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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 2: गोल
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
13 – 24 15 25 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 27 pages
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: गोल
NCERT कक्षा 6 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 2 गोल के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह पाठ ‘हॉक के जादूगर’ मेजर ध्यानचंद (1905–1979)
क आत्मकथा गोल से लया गया संस्मरण का अंश है। पृष्ठ 13 से 24 तक क हर ग त व ध — मेरी समझ से, मलकर कर मलान, पं क्तय पर चचा,
सोच- वचार के लए, संस्मरण क रचना, शब्द के जोड़े व भन्न प्रकार के, बात पर बल दे ना, आपक बात, समाचार-पत्र से, डायरी का प्रारंभ, आज क
पहेली, झरोखे से, साझी समझ, खोजबीन के लए और पढ़ने के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 6) 13 – 24
खं ड प्रश्न
15 25
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 16
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
नीचे दए गए प्रश्न का सट क उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा ( ) बनाइए— (1) “दोस्त, खेल म इतना
गुस्सा अ ा नह । मने तो अपना बदला ले ही लया है। अगर तुम मुझे हॉक नह मारते तो शायद म तुम्ह दो ही
गोल से हराता।” मेजर ध्यानचंद क इस बात से उनके बारे म क्या पता चलता है? • वे अत्यंत क्रोधी थे। • वे अ े
ढं ग से बदला लेते थे। • उन्ह हॉक से मारने पर वे अ धक गोल करते थे। • वे जानते थे क खेल को सही भावना से
खेलना चा हए।
सही उत्तर है — वे जानते थे क खेल को सही भावना से खेलना चा हए। इसी वकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / कारण
ग़लत
वे अत्यंत क्रोधी थे। ग़लत बलकुल उलट बात है। सर पर स्टक लगने के बाद भी वे लौटकर उसी खलाड़ी क पीठ
थपथपाते ह और उसे ‘दोस्त’ कहकर बुलाते ह। क्रोधी आदमी ऐसा नह करता।
वे अ े ढं ग से बदला लेते ग़लत यह बात ऊपर-ऊपर से ठ क लगती है, पर अधूरी है। ध्यानचंद ने ‘बदला’ शब्द मज़ाक म कहा था
थे। — उन्ह ने बदला लया ही नह , केवल अ ा खेल दखाया। प्रश्न पूछता है क उनके स्वभाव के
बारे म क्या पता चलता है, उनके बदला लेने के ढं ग के बारे म नह ।
उन्ह हॉक से मारने पर वे ग़लत यह वाक्य का शब्दशः, मज़ा कया अथ पकड़ लेना है। कोई खलाड़ी चोट खाकर अ ा नह
अ धक गोल करते थे। खेलता; ध्यानचंद अपनी लगन और अभ्यास के बल पर गोल करते थे।
वे जानते थे क खेल को सही ★ वे स्वयं कहते ह — “खेल म इतना गुस्सा अ ा नह ।” उन्ह ने चोट का उत्तर चोट से नह , गोल
सही भावना से खेलना से दया, और अंत म उस खलाड़ी को दोस्त बनाकर छोड़ा। यही खेल भावना है।
चा हए।
क्य यही उत्तर सबसे सट क है: पूरा पाठ एक ही बात दोहराता है — “लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता
के सबसे बड़े मंत्र ह।” यह वकल्प उसी मुख्य भाव से जुड़ता है, बाक तीन नह ।
प्र.2 (2) लोग ने मेजर ध्यानचंद को ‘हॉक का जादूगर’ कहना क्य शुरू कर दया? • उनके हॉक खेलने के वशेष
कौशल के कारण • उनक हॉक स्टक क अनोखी वशेषताओं के कारण • हॉक के लए उनके वशेष लगाव के
कारण • उनक खेल भावना के कारण
सही उत्तर है — उनके हॉक खेलने के वशेष कौशल के कारण। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
पाठ क पं क्त ही यह उत्तर दे दे ती है — “ब लन ओलं पक म लोग मेरे हॉक खेलने के ढं ग से इतने प्रभा वत हुए क उन्ह ने मुझे
‘हॉक का जादूगर’ कहना शुरू कर दया।”
वकल्प सही / कारण
ग़लत
उनके हॉक खेलने के वशेष सही ★ ‘खेलने का ढं ग’ यानी खेलने का कौशल। गद उनक स्टक से चपक रहती थी — यही
कौशल के कारण जादू-सा लगता था।
उनक हॉक स्टक क अनोखी ग़लत पाठ म स्टक क कसी वशेषता क चचा ही नह है। जादू स्टक म नह , खलाड़ी के
वशेषताओं के कारण हाथ म था।
हॉक के लए उनके वशेष ग़लत शुरू म तो “खेल म मेरी कोई दलचस्पी नह थी” — लगाव बाद म जागा। और दशक
लगाव के कारण लगाव नह , खेल दे खते ह।
उनक खेल भावना के कारण ग़लत खेल भावना से उन्ह ने “दु नया के खेल प्रे मय का दल जीत लया” — पर ‘जादूगर’
नाम उनके खेल-कौशल से मला। पाठ दोन बात अलग-अलग वाक्य म कहता है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
क्या आप जानते ह? ब लन ओलं पक (1936) के फ़ाइनल म भारत ने जमनी को 8–1 से हराया था। कहते ह क
लोग को उनक स्टक पर इतना संदेह हुआ क उसे तुड़वाकर जाँचा गया — पर उसम कुछ नह नकला।
प्र.3 (ख) अब अपने मत्र के साथ चचा क जए क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
यह चचा का प्रश्न है। चचा म सबसे मज़बूत कारण वही होता है जसके साथ आप पाठ क एक पं क्त प्रमाण के रूप म रख सक।
अ े उत्तर म तीन बात होनी चा हए:
आपने कौन-सा वकल्प चुना और उसका अथ अपने शब्द म;
पाठ क वह पं क्त जो उस वकल्प को सद्ध करती है;
बाक वकल्प क्य छोड़े — हर एक के लए एक वाक्य।
नमूना उत्तर: पहले प्रश्न म मने चुना — “वे जानते थे क खेल को सही भावना से खेलना चा हए।” क्य क ध्यानचंद
स्वयं कहते ह, “दोस्त, खेल म इतना गुस्सा अ ा नह ।” सर पर चोट खाने के बाद भी उन्ह ने उस खलाड़ी को मारा
नह , उसक पीठ थपथपाई और छह गोल करके अपना उत्तर दया। ‘वे अत्यंत क्रोधी थे’ ग़लत है, क्य क क्रोधी
आदमी वरोधी को ‘दोस्त’ नह कहता। ‘अ े ढं ग से बदला लेते थे’ भी पूरा उत्तर नह , क्य क उन्ह ने बदला लया
ही नह । और ‘हॉक से मारने पर वे अ धक गोल करते थे’ तो केवल मज़ाक क बात है।
दूसरे प्रश्न म मने चुना — “उनके हॉक खेलने के वशेष कौशल के कारण”, क्य क पाठ म साफ़ लखा है क “लोग
मेरे हॉक खेलने के ढं ग से इतने प्रभा वत हुए क उन्ह ने मुझे ‘हॉक का जादूगर’ कहना शुरू कर दया।” स्टक क
कोई वशेषता पाठ म बताई ही नह गई, इस लए वह वकल्प ग़लत है।
मलकर कर मलान — पृष्ठ 17
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल
a g l AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से
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e m.
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पाठ से शब्दाथ
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a s emम से चुनकर कुछ शब्द नीचे दए गए ह। अपने समूह म इन पर चचा क जए और इन्ह इनके सही अथ या
gl
पाठ
a
प्र.1
संदभ से मलाइए। इसके लए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शक्षक क सहायता ले सकते ह। शब्द: 1.
om
लांस नायक 2. ब लन ओलं पक 3. पंजाब रे जमट 4. सपस एंड माइनस ट म 5. सूबेदार 6. छावनी — अथ या
. c ag
संदभ: 1. स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अ धका रय का दूसरा सबसे बड़ा पद था। 2. भारतीय सेना का
एक पद (रक) है। 3. सै नक के रहने का क्षेत्रe। m
a s 4. वष 1936 म जमनी के ब लन शहर म आयो जत ओलं पक खेल
a l था। 5. स्वतंत्रता से पहले अं ेज़ क भारतीय सेना का एक दल। 6.
प्र तयो गता, जसम 49 दे श ने भाग gलया
अं ेज़ के समय का एक हॉक दल।
co m
em.
