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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 4: हार क जीत
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
33 – 44 12 25 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 29 pages
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
क ा 6 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: हार क जीत
NCERT कक्षा 6 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 4 हार क जीत के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह पाठ हद के प्र सद्ध कहानीकार सुदशन
(वास्त वक नाम — बदरीनाथ भट्ट, 1896–1983) क लखी एक कहानी है, जसम बाबा भारती, उनका घोड़ा सुलतान और डाकू खड़्ग सह ह। पृष्ठ
33 से 44 तक क हर ग त व ध — मेरी समझ से, शीषक, पं क्तय पर चचा, सोच- वचार के लए, दनचया, कहानी क रचना, मुहावरे कहानी से,
कैसे-कैसे पात्र, सुलतान क कहानी, मन के भाव, झरोखे से और खोजबीन के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (क ा 6) 33 – 44
खं ड प्रश्न
12 25
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 39
पाठ से
पाठ से
प्र.1 आइए, अब हम ‘हार क जीत’ कहानी को थोड़ा और नकटता से समझ लेते ह। (क) नीचे दए गए प्रश्न का
★
सट क उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा ( ) बनाइए— (1) सुलतान के छ ने जाने का बाबा भारती पर क्या
प्रभाव हुआ? • बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया। • बाबा भारती ने गरीब क सहायता करना
बंद कर दया। • बाबा भारती ने ार बंद करना छोड़ दया। • बाबा भारती असावधान हो गए।
सही उत्तर है — बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया। इसी वकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
कहानी क पं क्त ही इसका प्रमाण है — “ कसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठ लेकर पहरा दे ते थे, परंतु आज उन्ह कसी चोरी,
कसी डाके का भय न था।” डर तब तक था जब तक खोने के लए सुलतान था; सुलतान चला गया, तो डर भी चला गया।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / कारण
ग़लत
बाबा भारती के मन से चोरी सही ★ लेखक ने साफ़ शब्द म यही लखा है। पहले “सारी रात अस्तबल क रखवाली म कटने
का डर समाप्त हो गया। लगी”, अब “ कसी चोरी, कसी डाके का भय न था”।
बाबा भारती ने गरीब क ग़लत बलकुल उलटा हुआ। उनक चता ही यही थी क कह दूसरे लोग गरीब क सहायता
सहायता करना बंद कर दया। करना न छोड़ द — “दु नया से व ास उठ जाएगा।”
बाबा भारती ने ार बंद करना ग़लत उस रात “फाटक खुला पड़ा था” — यह सच है, पर यह एक रात क बात है, कोई नई
छोड़ दया। आदत नह । और यह अपने आप म प्रभाव नह , ऊपर वाले प्रभाव (डर मट जाने) का चह्न
भर है।
बाबा भारती असावधान हो ग़लत यह घोड़ा छनने के पहले क बात है — “कई मास बीत गए और वह न आया… बाबा
गए। भारती कुछ असावधान हो गए”। यही असावधानी तो घोड़ा छनने का कारण बनी, प रणाम
नह ।
ध्यान र खए: बहु वकल्पीय प्रश्न म अक्सर एक वकल्प ऐसा होता है जो कहानी म है तो सही, पर ग़लत जगह का
होता है। यहाँ ‘असावधान हो गए’ ठ क वैसा ही जाल है — घटना स ी, पर समय ग़लत।
प्र.2 (2) “बाबा भारती भी मनुष्य ही थे।” इस कथन के समथन म लेखक ने कौन-सा तक दया है? • बाबा भारती ने
डाकू को घमंड से घोड़ा दखाया। • बाबा भारती घोड़े क प्रशंसा दूसर से सुनने के लए ाकुल थे। • बाबा भारती
को घोड़े से अत्य धक लगाव और मोह था। • बाबा भारती हर पल घोड़े क रखवाली करते रहते थे।
सही उत्तर है — बाबा भारती घोड़े क प्रशंसा दूसर से सुनने के लए ाकुल थे। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
यहाँ अनुमान लगाने क ज़रूरत ही नह — लेखक ने तक ठ क अगले वाक्य म दे दया है:
“बाबा भारती भी मनुष्य ही थे ।
अपनी चीज़ की पशंसा दू सरे के मुख से सुनने के िलए उनका हृदय भी अधीर हो गया।”
दोन वाक्य आगे-पीछे ह। पहला वाक्य दावा है, दूसरा उसका कारण। इसी लए यही वकल्प ‘तक’ कहलाएगा।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प क्य नह
डाकू को घमंड से घोड़ा यह बात सच है (“बाबा ने घोड़ा दखाया घमंड से”), पर यह उस वाक्य से पहले आई है और लेखक ने उसे
दखाया इस कथन का कारण बनाकर नह रखा।
घोड़े से अत्य धक लगाव और यह पूरी कहानी म फैली हुई बात है, कोई एक तक नह । लेखक ने ‘मनुष्य ही थे’ के ठ क साथ यह कारण
मोह था नह जोड़ा।
हर पल रखवाली करते रहते यह डर का प रणाम है और बाद क घटना है — खड़्ग सह क धमक के बाद क ।
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“भी मनुष्य ही थे” का अथ क्या है: बाबा भारती साधु थे, उन्ह ने रुपया, माल, ज़मीन सब छोड़ दया था। फर भी
एक छोट -सी मानवीय कमज़ोरी उनम बची रह गई — अपनी प्रय वस्तु क तारीफ़ सुनने का लोभ। यही
कमज़ोरी उनसे घोड़े क चाल दखवा दे ती है और वह से डाकू के मन म लालच जन्म लेता है। लेखक यह कहकर
बाबा भारती को छोटा नह कर रहा — वह दखा रहा है क बड़े-से-बड़े व्य क्त भी अपनी छोट -सी कमज़ोरी से चूक
सकते ह।
प्र.3 (ख) अब अपने मत्र के साथ चचा क जए क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
यह चचा का प्रश्न है। चचा म आपका उत्तर तभी मज़बूत माना जाएगा जब आप उसके साथ कहानी क एक पं क्त प्रमाण के रूप
म रख सक।
अ चचा म तीन बात होनी चा हए —
आपने कौन-सा वकल्प चुना;
कहानी क वह पं क्त जो उसे सद्ध करती है;
बाक़ वकल्प क्य नह चुने — कम-से-कम एक का कारण।
नमूना उत्तर:
“पहले प्रश्न म मने चुना — बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया। कारण यह है क कहानी म
लखा है, ‘ कसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठ लेकर पहरा दे ते थे, परंतु आज उन्ह कसी चोरी, कसी डाके का
भय न था।’ ‘असावधान हो गए’ वाला वकल्प मने इस लए नह चुना, क्य क वह घोड़ा छनने से पहले क बात है।
दूसरे प्रश्न म मने चुना — बाबा भारती घोड़े क प्रशंसा दूसर से सुनने के लए ाकुल थे। कारण यह क ‘बाबा
भारती भी मनुष्य ही थे’ के ठ क बाद लेखक ने स्वयं लखा है — ‘अपनी चीज़ क प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के
लए उनका हृदय भी अधीर हो गया।’ जब लेखक ने कारण खुद लख दया हो, तो वही तक माना जाएगा।”
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत
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चचा का असली लाभ: हो सकता है आपके कसी मत्र ने दूसरा वकल्प चुना हो। उससे बहस मत क जए —
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पू छए क उसने कौन-सी पं क्त के आधार पर चुना। इस तरह पूरी कक्षा को यह आदत पड़ती है क उत्तर अनुमान से
o जाता है।
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शीषक — पृष्ठ 40
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पाठ से
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(क) आपने अभी जो कहानी पढ़ है, इसका नाम सुदशन ने ‘हार क जीत’ रखा है। अपने समूह म चचा करके
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प्र.1
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ल खए क उन्ह ने इस कहानी को यह नाम क्य दया होगा? अपने उत्तर का कारण भी ल खए।
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a ‘हार क जीत’ नाम इस लए रखा गया है क इस कहानी म हार आ ख़र म जीत बन जाती है। ऊपर से देखने पर बाबा भारती हारे
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— उनका प्रय घोड़ा सुलतान छन गया। पर वे जस बात के लए लड़ रहे थे, वह जीत गई; और अंत म घोड़ा भी अपने आप लौट
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आया।
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वह हार जीत कैसे बन गई कहानी का प्रमाण
दखती है
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बाबा भारती — उ न्होंने घोड़ ा तो खोया, पर मनुष्य पर से िवश्वास बचा िलया। यही “लोगों को यिद इस घटना का पता चला तो वे
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घोड़ा छन गया उनकी असली जीत है — और घोड़ ा भी उसी रात लौट आया। िकसी गरीब पर िवश्वास न करे ंग े। दुिनया से
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agl खड़्ग सह — वह घोड़ ा पाकर भी हार गया, क्योंिक उसका अपना मन उसे िधक्कारने “इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के
लगा। और जब उसने घोड़ ा लौटा िदया, तो असल में उसने अपने
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घोड़ा जीत लया आँस ू थे। ”
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भीतर के डाकू को हराकर जीत हािसल की।
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कारण सं ेप म —
बाबा भारती ने घोड़ा वापस नह माँगा; उन्ह ने केवल यह माँगा क घटना छपी रहे। यह त्याग ही उनका सबसे बड़ा ह थयार बन
गया।
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उनक इसी बात ने एक कुख्यात डाकू का हृदय बदल दया — “कैसे ऊँचे वचार ह, कैसा प वत्र भाव है!”
