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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 16: वृ ाः सत्पुरुषाः इव
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
160 – 168 12 22 हन्द
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 16: वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
NCERT कक्षा 6 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के षोडशः पाठः — वृक्षाः सत्पुरुषाः इव के सम्पूण हल। यह पुस्तक का अ न्तम पाठ है और पूरा
पाठ सुभा षत-संग्रहः है — व ालय म लगी पयावरण-संरक्षण क प्रदशनी से बात शुरू होती है और फर छह सुभा षत आते ह जो एक ही बात कहते
ह — वृक्ष सज्जन के समान ह, क्य क वे जो कुछ भी दे ते ह दूसर के लए ही दे ते ह। हर सुभा षत के साथ पुस्तक स्वयं पदच्छे दः, अन्वयः और
भावाथः दे ती है। व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ वभ क्त- नदशः, वचन-बहुवचन-रूपा ण तथा लट् लकारे प्रथमपुरुषस्य त्री ण वचना न का अभ्यास कराता
है। पृष्ठ 160 से 168 तक का हर भाग यहाँ क्रम से हल है — पूरे संलाप का हन्द अनुवाद, छह सुभा षत का अन्वय-अथ-भाव, वयं शब्दाथान्
जानीमः क पन्द्रह शब्द वाली ता लका, वयम् अभ्यासं कुमः के प्रश्न १–८ (हर उपभाग स हत), योग्यता वस्तरः क प्रहे लका, प रयोजनाकायम्
तथा पुस्तक का अ न्तम प र शष्टम् — आगच्छन्तु! संस्कृतेन संभाषणं कुमः।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 6) 160 – 168
खं ड प्रश्न
12 22
माध्यम
हन्द
षोडशः पाठः — वृक्षाः सत्पुरुषाः इव — पृष्ठ 160
पाठस्य आरम्भः — पयावरणसंरक्षणप्रदशन्यां छात्राणां शक्षकेण सह संलापः
पाठः
प्र.1 पयावरणसंरक्षणस्य वषये एका प्रदशनी वद्यालये आयो जता अ स्त । छात्राः तां प्रदशन पश्य न्त । शक्षकेण सह
संलापं च कुव न्त । … (मु दता सुभा षतं ावय त, अन्ये छात्राः अ प गाय न्त) — अस्य संलापस्य हन्द -अनुवादं
कुवन्तु ।
पाठ का पहला पृष्ठ एक चत्र-संलाप है। व ालय के मैदान म पयावरण-संरक्षण क प्रदशनी लगी है, ब े चत्रफलक दे ख रहे ह
और शक्षक से बात कर रहे ह। नीचे पूरा अनुवाद पं क्त-दर-पं क्त दया है।
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संस्कृतम् (मूलः पाठः) हन्द अनुवादः
पय वरणसंर क्षणस्य िवषये एका पदशनी िवद्यालये आयोिजता अिस्त । पय वरण-संर क्षण के िवषय में िवद्य ालय में एक पदशनी आयोिजत की
गई है।
छात्राः तां पदशनी ं पश्यिन्त । िशक्षके ण सह संल ापं च कु विन्त । छात्र उस पदशनी को दे खते है ं और िशक्षक के साथ बातचीत करते
है।
ं
छात्रा — ीमन् ! अहं जीवशास्त्रस्य पुस्तके पठािम यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं छात्र ा — ीमान् जी! मैं जीविव ान की पुस्तक में पढ़ ती हू ँ िक पेड़
यच्छिन्त । शुद्ध वायु दे ते है।
ं
अन्या छात्रा — ीमन् ! मम माता अिप वदित यत् वृक्षाः पूज्याः भविन्त । दू स री छात्र ा — ीमान् जी! मेर ी माँ भी कहती है ं िक पेड़ पूजनीय
होते है।
ं
िशक्षकः — िपयाः छात्राः ! सत्यम्, वृक्षाः शुद्धं वायुं, फलािन, पुष्पािण च सवम् िशक्षक — िपय छात्र ो! सच है, पेड़ शुद्ध वायु, फल , फू ल — सब
अिप यच्छिन्त । अतः ते पूज्याः । कु छ दे ते है।
ं इसीिलए वे पूजनीय है।
ं
मुिदता — ीमन् ! अहम् एकं सुभािषतं पिठतवती यत् ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः’ मुिदता — ीमान् जी! मैंने एक सुभािषत पढ़ ा है िक ‘पेड़ स ज्जन
सिन्त इित । पुरुष है’ं ।
िशक्षकः — िकम् एवम् ? अस्तु, तिह तत् सुभािषतं ावयतु । िशक्षक — क्या ऐसा है? ठीक है, तो वह सुभािषत सुनाइए।
मुिदता — अस्तु ीमन् ! मुिदता — ठीक है, ीमान् जी!
(मुिदता सुभािषतं ावयित, अन्ये छात्राः अिप गायिन्त ।) (मुिदता सुभािषत सुनाती है, दू स रे छात्र भी गाते है।
ं )
यह संलाप पाठ क भू मका है: पूरा पाठ कोई कहानी नह , सुभा षत का संग्रह है। संलाप का काम केवल इतना
है क वह प्रश्न खड़ा कर दे — ‘वृक्ष सज्जन जैसे कैसे ह?’ — और आगे के छह सुभा षत उसी का उत्तर दे ते ह।
ध्यान द जए — संलाप म आए तीन उपयोगी प्रयोग:
• यत् … इ त — ‘ क …’ के अथ म (पठा म यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छ न्त)।
• ीमन् — सम्बोधन का रूप, आदरपूवक ‘ ीमान् जी!’
• ावयतु — लोट् लकार, प्रेरणाथक ‘सुनवाइए / सुनाइए’। इसी प्रकार अस्तु = ‘ठ क है / ऐसा ही हो’।
सुभा षता न — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः — पृष्ठ 161
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प्रथमं द्वतीयं च सुभा षतम् — ‘छायामन्यस्य कुव न्त…’ तथा ‘दशकूपसमा वापी…’
सु भा षतम्
प्र.1 छायामन्यस्य कुव न्त तष्ठ न्त स्वयमातपे । फलान्य प पराथाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ॥ — अस्य ोकस्य पदच्छे दम्
अन्वयं भावाथ च लखन्तु ।
पदच्छे दः — छायाम् + अन्यस्य + कुव न्त + तष्ठ न्त + स्वयम् + आतपे + फला न + अ प + पराथाय + वृक्षाः + सत्पुरुषाः + इव ।
अन्वयः — (वृक्षाः) स्वयम् आतपे ितष्ठिन्त, (िकन्त)ु अन्यस्य छायां कुविन्त, फलािन अिप पराथ य (यच्छिन्त),
(अतः) वृक्षाः सत्पुरु षाः इव (सिन्त) ।
हन्द अथ — पेड़ स्वयं धूप म खड़े रहते ह, पर छाया दूसरे के लए करते ह; फल भी दूसर के उपकार के लए ही दे ते ह। इस लए
पेड़ सज्जन पुरुष के समान ह।
पदम् अथः
आतपे सूय की धूप में (स प्तमी, एकवचन)
पराथ य दू स रों के पयोजन के िलए (चतुथ , एकवचन)
इव के समान — यह उपमावाचक अव्यय है
भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — वृक्षाः स्वयं सूयस्य आतपे तष्ठ न्त कन्तु अन्येषां प्रा णनां कृते छायां कुव न्त,
फला न अ प स्वयं न खाद न्त अ प तु अन्येभ्यः एव यच्छ न्त । अतः ते सत्पुरुषाः इव स न्त । यतः ये सज्जनाः भव न्त,
ते स्वयं कष्टा न स हत्वा अ प अन्येषां हतं कुव न्त ।
भाव — सज्जन क पहचान सुख भोगने से नह , स्वयं कष्ट सहकर दूसर को सुख दे ने से होती है। वृक्ष इसका सबसे
सीधा उदाहरण है — वह सारा दन धूप म जलता है ता क नीचे बैठने वाले को छाया मले।
अलङ् कारः — ‘वृक्षाः सत्पुरुषा इव’ म उपमा अलङ् कार है — उपमेय ‘वृक्षाः’, उपमान ‘सत्पुरुषाः’, वाचक शब्द
‘इव’, और साधारण धम ‘परोपकार’। यही पं क्त पाठ का शीषक भी है।
प्र.2 दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः । दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः ॥ — अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं
भावाथ च लखन्तु ।
पदच्छे दः — दशकूपसमा + वापी + दशवापीसमः + ह्रदः + दशह्रदसमः + पुत्रः + दशपुत्रसमः + द्रुमः ।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
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comदमः
अन्वयः — दशकूपसमा वापी (अिस्त), दशवापीसमः ह्रदः (अिस्त), दशह्रदसमः पुत्रः (अिस्त), दशपुत्र.समः
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(अिस्त) । o
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aglअथ — एक बावड़ी दस कुओं के बराबर है, एक तालाब दस बाव ड़य के बराबर है, एक सन्तान दस तालाब के बराबर है,
हन्द
और एक वृक्ष दस सन्तान के बराबर है।
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क्रमः यत् कम प कस्य समम् हन्द