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.co जुड़ेगा a g
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शब्द
em अथ या संदभ पाठ म कहाँ आया
l
ag 1. लांस नायक →2 भारतीय सेना का एक पद (रक) है। “उस समय म सेना म लांस नायक था।”
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. coजसम agl
2. ब लन →4 वष 1936 म जमनी के ब लन शहर म आयो जत “सन् 1936 म ब लन ओलं पक म मुझे
e m
as
ओलं पक ओलं पक खेल प्र तयो गता, 49 दे श ने भाग लया कप्तान बनाया गया।”
था।
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3. पंजाब →5 स्वतंत्रता से पहले अं ेज़ क भारतीय सेना का एक दल। “म पंजाब रे जमट क ओर से खेला
रे जमट करता था।”
co m
m .
m l a sाबeटरेम’जमट’
.co ag
4. सपस एंड →6 अं ेज़ के समय का एक हॉक दल। “‘पंज और ‘सपस एंड
se m
माइनस ट म माइनस के बीच मुक़ाबला हो रहा
l a
था।”
a g
m
5. सूबेदार स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अ धका रय का “हमारी रे जमट के सूबेदार मेजर तवारी
se
→1
com l a
दूसरा सबसे बड़ा पद था। थे।”
. a g
m
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6. छावनी सै नक के रहने का क्षेत्र। “हमारी छावनी म हॉक खेलने का कोई
agl
→3
न त समय नह था।”
. c om
मलान क तरक ब: पहले वे जोड़े मलाइए जो आँख से ही पहचान म आ जाएँ — ‘ब लन ओलं पक’ और ‘ब लन
s e m‘हॉक दल’ क ओर ले जाता
cहै,o‘रेmजमट’ सेना के ‘दल’ क ओर। ‘लांस नायक’ और ‘सूबेदार’ — दोनagपदlaह; इनम ‘सूबेदार’ वाली प रभाषा म
शहर म आयो जत ओलं पक’। फर शब्द के भीतर छपा संकेत दे खए — ‘ट म’ शब्द
.
a s em ‘सूबेदार’ शब्द स्वयं लखा है, इस लए वह जोड़ा तुरंत बन जाता है और बचा हुआ ‘लांस नायक’ दूसरे से जुड़ जाता
agl है।
c
m .
m a s e
e m . co
ध्यान रहे: ‘रे जमट’ सेना का दल है और ‘ट म’ खेल का दल — दोन को आपस म मत उलझाइए। ‘छावनी’ कोई agl
g l as
पद नह , जगह है, इस लए वह ‘सै नक के रहने का क्षेत्र’ से ही जुड़ेगी।
a
co m
m .
m as e
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पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 17
पाठ से
पाठ से
प्र.1 पाठ म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह ध्यान से प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार कक्षा म अपने समूह म साझा क जए और अपनी लेखन पु स्तका म
ल खए— (क) “बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है क उसके साथ भी बुराई क
जाएगी।”
भावाथ: जो व्य क्त कसी के साथ बुरा करता है, उसका अपना मन ही उसे चैन नह लेने दे ता। उसे लगता रहता है क जैसा उसने
कया है, वैसा ही कभी उसके साथ भी होगा। इस तरह उसक सबसे बड़ी सज़ा बाहर से नह मलती — वह अपने भीतर के डर से ही
मलती रहती है।
पाठ से प्रमाण: जस खलाड़ी ने ध्यानचंद के सर पर हॉक स्टक मारी थी, ध्यानचंद ने उससे केवल इतना कहा — “तुम चता मत
करो, इसका बदला म ज़रूर लूँगा।” बस इतना सुनते ही “वह खलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही दे खता रहता क म कब
उसके सर पर हॉक स्टक मारने वाला ँ।” ध्यानचंद ने उसे छु आ तक नह , फर भी वह पूरे मैच म डरा रहा — यही इस पं क्त का
जीता-जागता उदाहरण है।
गहरी बात: उस खलाड़ी का डर ही उसक हार का कारण बना। जब उसका ध्यान गद पर होना चा हए था, तब वह
ध्यानचंद पर टका था। इसी लए ध्यानचंद छह गोल कर सके और अंत म कह सके — “अगर तुम मुझे हॉक नह
मारते तो शायद म तुम्ह दो ही गोल से हराता।”
चचा के लए: अपने समूह से पू छए — क्या यह बात केवल खेल के मैदान क है? कक्षा म कसी क चीज़ छपा
दे ने वाला या झूठ बोलकर बच नकलने वाला व ाथ भी तो हर समय पकड़े जाने के डर म ही जीता है। इसी भाव
को कहावत म कहते ह — “चोर क दाढ़ म तनका।”
प्र.2 (ख) “मेरी तो हमेशा यह को शश रहती क म गद को गोल के पास ले जाकर अपने कसी साथी खलाड़ी को दे दूँ
ता क उसे गोल करने का ेय मल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मने दु नया के खेल प्रे मय का दल
जीत लया।”
भावाथ: ध्यानचंद गद को अकेले गोल तक ले जाने क क्षमता रखते थे, फर भी वे गोलपोस्ट के पास पहुँचकर गद अपने साथी को
थमा दे ते थे, ता क गोल का यश उस साथी के नाम लखा जाए। उनके लए अपना नाम बड़ा नह था — ट म क जीत बड़ी थी।
इससे उनके बारे म क्या पता चलता है:
वे नस्वाथ थे। ‘ ेय’ यानी कसी काम का सेहरा। जो व्य क्त अपनी मेहनत का सेहरा दूसरे के सर बाँध दे , वह सचमुच बड़ा
होता है।
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वे ट म-भावना म व ास करते थे। वे स्वयं कहते ह — “इसका यह मतलब नह क सारे गोल म ही करता था।” हॉक ग्यारह
खला ड़य का खेल है, एक का नह ।
यही उनक असली जीत थी। पदक तो एक बार मलता है; उन्ह ने “दु नया के खेल प्रे मय का दल जीत लया” — और वह
जीत हमेशा के लए रही।
जोड़कर दे खए: पाठ के अंत क पं क्त इसी बात को पूरा करती है — “हार या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श क
है।” साथी को ेय दे ना और जीत को दे श के नाम कर दे ना — दोन एक ही स्वभाव के दो रूप ह।
चचा के लए: अपने समूह म सो चए — क्या ऐसा केवल खेल म होता है? समूह-काय म जब कोई साथी अपना
काम पूरा करके दूसरे क भी सहायता करता है और तारीफ़ पूरे समूह को मलती है, तो वह भी यही खेल भावना
दखा रहा होता है।
सोच- वचार के लए — पृष्ठ 18
पाठ से
पाठ से
प्र.1 संस्मरण को एक बार फर से प ढ़ए और नम्न ल खत के बारे म पता लगाकर अपनी लेखन पु स्तका म ल खए—
(क) ध्यानचंद क सफलता का क्या रहस्य था?
ध्यानचंद के अनुसार उनक सफलता का कोई जादू या गुरु-मंत्र नह था। वे स्वयं कहते ह — “मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो
है नह । हर कसी से यही कहता क लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र ह।”
मंत्र इसका अथ ध्यानचंद के जीवन म यह कैसे दखा
लगन कसी काम म मन का पूरी तरह लग छावनी म हॉक का कोई न त समय नह था — “सै नक जब चाहे मैदान म
जाना, धुन पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर दे ते।” जसम लगन हो, वही ऐसे समय
नकालता है।
साधना लगातार, बना ऊबे कया गया अभ्यास वे शुरू म “एक नौ स खया खलाड़ी” थे। लगातार अभ्यास से ही “मेरे खेल म
नखार आता गया” और वे कप्तान तक पहुँचे।
खेल खेल को सही भाव से खेलना — न चोट मारने वाले खलाड़ी को ‘दोस्त’ कहना, गोल का ेय साथी को दे ना, और
भावना गुस्सा, न ईष्या, न अकेले नाम कमाने क जीत को दे श क जीत मानना।
चाह
ध्यान द जए: तीन म से पहले दो मेहनत से जुड़े ह और तीसरा स्वभाव से। ध्यानचंद का कहना यही है क अ ा
खलाड़ी बनने के लए अ ा इनसान होना भी ज़रूरी है।
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प्र.2 (ख) कन बात से ऐसा लगता है क ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसर को रखते थे?