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अंत म दोन के आँसू एक ही जगह मट्ट पर गरते ह। यानी हार-जीत का भेद ही मट जाता है — दोन जीत गए।
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ag शीषक क परख कैसे कर: एक अ ा शीषक कहानी क सबसे बड़ी घटना या सबसे बड़े वचार को पकड़ता है।
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यहाँ सबसे बड़ी घटना घोड़े का छनना नह , ब ल्क डाकू का बदल जाना है — और वह बदलाव बाबा भारती क
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‘हार’ से ही आया। इसी लए ‘हार क जीत’ नाम ठ क बैठता है। य द कहानी का नाम केवल ‘सुलतान’ होता, तो वह
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घोड़े क कहानी लगती, मनुष्यता क नह ।
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प्र.2 (ख) य द आपको इस कहानी को कोई अन्य नाम दे ना हो तो क्या नाम दगे? आपने यह नाम क्य सोचा, यह भी
बताइए।
इसका कोई एक न श्चत उत्तर नह है — पर हर नाम के साथ कारण दे ना ज़रूरी है। नीचे कुछ अ े वकल्प और उनके कारण दए
गए ह; आप इनम से चुन सकते ह या इन्ह क तज़ पर अपना नाम सोच सकते ह।
संभा वत यह नाम क्य
शीषक
िवश्वास की जीत कहानी का कद्र- बदु घोड़ा नह , व ास है। बाबा भारती को घोड़े से अ धक इस बात क चता है क दु नया से गरीब पर
से व ास न उठ जाए।
पश्चाताप के आँस ू कहानी का सबसे मा मक क्षण वही है जब डाकू क आँख म आँसू आ जाते ह और वह चुपचाप घोड़ा बाँध जाता है।
दो आँस ू अं तम दृश्य म बाबा भारती और खड़्ग सह के आँसू एक ही मट्ट पर गरकर मल जाते ह — पूरी कहानी इसी एक चत्र
म समट आती है।
सुल तान घोड़ा ही वह कड़ी है जो साधु और डाकू को आपस म जोड़ता है; कहानी उसी के इद- गद घूमती है।
स च्ची जीत यह बताता है क जीत बल से नह , बड़े मन से मलती है।
नमूना उत्तर:
“म इस कहानी को ‘ व ास क जीत’ नाम दूँ गा/दूँ गी। मने यह नाम इस लए सोचा, क्य क बाबा भारती घोड़ा छन
जाने पर भी दुखी नह हुए। उन्ह ने खड़्ग सह से केवल इतना कहा क इस घटना को कसी के सामने प्रकट न करना,
नह तो लोग कसी गरीब पर व ास करना छोड़ दगे। यानी उनके लए अपने घोड़े से बड़ी चीज़ लोग का आपसी
व ास थी। अंत म यही व ास जीतता है — डाकू का मन बदल जाता है और वह घोड़ा लौटा दे ता है। इस लए मुझे
‘ व ास क जीत’ नाम सबसे उ चत लगता है।”
ध्यान द जए: शीषक बदलते समय यह दे खए क नया नाम कहानी का अंत खोल तो नह दे ता। जैसे ‘डाकू ने घोड़ा
लौटाया’ नाम अ ा नह होगा — वह पढ़ने से पहले ही सारा रहस्य बता दे ता है। अ ा शीषक इशारा करता है, भेद
नह खोलता।
प्र.3 (ग) बाबा भारती ने डाकू खड़्ग सह से कौन-सा वचन लया?
बाबा भारती ने खड़्ग सह से यह वचन लया क वह घोड़ा छ नने क इस घटना को कसी के सामने प्रकट न करे — कसी को
न बताए क उसने अपा हज बनकर, दया का सहारा लेकर घोड़ा ह थया लया।
उनके अपने शब्द थे —
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“यह घोड़ ा त म्ु हारा हो चुक ा है। मै ं त मु से इसे वापस करने के िलए न कहूँगा।
… मेरी पाथना के वल यह है िक इस घटना को िकसी के सामने पकट न करना।”
वचन लेने का कारण उन्ह ने स्वयं बताया — “लोग को य द इस घटना का पता चला तो वे कसी गरीब पर व ास न करगे। दु नया
से व ास उठ जाएगा।”
यह वचन इतना बड़ा क्य है: सो चए, उनके पास माँगने को कुछ भी था — घोड़ा वापस, या दं ड, या कम-से-कम
एक शकायत। पर उन्ह ने वह माँगा जससे उनका अपना कोई लाभ नह था। य द यह बात फैल जाती, तो आगे कोई
राहगीर कसी सचमुच के अपा हज या ज़रूरतमंद क मदद करने से पहले सौ बार सोचता। बाबा भारती ने अपना
घोड़ा दे कर दूसरे अनजान गरीब का भ वष्य बचा लया। यही बात खड़्ग सह को भीतर तक हला दे ती है।
कहानी का अंत इसी वचन से जुड़ा है: घोड़ा लौटाने के बाद बाबा भारती कहते ह — “अब कोई गरीब क
सहायता से मुँह न मोड़ेगा।” यानी उन्ह घोड़ा मलने क नह , अपनी बात के जीत जाने क ख़ुशी है।
पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 40
पाठ से
पाठ से
प्र.1 कहानी म से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दए गए ह। इन्ह ध्यान से प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार ल खए— “भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अपण हो
जाता।”
सीधा अथ: बाबा भारती का दन दो ही काम म बँटा था — भगवान का भजन और सुलतान क सेवा। भजन के बाद जतना भी
समय बचता, वह पूरा-का-पूरा घोड़े को दे दया जाता था।
इस वाक्य म असली बात क्या छपी है: ‘अपण’ शब्द पर ध्यान द जए। अपण तो दे वता को कया जाता है।
लेखक यह कहकर बहुत चतुराई से बता दे ता है क बाबा भारती के जीवन म घोड़ा दूसरे नंबर का दे वता बन चुका है।
यानी जस साधु ने रुपया, माल, ज़मीन सब त्याग दया, वह एक घोड़े के मोह म बँध गया।
यही वाक्य पूरी कहानी क न व रखता है —
इतना गहरा लगाव था, तभी घोड़ा छनने का दुख इतना बड़ा बनता है;
और तभी यह बात च काती है क ऐसे प्रय घोड़े को खोकर भी बाबा भारती के मुख पर “दुख क रेखा तक दखाई न पड़ती
थी”।
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चचा के लए: क्या कसी वस्तु या प्राणी से इतना लगाव रखना ठ क है? कक्षा म दोन पक्ष र खए — एक ओर यह
प्रेम है, दूसरी ओर यही मोह बाबा भारती क कमज़ोरी भी बनता है, जसके कारण वे घमंड से घोड़े क चाल दखा
बैठते ह।
प्र.2 “बाबा ने घोड़ा दखाया घमंड से, खड़्ग सह ने घोड़ा दे खा आश्चय से।”
सीधा अथ: बाबा भारती ने अपना घोड़ा गव के साथ दखाया — जैसे कोई अपनी सबसे अनमोल चीज़ दखाता है। और खड़्ग सह
ने उसे हैरानी से दे खा, क्य क उसने सैकड़ घोड़े दे खे थे, पर ऐसा बाँका घोड़ा कभी नह दे खा था।
वाक्य का आधा भाग क्रया भाव आगे क्या हुआ
बाबा ने घोड़ा िद खाया दखाना घमंड यही घमंड आगे चलकर उनसे घोड़े क चाल भी दखवा दे ता है
खड़् गिसंह ने घोड़ा दे खा दे खना आश्चय आश्चय आगे लालच म बदलता है — “ऐसा घोड़ा खड़्ग सह के पास होना चा हए था”
वाक्य क बनावट दे खए: दोन आधे हस्से एक ही साँचे म ढले ह — कता + ‘घोड़ा’ + क्रया + भाव। ऐसी
समानांतर रचना से दो व्य क्तय का अंतर एक ही झटके म सामने आ जाता है। एक ही वस्तु है, पर दे खने वाली दो
आँख अलग ह — एक क आँख म गव, दूसरे क आँख म लालच का बीज। यह से कहानी का टकराव शुरू होता है।
सो चए: य द बाबा भारती घमंड न दखाते, केवल शांत भाव से घोड़ा दखा दे ते, तो शायद कहानी वह ख़त्म हो
जाती। लेखक बता रहा है क घमंड कतना भी छोटा हो, नुक़सान बड़ा कर सकता है।
प्र.3 “वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अ धकार समझता था।”
सीधा अथ: खड़्ग सह डाकू था। डाकू क सोच यह होती है क जो चीज़ उसे अ लग जाए, वह उसी क है — भले ही वह कसी
और क हो। उसे लेने के लए वह कसी अनुम त या न्याय क प्रतीक्षा नह करता।
यह वाक्य क्य ज़रूरी था: लेखक यहाँ हम आगे क घटना के लए तैयार कर रहा है। इस एक वाक्य के बाद हम
आश्चय नह होता जब खड़्ग सह कहता है — “बाबाजी, म यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँ गा।” यह धमक उसके
स्वभाव से अपने आप नकली है। कहानी म ऐसे वाक्य को पात्र का प रचय कहते ह — लेखक बताता नह , पात्र क
सोच खोलकर दखा दे ता है।
इसम एक गहरी बात भी है — ‘पसंद आना’ और ‘अ धकार होना’ दो बलकुल अलग बात ह, पर डाकू के मन म ये दोन एक हो
गई ह। यही उसका सबसे बड़ा दोष है।
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और यह कहानी का मोड़ छपा है: अंत म यही खड़्ग सह घोड़ा अपने पास रखने के बजाय लौटा दे ता है। यानी जो
