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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: पृथ्वी — हम सबका घर
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — हमारा अ त संसार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
161 – 176 17 33 हन्द
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 5 · हमारे चार ओर क दु नया · हमारा अ त सं सार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: पृथ्वी — हम सबका घर
हमारा अद्भत संसार का अध्याय 10 इस पुस्तक का अं तम अध्याय है और यह इकाई 5 हमारा अ त ग्रह को पूरा करता है। अध्याय एक अंत रक्ष यात्री
क दृ ष्ट से आरंभ होता है — अंत रक्ष से पृथ्वी पूरी तरह एक दखाई दे ती है, उस पर कोई सीमा खची हुई नह दखती। इसके बाद यात्रा करती
वस्तुओं क छह स ी कहा नयाँ आती ह — रूस और मंगो लया से आने वाले प्रवासी पक्षी, भारत से वश्व तक पहुँचा योग, द क्षण अमे रका से आई
मच, भारत से गई शक्कर, मै क्सको से आया गदा और ब्राजील पहुँच भारतीय गाय। अंत म परस्पर जुड़ा हुआ जीवन और पृथ्वी एक प रवार —
भारत क प्राचीन कहावत वसुधैव कुटु म्बकम्। अध्याय म पाँच क्रमां कत ग त व धयाँ, सात ल खए बक्से, दो चचा क जए बक्से तथा अंत म
आइए वचार कर के 3 प्रश्न ह। अध्याय के अंत म कोई अलग अभ्यास नह है — प्रश्न पूरे अध्याय म फैले हुए ह। पीडीएफ़ के वषय म एक बात:
फ़ाइल म 24 पृष्ठ ह, परंतु अध्याय मु द्रत पृष्ठ 176 पर समाप्त हो जाता है। अं तम आठ पृष्ठ अध्याय क सामग्री नह ह और उनम कोई शब्दावली नह
है — वे पुस्तक के अंत क ऋतु-प त्रका (पाँच वषय और चार सत्र वाली खाली प्रकृ त-डायरी) तथा उसके बाद टप्पणी के दो पं क्तबद्ध पृष्ठ ह,
इस लए उनका कोई उत्तर यहाँ नह दया गया है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
हमारा अ त संसार (कक्षा 5) 161 – 176
खं ड प्रश्न
17 33
माध्यम
हन्द
ग त व ध 1 — पृष्ठ 162
नीला ग्रह — इस ग्रह पर मेरा पता
गतवध
प्र.1 1. मेरा पता — नाम ___ मकान संख्या / भवन का नाम ___ गली का नाम ___ गाँव/कस्बा/शहर ___ जला ___
राज्य अथवा कद्र शा सत प्रदे श ___ राष्ट्र ___ ग्रह ___
पं क्तय को सबसे छोटे स्थान से सबसे बड़े स्थान क ओर भ रए और अं तम पं क्त म पृथ्वी ल खए। वही अं तम पं क्त
संसार के हर ब े क एक-सी होगी — और यही कारण है क यह बक्सा यहाँ छापा गया है।
कैसे भर — चरण दर चरण:
1. अपना पूरा नाम वैसे ही ल खए जैसे वद्यालय के र जस्टर म लखा है।
2. मकान संख्या या भवन का नाम ल खए। य द घर पर कोई संख्या न हो तो कोई पहचान ल खए — “पीपल के पेड़ के पास”,
“आँगनवाड़ी के सामने”।
3. अपनी गली या मोहल्ले का नाम ल खए। गाँव म यह टोला भी हो सकता है।
4. अपने गाँव, कस्बे या शहर का नाम ल खए।
5. अपना ज़ला ल खए। संदेह हो तो वद्यालय क कसी सूचना या राशन काड पर दे ख ली जए।
6. अपना राज्य अथवा कद्र शा सत प्रदे श ल खए।
7. अपना राष्ट्र ल खए — भारत।
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8. अपना ग्रह ल खए — पृथ्वी।
नमूना उत्तर — पहली सात पं क्तयाँ आपक अलग ह गी, अं तम पं क्त बलकुल यही रहेगी।
पं क्त नमूना उत्तर यह कतना बड़ा है?
नाम आरव कु मार एक व्य क्त
मकान संख्या / भवन का नाम 14, शांित िनवास एक घर
गली का नाम गांधी माग कुछ सौ लोग
गाँव/कस्बा/शहर रामपुर कुछ हज़ार लोग
जला वाराणसी अनेक गाँव और कस्बे मलाकर
राज्य अथवा कद्र शा सत प्रदे श उत्तर पदे श करोड़ लोग
राष्ट्र भारत 140 करोड़ से अ धक लोग
ग्रह पथ्ृ वी हमें ात हर मनुष्य, हर पशु और हर पौधा
यह बक्सा ‘ग्रह’ पर क्य समाप्त होता है: हर पं क्त अपने से ऊपर वाली पं क्त से अ धक लोग को समेटती है।
अं तम पं क्त तक पहुँचते-पहुँचते उसम सब आ जाते ह — केरल का ब ा, मंगो लया का ब ा, कसान, अंत रक्ष
यात्री, और गाय, नीम का पेड़ तथा गुलाबी मैना भी। उस पं क्त का उत्तर कसी का अलग नह होता। यही इस
अध्याय का मूल वचार है — पहली सात पं क्तयाँ हम अलग बनाती ह, आठव पं क्त हम एक प रवार बनाती है।
क्या आप जानते ह? ड ज पन यही काम छोटे रूप म करता है। यह भारत के छोटे से छोटे स्थान को भी 10 अक्षर
का अपना ड जटल कोड दे ता है — मानो आपके घर या वद्यालय क नाम-प ट्टका। इससे डा कया, एंबुलस या
वतरणकता आपको बड़े शहर म भी और बखरे हुए गाँव म भी शीघ्र ढूँ ढ़ लेते ह।
प्र.2 2. नम्न ल खत का पता लगाने के लए ग्लोब का प्रयोग क जए— (क) क्या पृथ्वी के सभी महासागर आपस म
जुड़े हुए ह?
हाँ, सभी महासागर आपस म जुड़े हुए ह। वे वास्तव म खारे जल का एक ही वशाल भंडार ह, जसे हमने भाग म बाँटकर पाँच
नाम दे दए ह — प्रशांत महासागर, अटलां टक महासागर, हद महासागर, द क्षणी महासागर और आक टक महासागर।
ग्लोब पर स्वयं जाँ चए:
1. भारत के ठ क द क्षण के समुद्र पर उँ गली र खए। यह हद महासागर है।
2. उँ गली को प श्चम क ओर, अ का के द क्षणी सरे के नीचे से सरकाइए। उँ गली उठाइए मत। अब आप अटलां टक महासागर
म ह।
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3. प श्चम और फर द क्षण क ओर, द क्षण अमे रका के नीचे से सरकते जाइए। बीच म कह भू म नह आई। अब आप प्रशांत
महासागर म ह।
4. प श्चम क ओर चलते र हए, जब तक आप ऑस् े लया के नीचे से होकर फर हद महासागर म न आ जाएँ।
5. आपने पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा लया और एक बार भी उँगली जल से नह उठानी पड़ी। यही प्रमाण है क महासागर जुड़े
हुए ह।
पशांत + अटलांिटक + िहंद + दिक्षणी + आक िटक = एक जुड़ा हुआ महासागर
जल पृथ्वी की सतह के लगभग तीन -चौथाई भाग को घेरता है
इस अध्याय म यह क्य महत्वपूण है: जल जुड़ा हुआ है, इस लए मछली, कछु आ या व्हेल कसी सीमा को पार
कए बना एक दे श के तट से दूसरे दे श के तट तक तैर सकते ह। और कसी एक स्थान पर नद म फका गया कचरा
भी उसी जल के साथ बहकर दूर कसी तट पर पहुँच सकता है। जुड़ा हुआ जल एक उपहार भी है और एक चेतावनी
भी — यही सबसे स्पष्ट प्रमाण है क प्रकृ त क कोई सीमा नह होती।
ध्यान से दे खए: ग्लोब का नीला रंग एक-सा नह है। हल्का नीला प्रायः तट के पास का उथला जल दशाता है और
गहरा नीला खुला, गहरा महासागर। भारत के चार ओर हल्के नीले रंग क पट्ट ढूँ ढ़ए — वह हमारी मछली पकड़ने
वाली नाव जाती ह।
प्र.3 2. नम्न ल खत का पता लगाने के लए ग्लोब का प्रयोग क जए— (ख) ग्लोब पर भारत कहाँ स्थत है?
भारत ए शया के द क्षणी भाग म, हद महासागर के उत्तर म स्थत है। ग्लोब घुमाकर ए शया का वशाल भू-भाग ढूँ ढ़ए। भारत
उससे नीचे क ओर लटकते हुए एक चौड़े त्रभुज जैसा दखता है जसका नुक ला सरा समुद्र क ओर है।
पाँच चरण म ढूँ ढ़ए:
1. भूमध्य रेखा ढूँ ढ़ए — वह रेखा जो ग्लोब के ठ क बीच से चार ओर खची है। भारत उससे ऊपर, अथात् उत्तरी भाग म है।
2. ग्लोब का सबसे बड़ा भू-भाग ढूँ ढ़ए। वह ए शया है।
3. ए शया के द क्षणी कनारे पर समुद्र म उतरता हुआ चौड़ा त्रभुज दे खए। वही भारत है।
4. उसके ऊपरी कनारे पर बने पवत दे खए — वे हमालय ह।
5. अब चार ओर का जल दे खए। भारत के प श्चम म अरब सागर है, पूव म बंगाल क खाड़ी और नुक ले सरे के नीचे हद
महासागर।
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर
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भारत से दशा ग्लोब पर क्या दखेगा
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िहमालय, और उसके आगे चीन, नेपाल तथा भूटान
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प श्चम
a पािकस्तान, अरब सागर और उससे आगे अरब दे श
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पूव बांग्लादे श, म्याँमार और बंगाल की खाड़ ी
ीलंका और उसके आगे खु.लcाoिहंm
द महासागर ag
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द क्षण
दूर उत्तर-प श्चम
ala — जहाँ से हमारे शीतकालीन पक्षी आते है ं
रूस और मंगgोिलया
दिक्षण अमेिरका और मैिक्सको — जहाँ से िमच और गेंदा आए
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पृथ्वी के दूसरी ओर
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एक बात ध्यान दे ने योग्य: भारत वश्व का एकमात्र दे श है जसके नाम पर एक महासागर का नाम है। यह संयोग
नहeहैm। हज़ार वष तक उसी महासागर से जहाज़ हमारे मसाले, कपड़ा और शक्कर बाहर ले जाते रहे और खजूर, a g
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a gl न बू तथा बाद म मच यहाँ लाते रहे। ग्लोब पर भारत क स्थ त ही वह कारण है जससे इस अध्याय क इतनी
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कहा नयाँ भारत से होकर गुज़रती ह।
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शक्षक आपको ये भी दखा सकते ह: मै क्सको, पुतगाल, द क्षण अमे रका, ब्राजील, रूस और मंगो लया। हर
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कहानी पढ़ते समय उस दे श को ग्लोब पर ढूँ ढ़ए और वहाँ कागज़ क एक छोट झंडी लगा द जए। अध्याय समाप्त
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होते-होते आपका ग्लोब झं डय से भर जाएगा।
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semप्रश्न — पृष्ठ 164
la 1— प्रवासी पक्षी
पाठ्य
agकहानी
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क्या आपने कभी बड़े समूह म काले और cगुo g l a
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प्र.1 ाबी पक्षी दे खे ह?
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य द आपने आकाश म छोटे प क्षय का ऐसा वशाल झुंड दे खा है जो धुए ँ के बादल क तरह एक साथ मुड़ता-घूमता है, तो
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संभवतः आपने गुलाबी मैना ही दे खी है। ये अकेली लगभग कभी दखाई नह दे त । ये सैकड़ या हज़ार के झुंड म यात्रा करती ह,
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खाती ह और रात को साथ बसेरा करती ह।
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क्या-क्या
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agl रंग। वयस्क गुलाबी मैना का शरीर गुलाबी तथा सर, पंख और पूँछ काले होते ह। छोटे पक्षी कह अ धक साधारण होते ह —
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भूरे और हल्के पीले, ठ क वैसे ही जैसा पक्षी पृष्ठ 164 पर बना है। इस लए पूरा झुंड गुलाबी नह दखता।
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आकार। लगभग आम मैना जतना, जससे इसका नकट का संबंध है। च च नुक ली और पीली-गुलाबी, सर पर छोट -सी
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कलगी।
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झुंड। पृष्ठ 164 का छाया चत्र यही दखाता है — हरे खेत के ऊपर हज़ार पक्षी, इतने पास-पास क पूरा झुंड हवा म उड़ेले गए
एक ही गहरे आकार जैसा लगता है।
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आवाज़। सूयास्त के समय कसी पेड़ से आती तेज़, चहचहाती, च -च जैसी आवाज़, जब सारा झुंड एक साथ सोने बैठता है।
ऋतु। सद । ये लगभग अक्तूबर म आती ह और माच-अप्रैल तक लौट जाती ह।
ये इतने बड़े झुंड म क्य उड़ती ह: अकेले छोटे पक्षी को बाज़ सरलता से पकड़ लेता है। परंतु हज़ार पक्षी एक साथ
मुड़ते-घूमते ह तो बाज़ भ्र मत हो जाता है — वह कसी एक पक्षी पर दृ ष्ट टका ही नह पाता। झुंड भोजन ढूँ ढ़ने म
भी सहायक है — जैसे ही एक पक्षी ट से भरे खेत पर उतरता है, शेष भी तुरंत उतर आते ह। साथ उड़ना ही वह
उपाय है जससे एक छोटा और कमज़ोर पक्षी स्वयं को सुर क्षत और भरपेट रखता है।
जाकर दे खए: स दय म सूयास्त से ठ क पहले खेत के पास के कसी बड़े पेड़ को दे खए। य द वह पेड़ अचानक
शोर से भर जाए और चार दशाओं से पक्षी उसम आते ही जाएँ, तो आपने बसेरा ढूँ ढ़ लया। चुपचाप खड़े होकर
ग नए क पक्षी कतनी दे र तक आते रहते ह।
प्र.2 क्या यह आश्चयजनक नह है क ये छोटे -छोटे से पक्षी इतनी लंबी यात्रा करते ह और इतने सहायक होते ह?
हाँ — और इस वाक्य के दोन भाग पर अलग-अलग सोचना चा हए। यात्रा आश्चयजनक है क्य क पक्षी इतना छोटा है।
सहायता आश्चयजनक है क्य क पक्षी हमारी सहायता करने के लए आता ही नह ।
1. यात्रा। गुलाबी मैना का भार बस्कुट के एक छोटे पैकेट से भी कम होता है। फर भी हर शरद ऋतु म वह रूस के द क्षणी भाग
और मंगो लया से मध्य ए शया पार करती हुई भारत आती है — कई हज़ार कलोमीटर — और हर वसंत म उतनी ही दूर लौट जाती
है। उसे कोई मान चत्र नह दे ता। न इंजन, न ईंधन, न लंबे वश्राम क सु वधा। यह सब वह अपने दो पंख के बल पर करती है।
2. सहायता। भारत म वह ट े- ट य तथा क ड़ -मकौड़ को खाती है। ये क ट गे ँ, ज्वार, बाजरा और घास को चट कर जाते
ह। इस लए खेत पर उतरता इनका झुंड कसान के लए मुफ़्त म आई क ट-नाशक सेना जैसा है। पक्षी तो केवल अपना भोजन ढूँ ढ़
रहे ह — पर उनका भोजन ही कसान का शत्रु है।
पक्षी को भारत से क्या मलता है भारत को पक्षी से क्या मलता है
जब उसका अपना दे श जमा हुआ रहता है तब गम मौसम फ़ सल के कीटों का भारी संख्या में समाप्त होना
भरपूर क ट और अनाज गेहू,ँ ज्वार और बाजरा को कम क्षित
बसेरे के लए बड़े, सुर क्षत पेड़ कीट मारने के िलए कम िवष खरीदने की आवश्यकता
असली सीख: यह कसी ने योजना बनाकर नह कया। न पक्षी ने कसान क सहायता का नश्चय कया, न
कसान ने पक्षी को बुलाया। यह इस लए चलता है क्य क जीव एक-दूसरे पर ऐसे-ऐसे ढं ग से नभर ह जनका उन्ह
स्वयं भी पता नह होता। अध्याय इसी को परस्पर जुड़ा हुआ जीवन कहता है — एक धागा ख चए और कह दूर
कुछ हल जाता है। और चूँ क यह पक्षी रास्ते म कई दे श पार करता है, इस लए इसे बचाना अकेले भारत का काम
नह है।
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याद रखने योग्य बात: य द जन पेड़ पर ये पक्षी बसेरा करते ह वे काट दए जाएँ, या खेत म ऐसा तेज़ वष
छड़का जाए जो हर क ट मार दे , तो प क्षय के पास न ठहरने का स्थान बचेगा न खाने को कुछ। तब वे आना बंद कर
दगे — और क ट लौट आएँगे। बसेरे का एक पेड़ बचाना छोटा-सा काम है, पर उसका असर बहुत दूर तक जाता है।
ल खए — पृष्ठ 164
कहानी 1— प्रवासी पक्षी
ल खए
प्र.1 1. क्या गुलाबी मैना आपके क्षेत्र म आती है? इसे आपक स्थानीय भाषा म क्या कहते ह?