१ वापी (बावड़ी) agदशl कूपाः दस कुएँ = एक बावड़ी
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२ ह्रदः (तालाब) दश वाप्यः दस बाव ड़याँ = एक तालाब
mपुत्रः (सन्तान) as e
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दस तालाब = एक सन्तान
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g l a४ द मः (वृक्ष) दश पुत्र ाः दस सन्तान = एक वृक्ष
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om ः समानः एकः वृक्षः मूल्यवान् भव त । अथात् एकः a s
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भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — दशकूपैः समाना एका वापी भव त । एवम् एव दशवापीसमानः एकः ह्रदः भव त ।
दशह्रदै ः समानः एकः/एका पुत्रः/पुत्री भव त । तथैव.cदशसन्तानै
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वृक्षः सवा धकः उपकारकः भव त । अतः सव
g l क्षारोपणं कुवन्तु ।
भाव — ोक एक चढ़ती हुई सीढ़ aबनाता है और सबसे ऊपर वृक्ष को रखता है। सन्दे श सीधा है — वृक्ष लगाना
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सबसे बड़ा पुण्य-काय है।
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ाकरण-संकेत: ‘दशवापीसम◌ो ह्रदः’ और ‘दशपुत्रसम◌ो द्रुमः’ म वसग-स न्ध है — दशवापीसम◌ः + ह्रदः =
l a se दशवापीसमो ह्रदः ( वसग के पहले अ और आगे घोष वण हो तो वसग ‘उ’ बनकर ‘ओ’ हो जाता है)।
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co—m पृष्ठ 162 g l a
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eतथा
सुभा षता न — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः
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तृतीयं चतुथ च सुभा षतम् — ‘अहो एषां वरं जन्म…’ ‘परोपकाराय फल न्त वृक्षाः…’
सु भा षतम्
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m a s em॥ — अस्य
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अहो एषां वरं जन्म सवप्राण्युपजीवनम् । सुजनस्येव येषां वै वमुखा या न्त ना थनः ोकस्य पदच्छे दम्
co अन्वयं भावाथ च लखन्तु ।
प्र.1
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पदच्छे दः — अहो ! + एषाम् + वरम् + जन्म + सवप्रा ण-उपजीवनम् + सुजनस्य + इव + येषाम् + वै + वमुखाः + या न्त + न +
अ थनः ।
e m . co agl
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अन्वयः — अहो ! एषां सवपाण्युपजीवनं जन्म वरम् (अिस्त) । सुजनस्य इव येषाम् अिथनः िवमुखाः न यािन्त ।
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हन्द अथ — अहा! इन वृक्ष का जन्म ेष्ठ है, क्य क इनसे सभी प्रा णय का जीवन चलता है। जैसे सज्जन के पास से कोई
याचक खाली हाथ नह लौटता, वैसे ही इन वृक्ष के पास से भी माँगने वाले नराश होकर नह लौटते।
पदम् अथः
वरम् ेष्ठम् — ेष्ठ, उ त्त म
सवपाण्युपजीवनम् सवषां पािणनाम् उपजीवनम् — िजससे सब पाणी जीवन चलाते है ं
अिथनः पाप्तमु ् इच्छु क ाः — याचक , माँग ने वाले (पथमा, बहुवचन)
िवमुखाः मुँह मोड़े हुए , िनराश
भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — ीकृष्णः यु ध ष्ठरं वद त — हे यु ध ष्ठर ! अहो ! एतेषां वृक्षाणां जन्म ेष्ठम्
अ स्त, यतः एतेषां जन्म सवषां जीवानाम् उपकाराय भव त । यथा सज्जनेभ्यः जनानां नराशा न भव त तथैव वृक्षाणां
समीपे आगत्य अ थनां जनानां नराशा न भव त । तेषाम् आशानुरूपं वृक्षाः तेभ्यः फला न पुष्पा ण छायां च यच्छ न्त ।
भाव — जीवन क साथकता कतना पाया म नह , कतन के काम आए म है। यह ोक महाभारत म ीकृष्ण
यु ध ष्ठर से कहते ह।
Tip — पं क्त म छपी स : ‘न + अ थनः’ = ना थनः (द घ-स न्ध: अ + अ = आ)। ‘सुजनस्य + इव’ =
सुजनस्येव (गुण-स न्ध: अ + इ = ए)। परीक्षा म स न्ध- वच्छे द पूछा जाता है, इस लए इन्ह याद र खए।
प्र.2 परोपकाराय फल न्त वृक्षाः परोपकाराय वह न्त नद्यः । परोपकाराय दुह न्त गावः परोपकाराथ मदं शरीरम् ॥ —
अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखन्तु ।
पदच्छे दः — परोपकाराय + फल न्त + वृक्षाः + परोपकाराय + वह न्त + न ः + परोपकाराय + दुह न्त + गावः + परोपकाराथम् +
इदम् + शरीरम् ।
अन्वयः — वृक्षाः परोपकाराय फलिन्त, नद्यः परोपकाराय वहिन्त, गावः परोपकाराय दुहिन्त, परोपकाराथम् (एव)
इदं शरीरम् (अिस्त) ।
हन्द अथ — पेड़ परोपकार के लए फलते ह, न दयाँ परोपकार के लए बहती ह, गाय परोपकार के लए दूध दे ती ह — और यह
शरीर भी परोपकार के लए ही है।
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कः / का क करो त कमथम् हन्द
वृक्षाः फल न्त परोपकाराय पेड़ फलते ह
नद्यः वह न्त परोपकाराय न दयाँ बहती ह
गावः दुह न्त परोपकाराय गाय दूध दे ती ह
इदं शरीरम् (अ स्त) परोपकाराथम् यह शरीर भी परोपकार के लए
भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — वृक्षस्य फला न अन्ये खाद न्त, न तु वृक्षः स्वयं खाद त । नद नां जलस्य उपयोगम्
अ प अन्ये एव प्रा णनः कुव न्त । गावः अ प अन्येषां कृते एव दुग्धं यच्छ न्त । एवमेव अस्माकं जीवनम् अ प अन्येषाम्
उपकाराय भवतु ।
भाव — ोक प्रकृ त के तीन उदाहरण दे कर चौथी पं क्त म मनुष्य पर लौटता है — जब पेड़, नद और गाय दूसर
के लए जीते ह, तो मनुष्य का शरीर भी उसी के लए है।
अलङ् कारः — ‘परोपकाराय’ शब्द चार बार दोहराया गया है — यह अनुप्रास तथा पुनरु क्त से बना बल है,
जससे पूरी बात एक ही शब्द पर टक जाती है और सरलता से याद हो जाती है।
सुभा षता न — पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः — पृष्ठ 163
पञ्चमं षष्ठं च सुभा षतम् — ‘पुष्प-पत्र-फलच्छाया…’ तथा ‘ पब न्त नद्यः स्वयमेव नाम्भः…’
सु भा षतम्
प्र.1 पुष्प-पत्र-फलच्छाया-मूल-वल्कल-दारु भः । धन्या महीरुहा येषां वमुखा या न्त ना थनः ॥ — अस्य ोकस्य
पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखन्तु ।
पदच्छे दः — पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारु भः + धन्याः + महीरुहाः + येषाम् + वमुखाः + या न्त + न + अ थनः ।
अन्वयः — येषां पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुिभः अिथनः िवमुखाः न यािन्त, (ते ) महीरुहाः धन्याः (सिन्त)
।
हन्द अथ — वे पेड़ धन्य ह, जनके फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल और लकड़ी से माँगने वाले कभी नराश होकर नह
लौटते।
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वृक्षस्य दानम् संस्कृत-पदम् हन्द उपयोगः
१ पुष्पम् फू ल पूजा, सुगन्ध, औष ध
२ पत्रम् पत्त ा पत्तल, चारा, खाद
३ फलम् फल भोजन
४ छाया छाया प थक और पशुओं को व ाम
५ मूल म् जड़ औष ध, भू म को बाँधना
६ वल्कलम् छाल वस्त्र, औष ध
७ दारु लकड़ी ईंधन, गृह- नमाण
भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — प्रा णनः वृक्षात् पुष्पा ण, पत्रा ण, फला न, छायां, मूला न, वल्कला न काष्ठा न च
प्रा ुव न्त । अथात् वृक्षाणां पाश्व यत् कम प अ स्त तत् सवम् अ प प्रा णनां कृते एव अ स्त । वृक्षाः कदा प याचकान्
नराशान् न कुव न्त । अतः वृक्षाः धन्याः स न्त ।
भाव — वृक्ष का कोई भी अङ्ग अपने लए नह है — सात वस्तुएँ गनाकर क व यही सद्ध करता है। जो पूरा का पूरा