आदमी ‘पसंद = अ धकार’ मानता था, वह पहली बार अपनी पसंद छोड़ना सीखता है। इसी बदलाव के कारण
कहानी का नाम ‘हार क जीत’ है।
प्र.4 “बाबा भारती ने नकट जाकर उसक ओर ऐसी आँख से दे खा जैसे बकरा कसाई क ओर दे खता है और कहा,
यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।”
सीधा अथ: घोड़ा छन जाने के बाद बाबा भारती खड़्ग सह के पास गए और उसक ओर उन्ह आँख से दे खा जन आँख से बकरा
कसाई क ओर दे खता है — यानी बलकुल असहाय, लाचार और गड़ गड़ाती हुई दृ से।
तुलना कससे क्या दखता है
बाबा भारती बकरा पूरी तरह नबल, जसके हाथ म कुछ नह बचा
खड़् गिसंह कसाई जसके हाथ म सारी श क्त है और जो दया करे तो ही कुछ बचे
अलंकार: यहाँ ‘जैसे’ शब्द से तुलना क गई है, इस लए यह उपमा है। यह उपमा जान-बूझकर बहुत तीखी चुनी गई
है। लेखक चाहता तो लख दे ता “बाबा भारती ने द न दृ से दे खा”, पर बकरे और कसाई का चत्र मन पर जो चोट
करता है, वह ‘द न दृ ’ नह कर सकती। एक ही वाक्य म हम दोन पात्र क श क्त का अंतर दखाई दे जाता है।
पर सबसे बड़ी बात आगे है: इतनी लाचार दृ से दे खने के बाद भी बाबा भारती घोड़ा नह माँगते — वे कहते ह
“यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।” यानी बाहर से वे बकरे जैसे असहाय ह, पर भीतर से इतने बड़े क हारी हुई बाज़ी म
भी अपनी सबसे प्रय चीज़ छोड़ दे ते ह। यही वरोधाभास इस पं क्त को कहानी क सबसे सशक्त पं क्तय म से एक
बनाता है।
प्र.5 “उनके पाँव अस्तबल क ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई।”
सीधा अथ: घोड़ा छन जाने के बाद वाली सुबह भी बाबा भारती नहाकर, रोज़ क तरह, बना सोचे अस्तबल क ओर चल पड़े।
फाटक तक पहुँचने पर उन्ह याद आया क अब वहाँ सुलतान है ही नह — यानी उनसे भूल हो गई।
इस वाक्य म आदत क ताक़त दखाई गई है: बरस से यही क्रम था — उठना, स्नान करना, सीधे अस्तबल जाना।
मन को चोट लगी है, पर पैर को अभी ख़बर नह हुई। इसी लए लेखक ने ठ क पहले लखा है — “इस प्रकार जैसे
कोई स्वप्न म चल रहा हो”। यह पं क्त हम बताती है क उनका दुख कतना गहरा था, बना एक बार भी ‘दुख’ शब्द
लखे।
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अगला वाक्य इसे और भारी बना दे ता है — “घोर नराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दया।” नराशा का बोझ मानो
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शरीर पर लद गया हो। यह मानवीकरण जैसा प्रयोग है — नराशा कोई चीज़ नह , फर भी उसका वज़न बताया गया है (एक मन ≈
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aफाटक पर नराशा ने पाँव रोक दए थे, उसी फाटक से वे दौड़ते हुए भीतर घुसते ह। दुख और आनंद के बीच केवल
ध्यान द जए: ठ क इसी क्षण कहानी अपने सबसे सुंदर मोड़ पर पहुँचती है — घोड़ा भीतर से हन हनाता है। जस
एक हन हनाहट का फ़ासला है।
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सोच- वचार के लए — पृष्ठ 40
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पाठ से
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a glप्र.1 कहानी को एक बार फर से प ढ़ए और नम्न ल खत पं क्त के वषय म पता लगाकर अपनी लेखन पु स्तका म
ल खए। “दोन के आँसुओं का उस भू म क म पर परस्पर मेल हो गया।” (क) कस- कस के आँसुओं का मेल
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हो गया था?
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बाबा भारती और डाकू खड़्ग सह — इन्ह दोन के आँसुओं का मेल हुआ था।
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कहानी बताती है क दोन एक ही जगह पर रोए थे, बस समय अलग-अलग था —
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कौन कहानी क पं क्त
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खड़् गिसंह रात के अँधेरे म, सुलतान को अस्तबल म “इस समय उसक आँख म पश्चाताप के आँसू थे।” … “जहाँ बाहर
बाँधकर फाटक बंद करने के बाद नकलने के बाद खड़्ग सह खड़ा होकर रोया था।”
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बाबा अगले दन तड़के, घोड़े से लपटकर रोने के बाद “जब वह अस्तबल से बाहर नकले तो उनक आँख से आँसू बह रहे थे।
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भारती जब वे अस्तबल से बाहर नकले ये आँसू उसी भू म पर ठ क उसी जगह गर रहे थे…”
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लेखक ने यह चत्र क्य बनाया: दोन आदमी कभी आमने-सामने बैठकर नह मले, न कसी ने दूसरे से माफ़
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माँगी, न धन्यवाद कहा। उनका मलन आँसुओं के रास्ते हुआ — वह भी अनजाने म। एक साधु और एक डाकू, दोन
के आँसू एक ही मट्ट म मल जाते ह, इसका अथ है क भीतर से दोन अब एक जैसे m
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यह अंत बना एक भी उपदे श दए सब कुछ कह दे ता है।
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प्र.2 (ख) दोन के आँसुओं म क्या अंतर था?
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आँसू दोन क आँख से गरे, पर उनके पीछे का भाव बलकुल अलग था —
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
अंतर क खड़्ग सह के आँसू बाबा भारती के आँसू
बात
भाव पश्चाताप और ग्लािन के हष, कृ तज्ञता और संतोष के
कारण उसे लगा क उसने एक ऐसे व्य क्त को ठगा जो घोड़े से भी खोया हुआ सुलतान वापस मल गया और साथ ही यह
ऊँचा सोचता है — “कैसे ऊँचे वचार ह, कैसा प वत्र भाव व ास भी क “अब कोई गरीब क सहायता से मुँह न
है!” मोड़ेगा।”
समय रात के अँधेरे म, चोरी-चोरी घोड़ा लौटाने के बाद अगली सुबह, घोड़े के गले से लपटकर रोने के बाद
क्या उसका च रत्र बदल गया — डाकू के भीतर का आदमी जाग उनका व ास जीत गया — मनुष्यता पर उनका भरोसा
बदला उठा सही सद्ध हुआ
एक और सूक्ष्म अंतर: खड़्ग सह के आँसू उसे हल्का करने वाले ह — बोझ उतारने वाले। बाबा भारती के आँसू उन्ह
भर दे ने वाले ह — पाने क ख़ुशी के। एक आँसू पाप धोता है, दूसरा प्रेम बहाता है। और दलचस्प बात यह क दोन
ही आँसू एक ही घटना से पैदा हुए ह।
लखते समय यह ज़रूर जो ड़ए: आँसू हमेशा दुख के नह होते। इस कहानी म एक भी आँसू दुख का नह है —
एक पश्चाताप का है, दूसरा आनंद का। यही इस अंत क सुंदरता है।
दनचया — पृष्ठ 41
पाठ से
पाठ से ले ख न
प्र.1 (क) कहानी पढ़कर आप बाबा भारती के जीवन के वषय म बहुत कुछ जान चुके ह। अब आप कहानी के आधार
पर बाबा भारती क दनचया ल खए। वे सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक क्या-क्या करते ह गे, ल खए। इस
काम म आप थोड़ा-बहुत अपनी कल्पना का सहारा भी ले सकते ह।
पहले दे खए क दनचया के कतने हस्से कहानी म ही दए ह — बाक़ म ही कल्पना जोड़नी है। अ ा उत्तर वही है जसम कहानी
वाली बात ज़रूर आएँ।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
समय काम यह कहाँ से मला
राित्र का चौथा पहर कु टया से बाहर नकलकर ठं डे जल से स्नान कहानी से — “चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने
(लगभग 3–6 बजे) अपनी कु िटया से बाहर िनकल ठं डे जल से स्नान िकया।”
पातःकाल सीधे अस्तबल जाकर सुलतान को दे खना, खरहरा कहानी से — “अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना
करना, अपने हाथ से दाना-पानी दे ना िखलाते”; “उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े।”