अनुमान मत लगाइए — पूछकर पता क जए। गुलाबी मैना स दय म भारत के अ धकांश भाग म आती है, परंतु कुछ स्थान पर
बहुत अ धक और कुछ म कम। इस लए स ा उत्तर वही है जो आपको अपने आस-पास के कसान, कसी बुजग या पक्षी दे खने
वाले से मले।
कैसे पता क जए:
1. पृष्ठ 164 का चत्र घर के कसी बड़े को या कसी कसान को दखाइए और पू छए, “क्या यह पक्षी यहाँ आता है? कब आता
है?”
2. पू छए क आपक अपनी भाषा म इसे क्या कहते ह। कसान प्रायः इसका नाम जानते ह, क्य क वे इसे खेत म दे खते ह।
3. लगभग अक्तूबर से माच के बीच स्वयं दे खए — खेत के पास, फूल से लदे पेड़ पर, और सूयास्त के समय कसी बड़े पेड़ पर।
4. तीन बात ल खए — स्थानीय नाम, कन महीन म दखती है, और आपने कहाँ दे खा।
नमूना उत्तर: हाँ, गुलाबी मैना हमारे क्षेत्र म हर सद म आती है। यह अक्तूबर के अंत म दखने लगती है और माच तक रहती है। हम
इसे ज्वार के खेत के ऊपर और नहर के पास के सेमल के पेड़ पर बड़े झुंड म दे खते ह। हमारी भाषा म लोग इसे त लयर कहते ह;
मेरी दाद इसे गुलाबी मैना भी कहती ह।
क्या लखना है नमूना
क्या यह यहाँ आती हाँ — हर सद में, बड़ े झुंडों में
है?
कब? लगभग अक्तूबर से माच तक
कहाँ दखती है? खेतों के ऊपर, फू लों वाले पेड़ों पर, और सूय स्त के समय बड़ े पेड़ पर बसे रा करते हुए
स्थानीय नाम उत्तर भारत के अनेक भागों में ितिलयर ; पाठ पुस्तक में ग ुलाबी मैना या ग ुलाबी सािरका ; महारा के कु छ भागों में भोरडी
य द यहाँ नह आती यह बात सच्चाई से िलिखए, और कोई दू सरा शीतकालीन अितिथ पक्षी िलिखए जो सचमुच आता है — बत्तख, सारस,
खंजन या राजहंस
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स्थानीय नाम क्य पूछा गया है: अपनी भाषा म कसी पक्षी का नाम होना इस बात का प्रमाण है क आपके आस-
पास के लोग उसे बहुत लंबे समय से जानते ह। वै ा नक उसे कुछ कहते ह, आपका गाँव कुछ और, और हद क
पुस्तक गुलाबी मैना। तीन नाम एक ही पक्षी के ह। स्थानीय नाम इक ा करना उस ान को बचाने का छोटा-सा उपाय
है जो धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है।
सच ल खए: य द आपके क्षेत्र म कसी ने इसे नह दे खा तो ल खए — “मुझे ऐसा कोई नह मला जसने इसे यहाँ
दे खा हो।” यह पूरी तरह उ चत उत्तर है और सच है। बनावट उत्तर से कुछ नह सीखा जाता।
प्र.2 2. यह कहानी प्रकृ त के वषय म क्या बताती है?
यह बताती है क प्रकृ त एक जुड़ी हुई इकाई है और वह मनुष्य ारा ख ची गई सीमाओं को नह मानती। मंगो लया म जन्मा
पक्षी भारतीय कसान का खेत बचाता है, और दोन कभी एक-दूसरे से मलते तक नह ।
कहानी क चार सीख:
1. प्रकृ त क कोई सीमा नह होती। पक्षी को पासपोट नह चा हए। वह एक ही यात्रा म कई दे श पार कर जाता है, क्य क वायु
और भू म नरंतर ह।
2. जीव एक-दूसरे पर नभर ह। पक्षी को भारत क गम सद और क ट चा हए। कसान क फ़सल को पक्षी चा हए। क ट, पक्षी,
फ़सल और कसान — एक ही ंखला क चार क ड़याँ ह।
3. छोटा जीव भी बड़ा काम कर सकता है। हथेली म समा जाने वाला पक्षी एक महा प पार करता है और खेत क रक्षा करता
है। आकार और महत्व एक बात नह ह।
4. दे खभाल भी साझा करनी होगी। पक्षी का ग्रीष्म-घर दूसरे दे श म है, शीत-घर यहाँ है और बीच म कई स्थान पर वह रुकता है।
इनम से एक भी स्थान नष्ट हो जाए तो पक्षी सब जगह से लुप्त हो जाएगा। इस लए कोई एक दे श अकेले उसे नह बचा सकता।
एक शृंखला, चार किड़याँ — और तीसरी कड़ी मंगोिलया से उड़कर आती है
घास और िट े फ़सल गुलाबी मैना फ़सल
फ़सल उगती है खाते है ं िट े खाती है बचती है
पक्षी हटा दीिजए तो दूसरी कड़ ी बेकाबू हो जाएगी।
पक्षी खेत का अ त थ नह है। वह इस बात का हस्सा है क खेत चलता कैसे है।
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एक वाक्य म: प्रकृ त दे श म नह , काम म बँट है, और हर जीव उनम से कोई एक काम कर रहा है। भारत म
गुलाबी मैना का काम है उन क ट को खाना जो हमारा अन्न खाते ह — और यह काम वह हर सद म, बना कहे,
बना कसी शुल्क के करती है।
ग त व ध 2 — पृष्ठ 165
कहानी 1— प्रवासी पक्षी
गतवध
प्र.1 1. आप अपने क्षेत्र म आने वाले पाँच प क्षय का पोस्टर बनाइए। यह जानने का प्रयास क जए क वे कहाँ से
आते ह।
ऐसे पाँच पक्षी चु नए जो सचमुच स दय म भारत आते ह, हर एक का चत्र बनाइए या चपकाइए, और नीचे ल खए क
वह कहाँ से आता है। ठ क से बनाया गया पाँच प क्षय का पोस्टर पुस्तक से नकल कए पंद्रह नाम से कह अच्छा है।
कैसे बनाएँ:
1. एक चाट पेपर ली जए और ऊपर शीषक के लए एक पट्ट छोड़कर उसे पाँच बराबर खान म बाँ टए।
2. शीषक ल खए — “हमारे शीतकालीन अ त थ”, और नीचे अपनी कक्षा तथा वष ल खए।
3. हर खाने म पक्षी का चत्र बनाइए या पुराने समाचार-पत्र या प त्रका से काटकर चपकाइए।
4. हर पक्षी के नीचे चार छोट पं क्तयाँ ल खए — नाम, स्थानीय नाम, कहाँ से आता है, यहाँ कहाँ दखता है।
5. हर खाने म एक छोटा तीर बनाइए जो उस दशा क ओर हो जहाँ से पक्षी आता है। हमारे अ धकांश शीतकालीन पक्षी उत्तर से
आते ह।
6. पूरा करने से पहले कसी कसान, मछु आरे या पक्षी दे खने वाले से पूछ ली जए और जो ग़लत हो उसे सुधार ली जए।
नमूना पोस्टर — स दय म भारत आने वाले पाँच पक्षी
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पक्षी कहाँ से आता है भारत म कहाँ दख सकता है ध्यान दे ने योग्य बात
mरूस का दिक्षणी भाग, l a se
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गुलाबी मैना खेत के ऊपर, फूल वाले पेड़ पर, वशाल झुंड जो आकाश म मुड़ता-
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( त लयर) सूयास्त के समय बड़े पेड़ पर बसेरा मता
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दे श करते हुए
पट्ट-शीष हंस मंगोिलया और मध्य एिशया उत्तर और मध्य भारत क झील तथा सर के पीछे दो गहरी प ट्टयाँ। यह
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(बार-हेडेड गूज़) न दय के रेतीले कनारे हमालय के ऊपर से उड़कर आता है
मध्य एिशया और मंगोिलया a em का ख चन गाँव, तथा गुजरात-
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agl राजस्थान के खेत
कुरजाँ (डेमोइज़ेल ख चन के ग्रामीण हर सद क सुबह
सारस) इन्ह अनाज खलाते ह
स खपर (नॉदन साइबेिरया और मध्य एिशया लगभग पूरे भारत के तालाब, ताल और
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नर क पूँछ लंबी, पतली और नुक ली
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पनटे ल बत्तख) झील होती है
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अमूर बाज़ (अमूर नागालड का दोयांग — अ का जाते
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फ़ाल्कन) समय यह वह रुकता है शकार करते थे, अब उसक रक्षा
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यह पता करना क्य ज़रूरी है क वे कहाँ से आते ह: पक्षी का घर केवल वह नह है जहाँ आप उसे दे खते ह।
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आपके गाँव के तालाब पर तैरती यह बत्तख संभवतः साइबे रया म जन्मी थी। यह बात दे खने भर से नह पता चलती
a l पता चल जाए तो वद्यालय के पीछे का तालाब केवल तालाब नह रह
— इसे पता करना पड़ता है। और एकgबार
जाता। वह हज़ार कलोमीटर दूर से आरंभ हुई एक यात्रा का अं तम पड़ाव बन जाता है।
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बनाने से पहले पू छए: हर स्थान क अपनी सूची होती है। समुद्र तट पर राजहंस और गंगा- चल्ली जुड़ सकते ह;
परgवे पक्षी लगाइए जो आपके क्षेत्र म
बड़ी.cझील के पास हंसावर और सारंग; पहाड़ म कस्तूरा और थर थरा। पोस्टर a
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aseसचमुच आते ह।
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2. एक धागे क सहायता से गुलाबी मैना क यात्रा को ग्लोब पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक दशाइए। इनक
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रूस या मंगो लया से भारत तक
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धागे का एक सरा रूस के द क्षणी भाग और मंगो लया पर लगाइए और दूसरा सरा भारत
s e mतक लाइए। धागे को ग्लोब से
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सटाकर omर खए और आप देखगे क माग मध्य ए शया से होते हुए द क्षण-प श्चम क ओर
a g lमुaड़ता है और भारत म उत्तर-प श्चम से प्रवेश
as emकरता है।
agl कैसे कर:
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1. लगभग 40 सट मीटर लंबा मोटा रंगीन ऊन का धागा ली जए। रंगीन ऊन सादे धागे से कह स्पष्ट दखता है।
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2. ग्लोब पर मंगो लया और रूस का द क्षणी भाग ढूँ ढ़ए। धागे का एक सरा वहाँ टे प या थोड़ी-सी मट्ट से चपका द जए।
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3. धागे को नीचे और बाईं ओर, मध्य ए शया से होकर लाइए — कज़ा कस्तान, उज़्बे कस्तान, अफ़ग़ा नस्तान।
ag श्चमी भारत — राजस्थान और गुजरात — तक लाइए।
4. फर उसे पवत के ऊपर से उत्तर-प
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5. दूसरा सरा वहाँ चपका द जए। अब वहाँ से एक छोटा धागा शेष भारत तक फैलाइए, क्य क पहुँचने के बाद झुंड पूरे दे श म
बखर जाते ह।
6. पीछे हटकर दे खए और बताइए क धागे ने कतने दे श पार कए।
दिक्षणी रूस · मंगोिलया
गीष्म-घर — यहाँ घोंसले बनते है ं
हर शरद मे ं दिक्षण की ओर
मध्य एिशया के ऊपर से
वसंत मे ं वापसी
पवतों को पार करते हुए
भारत — शीत-घर
माग का सरल रूप। ग्लोब पर यही यात्रा कई दे श के ऊपर से द क्षण-प श्चम क ओर मुड़ती है।
धागा क्या दखाता है उसका अथ
धागा लंबा है एक ओर की यात्रा कई हज़ ार िकलोमीटर की है — लगभग 4,000 से 5,000 िकलोमीटर
वह कई दे श पार करता है पक्षी ऐसे दे शों के ऊपर से उड़ ता है जहाँ अलग भाषा और अलग मुदा है। उसे इनमें से कु छ भी पता नहीं
चलता
वह ऊँचे पवत के ऊपर से जाता रास्ते में ठं डी, िवरल हवा और तेज़ हवाओं का सामना करना पड़ ता है
है
वही धागा दोन ओर काम आता शरद में वे दिक्षण आते है ं और वसंत में लगभग उसी माग से उत्तर लौट जाते है ं
है
सपाट मान चत्र क रेखा से ग्लोब का धागा बेहतर क्य है: पृथ्वी गद जैसी है। सपाट मान चत्र पर ऊपर क दू रयाँ
खचकर ग़लत हो जाती ह। ग्लोब पर रखा धागा पृथ्वी क असली गोलाई पर चलता है, इस लए वह असली माग और
असली दूरी दखाता है। इसी लए ना वक और वायुयान-चालक सदा ग्लोब का प्रयोग करते आए ह।
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यह भी क जए: दूसरे रंग के धागे से मच क यात्रा द क्षण अमे रका से भारत तक दशाइए (ग त व ध 3)। अब
आपके पास एक धागा भीतर आता हुआ और एक बाहर जाता हुआ होगा — यही ग त व ध 5 के मान चत्र क
शुरुआत है।
प्र.3 3. कल्पना क जए क आप एक पक्षी ह जो वश्व क यात्रा कर रहे ह। एक छोटा-सा पोस्टकाड या संदेश ल खए
जसम आप यह बताएँगे क रास्ते म आपने क्या-क्या दे खा है और यात्रा के दौरान आपक कौन-कौन सहायता
करता है (हवा, समुद्र धाराएँ, गम मौसम)। इसे अपने सा थय के साथ भी साझा क जए।
इसे पक्षी क अपनी जबानी ल खए और कम से कम तीन सहायक का उल्लेख क जए — हवा, गम मौसम, और वे स्थान
जहाँ आप व ाम तथा भोजन के लए रुकते ह। इसे छोटा र खए — पोस्टकाड म स्थान बहुत कम होता है।
अ े पोस्टकाड म क्या होना चा हए:
1. आप कहाँ से चले और कहाँ जा रहे ह।
2. रास्ते म दे खी दो-तीन बात।
3. कसने सहायता क — पीछे से चलती हवा, गम हवा, समुद्र, पीने के लए झील, क ड़ से भरा खेत, सोने के लए ऊँचा पेड़।
4. क्या क ठन रहा — ठं ड, तूफ़ान, थकान, भूख, शकारी, या पाटा जा चुका कोई तालाब।
5. अपनी भावना क एक पं क्त।
नमूना उत्तर
पोस्टकाड
कक्षा 5 के प्यारे मत्रो,
म एक गुलाबी मैना ँ। छह दन पहले म अपने लगभग चार सौ भाई-बहन के साथ मंगो लया से चली, क्य क वहाँ क घास भूरी पड़ चुक थी
और रात जमने लगी थ ।
पहले दन हमने एक पीला-भूरा मरुस्थल पार कया जहाँ कह पानी नह था। तीसरे दन एक चौड़ी झील मली और हमने च च दुखने तक पानी
पया। कल हमने बफ़ से ढके पवत पार कए। ऊपर क हवा इतनी पतली और ठं डी थी क हम गम रहने के लए एक कसे हुए गोले क तरह उड़े।
तीन चीज़ मेरी सहायता कर रही ह। पीछे से तेज़ हवा धकेल रही है, इस लए म पंख कम फड़फड़ाकर तैरती-सी चल रही ँ। द क्षण बढ़ने के साथ
हर दन हवा गम होती जा रही है। और रास्ते म खेत और झील ह जहाँ हम रुक पाते ह — उनके बना यह यात्रा हो ही नह सकती थी।
कल हम भारत पहुँच जाएँगे। वहाँ ट से भरे ज्वार के खेत ह गे, गुनगुनी धूप होगी, और एक बड़ा पीपल का पेड़ होगा जहाँ सारा झुंड सूयास्त के
समय शोर मचाते हुए सोएगा।
कृपया उस पेड़ को खड़ा रहने द जए। पूरी सद वही मेरा घर है।
थके हुए पंख स हत आपक ,
गुलाबी
सेवा म: कक्षा 5, राजकीय पाथिमक िव ालय, रामपुर, भारत, गह — पथ्ृ वी
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पक्षी बनकर लखना इतना अ ा क्य काम करता है: जैसे ही आप “म” कहते ह, आपको सोचना पड़ता है क
यह यात्रा वास्तव म कैसी लगती होगी — ठं ड, भूख, हवा, डर। केवल पढ़े हुए तथ्य भूल जाते ह। भीतर से महसूस
कए गए तथ्य ठहर जाते ह। और पते क अं तम पं क्त दे खए — पक्षी के पोस्टकाड पर भी वही लखा है — ग्रह,
पृथ्वी।
साझा करते समय: कक्षा म चार-पाँच पोस्टकाड पढ़वाइए और फर एक प्रश्न पू छए — “सबसे अ धक लोग ने
कस सहायक का नाम लखा?” लगभग सब हवा लखगे। और यही सच भी है — पीछे से चलती हवा के साथ उड़ना
पक्षी क बहुत बड़ी श क्त बचाता है।
ल खए — पृष्ठ 165
‘प्रकृ त क कोई सीमा नह होती’
ल खए
प्र.1 ‘प्रकृ त क कोई सीमा नह होती’ इस कथन से आप क्या समझते ह?
