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 145
प्रश्नाः १–३ : एकपदे न उत्तरा ण, ‘आम्/न’ इ त उत्तरम्, द्वतीया वभक्तेः द्ववचने प रवतनम्
अभ्यासः
प्र.1 अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरा ण यच्छन्तु — (क) भक्षुकः क करो त स्म ? (ख) कदा चत् तेन मागण
कः आगच्छ त ? (ग) भक्षुकः ध नकात् कम् इच्छ त ? (घ) ध नकः भक्षुकात् क या चतवान् ? (ङ) सौभाग्येन
वयं क प्राप्तवन्तः ?
‘एकपदे न’ का अथ है — केवल एक पद म उत्तर, पूरा वाक्य नह । नीचे पहले वही एक पद, फर कोष्ठक म उसका हन्द अथ,
और साथ म वह पं क्त जससे उत्तर नकला है।
प्रश्नः एकपदे न उत्तरम् पाठस्य आधारवाक्यम्
(क) िभक्षक
ु ः िकं करोित स्म ? िभक्षाटनम् (भीख माँग ता िफरता था) तथा प सः भक्षाटनं करो त स्म ।
(ख) कदािचत् तेन मागण कः धिनकः (एक धनी व्यिक्त) एकदा तेन मागण क श्चत् ध नकः आगच्छ त ।
आगच्छित ?
(ग) िभक्षक
ु ः धिनकात् िकम् इच्छित ? धनम् (धन — ‘पभूतं धनम्’) आय ! अहं प्रभूतं धनम् इच्छा म ।
(घ) धिनकः िभक्षक
ु ात् िकं यािचतवान् शरीराङ् गािन (शरीर के अङ् ग — पैर , हाथ ध नकः … तस्य अनेका न शरीराङ्गा न क्रेतुम्
? आिद ) इष्टवान् ।
(ङ) सौभाग्येन वयं िकं पाप्तवन्तः ? मानवजन्म (मनुष्य-जन्म ) सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म प्राप्तवन्तः ।
उत्तर का रूप कैसे तय कर: उत्तर उसी वभ क्त म आएगा जसम प्रश्न का प्रश्नवाचक शब्द है। ‘ कम्’ यहाँ तीया
वभ क्त म है (कम पूछा जा रहा है), इस लए उत्तर भी तीया म — भक्षाटनम्, धनम्, शरीराङ्गा न, मानवजन्म।
परन्तु (ख) म ‘कः’ प्रथमा वभ क्त म है (कता पूछा गया है), इस लए उत्तर भी प्रथमा म — ध नकः।
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Check it yourself: (घ) म सीधा-सा उत्तर ‘पादौ’ भी लखा जा सकता है, क्य क ध नक ने सबसे पहले पैर ही
माँगे थे। पर वह अधूरा है — उसने पैर, फर हाथ और फर अनेक अङ्ग माँगे। इस लए एक पद म सबसे पूरा उत्तर
शरीराङ्गा न ही है।
प्र.2 अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण ‘आम्’ अथवा ‘न’ इ त पदे न लखन्तु — यथा – ग्रामे कश्चन भक्षुकः आसीत् ।
— आम् । (क) भक्षुकः उन्नतः दृढकायः च आसीत् । (ख) जनाः तस्मै दण्डं यच्छ न्त । (ग) भक्षुकः प्रभूतं धनम्
इच्छ त । (घ) भक्षुकः ध नकाय पादौ ददा त । (ङ) भक्षुकः भक्षाटनं त्यज त ।
‘आम्’ = हाँ, ‘न’ = नह । जहाँ उत्तर ‘न’ है, वहाँ नीचे यह भी दया है क पाठ म सचमुच क्या लखा है — परीक्षा म यही अन्तर अंक
दलाता है।
वाक्यम् उत्तरम् कारणम् (पाठात्)
यथा — गामे कश्चन िभक्षक
ु ः आसीत् । आम् एक स्मन् वशाले ग्रामे कश्चन भक्षुकः आसीत् ।
(क) िभक्षक
ु ः उन्नतः दृ ढकायः च आसीत् । आम् यद्य प सः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत् ।
(ख) जनाः तस्मै दण्डं यच्छिन्त । न केचन जनाः तस्मै धनं यच्छ न्त — दण्ड नह , धन दे ते थे ।
(ग) िभक्षक
ु ः पभूतं धनम् इच्छित । आम् आय ! अहं प्रभूतं धनम् इच्छा म ।
(घ) िभक्षक
ु ः धिनकाय पादौ ददाित । न ‘अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददा म ?’ — उसने पैर दे ने से मना कर दया ।
(ङ) िभक्षक
ु ः िभक्षाटनं त्यजित । आम् तस्माद् दनात् भक्षुकः भक्षाटनं त्यक्त्वा … आरब्धवान् ।
Tip: (ख) म केवल एक शब्द बदला है — धनम् क जगह दण्डम्। ऐसे प्रश्न म पूरा वाक्य प ढ़ए, केवल जाना-
पहचाना ढाँचा दे खकर ‘आम्’ मत लख द जए। पाठ म लखा है क कुछ लोग धन दे ते थे और कुछ तजय न्त (डाँटते
थे) — डाँटना ‘दण्ड दे ना’ नह है।
प्र.3 अधो ल खतेषु वाक्येषु द्वतीया वभक्तेः शब्दानां द्ववचने प रवतनं कृत्वा वाक्या न लखन्तु — यथा – चन्द्रशेखरः
लेखं लख त । — चन्द्रशेखरः लेखौ लख त । (क) आप णकः अङ् कन ददा त । (ख) मातामही कथां श्रावय त ।
(ग) सै नकः मां रक्ष त । (घ) कृष्णः कन्दुकं गृ ा त । (ङ) छात्रः ोकं पठ त ।
यहाँ केवल मोटे अक्षर वाला कम-पद बदलना है — कता और क्रया ज्य -के-त्य रहगे, क्य क कम का वचन बदलने से क्रया का
वचन नह बदलता।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः
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एकवचनम् (प्रश्नः) द्ववचने (उत्तरम्) शब्दः तथा नयमः
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यथा — चन्द शेखरः ले खं िलखित । चन्द शेखरः ले खौ िलखित ।
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लेख (अकारान्त पुं.) — लेखम् → लेखौ
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g l a आपिणकः अङ् क न्यौ ददाित । अङ् कनी (ईकारान्त स्त्री.) — अङ् कनीम् → अङ् कन्यौ
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(क) आपिणकः अङ् कनी ं ददाित ।