पूरे संस्मरण म कम से कम चार जगह ऐसी ह जहाँ ध्यानचंद अपने से पहले दूसर को रखते दखाई दे ते ह—
1. गोल का ेय साथी को दे ना। “मेरी तो हमेशा यह को शश रहती क म गद को गोल के पास ले जाकर अपने कसी साथी
खलाड़ी को दे दूँ ता क उसे गोल करने का ेय मल जाए।” गोल वे स्वयं कर सकते थे, पर यश साथी को दे ते थे।
2. ‘सारे गोल म ही करता था’ — इस भ्रम को स्वयं तोड़ना। ‘हॉक का जादूगर’ कहलाने के बाद भी वे साफ़ कहते ह —
“इसका यह मतलब नह क सारे गोल म ही करता था।” यह पूरी ट म को बराबर का हस्सेदार मानना है।
3. जीत को दे श के नाम करना। “खेलते समय म हमेशा इस बात का ध्यान रखता था क हार या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श
क है।” अपने से बड़ा उन्ह ने दे श को माना।
4. चोट पहुँचाने वाले को भी क्षमा कर दे ना। सर पर स्टक लगने के बाद भी वे उसी खलाड़ी क पीठ पर हाथ रखते ह, फर मैच
के बाद पीठ थपथपाकर उसे ‘दोस्त’ कहते ह। अपने अपमान से बड़ा उन्ह ने खेल और खलाड़ी के रश्ते को माना।
नष्कष: ध्यानचंद के लए ‘म’ छोटा था और ‘हम’ बड़ा — चाहे वह ‘हम’ ट म हो, वरोधी खलाड़ी हो या पूरा दे श।
इसी लए वे केवल बड़े खलाड़ी नह , बड़े इनसान भी माने जाते ह।
क्या आप जानते ह? इसी महानता के कारण भारत उनके जन्म दन 29 अगस्त को ‘रा ीय खेल दवस’ के रूप म
मनाता है और दे श का सव च्च खेल पुरस्कार ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ उन्ह के नाम पर दया जाता है।
संस्मरण क रचना — पृष्ठ 18
पाठ से
पाठ से वधा
प्र.1 “उन दन म म, पंजाब रे जमट क ओर से खेला करता था।” इस वाक्य को पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक
आपसे यानी पाठक से अपनी याद को साझा कर रहा है। ध्यान दगे तो इस पाठ म ऐसी और भी अनेक वशेष
बात आपको दखाई दगी। इस पाठ को एक बार फर से प ढ़ए। (क) अपने-अपने समूह म मलकर इस संस्मरण
क वशेषताओं क सूची बनाइए।
ध्यान से पढ़ने पर ‘गोल’ म संस्मरण क ये वशेषताएँ दखाई दे ती ह—
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
वशेषता पाठ से उदाहरण इससे क्या होता है
1. ‘म’ शैली (उत्तम “मैं पंजाब रे िजमेंट की ओर से खेल ा लेखक स्वयं अपनी बात कहता है, इस लए बात सच्ची और अपनी-सी
पुरुष) करता था।” लगती है।
2. बीती हुई स ी िसर पर िस्टक लगना, छह गोल करना, संस्मरण कल्पना नह होता; इसम वही लखा जाता है जो सचमुच
घटनाएँ कप्तान बनना घटा हो।
3. समय और ान सन् 1933, सन् 1905, पयाग, झाँस ी, त थयाँ और जगह घटना को वास्त वक बना दे ती ह।
का उल्लेख सन् 1936, बिलन
4. असली नाम पंजाब रे िजमेंट, सै ंपस एंड माइनस टीम, पात्र गढ़े हुए नह , सच्चे व्य क्त और सं ाएँ ह।
सूबेद ार मेजर ितवारी
5. पाठक से सीधी “तो दे खा आपने मेर ा बदला ले ने का ऐसा लगता है मानो लेखक सामने बैठकर बात कर रहा हो।
बात ढं ग ?”, “सच मानो…”
6. संवाद “तुम िचंता मत करो, इसका बदला मैं बातचीत ज्य -क -त्य दे ने से दृश्य आँख के सामने खच जाता है।
ज़रूर लूँग ा।”
7. भूतकाल क खेल ा करता था, चलता था, दे मारी, पूरी रचना याद क है, इस लए क्रयाएँ बीते समय क ह।
क्रयाएँ कर िदए
8. सरल, बोलचाल धक्का-मुक्की, नोंक -झोंक , झटपट, भाषा भारी नह है; सपाही क सीधी-साद ज़बान है।
क भाषा नौिसिखया, तरक्की
9. घटनाओं का क्रम 1933 का मैच → जन्म और भत → लेखक पहले एक रोचक घटना सुनाता है, फर पीछे लौटकर पूरा
1936 का ओलंिपक जीवन बताता है — इससे पाठक बँधा रहता है।
10. अंत म सीख “हार या जीत मेर ी नही ं, बिल्क पूरे दे श संस्मरण केवल घटना नह सुनाता, जीवन का एक अनुभव भी दे
की है। ” जाता है।
11. वनम्रता “मेरे पास सफलता का कोई ग रु
ु -मंत्र लेखक अपनी बड़ाई नह करता — यही अ े संस्मरण क पहचान
तो है नही ं।” है।
संस्मरण कसे कहते ह: ‘सम् + स्मरण’ यानी अ तरह याद करना। जब लेखक अपने जीवन क कसी सच्ची
घटना या कसी व्य क्त क याद को अपने शब्द म लखता है, तो वह संस्मरण कहलाता है। पूरा जीवन लखा जाए
तो वह आत्मकथा बन जाती है — यह पाठ ध्यानचंद क आत्मकथा ‘गोल’ का ही एक अंश है।
प्र.2 (ख) अपने समूह क सूची को कक्षा म सबके साथ साझा क जए।
यह प्रस्तु त (presentation) क ग त व ध है। इसे इस तरह क जए—
1. सूची छाँ टए। समूह क सूची म से सबसे स्पष्ट 5–6 वशेषताएँ चुन ली जए, ता क बात दोहराई न जाए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल
a g l AglaSem · NCERT Solutions
2. हर वशेषता के साथ प्रमाण र खए। केवल “भाषा सरल है” मत क हए — क हए, “भाषा सरल है, जैसे ‘झटपट छह गोल
co m
कर दए’।”
se m.
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g पर नशान लगाइए — अंत
.cसाझा सूची बनाइए। हर समूह क नई-नई बात जोड़ते जाइए और दोहराई गई बात
a
3. काम बाँट ली जए। एक साथी वशेषता बोले, दूसरा पाठ क पं क्त पढ़कर सुनाए।
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मlपूaरs
4. बोड पर एक
ag
ी कक्षा क एक बड़ी सूची तैयार हो जाएगी।
5. अंत म एक वाक्य म नष्कष क हए।
co m
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नमूना उत्तर (प्रस्तु त का आरंभ): “नमस्ते! हमारे समूह ने ‘गोल’ पाठ म संस्मरण क छह वशेषताएँ पहचानी ह। ag
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पहली — यह पूरा पाठ ‘म’ शैली म है, जैसे ‘म पंजाब रे जमट क ओर से खेला करता था’। दूसरी — इसम सच्ची
a
त थयाँ और जगह ह, जैसे सन् 1933, सन् 1936, प्रयाग, झाँसी और ब लन। तीसरी — लेखक बीच-बीच म हमसे
m
सीधे बात करता है, जैसे ‘तो दे खा आपने मेरा बदला लेने का ढं ग?’ … इन सब बात से यह पाठ कहानी नह , ब ल्क
co
m.
एक सच्चा संस्मरण लगता है।”
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agl के जोड़े, व भन्न प्रकार के — पृष्ठ 18 और 19
शब्द
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पाठ से
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पाठ से शब्द क बात
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प्र.1
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(क) “जैसे-जैसे मेरे खेल म नखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्क भी मलती गई।” इस वाक्य म ‘जैसे-जैसे’
और ‘वैसे-वैसे’ शब्द के जोड़े ह जनम एक ही शब्द दो बार उपयोग म लाया गया है। ऐसे जोड़ को ‘शब्द-युग्म’
co m
m .
e
कहते ह। शब्द-युग्म म दो शब्द के बीच म छोट -सी रेखा लगाई जाती है जसे योजक चह्न कहते ह। योजक यानी
m l as
.co g
जोड़ने वाला। आप भी ऐसे पाँच शब्द-युग्म ल खए।
em a
a s
a gl उत्तर
se m
जन शब्द-युग्म म एक ही शब्द दो बार आता है, उन्ह पुनरुक्त शब्द कहते ह। पाँच उदाहरण और उनका प्रयोग—
com g l a
m . a
ase
शब्द-युग्म अथ वाक्य म प्रयोग
धीरे -धीरे बहुत आिहस्ता, थोड़ ाa glा करके
-थोड़ धीरे-धीरे उसका डर दूर हो गया।
बार -बार कई-कई बार
co m
सूबेदार मेजर तवारी बार-बार ध्यानचंद से हॉक खेलने के लए कहते थे।
ध्यानचंद का नाम आज घर-घर म जाना e
.
mहै।
a s
com agl
घर -घर हर घर में जाता
m .कभी-कभी
as e बीच-बीच में, यदा-कदा
agl
कभी-कभी हार से भी बहुत कुछ सीखने को मलता है।
िबलकु ल नज़ दीक
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m
पास -पास दोन खलाड़ी पास-पास खड़े होकर योजना बना रहे थे।
m a s e
m . co
पाठ म आए ऐसे और शब्द-युग्म: जैसे-जैसे, वैसे-वैसे, बार-बार, थोड़ी-थोड़ी, एक-एक, दो-दो, अपनी-अपनी, अपने-अपने, बारी-
e agl
बारी, सब के सब।
g l as
a
co m
m .