इसका अथ है क दे श के बीच मनुष्य ारा ख ची गई रेखाएँ केवल मान चत्र और कागज़ पर ह। प्रकृ त उन्ह जानती ही
नह और उन पर रुकती भी नह । वायु, बादल, वषा, न दयाँ, बीज, पक्षी, मछ लयाँ और तत लयाँ — सब पूरे वश्व म स्वतंत्र रूप
से आते-जाते ह।
दे खए वास्तव म क्या-क्या सीमा पार करता है:
क्या पार करता है एक उदाहरण जसे आप जाँच सकते ह
वायु और हवा हमारे यहाँ वष लाने वाली मानसूनी हवा भारत से बहुत दू र, समुद के ऊपर बनती है
बादल और वषा बंगाल की खाड़ ी पर बना बादल सै कड़ ों िकलोमीटर दू र असम में बरस जाता है
न दयाँ निदयाँ एक भूिम पर िनकलती है,ं दू सरी से बहती है ं और िकसी तीसरी में जाकर समुद से िमलती है ं
पक्षी गुल ाबी मैना हर सद में रूस और मंगोिलया से भारत आती है
मछ लयाँ और समुद्र जीव सभी महासागर जुड़े है,ं इसिलए कछु आ एक दे श के तट से दू सरे दे श के तट तक तैर सकता है
बीज और पौधे दिक्षण अमेिरका की िमच और मैिक्सको का गेंदा आज पूरे भारत में उगते है ं
धूल और धुआँ दू र के मरुस्थल से उड़ ी धूल हमारे शहरों पर जम जाती है
और इस कथन का दूसरा भाग, जो अ धक महत्वपूण है:
1. प्रकृ त साझा है, इस लए उसका लाभ साझा है — वषा, पक्षी, बीज, स्वच्छ वायु, नए खाद्य पदाथ।
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2. प्रकृ त साझा है, इस लए हा न भी साझा है। एक स्थान पर वायु म छोड़ा गया धुआँ वह नह रुकता। नद म फका कचरा बहकर
समुद्र तक चला जाता है।
3. अतः वायु, जल और जीव क दे खभाल कसी एक दे श का काम नह हो सकता। यह सबका काम है।
अध्याय के आरंभ म अंत रक्ष यात्री के शब्द क्य दए गए ह: ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने कहा क बाहर से दे खने
पर पृथ्वी पूरी तरह एक दखती है — कोई सीमा दखाई ही नह दे ती। वे कोई इच्छा नह जता रहे थे; वे बता रहे थे
क उन्ह क्या दख रहा था। सीमाएँ पासपोट और डाकघर के लए सच ह। जस हवा म आप इस समय साँस ले रहे ह,
उसके लए वे सच नह ह — वह हवा सप्ताह भर पहले कसी और दे श के ऊपर थी।
कक्षा म यह क जए: सबसे क हए क पाँच सेकंड तक साँस रोक, फर छोड़ द। अब क हए — यह हवा अब कमरे
से नकलकर खड़क से बाहर, कस्बे के ऊपर से होती हुई दूर जा रही है। इसे न कोई वापस बुला सकता है, न कोई
इसका स्वामी है। ‘प्रकृ त क कोई सीमा नह होती’ का अथ एक साँस म इतना ही है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 166
कहानी 2 — योग — वश्व को भारत का उपहार!
प्र.1 क्या आप जानते ह क भारत म 3000 से भी अ धक वष से योगाभ्यास कया जा रहा है?
हाँ — योग 3000 वष से भी अ धक पुराना है, अथात् भारत के लोग यह अभ्यास तब से कर रहे ह जब आज के अ धकांश
भवन, भाषाएँ और दे श बने भी नह थे। इसे व्यायाम के रूप म नह बनाया गया था। यह शरीर को स्वस्थ रखने, मन को शांत
रखने और स्वयं तथा प्रकृ त के साथ सामंजस्य बनाए रखने का माध्यम था।
3000 वष कतने होते ह, यह ऐसे सम झए:
1. आपक आयु लगभग 10 वष है।
2. आपके दादा-दाद क आयु शायद 65 या 70 वष है।
3. तीन हज़ार वष लगभग सौ दादा-दाद , एक के बाद एक, के बराबर ह।
4. इन सौ पी ढ़य म हर बार इसी भू म पर कोई न कोई पालथी मारकर बैठता था, धीरे-धीरे साँस लेता था, और यह अभ्यास अगली
पीढ़ को स प दे ता था।
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भारत म क्या बहुत पुराना है लगभग कतना पुराना
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योग
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3000 वष से अिधक
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आयुवद, च कत्सा क सबसे प्राचीन पद्ध तय म से एक वष से अिधक
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3000
गन्ने के रस से गुड़ बनाना बहुत पाचीन — भारत ने इसे सवपथम खोजा
com पाचीन भारत; िफर यह िवचार पूरे िवश्व में फै ला
शून्य को लखना
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भारतीय भोजन म मच
a के वल लगभग 400 से 500 वष
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अं तम पं क्त पर ठहरकर सो चए: योग 3000 वष से अ धक पुराना है। मच भारत म लगभग 450 वष पुरानी है।
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अथात् जो अभ्यास हमने वश्व को दया, वह उस भोजन से कह अ धक पुराना है जो हम पूरी तरह भारतीय लगता
है। चीज़.cनरंतर बाहर जाती ह और भीतर आती ह — और कुछ सौ वष बाद यह बता
a gपाना क ठन हो जाता है क
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se कौन थी। यही इस अध्याय का मूल वचार है।
aकौन-सी
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क्या आप जानते ह? संयुक्त राष्ट्र ने 2014 म 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दवस घो षत कया। उस एक दन
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वश्वभर म करोड़ लोग एक साथ योग करते ह —mउद्यान म, समुद्र तट पर, वद्यालय के मैदान म और कायालय
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क छत पर।
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चचा क जए — पृष्ठ 167
कहानी 2 —.cयोग — वश्व को भारत का उपहार! a g
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agl चचा क जए
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आपके अनुसार व भन्न दे श म योग के लोक प्रय होने के क्या कारण हो सकते ह?
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प्र.1
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क्य क इसम लगभग कुछ भी नह लगता, इसे लगभग हर कोई कर सकता है, और यह ठ क उन्ह समस्याओं म सहायता
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करता है जो आज के लोग को ह। ये तीन कारण मलकर इसक लोक प्रयता समझाते ह।
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अपने समूह म इन बदुओं पर चचा क जए:
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m1. इसम कोई ख़च नह है। न कोई मशीन, न गद, न कराए का मैदान, न ट म जुटाने क आवश्यकता। एक चटाई और थोड़ी-सी
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ag जगह पयाप्त है। इसे घर म, उद्यान म या छत पर कया जा सकता है।
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2. इसे कोई भी कर सकता है। ब ा, दाद , कसान, प हएदार कुस पर बैठा व्य क्त — हर कोई अपने योग्य भाग कर सकता है।
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युवा, बलवान या तेज़ होना आवश्यक नह ।
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3. यह आज क परेशा नय म काम आता है। आजकल बहुत-से लोग दनभर बैठे रहते ह, पद दे खते रहते ह और ठ क से सो
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नह पाते। योग जकड़े हुए शरीर को खोलता है, कमर और गदन का दद घटाता है, और धीमी साँस च तत मन को शांत करती है।
4. यह शरीर और मन दोन पर काम करता है। अ धकांश व्यायाम केवल शरीर साधते ह। योग स्थर बैठना, धीरे साँस लेना और
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ध्यान दे ना भी सखाता है। लोग इसका मूल्य समझते ह।
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5. भारतीय इसे अपने साथ ले गए। भारत के यात्री, व ान और शक्षक जहाँ भी गए, योग साथ ले गए, और वदे श म बसे
भारतीय इसका अभ्यास करते रहे। पड़ो सय ने दे खा, पूछा और सीख लया।
6. यह सबका है। इसके लए धम, भोजन या भाषा बदलने क आवश्यकता नह । इसी कारण भन्न- भन्न दे श के लोग ने इसे
सरलता से अपना लया।
7. पुस्तक, फ़ल्म और फर इंटरनेट। जस बात को पद पर दे खा जा सके, उसे उसी शाम कसी भी दे श के गाँव म सीखा जा
सकता है।
8. संयुक्त राष्ट्र ने इसे त थ दे द । 2014 से 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दवस है। हर वष एक न श्चत दन, जब करोड़ लोग साथ
योग करते ह, इसने उन लोग तक भी योग पहुँचा दया जन्ह ने कभी इसका नाम नह सुना था।
इसके पीछे का वचार: कोई वस्तु वश्वभर म तभी फैलती है जब वह उपयोगी हो, सस्ती हो और सरलता से
अपनाई जा सके। यह योग पर लागू होता है और मच, कागज़ तथा शून्य पर भी। कसी ने इन्ह कसी पर थोपा
नह । लोग ने आज़माया, अच्छा पाया और आगे बढ़ा दया। परस्पर जुड़ा हुआ जीवन ऐसे ही बढ़ता है।
चचा के लए: समूह से उल्टा प्रश्न भी पू छए — “ कसी और दे श क ऐसी कौन-सी बात है जो हमने अपना ली है?”
उत्तर म फ़टबॉल, बैड मटन, जन्म दन का केक, नूडल्स और मोमोज़ सुनाई दगे। आवागमन दोन ओर होता है।
ल खए — पृष्ठ 167
कहानी 2 — योग — वश्व को भारत का उपहार!
ल खए
प्र.1 क्या आप कसी योगासन का नाम बता सकते ह जसका अभ्यास आपने कया है अथवा कसी को करते दे खा
है? आपके अनुसार इस योगाभ्यास के क्या लाभ ह?
ऐसे एक आसन का नाम ल खए जो आपने सचमुच कया है या कसी को करते दे खा है, और सीधे-सादे शब्द म बताइए
क वह शरीर या मन के लए क्या करता है। ईमानदारी से बताया गया एक आसन दस नाम क सूची से अ धक मूल्यवान है।
नमूना उत्तर: मने वृक्षासन कया है। इसम एक पैर पर खड़े होकर दूसरे पैर का तलवा जाँघ के भीतरी भाग से लगाते ह और दोन
हाथ शाखाओं क तरह सर के ऊपर जोड़ लेते ह। पहली बार म तुरंत डगमगाकर गर गया था। एक सप्ताह के अभ्यास के बाद म
बीस तक गनते हुए टक पाया। मेरे वचार से यह संतुलन बढ़ाता है और एकाग्रता भी, क्य क जैसे ही मन इधर-उधर भटकता है, म
झुकने लगता ँ।
जन आसन को आपने दे खा होगा — इनम से कोई एक चु नए
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आसन क्या करते ह कसम सहायक है
ताड़ासन पैर मलाकर सीधे तनकर खड़े होना और हाथ ऊपर उठाना सीधे खड़ े होना; अपनी मुदा के पित सजगता
वृक्षासन एक पैर पर खड़े होकर दूसरे का तलवा जाँघ से लगाना, हाथ संतलु न और एकागता
सर के ऊपर
भुजंगासन पेट के बल लेटकर हाथ के बल छाती उठाना, जैसे साँप फन जकड़ ी हुई कमर खुल ती है और छाती फै लती है
उठाता है
सुखासन / पालथी मारकर कमर सीधी रखकर बैठना और धीरे-धीरे साँस िबना िहले -डुले बैठना; मन का शांत होना
प ासन लेना
बालासन घुटन के बल बैठकर आगे झुकना, माथा ज़मीन पर और हाथ आसनों के बीच िव ाम; कमर का िखंचाव कम होता
आगे फैले हुए है
सूय नमस्कार बारह क्रयाओं का एक क्रम, एक के बाद एक पूरे शरीर को गम ता है और साँस चलाता है
शवासन पीठ के बल सीधे लेटकर, आँख बंद करके पूरे शरीर को ढ ला िव ाम; धड़ कन धीमी होती है; इसे सदा अंत में
छोड़ना िकया जाता है
अनुलोम- वलोम एक ना सका से धीरे-धीरे साँस लेना और दूसरी से छोड़ना क्र ोध या घबराहट में मन को शांत करता है
योग केवल व्यायाम क्य नह है: दौड़ या क्रकेट म आप शरीर को जतना हो सके उतना धकेलते ह। योग म आप
धीरे चलते ह, स्थर रुकते ह और अपनी साँस दे खते रहते ह। इस लए यह वह चीज़ सखाता है जो दौड़ नह सखाती
— शांत और स्थर रह पाना। अध्याय कहता है क योग स्वयं और प्रकृ त के साथ सामंजस्य बनाए रखने का
माध्यम था; व्यवहार म इन शब्द का यही अथ है।
दो सावधा नयाँ: योग खाली पेट क जए, और कसी भी खचाव को दद होने तक मत ख चए। आसन म हल्का
तनाव लगना चा हए, चरने जैसा दद नह । हो सके तो आरंभ के कुछ सप्ताह कसी शक्षक से सी खए।
ल खए — पृष्ठ 168
कहानी 3 — मच — एक मसाला जसने हमारा जीवन बदल दया!
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प्र.1 1. क्या होगा य द हमारी रसोई म से मच एक सप्ताह के लए गायब हो जाए?
एक सप्ताह तक भोजन बनता भी रहेगा, पेट भी भरेगा और पौ ष्टक भी रहेगा — पर स्वाद फ का लगेगा और अ धकांश
व्यंजन का लाल रंग चला जाएगा। न कोई बीमार पड़ेगा, न कोई भूखा रहेगा। हम बस वही करगे जो मच के आने से पहले भारत
करता था — काली मच का उपयोग।
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दन-प्र त दन क्या बदलेगा:
1. पहला दन। दाल, सब्ज़ी और सांभर फ के लगगे। सब बार-बार कहगे, “कुछ कमी लग रही है।”
2. दूसरा दन। रंग चला जाएगा। राजमा, छोले, मछली क तरी और अ धकांश ग्रेवी का लाल रंग मच से आता है। वे हल्के भूरे या
पीले दखगे।
3. तीसरा दन। रसोइए तीखापन लाने के लए काली मच, अदरक, लहसुन, राई और ह ग का अ धक उपयोग करने लगगे।
4. सप्ताह के मध्य तक। थाली से अचार, चटनी और पापड़ ग़ायब हो जाएँगे, क्य क लगभग इन सबका मुख्य घटक लाल मच है।
5. पूरे सप्ताह। जन व्यंजन म मच लगती ही नह , उन पर कोई असर नह पड़ेगा — सादा चावल, दही, दूध, सभी मठाइयाँ,
पोहा, उपमा, अ धकांश नाश्ते और बीमार व्य क्त के लए बना भोजन।
6. घर के बाहर। मच उगाने वाले कसान और बेचने वाले व्यापा रय क एक सप्ताह क कमाई चली जाएगी। उनके लए यह
छोट बात नह है।
क्या कम पड़े गा उसके स्थान पर क्या काम आ सकता है
मुँह म तीखापन काली िमच, अदरक, राई, लहसुन
ग्रेवी का लाल रंग टमाटर, चुकंदर, या पीले रंग के िलए थोड़ ी हल्दी
अचार और चटनी ख े -मीठे — आँवला, इमली, गुड़ वाला आम
चाट का चटपटापन अिधक नींब,ू काला नमक और चाट मसाला
इस प्रश्न का असली उ े श्य: मच हम पूरी तरह भारतीय लगती है — पर वह हमारी रसोई म केवल लगभग 400 से
500 वष से है। भारत हज़ार वष तक उसके बना भोजन बनाता रहा और अच्छा ही रहा। इस लए यह सप्ताह
वास्तव म भोजन के वषय म नह है। यह दखाता है क दूर से आई कोई वस्तु कतनी शीघ्र हमारा ऐसा अंग बन
जाती है क हम उसके बना के जीवन क कल्पना ही नह कर पाते।
एक बार आज़माइए: घर म क हए क एक व्यंजन लाल मच के स्थान पर काली मच से बनाया जाए और उसे
सामान्य व्यंजन के साथ च खए। काली मच का तीखापन बाद म आता है और गले म ठहरता है; मच का तीखापन
जीभ पर तुरंत और तीखा लगता है। पुतगाली जहाज़ के आने से पहले भारतीय भोजन का स्वाद ऐसा ही था।
प्र.2 2. अपने माता- पता से ऐसे व्यंजन के नाम पूछकर ल खए जनम लाल मच के स्थान पर काली मच का उपयोग
कया जाता है।
पहले घर म पू छए — हर प रवार म कम से कम एक ऐसा व्यंजन होता है, प्रायः वही जो कसी के अस्वस्थ होने पर बनता
है। फर व्यंजन का नाम, बताने वाले का नाम, और यह ल खए क उसम मच के स्थान पर काली मच क्य डाली जाती है।
नमूना उत्तर: मेरी माँ घर म कसी को सद -जकाम होने पर काली मच का रसम ( मलगु रसम) बनाती ह। इसम काली मच, जीरा,
लहसुन और इमली डालते ह, लाल मच बलकुल नह । वे कहती ह क काली मच छाती को गमाती है और पेट पर मच से हल्क
पड़ती है। मेरी दाद इसी कारण हल्द वाले गम दूध म भी चुटक भर काली मच डालती ह।
ऐसे व्यंजन जनम काली मच चलती है, लाल मच नह
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व्यंजन कहाँ प्रच लत काली मच क्य
काली मच का रसम ( मलगु रसम) त मलनाडु , और अब सब सद -बुखार में बनाया जाता है; काली िमच गम ती है, जलाती नहीं
जगह
बीमार व्य क्त के लए मूँग दाल क पूरे भारत म पेट पर बहुत हल्की होनी चािहए
खचड़ी
काली मच पनीर / पेपर चकन उत्तर भारत, केरल तीखापन िमलता है पर व्यंजन लाल नहीं होता
काढ़ा पूरे भारत म तुल सी, अदरक, शहद के साथ काली िमच — गले की ख़ राश के
िलए
चुटक भर काली मच वाला हल्द दूध पूरे भारत म थोड़ ी काली िमच हल्दी का गुण शरीर तक पहचु ँ ाने में सहायक
मानी जाती है
टमाटर का सूप, उबला अंडा, ू ट सब जगह के वल नमक और काली िमच चािहए; लाल िमच स्वाद िबगाड़ दे गी
चाट
उपमा और दही-चावल (कई घर म) द क्षण भारत हरी िमच या काली िमच डलती है, लाल िमच पाउडर नहीं
काली मच कभी लुप्त क्य नह हुई: काली मच भारत म ही उगती है — मुख्यतः केरल और कनाटक म — और
वह इतनी मूल्यवान थी क व्यापारी उसे ‘काला सोना’ कहते थे और उसे लेने आधी दु नया पार करके आते थे। मच
ने उसक जगह नह ली। मच ने रोज़मरा क रसोई सँभाल ली और काली मच ने वे काम अपने पास रखे जनम वह
सबसे अच्छ है — औष ध वाले व्यंजन, दूध और सूप, तथा हल्का भोजन।
बताने वाले का नाम ल खए: व्यंजन के आगे ल खए — “ पताजी ने बताया”, “कमला चाची ने बताया”। नाम के
साथ लखी व ध केवल गृहकाय नह रह जाती, वह प रवार के इ तहास का छोटा-सा टु कड़ा बन जाती है।
ग त व ध 3 — पृष्ठ 168
कहानी 3 — मच — एक मसाला जसने हमारा जीवन बदल दया!