(ख) मातामही कथां श्रावयित । मातामही कथे श्रावयित । कथा (आकारान्त स्त्री.) — कथाम् → कथे
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(ग) सै िनकः मां रक्षित ।
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सै िनकः आवां र क्षित ।
m . अस्मद् (सवनाम) — माम् → आवाम् ag
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(घ) कृ ष्णः क न्दुकं ग ृ ाित ।
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कृ ष्णः क न्दुक ौ ग ृ ाित । कन्दुक (अकारान्त पुं.) — कन्दुकम् → कन्दुकौ
(ङ) छात्रः श्लोकं पठित । छात्र ः श्लोकौ पठित ।
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ोक (अकारान्त पुं.) — ोकम् → ोकौ
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द्वतीया- द्ववचन के चार साँचे याद कर ली जए:
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a s em पुं लङ्ग → -औ (बालकम् → बालकौ, ग्रामम् → ग्रामौ)
• अकारान्त
a gl • आकारान्त स्त्री लङ्ग → -े (बा लकाम् → बा लके, मालाम् → माले)
• ईकारान्त स्त्री लङ्ग → -्यौ (नद म् → नद्यौ, लेखनीम् → लेखन्यौ)
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• अकारान्त नपुंसक लङ्ग → -े (फलम् → फले, गृहम् → गृहे)
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यही पृष्ठ 149 क ता लकाओं म भी छपा है।
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Check it yourself: (ग) सबसे क ठन है — ‘माम्’ अकारान्त शब्द नह , अस्मद् सवनाम है, इस लए यहाँ ‘मौ’
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जैसा कोई रूप नह बनता। अस्मद् के तीन रूप याद र खए — माम् (एक) — आवाम् ( द्व) — अस्मान् (बहु)।
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इसी प्रकार युष्मद् — त्वाम् — युवाम् — युष्मान्।
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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 146
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प्रश्नः ४ : चत्रं दृ ् वा द्वतीया वभक्तेः वाक्या न रचयन्तु
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अभ्यासः
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प्र.1 चत्रं दृ ् वा द्वतीया वभक्तेः वाक्या न रचयन्तु — बा लकाः ............ गच्छ न्त । प क्षणः ............ खाद न्त ।
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शक्षकः ............ पाठय त । नतक ............ धर त । अहं ............ स्वीकरो म ।
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पाँच रक्त स्थान म कम भरना है, इस लए हर उत्तर तीया वभ क्त म आएगा। नीचे पहले यह बताया है क पृष्ठ 146 के चत्र म
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क्या दखता है, फर उत्तर।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
चत्रे कम् अ स्त पूण वाक्यम् रक्तपदस्य ववरणम्
तीन बािलकाएँ बस्ता ले क र ‘िवद्यालय’ िलखे सङ् के त-पट्ट की बािलकाः िवद्य ालयं वद्यालय — तीया, एकवचन, पुं लङ्ग
ओर जा रही है ं ग च्छिन्त ।
डाल पर बैठे पक्षी लाल फल चुग रहे है ं पिक्षणः फलािन खादिन्त । फल — तीया, बहुवचन, नपुंसक लङ्ग
श्यामपट्ट के आगे िशक्षक पुस्तक खोले है,ं सामने दो छात्र बैठे है ं िशक्षकः छात्र ान् पाठयित । छात्र — तीया, बहुवचन, पुं लङ्ग
नत्ृ य-मुद ा में खड़ी नतकी गले में फू लों की माला पहने है नतकी मालां धरित । माला — तीया, एकवचन, स्त्री लङ्ग
दो छात्र मेज़ पर पुस्तक खोले बैठे है,ं एक दू स रे को ले खनी दे अहं ले खनी ं स्वीकरोिम । लेखनी — तीया, एकवचन, स्त्री लङ्ग
रहा है (ईकारान्त)
वचन कैसे तय हुआ: यह चत्र से दे खना है, अनुमान से नह । चत्र म पक्षी अनेक फल चुग रहे ह, इस लए फला न
(बहुवचन); कक्षा म दो-से-अ धक छात्र ह, इस लए छात्रान् (बहुवचन); नतक ने एक ही माला पहनी है, इस लए
मालाम् (एकवचन)। ‘अहं’ एक व्य क्त है, इस लए क्रया ‘स्वीकरो म’ उत्तमपुरुष एकवचन म है।
Tip — अन्य ठ क उत्तर भी सम्भव ह: ‘ शक्षकः संस्कृतं पाठय त’ अथवा ‘ शक्षकः पाठं पाठय त’ भी शुद्ध है,
क्य क ‘पाठय्’ कमक धातु है — इसके साथ दो कम आ सकते ह (‘ शक्षकः छात्रान् संस्कृतं पाठय त’)। इसी
प्रकार अ न्तम वाक्य म ‘अहं पुस्तकं स्वीकरो म’ भी लखा जा सकता है। जो भी लख, रूप तीया वभ क्त का ही
होना चा हए।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 147
प्रश्नौ ५–६ : कोष्ठकस्थशब्दानां द्वतीयायाः एकवचनरूपम्, एकवचनात् बहुवचने प रवतनम्
अभ्यासः
प्र.1 कोष्ठके वद्यमानानां शब्दानां द्वतीया वभक्तेः एकवचनरूपेण सह वाक्या न लखन्तु — यथा – भक्तः (दे व)
नम त । — भक्तः दे वं नम त । (क) छात्राः (ग्रन्थ) पठ न्त । (ख) बालकाः (कथा) लख न्त । (ग) रमा (लेखनी)