m as e
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
योजक चह्न (-) क्य लगाते ह: ‘बार बार’ लखने पर वे दो अलग शब्द लगते ह, पर ‘बार-बार’ लखने पर वे
मलकर एक ही अथ दे ते ह। योजक चह्न यही बताता है क ये दोन शब्द अब एक इकाई बन चुके ह। ‘योजक’ का
अथ ही है — जोड़ने वाला।
ध्यान र खए: पुनरुक्त शब्द अथ म ज़ोर या नरंतरता ले आते ह। ‘मने पढ़ा’ और ‘मने बार-बार पढ़ा’ — दूसरे वाक्य
म मेहनत साफ़ दखाई दे ती है।
प्र.2 (ख) “खेल के मैदान म धक्का-मुक्क और न क-झ क क घटनाएँ होती रहती ह।” इस वाक्य म भी आपको दो
शब्द-युग्म दखाई दे रहे ह, ले कन इन शब्द-युग्म के दोन शब्द भन्न- भन्न ह, एक जैसे नह ह। आप भी ऐसे पाँच
शब्द-युग्म ल खए जनम दोन शब्द भन्न- भन्न ह ।
यहाँ दोन शब्द अलग-अलग होते ह, पर मलकर एक ही भाव दे ते ह। पाँच उदाहरण—
शब्द-युग्म अथ वाक्य म प्रयोग
हार -जीत हारना और जीतना, दोनों हार-जीत तो खेल का हस्सा है, मन छोटा नह करना चा हए।
माता-िपता माँ और िपता मेरे माता- पता हर मैच दे खने आते ह।
रात-िदन हर समय, लगातार वह रात- दन अभ्यास करके ट म म चुना गया।
ले न-दे न आपसी व्यवहार, आदान-पदान दुकानदार का लेन-दे न बहुत साफ़ है।
आना-जाना आवागमन, आवाजाही बा रश म गाँव तक आना-जाना क ठन हो जाता है।
और भी उदाहरण: धूम-धाम, हँसी-मज़ाक, ऊँच-नीच, भला-बुरा, दाल-रोट , सुबह-शाम, दे श- वदे श, खान-पान, मेल-जोल।
तीन तरह के जोड़े पहचा नए:
दोन शब्द अलग और दोन का अपना अथ — हार-जीत, माता- पता, लेन-दे न।
दूसरा शब्द नरथक (केवल तुक के लए) — धक्का-मुक्क , रोट -वोट , चाय-वाय। ‘मुक्क ’ अकेले कोई शब्द
नह है।
दोन शब्द मलती-जुलती ध्व न वाले — न क-झ क, गोल-मोल, अटर-पटर।
पाठ के दोन उदाहरण — धक्का-मुक्क और न क-झ क — इसी दूसरी और तीसरी तरह के ह।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 (ग) “हार या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श क है।” “आज म जहाँ भी जाता ँ ब े व बूढ़े मुझे घेर लेते ह।” इन
वाक्य म जन शब्द के नीचे रेखा खची है, उन्ह ध्यान से प ढ़ए। हम इन शब्द को योजक क सहायता से भी
लख सकते ह, जैसे— हार-जीत, ब े-बूढ़े आ द। आप नीचे दए गए शब्द को योजक क सहायता से ल खए—
•अ ा या बुरा • छोटा या बड़ा • अमीर और गरीब • उत्तर और द क्षण • गुरु और शष्य • अमृत या वष
दया गया योजक क सहायता वाक्य म प्रयोग
रूप से
अ ा या बुरा अच्छा-बुरा अ ा-बुरा समझने क उम्र अब आ गई है।
छोटा या बड़ा छोटा-बड़ ा खेल के मैदान म छोटा-बड़ा कोई नह होता।
अमीर और गरीब अमीर-गरीब ओलं पक म अमीर-गरीब सभी दे श के खलाड़ी एक साथ खेलते ह।
उत्तर और द क्षण उ त्तर-दि ण यह सड़क पूरे नगर को उत्तर-द क्षण जोड़ती है।
गुरु और शष्य गुरु-िशष्य ध्यानचंद और तवारी जी का नाता गुरु- शष्य जैसा था।
अमृत या वष अमृत-िवष कड़वे शब्द वष ह और मीठे शब्द अमृत — अमृत- वष का अंतर बोली से ही पता चलता
है।
ध्यान द जए: ‘या’ और ‘और’ हटाकर उनक जगह छोट -सी रेखा ( - ) लगा द जए — बस, शब्द-युग्म बन गया।
ये जोड़े वपरीत अथ वाले शब्द से बने ह (अ ा × बुरा, अमीर × गरीब, अमृत × वष), फर भी जुड़कर एक ही
भाव दे ते ह — यानी ‘सब तरह के’ या ‘दोन तरह के’। ‘गुरु- शष्य’ वपरीत नह , जोड़ीदार शब्द ह।
करके दे खए: इसी ढं ग से और जोड़े बनाइए — दन और रात → दन-रात; लाभ और हा न → लाभ-हा न; सुख
या दुख → सुख-दुख; जीवन और मरण → जीवन-मरण।
बात पर बल दे ना — पृष्ठ 19
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पाठ से
पाठ से शब्द क बात
प्र.1 “मने तो अपना बदला ले ही लया है।” “मने तो अपना बदला ले लया है।” इन दोन वाक्य म क्या अंतर है?
ध्यान द जए और बताइए। सही पहचाना! दूसरे वाक्य म एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के
अथ म भी थोड़ा अंतर आ गया है। हम अपनी बात पर बल दे ने के लए कुछ वशेष शब्द का प्रयोग करते ह जैसे
— ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ आ द। पाठ म से इन शब्द वाले वाक्य को चुनकर ल खए। ध्यान द जए क य द उन वाक्य
म ये शब्द न होते तो उनके अथ पर इसका क्या प्रभाव पड़ता।
पहले दोन वाक्य का अंतर: पहले वाक्य म ‘ही’ है। उससे अथ बनता है — “बदला म ले चुका ँ, अब कुछ बाक़ नह ; तुम्ह डरने
क ज़रूरत नह ।” दूसरे वाक्य म केवल सूचना है — “मने बदला ले लया है।” यानी ‘ही’ बात को पक्का और अं तम बना दे ता है।
ऐसे शब्द को व्याकरण म नपात कहते ह। ये अपने आप म कोई अथ नह रखते, पर जस शब्द के बाद लग जाएँ, उस पर ज़ोर
डाल दे ते ह। पाठ म से चुने हुए वाक्य—
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पाठ का वाक्य बल दे ने वह क्या जोड़ता है यह शब्द हटा द तो
वाला
शब्द
“खेल म तो यह सब चलता ही है।” तो, ही यह बात सामान्य है, इसम नई या “खेल म यह सब चलता है।” — केवल
च काने वाली कोई बात नह । सूचना रह जाती, वह ‘आम बात है’ वाला
भाव चला जाता।
“ जन दन हम खेला करते थे, उन भी आज तो होता ही है, तब भी होता “उन दन यह सब चलता था।” — आज से
दन भी यह सब चलता था।” था — बात दोन समय पर लागू जोड़ने वाला पुल टू ट जाता।
है।
“मेरे इतना कहते ही वह खलाड़ी ही तुरंत, उसी क्षण। “मेरे इतना कहने पर वह घबरा गया।” —
घबरा गया।” तेज़ी और तुरंतपन खत्म हो जाता।
“अब हर समय मुझे ही दे खता ही केवल मुझे, और कसी को नह “अब हर समय मुझे दे खता रहता।” —
रहता…” — उसका पूरा ध्यान बँट गया। ‘केवल’ वाला भाव और उसका डर हल्का
पड़ जाता।
“मने तो अपना बदला ले ही लया तो, ही जहाँ तक मेरी बात है — मेरा “मने अपना बदला ले लया है।” — बात
है।” काम पूरा हो चुका। सपाट हो जाती, उसम छपा मज़ाक और
आ ासन न रहता।
“…शायद म तुम्ह दो ही गोल से ही केवल दो — छह नह । तुम्हारे “दो गोल से हराता।” — ‘केवल दो’ वाली
हराता।” गुस्से ने ही तुम्ह ज़्यादा हराया। चुटक खत्म हो जाती।
“मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो वनम्रता — जो सब समझते ह, “मेरे पास कोई गुरु-मंत्र नह है।” —
तो है नह ।” वैसा कोई जादू मेरे पास नह है। वनम्रता और अपनापन कम हो जाता।
“लगन, साधना और खेल भावना ही ही यही तीन, इनके सवा कुछ नह । “…सबसे बड़े मंत्र ह।” — बात कही तो
सफलता के सबसे बड़े मंत्र ह।” जाती, पर उसम दावे का ज़ोर न रहता।
“आज म जहाँ भी जाता ँ बच्चे व भी हर जगह, चाहे कह भी जाऊँ। “जहाँ जाता ँ…” — ‘हर जगह’ वाला
बूढ़े मुझे घेर लेते ह।” वस्तार समट जाता।
“इसका यह मतलब नह क सारे ही केवल म — इसी भ्रम को लेखक “…सारे गोल म करता था।” — पूरा वाक्य
गोल म ही करता था।” हटाना चाहता है। ही उलटा अथ दे ने लगता।
“जैसे-जैसे मेरे खेल म नखार आता भी नखार के साथ-साथ एक और “…तरक्क मलती गई।” — दोन बात का
गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्क भी चीज़ — तरक्क — भी जुड़ती साथ-साथ बढ़ना उतना स्पष्ट न होता।
मलती गई।” गई।
“…उसके साथ भी बुराई क भी जैसा उसने कया, वैसा उसके “उसके साथ बुराई क जाएगी।” — ‘जैसा
जाएगी।” साथ भी — बात लौटकर उसी कया वैसा भरा’ वाला भाव मट जाता।
पर आती है।
नष्कष: ‘ही’ प्रायः सीमा बाँधता है (केवल यही), ‘भी’ जोड़ता है (यह भी, वह भी) और ‘तो’ बात को अलग
करके सामने रखता है (जहाँ तक इसक बात है)। छोटे -से शब्द, पर वाक्य का पूरा भाव बदल दे ते ह।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल
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करके दे खए: एक वाक्य ली जए — “राम आया।” अब ल खए — “राम ही आया।” (और कोई नह ), “राम भी
mवाक्य के तीन
आया।” (दूसर के साथ), “राम तो आया।” (कम-से-कम राम आ गया, बाक का पता नह )। एकeही
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अथ!
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आपक बात — पृष्ठ 19
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे a g l
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(क) ध्यानचंद के ान पर आप होते तो क्या आप बदला लेते? य द हाँ, तो बताइए क आप बदला कस प्रकार
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प्र.1
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लेते?
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a यह आपके अपने वचार का प्रश्न है, इस लए उत्तर हर व ाथ का अलग होगा। पर उत्तर पाठ के भाव से जुड़ा होना चा हए —
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ध्यानचंद ने चोट का उत्तर चोट से नह , अपने खेल से दया था।
अ े उत्तर म क्या होना चा हए:
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पहले साफ़ क हए — हाँ या नह ;
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फर बताइए क कस तरीक़े से, और वह तरीक़ा हसा वाला न हो;
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अंत म एक कारण द जए — उस तरीक़े से क्या अ ा होता है।
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नमूना उत्तर: ध्यानचंद के
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ान पर म भी ‘बदला’ लेता, पर ठ क उसी ढं ग से जस ढं ग से उन्ह ने लया। म उस
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gl खेल का सारा आनंद खत्म हो जाता। म और अ धक मन लगाकर खेलता और गोल करके दखाता क गुस्से से नह ,
खलाड़ी को पलटकर स्टक नह मारता, क्य क उससे मुझे भी चोट लगती, ट म एक खलाड़ी से हाथ धो बैठती और
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खेल से जीता जाता है। मैच के बाद म उससे हाथ मलाकर कहता, “खेल म गुस्सा मत लाओ, दोस्त।” मुझे लगता है
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क इस तरह का बदला सामने वाले को श मदा भी कर दे ता है और अपना मन भी साफ़ रह जाता है — जैसे उस
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खलाड़ी के साथ हुआ, वह “सचमुच बड़ा श मदा हुआ।”
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दूसरा पक्ष भी ठ क है: कोई व ाथ कह सकता है — “म बदला बलकुल नह लेता, केवल क्षमा कर दे ता, क्य क
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खेल म चोट जान-बूझकर ही लगी हो, यह ज़रूरी नह ।” यह भी सही उत्तर है, बशत आप उसका कारण द। ग़लत
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उत्तर केवल वही है जसम मारपीट या बदले क भावना हो।
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(ख) आपको कौन-से खेल और कौन-से खलाड़ी सबसे अ धक अ े लगते ह? क्य ?