दूसर के काम आ जाए, वही ‘धन्य’ है।
ाकरण-संकेत: ‘पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारु भः’ एक बड़ा द्वन्द्व समास है जो तृतीया वभ क्त,
बहुवचन म है — ‘इनके ारा’। ोक म ‘फल+छाया’ म छत्व-स न्ध से ‘फलच्छाया’ बना है।
प्र.2 पब न्त नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खाद न्त फला न वृक्षाः । नाद न्त सस्यं खलु वा रवाहाः परोपकाराय सतां
वभूतयः ॥ — अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखन्तु ।
पदच्छे दः — पब न्त + न ः + स्वयम् + एव + न + अम्भः, स्वयम् + न + खाद न्त + फला न + वृक्षाः । न + अद न्त + सस्यम् +
खलु + वा रवाहाः, परोपकाराय + सताम् + वभूतयः ।
अन्वयः — नद्यः अम्भः स्वयम् एव न िपबिन्त । वृक्षाः अिप फलािन स्वयं न खादिन्त । वािरवाहाः (अिप) सस्यं न
अदिन्त खलु । (यतः) सतां िवभूत यः परोपकाराय (भविन्त) ।
हन्द अथ — न दयाँ अपना पानी स्वयं नह पीत , पेड़ अपने फल स्वयं नह खाते, बादल भी (वषा से उगा) अनाज स्वयं नह खाते
— क्य क सज्जन क सम्प त्तयाँ परोपकार के लए ही होती ह।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव AglaSem · NCERT Solutions
कः क न भुङ्क्ते हन्द
नद्यः अम् भः (जलम्) न िपबिन्त न दयाँ अपना जल नह पीत
वृक्षाः फलािन न खादिन्त पेड़ अपने फल नह खाते
वािरवाहाः (मेघ ाः) स स्यं न अदिन्त बादल अनाज नह खाते
भावाथः (पुस्तक के शब्द म) — न ः स्वीयं जलं स्वयं न पब न्त अ पतु अन्येषाम् उपयोगाय यच्छ न्त । एवम् एव
वृक्षाः अ प फला न स्वयं न खाद न्त । मेघाः अ प जलं वष न्त, कन्तु वृ ा उत्पन्नं सस्यं स्वयं न खाद न्त । अनेन
प्रकारेण सज्जनानां सम्पदः अ प परोपकाराय भव न्त ।
भाव — तीन उदाहरण दे कर अ न्तम पं क्त म सद्धान्त रखा गया है — ‘परोपकाराय सतां वभूतयः’। यह पं क्त
स्वयं म एक सू क्त है और परीक्षा म बहुत पूछ जाती है।
Tip — स - वच्छे द: ‘न + अम्भः’ = नाम्भः, ‘न + अद न्त’ = नाद न्त (दोन द घ-स न्ध); ‘स्वयम् + एव’ =
स्वयमेव। खलु यहाँ ‘ नश्चय ही’ के अथ म अव्यय है।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 164
पाठस्य पञ्चदश शब्दाः — संस्कृत-अथः, हन्द , English तथा ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ इ त स्तम्भः
शब्दाथाः
प्र.1 शब्दः — अथः — हन्द — English — मातृभाषया अथ लखन्तु : आतपे, पराथाय, सत्पुरुषाः, वापी, ह्रदः,
द्रुमः, वरम्, अ थनः, वह न्त, वल्कलम्, दारु भः, महीरुहाः, अम्भः, वा रवाहाः, वभूतयः ।
पुस्तक क ता लका के चार स्तम्भ छपे हुए ह; पाँचवाँ स्तम्भ ‘मातृभाषया अथ लखन्तु’ छात्र को स्वयं भरना है। नीचे पूरी ता लका
द है — पाँचव स्तम्भ म हन्द -भाषी छात्र के लए एक नमूना भरा गया है (आप अपनी मातृभाषा — मराठ , बाङ् ला, त मऴ् ,
गुजराती आ द — म ल खए)।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथः (नमूना)
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आतपे
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सूयतापे धूप में In the sunlight
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घाम म / धूप म
a s emअन्येषाम् उपकाराय
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For the sake of others और के भले के लए
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पराथ य दू स रों के उपकार के िलए
सत्पुरुषाः सज्जनाः स ज्जन लोग Noble men भले लोग
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वापी द घका बावड़ी Stepwell सीढ़ दार कुआँ
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ह्रदः सरोवरः
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तालाब / झील Pond / Lake पोखर
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द मः वृक्षः पेड़ Tree पेड़
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वरम् ेष्ठम् ेष्ठ Best सबसे अच्छा
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अिथनः पाप्त करने के इच्छु क Wishing to receive माँगने वाले
aglवहिन्त प्रवह न्त बहती है ं Flows बहती ह
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वल्कलम् वृक्षस्य त्वक् पेड़ की छाल Bark of tree छाल
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दारुिभः काष्ठैः लकिड़यों से लकड़ी से
महीरुहाः वृक्षाः पेड़ Trees पेड़ (धरती से उगने वाले)
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अम्भः जलम् पानी Water पानी
comमेघाः l a
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वािरवाहाः बादल बादल
agl िवभूतयः समृद्धयः सम ृिद्धयाँ Prosperity सम्प त्तयाँ
m
शब्द म छपा अथ पक ड़ए — ‘महीरुह’ = c o m(पृथ्वी) + रुह (उगने वाला) — ‘धरती से उगने वाला’ यानी पेड़। glase
m.— ‘पानी ढोने वाला’ यानी बादल। संस्कृत के अ धकांश नाम इसी a
मही
‘वा रवाह’ = वा र (जल) + वाह (ढोने s e
glaकर ली जए, अथ स्वयं खुल जाएगा।
वाला)
प्रकार यौ गक होते ह — टु कड़े a
अलग
co m
Check it yourself: पाठ के छह सुभा षत म से ये शब्द ढूँ ढ़कर उन पर गोला लगाइए — दे खए, हर शब्द
m .
o m l a se → दूसरा, वरम्/अ थनः →
.cतीसरा, वह न्त → चौथा, वल्कलम्/दारु भः/महीरुहाः → पाँचवाँ, अम्भः/वाagरवाहाः/ वभूतयः → छठा)।
कसी न कसी ोक-पं क्त म मल जाएगा (आतपे → पहला ोक, वापी/ह्रदः/द्रुमः
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वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 164 – 165com
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प्रश्नौ १–२ : सुभा षतानां सस्वरं पठनम्, तथा एकपदे न उत्तर-लेखनम्
अभ्यासः
प्र.1 पाठे ल खता न सुभा षता न सस्वरं पठन्तु, अवगच्छन्तु, लखन्तु स्मरन्तु च ।
यह करणीय (मौ खक-लेखन) काय है — इसका उत्तर कक्षा म करके दखाना है। चार क्रयाएँ चार सोपान ह: पठन्तु (लय के साथ
प ढ़ए) → अवगच्छन्तु (अथ सम झए) → लखन्तु ( ल खए) → स्मरन्तु (कण्ठस्थ क जए)।
सोपानम् क्या करना है कैसे कर
सस्वरं लय और स्वर के साथ अनुष्टुप् छन्द के ोक को ८ + ८ अक्षर पर रुककर प ढ़ए — ‘छायामन्यस्य कुव न्त /
पठन्तु पाठ तष्ठ न्त स्वयमातपे’।
अवगच्छन्तु अथ समझना पहले पदच्छे द दे खए, फर अन्वय, फर भावाथ — पुस्तक ने तीन दे रखे ह।
िलखन्तु शुद्ध ले खन वसग (◌ः), अनुस्वार (◌ं) और हलन्त (◌्) पर वशेष ध्यान — ‘वृक्षा◌ः सत्पुरुषा◌ः इव’।
स्मरन्तु क ण् ठस्थीकरण प्र त दन एक ोक — छह दन म छह याद हो जाएँगे।
नमूना उत्तर (कक्षा म क्या बोल): ‘अहं षट् सुभा षता न सस्वरं पठा म । मम प्रयं सुभा षतम् अ स्त —
परोपकाराय फल न्त वृक्षाः परोपकाराय वह न्त नद्यः — यतः इदं सुभा षतं कथय त यत् इदं शरीरम् अ प
परोपकाराथम् एव अ स्त ।’ (म छह सुभा षत स्वर के साथ पढ़ता ँ; मुझे सबसे प्रय यही है, क्य क यह कहता है
क यह शरीर भी परोपकार के लए ही है।)
प्र.2 पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखन्तु — (क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तष्ठ न्त ? (ख)
परोपकाराय काः वह न्त ? (ग) दशवापीसमः कः भव त ? (घ) सत्पुरुषाः इव के स न्त ? (ङ) अ थनः केभ्यः
वमुखाः न या न्त ? (च) वृक्षाः स्वयं का न न खाद न्त ?