क्र णा त । (घ) शक्षकः (अस्मद्) पाठय त । (ङ) अजुनः (नद ) पश्य त । (च) पतामही (रजनी) आह्वय त । (छ)
अहं (युष्मद्) नमस्करो म । (ज) कृषकः (क्षेत्र) कष त । (झ) पयटकः (कन्याकुमारी) गच्छ त । (ञ) चत्रकारः
( चत्र) रचय त ।
कोष्ठक म मूल शब्द (प्रा तप दक) दया है; उसे द्वतीया वभ क्त के एकवचन म बदलकर वाक्य पूरा करना है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः पूण वाक्यम् शब्दस्य वगः
यथा — भक्तः (दे व) नमित । भक्तः दे वं नमित । अकारान्त पुं लङ्ग
(क) छात्राः (ग न्थ) पठिन्त । छात्र ाः ग न्थं पठिन्त । अकारान्त पुं लङ्ग
(ख) बालकाः (कथा) िलखिन्त । बालकाः कथां िलखिन्त । आकारान्त स्त्री लङ्ग
(ग) रमा (ले खनी) ीणाित । रमा ले खनी ं ीणाित । ईकारान्त स्त्री लङ्ग
(घ) िशक्षकः (अस्मद् ) पाठयित । िशक्षकः मां पाठयित । सवनाम — अस्मद् → माम्
(ङ) अजुनः (नदी) पश्यित । अजुनः नदी ं पश्यित । ईकारान्त स्त्री लङ्ग
(च) िपतामही (रजनी) आह्वयित । िपतामही रजनीम् आ ह्व यित । ईकारान्त स्त्री लङ्ग (यहाँ ‘रजनी’ नाम है)
(छ) अहं (युष्मद् ) नमस्करोिम । अहं त्वां नम स्करोिम । सवनाम — युष्मद् → त्वाम्
(ज) कृ षकः (क्षेत्र ) कषित । कृ षकः क्षेत्र ं कषित । अकारान्त नपुंसक लङ्ग
(झ) पयटकः (कन्याकु मारी) गच्छित । पयटकः क न्याकु मारी ं ग च्छित । ईकारान्त स्त्री लङ्ग (स्थान-नाम)
(ञ) िचत्रकारः (िचत्र) रचयित । िचत्र कारः िचत्र ं रचयित । अकारान्त नपुंसक लङ्ग
ध्यान द जए — अनुस्वार कब, ‘म्’ कब: तीया एकवचन का प्रत्यय -म् ही है। पर वाक्य के बीच म य द अगला
शब्द व्यञ्जन से आरम्भ हो तो वह ‘म्’ अनुस्वार बन जाता है — ‘ग्रन्थ◌ं पठ न्त’, ‘कथा◌ं लख न्त’। और य द
अगला शब्द स्वर से आरम्भ हो तो ‘म्’ ज्य -का-त्य रहता है — ‘रजनीम् आह्वय त’। यही अन्तर (च) और शेष
वाक्य म दखता है।
Tip — (झ) पर एक वशेष बात: ‘गम्’ धातु के साथ जस स्थान पर जाना है, वह द्वतीया वभ क्त म आता है,
न क ‘को/क ओर’ के लए कसी और वभ क्त म — ‘सः वद्यालयं गच्छ त’, ‘पयटकः कन्याकुमार गच्छ त’। इसे
‘कम ण तीया’ का ही वस्तार सम झए।
प्र.2 द्वतीया वभक्तेः एकवचनशब्दानां बहुवचने प रवतनं कृत्वा वाक्या न रचयन्तु — यथा – वयं सुभा षतं वदामः । —
वयं सुभा षता न वदामः । (क) अरुणः दूरवाण नय त । (ख) पता लेखनीम् आनय त । (ग) जननी पाकं पच त ।
(घ) मातामहः मां बोधय त । (ङ) अग्रजा त्वाम् आह्वय त ।
इस बार कम-पद को बहुवचन म करना है। कता और क्रया फर भी नह बदलगे।
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एकवचनम् (प्रश्नः) बहुवचने (उत्तरम्) शब्दः तथा नयमः
यथा — वयं सुभािषतं वदामः । वयं सुभािषतािन वदामः । सुभा षत (अकारान्त नपुं.) — सुभा षतम् → सुभा षता न
(क) अरुणः दू र वाणी ं नयित । अरुणः दू र वाणीः नयित । दूरवाणी (ईकारान्त स्त्री.) — दूरवाणीम् → दूरवाणीः
(ख) िपता ले खनीम् आनयित । िपता ले खनीः आनयित । लेखनी (ईकारान्त स्त्री.) — लेखनीम् → लेखनीः
(ग) जननी पाकं पचित । जननी पाकान् पचित । पाक (अकारान्त पुं.) — पाकम् → पाकान्
(घ) मातामहः मां बोधयित । मातामहः अस्मान् बोधयित । अस्मद् — माम् → अस्मान्
(ङ) अग जा त्वाम् आह्वयित । अग जा युष्म ान् आ ह्व यित । युष्मद् — त्वाम् → युष्मान्
द्वतीया-बहुवचन के चार साँचे:
• अकारान्त पुं लङ्ग → -आन् (ग्रामान्, बालकान्, पाकान्)
• आकारान्त स्त्री लङ्ग → -आः (मालाः, बा लकाः, कथाः)
• ईकारान्त स्त्री लङ्ग → -ीः (नद ः, लेखनीः, दूरवाणीः)
• अकारान्त नपुंसक लङ्ग → -आ न (फला न, जला न, सुभा षता न)
सवनाम अलग चलते ह — अस्मान्, युष्मान्, तान्, एतान्।
Check it yourself: (घ) और (ङ) म वद्याथ प्रायः ‘मान्’ या ‘त्वान्’ लख दे ते ह — ऐसा कोई रूप नह होता।
सवनाम क पूरी पं क्त एक साथ याद क जए:
अस्मद् — माम् / आवाम् / अस्मान्
युष्मद् — त्वाम् / युवाम् / युष्मान्
तद् (पुं.) — तम् / तौ / तान्
एतद् (पुं.) — एतम् / एतौ / एतान् ।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 148
प्रश्नः ७ : अधः प्रदत्तं चत्रं दृ ् वा द्वतीया वभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्या न रचयन्तु
अभ्यासः
प्र.1 अधः प्रदत्तं चत्रं दृ ् वा द्वतीया वभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्या न रचयन्तु — (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ)
… (च) … (छ) … (ज) … (झ) … (ञ) …
पृष्ठ 148 का चत्र एक वद्यालय-प्राङ्गण का है। उसम चार दृश्य ह — (1) जा लका (नेट) के दोन ओर बालक कन्दुक-क्र डा कर रहे
ह, (2) पीले वस्त्र वाले योग शक्षक के साथ तीन छात्र योगासन कर रहे ह, (3) दो बा लकाएँ काग़ज़, कची और रंग से यान (राकेट)