िदन का पूव ध मं दर म भगवान का भजन-पूजन कहानी से — “गाँव से बाहर एक छोटे-से मंिदर में रहते और
भगवान का भजन करते थे।”
दोपहर सादा भोजन, मं दर क सफ़ाई, दशन को आए गाँव कहानी + थोड़ी कल्पना (“एक दन वह दोपहर के समय
वाल से भट — जैसे उस दन खड़्ग सह आया था बाबा भारती के पास पहुँचा”)
तीसरा पहर पुनः भजन; घोड़े के पास बैठकर उसे दे खते रहना कहानी से
— “दे ख-दे खकर प्रसन्न होते थे”
संध् या सुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील का कहानी से — “जब तक संध्या समय सुल तान पर चढ़ कर
चक्कर — इसके बना उन्ह चैन न पड़ता था आठ-दस मील का चक्कर न लगा ले ते, उ न्हे ं चैन न
आता।”
रात संध्या-भजन, थोड़ा-सा भोजन और वश्राम; डर कहानी से — “सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने
वाले दन म लाठ लेकर अस्तबल का पहरा लगी”; “बाबा भारती स्वयं लाठी ले क र पहरा दे ते थे।”
नमूना उत्तर:
“बाबा भारती क दनचया बहुत साद थी। रात का चौथा पहर आरंभ होते ही, जब आकाश म तारे मंद पड़ने लगते, वे
अपनी कु टया से बाहर नकल आते और ठं डे जल से स्नान करते। इसके बाद उनके पाँव अपने आप अस्तबल क
ओर मुड़ जाते। वहाँ वे सुलतान के गले पर हाथ फेरते, अपने हाथ से उसका खरहरा करते और खुद दाना-पानी दे ते।
फर मं दर म जाकर द पक जलाते और दे र तक भगवान का भजन करते। दोपहर म वे थोड़ा-सा सादा भोजन करते,
मं दर क सफ़ाई करते और जो गाँव वाला मलने आता, उससे कुशल-क्षेम पूछते। दन ढलने पर वे फर भजन म बैठ
जाते, और भजन से जो समय बचता, वह पूरा घोड़े को अपण हो जाता। संध्या होते ही वे सुलतान पर सवार होकर
आठ-दस मील का चक्कर लगाने नकल पड़ते — यह उनके दन का सबसे प्रय समय था। लौटकर संध्या-भजन
करते और रात होते ही सो जाते। पर जन दन खड़्ग सह क धमक का भय था, उन दन वे सोते नह थे — सारी
रात लाठ लेकर अस्तबल के फाटक पर पहरा दे ते रहते।”
दनचया लखने का ढं ग: समय के क्रम से ल खए — सुबह, दोपहर, शाम, रात। हर काम के साथ एक छोटा-सा
ब्योरा जो ड़ए (केवल “भजन करते थे” नह , ब ल्क “द पक जलाकर दे र तक भजन करते थे”)। और जहाँ कहानी म
कोई पं क्त मलती है, उसे अपने शब्द म उतार द जए — इससे उत्तर पाठ पर टका हुआ लगता है, हवा म नह ।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (ख) अब आप अपनी दनचया भी ल खए।
यह आपके अपने दन का प्रश्न है, इस लए उत्तर हर व ाथ का अलग होगा। पर अ ा उत्तर बनता कैसे है, यह तय है।
ध्यान रखने योग्य चार बात —
समय के क्रम से ल खए — उठने से सोने तक, बीच म कुछ छू टे नह ।
समय भी ल खए — “सुबह जल्द उठता ँ” से बेहतर है “सुबह छह बजे उठता ँ”।
अपनी एक ख़ास बात ज़रूर डा लए — कोई ऐसा काम जो सफ़ आप करते ह (दाद को अख़बार पढ़कर सुनाना, गमल म
पानी दे ना, छोट बहन को तैयार करना)।
अंत म एक वाक्य अपने बारे म — दनचया का कौन-सा हस्सा आपको सबसे अ ा लगता है, और कौन-सा सुधारना चाहते
ह।
नमूना उत्तर:
“म सुबह छह बजे उठ जाता ँ। सबसे पहले बस्तर ठ क करता ँ, फर मुँह-हाथ धोकर आधे घंटे पढ़ने बैठता ँ,
क्य क सुबह पढ़ा हुआ मुझे दे र तक याद रहता है। सात बजे नहा-धोकर तैयार होता ँ और माँ के साथ नाश्ता करता
ँ। साढ़े सात बजे साइ कल से व ालय जाता ँ। दोपहर दो बजे लौटकर भोजन करता ँ और थोड़ी दे र आराम
करता ँ। चार बजे म छत पर रखे गमल म पानी दे ता ँ — तुलसी और गुड़हल के पौधे मने ख़ुद लगाए ह। साढ़े चार
से छह बजे तक मैदान म दोस्त के साथ क्रकेट खेलता ँ। शाम को गृहकाय पूरा करता ँ और दाद को अख़बार क
मुख्य ख़बर पढ़कर सुनाता ँ। रात आठ बजे सब साथ बैठकर भोजन करते ह, फर थोड़ी दे र बातचीत होती है और
साढ़े नौ बजे म सो जाता ँ। मुझे अपनी दनचया का सबसे अ ा हस्सा शाम का खेल लगता है, और सुधारना यह
चाहता ँ क म टे ली वज़न पर कम समय बताऊँ।”
एक तुलना ज़रूर सो चए: बाबा भारती क दनचया म एक बात बहुत साफ़ थी — वह हर दन एक-सी थी और
उसम एक काम ऐसा था जसे वे सबसे अ धक चाहते थे (संध्या क सवारी)। आपक दनचया म वह काम कौन-सा
है? उसे पहचानना ही अपने आपको जानने क शुरुआत है।
कहानी क रचना — पृष्ठ 41
पाठ से
पाठ से वधा
प्र.1 (क) इस कहानी क कौन-कौन सी बात आपको पसंद आईं? आपस म चचा क जए।
यह चचा का प्रश्न है, पर चचा म कहने के लए ठोस बात चा हए। नीचे इस कहानी क वे वशेषताएँ द गई ह जो अकसर पाठक को
सबसे अ लगती ह — इनम से जो आपको सचमुच पसंद आई ह , उन्ह कारण स हत क हए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
कहानी क वह क्य अ लगती है
बात
कहानी का अंत डाकू चुपचाप घोड़ ा लौटा जाता है — न कोई भाषण, न कोई माफ़ ी। दोनों के आँस ू एक ही िम ी पर िमल जाते है।ं ऐसा शांत
और सुंद र अंत बहुत कम कहािनयों में िमलता है।
बाबा भारती की वे घोड़ ा नही ं माँगते, के वल यह माँगते है ं िक बात िछपी रहे। यह मोड़ पाठक को चौंक ा दे ता है — और सबसे य़ ादा याद भी
पाथना यही रहता है।
पा त्र ों का बद ल ना खड़् गिसंह वैस ा-का-वैस ा नही ं रहता। एक कु ख्यात डाकू का हृदय िपघलते दे खना कहानी को जीवंत बनाता है।
भाषा के िच त्र “घोड़ ा हवा से बाते ं करने लगा”, “हृ दय पर साँप लोट गया”, “जैसे बकरा कसाई की ओर दे खता है”, “पाँव मन-मन-भर के
भारी हो गए ” — ऐसे मुहावरे और उपमाएँ दृ श्य को आँखों के सामने खड़ ा कर दे ते है।ं
-
छोटे छोटे संवाद बाबा भारती और खड़् गिसंह की पहली बातचीत एक -एक पंिक्त में चलती है और उसी में दोनों का स्वभाव खुल जाता है।
घोड़ े का सुल तान अपने स्वामी के पाँवों की चाप पहचान ले ता है। यह छोटा-सा ब्योरा पूरे दुख को एक क्षण में ख़शु ी में बदल दे ता है।
िहनिहनाना
नमूना उत्तर:
“मुझे इस कहानी म सबसे अ वह बात लगी जब बाबा भारती डाकू से अपना घोड़ा वापस नह माँगते, ब ल्क
केवल इतना कहते ह क इस घटना को कसी को मत बताना। म सोच भी नह सकता था क कोई अपना सबसे प्रय
घोड़ा खोकर दूसर क चता करेगा। दूसरी बात मुझे यह अ लगी क लेखक ने अंत म कोई उपदे श नह दया —
बस दो आँसुओं को मट्ट पर मलते हुए दखा दया, और सब समझ म आ गया।”
चचा को अ ा कैसे बनाएँ: केवल “मुझे अंत अ ा लगा” कहना अधूरा है। हमेशा जो ड़ए — “…क्य क…”
और कहानी क एक पं क्त। और अपने मत्र से पू छए क उसे कौन-सी बात अ लगी; हो सकता है वह ऐसी बात
बताए जो आपने दे खी ही न हो।
प्र.2 (ख) कोई भी कहानी पाठक को तभी पसंद आती है जब उसे अ तरह लखा गया हो। लेखक कहानी को
अ तरह लखने के लए अनेक बात का ध्यान रखते ह, जैसे— शब्द, वाक्य, संवाद आ द। इस कहानी म आए
संवाद के वषय म अपने वचार लख।
इस कहानी के संवाद बहुत छोटे , सहज और काम के ह। लेखक ने कह भी लंबा भाषण नह लखा — दो-दो, तीन-तीन शब्द के
वाक्य से ही सारा काम नकाल लया है।
दे खए, पहली भट का संवाद कैसा चलता है —
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“कहो, इधर कै से आ गए?”
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“सुलतान की चाह खी ंच लाई।”
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“िविचत्र जानवर है। दे खोगे तो पसन्न हो जाओगे।”
a“मैनं े भी बड़ ी पशंसा सुनी है।”
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“उसकी चाल त म्ु हारा मन मोह लेगी!”
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कgबाबा भारती को घमंड था और खड़्ग सह के मन म लालच था — फर भी दोन
इन पाँच पं क्तय म लेखक ने कह नह लखा a
बात पाठक को अपने आप समझ आ जाती ह। यही अ े संवाद क पहचान है।
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उससे क्या हा सल होता हैm .