एकपदे न का अथ है — केवल एक शब्द म उत्तर, पूरा वाक्य नह । और वह एक शब्द उसी वभ क्त-वचन म होगा जसम
प्रश्नवाचक शब्द है।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः उत्तरम् हन्द वभ क्तः / मूल ोकः
(एकपदे न)
(क) वृक्षाः स्वयं कु त्र ितष्ठिन्त ? आतपे धूप म सप्तमी, एकवचन — ‘ तष्ठ न्त स्वयमातपे’
(ख) परोपकाराय काः वहिन्त ? नद्य ः न दयाँ प्रथमा, बहुवचन (स्त्री.) — ‘परोपकाराय वह न्त न ः’
(ग) दशवापीसमः कः भवित ? ह्र दः तालाब प्रथमा, एकवचन — ‘दशवापीसमो ह्रदः’
(घ) सत्पुरुषाः इव के सिन्त ? वृक्षाः पेड़ प्रथमा, बहुवचन — ‘वृक्षाः सत्पुरुषा इव’
(ङ) अिथनः के भ्यः िवमुखाः न यािन्त महीरुहेभ्यः (वृक्षेभ्यः) पेड़ से पञ्चमी, बहुवचन — ‘धन्या महीरुहा येषां वमुखा या न्त
? ना थनः’
(च) वृक्षाः स्वयं कािन न खादिन्त ? फलािन फल तीया, बहुवचन (नपुं.) — ‘स्वयं न खाद न्त फला न वृक्षाः’
एकपदे न उत्तर का सुनहरा नयम: प्रश्नवाचक शब्द को दे खए और उत्तर उसी रूप म द जए —
• कुत्र (कहाँ) पूछा है → उत्तर सप्तमी म (आतपे)
• कः / काः / के (कौन) पूछा है → उत्तर प्रथमा म (ह्रदः, न ः, वृक्षाः)
• केभ्यः ( कनसे) पूछा है → उत्तर पञ्चमी बहुवचन म (महीरुहेभ्यः)
• का न ( कन- कन को) पूछा है → उत्तर तीया बहुवचन नपुंसक लङ्ग म (फला न)
Tip: (ङ) म ‘वृक्षेभ्यः’ लखना भी शुद्ध है, पर ोक का अपना शब्द महीरुहेभ्यः है — पाठ का शब्द लखने पर
पूरे अंक मलते ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 165
प्रश्नौ ३–४ : पूणवाक्येन उत्तर-लेखनम्, तथा प कातः पदा न चत्वा रक्त ान-पू तः
अभ्यासः
प्र.1 पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखन्तु — (क) नद्यः क न पब न्त ? (ख)
वृक्षाः अस्मभ्यं क क यच्छ न्त ? (ग) इदं शरीरं कमथम् अ स्त ? (घ) दशपुत्रसमः कः भव त ? (ङ) केषां
वभूतयः परोपकाराय भव न्त ? (च) अन्यस्य छायां के कुव न्त ?
पूणवाक्येन का अथ है — कता और क्रया दोन लखकर पूरा वाक्य बनाइए। सरल तरीका यह है क प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म
दोहरा द जए और प्रश्नवाचक शब्द क जगह उत्तर रख द जए।
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प्रश्नः उत्तरम् (पूणवाक्येन) हन्द अथः
(क) नद्यः िकं न िपबिन्त ? नद्य ः स्वयम् एव अम् भः (जलं) न िपबिन्त । न दयाँ स्वयं अपना जल नह पीत ।
(ख) वृक्षाः अस्मभ्यं िकं िकं वृक्षाः अस्म भ्यं शुद्धं वायु,ं पुष्पािण, पत्र ािण, फलािन, छायां, पेड़ हम शुद्ध वायु, फूल, पत्ते, फल, छाया,
यच्छिन्त ? मूल ािन, वल्कलािन, काष्ठािन च यच्छिन्त । जड़, छाल और लकड़ी दे ते ह।
(ग) इदं शरीरं िकमथम् इदं शरीरं परोपकाराथम् अिस्त । यह शरीर परोपकार के लए है।
अिस्त ?
(घ) दशपुत्र समः कः भवित दशपुत्र समः द मः (वृक्षः) भवित । एक पेड़ दस सन्तान के समान होता है।
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(ङ) के षां िवभूतयः सतां (स ज्जनानां) िवभूतयः परोपकाराय भविन्त । सज्जन क सम्प त्तयाँ परोपकार के लए
परोपकाराय भविन्त ? होती ह।
(च) अन्यस्य छायां के अन्यस्य छायां वृक्षाः कु विन्त । दूसर के लए छाया पेड़ करते ह।
कु विन्त ?
प्रश्नवाचक शब्द और उत्तर क वभ क्त: ‘ क न पब न्त?’ → कम पूछा गया है, उत्तर तीया म (अम्भः —
नपुंसक लङ्ग म प्रथमा और तीया का रूप एक-सा होता है)। ‘केषां वभूतयः?’ → सम्बन्ध पूछा है, उत्तर षष्ठी
बहुवचन म (सताम् / सज्जनानाम्)। ‘ कमथम्’ → प्रयोजन पूछा है, उत्तर चतुथ या ‘-अथम्’ रूप म
(परोपकाराथम्)।
Tip: (ख) का उत्तर पाँचव सुभा षत से बनता है — ‘पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारु भः’। सात वस्तुएँ वह
गनी ह; ‘शुद्धं वायुं’ पाठ के आर म्भक संलाप से जो ड़ए। परीक्षा म तीन-चार वस्तुएँ लख दे ना भी पयाप्त होता है।
प्र.2 प कातः उ चता न पदा न चत्वा रक्त ाना न पूरयन्तु — (प का : तष्ठ न्त, सुजनस्येव, वभूतयः, वृक्षाः,
फला न, दशपुत्रसमः, परोपकाराथम्) यथा — छायामन्यस्य कुव न्त ................ स्वयमातपे । (क) फलान्य प
पराथाय ................ सत्पुरुषा इव । (ख) दशह्रदसमः पुत्रः ................ द्रुमः । (ग) ................ येषां वै वमुखा
या न्त ना थनः । (घ) ................ इदं शरीरम् । (ङ) स्वयं न खाद न्त ................ वृक्षाः । (च) परोपकाराय सतां
................ ।
प का म सात पद ह और रक्तस्थान भी सात — एक ‘यथा’ (उदाहरण) म और छह (क)–(च) म। इस लए हर पद ठ क एक बार
प्रयोग होगा। उदाहरण म तष्ठ न्त लग चुका है, शेष छह पद छह वाक्य म बँट जाएँगे।
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वाक्यम् पू रतं वाक्यम् हन्द
यथा छायाम न्यस्य कु विन्त ितष्ठिन्त स्वयमातपे । दूसरे के लए छाया करते ह, स्वयं धूप म खड़े रहते ह।
(क) फलान्यिप पराथ य वृक्षाः स त्पुरुषा इव । फल भी दूसर के लए — पेड़ सज्जन के समान ह।
(ख) दशह्र दसमः पुत्र ः दशपुत्र समः द मः । एक सन्तान दस तालाब के बराबर, एक पेड़ दस सन्तान के बराबर।
(ग) सुजनस्येव येषां वै िवमुखा यािन्त नािथनः । सज्जन के समान, जनसे याचक नराश होकर नह लौटते।
(घ) परोपकाराथम् इदं शरीरम् । यह शरीर परोपकार के लए है।
(ङ) स्वयं न खादिन्त फलािन वृक्षाः । पेड़ अपने फल स्वयं नह खाते।
(च) परोपकाराय सतां िवभूतयः । सज्जन क सम्प त्तयाँ परोपकार के लए होती ह।
पद चुनने क यु क्त — छन्द और अथ दोन दे खए:
• (क) म क्रया-कता चा हए और ‘सत्पुरुषा इव’ बहुवचन है → वृक्षाः।
• (ख) पहले तीन चरण का साँचा ‘दश—समः X’ है, तो चौथे म भी वही → दशपुत्रसमः।
• (ग) म ‘येषां … ना थनः’ के साथ तुलना चा हए → सुजनस्येव (= सुजनस्य इव)।
• (घ) म ‘इदं शरीरम्’ का प्रयोजन चा हए → परोपकाराथम्।
• (ङ) ‘न खाद न्त’ का कम चा हए, नपुंसक लङ्ग बहुवचन → फला न।
• (च) ‘सतां’ के बाद षष्ठी का सम्बन्धी पद → वभूतयः।
Check it yourself: भरने के बाद हर वाक्य को पाठ के मूल ोक से मला ली जए — छह वाक्य पाठ के छह
सुभा षत क ही पं क्तयाँ ह।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 166
प्रश्नाः ५–७ : वभ क्त- नदशः, द्ववचन-बहुवचन-रूपा ण, तथा ‘कः क ददा त’ इ त मेलनम्