क प्र तकृ त बना रही ह, और (4) एक गोल घेरे म श क्षका दो छात्र को सङ्गणक (कम्प्यूटर) पर सखा रही ह। पीछे वद्यालय-
भवन, वृक्ष और पुष्पवा टका है।
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क्रमः वाक्यम् द्वतीयापदम् हन्द
(क) बालकाः क्र डाक्षेत्रे कन्दुकं क्र ड न्त । क न्दुक म् बालक मैदान म गद खेल रहे ह।
(ख) एकः बालकः कन्दुकं ताडय त । क न्दुक म् एक बालक गद पर प्रहार करता है।
(ग) योग शक्षकः आसनं करो त । आसनम् योग- शक्षक आसन कर रहे ह।
(घ) छात्राः योगासना न अभ्यस्य न्त । योगासनािन छात्र योगासन का अभ्यास कर रहे ह।
(ङ) बा लके यानप्र तकृ त रचयतः । यानपितकृ ितम् दो बा लकाएँ राकेट का प्र तरूप बना रही ह।
(च) बा लका कतया पत्रं कतय त । पत्र म् बा लका कची से काग़ज़ काटती है।
(छ) श क्षका छात्रान् सङ्गणकं पाठय त । छात्र ान्, सङ् गणकम् श क्षका छात्र को कम्प्यूटर सखाती ह।
(ज) छात्रः सङ्गणकं चालय त । सङ् गणकम् छात्र कम्प्यूटर चलाता है।
(झ) वयं चत्रे वद्यालयस्य भवनं पश्यामः । भवनम् हम चत्र म वद्यालय का भवन दे खते ह।
(ञ) जनाः वा टकायां पुष्पा ण पश्य न्त । पुष्पािण लोग वा टका म फूल दे खते ह।
ऐसा प्रश्न कैसे हल कर — तीन चरण: (1) चत्र म जो-जो व्य क्त दख, उन्ह कता बनाइए (बालकः, छात्राः,
श क्षका, बा लके); (2) हर व्य क्त जो काम कर रहा है, उसक क्रया ल खए (क्र ड त, करो त, पाठय त); (3) उस
काम क वस्तु को तीया वभ क्त म र खए (कन्दुकम्, आसनम्, सङ्गणकम्)। कता का वचन और क्रया का वचन
मलाना न भू लए — ‘बालकाः क्र ड न्त’ (बहुवचन), ‘बा लके रचयतः’ ( वचन), ‘छात्रः चालय त’ (एकवचन)।
Tip: (छ) म दो-दो कम ह — छात्रान् और सङ्गणकम्। ‘पाठय्’ (पढ़ाना), ‘याच्’ (माँगना), ‘नी’ (ले जाना) जैसी
धातुएँ कमक कहलाती ह, इनके साथ दो कम आ सकते ह और दोन तीया वभ क्त म रहते ह। पाठ म भी यही
रचना है — ‘ध नकः भक्षुकात् शरीराङ्गा न या चतवान्’।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 149
प्रश्नः १ : एता न शब्दरूपा ण पठन्तु, अवगच्छन्तु, स्मरन्तु च — द्वतीया वभक्तेः पञ्च वगाः
योग्यता वस्तरः
प्र.1 एता न शब्दरूपा ण पठन्तु, अवगच्छन्तु, स्मरन्तु च — (क) अकारान्त-पुं लङ्गशब्दाः (ग्राम, भक्षुक, बालक) (ख)
आकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दाः ( भक्षा, माला, बा लका, तत्) (ग) ईकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दाः (नद , लेखनी, भ गनी)
(घ) अकारान्त-नपुंसक लङ्गशब्दाः (फल, जल, गृह) (ङ) सवनामशब्दाः (अस्मद्, युष्मद्, तद्, एतद्) ।
पृष्ठ 149 क पाँच ता लकाएँ यहाँ एक साथ ह। सब द्वतीया वभ क्त क ह — यही इस पाठ का व्याकरण- वषय है।
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(क) अकारान्त-पुं लङ्गशब्दाः
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वभ क्तः शब्दः एकवचनम् द्ववचनम्
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ि तीया िवभिक्तः ग्राम ग ामम् ग ामौ ग ामान्
a भक्षुक िभक्षक
ु म् िभक्षक
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(ख) आकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दाः a
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वभ क्तः शब्दः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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ि तीया िवभिक्तः भक्षा िभक्षाम् िभक्षे
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बा लका बािलकाम् बािलके बािलकाः
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तत् (स्त्री.) ताम् ते ताः
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(ग) ईकारान्त-स्त्री लङ्गशब्दाः a
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वभ क्तः शब्दः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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ि तीया िवभिक्तः नद नदीम् नदीः
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g l a लेखनी ले खनीम् ले खन्यौ ले खनीः
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भ गनी भिगनीम् भिग न्यौ भिगनीः
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(घ) अकारान्त-नपुंसक लङ्गशब्दाः
वभ क्तः शब्दःagl एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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ि तीया िवभिक्तः फल फलम् फले
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जल जलम् जले जलािन
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गृह ग ृहम् ग ृहे ग ृहािण
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(ङ) सवनामशब्दाः
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वभ क्तः शब्दः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