गतवध
प्र.1 1. रंगीन धागे क सहायता से ग्लोब पर मच क यात्रा को द क्षण अमे रका से भारत तक अं कत क जए।
धागे का एक सरा द क्षण अमे रका पर लगाइए, उसे अटलां टक महासागर पार कराकर पुतगाल तक लाइए, फर अ का
के द क्षणी सरे के नीचे से घुमाकर हद महासागर पार कराते हुए भारत के प श्चमी तट पर लाइए। पूरा होने पर आप दे खगे क
मच ने आधी से अ धक पृथ्वी क यात्रा क ।
कैसे अं कत कर — चरण दर चरण:
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर
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1. लगभग 60 सट मीटर लंबा चटक लाल ऊन का धागा ली जए — लाल, ता क वह पक्षी वाले धागे से अलग पहचाना जा सके।
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2. ग्लोब पर द क्षण अमे रका ढूँ ढ़ए और एक सरा वहाँ लगाइए।
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यह. से आए थे। a
3. धागे को उत्तर-पूव क ओर अटलां टक महासागर पार कराते हुए यूरोप के प श्चमी कनारे पर पुतगाल तक लाइए। मच लाने
वाले यात्रीm
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4. अब उसे अ का के प श्चमी तट के साथ द क्षण क ओर, और अ का के द क्षणी सरे के नीचे से घुमाइए।
5. वहाँ से उत्तर-पूव क ओर हद महासागर पार कराते हुए दूसरा सरा भारत के प श्चमी तट पर लगाइए।
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6. पीछे हटकर दे खए क धागे ने कतना जल पार कया और कतनी कम भू म।
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यात्रा का चरण
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यह क्या बताता है
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द क्षण अमे रका → पुतगाल िमच पहले यूरोप पहचु ँ ी। वह सीधे भारत नहीं आई
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उस समय कोई छोटा माग नहीं था। जहाज़ ों को अफ़ ीका के दिक्षणी िसरेmका.cपूरoा चक्कर लगाना
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पुतगाल → अ का के चार ओर
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हद महासागर पार → भारत का प श्चमी जहाज़ पिश्चमी तट पर उतरते थे, इसीिलए िमच वहीं से भीतर की ओर फै ली
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लगभग पूरा जल -माग, और इसमें महीनों लगते थे। यह 400 से 500 वष पहले की, पालवाले जहाज़ ों
की बात है .com a s
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पूरा माग
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यह माग क्य महत्वपूण है: मच न चलकर भारत आई, न हवा म उड़कर। उसे मनुष्य लाए — बोरी म भरकर,
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लकड़ी के जहाज़ पर, महीन तक। कहानी 1 और कहानी 3 का अंतर यही है। पक्षी स्वयं यात्रा करता है; मच
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इस लए आई क्य क मनुष्य चले, व्यापार कया और बसे। दोन यात्राएँ ह, पर नाव केवल एक को चा हए थी।
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m लगे रहने द जए: पक्षी का धागा और मच का धागा ग्लोब पर एक साथ रहने द जए। एक उत्तर से आता है, a g
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a gl दूसरा प श्चम से। जब मै क्सको से गदा और ब्राजील जाती गाय भी जुड़ जाएँगी, तो ग्लोब स्वयं ग त व ध 5 का उत्तर
बन जाएगा।
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2. आलू, टमाटर, मूँगफली, काजू और अन्य खाद्य पदाथ क भी ऐसी ही कहानी है। इन खाद्य पदाथ ने भारत
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तक पहुँचने के लए एक लंबी यात्रा क है और अब हम अपने प्र त दन के भोजन म इनका आनंद लेते ह। इनम से
कसी एक क कहानी के वषय म पता करके ल खए।
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कोई एक चु नए, उसके वषय म तीन बात पता क जए — वह कहाँ से आया, उसे कौन लाया, और उसने क्या बदला —
और अपने शब्द म छोट -सी कहानी ल खए। नीचे आलू क पूरी नमूना कहानी है और शेष तीन पर छोट टप्प णयाँ, ता क आप
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चुन सक।
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नमूना उत्तर — आलू क कहानी
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agबोली वया कहते ह। वहाँ के कसान हज़ार वष पहले से आलू उगाते आ रहे थे, सैकड़ रंग और
आलू क शुरुआत पंजाब या बहार के कसी खेत से नह हुई। उसक शुरुआत द क्षण अमे रका के ऊँचे, ठं डे पहाड़ म हुई — उन
प्रदे श म जन्ह आज हम पेरू और
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आकार म — बगनी, लाल, पीला और नीला। आलू वहाँ उगता था जहाँ और कुछ मु श्कल से ही उगता, और उसने पूरे-पूरे गाँव का
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पेट भरा।
लगभग पाँच सौ वष पहले स्पेन और पुतगाल के ना वक द क्षण अमे रका पहुँचे और आलू को अपने साथ समुद्र पार यूरोप ले गए।
पहले तो यूरोप के लोग को उस पर भरोसा नह हुआ और वे उसे खाते ही नह थे। धीरे-धीरे उन्ह ने जाना क यह सरलता से उगता
है, दे र तक टकता है और पेट भरता है — और वह यूरोप के सबसे महत्वपूण खाद्य पदाथ म से एक बन गया।
फर लगभग चार सौ वष पहले पुतगाली उसे भारत के प श्चमी तट पर लाए। उसका पुतगाली नाम बटाटा आज भी हमारे यहाँ चलता
है — बटाटा, आलू। पहले उसे पहाड़ म बोया गया, जहाँ ठं डा मौसम उसके अनुकूल था, और फर वह मैदान म फैल गया।
आज वह हर जगह है। आलू के बना न समोसा है, न आलू का पराँठा, न आलू-गोभी, न दम आलू, न चाट, न चप्स का पैकेट। भारत
आज संसार म आलू उगाने वाले बड़े दे श म है। फर भी, य द आप पाँच सौ वष पहले कसी भारतीय रसोई म जाकर आलू माँगते,
तो कोई समझ ही न पाता क आप क्या माँग रहे ह।
शेष तीन पर सं क्षप्त टप्प णयाँ
खाद्य कहाँ से आया कौन लाया भारत म क्या बदला
पदाथ
टमाटर द क्षण अमे रका पुतगाली यात्री, लगभग 400– इससे पहले खटास इमली, अमचूर, कोकम और दही से आती
और मै क्सको 500 वष पूव थी। अब टमाटर लगभग हर तरी में है
मूँगफली द क्षण अमे रका पुतगाली व्यापारी गुजरात, राजस्थान और आंध पदे श की बड़ ी फ़ सल बनी।
मूँगफली का तेल , िचक्की और सिदयों की शाम का नाश्ता िदया
काजू ब्राजील पुतगाली, जन्ह ने इसे गोवा और पेड़ों ने तट की ढीली िम ी को बाँधे रखा। काजू कतली दी और
क कण के तट पर लगाया गोवा, के रल तथा कोंकण में पूरा उ ोग खड़ ा िकया
चार कहा नय म समान क्या है: ये सब लगभग एक ही समय, पुतगाली जहाज़ पर, अमे रका महा प से समुद्र
पार करके आईं। कुछ ही पी ढ़य म ये इतनी सामान्य हो गईं क लोग भूल ही गए क कभी ये नई थ । संस्कृ त ऐसे ही
बढ़ती है — सब कुछ बाहर रखकर नह , ब ल्क जो उपयोगी है उसे भीतर लेकर और अपना बनाकर।
और पता कैसे कर: अपने घर के सबसे बुजग व्य क्त से पू छए क उनके दादा-दाद के समय आलू और टमाटर रोज़
खाए जाते थे या नह । प रवार क पुरानी व धयाँ दे खए। और नाम पर ध्यान द जए — इनम से कई खाद्य पदाथ के
भीतर आज भी वदे शी नाम छपा है, जैसे बटाटा, और वही नाम इस बात का सुराग है क वह कहाँ से आया।
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कहानी 4 — शक्कर क मीठ कहानी!
चचा क जए
प्र.1 1. य द आप वश्व के अन्य दे श के साथ साझा करने के लए कोई एक भारतीय व्यंजन चुनगे तो वह कौन-सा
व्यंजन होगा?
कोई एक व्यंजन चु नए और ऐसा कारण द जए जो व्यंजन के वषय म हो, केवल पसंद के वषय म नह । अच्छा कारण यह
है — बनाना सरल हो, सस्ता हो, सामग्री सब जगह मलती हो, हर तरह के व्य क्त के लए उपयुक्त हो, और स्थानीय स्वाद के
अनुसार बदला जा सके।
नमूना उत्तर: म खचड़ी साझा करूँगा। यह चावल और दाल को एक साथ, थोड़े नमक और हल्द के साथ पकाकर बनती है। इसम
एक बतन, एक चूल्हा और लगभग बीस मनट लगते ह। यह बहुत सस्ती है। यह संपूण भोजन है — चावल और दाल मलकर शरीर
को आवश्यक तत्व दे ते ह। यह नरम होती है, इस लए छोटा ब ा, बुजग और रोगी — तीन खा सकते ह। और भारत का हर भाग
इसे पहले से अलग-अलग ढं ग से बनाता है — गुजरात म स ब्ज़य के साथ, उत्तर भारत म घी और ह ग के साथ, द क्षण म प गल के
रूप म। कोई भी व्य क्त अपने यहाँ क स ब्ज़याँ डाल ले तो भी वह खचड़ी ही रहेगी। इसी लए मुझे लगता है क पूरा वश्व इसे
उपयोगी पाएगा।
जो व्यंजन आप चुन सकते ह चुनने का अ ा कारण
खचड़ी एक बतन, सस्ती, संपूण भोजन, पेट पर हल्की, स्थानीय स्वाद के अनुसार बदली जा सकती है
इडली भाप से बनती है, तेल िबलकु ल नहीं; नरम और हल्की; बच्चों और बुज़गु ं के िलए उपयुक्त
दाल-रोट करोड़ ों भारतीयों का रोज़ का भोजन; सरल , पेट भरने वाला और संतिु लत
आम भारत में सै कड़ ों िकस्में; पहले ही स्वाद में सबको भा जाता है
मोटे अनाज (बाजरा, रागी, ज्वार) बहुत कम जल में, सूखी भूिम पर उगते है ं और स्वास्थ्य के िलए बहुत अच्छे है ं
मसाला चाय गम, सस्ती, अितिथ के साथ बाँटी जाने वाली — यह भारत की अितिथ-सत्कार की आदत साथ ले जाती है
दही िबना मशीन के घर पर दू ध से बन जाता है; शरीर को ठं डक दे ता है और पेट के िलए अच्छा है
कौन-सा भोजन यात्रा करता है: इस अध्याय म जन खाद्य पदाथ ने सचमुच यात्रा क — शक्कर, चावल, आम,
केला, मच, आलू — उन सबको दे खए। हर एक सस्ता, सरलता से उगने या बनने वाला और साधारण लोग के
काम का है। बहुत वशेष और क ठन व्यंजन कम ही दूर तक जाते ह। सरल और उपयोगी व्यंजन ही पूरी दु नया घूम
आते ह।
चचा म: समूह को “क्य क यह स्वा दष्ट है” पर मत रुकने द जए। हर व्य क्त से एक और कारण पू छए — इसे
कौन खा सकता है, इसम कतना ख़च आता है, इसे बनाना कतना क ठन है। इससे केवल पसंद, एक तक म बदल
जाती है।
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प्र.2 2. आपके अनुसार भ वष्य म कौन-से नए खाद्य पदाथ क वश्व म यात्रा करने क संभावना है?
भ वष्य म संभवतः वही खाद्य पदाथ यात्रा करगे जो स्वास्थ्यवधक ह , जन्ह उगाने म बहुत कम जल लगे, और जो लंबी
यात्रा म ख़राब न ह । यही कसौट अपने समय म शक्कर, चावल और मच ने भी पार क थी।
नमूना उत्तर: मेरे वचार से सबसे अ धक यात्रा मोटे अनाज करगे — बाजरा, रागी और ज्वार। ये सूखी भू म पर बहुत कम जल म
उगते ह, स्वास्थ्य के लए बहुत अच्छे ह, और वश्व म जल क भी कमी है तथा पौ ष्टक भोजन क भी। मुझे लगता है क तैयार
भारतीय मसाले और इडली-डोसा का तैयार घोल भी जाएँगे, क्य क उनसे दूसरे दे श का व्य क्त भी शीघ्र भारतीय भोजन बना सकता
है।
संभा वत यात्री क्य
मोटे अनाज — बाजरा, रागी, ज्वार, साँवा सूखी भूिम पर बहुत कम जल में उगते है;ं लोहा और रे शा भरपूर; जल की कमी बढ़ ने पर और
भी महत्वपूण
मखाना ( बहार के तालाब से) हल्का, महीनों िटकता है, ले जाने में सरल , तले हुए िचप्स की जगह स्वास्थ्यकर नाश्ता
सहजन (मो रगा) क प त्तयाँ पेड़ लगभग कहीं भी उग जाता है; पित्तयाँ अत्यंत पौिष्टक है ं और सरलता से सुखाकर चूण बन
जाती है ं
हल्द — दूध और पेय म िवदे शों में पहले ही स्वास्थ्यवधक पेय के रूप में िबक रही है
कटहल बड़ े पेड़ पर िबना दे खभाल के उगता है; कच्चा कटहल माँस की तरह पकाया जा सकता है,
िजसकी माँग बढ़ रही है
तैयार मसाले, इडली-डोसा का घोल, पैकेट दू सरे दे श का व्यिक्त पूरी िविध सीखे िबना भारतीय व्यंजन बना सकता है
क चाय
सफ़ेद चीनी के स्थान पर गुड़ यह उसी पुराने भारतीय पदाथ की वापसी है, िजसे अब लोग चीनी से बेहतर मानते है ं
भ वष्य का समझदारी भरा अनुमान कैसे लगाएँ: मनमाना अनुमान मत लगाइए। दे खए क वश्व म कस चीज़
क कमी है और भारत के पास कस चीज़ क भरमार है। वश्व म स्वच्छ जल घट रहा है और अस्वास्थ्यकर भोजन क
चता बढ़ रही है। भारत के पास ऐसी फ़सल ह जन्ह कम जल चा हए और जो खाने म अच्छ ह। इन दो तथ्य को
जोड़ द जए और आपका अनुमान तकसंगत हो जाएगा — जो अपने पसंद दा व्यंजन का नाम लख दे ने से कह
बेहतर उत्तर है।
यह भी याद र खए: भोजन दूसरी दशा म भी अब भी यात्रा कर रहा है। मोमोज़, नूडल्स, पज़्ज़ा और चाउमीन
आपके दादा-दाद के जीवनकाल म ही भारतीय कस्ब तक पहुँचे ह। उनसे पू छए — उन्ह याद होगा क उनके यहाँ
ऐसी पहली दुकान कब खुली थी।
ल खए — पृष्ठ 170–171
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कहानी 5 — मै क्सको के गदे के फूल का भारत आगमन!