अभ्यासः
प्र.1 उदाहरणानुसारम् अधो ल खतेषु वाक्येषु ूलाक्षरपदानां वभ क्तं न दशन्तु — (क) वृक्षाः अन्यस्य कृते ‘छायां’
कुव न्त । — द्वतीया वभ क्तः (ख) वृक्षाः पराथाय ‘फला न’ यच्छ न्त । (ग) वृक्षाः ‘सत्पुरुषाः’ इव स न्त । (घ)
‘द्रुमः’ दशसन्तानसमः भव त । (ङ) वृक्षः ‘प्रा णभ्यः’ काष्ठा न यच्छ त । (च) ‘नद्यः’ जलं स्वयमेव न पब न्त । (छ)
सज्जनानां ‘सङ्ग त’ करोतु । ( ूलाक्षरपदा न एकोद्धरण च े न द शता न)
उदाहरण (क) पुस्तक ने स्वयं हल कया है — ‘छायां’ कम है, इस लए द्वतीया वभ क्तः। शेष सब पर वही तरीका लगाइए: पहले
पू छए क वाक्य म उस पद क भू मका क्या है — कता, कम, या सम्प्रदान।
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
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वाक्यम् ूलपदम् वभ क्तः वचनम् / कारणम्
m l a se तीया)
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(क) वृक्षाः अन्यस्य कृ ते छायां कु विन्त छायाम् िद्वतीया एकवचन — ‘कुव न्त’ का कम (कम ण
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। िवभिक्तः
a(ख)glवृक्षाः पराथ य फलािन यच्छिन्त फला न िद्वतीया बहुवचन (नपुं.) — ‘यच्छ न्त’ का कम
। िवभिक्तः
co m बहुवचन — ‘इव’ के साथ उपमान भी कता के समान प्रथमा म
(ग) वृक्षाः स त्पुरुषाः इव सिन्त । सत्पुरुषाः
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पथमा िवभिक्तः ag
g l as रहता है
(घ) द मः दशसन्तानसमः भवित । द्रुमः
a पथमा िवभिक्तः एकवचन — वाक्य का कता
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(ङ) वृक्षः पािणभ्यः काष्ठािन यच्छित प्रा णभ्यः चतुथ िवभिक्तः बहुवचन — जसे दया जाए वह सम्प्रदान (सम्प्रदाने चतुथ )
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(च) नद्य ः जलं स्वयमेव न िपबिन्त । पथमा िवभिक्तः
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न ः बहुवचन (स्त्री.) — वाक्य क कता
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a (छ) सज्जनानां सङ् गितं करोतु । सङ्ग तम् िद्वतीया एकवचन (स्त्री.) — ‘करोतु’ का कम
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िवभिक्तः
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तीन नयम, जनसे सात उत्तर नकल आते ह:
• कत र प्रथमा — जो काम करे (द्रुमः, न ः)। ‘इव’ से जुड़ा उपमान भी प्रथमा म ही (सत्पुरुषाः)।
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• कम ण द्वतीया — जस पर काम पड़े (छायाम्, फला न, सङ्ग तम्)। पहचान: क्रया से ‘ कसको / क्या’ पू छए।
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• सम्प्रदाने चतुथ — जसे दया जाए (प्रा णभ्यः)। पहचान: ‘ कसके लए / कसको दया’ — दा, यम्, यच्छ् जैसी
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‘दे ने’ वाली धातुओं के साथ यही आती है।
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a gl सावधानी — (ङ) म भ्रम मत खाइए: ‘प्रा णभ्यः’ का रूप दे खकर पञ्चमी बहुवचन लग सकता है, क्य क चतुथ
और पञ्चमी का बहुवचन रूप एक जैसा (-भ्यः) होता है। यहाँ क्रया यच्छ त (दे ता है) है, इस लए अथ ‘प्रा णय को
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दे ता है’ बनता है — अतः चतुथ । य द क्रया ‘आगच्छ त’ होती तो पञ्चमी होती।
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अधो ल खतानां पदानां द्ववचने बहुवचने च रूपा ण लखन्तु — (क) वृक्षः — वृक्षौ, वृक्षाः (ख) मेघः (ग) ह्रदः (घ)
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प्र.2
सत्पुरुषः (ङ) छाया (च) वापी (छ) नद (ज) शरीरम् (झ) पुष्पम् ।
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सभी पद प्रथमा वभ क्त, एकवचन म दए ह; इनके द्ववचन और बहुवचन रूप लखने ह। उत्तर लङ्ग और अन्त्य-स्वर दे खकर
तय होते ह।
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पदम् (एकवचनम्) द्ववचनम् बहुवचनम् शब्दः / लङ्गम्
(क) वृक्षः वृक्षौ वृक्षाः अकारान्त पुँ ल्लङ्ग (राम-शब्दवत्)
(ख) मेघ ः मेघ ौ मेघ ाः अकारान्त पुँ ल्लङ्ग
(ग) ह्रदः ह्र दौ ह्र दाः अकारान्त पुँ ल्लङ्ग
(घ) सत्पुरुषः स त्पुरुषौ स त्पुरुषाः अकारान्त पुँ ल्लङ्ग
(ङ) छाया छाये छायाः आकारान्त स्त्री लङ्ग (रमा-शब्दवत्)
(च) वापी वाप्यौ वाप्यः ईकारान्त स्त्री लङ्ग (नद -शब्दवत्)
(छ) नदी नद्य ौ नद्य ः ईकारान्त स्त्री लङ्ग
(ज) शरीरम् शरीरे शरीरािण अकारान्त नपुंसक लङ्ग (फल-शब्दवत्)
(झ) पुष्पम् पुष्पे पुष्पािण अकारान्त नपुंसक लङ्ग
चार साँचे याद कर ली जए, नौ के नौ उत्तर बन जाएँगे:
• अकारान्त पुँ ल्लङ्ग (राम) — ◌ः / औ / आः → वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः
• आकारान्त स्त्री लङ्ग (रमा) — आ / ए / आः → छाया, छाये, छायाः
• ईकारान्त स्त्री लङ्ग (नद ) — ई / यौ / यः → नद , न ौ, न ः
• अकारान्त नपुंसक लङ्ग (फल) — म् / ए / आ न → पुष्पम्, पुष्पे, पुष्पा ण
Tip — ‘वाप्यः’ और ‘नद्यः’ म इ-कार क्य नह दखता? ईकारान्त स्त्री लङ्ग म स्वर के आगे स्वर आने पर ई →
य् हो जाता है (यण्-स न्ध): वापी + अः = वाप्यः, नद + औ = न ौ। पाठ म भी यही रूप छपा है — ‘परोपकाराय
वह न्त नद्यः’। ध्यान र खए, ‘शरीरा ण’ और ‘पुष्पा ण’ म ण होता है (णत्व- व ध), ‘न’ नह ।
प्र.3 अधो ल खतानां पदानां परस्परं समु चतं मेलनं कृत्वा ‘कः क ददा त’ इ त लखन्तु — (क) वृक्षः — दुग्धं (ख) गौः
— प्रकाशं (ग) सूयः — वद्यां (घ) नद — शुद्धं वायुं (ङ) अ ग्नः — जलम् (च) शक्षकः — तापं । यथा — वृक्षः
शुद्धं वायुं ददा त ।
बाएँ स्तम्भ म दे ने वाला है और दाएँ स्तम्भ म द जाने वाली वस्तु — पर जोड़े जान-बूझकर उलट-पुलट छपे ह। पुस्तक ने पहला
मेल जोड़कर दखा दया है (वृक्षः → शुद्धं वायुं)। शेष अथ के आधार पर जो ड़ए।
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कः (कता) कम् (कम) पूण वाक्यम् हन्द
(क) वृक्षः शुद्धं वायुं वृक्षः शुद्धं वायुं ददाित । पेड़ शुद्ध वायु दे ता है।
(ख) गौः दुग्धं गौः दुग्धं ददाित । गाय दूध दे ती है।
(ग) सूयः प्रकाशं सूयः पकाशं ददाित । सूय प्रकाश दे ता है।