ि तीया िवभिक्तः अस्मद् माम् आवाम् अस्मान्
युष्मद् त्वाम् युवाम् युष्म ान्
तद् (पुं.) तम् तौ तान्
एतद् (पुं.) एतम् एतौ एतान्
पूरी ता लका एक पं क्त म: तीया वभ क्त के प्रत्यय ह — अम् / औ / शस्, अथात् एकवचन म -म्, वचन म
-औ (नपुंसक तथा आकारान्त-स्त्री लङ्ग म -ए), और बहुवचन म -आन् / -आः / -ीः / -आ न। यह याद रखने क
सबसे सरल कुंजी यह है क नपुंसक लङ्ग म प्रथमा और द्वतीया के रूप सदा एक-जैसे होते ह — फलम्/फले/
फला न दोन वभ क्तय म वही।
Tip: ‘गृह’ का बहुवचन गृहा ण है, ‘गृहा न’ नह — क्य क ‘ऋ, र्, ष्’ के बाद ‘न्’ का ‘ण्’ हो जाता है (णत्व-
वधान)। इसी नयम से ‘शरीराङ्गा न’ म ‘ न’ ही रहा (बीच म ‘ग’ के कारण), पर ‘पुष्पा ण’ म ‘ ण’ हुआ।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 150
प्रश्नौ २–३ : अ ा वश तपदानां द्वतीयारूपा ण तथा द्वौ ोकौ
योग्यता वस्तरः
प्र.1 उदाहरणानुसारम् अधो ल खतानां पदानां द्वतीया वभक्तेः रूपा ण लखन्तु अवगच्छन्तु च — यथा : युवकः –
युवकम् । भक्षा – भक्षाम् । नद – नद म् । धनम् – धनम् । (आसन्दः, पूजा, लेखनी, नगरम्, ध नकौ, क वते,
जननी, पुष्पे, पादाः, ना सका, कतरी, पुष्पा ण, गोलद पौ, प त्रकाः, अङ् कन्यौ, पुस्तका न, हस्तः, पे टका,
सम्माजन्यः, वना न, अहम्, यूयम्, द्रोणी, त्वम्, युवाम्, आवाम्, भ गनी, सः)
ता लका के चार स्तम्भ चार अलग-अलग वग के ह — पहला अकारान्त पुं लङ्ग तथा सवनाम, दूसरा आकारान्त स्त्री लङ्ग, तीसरा
ईकारान्त स्त्री लङ्ग और चौथा अकारान्त नपुंसक लङ्ग। सबके 28 उत्तर नीचे ह।
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पदम् द्वतीयारूपम् वचनम् तथा वगः हन्द
आसन्दः आस न्दम् एकवचनम् — अकारान्त पुं. कुस को
धिनकौ धिनकौ वचनम् — अकारान्त पुं. दो ध नक को
पादाः पादान् बहुवचनम् — अकारान्त पुं. पैर को
गोलदीपौ गोलदीपौ वचनम् — अकारान्त पुं. दो गोल द प को
हस्तः हस्तम् एकवचनम् — अकारान्त पुं. हाथ को
अहम् माम् एकवचनम् — सवनाम (अस्मद्) मुझको
युवाम् युवाम् वचनम् — सवनाम (युष्मद्) तुम दोन को
पूजा पूजाम् एकवचनम् — आकारान्त स्त्री. पूजा को
किवते किवते वचनम् — आकारान्त स्त्री. दो क वताओं को
नािसका नािसकाम् एकवचनम् — आकारान्त स्त्री. नाक को
पित्रकाः पित्र काः बहुवचनम् — आकारान्त स्त्री. प त्रकाओं को
पेिटका पेिटकाम् एकवचनम् — आकारान्त स्त्री. पेट को
यूयम् युष्म ान् बहुवचनम् — सवनाम (युष्मद्) तुम सबको
आवाम् आवाम् वचनम् — सवनाम (अस्मद्) हम दोन को
ले खनी ले खनीम् एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री. कलम को
जननी जननीम् एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री. माता को
कतरी कतरीम् एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री. कची को
अङ् कन्यौ अङ् क न्यौ वचनम् — ईकारान्त स्त्री. दो प सल को
सम्माजन्यः स म् माजनीः बहुवचनम् — ईकारान्त स्त्री. झाड़ुओं को
द ोणी द ोणीम् एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री. नाव / कठौती को
भिगनी भिगनीम् एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री. बहन को
नगरम् नगरम् एकवचनम् — अकारान्त नपुं. नगर को
पुष्पे पुष्पे वचनम् — अकारान्त नपुं. दो फूल को
पुष्पािण पुष्पािण बहुवचनम् — अकारान्त नपुं. फूल को
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 14 आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रपुः AglaSem · NCERT Solutions
पदम् द्वतीयारूपम् वचनम् तथा वगः हन्द
पुस्तकािन पुस्तकािन बहुवचनम् — अकारान्त नपुं. पुस्तक को
वनािन वनािन बहुवचनम् — अकारान्त नपुं. वन को
त्वम् त्वाम् एकवचनम् — सवनाम (युष्मद्) तुझको
सः तम् एकवचनम् — सवनाम (तद्, पुं.) उसको
चार पद के रूप बदले ही नह — क्य ? ध नकौ, गोलद पौ, क वते, अङ् कन्यौ, पुष्पे, प त्रकाः, पुष्पा ण,
पुस्तका न, वना न, नगरम्, युवाम्, आवाम् — इनम प्रथमा और तीया के रूप एक-जैसे ह। इसके दो कारण ह:
(1) नपुंसक लङ्ग म प्रथमा और तीया सदा समान होती ह; (2) वचन तथा आकारान्त स्त्री लङ्ग के बहुवचन म भी
दोन वभ क्तय के रूप समान रहते ह। इस लए इन्ह ‘नह बदला’ मत सम झए — ये सही तीया-रूप ही ह।
Check it yourself — दो क ठन पद:
• सम्माजन्यः पहले से बहुवचन (प्रथमा) है; इसका तीया-बहुवचन सम्माजनीः होगा (नद → नद ः के अनुसार)।
• पादाः भी बहुवचन है; अकारान्त पुं लङ्ग होने से तीया-बहुवचन पादान् बनेगा (बालकाः → बालकान्)।
• अहम् → माम् तथा यूयम् → युष्मान् — सवनाम के रूप मूल शब्द से बलकुल अलग दखते ह, इन्ह रटना ही
पड़ता है।
प्र.2 अधो ल खतान् ोकान् पठन्तु, अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — (१) वना वेदं वना गीतां वना रामायण कथाम् । वना