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प्र.1 1. आपके अनुसार भारत और मै क्सको क संस्कृ त म उत्सव के अवसर पर गदे का प्रयोग क्य कया जाता है?
क्य क दोन दे श म गदा एक ही तीन काम करता है — उसका रंग सूय और अ ग्न जैसा है, वह सरलता से उगता है और
ठ क उत्सव के समय भारी संख्या म खलता है, और वह इतना मज़बूत होता है क उसक मालाएँ बनाई जा सक और
पंखु ड़याँ बखेरी जा सक। पृथ्वी के दो छोर पर बसी दो संस्कृ तय ने एक ही फूल को, एक ही कारण से चुना।
कारण को एक-एक करके दे खए:
1. रंग। गदा चटक नारंगी और पीला होता है — सूय का, अ ग्न का और द पक क लौ का रंग। अध्याय कहता है क इन रंग ने हम
सौहाद, उत्सव और आध्या त्मकता का स्मरण दलाया। कसी भी दे श म उत्सव क भावना यही होती है।
2. यह सरलता से उगता है। पौधा नखरे नह करता। गमले म, खेत म या आँगन म साधारण मट्ट म उग जाता है और एक ही
पौधा बहुत-से फूल दे ता है।
3. यह सही समय पर खलता है। भारत म यह द पावली के आस-पास पूरे यौवन पर होता है; मै क्सको म भी लगभग उन्ह
सप्ताह म, जब वहाँ पूवज के स्मरण का पव होता है। जो फूल ऋतु से बाहर खले, वह उत्सव के काम का नह ।
4. तोड़ने के बाद भी टकता है। इसके फूल कसे और मज़बूत होते ह। पौधे से अलग होकर भी वे एक-दो दन ताज़े रहते ह,
इसी लए उन्ह परोया जा सकता है, ार पर टाँगा जा सकता है और जुलूस म ले जाया जा सकता है।
5. यह सस्ता है। नधन प रवार और संपन्न प रवार — दोन इससे सजावट कर सकते ह। उत्सव का फूल वही हो सकता है जो
सबक पहुँच म हो।
6. इसक गंध। इसक तीखी, व शष्ट गंध पहचानने म भूल नह होती, और दोन दे श म उस गंध का अथ हो गया है — ‘आज
कोई वशेष दन है’।
भारत म मै क्सको म
कहाँ दखता है मं दर, घर, ववाह, ार, मालाएँ, द पावली उत्सवों की सजावट में, िवशेषकर उस पव पर जब पिरवार
अपने पूवजों का स्मरण करते है ं
कैसे उपयोग मालाओं म परोकर, ार पर टाँगकर, रंगोली म पंखिु ड़ याँ िबखेरकर माग बनाया जाता है और सजावट पर ढे र
होता है बखेरकर, पूजा म अ पत करके लगाया जाता है
रंग का अथ सौहाद, उत्सव, आध्या त्मकता गमजोशी और स्वागत — चटक रंग माग िदखाने और स्वागत
करने का पतीक है
कहाँ उगता है पूरे भारत के खेत , गमल और आँगन म इसका मूल घर — गेंदा मैिक्सको का है
इस कहानी क सबसे रोचक बात: भारत ने मै क्सको से फूल चढ़ाने का वचार नह लया। भारत हज़ार वष से
फूल अ पत करता आ रहा था। मै क्सको से आया केवल एक वशेष फूल — और वह हमारे उत्सव म इतना ठ क
बैठा क कुछ सौ वष म लोग भूल ही गए क वह कभी कह और से आया था। जब बाहर से आई कोई वस्तु पहले से
मौजूद कसी आवश्यकता को पूरा कर दे ती है, तो वह बहुत शीघ्र पराई नह रह जाती।
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर
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घर म पता क जए: पू छए क गदे के इतना सामान्य होने से पहले आपके प रवार म पूजा म कौन-से फूल चढ़ाए
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जाते थे। चंपा, चमेली, कनेर, हर सगार, कमल और गुड़हल जैसे नाम सुनाई दगे — ये सब भारतीय फूल ह और
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आज भी मै क्सको
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2. आपके अनुसार व भन्न दे श के लोग उत्सव म फूल का उपयोग क्य करते ह?
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क्य क फूल वह एक सुंदर वस्तु है जो हर दे श के पास है, जसका मूल्य लगभग कुछ नह है, और जसे हर कोई तुरंत समझ
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जाता है। यह जानने के लए क फूल दे ने का अथ है ‘मुझे आपको दे खकर प्रसन्नता हुई’, कसी साझा भाषा क आवश्यकता नह
पड़ती।
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छह कारण, और हर एक हर दे श पर लागू होता है:
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1. वे सुंदर होते ह और उनक गंध अ होती है। जस कमरे म फूल ह वह साधारण कमरे से अलग दखता और महकता है
— और उत्सव को यही अंतर चा हए।
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2. प्रकृ त उन्ह नःशुल्क दे ती है। नधन प रवार के लए भी फूल का मूल्य बहुत कम है, और आँगन म उगे ह तो कुछ भी नह ।
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जस उत्सव क सजावट केवल संपन्न लोग कर सक, वह वास्तव म उत्सव ही नह है।
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3. वे जी वत और ताज़े होते ह। फूल नए जीवन, नए आरंभ और शुभकामना के प्रतीक ह — नववष, ववाह, जन्म और फ़सल के
अवसर पर। a g
4. वे टकते नह । फूल एक-दो दन म मुरझा जाता है। यह उसका दोष नह , यही उसका अथ है। जो टकेगा नह , वही दे कर हम
कहते ह — “आज का दन वशेष है और म इस पर कुछ ख़च कर रहा ँ।”
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5. उनके सौ उपयोग ह। माला म परोना, बाल म लगाना, जल पर तैराना, माग पर बखेरना, पत्थरm
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comके अपने फूल ह। भारत म गदा और चमेली, जापान म चेरी के फूल, अनेकagदेशlaम गुलाब, पूव त्तर म ऑ कड।
पर रखना, रंगोली बनाना।
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6. हर स्थान
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बड़ा वचार, और यही इस अध्याय का वषय भी है: बहुत दूर-दूर क भू मय के लोग, जो कभी मले तक नह
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और आपस म बात भी नह कर सकते थे, अपने-आप एक ही री त तक पहुँच गए। यह एक महत्वपूण बात बताता है
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— दु नया के लोग जतना भन्न लगते ह, उससे कह अ धक एक-जैसे ह। हम भन्न समय पर, भन्न भाषाओं म, भन्न
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वस्त्र पहनकर उत्सव मनाते ह — और हम सब फूल क ओर हाथ बढ़ाते ह।
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कक्षा क छोट ग त व ध: सबसे पू छए क उनके प रवार के उत्सव म सबसे अ धक कौन-सा फूल उपयोग होता
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omसे आए। लगभग हर सूची म कम से कम एक यात्री नकलेगा। l
है। सूची श्यामपट्ट पर ल खए। फर पता क जए क उनम से कौन-से फूल मूल रूप से भारत के ह और कौन-से कह
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कहानी 6 — गाय का ाजील पहुँचना!
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प्र.1 यह कहानी पशुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के वषय म क्या बताती है?
यह बताती है क पशु केवल स्वयं यात्रा नह करते — मनुष्य भी उन्ह ले जाते ह — और नई भू म पर पहुँचा पशु वहाँ बस
सकता है, फल-फूल सकता है और वहाँ के लोग के लए अत्यंत महत्वपूण बन सकता है। भारतीय गाय जहाज़ से ब्राजील
गईं और आज ब्राजील के दूध का तीन चौथाई से भी अ धक भाग तीन भारतीय नस्ल — गर, कांकरेज और ओंगोल — पर नभर
है।
कहानी क पाँच सीख:
1. कुछ यात्राएँ पशु करते ह, कुछ यात्राएँ पशुओं के लए क जाती ह। कहानी 1 क गुलाबी मैना स्वयं उड़कर आई थी। इन
गाय को पुतगाली व्यापारी ले गए थे।
2. पशु वह बसता है जहाँ का मौसम उसके अनुकूल हो। ये गाय हृष्ट-पुष्ट थ , अच्छा दूध दे ती थ और उन्ह ने ाजील के
मौसम से सामंजस्य बठा लया — यही उनक सफलता का पूरा कारण है। ब्राजील, भारत के अ धकांश भाग क तरह, गम
है। ठं डे दे श का पशु वहाँ नह टक पाता।
3. नया आया पशु दे श का सबसे महत्वपूण पशु बन सकता है। आज ब्राजील का दूध मुख्यतः इन्ह तीन भारतीय नस्ल पर
टका है। इनके चत्र ब्राजील के टकट और सक्क तक पर मलते ह — कसी वस्तु का सम्मान दे श ऐसे ही करता है।
4. दोन दे श बहुत बाद तक जुड़े रहते ह। ब्राजील म पया गया दूध का हर गलास गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदे श से एक
मौन संबंध है, जहाँ से ये नस्ल आती ह।
5. यह हम अपनी वस्तुओं का मूल्य बताता है। भारतीय नस्ल वश्वस्तरीय सद्ध हुईं। यह अपने यहाँ इन नस्ल क ठ क से
दे खभाल करने का, और पुरानी नस्ल को समाप्त न होने दे ने का प्रबल कारण है।
नस्ल भारत म घर ाजील म सफल क्य हुई
गर गुजरात ( गर क्षेत्र) भरपूर दू ध दे ती है और गम सह ले ती है
कांकरेज गुजरात और राजस्थान बलवान और सहनशील ; दू ध और भारी काम — दोनों के िलए उपयुक्त
ओंगोल आंध्र प्रदे श बड़ ी और शिक्तशाली; गम और आद मौसम सरलता से सह ले ती है
एक ईमानदार सावधानी: पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना सदा सुखद कहानी नह होती। य द नए
स्थान पर कसी पशु का कोई शत्रु न हो तो उसक संख्या बेकाबू हो सकती है और वह वहाँ पहले से रहने वाले जीव
और पौध को हा न पहुँचा सकता है। ब्राजील क ये गाय खेत म रखी गईं और लोग ने इनक दे खभाल क , इस लए
ऐसी कोई हा न नह हुई। परंतु जब भी कसी जीव को नई भू म पर ले जाया जाए, तो सोच-समझकर ले जाना चा हए
— यह भी एक स ी सीख है और दस वष का ब ा इसके दोन पक्ष भली-भाँ त समझ सकता है।
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पृष्ठ 171 का चत्र फर दे खए: तीन गाय के कंध पर ऊँचा कूबड़ है और गले के नीचे ढ ली त्वचा क लटकती तह
है। ये दोन बनावट शरीर क गम बाहर नकालने म सहायक ह — और यही कारण है क भारतीय गाय गम दे श म
आराम से रह लेती ह। चत्र आपको कहानी का कारण दखा रहा है।
ग त व ध 4 — पृष्ठ 172
कहानी 6 — गाय का ाजील पहुँचना!
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प्र.1 1. अपने शक्षक या कसी बड़े क सहायता से गाय क कम से कम पाँच नस्ल के नाम पता क जए।
भारतीय गाय क पाँच नस्ल ह — गर, साहीवाल, लाल सधी, थारपारकर और कांकरेज। भारत म इनसे कह अ धक नस्ल
ह। कसी बुजग या पशुपालक से अवश्य पू छए, क्य क वे आपके ज़ले क नस्ल के नाम बताएँगे — यही इस ग त व ध का असली
उ े श्य है।
कैसे पता क जए:
1. अपने गाँव या मोहल्ले म गाय पालने वाले कसी व्य क्त से, या दूध दे ने वाले से पू छए।
2. तीन प्रश्न पू छए — “यह कस नस्ल क गाय है?”, “यह नस्ल कहाँ क है?”, “यह कस बात के लए जानी जाती है?”
3. पास म पशु च कत्सालय या डेयरी हो तो वहाँ भी पू छए।
4. उत्तर नीचे जैसी ता लका म ल खए और अंत म अपने ज़ले क नस्ल जो ड़ए।
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर AglaSem · NCERT Solutions
नस्ल मूल राज्य कसके लए जानी जाती है
गर गुजरात भरपूर दू ध; चौड़ ा, गोलाकार मस्तक और लंबे लटकते कान। बाजील जाने वाली
तीन नस्लों में से एक
साहीवाल पंजाब क्षेत्र लाल -भूरे रंग की; भारत की सव त्तम दुधारू नस्लों में से एक; शांत स्वभाव
लाल सधी अब उत्तर और द क्षण भारत म पाली गहरा लाल रंग; गम स्थानों में भी अच्छा दू ध
जाती है
थारपारकर राजस्थान सफ़े द या धूसर; बहुत कम जल और चारे में सूखे क्षेत्रों में रह ले ती है
कांकरेज गुजरात और राजस्थान बलवान; दू ध के िलए भी और हल तथा गाड़ ी खींचने के िलए भी। यह भी बाजील गई
ओंगोल आंध्र प्रदे श बहुत बड़ ी और शिक्तशाली। बाजील जाने वाली तीसरी नस्ल
हल्लीकर कनाटक गाड़ ी खींचने की शिक्त के िलए पिसद्ध
वेचूर केरल िवश्व की सबसे छोटी गोवंश नस्लों में से एक — वयस्क गाय लगभग कमर तक ही
ऊँ ची होती है
राठ राजस्थान भूरे रंग पर सफ़े द धब्बे; मरुस्थली िज़ लों की अच्छी दुधारू नस्ल
दे वनी महाराष्ट्र काली-सफ़े द; िनरंतर दू ध और बलवान बैल
इतनी नस्ल क्य ह: भारत बहुत बड़ा है और एक भाग का मौसम दूसरे भाग जैसा बलकुल नह है। जो गाय केरल
के आद्र तट पर फलती-फूलती है, वह थार मरुस्थल क सूखी गम म कष्ट पाएगी। सैकड़ वष म हर क्षेत्र के कसान
ने वही पशु रखे जो वहाँ सबसे अच्छे रहे — और इसी से हर क्षेत्र क अपनी नस्ल बन गई। हर नस्ल अपने स्थान का
लेखा-जोखा है।
एक बात जसम लोग प्रायः भ्र मत होते ह: मुरा भारत क प्र सद्ध नस्ल है, परंतु वह भस क नस्ल है, गाय क
नह । भारत म पया जाने वाला अ धकांश दूध वास्तव म भस से आता है। पू छए क आपके घर का दूध कस पशु
का है — उत्तर सुनकर बहुत-से ब े च क जाते ह।
प्र.2 2. अपने घर या वद्यालय क कुछ ऐसी वस्तुओं क सूची बनाइए जो संभवतः वश्व के कसी अन्य भाग से आई
ह । पता लगाइए क वे मूल रूप से कहाँ से आईं। (ता लका भ रए — वस्तुए:ँ वस्त्र, भोजन, खेल, वाद्ययंत्र, वृक्ष;
स्तंभ: नाम, मूल स्थान। पहली पं क्त भरी है — वस्त्र, ज स, अमे रका।)
हर पं क्त म ऐसी एक वस्तु ल खए जो सचमुच आपके घर या वद्यालय म है, और ल खए क वह मूल रूप से कहाँ से
आई। पहली पं क्त पुस्तक म भरी हुई है — वस्त्र — ज स — अमे रका। नीचे पूरी ता लका नमूने के रूप म भरी हुई है।
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वस्तुए ँ नाम मूल स्थान कैसे जाँच
वस्त्र जींस अमेिरका पुस्तक म दया हुआ
भोजन आलू दिक्षण कसी बुजग से पू छए क उनके दादा-दाद रोज़ आलू खाते थे या नह । मच, टमाटर,
अमेिरका काजू और मूँगफली क भी यही कहानी है
खेल फ़ु टबॉल इंग्लै ंड क्रकेट भी इंग्लड से आया; बास्केटबॉल और वॉलीबॉल अमे रका से
वाद्ययंत्र हारमोिनयम फ़ ांस (यूरोप) यह लगभग दो सौ वष पहले भारत आया और यहाँ इसे ज़मीन पर बैठकर बजाने योग्य
बना दया गया। गटार — स्पेन; वाय लन — इटली; क बोड — जापान
वृक्ष यूकेिल प्टस ऑस्टेिलया सड़क कनारे इसका सीधा ऊँचा तना और उतरती छाल पहचा नए। गुलमोहर —
(सफ़े दा) मेडागास्कर; रबड़ का पेड़ — ब्राजील; काजू का पेड़ — ब्राजील
अपनी ता लका म ये भी जोड़ सकते ह
आपके घर या वद्यालय क मूल रूप से कहाँ से
वस्तु
कॉपी का कागज़ चीन। कागज़ के भारत पहचु ँ ने से पहले हम ताड़ के पत्तों और छाल पर िलखते थे
चाय क पत्ती चाय का पौधा असम में स्वयं उगता है, पर रोज़ चाय पीने की आदत भारत में लगभग सौ वष पहले ही फै ली
पूजा क थाली का गदा मैिक्सको
खजूर और न बू अरब व्यापारी लाए, जो बदले में भारतीय चावल और कपड़ ा ले गए
पपीता, अमरूद, अनानास, चीकू मध्य और दिक्षण अमेिरका
कॉफ़ अफ़ ीका, और अरब दे शों से होते हुए भारत पहचु ँ ी
बैड मटन, टे बल टे नस, शतरंज शतरंज भारत में आरंभ होकर बाहर गया; बैडिमंटन भारत के एक खेल से िवकिसत हआ
ु और नए िनयमों
के साथ लौट आया
ता लका भरते समय जो बात दखाई दे ती है: साधारण भारतीय घर म लगभग कुछ भी केवल एक ही स्थान का
नह है। कॉपी चीन का वचार है, सब्ज़ी का आलू द क्षण अमे रका का, ार का गदा मै क्सको का, भजन का
हारमो नयम ांस का — और छत पर होता योग, चाय क शक्कर तथा थाली का चावल यह से बाहर गए। आपका
घर कोई बंद डब्बा नह है। वह एक मलन-स्थल है।
ईमानदारी से क जए: केवल वही ल खए जो आप सचमुच घर या वद्यालय म दे ख सकते ह। य द आपके घर म
ज स नह है तो कोई दूसरा वस्त्र ल खए और उसी के वषय म पता क जए। इस ग त व ध का मूल्य वास्त वक
वस्तुएँ जाँचने म है, सूची उतारने म नह ।
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ग त व ध 5 — पृष्ठ 173
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परस्पर जुड़ा हुआ जीवन
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गतवध
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1. अपने दादा-दाद , नाना-नानी या पड़ोसी का साक्षात्कार ली जए— उनसे व्यंजन, वस्तुओं, कसी गीत या कसी
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री त- रवाज, परंपरा या अभ्यास के वषय म चचा क जए जो उनके बचपन म प्रचलन म नह थी कतु आज
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प्रचलन म है। पता लगाइए क यह कहाँ से आया?