(घ) नदी जलम् नदी जलं ददाित । नद जल दे ती है।
(ङ) अिग्नः तापं अिग्नः तापं ददाित । आग ताप (गम ) दे ती है।
(च) िशक्षकः व ां िशक्षकः िवद्य ां ददाित । शक्षक व ा दे ते ह।
वाक्य बनाते समय दो बात दे खए:
• कता प्रथमा म रहेगा — वृक्षः, गौः, सूयः, नद , अ ग्नः, शक्षकः (सब प्रथमा एकवचन)।
• कम द्वतीया म — वायुम् → ‘वायुं’, दुग्धम् → ‘दुग्धं’, प्रकाशम् → ‘प्रकाशं’, जलम्, तापम् → ‘तापं’, व ाम्
→ ‘ व ां’। ध्यान द जए, पुस्तक क प का म ये पद पहले से तीया वभ क्त म छपे ह — इस लए उन्ह ज्य का
त्य उठाकर रख द जए।
Try this: इसी साँचे पर अपने पाँच वाक्य बनाइए — माता स्नेहं ददा त । मेघः वृ ष्ट ददा त । पुस्तकं ानं
ददा त । कृषकः अन्नं ददा त । मत्रं साहाय्यं ददा त । ‘ददा त’ के स्थान पर पाठ का शब्द यच्छ त भी लगाया जा
सकता है — दोन का अथ ‘दे ता है’ ही है।
वयम् अभ्यासं कुमः — पृष्ठ 167
प्रश्नः ८ : लट् लकारे प्रथमपुरुषस्य त्री ण वचना न
अभ्यासः
प्र.1 अधो ल खतानां क्रयापदानां लट् लकारे प्रथमपुरुषस्य रूपा ण लखन्तु — कुव न्त — करो त, कुरुतः, कुव न्त ;
तष्ठ न्त ; फल न्त ; या न्त ; पब न्त ; खाद न्त ।
दए गए सब पद लट् लकार (वतमान काल), प्रथमपुरुष, बहुवचन म ह। लखना है उसी पुरुष के तीन वचन — एकवचन,
वचन, बहुवचन। पहला उत्तर पुस्तक ने भर दया है।
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दत्तं पदम् धातुः / गणः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम् हन्द
कु विन्त कृ (तना दगणः) करोित कु रुतः कु विन्त करता है / करते ह
ितष्ठिन्त स्था (भ्वा दगणः) ितष्ठित ितष्ठतः ितष्ठिन्त ठहरता है / ठहरते ह
फलिन्त फल् (भ्वा दगणः) फलित फलतः फलिन्त फलता है / फलते ह
यािन्त या (अदा दगणः) याित यातः यािन्त जाता है / जाते ह
िपबिन्त पा (भ्वा दगणः) िपबित िपबतः िपबिन्त पीता है / पीते ह
खादिन्त खाद् (भ्वा दगणः) खादित खादतः खादिन्त खाता है / खाते ह
साधारण नयम (भ्वा दगण, परस्मैपद, लट् लकार, प्रथमपुरुष): - त / -तः / - न्त। इसी से तष्ठ त– तष्ठतः–
तष्ठ न्त, फल त–फलतः–फल न्त, पब त– पबतः– पब न्त, खाद त–खादतः–खाद न्त सब बन जाते ह।
दो अपवाद जो यहाँ आए ह:
• कृ धातु तना दगण क है, इस लए रूप ‘करो त, कुरुतः, कुव न्त’ — यहाँ धातु ही बदलती दखती है।
• या धातु अदा दगण क है — बीच म कोई वकरण नह जुड़ता, इस लए सीधे ‘या त, यातः, या न्त’ (‘याय त’
नह )।
Tip — तीन पुरुष एक साथ याद कर ली जए ( तष्ठ् उदाहरण):
प्रथमपुरुषः (सः/तौ/ते) — तष्ठ त, तष्ठतः, तष्ठ न्त
मध्यमपुरुषः (त्वम्/युवाम्/यूयम्) — तष्ठ स, तष्ठथः, तष्ठथ
उत्तमपुरुषः (अहम्/आवाम्/वयम्) — तष्ठा म, तष्ठावः, तष्ठामः
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 167
अधो ल खतां प्रहे लकां प ठत्वा उत्तरं वदन्तु
योग्यता वस्तरः
प्र.1 अधो ल खतां प्रहे लकां प ठत्वा उत्तरं वदन्तु — वृक्षाग्रवासी न च प क्षराजः त्रनेत्रधारी न च शूलपा णः ।
त्वग्वस्त्रधारी न च सद्धयोगी जलं च बभ्रन्न घटो न मेघः ॥
उत्तरम् — ना रकेलम् / ना रकेलः (ना रकेलफलम्) । [ हन्द : ना रयल]
प्रहे लका क चार पं क्तयाँ एक ही ढं ग से बनी ह — पहले एक लक्षण बताया जाता है, फर तुरन्त ‘न च’ कहकर उस लक्षण वाले
प्र सद्ध व्य क्त/वस्तु का नषेध कर दया जाता है। जो सब लक्षण एक साथ रखता हो पर उनम से कोई न हो — वही उत्तर है।
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पं क्तः अथः ना रकेले कथम् घटते
वृक्षाग वासी न च पेड़ क चोट पर रहता है, पर प क्षराज नािरयल का फल सदा वृक्ष की सबसे ऊपरी शाखा पर ही लगता
पिक्षराजः (गरुड़) नह है है
ित्रनेत्र धारी न च तीन आँख रखता है, पर शूलपा ण ( शव) नािरयल की िगरी पर तीन िछद होते है,ं जो तीन आँखों जैसे िदखते
शूल पािणः नह है है ं
त्वग्वस्त्रधारी न च छाल का वस्त्र पहनता है, पर सद्ध योगी नािरयल के ऊपर रे शेद ार िछलका (जटा) िलपटा रहता है, मानो
िसद्धयोगी नह है वल्कल -वस्त्र हो
जलं च िबभन्न घटो न जल धारण करता है, पर न घड़ा है न बादल नािरयल के भीतर मीठा जल भरा रहता है
मेघ ः
चत्र भी संकेत दे ता है: पृष्ठ 167 पर प्रहे लका के दोन ओर ना रकेल-वृक्ष के चत्र छपे ह और नीचे गरे हुए
ना रयल भी दखते ह — यही उत्तर का सबसे सीधा सुराग है।
ाकरण-संकेत: ‘ बभ्रन्न’ = बभ्रत् + न ( बभ्रत् = धारण करता हुआ, ‘भृ’ धातु का शतृ-प्रत्ययान्त रूप)।
‘त्वग्वस्त्रधारी’ = त्वक् (छाल) + वस्त्र + धारी।
Try this: इसी ढाँचे पर स्वयं एक प्रहे लका बनाइए — ‘नेत्रं धारय त न च मानवः, जलं वह त न च नद ’ … और
मत्र से पू छए।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 167
वृक्षसंरक्षणस्य तथा सुभा षत-संग्रहणस्य द्वे प रयोजने
प रयोजनाकायम्
प्र.1 वद्यालयं गृहं वा प रतः वद्यमानानां पञ्च-पादपानां (वृक्षाणां) संरक्षणं कुवन्तु ।
यह करके दखाने वाला काय है — इसका उत्तर कॉपी म नह , वृक्ष क दे खभाल म लखा जाता है। नीचे व ध और एक भरा हुआ
नमूना-अ भलेख दया है, जसे आप अपने वृक्ष के नाम डालकर बना सकते ह।
व धः (कैसे कर):
1. व ालय या घर के आसपास पाँच पेड़ चु नए और हर एक को एक नाम-प का द जए (संस्कृत नाम स हत)।
2. प्रत्येक पेड़ क थाला (आलवाल) बनाकर सप्ताह म दो बार जल द जए।
3. सूखे पत्ते जड़ के पास ही इक े क जए — वही खाद बन जाएगी।
4. छोटे पौध के चार ओर बाड़ लगाइए ता क पशु न चर।
5. एक वृक्ष-अ भलेख (र जस्टर) बनाइए और हर सप्ताह क स्थ त ल खए।
नमूना उत्तर — वृक्ष-अ भलेखः:
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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 16 वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
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क्रमाङ् कः वृक्षस्य नाम (संस्कृतम्) हन्द उपकारः मम कायम्
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न्यग बरगद वशाला छाया, शुद्धः वायुः
ag l तसप्ताहं जलसेचनम्
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g l a अ धकतमं प्राणवायुं यच्छ त मूलसमीपे स्वच्छता
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पीपल