क व का लदासं भारतं भारतं न ह ॥ (२) रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम् । शयने यः स्मरे न्नत्यं दुःस्वप्नस्तस्य
नश्य त ॥
दोन ोक जान-बूझकर यहाँ रखे गए ह — इनका लगभग हर पद द्वतीया वभ क्त म है, इस लए ये इस पाठ के व्याकरण का
सुन्दर अभ्यास बन जाते ह।
ोकः १ — वना वेदं वना गीताम् …
अन्वयः — वेद ं िवना, गीतां िवना, रामायणी ं कथां िवना, किवं कािलदासं िवना च भारतं भारतं न िह (भवित) ।
हन्द अथ: वेद के बना, गीता के बना, रामायण क कथा के बना और क व का लदास के बना भारत ‘भारत’ ही नह रह
जाता।
भाव: दे श केवल भू म का नाम नह होता; उसक पहचान उसक वचार-सम्पदा से बनती है। पुस्तक का भावाथ यही
कहता है — ‘भारतस्य वास्त वकं स्वरूपं वेदे, गीतायां, रामायणे, का लदासस्य काव्येषु च द्रष्टु ं शक्यते।’ वेद ान दे ते
ह, गीता कतव्य सखाती है, रामायण मयादा दखाती है और का लदास का काव्य सौन्दय-दृ ष्ट दे ता है। इन्ह भुला द
तो न ा तो रहेगा, भारत नह ।
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ोकः २ — रामं स्कन्दं हनूमन्तम् …
अन्वयः — यः शयने िनत्यं रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैन ते यं वृक ोदरं (च) स्मरेत ्, तस्य दुःस्वप्नः नश्यित ।
हन्द अथ: जो सोते समय प्र त दन राम, स्कन्द (का तकेय), हनुमान, वैनतेय (गरुड) और वृकोदर (भीम) का स्मरण करता है,
उसका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है।
भाव: पाँच नाम नभयता के प्रतीक ह — राम धैय के, स्कन्द वीरता के, हनुमान बल और भ क्त के, गरुड ग त के,
भीम श क्त के। सोने से पहले जन वचार को मन म रखते ह, न द उन्ह का रूप ले लेती है; इस लए साहस के
प्रतीक का स्मरण करने से डरावने सपने नह आते। यह ोक वस्तुतः यही सखाता है क मन को अच्छ बात पर
टकाकर सोना चा हए।
Tip — दोन ोक क व्याकरण-कुंजी:
• पहले ोक म ‘ वना’ अव्यय है और उसके योग म शब्द तीया वभ क्त म आते ह — वेदम्, गीताम्, कथाम्,
क वम्, का लदासम्। (‘ वना’ के साथ तृतीया तथा पञ्चमी भी हो सकती है, पर यहाँ तीया है।)
• दूसरे ोक म ‘स्मरेत्’ (स्मृ धातु) का कम तीया म है — रामम्, स्कन्दम्, हनूमन्तम्, वैनतेयम्, वृकोदरम्।
• स्मरे न्नत्यं = स्मरेत् + नत्यम्; दुःस्वप्नस्तस्य = दुःस्वप्नः + तस्य। ‘स्मरेत्’ व ध लङ् लकार का रूप है — ‘स्मरण
करना चा हए’।
कायकलापः तथा प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 151
भाषाक्र डा तथा प रयोजनाकायस्य त्री ण काया ण
कायकलापः प रयोजनाकायम्
प्र.1 भाषाक्र डा — बालकाः गणद्वये वभजनीयाः । शक्षकः प्रथमा वभक्त्यन्तं कम प शब्दं वद त । प्रथमगणस्य कश्चन
छात्रः तस्य एव शब्दस्य द्वतीया वभक्तेः एकवचनरूपं वदे त् । ततश्च द्वतीयगणस्य कश्चन छात्रः तस्यैव पदस्य
बहुवचनरूपं वदे त् । यस्य गणस्य छात्राः शु ं पदं वद न्त तस्मै गणाय शक्षकः अङ् कान् यच्छे त् । एवमेव
द्वतीया वभक्तेः वाक्य नमाणस्य क्र डा अ प भ वतुम् अह त ।
यह कक्षा म खेलने का खेल है। नयम पुस्तक ने ही दे दए ह — कक्षा दो दल म बँटे; शक्षक कोई शब्द प्रथमा वभ क्त म बोल;
पहला दल उसका द्वतीया एकवचन बताए; दूसरा दल उसी शब्द का द्वतीया बहुवचन; शुद्ध उत्तर पर उस दल को अंक मल।
खेल का नमूना (एक चक्र) —
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शक्षकः वद त (प्रथमा) प्रथमगणः ( द्वतीया एकवचनम्) द्वतीयगणः ( द्वतीया बहुवचनम्)
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बालकः
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बालकम् बालकान्
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भिगनी भिगनीम् भिगनीः
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दूसरा चरण — वाक्य-क्र डा: पुस्तक कहती है क इसी प्रकार वाक्य बनाने का खेल भी हो सकता है। तब शक्षक
m बोल (जैसे ‘फलम्’) और दल उससे तीया वाला पूरा वाक्य बनाए — ‘बालकः फलं खाद त।’ दूसरा दल
एकeशब्द
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agl उसी को बहुवचन म — ‘बालकाः फला न खाद न्त।’ इससे रूप और वाक्य — दोन का अभ्यास एक साथ हो जाता
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है।
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Tip — अंक दे ने का सरल तरीका: शुद्ध रूप पर 2 अंक, बना सहायता के तुरन्त उत्तर दे ने पर 1 अ त रक्त
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अंक, और गलत उत्तर पर दूसरे दल को सुधारने का अवसर दे कर 1 अंक। दस चक्र म खेल पूरा कर ली जए —
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कक्षा को तीया वभ क्त के चार साँचे अपने-आप याद हो जाएँगे।