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कसी बुजग से पू छए क आज जो बात बलकुल सामान्य है, वह उनके बचपन म थी ही नह । लगभग हर बुजग एक साथ
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तीन-चार बात बता दगे, और उनम से हर एक कह न कह से आई है।
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साक्षात्कार ठ क से कैसे ल:
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a 2. ऐसा समय तय क जए जब वे खाली ह , और कॉपी-पेन साथ ले जाइए। बताइए क आप क्य आए ह।
1. साठ वष से अ धक आयु का कोई व्य क्त चु नए — दादा-दाद , नाना-नानी, पड़ोसी, दुकानदार या कोई सेवा नवृत्त शक्षक।
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3. ये प्रश्न एक-एक करके पू छए और उन्ह बोलने द जए — “आप बचपन म क्या खाते थे जो अब नह खाया जाता?” ·
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“आज हम क्या खाते ह जसका नाम भी आपने नह सुना था?” · “ ववाह म कौन-से गीत गाए जाते थे?” · “त्योहार
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पर अब क्या होता है जो तब नह होता था?” · “आपक गली म पहला टे ली वज़न, टे लीफ़ोन, गैस चूल्हा या स्कूटर कब
आया?” a g
4. जहाँ तक हो सके उनके अपने शब्द ल खए, अपना सारांश नह ।
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5. अंत म पू छए, “आपको क्या लगता है यह कहाँ से आया?” — और फर स्वयं भी पता क जए।
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6. पृष्ठ के ऊपर उस व्य क्त का नाम और आयु ल खए।
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aमेsरeी दाद कमला देवी, आयु 72 वष, से बातचीत।
नमूना उत्तर
agl उन्ह ने बताया क जब वे छोट थ तो उनके गाँव म न नूडल्स थे, न मोमोज़, न पज़्ज़ा, न जन्म दन का केक। जन्म दन केक और
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गीत बहुत बाद म, यूरोप और अमे रका से, पहले शहर.cम और फर गाँव तक, फ़ल्म और टे ली वज़न के माध्यम से आया।
मोमबत्ती से मनाया ही नह जाता था — माँ खीर या हलवा बनाती थ और ब ा बड़ के पैर छू ता था। केक और ‘हैप्पी बथडे’ का
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e नह पी जाती थी। वह केवल तब बनती थी जब कोई अ त थ आता था। अब सब a
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उन्ह ने यह भी बताया क उनके बचपन म lचाय sरोज़
agक यह बदलाव तब आया जब चाय पैकेट म बकने लगी और उसका ख़ूब प्रचार होने लगा।
दन म दो-तीन बार पीते ह। उन्ह ने कहा
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तीसरी बात उन्ह ने गैस चूल्हे क बताई। वे लकड़ी और उपल के चूल्हे पर खाना बनाती थ और धुएँ से रोज़ आँख जलती थ । गैस
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का सलडर उनके घर तब आया जब वे स्वयं माँ बन चुक थ ।
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बुजग क्या-क्या बता सकते ह वह कहाँ से आया
नूडल्स, चाउमीन, मोमोज़ चीन, ितब्बत और नेपाल — ये पहाड़ ी कस्बों और ठे ल ों के माध्यम से भारतीय शहरों
तक पहचु ँ े
पज़्ज़ा, बगर, केक, शीतल पेय यूरोप और अमेिरका, शहरों, िफ़ ल्मों और टेल ीिवज़ न के रास्ते
जन्म दन का केक और ‘हैप्पी बथडे’ गीत यूरोप और अमेिरका की रीित; पहले भारतीय जन्मिदन का अथ था िमठाई और
बड़ ों का आशीव द
दन म कई बार चाय चाय का पौधा असम में उगता है, पर रोज़ पीने की आदत िपछले लगभग सौ वष ं में
ही फै ली
सले- सलाए कपड़े, ज स, स्कूल के जूते पहले लगभग सब कु छ गाँव का दज़ िसलता था
प्ला स्टक क बाल्ट , मग और बोतल इन्होंने एक ही पीढ़ ी में पीतल , ताँबे और िम ी के बतनों की जगह ले ली
टे ली वज़न, मोबाइल फ़ोन, ववाह म फ़ल्मी गीत मशीने ं िवदे श से आईं; दादी-नानी के गाए िववाह-गीत अब कम ही सुनाई दे ते है ं
पाव-भाजी, इडली, ढोकला अपने मूल स्थान से बहुत दूर ये भारत के भीतर ही एक राज्य से दू सरे राज्य तक गए
खाए जाना
पूछने के लए बुजग ही सही व्य क्त क्य ह: पुस्तक बताती है क चीज़ बदलती ह। दाद बताती ह क कतनी
तेज़ी से बदलती ह। इस सूची क हर बात एक ही व्य क्त के जीवनकाल म आई — एक जीवन म, सौ पी ढ़य म
नह । प रवतन केवल इ तहास क पुरानी बात नह है। वह आपके चार ओर अभी हो रहा है, और एक दन आप ही
वे बुजग ह गे जनका साक्षात्कार लया जाएगा।
धन्यवाद क हए और लौटकर जाइए: लख लेने के बाद अपनी टप्प णयाँ उन्ह पढ़कर सुनाइए और जाँच ली जए
क कुछ ग़लत तो नह लखा। सुनते ही उन्ह प्रायः दो बात और याद आ जाती ह।
प्र.2 2. आपने जो कहा नयाँ पढ़ उनके आधार पर उन वस्तुओं क सूची बनाइए जो अन्य दे श से भारत आईं और
भारत क वे वस्तुए ँ जो यात्रा करके अन्य दे श म पहुँच । इसके पश्चात दो रंगीन धाग क सहायता से इन्ह मान चत्र
पर दशाने का प्रयत्न क जए।
दो सू चयाँ बनाइए — जो भारत आईं और जो भारत से गईं — फर आने वाली हर वस्तु के लए एक रंग का धागा और
जाने वाली हर वस्तु के लए दूसरे रंग का धागा लगाइए। मान चत्र पूरा होने पर भारत एक गाँठ जैसा दखेगा जससे चार
दशाओं म धागे नकल रहे ह।
मान चत्र कैसे बनाएँ:
1. वश्व का मान चत्र लगाइए, या चाट पेपर पर मोटा-मोटा बना ली जए। बलकुल सट क होना आवश्यक नह ।
2. मान चत्र पर भारत लखा एक छोटा काड पन कर द जए।
3. भारत आने वाली वस्तुओं के लए लाल धागा और भारत से जाने वाली वस्तुओं के लए हरा धागा ली जए।
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4. हर वस्तु के लए धागे का एक सरा संबं धत दे श पर और दूसरा भारत पर पन क जए।
5. हर धागे पर एक छोट पच लगाइए — एक शब्द पयाप्त है: मच, गदा, योग, शक्कर।
6. पीछे हटकर ग नए। कस रंग के धागे अ धक ह? कक्षा से पू छए क उन्ह ऐसा क्य लगता है।
भारत आईं (लाल कहाँ से भारत से वश्व तक गईं (हरा धागा) कहाँ तक
धागा)
िमच द क्षण अमे रका, योग वश्व के लगभग सभी दे श
पुतगाली यात्री लाए
आलू, टमाटर, मूँगफली, द क्षण अमे रका और शक्कर तथा गुड़ बनाने की िविध व्यापार और यात्रा के माध्यम से
काजू, मक्का मै क्सको अनेक दे श तक
गेंदा मै क्सको चावल , आम और के ला अनेक दे श
गुल ाबी मैना, हर सद में द क्षणी रूस और िगर, कांकरे ज और ओंगोल गाये ं ब्राजील
मंगो लया
कागज़ चीन काली िमच और इलायची — व्यापारी इन्हे ं अनेक दे श
‘काला सोना’ कहते थे
खजूर और नींब ू अरब व्यापारी लाए चावल और कपड़ ा, जो वही अरब व्यापारी अरब दे श
लौटते समय ले गए
जींस अमे रका नील (इंिडगो) — वह गहरा नीला रंग जो अ का और यूरोप
कभी के वल राजपिरवार पहनते थे
फ़ु टबॉल , ि के ट,
क्र इंग्लड और यूरोप शून्य — ‘कु छ नहीं’ की वह अवधारणा पूरा वश्व
हारमोिनयम िजसने सबका गिणत सरल िकया
कॉफ़ ी अ का, अरब दे श से शतरंज तथा साँप-सीढ़ ी पूरा वश्व
होकर
यूकेिल प्टस और ऑस् े लया और आयुवद तथा यहाँ जन्मे चार धम ं के िवचार अनेक दे श; कंबो डया का
गुल मोहर के वृक्ष मेडागास्कर अंगकोरवाट इसका एक प्रमाण है
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िमच, आलू, टमाटर योग
गेदं ा — मैिक्सको शक्कर और गुड़
कागज़ — चीन चावल, आम, केला
भारत
खजूर, नी ंबू — अरब देश एक िमलन-स्थल काली िमच, इलायची, नील
गुलाबी मैना — रूस ं रेज, ओंगोल — बाजील
िगर, काक
जी ंस, फ़ुटबॉल — शून्य, शतरंज, आय ुवद
अमेिरका, इंग्लैड
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लाल = भारत आईं · हरा = भारत से गईं। दोनों सूिचयाँ लंबी है।
ं
यही मान चत्र आप दो रंगीन धाग से बनाएँगे — एक ओर आती हुई वस्तुए,ँ दूसरी ओर जाती हुई।
पूरा मान चत्र क्या दखाता है: धागे दोन दशाओं म जाते ह और दोन गुच्छे मोटे ह। भारत केवल लेने वाला दे श
नह है और केवल दे ने वाला दे श भी नह । वह एक चौराहा है — जसने जो उपयोगी लगा वह लया और जो उसके
पास था वह दया। य द आप वश्व क कसी भी संस्कृ त का ऐसा मान चत्र बनाएँ तो वह भी ऐसा ही दखेगा। अध्याय
इसी को परस्पर जुड़ा हुआ जीवन कहता है।
मान चत्र द वार पर लगा रहने द जए: कुछ पन खाली छोड़ द जए। जब भी कक्षा म कसी को कोई और यात्री
मले — कोई फल, खेल, शब्द या वाद्ययंत्र — वह एक और धागा जोड़ दे । वष के अंत तक मान चत्र भर जाएगा।
ल खए — पृष्ठ 176
पृथ्वी एक प रवार!
ल खए
प्र.1 1. ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ क अवधारणा हम क्या सखाती है?
यह हम सखाती है क पूरा वश्व एक प रवार है। वसुधैव कुटु म्बकम् प्राचीन भारत क एक कहावत है और इसका अथ है ‘पूरा
वश्व एक प रवार है’। एक दे श नह , एक गाँव नह — पूरा वश्व।
यह क्रम से चार बात सखाती है:
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1. सब इसी प रवार के ह। समस्त मानव जा त, पशु, वनस्प त, न दयाँ और यहाँ तक क वायु और आकाश भी इसी प रवार का
अंग ह। केवल मनुष्य नह , और केवल आस-पास रहने वाले लोग नह ।
2. हम एक-दूसरे पर नभर ह। हम साथ रहते ह और एक-दूसरे क आवश्यकता रखते ह। पेड़ आपको वायु दे ता है, नद जल दे ती
है, कसान अन्न उगाता है, और पक्षी कसान क फ़सल बचाता है।
3. इस लए हम प रवार जैसा ही व्यवहार करना चा हए। जब हम वश्व को एक प रवार क तरह दे खते ह तो हम एक-दूसरे के
प्र त और उस पृथ्वी के प्र त, जो हम सबको सँभाले हुए है, सम्मान, दे खभाल और प्रेम से रहना सीखते ह।
4. पृथ्वी क दे खभाल ही एक-दूसरे क दे खभाल है। य द आप नद को गंदा करते ह तो आपने नद को हा न नह पहुँचाई;
आपने उन सबको हा न पहुँचाई जो आगे उससे पानी पीते ह। ये दोन बात एक ही बात ह।
मनुष्य
आकाश पशु
पथ्ृ वी
एक ही घर
वायु वनस्पित
निदयाँ
अध्याय म बताया गया प रवार — मनुष्य, पशु, वनस्प त, न दयाँ, वायु और आकाश, सब एक ही घर म।
इसे नयम नह , प रवार क्य कहा गया है: अपने छोटे भाई का ध्यान रखने के लए कसी को आदे श नह दे ना
पड़ता। आप वह इस लए करते ह क्य क वह आपका है। यह कहावत भी ऐसे ही काम करती है। जब आप कसी
अनजान व्य क्त को, कसी पेड़ को या कसी नद को सचमुच अपने प रवार का अंग मानने लगते ह, तो उनके प्र त
अच्छा व्यवहार करना कतव्य नह , स्वाभा वक बात लगने लगती है। यह कसी भी नयम से कह अ धक प्रबल है।
क्या आप जानते ह? पयावरण, वन और जलवायु प रवतन मंत्रालय का प्रतीक चह्न यही वचार दशाता है। यह
प्रकृ त और मानव जीवन के बीच संतुलन का प्रतीक है और उस पर लखा है “प्रकृ तः रक्ष त र क्षता” — अथात् रक्षा
क गई प्रकृ त ही रक्षा करती है। पृष्ठ 175 पर दे खए — पक्षी, पत्ती और जल एक ही वृत्त म बने ह।
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2. ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ क अवधारणा को अपने शब्द म ल खए।
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a gl शब्द म’ का अथ है — पुस्तक क पं क्त मत उता रए। इसे वैसे क हए जैसे आप कसी छोटे ब े को समझाते।
‘अपने
नीचे एक ही बात कहने के कई ढं ग दए ह — जो आपके जैसा लगे वही ल खए, या अपना बनाइए।
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नमूना उत्तर
m — मनुष्य, पशु, पेड़ और न दयाँ — मेरे अपने ह।”
“पूरा संसार एक बड़ा प रवार है, और उसम रहने वालेeसब
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glसब उसी म ह। सीमाएँ तो केवल मान चत्र क रेखाएँ ह।”
“पृथ्वी पर वास्तव म एक ही प रवार है औरaहम
“इस ग्रह पर हर कोई मेरा अपना है, इस लए मुझे अनजान व्य क्त के साथ भी वैसा ही व्यवहार करना चा हए जैसा अपने भाई-
बहन के साथ करता ँ।”
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s e m चा हए।”
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c m नह है। पेड़, पक्षी, न दयाँ और हर व्य क्त मेरे साथ एक ही प रवार का aअंgगlह।”
“पृथ्वी एक घर है। हम सब उसी घर के अलग-अलग कमर म रहते ह, इस लए उसे मलकर स्वच्छ रखना
“यहाँ कोईoपराया
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a s em म लखने के दो नयम:
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अपने शब्द
1. अपने रोज़मरा के शब्द काम म लाइए। य द मत्र से बात करते समय आप ‘अपना’, ‘घर’, ‘सब लोग’ कहते ह, तो वैसे ही शब्द
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ल खए।
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है — “…इसी लए मेरी माँ ग मय म गौरैय के लए पानी
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2. अपने जीवन का एक उदाहरण जो ड़ए। यही उसे आपका
रखती ह, चाहे वे हमारी नह ह।”
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पुस्तक एक ही बात दो बार क्य पूछती है: पहला प्रश्न पूछता है क यह कहावत क्या सखाती है। दूसरा पूछता है
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क इसका आपके लए क्या अथ है। रटा हुआ वाक्य बना समझे भी दोहराया जा सकता है — परंतु जैसे ही उसे
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omकसौट आप स्वयं पर भी लगा सकते ह। l
अपने शब्द म कहना पड़ता है, पता चल जाता है क आपने वास्तव म समझा या नह । शक्षक इसी लए यह पूछते ह,
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यह आया कहाँ से: यह कहावत संस्कृत क है। वसुधा का अथ है पृथ्वी, एव का अथ है ‘ही’, और कुटु म्बकम् का
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अथ है प रवार। शब्दशः — “पृथ्वी ही प रवार है।”
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3. प्रत्येक व्य क्त के भन्न होते हुए भी हम एक बड़े प रवार क तरह कैसे रह सकते ह?