३ िनम्बः नीम औषधीया न पत्रा ण पणानां संरक्षणम्
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४ आमः आम वेष्टनस्य नमाणम्
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५ तुल सी
ag तुलसी औष धः, सुगन्धः प्र त दनं जलदानम्
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एक वाक्य म प्र त ा (कक्षा म बो लए): ‘अहं पञ्च वृक्षाणां संरक्षणं क रष्या म, यतः दशपुत्रसमः द्रुमः भव त
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।’ — यही पाठ के दूसरे सुभा षत का सन्दे श है।
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अन्तजालस्य साहाय्येन परोपकार वषये दश-सुभा षतानां संग्रहणं कुवन्तु ।
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व धः — अन्तजाल (इंटरनेट) पर ‘परोपकार सुभा षत’, ‘परोपकाराय सुभा षता न’ जैसे शब्द खो जए; वश्वसनीय ोत (NCERT,
संस्कृत भारती, व क ोत) से ली जए; हर सुभा षत के साथ अथ और ोत अवश्य ल खए। बड़ क सहायता लेकर ही खोज
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क जए।
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नमूना संग्रहः — परोपकार वषयका न दश सुभा षता न:
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क्रमः सुभा षतम् हन्द अथः
१ परोपकाराय फलिन्त वृक्षाः परोपकाराय वहिन्त नद्यः । पेड़ और निदयाँ दू स रों के उपकार के िलए ही फलते और बहते है।
ं
२ िपबिन्त नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादिन्त फलािन वृक्षाः । निदयाँ अपना जल और पेड़ अपने फल स्वयं नही ं भोगते।
३ परोपकाराय सतां िवभूतयः । स ज्जनों की स म् पित्त याँ परोपकार के िलए होती है।
ं
४ अष्टादशपुर ाणेष ु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण् याय अठारह पुर ाणों में व्यास की दो ही बाते ं है ं — परोपकार पुण् य है, दू स रे
पापाय परपीडनम् ॥ को पीड़ा दे ना पाप।
५ पत्रं नैव यदा करीरिवटपे दोषो वसन्तस्य िकम् । करील की डाल पर पत्त ा न आए तो इसमें वस न्त का क्या दोष — दे ने
वाला सदा दे ता ही है।
६ परोपकारशून्यस्य िधक् मनुष्यस्य जीिवतम् । िजस मनुष्य के जीवन में परोपकार नही,ं उसके जीवन को िध क्कार
है।
७ वृक्षाग वासी न च पिक्षराजः … (पहेिलका) पाठ की ही पहेिलका — नािरयल भी सब कु छ दू स रों को दे ता है।
८ गण
ु ा गण
ु े ष ु गण
ु ा भविन्त । ु उ न्ही ं के पास ग ण
गण ु बनते है ं जो ग ण
ु को पहचानते है।
ं
९ िवद्या ददाित िवनयं िवनयाद् याित पात्रताम् । िवद्य ा िवनय दे ती है, िवनय से योग्यता आती है — िवद्य ा भी दे ने का ही
काम करती है।
१० सव भवन्तु सुिखनः सव सन्तु िनरामयाः । सब सुखी हों, सब िनरोग हों — यही परोपकार की सबसे बड़ी पाथना
है।
प्रस्तु त का सुझाव: दस सुभा षत एक चाट पर सुन्दर अक्षर म ल खए, बीच म एक वृक्ष का चत्र बनाइए और हर
शाखा पर एक सुभा षत ल खए — यह ‘सुभा षत-वृक्षः’ कक्षा क द वार के लए अच्छ प्रस्तु त बनेगी।
प र शष्टम् — आगच्छन्तु ! संस्कृतेन संभाषणं कुमः — पृष्ठ 168
पुस्तकस्य अ न्तमं पृष्ठम् — दै न न्दन-संभाषणस्य वाक्या न, ‘करो त’ तथा ‘इच्छ त’ इ त क्रयापदाभ्यां वाक्यरचना, मुख्या न क्रयापदा न च
प र शष्टम् सं भाषणम्
प्र.1 ‘करो त’ इ त क्रयापदम् उपयुज्य बहू न वाक्या न कतु शक्नुमः । यथा — बालकः पूजां करो त । योगासनं करो त
। काय करो त । स्नानं करो त । — एवं स्वयम् अ प वाक्या न रचयन्तु ।
‘करो त’ के साथ वाक्य बनाने का साँचा एक ही है — कता (प्रथमा) + कम ( तीया) + करो त। कम को तीया वभ क्त म रखना
मत भू लए (पूजा → पूजाम् → ‘पूजां’; कायम् → ‘काय’)।
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वाक्यम् हन्द कता + कम
छात्रः ग ृहकाय ं करोित । छात्र ग ृहकाय करता है। छात्रः (प्रथमा) + गृहकायम् ( तीया)
माता भोजनं करोित । माँ भोजन बनाती/करती है। माता + भोजनम्
बािलका नत्ृ यं करोित । बािलका नत्ृ य करती है। बा लका + नृत्यम्
वयं वृक्षारोपणं कु मः । हम वृक्षारोपण करते है।
ं वयम् (उत्तमपुरुष, बहुवचन) → कुमः
त्वं व्यायामं करोिष । तुम व्यायाम करते हो। त्वम् (मध्यमपुरुष) → करो ष
अहं संस्कृ तेन संभाषणं करोिम । मैं संस्कृ त में बातचीत करता हू।
ँ अहम् (उत्तमपुरुष) → करो म
कता बदलते ही क्रया बदलेगी — ‘करो त’ केवल प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है: सः/सा करो त, तौ/ते
कुरुतः, ते कुव न्त; त्वं करो ष, युवां कुरुथः, यूयं कुरुथ; अहं करो म, आवां कुवः, वयं कुमः। यही ता लका इसी
पाठ के प्रश्न ८ म भी आई है।
प्र.2 ‘इच्छ त’ इ त क्रयापदम् उपयुज्य बहू न वाक्या न कतु शक्नुमः । यथा — राधा जलम् इच्छ त । फलम् इच्छ त ।
भोजनम् इच्छ त । गीतम् इच्छ त । — एवं स्वयम् अ प वाक्या न रचयन्तु ।
साँचा वही है — कता (प्रथमा) + कम ( तीया) + इच्छ त। ‘इच्छ त’ के साथ कोई क्रया भी जोड़ी जा सकती है, तब उसका रूप
तुमुन्-प्रत्ययान्त (‘-तुम्’) होगा — जैसे ‘प ठतुम् इच्छ त’।
वाक्यम् हन्द टप्पणी
बालकः दुग्धम् इच्छित । बालक दू ध चाहता है। कम — तीया एकवचन
छात्रा पुस्तकम् इच्छित । छात्र ा पुस्तक चाहती है। स्त्री लङ्ग कता, क्रया वही
कृ षकः वृिष्टम् इच्छित । िकसान वष चाहता है। वृ ष्टः → वृ ष्टम्
अहं संस्कृ तं पिठतुम ् इच्छािम । मैं संस्कृ त पढ़ ना चाहता हू।
ँ तुमुन् — प ठतुम् + इच्छा म
वयं वृक्षान् रोपियतुम ् इच्छामः । हम पेड़ लगाना चाहते है।
ं वृक्षान् — तीया बहुवचन
ते ीिडतुम ् इच्छिन्त । वे खेल ना चाहते है।
ं प्रथमपुरुष बहुवचन — इच्छ न्त
Tip: ‘इच्छ त’ भ्वा दगण क इष् धातु से बनता है — इच्छ त, इच्छतः, इच्छ न्त / इच्छ स, इच्छथः, इच्छथ /
इच्छा म, इच्छावः, इच्छामः।
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प्र.3 प र शष्टे दत्ता न संभाषण-वाक्या न पठन्तु, अभ्यसन्तु च — भवतः नाम कम् ? भवतः गृहं कुत्र अ स्त ? भवान् क
करो त ? … अद्य कः वासरः ? इदान कः समयः ? — एतेषां प्रश्नानाम् उत्तरा ण संस्कृतेन वदन्तु ।
यह पुस्तक का अ न्तम अभ्यास है — बोलकर करने का। नीचे प र शष्ट के सब प्रश्न-उत्तर एक साथ, अथ स हत दए ह; इन्ह जोड़ी
बनाकर आपस म पू छए।
प्रश्नः उत्तरम् हन्द