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m प रयोजनाकायम् १ — पाठे द शतानां चत्राणाम् अनुसारं द्वतीया वभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्या न रचयन्तु ।
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प्र.2
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माता-पुत्र संवाद, पृष्ठ 142–143 के भक्षुक और ध नक के चत्र, तथा पृष्ठ gla
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यह पाठ के अपने चत्र पर आधा रत है — पृष्ठ 141 c
m . तीया वभ क्त म होना चा हए।
146 व 148 के अभ्यास- चत्र। हर वाक्य म एकeकम-पद
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नमूना उत्तर (दश वाक्या न) — ag
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क्रमः वाक्यम् हन्द
१ बालकः शय्यायां वश्रामं करो त । बालक िबस्तर पर आराम कर रहा है।
२ माता पुत्रं बोधय त । माँ पुत्र को समझाती है।
३ बालकः प रश्रमं न करो त । बालक पिर श्रम नही ं करता।
४ भक्षुकः माग भक्षां याचते । िभखारी रास्ते में भीख माँग ता है।
५ जनाः भक्षुकाय धनं यच्छ न्त । लोग िभखारी को पैसे दे ते है।
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६ ध नकः भक्षुकं पश्य त । धनी व्यिक्त िभखारी को दे खता है।
७ ध नकः पादौ हस्तौ च याचते । धनी दोनों पैर और दोनों हाथ माँग ता है।
८ भक्षुकः शरीराङ्गा न न यच्छ त । िभखारी अपने अङ् ग नही ं दे ता।
९ श्र मकः शर स इ काः वह त । मज़दू र िसर पर ईंटें ढोता है।
१० कृषकः क्षेत्रे काय करो त । िकसान खेत में काम करता है।
Tip: वाक्य बनाते समय हर बार यह जाँच ली जए — कता का वचन और क्रया का वचन एक हो (‘जनाः
यच्छ न्त’, ‘ध नकः पश्य त’), और कम द्वतीया वभ क्त म हो। पाठ के अपने शब्द ( भक्षा, धन, पाद, हस्त,
शरीराङ्ग, प रश्रम) का प्रयोग क जए — इससे प रयोजना पाठ से जुड़ी दखेगी।
प्र.3 प रयोजनाकायम् २ — द्वतीया वभक्तेः आधारेण स्व दनचयायाः वषये दश वाक्या न लखन्तु ।
यह अपने बारे म लखने का काम है, इस लए नीचे दया उत्तर एक नमूना है — इसे अपनी दनचया के अनुसार बद लए। ढाँचा एक
ही र खए: कता + कम ( तीया) + क्रया, और सारे वाक्य ‘अहम्’ से आरम्भ क जए।
नमूना उत्तर (मम दनचया) —
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क्रमः संस्कृतम् हन्द
१ अहं प्रातःकाले शय्यां त्यजा म । मैं सुबह िबस्तर छोड़ता हू।
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२ अहं दन्तान् धावया म । मैं दाँत साफ़ करता हू।
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३ अहं व्यायामं करो म । मैं व्यायाम करता हू।
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४ अहं जलं पबा म । मैं पानी पीता हू।
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५ अहं मातरं पतरं च नमा म । मैं माता-िपता को पणाम करता हू।
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६ अहं वद्यालयं गच्छा म । मैं िवद्य ालय जाता हू।
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७ अहं कक्षायां पाठान् पठा म । मैं क क्षा में पाठ पढ़ ता हू।
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८ अहं सायं कन्दुकं क्र डा म । मैं शाम को गेंद खेल ता हू।
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९ अहं रात्रौ गृहकाय करो म । मैं रात में ग ृहकाय करता हू।
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१० अहं शयनात् पूव ोकं स्मरा म । मैं सोने से पहले श्लोक याद करता हू।
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अच्छे उत्तर म क्या-क्या होना चा हए: (1) दस वाक्य समय के क्रम म ह — प्रातः से रा त्र तक; (2) हर वाक्य म
एक स्पष्ट द्वतीया-पद हो; (3) कम-से-कम तीन अलग-अलग वग के शब्द आएँ — पुं लङ्ग (कन्दुकम्, पाठान्),
स्त्री लङ्ग (शय्याम्, मातरम्) और नपुंसक लङ्ग (जलम्, गृहकायम्); (4) क्रया सदा उत्तमपुरुष एकवचन म रहे —
पठा म, गच्छा म, करो म।
Check it yourself: य द छात्रा लख रही हो तो कता ‘अहम्’ ही रहेगा (यह सवनाम लङ्ग- नरपेक्ष है) — केवल
वशेषण बदलेगा, जैसे ‘अहं छात्रा अ स्म’। ध्यान र खए क ‘क्र ड् ’ धातु आत्मनेपद भी है, इस लए ‘कन्दुकेन
क्र डा म’ (तृतीया) भी शुद्ध है; पर इस प रयोजना म तीया चा हए, इस लए ‘कन्दुकं क्र डा म’ ल खए।
प्र.4 प रयोजनाकायम् ३ — क भवन्तः एवरेस्ट-पवतारो हणीम् अरु णमा- सन्हां जान न्त ? तस्याः वषये अन्वेषणं
कृत्वा स्वभाषया दशवाक्यैः नबन्धं लखन्तु ।
यह खोजकर लखने का काम है। अरु णमा सन्हा का जीवन इसी पाठ का जी वत उदाहरण है — जन्ह ने एक पैर खोकर भी स्वयं
को ‘दुबल’ नह माना, ठ क वैसे ही जैसे ध नक ने भक्षुक से कहा था — ‘ कमथ त्वम् आत्मानं दुबलं मन्यसे?’