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यह भी आपक अपनी पसंद का a g है। ध्यान रहे — प्रश्न म ‘क्य ’ भी है, इस लए केवल नाम गना देना पूरा उत्तर नह होगा।
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अ े उत्तर का ढाँचा:
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
1. खेल का नाम + वह आपको क्य अ ा लगता है (उसक कोई एक खास बात);
2. खलाड़ी का नाम + उसका कोई एक गुण या उपल ;
3. उस खलाड़ी से आपने क्या सीखा — यही सबसे अ ा अंत होता है।
नमूना उत्तर: मुझे सबसे अ धक अ ा खेल हॉक लगता है। यह हमारा बहुत तेज़ खेल है, इसम ग्यारह खलाड़ी
एक साथ मलकर एक गद को आगे बढ़ाते ह, और यहाँ अकेला कोई नह जीत सकता — पूरी ट म जीतती है। इसके
साथ मुझे कब ी भी बहुत पसंद है, क्य क इसे खेलने के लए कसी महँगे सामान क ज़रूरत नह , बस एक मैदान
चा हए।
खला ड़य म मुझे मेजर ध्यानचंद सबसे अ े लगते ह। वे इतना अ ा खेलते थे क दु नया ने उन्ह ‘हॉक का
जादूगर’ कहा, फर भी उनम ज़रा-सा घमंड नह था। वे गोल का ेय अपने साथी को दे दे ते थे और कहते थे — “हार
या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श क है।” उनसे मने यह सीखा क सच्चा खलाड़ी वही है जो अपनी ट म को अपने से
बड़ा माने।
सुझाव: आप अपनी पसंद के कसी भी खेल और खलाड़ी का नाम ले सकते ह — क्रकेट, फ़टबॉल, बैड मटन,
कुश्ती, तीरंदाज़ी, खो-खो — बस उसके साथ एक ठोस कारण ज़रूर जो ड़ए। सबसे अ ा कारण वह होता है जो
खलाड़ी के स्वभाव से जुड़ा हो, केवल उसके रकॉड से नह ।
समाचार-पत्र से — पृष्ठ 19 और 20
पाठ से आगे
पाठ से आगे गतवध
प्र.1 (क) क्या आप समाचार-पत्र पढ़ते ह? समाचार-पत्र म प्र त दन खेल के समाचार का एक पृष्ठ प्रका शत होता है।
अपने घर या पुस्तकालय से पछले सप्ताह के समाचार पत्र को दे खए। अपनी पसंद का एक खेल-समाचार
अपनी लेखन पु स्तका म ल खए।
यह पढ़ने और लखने क ग त व ध है। इसे इस तरह पूरा क जए—
1. खेल-पृष्ठ ढूँ ढ़ए। हद के अख़बार म खेल का पन्ना प्रायः अं तम या उससे पहले वाला होता है और उस पर ‘खेल’ या ‘खेल-
जगत’ लखा रहता है।
2. एक समाचार चु नए जो आपको सचमुच रोचक लगे — कसी बड़े मैच का, कसी नए रकॉड का या अपने ज़ले/राज्य के
कसी खलाड़ी का।
3. समाचार क त थ और अख़बार का नाम सबसे ऊपर लख ली जए — यही सही तरीक़ा है।
4. अपने शब्द म ल खए। हर समाचार पाँच बात का उत्तर दे ता है — क्या हुआ, कसके साथ हुआ, कब, कहाँ और कैसे। इन्ह
पाँच के आसपास 6–8 वाक्य ल खए।
5. अंत म दो पं क्तयाँ अपनी ओर से जो ड़ए — यह समाचार आपको क्य अ ा लगा।
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खेल-समाचार का भाग क्या लखा जाता है
शीषक कम शब्दों में पूरी बात — “भारत ने जीता स्वण”
ान और त थ नई िद ल्ली, 20 अगस्त
पहला अनु ेद सबसे मुख्य बात — कौन जीता, िकतने अंतर से
बीच का भाग मैच का हाल , िकसने क्या िकया, कौन-से गोल या अंक
अंत िखलाड़ ी या कोच का कथन, अगला मुक़ ाबला कब है
नमूना उत्तर (खेल-समाचार):
शीषक — भारतीय हॉक ट म ने फ़ाइनल म बाज़ी मारी
(दै नक समाचार-पत्र, खेल पृष्ठ, 20 अगस्त)
चेन्नई, 19 अगस्त। ए शयाई हॉक च पयंस ॉफ़ के फ़ाइनल म भारत ने रोमांचक मुक़ाबले म जीत दज क । पहले
हाफ़ म दोन ट म बराबरी पर थ , ले कन दूसरे हाफ़ म भारतीय खला ड़य ने तेज़ी पकड़ी और लगातार दो गोल कर
दए। भारत क ओर से पहला गोल पेनल्ट कॉनर पर हुआ और दूसरा मैदानी गोल था। गोलक पर ने अं तम मनट म
दो शानदार बचाव करके ट म क बढ़त बनाए रखी। मैच के बाद कप्तान ने कहा क यह जीत कसी एक खलाड़ी क
नह , पूरी ट म क मेहनत का फल है।
मुझे यह समाचार क्य अ ा लगा: कप्तान क बात मुझे मेजर ध्यानचंद क याद दला गई, जो कहते थे क हार
या जीत मेरी नह , पूरे दे श क है।
प्र.2 (ख) मान ली जए क आप एक खेल-संवाददाता ह और कसी खेल का आँख दे खा प्रसारण कर रहे ह। अपने
समूह के साथ मलकर कक्षा म उस खेल का आँख दे खा हाल प्रस्तुत क जए। (संकेत— इस काय म आप
आकाशवाणी या दूरदशन पर प्रसा रत होने वाले खेल-प्रसारण क कमटरी क शैली का उपयोग कर सकते ह।
बारी-बारी से प्रत्येक समूह कक्षा म सामने डेस्क या कु सय पर बैठ जाएगा और पाँच मनट के लए कसी खेल के
सजीव प्रसारण क कमटरी का अ भनय करेगा।)
यह अ भनय और बोलने क ग त व ध है। ‘आँख दे खा हाल’ यानी जो सामने घट रहा है, उसे उसी समय शब्द म इस तरह कहना क
सुनने वाले को दृश्य दखाई दे ने लगे।
तैयारी कैसे कर:
1. खेल चु नए — हॉक , कब ी या क्रकेट, जसे समूह के सब लोग जानते ह ।
2. भू मकाएँ बाँ टए — एक मुख्य कमटे टर, एक सहयोगी (जो बीच-बीच म जानकारी जोड़े), एक वशेषज्ञ (पूव खलाड़ी) और
एक जो दशक के शोर क आवाज़ बनाए।
3. खला ड़य के नाम पहले तय कर ली जए, वरना बोलते समय अटक जाएँगे।
4. वतमान काल म बो लए — “गद अब मीरा के पास है”, न क “गद मीरा के पास थी”। यही कमटरी क जान है।
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5. आवाज़ म उतार-चढ़ाव र खए — साधारण पास पर धीमी आवाज़, गोल पर ऊँची और तेज़।
6. छोटे -छोटे वाक्य बो लए और खेल के शब्द इस्तेमाल क जए — पास, बल, पेनल्ट कॉनर, बचाव, मध्य रेखा, सीट ।
नमूना उत्तर (पाँच मनट क कमटरी का आरंभ):
“नमस्कार दशक ! म आपका साथी अनुज, और आप दे ख रहे ह जला व ालय हॉक प्र तयो गता का फ़ाइनल
मुक़ाबला — नवोदय व ालय बनाम आदश व ालय। मैदान खचाखच भरा है… और सीट बज चुक है, खेल शुरू!
गद नवोदय के पास… रो हत आगे बढ़ रहे ह… एक साफ़ पास बाईं ओर मीरा को… मीरा तेज़ दौड़ रही ह, दो
खला ड़य को छकाया… ओह! आदश क डफ़डर ने गद रोक ली। गद अब मध्य रेखा क ओर लौट रही है।
… और यह पेनल्ट कॉनर है, दशको, पेनल्ट कॉनर! नवोदय को सुनहरा मौका… गद रुक … रो हत का ज़ोरदार
हट… गोऽऽल! जी हाँ, गोल हो गया! पूरा मैदान ता लय से गूँज उठा है। नवोदय अब एक-शून्य से आगे…
… खेल के अं तम क्षण… सीट बजी! नवोदय व ालय दो-एक से वजयी! पर दे खए, दोन ट म हाथ मला रही ह,
मुस्कुरा रही ह — यही तो असली खेल भावना है। इसी के साथ मुझे और मेरे सा थय को इजाज़त द जए।
नमस्कार!”