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a s em अपनी भन्नताओं को समस्या नह , सामान्य बात मानकर — और रोज़ के छोटे -छोटे काम करके जनसे सम्मान और
agl अपनापन दखे। प रवार एक-जैसे लोग से नह बनता। आपके अपने प रवार म भी एक बुजग ह, एक शशु है, कोई कसान है और
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कोई वद्याथ — फर भी प रवार चलता है।
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जो आप सचमुच कर सकते ह — इसी सप्ताह, अपने वद्यालय और अपनी गली म:
1. कसी साथी क भाषा के कुछ शब्द eसी
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mखए। उसम ‘धन्यवाद’ और ‘कैसे हो’ कहना सी खए। कसी को अपनापन महसूसa
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कराने का इससे अच्छा उपाय नह
2. कसी के भोजन, कपड़ , बोली या नाम का मज़ाक कभी मत उड़ाइए। इस पूरी सूची का यह सबसे उपयोगी नयम है।
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3. कसी नए साथी के पास बै ठए। सप्ताह म एक बार अपनी जगह बद लए। उस ब े से बात क जए जसे सब अलग छोड़ दे ते
ह।
4. बाँ टए। अपना ट फ़न, रंग, छाता बाँ टए। बाँटने से ही ब का समूह एक कक्षा बनता है।
5. ट म मलाकर बनाइए। खेल म ट म चुनते समय केवल अपने मत्र मत चु नए। जो ब ा अंत म चुना गया, अगली बार उसे
पहले चु नए।
6. बहस से पहले सु नए। झगड़ा हो तो दोन पक्ष को एक-एक बार बना टोके पूरी बात कहने द जए। अ धकांश झगड़े वह छोटे
हो जाते ह।
7. दूसर के त्योहार म स म्म लत होइए। उनका भोजन च खए, जा नए क वह कस बात का उत्सव है, और बधाई द जए।
ज ासा भी सम्मान का एक रूप है।
8. साझा वस्तुओं का ध्यान र खए। कक्षा, नल, शौचालय, मैदान, बस-स्टॉप। साझा स्थान स्वच्छ रखना यह कहने का तरीका है
क ‘ये लोग मेरे अपने ह’।
9. पशु-प क्षय और पौध को भी प रवार म ग नए। ग मय म पानी का कटोरा र खए। टह नयाँ मत तो ड़ए। अध्याय के
अनुसार वे भी इसी प रवार के अंग ह।
10. बना कहे सहायता क जए। भारी बैग उठाइए, गरी हुई चीज़ उठाइए, जसे सवाल समझ न आया हो उसे समझाइए।
भन्नता प रवार क तरह रहना कैसा दखता है
अलग-अलग भाषाएँ बोली का मज़ ाक उड़ ाने के बजाय एक-दू सरे की भाषा के कु छ शब्द सीखना
अलग-अलग भोजन िमत्र के लाए भोजन को चखना; िकसी के िटिफ़ न को दे खकर ‘छी’ न कहना
अलग-अलग त्योहार िमत्र को उसके त्योहार पर बधाई दे ना और पूछना िक वह िकस बात का उत्सव है
अलग-अलग खेल और कौशल हर व्यिक्त कक्षा को वही खेल िसखाए िजसमें वह सबसे अच्छा है
अलग-अलग क्षमताएँ िकसी को बाहर छोड़ ने के बजाय िनयम थोड़ े बदल दे ना तािक सब खेल सके ं
घर क अलग-अलग आ थक स्थ त जूते, बैग या फ़ ोन की तुल ना कभी न करना; ऐसे खेल खेल ना िजनमें कु छ ख़ रीदना न पड़ े
भन्नताएँ बाधा नह , लाभ क्य ह: पूरे अध्याय पर फर दृ ष्ट डा लए। इसम जो कुछ भी अच्छा हुआ, वह इसी लए
हुआ क्य क कोई स्थान भन्न था — द क्षण अमे रका से मच, मै क्सको से गदा, चीन से कागज़, और भारत से बाहर
जाता योग। य द हर स्थान एक-जैसा होता तो न कुछ दे ने को होता, न कुछ पाने को। भन्नता ही वह चीज़ है जससे
साझा करना संभव होता है।
याद रखने योग्य एक पं क्त: वश्व कसी बड़ी घोषणा से एक प रवार नह बनेगा। वह छोटे -छोटे टु कड़ म प रवार
बनता है — एक कक्षा, एक गली, एक बस और एक बाँटे हुए ट फ़न से।
आइए वचार कर — पृष्ठ 176
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कक्षा 5 हमारे चार ओर क दु नया अध्याय 10 पृथ्वी — हम सबका घर AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय और पुस्तक के अं तम प्रश्न
आइए वचार कर
प्र.1 1. कोई एक वचार चुनकर उसके वषय म ल खए क कस प्रकार इसने कई वष पूव एक स्थान से दूसरे स्थान
तक क यात्रा क होगी? सो चए क यह कैसे लोग के जीवन या चतन को प रव तत करने म सहायक रहा होगा?
अध्याय से कोई एक वचार चु नए, कल्पना क जए क उसे कोई एक व्य क्त ले जा रहा है, और उस व्य क्त के साथ यात्रा
पर च लए। कहानी म एक व्य क्त, एक स्थान और एक प रवतन चा हए — तथ्य क सूची नह ।
आपक कहानी म क्या-क्या होना चा हए:
1. आपने जो वचार चुना है, उसका नाम पहली कुछ पं क्तय म।
2. वह व्य क्त जो उसे ले जा रहा है — ना वक, व्यापारी, रसोइया, शक्षक या कसान।
3. यात्रा — कतनी दूर, कतनी लंबी और कतनी क ठन।
4. वह क्षण जब नई भू म पर कसी ने पहली बार उसे आज़माया।
5. प रवतन — उसके बाद लोग ने क्या अलग करना आरंभ कया। प्रश्न वास्तव म यही पूछ रहा है, इस लए इसे छो ड़ए मत।
नमूना उत्तर — छोट लाल आग
दओगो एक पुतगाली जहाज़ पर रसोइया था और समुद्र से ऊब चुका था। चार महीने से जहाज़ पानी पार कर रहा था, फर और
पानी। अब आ ख़रकार सामने भारत का नीचा हरा तट था और हवा म गीली मट्ट और धुएँ क गंध थी।
दओगो क जेब म कपड़े क एक छोट थैली थी। उसम सूखी लाल फ लयाँ थ , जो उसने दु नया के दूसरी ओर, द क्षण अमे रका के
एक बाज़ार से उठाई थ । वहाँ लोग उन्ह पीसकर भोजन म डालते थे और उससे उसका मुँह जल उठा था। वह हँसा था, खाँसा था
और और माँगा था।
कनारे पर उसे मीनाक्षी नाम क एक रसोइया मली, जो पत्थर पर काली मच पीस रही थी। वह व्यापा रय के लए तरी बना रही थी।
दओगो ने अपनी थैली क ओर इशारा कया, फर उसक हाँडी क ओर। उसने भ ह सकोड़ , एक फली तोड़ी, एक बीज जीभ से
लगाया — और उसक आँख फैल गईं।
उस दन उसने हाँडी म आधी फली डाली। व्यापारी हाँडी ख़ाली कर गए। अगले सप्ताह उसने रसोई के पीछे , ना रयल के पेड़ के
कनारे क भुरभुरी लाल मट्ट म चार बीज बो दए। वषा हुई। पौधे तेज़ी से बढ़े ; उन्ह यह भू म अपनी भू म से भी अ धक भाई।
पड़ोसन ने बीज माँगे। पड़ोसन का भाई, जो भीतर क ओर जा रहा था, मु भर बीज धोती के छोर म बाँधकर ले गया। सौ वष के
भीतर वह छोट लाल आग तट से पवत तक हर रसोई पहुँच गई — आंध्र, कश्मीर, नागालड, राजस्थान।
और इससे बहुत कुछ बदला। अब भोजन सस्ते म तीखा बनाया जा सकता था, क्य क मच हर आँगन म उगती थी जब क काली
मच ख़रीदनी पड़ती थी। अचार अ धक दन चलने लगे। ऐसे-ऐसे व्यंजन बने जो पहले हो ही नह सकते थे। आज भारत म ब ा
लगभग अपने पहले ठोस भोजन म ही मच का स्वाद चख लेता है — और हज़ार म एक व्य क्त भी नह जानता क वह कसी
पुतगाली ना वक क जेब म यहाँ आई थी।
इनके वषय म भी लखा जा सकता है
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वचार कस दशा म गया क्या प रवतन आया
योग भारत से बाहर, या त्रय , व ान और दू सरे दे शों के लोगों को िबना मशीन और िबना धन के शरीर स्वस्थ और मन शांत
शक्षक के साथ रखने का उपाय िमला
शक्कर और भारत से बाहर, व्यापार और यात्रा के इससे पहले िवश्व भोजन को शहद से मीठा करता था। शक्कर के चारों ओर
गुड़ माध्यम से िमठाइयाँ, पव और पूरे व्यापार खड़ े हएु
शून्य भारत से बाहर, पूरे वश्व तक ‘कु छ नहीं’ को एक संख्या मानने के िवचार ने सब जगह बड़ ी गणनाएँ संभव बना
दीं
कागज़ चीन से व्यापार के माध्यम से भारत म इससे पहले हम ताड़ के पत्तों और छाल पर िलखते थे। कागज़ ने पुस्तके ं और
िव ालय कहीं सरल बना िदए
गदा मै क्सको से भारत म कु छ सौ वष ं में ही वह हमारे मंिदरों, िववाहों और दीपावली का फू ल बन गया
पुस्तक का अंत कहानी लखवाकर ही क्य होता है: तथ्य क सूची बताती है क चीज़ ने यात्रा क । कहानी
महसूस कराती है क उन्ह कोई सचमुच का व्य क्त ले गया — कोई ऐसा जो थका था, भूखा था, घर से बहुत दूर था,
और जसे त नक भी अनुमान नह था क उसक जेब क चीज़ करोड़ रसोइय को बदल दे गी। इ तहास केवल राजा
नह बनाते। उसे रसोइए, ना वक, कसान और व्यापारी भी बनाते ह।
लखने का सुझाव: अपने पात्र का नाम पहली ही पं क्त म दे द जए। जैसे ही व्य क्त का नाम हो जाता है, लखना
सरल हो जाता है और पढ़ने वाले को उससे लगाव होने लगता है।
प्र.2 2. पृथ्वी के संरक्षण या दे खभाल का कोई एक उपाय ल खए।
एक स्पष्ट उपाय: “म दाँत साफ़ करते समय और हाथ पर साबुन लगाते समय नल बंद रखूँगा।” इसे एक वाक्य म, अपने
वषय म और ऐसे काम के वषय म ल खए जो आप सचमुच करगे — “हम जल बचाना चा हए” नह , ब ल्क “म यह करूँगा”।
कुछ वास्त वक उपाय — इनम से एक चुनकर अपने ढं ग से ल खए
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क्षेत्र जो आप सचमुच कर सकते ह इससे क्या बचता है
जल बश करते और साबुन लगाते समय नल बंद रिखए; िव ालय खुला नल एक मनट म कई लीटर बहा दे ता है। टपकता नल
में टपकते नल की सूचना उसी िदन दीिजए रातभर, हर रात पानी बहाता रहता है
बजली ख़ ाली कमरे का पंखा और बत्ती बंद कीिजए। कक्षा से सबसे उस बजली के लए कम कोयला जलेगा और घर का बल
अंत में िनकलकर जाँचने वाले आप बिनए भी कम आएगा
प्ला स्टक कपड़ े का थैल ा और स्टील की बोतल साथ रिखए। वषभर काम आने वाला एक कपड़े का थैला कुछ सौ
दुकानदार से प्ल ािस्टक की थैल ी मत लीिजए प्ला स्टक थै लय क जगह ले लेता है
कचरा दो कू ड़ ेदान रिखए — गीला (भोजन, पित्तयाँ) और सूखा गीले कचरे से वद्यालय के बगीचे क खाद बनती है;
(कागज़ , प्ल ािस्टक , धातु)। प्ल ािस्टक या पत्ते कभी मत प्ला स्टक जलाने से वही वायु वषैली होती है जसम आप
जलाइए साँस लेते ह
पेड़ एक पौधा लगाइए और पूरे दो वष उसे पानी दीिजए — बच गया एक पेड़ पचास वष तक छाया दे ता है, मट्ट बाँधता
असली काम यही दू सरा भाग है है और प क्षय को भोजन दे ता है
भोजन थाली में उतना ही लीिजए िजतना आप पूरा खा सके ं बरबाद भोजन के साथ जल, मट्ट और कसान का पूरे वष
का प रश्रम भी बरबाद होता है
आवागमन िव ालय पास हो तो पैदल या साइिकल से जाइए; दू र हो तो आपक अपनी गली म कम धुआँ और साँस लेने के लए
िरक्शा साझा कीिजए या बस लीिजए स्वच्छ हवा
पशु-पक्षी गिमयों में छत या िखड़ की पर उथला कटोरा भरकर रिखए वष के सबसे गम सप्ताह म गौरैया, गलहरी और कौवे
और रोज़ पानी बदिलए
कागज़ हर प े के दोनों ओर िलिखए। बचे हुए प ों की रफ़ कॉपी कागज़ पेड़ से बनता है और उसे बनाने म बहुत जल लगता है
बनाइए
नमूना उत्तर: पृथ्वी क दे खभाल का मेरा एक उपाय है — प्र त दन कपड़े का थैला और स्ट ल क बोतल साथ रखना। पहले
हमारे घर म हर सप्ताह बाज़ार से चार-पाँच प्ला स्टक क थै लयाँ आ जाती थ और म वद्यालय क यात्रा म प्ला स्टक क बोतल म
पानी ख़रीदता था। जब से मने अपना थैला और बोतल साथ रखना शुरू कया है, घर म प्ला स्टक लगभग आता ही नह । मने एक
थैला अपनी दाद के लए भी बना दया है, ता क वे भी दुकानदार क थैली न ल।
यह कतना मायने रखता है — इसका सीधा और स ा उत्तर। आपके काम वास्त वक ह और जुड़ते जाते ह —
ब्रश करते समय बंद कया गया नल सचमुच लीटर पानी बचाता है और वषभर चलने वाला एक थैला सचमुच सैकड़
प्ला स्टक थै लय क जगह लेता है। दो बात इन्ह और बड़ा बनाती ह — ये आदत बन जाती ह जो बड़े होकर भी बनी
रहेगी, और दूसरे लोग इनक नकल करते ह, इस लए एक ब े का थैला प्रायः पूरे प रवार का थैला बन जाता है। पर
यह भी सच है क सबसे बड़ी समस्याएँ — शहर क दू षत हवा, समुद्र म प्ला स्टक, पृथ्वी का गम होते जाना —
इतनी बड़ी ह क ब े अकेले उन्ह हल नह कर सकते। उनके लए सरकार , कारखान , खेत और पूरे दे श को
अपना काम करने का ढं ग बदलना होगा। यह न आपक ग़लती है, न अकेले आपका काम। आपका काम है अपना
हस्सा ठ क से करना, और जब बड़े अपना हस्सा न कर तो खुलकर प्रश्न पूछना। ये दोन काम करने योग्य ह और
इनम से कसी म भी अपराधबोध क कोई बात नह है।
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नभाना सरल बनाइए: दस बात का संकल्प मत क जए। एक चु नए और तीस दन तक क जए, जब तक वह
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प्रयास लगना बंद न हो जाए। फर अगली जो ड़ए। आदत वास्तव म ऐसे ही बनती ह — एक-एक eकरक
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3. कसी एक ऐसी वस्तु का पता लगाइए जसने भारत से अन्य दे श तक यात्रा क है और उसके वषय म
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कोई एक भारतीय वस्तु चु नए और उसके वषय म चार प्रश्न के उत्तर द जए — वह क्या है, भारत म कहाँ से आती है,
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दूसरे दे श उसे क्य चाहगे, और उनके लए वह क्या बदलेगी। इससे एक नाम पूरा उत्तर बन जाता है।
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नमूना उत्तर — मोटे अनाज (बाजरा, ज्वार और रागी)
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l और भारत के अनेक शुष्क भाग म ये हज़ार वष से उगाए जाते रहे ह, गे ँ और चावल के मुख्य भोजन बनने से बहुत पहले
म भारत से वश्व तक मोटे अनाज — बाजरा, ज्वार और रागी — भेजना चा ँगा। ये भारत के प्राचीन अनाज ह। राजस्थान, महाराष्ट्र,