नबन्ध म ये दस बात आनी चा हए: (1) जन्म और स्थान, (2) खेल-जीवन, (3) 2011 क दुघटना, (4) पैर का
जाना, (5) अस्पताल म लया गया संकल्प, (6) बछे न्द्र पाल से प्र शक्षण, (7) एवरेस्ट-आरोहण क त थ, (8) अन्य
शखर, (9) सम्मान, (10) उनसे मलने वाली सीख। दस वाक्य इन्ह दस बन्दुओं पर बनाइए।
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नमूना उत्तर ( हन्द म) —
क्रमः वाक्यम्
१ अरुिणमा िस न्हा का जन्म उ त्त र पदे श के अम् बेडकर नगर में हआ
ु था।
२ वे रा ीय स्तर की वॉलीबॉल तथा फु टबॉल िखलाड़ी रह चुक ी है।
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३ सन् 2011 में एक रे ल यात्र ा के दौरान लुटेर ों ने उ न्हे ं चलती गाड़ी से नीचे फें क िदया।
४ इस दुघ टना में उ न्हे ं अपना एक पैर गँवाना पड़ा और उसकी जगह कृ ित्र म पैर लगा।
५ अस्पताल में ही उ न्होंने ठान िलया िक वे संस ार की सबसे ऊँची चोटी पर चढ़ े ंग ी।
६ उ न्होंने पिस द्ध पवतारोही बछे न्द ी पाल से पिशक्षण िलया।
७ 21 मई 2013 को उ न्होंने एवरे स्ट पर ितरंग ा फहराया और ऐसा करने वाली िवश्व की पहली िद व्याङ् ग मिहला बनी ं।
८ इसके बाद उ न्होंने िकिलमंजारो, ए ल्बुस , कोिसअस्को, अकोंक ाग आ
ु तथा िवन्सन जैस ी चोिटयाँ भी जीती ं।
९ भारत सरकार ने उ न्हे ं पद्मश्री तथा तेनिजंग नोग रा ीय साहिसक पुर स्कार से स म् मािनत िकया।
१० उनका जीवन िसखाता है िक शरीर की कमी नही,ं आल स्य और हार मान ले ना ही असली दुबलता है।
Tip — य द संस्कृत म लखना चाह: प्रश्न म ‘स्वभाषया’ कहा गया है, अथात् अपनी भाषा म लखना पयाप्त है।
फर भी दो-तीन वाक्य संस्कृत म जोड़ दे ने से प रयोजना और अच्छ लगेगी —
‘अरु णमा- सन्हा एका साह सका म हला अ स्त। सा एकेन कृ त्रमेण पादे न एवरेस्ट- शखरम् आरूढवती। सा
अस्माकं प्रेरणा अ स्त।’
ध्यान द जए — ‘ शखरम् आरूढवती’ म तीया वभ क्त है, अथात् यह प रयोजना भी पाठ के व्याकरण से जुड़ी
हुई है।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का आरम्भ चत्रसंवाद से (पृष्ठ 141)। अवकाश का दन है। पुत्र कहता है — ‘अद्य अहं सम्पूण दने वश्रामं क रष्या म।’
माँ उत्तर दे ती है — ‘अवकाशः वद्यालयस्य अ स्त न तु स्वाध्यायस्य। बहु आलस्यं करो ष। उ त्तष्ठ, प रश्रमं कुरु।’ और
समझाती है क प रश्रमः एव मनुष्यस्य मत्रम् अ स्त, आलस्यं तु शत्रुः इव अ स्त।
कथा — भक्षुकः तथा ध नकः (पृष्ठ 142–143)। एक गाँव म ह ा-क ा जवान भक्षुक भीख माँगता था। एक ध नक उससे
कहता है — हज़ार रुपये लो, बदले म अपने पैर दे दो; फर पाँच हज़ार लो, अपने हाथ दे दो। भक्षुक हर बार मना कर दे ता है।
तब ध नक कहता है — ‘तव समीपे एव सह ा धकमूल्यका न वस्तू न स न्त। फर स्वयं को दुबल क्य मानते हो?’ उसी
दन से भक्षुक ने भीख छोड़कर प रश्रम से जी वका आरम्भ कर द ।
पाठ का ोक (पृष्ठ 143–144)। ‘आलस्यं ह मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीद त॥’
— आलस्य मनुष्य के शरीर म ही बैठा हुआ सबसे बड़ा शत्रु है, और उद्यम (प रश्रम) जैसा कोई बन्धु नह , जसे करके
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मनुष्य कभी दुखी नह होता। पुस्तक ने इसका पदच्छे दः, अन्वयः और भावाथः — तीन दए ह।
व्याकरण — पूरा पाठ ‘ द्वतीया वभ क्त’ पर है। अभ्यास के सात म से पाँच प्रश्न सीधे तीया के ह — एकवचन से
वचन (प्र.३), चत्र दे खकर वाक्य (प्र.४), कोष्ठक के शब्द का एकवचन-रूप (प्र.५), एकवचन से बहुवचन (प्र.६) और चत्र
दे खकर दस वाक्य (प्र.७)। नयम एक ही है — कम म द्वतीया वभ क्त (कम ण तीया)।
योग्यता वस्तरः (पृष्ठ 149–150)। पाँच वग के शब्दरूप दए ह — अकारान्त पुं लङ्ग (ग्राम, भक्षुक, बालक), आकारान्त
स्त्री लङ्ग ( भक्षा, माला, बा लका, तत्), ईकारान्त स्त्री लङ्ग (नद , लेखनी, भ गनी), अकारान्त नपुंसक लङ्ग (फल, जल, गृह)
तथा सवनाम (अस्मद्, युष्मद्, तद्, एतद्) — सबके तीन वचन। साथ म 28 पद का अभ्यास और दो सुभा षत ह।
कायकलापः तथा प रयोजनाकायम् (पृष्ठ 151)। भाषाक्र डा म कक्षा दो दल म बँटती है — शक्षक प्रथमा-रूप बोलते ह,
एक दल तीया का एकवचन और दूसरा बहुवचन बताता है। प रयोजना म दस वाक्य चत्र से, दस वाक्य अपनी दनचया पर,
तथा एवरेस्ट-आरो हणी अरु णमा सन्हा पर दस वाक्य का नबन्ध लखना है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
दृढकायः दृ ढशरीरः दृढ शरीर वाला A person with strong body
भक्षाटनम् िभक्षाथं भमणम् भीख के लए घूमना Roaming for begging
प्रभूतम् पय प्तम् / अिधकम् ढे र सारा A lot of
अतीव अत्यिधकम् बहुत सारा Excessive
मह्यम् मम कृ ते मुझे For me
शरीराङ्गा न शरीरस्य अङ् गािन शरीर के अङ्ग Body parts
नराकृतवान् न स्वीकृ तवान् अस्वीकार कया Refused
दुबलम् बलहीनम् नबल Weak
त्यक्त्वा त्यागं कृ त्वा त्याग करके Having left
नावसीद त दुःिखतः न भवित दुःखी नह होता है Doesn’t feel sad
रपुः शत्र ःु शत्रु Enemy
उद्यमः पिरश्रमः प रश्रम Effort / hard work
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