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संवाद क वशेषता कहानी से उदाहरण
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बहुत छोटे वाक्य “परंत ु एक बात सुनते जाओ।” / “खड़् गिसंह ठहर रहती है, पाठक ऊबता नही ं।
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गया।”
एक ही वाक्य में डाकू की िनडरता और हठ दोनों िदख जाते
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पात्र का स्वभाव “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दू ँग ा।”
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खोलते ह है।ं
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आदर और शष्टता
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“बाबाजी, आज्ञा कीिजए। मैं आपका दास हू,ँ डाकू होते हुए भी वह अस भ्य नही ं है — इसीिलए बाद में
बनी रहती है
aदू ँगा।” उसका बदल जाना िवश्वसनीय लगता है।
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यही एक वाक्य पूरी कहानी की िदशा पलट दे ता है।
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कहानी को मोड़ दे ते ह “मेर ी पाथना के वल यह है िक इस घटना को िकसी
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के सामने पकट न करना।”
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बोलचाल क भाषा “क्यों, तुम्हे ं क्या कष्ट है?” / “आपकी दया है। ” संवाद सुने हुए -g
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agl एक बात और ध्यान दे ने योग्य: कहानी का सबसे मा मक हस्सा — जब खड़्ग सह घोड़ा लौटाता है — उसम एक
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भी संवाद नह है। वहाँ केवल सन्नाटा, टम टमाते तारे, दूर भ कते कुत्ते और आँख म आँसू ह। लेखक जानता है क
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cवाद जतने ज़रूरी ह, उतना ही ज़रूरी यह जानना है क संवाद कहाँ ag
कुछ भाव शब्द से नह , चुप्पी से कहे जाते ह।.सं
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नह दे ना।
आप भी आज़माइए: अपनी कसी कहानी म दो पात्र क बातचीत ल खए, पर शत यह क कोई वाक्य दस शब्द
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से बड़ा न हो और आप यह न लख क पात्र ग़स्से म है या ख़ुश — केवल उसके बोले हुए शब्द से पाठक को यह
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समझ आ जाए।
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मुहावरे कहानी से — पृष्ठ 41
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पाठ से
पाठ से मु हावरे
प्र.1 (क) कहानी से चुनकर कुछ मुहावरे नीचे दए गए ह— लट्टू होना, हृदय पर साँप लोटना, फूले न समाना, मुँह मोड़
लेना, मुख खल जाना, न्योछावर कर दे ना। कहानी म इन्ह खोजकर इनका प्रयोग सम झए।
नीचे छह मुहावरे कहानी म जहाँ आए ह, वह से दखाए गए ह — साथ म उनका अथ और वहाँ उनका काम क्या था।
मुहावरा अथ कहानी म कहाँ वहाँ उसका अथ क्या बनता है
ल ू होना िकसी पर मोिहत हो “वे उसक चाल पर लट्टू थे।” (पृष्ठ 33) बाबा भारती सुलतान क चाल पर इस क़दर
जाना, दीवाना हो मुग्ध थे क उसक तुलना घटा दे खकर नाचते
जाना मोर से करते थे।
हृ द य पर ईष्य या जलन से “उसक चाल को दे खकर खड़्ग सह के हृदय घोड़े क चाल दे खकर खड़्ग सह जल-भुन उठा
साँप ल ोटना मन छटपटा उठना पर साँप लोट गया।” (पृष्ठ 34) — “ऐसा घोड़ा तो मेरे पास होना चा हए था।”
यह से उसका लालच पक्का होता है।
फू ले न ख़शु ी के मारे फू ल “कभी उसके रंग को और मन म फूले न संध्या क सवारी पर घोड़े का शरीर और रंग
समाना जाना, अत्यिधक समाते थे।” (पृष्ठ 35) नहारते हुए बाबा भारती का मन ख़ुशी से भरा
पस होना
न्न हुआ था।
मुख िखल चेहरा पस ता से
न्न “इसे दे खकर उनका मुख फूल क नाईं खल यह खड़्ग सह के मन क बात है — वह याद
जाना चमक उठना जाता था।” (पृष्ठ 37) कर रहा है क सुलतान को दे खते ही बाबा का
चेहरा फूल-सा खल उठता था। इसी याद से
उसका पछतावा और गहरा होता है।
मुँह मोड़ यान हटा ले ना,
ध् “उन्ह ने सुलतान क ओर से इस तरह मुँह मोड़ पहली बार यह मुहावरा त्याग दखाता है —
ले ना पीठ फे र ले ना, लया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न बाबा भारती अपने प्रय घोड़े से नाता ही तोड़
उपेक्षा करना रहा हो।” (पृष्ठ 37) तथा “अब कोई गरीब क लेते ह। दूसरी बार यही मुहावरा आशा बन जाता
सहायता से मुँह न मोड़ेगा।” (पृष्ठ 38) है — अब कोई ज़रूरतमंद से मुँह नह फेरेगा।
न्योछावर िकसी पर सब कु छ कहानी म यह मुहावरा इन्ह शब्द म नह बाबा भारती ने अपना सारा बचा हुआ समय,
कर दे ना वार दे ना, पूरी तरह आया; इसका भाव पहली ही पं क्तय म है — श्रम और स्नेह सुलतान पर न्योछावर कर दया
समिपत कर दे ना “भगवत भजन से जो समय बचता, वह घोड़े था। ‘अपण’ और ‘न्योछावर’ लगभग एक ही
को अपण हो जाता।” बात कहते ह।
मुहावरा पहचानने का नयम: मुहावरे का अथ उसके शब्द से नह नकलता। ‘हृदय पर साँप लोटना’ म न कोई
साँप है, न कोई लोट रहा है — अथ है जलन। इसी लए मुहावरे को टु कड़ म नह , पूरे वाक्य के साथ याद क जए।
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एक ज़रूरी बात: ऊपर क सूची म पाँच मुहावरे कहानी म ज्य -के-त्य मलते ह, पर ‘न्योछावर कर दे ना’ पाठ म
इसी रूप म नह छपा — वहाँ उसक जगह ‘अपण हो जाना’ है। उत्तर लखते समय यह बात साफ़-साफ़ लख दे ना
ही सही है; अपनी ओर से कोई पं क्त गढ़ना ठ क नह ।
प्र.2 (ख) अब इनका प्रयोग करते हुए अपने मन से नए वाक्य बनाइए।
नीचे हर मुहावरे के दो-दो नए वाक्य दए गए ह — एक सरल और एक थोड़ा अलग संदभ का। आप इन्ह दे खकर अपने वाक्य बना
सकते ह।
मुहावरा नया वाक्य — 1 नया वाक्य — 2
ल ू होना मेले में रंग-िबरंगी पतंगें दे खकर छोटा भाई उन पर ल ू हो गया। नए िशक्षक के पढ़ ाने के ढं ग पर पूरी क क्षा ल ू है।
हृ द य पर साँप अपने से कम अंक पाने वाले िमत्र को पुरस्कार िमलते दे ख उसके पड़ ोसी की नई साइिकल दे खकर उसके हृदय पर
ल ोटना हृ दय पर साँप लोट गया। साँप लोटने लगा।
फू ले न समाना बेटी के चयन का समाचार सुनकर िपताजी फू ले न समाए। पहली बार अपनी उगाई मूल ी दे खकर दादी फू ली नही ं
समा रही थी ं।
मुँह मोड़ ले ना किठनाई के समय जो िमत्र मुँह मोड़ ले , वह स च्चा िमत्र नही ं। बीमार पड़ ोसी की सहायता से उसने कभी मुँह नही ं
मोड़ ा।
मुख िखल जाना बहतु िदनों बाद मामाजी को ार पर दे खकर माँ का मुख िखल परीक्षा पिरणाम दे खते ही उसका मुख िखल उठा।
गया।
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योछावर कर वीर सै िनकों ने दे श की रक्षा में अपने पाण न्योछावर कर िदए। उ न्होंने अपना सारा जीवन गाँव के बच्चों की पढ़ ाई पर
दे ना न्योछावर कर िदया।
वाक्य बनाते समय दो ग़ल तयाँ बचाइए:
शब्दशः अथ मत लगाइए — “मने लट्टू घुमाया” मुहावरे का प्रयोग नह है, वह तो खलौना है।
भाव का मेल दे खए — ‘हृदय पर साँप लोटना’ जलन के लए है, डर के लए नह । “साँप दे खकर मेरे हृदय पर
साँप लोट गया” ग़लत वाक्य है।
कैसे-कैसे पात्र — पृष्ठ 41–42
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पाठ से
पाठ से शब्द- चत्र
प्र.1 इस कहानी म तीन मुख्य पात्र ह— बाबा भारती, डाकू खड़्ग सह और सुलतान घोड़ा। इनके गुण को बताने वाले
शब्द से दए गए शब्द- चत्र को पूरा क जए—
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पुस्तक (पृष्ठ 42) के तीन शब्द- चत्र — हर सूरज म एक पात्र का नाम और उसके चार ओर छह बादल; हर सूरज का
एक बादल पहले से भरा है, बाक खाली ह।
पुस्तक म हर पात्र के शब्द- चत्र म छह बादल ह और उनम से एक पहले से भरा है। इस लए हर पात्र के लए पाँच नए वशेषण
भरने ह। नीचे तीन शब्द- चत्र पूरे करके दए गए ह — साथ म कहानी का वह प्रमाण भी, जससे वह गुण सद्ध होता है।
1. बाबा भारती ( दया हुआ शब्द — दयालु)
वशेषण कहानी से प्रमाण
दयालु (िदया हुआ) राह म पड़े अपा हज क करुण पुकार सुनकर वे रुक गए और उसे अपने घोड़े पर बठा लया।
यागी
त् “उन्ह ने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आ द अपना सब-कुछ छोड़ दया था।”
धािमक (भक्त) “गाँव से बाहर एक छोटे -से मं दर म रहते और भगवान का भजन करते थे।”
उदार (बड़ े मन वाले ) घोड़ा छ ने जाने पर भी बोले — “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। म तुमसे इसे वापस करने के लए न क ँगा।”
परोपकारी अपनी हा न से अ धक इस बात क चता — “लोग कसी गरीब पर व ास न करगे।”
स् नेही (वात्स ल्यपूण) घोड़ा लौट आने पर उससे लपटकर ऐसे रोए “मानो कोई पता बहुत दन से बछड़े पुत्र से मल रहा हो।”
2. डाकू खड़्ग सह ( दया हुआ शब्द — बाहुबली)
वशेषण कहानी से प्रमाण
बाहुबली (िदया हुआ) “उसके पास बाहुबल था, आदमी थे और बेरहमी थी।”
िनभ क (िनडर) दन-दहाड़े साधु के पास जाकर खुली धमक द — “म यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँ गा।”
लालची “ऐसा घोड़ा खड़्ग सह के पास होना चा हए था। इस साधु को ऐसी चीज़ से क्या लाभ?”