भवतः नाम िकम् ? मम नाम राजेशः । आपका नाम क्या है? — मेरा नाम राजेश है।
भवतः ग ृहं कु त्र अिस्त ? मम ग ृहं स ञ्जयनगरे अिस्त । आपका घर कहाँ है? — मेरा घर सञ्जयनगर म है।
भवान् िकं करोित ? अहं काय ं करोिम । आप क्या करते ह? — म काम करता ँ।
भवती िकं िलखित ? अहं श्लोकं िलखािम । आप (स्त्री) क्या लख रही ह? — म ोक लखती ँ।
सः कदा आगच्छित ? सः दशवादने आग च्छित । वह कब आता है? — वह दस बजे आता है।
कक्षायां कित छात्राः सिन्त ? क क्षायां ित्र ंशत् छात्र ाः सिन्त । कक्षा म कतने छात्र ह? — तीस छात्र ह।
रिवः कु तः आगच्छित ? रिवः ग न्थालयतः आग च्छित । र व कहाँ से आता है? — पुस्तकालय से।
सः िकमथं योगासनं करोित ? सः आरोग्याथ ं योगासनं करोित । वह कस लए योगासन करता है? — स्वास्थ्य के लए।
एतत् कस्य पुस्तकम् ? एतत् राजेशस्य पुस्तकम् । यह कसक पुस्तक है? — यह राजेश क पुस्तक है।
भवत्याः आरोग्यं कथम् अिस्त ? मम आरोग्यं स म् यक् अिस्त । आपका स्वास्थ्य कैसा है? — मेरा स्वास्थ्य ठ क है।
नमस्ते । भवान् कथम् अिस्त ? नम स्ते । अहं कु शली अिस्म । नमस्ते। आप कैसे ह? — म कुशल ँ।
शारदे ! भवती कथम् अिस्त ? आम्, अहमिप कु शिलनी अिस्म । शारदा! तुम कैसी हो? — हाँ, म भी कुशल ँ।
अद्य कः वासरः ? अद्य बुध वासरः । आज कौन-सा दन है? — आज बुधवार है।
इदानी ं कः समयः ? इदानी ं एकादशवादनम् । इस समय कतने बजे ह? — अभी ग्यारह बजे ह।
भवती अद्य िकं खािदतवती ? अहम् अद्य दोसां खािदतवती । आपने आज क्या खाया? — मने आज दोसा खाया।
भवान् िकं खािदतवान् ? अहम् अद्य फलािन खािदतवान् । आपने क्या खाया? — मने आज फल खाए।
तीन बात जो इस ता लका से पक्क हो जाती ह:
• भवान् / भवती आदरसूचक ह, पर इनक क्रया प्रथमपुरुष म लगती है — ‘भवान् क करो त?’ (‘करो ष’ नह )।
• उत्तर दे ते समय अहम् आता है, इस लए क्रया उत्तमपुरुष म — ‘अहं काय करो म’।
• पुँ ल्लङ्ग-स्त्री लङ्ग का भेद भूतकाल म स्पष्ट दखता है — खा दतवान् (पुरुष), खा दतवती (स्त्री); कुशली (पुरुष),
कुश लनी (स्त्री)।
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प र शष्ट के मुख्य क्रयापद (लट् लकारः, प्रथमपुरुष एकवचनम्): पठ त, लख त, खाद त, पब त, गच्छ त,
हस त, क्र ड त, मल त, त्यज त, पृच्छ त, नय त, भव त, अ स्त, जाना त, ददा त, शृणो त, प्रक्षालय त, माजय त,
पश्य त, स्थापय त, स्मर त, उ त्तष्ठ त, उप वश त ॥
साथ ही — बालकः/बा लका/सः/सा/वाहनं/र वः/गीता — गच्छ त; त्वं — गच्छ स; अहं — गच्छा म।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का आरम्भ (पृष्ठ 160)। ‘पयावरणसंरक्षणस्य वषये एका प्रदशनी व ालये आयो जता अ स्त।’ — छात्र प्रदशनी दे खते
ह और शक्षक से संलाप करते ह। एक छात्रा कहती है क जीव व ान क पुस्तक म पढ़ा है ‘वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छ न्त’, दूसरी
कहती है ‘मम माता अ प वद त यत् वृक्षाः पूज्याः भव न्त’। मु दता एक सुभा षत सुनाती है और वह से पाठ के छह सुभा षत
आरम्भ होते ह।
छह सुभा षत, एक ही सन्दे श — परोपकारः। (१) छायामन्यस्य कुव न्त… (२) दशकूपसमा वापी… (३) अहो एषां वरं
जन्म… (४) परोपकाराय फल न्त वृक्षाः… (५) पुष्प-पत्र-फलच्छाया-मूल-वल्कल-दारु भः… (६) पब न्त न ः स्वयमेव नाम्भः…
— हर ोक के साथ पुस्तक पदच्छे दः, अन्वयः और भावाथः दे ती है।
पाठ का मुख्य वाक्य। ‘फलान्य प पराथाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव’ — वृक्ष स्वयं धूप म खड़े रहते ह पर दूसर को छाया दे ते ह,
फल स्वयं नह खाते पर दूसर को दे ते ह। यही सज्जन का लक्षण है — स्वयं कष्ट सहकर भी दूसर का हत करना। इसी पं क्त
से पाठ का नाम ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव’ बना है।
एक वृक्ष का मूल्य (पृष्ठ 161)। ‘दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः॥’ — दस कुओं के
बराबर एक बावड़ी, दस बाव ड़य के बराबर एक तालाब, दस तालाब के बराबर एक सन्तान और दस सन्तान के बराबर एक
वृक्ष। इसी लए भावाथ कहता है — ‘अतः सव वृक्षारोपणं कुवन्तु।’
ाकरण-अभ्यास (पृष्ठ 164–167)। प्रश्न ५ म वभ क्त- नदशः (प्रथमा, तीया, चतुथ ), प्रश्न ६ म द्ववचन-बहुवचन
(वृक्षः → वृक्षौ/वृक्षाः, वापी → वाप्यौ/वाप्यः, पुष्पम् → पुष्पे/पुष्पा ण), प्रश्न ७ म ‘कः क ददा त’ वाक्यरचना और प्रश्न ८ म
लट् लकारे प्रथमपुरुषस्य तीन वचन (करो त–कुरुतः–कुव न्त)।
योग्यता वस्तरः तथा प र शष्टम् (पृष्ठ 167–168)। एक मनोरञ्जक प्रहे लका — ‘वृक्षाग्रवासी न च प क्षराजः…’ जसका
उत्तर ना रकेलः (ना रयल) है; फर प रयोजनाकायम्; और पुस्तक के अन्त म प र शष्टम् — आगच्छन्तु! संस्कृतेन संभाषणं
कुमः, जसम दै नक संभाषण के वाक्य तथा मुख्य क्रयापद क सूची है।
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शब्दः हन्द ENGLISH
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For the sake of others
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पराथाय अन्येषाम् उपकाराय दूसर के उपकार के लए
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सत्पुरुषाः सज्जनाः सज्जन लोग Noble men
वापी दीिघका Stepwell
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ह्रदः सरोवरः तालाब / झील Pond / Lake
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वरम् ेष्ठम् ेष्ठ Best
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अ थनः पाप्तुम ् इच्छु क ाः प्राप्त करने के इच्छु क Wishing to receive
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वह न्त पवहिन्त Flows
वल्कलम् वृक्षस्य त्वक् agl पेड़ क छाल Bark of tree
दारु भः काष्ठै ः लक ड़य से By wood
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महीरुहाः वृक्षाः पेड़ Trees
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अम्भः जलम् पानी Water
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वा रवाहाः मेघ ाः बादल Clouds
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समृ द्धयाँ Prosperity
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