आकलन म क्या दे खा जाएगा: आवाज़ स्पष्ट है या नह , वतमान काल का प्रयोग, खेल के शब्द क सही समझ,
समूह के सदस्य म तालमेल, और यह क सुनने वाले को दृश्य दखाई दया या नह ।
डायरी का प्रारंभ — पृष्ठ 20
पाठ से आगे
पाठ से आगे गतवध
प्र.1 कुछ लोग प्र त दन थोड़ी-थोड़ी बात कसी ान पर लख लेते ह। जो वे सोचते ह, या जो उनके साथ उस दन
हुआ या जो उन्ह ने दे खा, उसे ईमानदारी से लख लेते ह या टाइप कर लेते ह। इसे डायरी लखना कहते ह। क्या
आप भी अपने मन क बात और वचार को लखना चाहते ह? य द हाँ, तो आज से ही प्रारंभ कर द जए— •
आप जहाँ लखगे, वह माध्यम चुन ली जए। आप कसी लेखन-पु स्तका म या ऑनलाइन मंच पर लख सकते ह।
• आप प्र त दन, कुछ दन म एक बार या जब कुछ लखने का मन करे तब लख सकते ह। • शब्द या वाक्य क
कोई सीमा नह है चाहे दो वाक्य ह या दो पृष्ठ। आप जो मन म आए उसे उ चत और शालीन शब्द म लख सकते
ह।
यह जीवन भर काम आने वाली आदत डालने क ग त व ध है। पुस्तक ने तीन बात साफ़ कह द ह — माध्यम आपक मज़ का,
समय आपक मज़ का और लंबाई क कोई सीमा नह । बस एक शत है — भाषा उ चत और शालीन हो।
डायरी लखते समय ये बात ध्यान र खए:
हर प्र व ष्ट के ऊपर त थ और दन ज़रूर ल खए — बाद म पढ़ने पर वही सबसे काम आता है।
ल खए वही जो सचमुच हुआ या सचमुच महसूस हुआ। डायरी म सजावट क ज़रूरत नह , ईमानदारी क ज़रूरत है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
‘आज कुछ खास नह हुआ’ वाले दन भी दो पं क्तयाँ लख द जए — आदत टू टनी नह चा हए।
कसी के बारे म कड़वी या अपमानजनक बात मत ल खए। जो बात आप कसी के सामने न कह सक, वैसे शब्द डायरी म भी न
र खए।
बीच-बीच म एक छोटा-सा चत्र, पत्ती, टकट या टकट- चप्पी चपका द जए — डायरी और सुंदर बन जाएगी।
क्या लख उदाहरण
दन क कोई एक घटना आज खेल के पीिरयड में हमारी टीम पहली बार जीती।
कोई भाव या वचार आज मुझे बहुत डर लग रहा था, पर बोलने के बाद अच्छा लगा।
कुछ नया सीखा हुआ आज पता चला िक ‘छावनी’ का अथ सै िनकों के रहने की जगह होता है।
कोई पढ़ या सुनी बात ध् यानचंद कहते थे — हार या जीत मेर ी नही,ं पूरे दे श की है।
कल के लए कोई इरादा कल से रोज़ आधा घंटा हॉकी का अभ्यास क रूँ गा।
नमूना उत्तर (डायरी क एक प्र व ):
मंगलवार, 20 अगस्त
आज हद क कक्षा म हमने ‘गोल’ पाठ पढ़ा। मुझे वह जगह सबसे अ लगी जहाँ ध्यानचंद जी को सर पर हॉक
लग जाती है और वे लौटकर उसी खलाड़ी क पीठ थपथपा दे ते ह। म होता तो शायद गुस्सा कर बैठता।
खेल के पी रयड म हमारी ट म दो गोल से हार गई। पहले मुझे बहुत बुरा लगा, पर फर पाठ क वह पं क्त याद आ
गई — “हार या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श क है।” तब लगा क हारकर मुँह लटकाना भी तो खेल भावना के
वरुद्ध है। कल से म रोज़ शाम को आधा घंटा अभ्यास करूँगा।
आज एक नया शब्द भी सीखा — नौ स खया, यानी जसने अभी-अभी सीखना शुरू कया हो। ध्यानचंद जी भी
कभी नौ स खया ही थे!
डायरी लखने से लाभ क्या है: लखने से मन हल्का होता है, भाषा सुधरती है और कुछ महीन बाद अपनी ही
डायरी पढ़कर पता चलता है क आप कतना बदल चुके ह। ‘गोल’ जैसे संस्मरण भी तो कसी क सँभालकर रखी
गई याद से ही बनते ह।
आज क पहेली — पृष्ठ 20 और 21
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे पहे ली
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a s emएक रोचक पहेली द गई है। इसम आपको तीन खलाड़ी दखाई दे रहे ह। आपको पता लगाना है क कौन-से
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खलाड़ी ारा गोल कया जाएगा—
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उत्तर: गोल हरी गद वाली खलाड़ी करेगी — यानी चत्र म दाईं ओर खड़ी लड़क , जसने नारंगी ट -शट और नीली स्कट पहनी
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यह चत्र एक भूल-भुलैया (maze) है। मैदान पर बने पीले रास्ते तीन गद से शुरू होते ह, पर उनम से केवल एक रास्ता गोलपोस्ट
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तक पहुँचता है।
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उसक रास्ता कहाँ जाता है नतीजा
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शट, गुलाबी स्कट) नारंगी गद वाले रास्ते से जा मलता है। नह पहुँचता
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s mरास्ता है जो ऊपर बगनी गद तक जाता है — दोन एक ही
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बाईं ओर खड़ा खलाड़ी (नीली नारंग ी गेंद वही गोलपोस्ट तक
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पोशाक) घु मावदार लक र के दो सरे ह। नह पहुँचता
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दाईं ओर खड़ी लड़क हरी गेंद रास्ता पहले दा हने कनारे क ओर जाता है, फर ऊपर क ओर यही गोल करे गी
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(नारंगी ट -शट, नीली स्कट) मुड़कर घूमता हुआ सीधे गोलपोस्ट के मुँह पर जाकर रुकता है।
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seबजाय गोलपोस्ट से चलकर पीछे आइए। गोल के मुँह पर केवल एक ही रास्ता आकर रुका है, इस लए उसी एक
पहेली सुलझाने क तरक ब: ऐसी भूल-भुलैया को उलट दशा से हल क जए — गद से चलकर गोल तक जाने के
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लक र पर उँ गली रखकर पीछे लौटते जाइए। आप सीधे हरी गद तक पहुँच जाएँगे — बाक दोन रास्त म उलझना
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ही नह पड़ेगा।
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करके दे खए: पुस्तक के चत्र पर प सल क नोक रखकर धीरे-धीरे रेखा के साथ च लए, और जहाँ दो रेखाएँ पास-
पास दख वहाँ रुककर दे खए क वे सचमुच जुड़ी ह या केवल एक-दूसरे के ऊपर से नकल रही ह। यही इस पहेली
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का असली मज़ा है।
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a s em से — पृष्ठ 21, 22 और 23
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 आपने हॉक के बारे म बहुत-कुछ बात क होगी। अब हम हॉक जैसे ही अनोखे खेल के बारे म पढ़गे जसे आप
जैसे लाख ब े अपने गली-मुहल्ल म खेलते ह। इस खेल का नाम है— डाँडी या गोथा। (‘डाँडी या गोथा’ प ढ़ए
और सम झए क यह खेल कैसे खेला जाता है और यह हॉक से कन बात म अलग है।)
यह खेल क्या है: ‘डाँडी या गोथा’ भील- भलाला बच्च का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ — दोन शब्द का एक ही अथ है, खेलने
क हाथ-लकड़ी। यह खेल काफ़ -कुछ हॉक जैसा ही है, पर इसम न महँगा सामान चा हए, न बना-बनाया मैदान।
खेल साम ी (तीन ही चीज़):
1. बाँस के गु े क गद, जसे ‘दुईत’ कहते ह;
2. ‘गोथा’ — अं ेज़ी के ‘L’ अक्षर क तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस क डं डयाँ;
3. राख — जससे मैदान का सीमांकन कया जाता है और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाया जाता है।
कैसे खेल (संक्षेप म): टॉस जीतने वाला दल खेल शुरू करता है। गद बीच के छोटे वृत्त म रखी जाती है। हमला करने वाले दल के
खलाड़ी गद को पीटते हुए बचाव दल के दायरे म दूर तक ले जाना चाहते ह, और दोन दल का एक-एक खलाड़ी अपनी-अपनी
‘डी’ म खड़ा रहकर गद को रेखा पार करने से रोकता है। खलाड़ी दोन दल म कम-से-कम दो-दो होने चा हए।
दो वशेष नयम: (1) गद को शरीर के कसी भी अंग से न छू ना, न रोकना। (2) गद को हवाई शॉट न मारना और न हवा म शॉट
खेलकर साथी को पास दे ना। लकड़ी से गद रोकना या हट करना पूरी तरह ठ क है।
हार-जीत का फ़ैसला: इसम गोलपोस्ट नह होते, इस लए गोल गने ही नह जाते। जो दल गद को अ धक-से-अ धक बार वरोधी के
पाले म ढकेलता है, वही बलवान और वजयी माना जाता है।
तुलना का बदु हॉक डाँडी या गोथा
गोलपोस्ट होते है,ं गोल िगने जाते है ं नही ं होते; गोल का मामला ही नही ं बनता
गद िवशेष रूप से बनी हुई हॉकी बॉल बाँस के गु े की साधारण गेंद — ‘दुईत’
स्टक बनी-बनाई हॉकी िस्टक ‘L’ की तरह मुड़ी बाँस की डंडी — ‘गोथा’
स्टक का प्रयोग के वल एक ओर से खेल सकते दोनों ओर से खेल सकते है ं
है ं
खला ड़य क पत्येक दल में ग्यारह चाहे िजतने; कम-से -कम दो-दो
संख्या
मैदान बना-बनाया मैद ान, िखंची हुई राख से बनाया गया घे रा और बीच में छोटा वृत्त
रे खाएँ
जीत का आधार अिधक गोल करने वाला दल िवरोधी के पाले में गेंद अिधक बार ढके लने वाला दल
कब खेला जाता है वष भर होली से कु छ िदन पहले से ; होिलका जलने के िदन दुइत और गोथे आग में डाल
िदए जाते है ं
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कक्षा 6 हद अध्याय 2 गोल AglaSem · NCERT Solutions
सोचने क बात: हॉक के लए महँगा सामान चा हए, पर ‘डाँडी या गोथा’ बाँस और राख से खेला जा सकता है।
यही हमारे स्वदे शी खेल क सबसे बड़ी खूबी है — वे उसी सामान से बन जाते ह जो आस-पास पहले से मौजूद है,
इस लए हर बच्चा खेल सकता है।
‘झरोखे से’ का अथ: झरोखा यानी खड़क । जैसे खड़क से बाहर क दु नया क एक झलक दखती है, वैसे ही
इस भाग म पाठ से जुड़ी कोई और रचना या जानकारी क झलक द जाती है। यहाँ हॉक वाले पाठ के बाद हम
भारत के एक लोक-खेल क झलक मली।
साझी समझ — पृष्ठ 23
पाठ से आगे
पाठ से आगे गतवध
प्र.1 (क) आपने इस खेल के नयम पढ़कर अ तरह समझ लए ह। अब अपने मत्र के साथ मलकर ‘डाँडी’ या
‘गोथा’ खेल खे लए।
यह करके सीखने क ग त व ध है। खेलने से पहले यह तैयारी कर ली जए—
1. सामान जुटाइए। बाँस या कसी सुर क्षत लकड़ी क नीचे से मुड़ी डं डयाँ (गोथा) और एक छोट , हल्क गद (दुईत)। य द बाँस न
मले तो प्ला स्टक क हॉक स्टक और रबर क गद से भी काम चल जाएगा।
2. मैदान बनाइए। राख या चूने से एक बड़ा घेरा ख चए, बीच म एक छोटा वृत्त बनाइए और दोन ओर एक-एक ‘डी’ बना
ली जए। बीच म एक रेखा ज़रूर ख चए, क्य क हार-जीत इसी रेखा के पार गद ढकेलने से तय होगी।
3. दो दल बनाइए — हर दल म कम-से-कम दो खलाड़ी।
4. टॉस क जए। जीतने वाला दल खेल शुरू करेगा।
5. दो नयम ज़ोर से दोहराइए — गद को शरीर से न छू ना, और हवाई शॉट न मारना। एक साथी को ‘ नणायक’ बना द जए जो
गनती रखे क कस दल ने कतनी बार गद वरोधी के पाले म ढकेली।
6. खेल के बाद बात क जए — यह हॉक से कहाँ आसान लगा और कहाँ क ठन?