छली (चालाक ) अपा हज का वेश बनाकर, दया का सहारा लेकर घोड़ा ह थया लया।
िनद यी (आरंभ में) “लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे।” — “और बेरहमी थी।”
पश्चातापी (अंत में) “इस समय उसक आँख म पश्चाताप के आँसू थे।” — और उसने घोड़ा चुपचाप लौटा दया।
3. सुलतान घोड़ा ( दया हुआ शब्द — सुंदर)
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
वशेषण कहानी से प्रमाण
सुंद र (िदया हुआ) “वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान।”
बलवान “बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके म न था।”
बाँक ा (सजीला) “ऐसा बाँका घोड़ा उसक आँख से कभी न गुज़रा था।”
तेज़-र ़ तार (द तगामी) “घोड़ा हवा से बात करने लगा।”
वािमभक्त
स् “घोड़े ने अपने स्वामी के पाँव क चाप को पहचान लया और ज़ोर से हन हनाया।”
पिस द्ध (िवख्यात) “होते-होते सुलतान क क त उसके कान तक भी पहुँची।”
पुस्तक क बात — ये शब्द कहलाते क्या ह: शब्द- चत्र के ठ क बाद पृष्ठ 43 पर लखा है — “आपने जो शब्द
लखे ह, वे कसी क वशेषता, गुण और प्रकृ त के बारे म बताने के लए उपयोग म लाए जाते ह। ऐसे शब्द को
वशेषण कहते ह।” यानी दयालु, बाहुबली, सुंदर, त्यागी, लालची, बलवान — ये सब वशेषण ह। और जस शब्द क
वशेषता बताई जाती है (बाबा भारती, खड़्ग सह, घोड़ा), उसे वशेष्य कहते ह।
ध्यान द जए: खड़्ग सह के लए ‘ नदयी’ और ‘पश्चातापी’ — दोन शब्द एक साथ लखे गए ह, और यह ग़लत
नह है। वह कहानी के आरंभ म एक तरह का है और अंत म दूसरी तरह का। जो पात्र कहानी म बदल जाए, उसे
ग तशील पात्र कहते ह — और ऐसे ही पात्र कहानी को सजीव बनाते ह।
सुलतान क कहानी — पृष्ठ 43
पाठ से आगे
पाठ से आगे सृ ज न
प्र.1 मान ली जए, यह कहानी सुलतान सुना रहा है। तब कहानी कैसे आगे बढ़ती? स्वयं को सुलतान के ान पर
रखकर कहानी बनाइए। (संकेत— आप कहानी को इस प्रकार बढ़ा सकते ह — मेरा नाम सुलतान है। म एक घोड़ा
ँ..... )
यह सृजन का प्रश्न है — आपको वही कहानी दूसरी आँख से लखनी है। ऐसी कहानी को आत्मकथात्मक शैली कहते ह, क्य क
इसम ‘म’ ही सब कुछ बताता है।
लखने से पहले चार बात तय कर ली जए —
पूरी कहानी ‘म’ म हो — “मने दे खा”, “मुझे लगा”, “मेरे स्वामी”।
वही बताइए जो घोड़ा जान सकता है — वह बाबा भारती के मन क बात नह जान सकता, पर उनके हाथ का स्पश, उनक
आवाज़, उनके पाँव क चाप पहचान सकता है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
घोड़े क इं याँ काम म लाइए — गंध, आहट, चाबुक-लगाम का दबाव, दाने का स्वाद। यही आपक कहानी को नया
बनाएगा।
घटनाओं का क्रम वही र खए — डाकू का आना, चाल दखाना, अपा हज का धोखा, बाबा क प्राथना, रात को वापसी।
नमूना उत्तर:
“मेरा नाम सुलतान है। म एक घोड़ा ँ — सफ़ेद, ऊँचा और, लोग कहते ह, बड़ा बाँका। म गाँव के बाहर एक छोटे -से
मं दर के अस्तबल म रहता ँ। मेरे स्वामी बाबा भारती ह। हर सुबह मुँह-अँधेरे वे नहाकर सीधे मेरे पास आते ह, अपने
हाथ से मेरा खरहरा करते ह और दाना खलाते ह। उनके हाथ क गंध मुझे इतनी भली लगती है क आहट सुनते ही
म कान खड़े कर लेता ँ।
एक दोपहर एक भारी डील-डौल वाला आदमी आया। उसक आँख म जो चमक थी, वह मुझे अ नह लगी —
हम जानवर आदमी क आँख पढ़ लेते ह। बाबा ने गव से मुझे उसके सामने खड़ा कया, फर मेरी पीठ पर हाथ फेरा
और सवार हो गए। म हवा से बात करने लगा। लौटकर मने दे खा, वह आदमी मुझे ऐसे दे ख रहा था जैसे म उसी का
हो चुका होऊँ। जाते-जाते वह कुछ कह गया, और उस रात से बाबा ने अस्तबल के फाटक पर लाठ लेकर पहरा दे ना
शुरू कर दया।
कई महीने बीत गए। एक साँझ हम रोज़ क तरह घूमने नकले। रास्ते म एक अपा हज कराह रहा था। बाबा ने मुझे
रोका और उसे मेरी पीठ पर बठा दया, स्वयं लगाम पकड़कर पैदल चलने लगे। तभी उस आदमी ने मेरी पस लय म
एड़ लगाई — और वह गंध! वही चमकती आँख वाला डाकू था। म रुकना चाहता था, पर लगाम उसके हाथ म थी
और मुझे दौड़ना पड़ा। पीछे से बाबा क चीख सुनकर मेरा कलेजा काँप गया।
वह मुझे बहुत दूर ले गया। पर उस रात वह अजीब-सा चुप था। आधी रात बीते उसने मेरी बाग पकड़ी और चुपचाप
उसी अस्तबल के फाटक तक ले आया, जहाँ से मुझे ले गया था। उसने मुझे मेरी जगह पर बाँधा, फाटक बंद कया
और बाहर खड़ा होकर रोने लगा। म समझ नह पाया क आदमी लूटकर लौटाता क्य है और लौटाकर रोता क्य है।
सुबह होने से पहले मने वही जानी-पहचानी चाप सुनी — बाबा के पाँव क । म ज़ोर से हन हनाया। वे दौड़ते हुए
भीतर आए और मेरे गले से लपटकर रोने लगे, ठ क वैसे जैसे कोई पता बछड़े बेटे से मलता है। बार-बार मेरी पीठ
थपथपाते और कहते जाते — ‘अब कोई गरीब क सहायता से मुँह न मोड़ेगा।’ उस दन मुझे समझ आया क मेरे
स्वामी ने मुझे नह , मुझसे भी बड़ी कोई चीज़ बचाई थी।”
ऐसी कहानी लखने का लाभ: जब कहानी कहने वाला बदलता है, तो पाठक को नई बात दखने लगती ह। सुदशन
क मूल कहानी म हम बाबा भारती और खड़्ग सह के मन का पता चलता है; सुलतान क जबानी वही घटनाएँ गंध,
आहट और स्पश के रास्ते आती ह। यही कारण है क लेखक कभी-कभी जान-बूझकर कहानी कसी पशु, कसी
ब े या कसी नज व वस्तु से कहलवाते ह।
मन के भाव — पृष्ठ 43
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे भाव
प्र.1 (क) कहानी म से चुनकर कुछ शब्द नीचे दए गए ह। बताइए, कहानी म कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था— •
च कत • अधीर • डर • प्रसन्नता • करुणा • नराशा
हर भाव के साथ नीचे कौन और कब दोन दए गए ह, और साथ म कहानी क वह पं क्त भी जो उसे सद्ध करती है।
भाव कौन कब कहानी क पं क्त
चिकत खड़् गिसंह (1) जब उसने पहली बार सुलतान को दे खा; “खड़्ग सह ने घोड़ा दे खा आश्चय से।” /
(2) जब बाबा भारती ने घोड़ा वापस माँगने के “खड़्ग सह का मुँह आश्चय से खुला रह गया।”
बजाय केवल इतना कहा क घटना कसी को न
बताना
अधीर खड़् गिसंह — और खड़्ग सह: सुलतान क क त सुनकर उसे “उसका हृदय उसे दे खने के लए अधीर हो उठा।” /
एक बार बाबा भारती दे खने के लए, और फर उसक चाल दे खने के “बालक क -सी अधीरता से बोला।” / “अपनी
भी लए। बाबा भारती: अपने घोड़े क प्रशंसा दूसरे चीज़ क प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लए
के मुँह से सुनने के लए उनका हृदय भी अधीर हो गया।”
डर बाबा भारती जब खड़्ग सह धमक दे कर गया — “म यह “बाबा भारती डर गए। अब उन्ह रात को न द न
घोड़ा आपके पास न रहने दूँ गा।” उसके बाद आती। सारी रात अस्तबल क रखवाली म कटने
कई महीन तक लगी। प्र तक्षण खड़्ग सह का भय लगा रहता।”
पस न्न ता बाबा भारती (1) रोज़ घोड़े को दे ख-दे खकर; (2) संध्या क “दे ख-दे खकर प्रसन्न होते थे।” / “इस समय उनक
सवारी के समय; (3) सबसे अ धक तब, जब आँख म चमक थी, मुख पर प्रसन्नता।” / “बाबा
सुलतान लौटा हुआ मला भारती आश्चय और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर
घुसे।”
क रु णा बाबा भारती (और जब माग म पड़े अपा हज ने पुकारा — “ओ “आवाज़ म करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक
वेश बदले खड़् गिसंह बाबा, इस कंगले क सुनते जाना।” उसक लया।”
की आवाज़ में) आवाज़ सुनकर बाबा का मन दया से भर गया
और उन्ह ने घोड़ा रोक लया
िनराशा बाबा भारती (1) जस क्षण अपा हज घोड़ा दौड़ाकर ले “उनके मुख से भय, वस्मय और नराशा से मली
भागा; (2) अगली सुबह, जब आदतवश हुई चीख नकल गई।” / “घोर नराशा ने पाँव को