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मोटे अनाज म एक ऐसा गुण है जसक वश्व को इस समय बहुत आवश्यकता है — ये बहुत कम जल म उगते ह। धान को खेत म
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भरे पानी म खड़ा रहना पड़ता है। बाजरा वहाँ भी उग जाता
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अनेक दे श म जल क कमी है और उनक ग मयाँ
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इतना कम जल चा हए।
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ये स्वास्थ्य के लए भी बहुत अच्छे ह। रागी म कै ल्सयम अ धक होता है, जो ह य के लए अच्छा है। बाजरे और ज्वार म लोहा और
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रेशा भरपूर होता है। ये दे र तक पेट भरा रखते ह। जस दु नया म बहुत-से लोग अत्य धक प रष्कृत भोजन से अस्वस्थ हो रहे ह, वहाँ
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यह बात महत्वपूण है।
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emऔर दूसर को स्वाद भा जाए। शुष्क देश के कसान इन्ह उगाकर कम जल ख़च करगे। प रवार को सस्ता और स्वास्थ्यकर
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मोटे अनाज उसी तरह यात्रा करगे जैसे कभी शक्कर ने भारत से क थी — व्यापार के माध्यम से, और इस तरह क कुछ लोग उन्ह
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अनाज मलेगा। और इन्ह उगाने वाले भारतीय कसान क आय बढ़े गी, जससे वे पुराने बीज भुलाए जाने के बजाय सँभाले जाएँगे।
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इनके वषय म भी लखा जा सकता है
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वस्तु भारत म कहाँ वश्व उसे क्य चाहेगा
आम उत्तर प्रदे श, बहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदे श भारत में सै कड़ ों िकस्में उगती है।ं पहले ही स्वाद में सबको भा
और अनेक राज्य जाता है
बासमती चावल पंजाब, ह रयाणा, उत्तराखंड लंबे दाने और ऐसी सुगंध जो और िकसी चावल में नहीं
हल्द तेलंगाना, त मलनाडु , महाराष्ट्र भोजन को रंग दे ती है और भारतीय घरों में घाव तथा सद की
औषिध की तरह काम आती है
खाद और हथकरघे का पूरे भारत के गाँव म बुना जाता है हाथ से बनता है, मशीन और िबजली बहुत कम लगती है, और
कपड़ा बुनकरों को काम िमलता है
चन्नपटना के लकड़ी के कनाटक प्ल ािस्टक के स्थान पर लकड़ ी और सुरिक्षत वनस्पित रंगों से बने
खलौने
योग और आयुवद पूरे भारत म ये यात्रा कर ही चुके है ं — और अब भी फै ल रहे है ं
कब ी और खो-खो पूरे भारत के गाँव के मैदान म इनमें कोई सामान नहीं चािहए — के वल समतल ज़ मीन और
िखलाड़ ी
कोई वस्तु सचमुच यात्रा करेगी या नह , यह कससे तय होता है: इस अध्याय म जन वस्तुओं ने यात्रा क , उन्ह
फर दे खए — शक्कर, चावल, आम, मसाले, गाय, योग, शून्य। हर एक उपयोगी थी, ले जाने या अपनाने योग्य
थी, और ऐसी थी जो दूसरे स्थान के पास पहले से नह थी। अपनी चुनी हुई वस्तु को इन तीन कसौ टय पर क सए।
तीन पर खरी उतरे तो आपका उत्तर अच्छा है।
जानने योग्य एक बात: कुछ भारतीय वस्तुओं पर एक वशेष चह्न लगता है जो बताता है क वे कस स्थान क ह
— दा ज लग क चाय, कांचीपुरम का रेशम, नागपुर के संतरे, मैसूर का रेशम। इस चह्न का अथ है क उस नाम से
कोई और अपना सामान नह बेच सकता। यह कसी स्थान ारा अपनी उस वस्तु क रक्षा करने का उपाय है जसे
वह बहुत लंबे समय से अच्छ तरह बनाता आ रहा है।
अध्याय — एक नज़र म
अंत रक्ष से दे खने पर पृथ्वी पर कोई रेखा नह दखती। अंतरराष्ट्रीय अंत रक्ष स्टे शन तक पहुँचने वाले पहले भारतीय ग्रुप
कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने कहा क बाहर से दे खने पर पृथ्वी पूरी तरह एक दखाई दे ती है — न कोई सीमा, न कोई राज्य, न कोई
दे श। अंत रक्ष से पृथ्वी को दे खने वाले पहले भारतीय वग कमांडर राकेश शमा से पूछा गया क ऊपर से भारत कैसा दखता है।
उन्ह ने उत्तर दया — “सारे जहाँ से अच्छा”। उतनी ऊँचाई से अपना शहर या गाँव दखाई ही नह दे ता; केवल बड़े भू-भाग
और समुद्र का नीला रंग दखता है। इसी कारण पृथ्वी को नीला ग्रह कहा जाता है।
आपका एक पता है और उसक अं तम पं क्त सबक एक-सी है। पता छोटे से बड़े क ओर चलता है — घर, गली, गाँव
या शहर, ज़ला, राज्य, राष्ट्र। उसके बाद क पं क्त है ग्रह — पृथ्वी, और वश्व के हर दे श का हर ब ा वहाँ यही एक शब्द
लखेगा। ड ज पन (DIGIPIN) इसी बात को नए ढं ग से करता है — यह भारत के छोटे से छोटे स्थान को भी 10 अक्षर का
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अपना ड जटल कोड दे ता है, मानो आपके घर या वद्यालय क नाम-प ट्टका हो, जससे डा कया, एंबुलस या वतरणकता
आपको शीघ्र ढूँ ढ़ सके।
प्रकृ त क कोई सीमा नह होती। सीमाएँ मनुष्य ारा मान चत्र पर ख ची गई रेखाएँ ह। वायु उन पर रुकती नह । न बादल
रुकते ह, न वषा, न न दयाँ, न बीज, न पक्षी, न मछ लयाँ, न तत लयाँ। हमारे खेत को स चने वाली मानसूनी हवा समुद्र के
ऊपर बनती है। दूर के मरुस्थल क धूल हमारे शहर तक पहुँच जाती है। इस लए प्रकृ त का लाभ भी साझा है और हा न भी —
य द हम वायु या जल को दू षत कर तो वह एक दे श के भीतर नह रुकती।
कहानी 1 — प्रवासी पक्षी। गुलाबी मैना (गुलाबी सा रका) प्रत्येक स दय म रूस के द क्षणी भाग, मंगो लया और आस-पास
के दे श से हज़ार कलोमीटर उड़कर भारत आती है। यहाँ ये गम मौसम का आनंद लेती ह और ट े- ट य तथा क ड़ -
मकौड़ को खाती ह — वही क ट जो फ़सल को क्ष त पहुँचाते ह। इस प्रकार प क्षय को भोजन मलता है और कसान के
खेत सुर क्षत होते ह। ये वशाल समूह म उड़ती ह जो आकाश म धुएँ के बादल क तरह मुड़ता-घूमता दखाई दे ता है। जब पशु-
पक्षी स्वतंत्र और सुर क्षत रूप से वचरण करते ह तो पता चलता है क प्रकृ त कतनी गहनता से जुड़ी हुई है।
कहानी 2 — योग, वश्व को भारत का उपहार। भारत म 3000 से भी अ धक वष से योगाभ्यास कया जा रहा है —
शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखने के लए तथा स्वयं और प्रकृ त के साथ सामंजस्य बनाए रखने के लए। भारत के
या त्रय , व ान और शक्षक ने इसे वश्व तक पहुँचाया और धीरे-धीरे अन्य दे श ने भी इसे सीखा। संयुक्त राष्ट्र ने 2014 म
21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दवस घो षत कया और उस दन वश्वभर म करोड़ लोग एक साथ योग करते ह।
कहानी 3 और 4 — मच आई, शक्कर गई। मच के पौधे केवल द क्षण अमे रका म पाए जाते थे। लगभग 400 से 500
वष पूव पुतगाली यात्री मच को भारत लाए। उससे पहले हम भोजन को तीखा बनाने के लए काली मच का उपयोग करते
थे। आज हम मच के बना अपने भोजन क कल्पना भी नह कर सकते। शक्कर क यात्रा उल्ट दशा म हुई। गन्ने के रस से
गुड़ बनाने क व ध सवप्रथम भारत म खोजी गई और कालांतर म हमने गुड़ से चीनी बनाना सीखा। यह ान व्यापार और
यात्रा के माध्यम से वश्व म फैला। चावल, आम और केले भी भारत से दूसरे दे श तक पहुँचे।
कहानी 5 और 6 — एक फूल आया, कुछ गाय गईं। गदे का फूल मूल रूप से मै क्सको का है, जहाँ यह त्योहार का वशेष
फूल है। वह वश्व क यात्रा करते हुए भारत पहुँचा और उसके नारंगी-पीले रंग आज हमारे मं दर , घर , ववाह और द पावली म
भर गए ह। वष पहले पुतगाली व्यापारी भारत से कुछ गाय ाजील ले गए। वे हृष्ट-पुष्ट थ , अच्छा दूध दे ती थ और उन्ह ने वहाँ
के मौसम से सामंजस्य बठा लया। आज ाजील के दूध का तीन चौथाई से भी अ धक भाग तीन भारतीय नस्ल — गर,
कांकरेज और ओंगोल — पर नभर है और इनके चत्र ब्राजील के टकट और सक्क तक पर मलते ह।
परस्पर जुड़ा हुआ जीवन। ये वास्तव म प क्षय , पौध और वस्तुओं क कहा नयाँ नह ह। ये लोग क , यात्राओं क , साझेदारी
क और संस्कृ तय के मेल-जोल क कहा नयाँ ह। हम भन्न भाषाएँ बोलते ह और भन्न खेल खेलते ह, फर भी हम नरंतर
एक-दूसरे से सीखते ह। पृथ्वी केवल भू म और जल नह है; यह जीवन का एक जी वत संजाल है जसम मनुष्य, पशु, पौधे और
वचार यात्रा करते ह, मलते ह और साथ बढ़ते ह। और भी बहुत कुछ आया-गया — कागज़ चीन से आया (उससे पहले हम
ताड़ के पत्त और वृक्ष क छाल पर लखते थे), अरब व्यापारी खजूर और न बू लाए और बदले म भारतीय चावल और
कपड़ा ले गए, और भारतीय नील (इं डगो) ने अ का और यूरोप के कपड़े रँगे — वह गहरा नीला रंग कभी केवल
राजप रवार ही पहनते थे।
पृथ्वी एक प रवार। भारत क प्राचीन कहावत वसुधैव कुटु म्बकम् का अथ है ‘पूरा वश्व एक प रवार है’। समस्त मानव
जा त, पशु, वनस्प त, न दयाँ और यहाँ तक क वायु और आकाश भी इसी प रवार का अंग ह। हम साथ रहते ह, एक-दूसरे पर
नभर ह और एक ही घर साझा करते ह। पृथ्वी एकमात्र ऐसा ग्रह है जस पर जीवन संभव है और हज़ार वष से इसने मानव,
पशु और वनस्प त को आश्रय दया है। इसे भी दे खभाल क आवश्यकता है — और जब हम पृथ्वी क दे खभाल करते ह तो
वस्तुतः हम एक-दूसरे क दे खभाल कर रहे होते ह। पयावरण, वन और जलवायु प रवतन मंत्रालय के प्रतीक चह्न पर लखा
है “प्रकृ तः रक्ष त र क्षता” — अथात् रक्षा क गई प्रकृ त ही हमारी रक्षा करती है।
भारत ने वश्व को चुपचाप बहुत कुछ दया है। शून्य सवप्रथम यह लखा गया और ‘शून्य’ क इस अवधारणा ने दु नयाभर
के लोग को ग णत समझने और हल करने म सहायता द । आयुवद, च कत्सा क सबसे प्राचीन पद्ध तय म से एक, 3000 से
अ धक वष पूव भारत म वक सत हुई थी। शतरंज और साँप-सीढ़ के खेल का उद्भव भी भारत म ही हुआ। काली मच और
इलायची जैसे मसाले यहाँ से अनेक दे श तक गए और व्यापारी उन्ह ‘काला सोना’ कहते थे। भारत वश्व के चार प्रमुख धम
— हदू, बौद्ध, जैन और सख — क जन्मभू म है, और कंबो डया का अंगकोरवाट, जो वश्व का सबसे बड़ा मं दर है, बताता
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है क भारतीय वचार कतनी दूर तक पहुँचे। दूसरी ओर हमारी अपनी आद्रभू मय म मछलीमार बल्ली जैसे जीव रहते ह,
जसके पंजे आं शक रूप से जालयुक्त होते ह और जो गोता लगाकर मछली पकड़ती है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म कहाँ रोज़मरा का उदाहरण
नीला ग्रह पथ्ृ वी का एक नाम, क्योंिक अंतिरक्ष से इसका अिधकांश नीला ग्रह, पृष्ठ 161 कक्षा म रखा ग्लोब — उसका नीला
भाग नीला िदखता है — वह नीला रंग समुद है भाग जल है
सीमा वह रे खा जो बताती है िक एक दे श या राज्य कहाँ समाप्त पृष्ठ 163 मान चत्र पर दो राज्य के बीच
होता है और दू स रा कहाँ आरंभ खची रेखा
पता आप कहाँ रहते है,ं यह छोटे भाग से बड़े भाग की ओर ग त व ध 1, पृष्ठ मकान संख्या, गली, गाँव, ज़ला,
िलखा हुआ 162 राज्य, राष्ट्र, ग्रह
ड ज पन (DIGIPIN) 10 अक्षरों का िडिजटल कोड जो भारत के एक छोटे-से क्या आप जानते ह?, वह ‘नाम-प ट्टका’ जससे एंबुलस
स्थान को पहचान दे ता है पृष्ठ 163 आपका घर ढूँ ढ़ ले
प्रवासी पक्षी वह पक्षी जो एक ऋतु के िलए दू स रे दे श से आता है और कहानी 1, पृष्ठ 164 हर सद म भारत आने वाली गुलाबी
बाद में लौट जाता है मैना
गुलाबी मैना काले -ग ल
ु ाबी रंग का पक्षी जो सिदयों में बड़े समूहों में कहानी 1, पृष्ठ 164 खेत के ऊपर धुएँ के बादल-सा
भारत आता है और फ़ सल के कीट खाता है घूमता प क्षय का झुंड
क ट (फ़सल को हा न वे कीड़े जो फ़ सलों को क्षित पहच
ु ँ ाते है ं कहानी 1, पृष्ठ 164 गे ँ के खेत म ट े और ट याँ
पहुँचाने वाले)
योग आसनों और श्वास का पाचीन भारतीय अभ्यास जो कहानी 2, पृष्ठ 166 21 जून को वद्यालय के मैदान म
शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखता है ताड़ासन करना
व्यापार स्थानों के बीच क्रय-िवक्रय, िजसके साथ बीज, भोजन कहानी 4, पृष्ठ 169 भारत से मसाल का जाना और चीन
और िवचार भी एक दे श से दू स रे दे श जाते है ं से कागज़ का आना
गुड़ ग े के रस को उबालकर बनाया गया मीठा पदाथ; कहानी 4, पृष्ठ 169 स दय म रोट के साथ खाया जाने
भारत ने इसे सवपथम खोजा और बाद में इससे चीनी वाला गुड़
बनाई
नस्ल एक ही पकार के पशुओ ं का वह समूह िजनका रूप और कहानी 6, पृष्ठ 171 गर, कांकरेज और ओंगोल —
गण
ु िमलते-जुल ते हों भारतीय गाय क तीन नस्ल
परस्पर जुड़ा हुआ यह िवचार िक मनुष्य, पशु, पौधे और िवचार सब एक- परस्पर जुड़ा हुआ पक्षी क ट खाता है, फ़सल बचती है,
जीवन दू स रे से जुड़े हुए है ं जीवन, पृष्ठ 172 हम भोजन मलता है
वसुधैव कुटु म्बकम् पाचीन भारत की कहावत, िजसका अथ है ‘पूर ा िवश्व पृथ्वी एक प रवार!, अनजान व्य क्त के साथ भी अपने
एक पिरवार है’ पृष्ठ 173 भाई-बहन जैसा व्यवहार करना
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