सुरक्षा सबसे पहले: डंडी हमेशा घुटन से नीचे र खए और गद को कभी हवा म मत उछा लए — पाठ म दया गया
यह नयम केवल खेल का नयम नह , सुरक्षा का नयम भी है। खेलने से पहले मैदान से पत्थर और काँच हटा ली जए,
और शक्षक या कसी बड़े क दे ख-रेख म ही खे लए।
नमूना उत्तर (खेल के बाद क टप्पणी): “हमने आठ बच्च के दो दल बनाकर मैदान म यह खेल खेला। शुरू म गद
बार-बार पैर से छू जाती थी और हम अंक गँवाने पड़ते थे, पर थोड़ी दे र म हम सँभल गए। सबसे मज़े क बात यह
लगी क गोथा दोन ओर से चलाया जा सकता है, इस लए गद को मोड़ना हॉक से आसान था। हमारे दल ने गद नौ
बार वरोधी के पाले म ढकेली और दूसरे दल ने छह बार, इस लए हम जीत गए।”
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प्र.2 (ख) आप भी ‘डाँडी’ या ‘गोथा’ जैसे अनेक स्वदे शी खेल अपने मत्र के साथ मलकर अपने व ालय, घर या
मोहल्ले म खेलते ह गे। अब आप ऐसे ही कसी एक खेल के नयम इस प्रकार से ल खए क उन्ह पढ़कर कोई भी
ब ा उस खेल को समझ सके और खेल सके।
यह लेखन का प्रश्न है। नयम लखते समय ठ क वही क्रम र खए जो पुस्तक ने ‘डाँडी या गोथा’ के लए रखा है — इससे लखना
आसान भी हो जाता है और पढ़ने वाले को सब कुछ मल भी जाता है।
भाग उसम क्या लख
1. खेल का नाम और प रचय यह कहाँ खेल ा जाता है, दू स रे नाम क्या है,ं िकतने बच्चे खेल सकते है ं
2. खेल साम ी क्या-क्या चािहए और िकतना बड़ ा
3. मैदान िकतना बड़ ा, कौन-सी रे खाएँ या घे रे बनाने है ं
4. कैसे खेल क्रम से , िगनती लगाकर — शुरुआत कैसे होती है से ले कर खेल आगे कैसे बढ़ ता है तक
5. वशेष नयम क्या करना मना है (‘आउट’ कब होते है)ं
6. हार-जीत िवजेता कै से तय होगा
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नमूना उत्तर:
पट्ठू (सतो लया / लगोरी / सात पत्थर)
प रचय — यह भारत के लगभग हर गाँव और मुहल्ले म खेला जाने वाला खेल है। इसे कह पट्ठू, कह सतो लया
और कह लगोरी कहते ह। इसम दो दल होते ह और हर दल म कम-से-कम तीन खलाड़ी।
खेल साम ी — 1. सात चपटे पत्थर, जो एक-दूसरे से थोड़े छोटे ह । 2. एक रबर या कपड़े क नरम गद।
मैदान — खुली, समतल जगह। बीच म सात पत्थर एक के ऊपर एक रखकर मीनार बनाइए। मीनार से लगभग छह
कदम दूर एक रेखा ख च ली जए, जहाँ से गद फक जाएगी।
कैसे खेल —
1. टॉस से तय क जए क कौन-सा दल पहले गद फकेगा (हमलावर दल) और कौन-सा रोकेगा (बचाव दल)।
2. हमलावर दल का एक खलाड़ी रेखा से गद फककर पत्थर क मीनार गराता है। हर खलाड़ी को तीन मौके
मलते ह।
3. मीनार गरते ही हमलावर दल के खलाड़ी दौड़कर पत्थर को फर से एक के ऊपर एक जमाने क को शश करते
ह।
4. इसी बीच बचाव दल गद उठाकर हमलावर खला ड़य को गद से छू ने (मारने) क को शश करता है।
5. जस खलाड़ी को गद छू जाए, वह उस पारी के लए बाहर हो जाता है।
वशेष नयम — (क) गद कमर से नीचे ही मारी जाएगी, सर या मुँह पर नह । (ख) गद हाथ म लेकर दौड़ना मना है;
उसे साथी को पास दे ना होगा। (ग) मीनार बनाते समय पत्थर पैर से नह छु ए जाएँगे।
हार-जीत — य द हमलावर दल पूरे सात पत्थर जमाकर ज़ोर से “ पट्ठू!” बोल दे , तो उसे एक अंक मलता है। य द
उससे पहले उसके सारे खलाड़ी गद से छू लए जाएँ, तो अंक बचाव दल को मलता है। जस दल के पाँच अंक पहले
पूरे ह , वही वजयी।
लखते समय ध्यान र खए: वाक्य छोटे र खए और हर नयम को अलग नंबर द जए। ‘आप’ या ‘ खलाड़ी’ कहकर
सीधे नदश द जए — “गद फ कए”, “पत्थर जमाइए”। ऐसे नयम पढ़कर वह बच्चा भी खेल सकेगा जसने यह
खेल कभी दे खा न हो — और यही इस प्रश्न क असली कसौट है।
खोजबीन के लए — पृष्ठ 23
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे प रयोजना
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a s emध्यानचंद जी के वषय म कुछ साम ी द गई है जैसे— फल्म, साक्षात्कार आ द, इन्ह पुस्तक म दए गए
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नीचे
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प्र.1
क्यू.आर. कोड क सहायता से पढ़, दे ख व समझ। • हॉक के जादूगर - मेजर ध्यानचंद - प्रेरक गाथाएँ • हॉक के
जादूगर- मेजर ध्यानचंद • ओलं पक • मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार
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यह दे खने-सुनने और खोजबीन करने क ग त वaधgहै। पुस्तक के पन्ने पर छपे क्यू.आर. कोड को शक्षक या घर के कसी बड़े क
सहायता से स्कैन क जए और चार साम याँ दे खए। हर एक के बाद अपनी लेखन पु स्तका म यह ता लका भरते जाइए।
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पाठ से क्या जुड़ता है m
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साम ी इसम क्या मलेगा
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s e mे जादूगर - मेजर ध् यानचंद के जीवन की पेर णा दे ने वाली छोटी-
a द - प्रेरक गाथाएँ
हॉक क पाठ म जो एक घटना (1933 का मैच) आई है, वैसी
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ध्यानचं छोटी स च्ची घटनाएँ। ही और घटनाएँ यहाँ मलगी।
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हॉक के जादूगर - मेजर उनके पूरे जीवन का पिरचय — पयाग में जन्म, ‘लेखक से प रचय’ (पृष्ठ 16) म द गई बात का
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ध्यानचंद झाँस ी, से ना में भत , तीन ओलंिपक वस्तार।
ओलंिपक खेल a
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seहै,ं कब और कहाँ होते है,ं
ओलं पक
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भारत काaपgदशन।
क्या पाठ म आए ‘ब लन ओलं पक 1936’ और ‘स्वण
पदक’ को समझने म मदद।
उनसे पूछे गए पश्न और उनके अपने उ त्तर।
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मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार यहाँ आप उन्ह क ज़बानी सुनगे वही बात जो पाठ म
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लखी है — लगन, साधना और खेल भावना।
cनoतेmसमय ये तीन बात ज़रूर नोट क जए: g l as
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दे खते-सु
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gl 1. कोई एक नई जानकारी जो पाठ म नह थी;
a 2. ध्यानचंद जी का कोई एक कथन जो आपको सबसे अ ा लगा;
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3. कोई नया शब्द और उसका अथ।
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साक्षात्कार क्या होता है: ‘साक्षात्कार’ यानी आमने-सामने बैठकर क गई बातचीत, जसम एक व्य क्त प्रश्न पूछता
है और दूसरा उत्तर दे ता है (अं ेज़ी म interview)। आप भी अपने व ालय के कसी खलाड़ी या खेल- शक्षक का
ऐसा ही छोटा-सा साक्षात्कार लेकर लख सकते ह — यह इस ग त व ध का बहुत अ
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ा वस्तार होगा।
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a s em के लए — पृष्ठ 24
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पढ़ने
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पढ़ने के लए
पढ़ने के लए
प्र.1 पढ़ने के लए — ‘एक दौड़ ऐसी भी’। कई साल पहले ओलं पक खेल के दौरान एक वशेष दौड़ होने जा रही थी।
सौ मीटर क इस दौड़ म एक आश्चयजनक घटना हुई। नौ प्र तभागी आरं भक रेखा पर तैयार खड़े थे। उन सभी को
कोई-न-कोई शारी रक वकलांगता थी… इस रचना को प ढ़ए और इसका भाव सम झए।
कथा-सार: कई साल पहले ओलं पक खेल के दौरान सौ मीटर क एक वशेष दौड़ हुई। आरं भक रेखा पर नौ प्र तभागी खड़े थे
और सभी को कोई-न-कोई शारी रक वकलांगता थी। सीट बजी और सब दौड़ पड़े। तभी एक छोटा लड़का ठोकर खाकर
लड़खड़ाया, गरा और रो पड़ा। उसक पुकार सुनकर बाक सब प्र तभागी दौड़ना छोड़कर लौट आए। उन्ह ने उसे दोबारा खड़ा कया,
उसके आँसू प छे और धूल साफ़ क । फर सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मलकर दौड़ लगाई — और सब के सब एक
साथ अं तम रेखा तक पहुँच गए। दशक मंत्रमुग्ध रह गए। अब सवाल यह था क कसी एक को स्वण पदक कैसे दया जाए?