अस्तबल पहुँचकर याद आया क घोड़ा है ही मन-मन-भर का भारी बना दया।”
नह
एक बात ध्यान दे ने क : इनम से चार भाव (डर, प्रसन्नता, करुणा, नराशा) बाबा भारती के ह और दो (च कत,
अधीर) मुख्यतः खड़्ग सह के। इससे पता चलता है क लेखक ने कहानी को बाबा भारती के मन के भीतर से कहा है
— हम घटनाएँ अ धकतर उन्ह क आँख से दे खते ह। खड़्ग सह के मन म हम केवल दो बार झाँकते ह, और दोन
बार वह च का हुआ है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत
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(ख) आप उपयुक्त भाव को कब-कब अनुभव करते ह? ल खए। (संकेत— जैसे गली म कसी कुत्ते को दे खकर
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प्र.2
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डर या प्रसन्नता या करुणा आ द का अनुभव करना)
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यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है, इस लए हर व ाथ का उत्तर अलग होगा। पर अ ा उत्तर वही है जसम हर भाव के साथ
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एक स ी, छोट -सी घटना जुड़ी हो — केवल “मुझे डर लगता है” कहना अधूरा है।
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तरीक़ा: छह भाव क सूची बनाइए और हर एक के सामने ‘कब’ ल खए — एक वाक्य म घटना, दूसरे वाक्य म उस समय आपके ag
शरीर-मन को क्या हुआ ( दल तेज़ धड़का, हाथ काँपे, आँख भर आई)।
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नमूना उत्तर:
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भाव म इसे कब अनुभव करता/करती ँ
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चिकत
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पछले वष व ान मेले म मने पहली बार सूक्ष्मदश से पानी क एक बूँद दे खी। उसम हलते-डु लते नन्हे जीव दे खकर म
च कत रह गया — मुझे व ास ही नह हुआ क इतना कुछ हमारी आँख से छपा रहता है।
अधीर
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परीक्षा-प रणाम वाले दन म अधीर हो जाता ँ। बार-बार घड़ी दे खता ँ और एक जगह बैठा नह जाता।
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गली के मोड़ पर एक बड़ा कुत्ता अचानक m
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डर
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भ कते हुए मेरी ओर दौड़ा था। उस दन मेरा दल इतनी तेज़ धड़का क साइ कल
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का हडल तक काँपने लगा।
पस न्नता जब मेरी बनाई चत्रकला कक्षा क द वार पर लगाई गई और श क्षका ने सबके सामने उसक प्रशंसा क , तब म प्रसन्नता से
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भर उठा।
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.co घर लाकर बोरी पर सुला आया। g
क रुणा बरसात म एक पल्ला दुकान के छ े के नीचे भीगता हुआ काँप रहा था। उसे दे खकर मन करुणा से भर गया और म उसे
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agl िनराशा पूरी तैयारी के बाद भी जब म दौड़ म अं तम ान पर रहा, तो बहुत नराशा हुई। पर पताजी ने कहा क हारने वाला भी
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वही है जो मैदान म उतरा था — इससे मन हल्का हो गया।
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यह अभ्यास क्य दया गया है: कहानी के पात्र के भाव तभी स े लगते ह जब हम उन्ह अपने भीतर पहचान ल।
जब आप लखते ह क कुत्ते को दे खकर आपका दल धड़का था, तो आप बाबा भारती के उस डर को भी बेहतर
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समझ पाते ह जसम उनक रात क न द उड़ गई थी। भाव पहचानना अ ा पाठक बनने क पहली सीढ़ है।
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agl झरोखे से — पृष्ठ 44
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे क वता
प्र.1 आप जानते ही ह क लेखक सुदशन ने अनेक क वताएँ भी लखी ह। आइए, उनक लखी एक क वता पढ़ते ह—
“वह चली हवा / वह चली हवा, वह चली हवा। / ना तू दे खे / ना म दे खूँ / पर पत्त ने तो दे ख लया / वरना वे
खुशी मनाते क्य ? / वह चली हवा, वह चली हवा।” — सुदशन ● साझी समझ — आपको इस क वता म क्या
अ ा लगा? आपस म चचा क जए और अपनी लेखन-पु स्तका म ल खए।
पहले क वता का भावाथ: हवा चल पड़ी है। हवा दखाई नह दे ती — न तुम उसे दे ख सकते हो, न म। फर भी पेड़ के पत्ते हलने
और खड़खड़ाने लगे ह। क व कहता है — लगता है पत्त ने तो हवा को दे ख लया है, वरना वे इस तरह ख़ुशी क्य मनाते?
क वता क उसका अथ ख़ास बात
पं क्त
“वह चली हवा, वह हवा बहने लगी पुनरुिक्त — एक ही पंिक्त दोहराने से हवा के लगातार बहने की लय बन जाती है;
चली हवा।” यही किवता की टेक है, जो आरंभ और अंत दोनों में आती है।
“ना तू दे खे, ना मैं हवा कसी को दखाई नह दे ती किव पहले यह मान ले ता है िक हवा अदृ श्य है — इसीिलए आगे वाली बात
दे खूँ” चौंक ाती है।
“पर प ों ने तो दे ख पत्ते हल रहे ह, इस लए लगता है मानवीकरण — प ों को आँखें दे दी गईं, वे ‘दे खने’ लगे।
िलया” उन्ह ने हवा दे ख ली
“वरना वे खुशी पत्त का हलना-खड़खड़ाना मानवीकरण के साथ एक चतुर तक — किव पमाण दे क र अपनी बात मनवा ले ता
मनाते क्यों?” मानो उनका उत्सव है है।
क वता क सबसे सुंदर बात: क व सीधे यह नह कहता क “हवा चल रही है, इस लए पत्ते हल रहे ह।” वह
उलटकर कहता है — “पत्ते ख़ुश ह, इस लए ज़रूर उन्ह ने हवा दे ख ली होगी।” यानी वह प रणाम से कारण क ओर
जाता है, और उसी म क वता का सारा आनंद है। जो चीज़ आँख से नह दखत (हवा, स्नेह, ख़ुशबू), उनका पता
उनके असर से चलता है — यही इस छोट -सी क वता का बड़ा संदेश है।
नमूना उत्तर (साझी समझ):
“मुझे इस क वता म सबसे अ बात यह लगी क यह बहुत छोट है, पर एक बड़ी बात कह जाती है। हवा को कोई
नह दे ख सकता, फर भी क व ने कह दया क पत्त ने उसे दे ख लया — क्य क वे ख़ुशी मना रहे ह। मुझे यह
कल्पना बहुत सुंदर लगी क पत्त का हलना उनका नाचना है। दूसरी बात मुझे यह अ लगी क ‘वह चली हवा’
पं क्त बार-बार आती है; उसे पढ़ते समय सचमुच ऐसा लगता है जैसे हवा के झ के आ-जा रहे ह । इसे पढ़कर मुझे
लगा क क वता के लए बड़े-बड़े शब्द क ज़रूरत नह होती, बस दे खने का नया ढं ग चा हए।”
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
जोड़कर दे खए: ‘हार क जीत’ लखने वाले सुदशन ही इस क वता के भी रच यता ह। दोन रचनाओं म एक बात
समान है — दोन म असली बात सीधे नह कही जाती। कहानी म बाबा भारती क महानता कसी उपदे श से नह , दो
आँसुओं से बताई जाती है; और क वता म हवा का होना हवा से नह , पत्त क ख़ुशी से बताया जाता है।
खोजबीन के लए — पृष्ठ 44
पाठ से आगे
पाठ से आगे प रयोजना
प्र.1 सुदशन क कुछ अन्य रचनाएँ पुस्तक म दए गए क्यू.आर. कोड या इंटरनेट या पुस्तकालय क सहायता से पढ़,
दे ख व समझ।
यह खोजबीन क प रयोजना है — इसका उत्तर पुस्तक म नह , आपक खोज म है। नीचे उसे करने का ढं ग और कुछ शुरुआती
सूत्र दए गए ह।
खोज कहाँ-कहाँ से कर —
क्यू.आर. कोड: पाठ के पहले पृष्ठ (पृष्ठ 33) पर ऊपर क ओर एक क्यू.आर. कोड छपा है। कसी बड़े क सहायता से मोबाइल
से उसे स्कैन क जए — यह इसी पाठ से जुड़ी सामग्री तक ले जाता है।
व ालय का पुस्तकालय: हद कहानी-संग्रह ढूँ ढ़ए। कक्षा 6–8 के लए बने संकलन म सुदशन क कहा नयाँ अकसर मल
जाती ह।
इंटरनेट: शक्षक या अ भभावक के साथ बैठकर “सुदशन क कहा नयाँ” खो जए। कसी भी रचना को पढ़ने से पहले यह दे ख
ली जए क वह इन्ह सुदशन क है — यह नाम कई लोग का हो सकता है।
सुदशन क कुछ प्र सद्ध कहा नयाँ, जनसे शुरुआत क जा सकती है —
रचना कस बारे म
हार की जीत यही पाठ — साधु, घोड़ े और डाकू की कहानी, जो सुद शन की सबसे पिस द्ध रचना मानी जाती है।
अठ न्न ी का चोर एक ग़ रीब नौकर और एक छोटी-सी चोरी की कहानी, जो न्याय और ग़ रीबी पर सोचने को िववश करती है।
साइिकल की सवारी हास्य-भरी शैल ी में िलखी एक हल्की-फु ल्की कहानी।
किव की स्त्र ी एक किव और उसकी पत्नी के जीवन को िदखाने वाली कहानी।
पिरवतन मन बदलने के िवषय पर िलखी कहानी — ‘हार की जीत’ से िमलता-जुल ता भाव।
पढ़ने के बाद अपनी लेखन-पु स्तका म यह ता लका भ रए —
रचना का नाम मुख्य पात्र कहानी एक वाक्य म मुझे सबसे अ लगी पं क्त क्या सीख मली
… … … … …
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
इस काम को और अ ा कैसे बनाएँ: केवल कहानी पढ़कर रुक मत जाइए — यह दे खए क सुदशन क
कहा नय म कोई बात बार-बार लौटती है या नह । ‘हार क जीत’ पढ़कर आप पहचान चुके ह क उनक रु च
आदमी के बदलते हुए मन म है। अगली कहानी पढ़ते समय दे खए — क्या वहाँ भी कोई पात्र अंत तक बदल जाता
है? य द हाँ, तो आपने एक लेखक क पहचान पकड़ ली — यही स ी खोजबीन है।
क ा के लए सुझाव: समूह बनाकर हर समूह एक अलग कहानी पढ़े और अगले सप्ताह पाँच मनट म उसे कक्षा
को सुनाए। इस तरह एक ही अव ध म सब ब े पाँच कहा नयाँ जान लगे। चाह तो सबसे पसंद आई कहानी का एक
छोटा-सा नाटक भी तैयार कर सकते ह।
अध्याय — एक नज़र म
हार क जीत सुदशन क लखी एक कहानी है। गाँव के बाहर एक छोटे -से मं दर म रहने वाले बाबा भारती को अपने घोड़े
सुलतान से इतना प्रेम था क भजन से बचा सारा समय वे उसी को दे दे ते थे — “भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े
को अपण हो जाता।”
उस इलाके का प्र सद्ध डाकू खड़्ग सह सुलतान को दे खने आया। घोड़े क चाल दे खकर उसके “हृदय पर साँप लोट गया” और
जाते-जाते उसने कह दया — “बाबाजी, म यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँ गा।”
कई महीने बीत गए। एक साँझ खड़्ग सह अपा हज का वेश बनाकर रास्ते म पड़ा रहा। दयावश बाबा भारती ने उसे घोड़े पर
बठाया और वह घोड़ा लेकर भाग नकला।
बाबा भारती ने उसे रोककर घोड़ा वापस नह माँगा — केवल एक प्राथना क : “इस घटना को कसी के सामने प्रकट न
करना”, क्य क पता चलने पर “लोग कसी गरीब पर व ास न करगे। दु नया से व ास उठ जाएगा।”
यही वाक्य खड़्ग सह के मन को बदल दे ता है। रात के अँधेरे म वह चुपचाप सुलतान को अस्तबल म बाँध जाता है और उसक
आँख म पश्चाताप के आँसू होते ह। अंत म दोन के आँसू एक ही जगह क मट्ट पर गरकर मल जाते ह — यही बाबा भारती
क हार क जीत है।
अभ्यास म कहानी के शीषक पर चचा, पाँच पं क्तय का भावाथ, बाबा भारती क दनचया, संवाद क परख, छह मुहावरे,
तीन पात्र के शब्द- चत्र ( वशेषण), सुलतान क जबानी कहानी, ‘मन के भाव’ और सुदशन क क वता ‘वह चली हवा’ द
गई है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत AglaSem · NCERT Solutions
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ कहानी क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
अपण समिपत कर दे ना, भेटं कर दे ना “भगवत भजन से जो समय बचता, वह घोड़े उसने अपनी पहली कमाई माँ के चरण
को अपण हो जाता।” म अपण कर द ।
खरहरा घोड़े के शरीर को खुर दरे बश से “अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना साईस रोज़ सुबह घोड़े का खरहरा करता
करना साफ़ करना और सहलाना खलाते…” है।
असबाब सामान, ग ृहस्थी का साज़-सामान “उन्ह ने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आ द यात्रा पर जाते समय ज़रूरत भर का
अपना सब-कुछ छोड़ दया था” असबाब ही साथ ली जए।
ां त भम, ग़ ल तफ़ हमी, मन में बैठी हुई “उन्ह ऐसी ां त-सी हो गई थी।” अँधेरे म रस्सी को साँप समझ लेना
धारणा केवल ां त थी।
लट्टू होना िकसी पर मोिहत हो जाना “वे उसक चाल पर लट्टू थे।” नन्हे ब े क मुसकान पर सब लट्टू हो
गए।
क त यश, नाम, पिसिद्ध “होते-होते सुलतान क क त उसके कान तक अ े काम क क त अपने आप दूर
भी पहुँची।” तक फैल जाती है।
अधीर बेचैन, िजससे पतीक्षा न हो सके “उसका हृदय उसे दे खने के लए अधीर हो प रणाम सुनने के लए सब अधीर हो रहे
उठा।” थे।
अस्तबल घोड़े बाँध ने का स्थान, तबेल ा “बाबा भारती और खड़्ग सह दोन अस्तबल अस्तबल म चार घोड़े बँधे थे।
म पहुँचे।”
बाँका सजीला, ितरछी शान वाला, अनोखा “परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसक आँख से कभी पगड़ी बाँधे वह बाँका जवान सबका
सुंद र न गुज़रा था।” ध्यान ख च रहा था।
बाहुबल भुजाओं का बल, शारीिरक शिक्त “उसके पास बाहुबल था, आदमी थे और हर लड़ाई बाहुबल से नह , बु द्ध से जीती
बेरहमी थी।” जाती है।
प्र तक्षण हर क्षण, लगातार “प्र तक्षण खड़्ग सह का भय लगा रहता” परीक्षा के दन म उसे प्र तक्षण घड़ी क
चता रहती थी।
मथ्या झूठा, बेबिु नयाद “इस भय को स्वप्न के भय क नाईं मथ्या अफ़वाह पर व ास मत करो, वह
समझने लगे।” मथ्या नकली।
नाईं की तरह, के समान “स्वप्न के भय क नाईं मथ्या समझने लगे।” वह बालक क नाईं खल खलाकर हँस
पड़ा।
कंगला बहुत ग़ र ीब व्यिक्त, दिरद “ओ बाबा, इस कंगले क सुनते जाना।” मं दर के बाहर बैठे कंगले को उसने
खाना खलाया।
अपा हज िदव्यांग , जो अपने अंग ों से चल-िफर “दे खा, एक अपा हज वृक्ष क छाया म पड़ा बस म चढ़ते अपा हज व्य क्त को उसने
न सके कराह रहा है।” सहारा दया।
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कक्षा 6 हद अध्याय 4 हार क जीत
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शब्द अथ कहानी क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
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वस्मय
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आश्चय, हैर ानी “भय, वस्मय और नराशा से मली हुई चीख
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aभर उठे ।
जादूगर का खेल दे खकर ब े वस्मय से
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नकल गई।”
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प्रयोजन उ े श्य, मतलब, फ़ ायदा “इससे क्या प्रयोजन सद्ध हो सकता है?” इस बहस का अब कोई प्रयोजन नह रह
गया।
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पहर िदन-रात का आठवाँ भाग, लगभग
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“रा त्र का तीसरा पहर बीत चुका था।” वे रोज़ रात के अं तम पहर म उठकर ag
तीन घंटे
g l as पढ़ते ह।
पश्चाताप िकए हुए बुरे काम पर मन-ही-मन दुखी
a “इस समय उसक आँख म पश्चाताप के आँसू झूठ बोलने के बाद उसे बहुत पश्चाताप
com
होना थे।” हुआ।
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a s eवmम परस्पर सहयोग क परंपरा
com lहै।
परस्पर आपस में, एक-दू स रे से “दोन के आँसुओं का उस भू म क मट्ट पर दोन गाँ
em.
परस्पर मेल हो गया।”
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