नणायक ने ब ढ़या हल नकाला — सबको स्वण पदक दया गया। उस दन ता लयाँ थमने का नाम ही नह ले रही थ ।
मुख्य भाव: जीत से भी बड़ी कोई चीज़ होती है — मनुष्यता और मत्रता। नौ बच्च म से हर एक जीत सकता था, पर उन्ह ने
अकेले जीतने के बजाय साथ चलना चुना। जस दौड़ म कोई पीछे न छू टे , वही सबसे सुंदर दौड़ है।
इस रचना क खास कहानी म कहाँ वह क्या कहती है
बात
पहली पं क्त म ही “एक आश्चयजनक घटना हुई” पाठक आगे पढ़ने के लए बँध जाता है।
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मोड़ (ट नग पॉइंट) “सब के सब लौट आए।” यह से दौड़ प्र तयो गता न रहकर मत्रता क कहानी बन
जाती है।
छोटा-सा दृश्य, बड़ी “उसके आँस ू पोंछे, धूल साफ़ की।” बड़ी-बड़ी बात कहे बना, केवल दो काम दखाकर पूरी
बात करुणा सामने रख द गई।
नणायक क सूझ “सबको स्वण पदक दे क र समस्या का बिढ़ या हल नयम भी तब बदले जा सकते ह जब सामने कोई इससे बड़ी
ढू ँढ़ िनकाला।” बात हो।
‘गोल’ पाठ से संबंध: दोन रचनाओं का हृदय एक ही है — खेल भावना। ध्यानचंद गद गोल के पास ले जाकर
साथी को दे दे ते थे ता क ेय उसे मले; इस दौड़ म बच्चे अपनी जीत छोड़कर गरे हुए साथी के पास लौट आए।
ध्यानचंद कहते ह — “हार या जीत मेरी नह , ब ल्क पूरे दे श क है”; ये बच्चे कहते ह — जीत मेरी अकेले क नह ,
हम सबक है।
सो चए और ल खए: य द उस दन आप उन नौ म से एक होते, तो क्या करते — दौड़ पूरी करते या लौट आते?
अपने उत्तर का कारण दो-तीन वाक्य म ल खए। और हाँ, कहानी का शीषक ‘एक दौड़ ऐसी भी’ क्य रखा गया —
इस पर भी अपने समूह म बात क जए। ‘ऐसी भी’ शब्द ही बता दे ते ह क यह दौड़ बाक सब दौड़ से अलग थी।
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अध्याय — एक नज़र म
गोल मेजर ध्यानचंद का लखा हुआ संस्मरण है, यानी अपने जीवन क सच्ची याद का लेखा। यह उनक आत्मकथा ‘गोल’
का एक अंश है और पूरा पाठ ‘म’ शैली म यानी स्वयं खलाड़ी क ज़बानी कहा गया है।
पहली घटना (सन् 1933): पंजाब रे जमट और ‘सपस एंड माइनस ट म’ के मुक़ाबले म एक वरोधी खलाड़ी ने गुस्से म
ध्यानचंद के सर पर हॉक स्टक दे मारी। प बाँधकर लौटे ध्यानचंद ने उसक पीठ थपथपाकर कहा — “इसका बदला म
ज़रूर लूँगा”, और फर एक के बाद एक छह गोल कर दए। यही उनका ‘बदला’ था।
जीवन-प रचय: जन्म सन् 1905 म प्रयाग म, बाद म प रवार झाँसी आ बसा। 16 साल क उम्र म ‘फस्ट ाह्मण रे जमट’ म
साधारण सपाही बने। सूबेदार मेजर तवारी के बार-बार कहने पर हॉक खेलना शुरू कया — तब तक वे एक नौ स खया
खलाड़ी थे।
ब लन ओलं पक, 1936: लांस नायक ध्यानचंद को भारतीय हॉक ट म का कप्तान बनाया गया। उनका खेल दे खकर लोग ने
उन्ह “हॉक का जादूगर” कहना शुरू कर दया। भारत ने स्वण पदक जीता।
पाठ का संदेश: सफलता का कोई गुरु-मंत्र नह होता — “लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र ह।”
ध्यानचंद गद गोल के पास ले जाकर साथी को दे दे ते थे ता क गोल का ेय उसे मले, और मानते थे क “हार या जीत मेरी
नह , ब ल्क पूरे दे श क है।”
भाषा-अभ्यास म शब्द-युग्म (जैसे-जैसे, धक्का-मुक्क , हार-जीत), योजक चह्न और बात पर बल दे ने वाले शब्द ‘ही’, ‘भी’,
‘तो’ पढ़ाए गए ह। साथ म एक भूल-भुलैया वाली पहेली, भील- भलाला बच्च के खेल ‘डाँडी या गोथा’ का प रचय और पढ़ने
के लए मा मक कहानी ‘एक दौड़ ऐसी भी’ द गई है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
संस्मरण बीती हुई सच्ची घटनाओं की याद, जो “यह पाठ एक प्र सद्ध खलाड़ी के संस्मरण दादाजी ने अपने गाँव का एक
ले खक स्वयं िलखता है का एक अंश है।” रोचक संस्मरण सुनाया।
धक्का- एक-दू स रे को धके लना, ठे ल मठे ल “खेल के मैदान म धक्का-मुक्क और न क- बस म चढ़ते समय धक्का-मुक्क
मुक्क झ क क घटनाएँ होती रहती ह।” नह करनी चा हए।
न क-झ क हल्की कहा-सुनी, मीठी तकरार “…और न क-झ क क घटनाएँ होती रहती दोन भाइय म दन भर न क-
ह।” झ क चलती रहती है।
रे जमट से ना की एक बड़ी टुक ड़ी या दल “म पंजाब रे जमट क ओर से खेला करता उसके पता एक रे जमट म
था।” सूबेदार ह।
छावनी सै िनकों के रहने का ेत्र , कैं टोनमेंट “हमारी छावनी म हॉक खेलने का कोई छावनी के मैदान म रोज़ परेड
न त समय नह था।” होती है।
सूबेदार स्वतंत्र ता से पहले भारतीय सै न्य अिधकािरयों “हमारी रे जमट के सूबेदार मेजर तवारी थे।” सूबेदार ने नए सपा हय को
का दू स रा सबसे बड़ा पद अभ्यास कराया।
लांस नायक भारतीय से ना का एक पद (रै ंक ) “उस समय म सेना म लांस नायक था।” वे तीन साल म सपाही से लांस
नायक बन गए।
नौ स खया िजसने अभी-अभी सीखना शुरू िकया हो, “उस समय तक म एक नौ स खया खलाड़ी नौ स खया होते हुए भी उसने
अनाड़ी था।” अ ा प्रदशन कया।
नखार सुंद रता या ग ण
ु का बढ़ ना, चमक आना “जैसे-जैसे मेरे खेल म नखार आता गया…” अभ्यास से उसक लखावट म
नखार आ गया।
तरक्क उन्नित, पदोन्नित, आगे बढ़ ना “…वैसे-वैसे मुझे तरक्क भी मलती गई।” मेहनत करने वाल को तरक्क
अवश्य मलती है।
ेय िकसी अच्छे काम का यश या से हरा “…ता क उसे गोल करने का ेय मल इस जीत का ेय पूरी ट म को
जाए।” जाता है।
खेल भावना खेल को सही ढं ग से , िबना ेष के खेल ने का “लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता हारकर भी वरोधी को बधाई दे ना
भाव (स्पोट् स मैनिशप) के सबसे बड़े मंत्र ह।” सच्ची खेल भावना है।
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