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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 6: मेरी माँ
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
51 – 59 12 22 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 27 pages
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 6: मेरी माँ
NCERT कक्षा 6 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 6 मेरी माँ के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह पाठ महान क्रां तकारी रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ (1897–
1927) क आत्मकथा का एक अंश है, जसम वे अपनी माँ को याद करते ह। पाठ के अंत म ‘झरोखे से’ म उन्ह क क वता ‘ऐ मातृभू म!’ भी द गई
है। पृष्ठ 51 से 59 तक क हर ग त व ध — मेरी समझ से, पं क्तय पर चचा, मलकर कर मलान, सोच- वचार के लए, आत्मकथा क रचना, शब्द-
प्रयोग तरह-तरह के, आपक बात, पुस्तकालय या इंटरनेट से, शब्द क बात, आज क पहेली, झरोखे से और खोजबीन के लए — शीषक-दर-शीषक
हल क गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 6) 51 – 59
खं ड प्रश्न
12 22
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 55
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
(क) नीचे दए गए प्रश्न का सट क उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा ( ) बनाइए— (1) ‘ कतु यह इ ा पूण
होती नह दखाई दे ती।’ ब स्मल को अपनी कस इ ा के पूण न होने क आशंका थी? • भारत माता के साथ
रहने क • अपनी प्र तज्ञा पर दृढ़ रहने क • अपनी माँ क जीवनपयत सेवा करने क • भोग वलास तथा ऐश्वय
भोगने क
सही उत्तर है — अपनी माँ क जीवनपयत सेवा करने क । इसी वकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
उत्तर का प्रमाण ठ क उसी पं क्त से एक वाक्य पहले मल जाता है —
“इस संसार में मेरी िकसी भी भोग-िवलास तथा ऐश्वय की इच्छा नही ं।
के वल एक इच् छा है, वह यह िक एक बार श्रद्धापूवक त म्ु हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना
लेत ा।
िक च्
ं त ु यह इ छा पूण होती नही ं िद खाई दे ती …”
यानी ‘यह इ ा’ का अथ है — वही इ ा जो अभी-अभी बताई गई: माँ के चरण क सेवा करने क । ब स्मल जानते थे क उन्ह
फाँसी होने वाली है, इस लए उन्ह आशंका थी क यह इ ा अधूरी ही रह जाएगी।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / कारण
ग़लत
अपनी माँ क जीवनपयत सही ★ ‘यह इ ा’ पछले ही वाक्य क ओर संकेत कर रही है — “तुम्हारे चरण क सेवा करके
सेवा करने क अपने जीवन को सफल बना लेता।”
भारत माता के साथ रहने ग़लत भारत माता का उल्लेख आगे आता है, पर वहाँ बात सेवा म जीवन दे ने क है, साथ रहने क
क नह — “भारत माता क सेवा म अपने जीवन को ब ल-दे वी क भट कर गया।”
अपनी प्र तज्ञा पर दृढ़ रहने ग़लत यह इ ा तो पूरी हो गई। ब स्मल स्वयं लखते ह — “अपनी प्र तज्ञा पर दृढ़ रहा।” अधूरी
क रहने वाली इ ा वह नह हो सकती।
भोग वलास तथा ऐश्वय ग़लत यह तो उन्ह ने साफ़ मना कर दया है — “मेरी कसी भी भोग- वलास तथा ऐश्वय क इ ा
भोगने क नह ।” जो इ ा है ही नह , वह अधूरी कैसे रहेगी?
उत्तर पकड़ने का तरीक़ा: जब प्रश्न म ‘यह’, ‘वह’, ‘इसका’ जैसा सवनाम हो, तो उत्तर पाठ म उससे ठ क पहले
छपा होता है। ‘यह इ ा’ पढ़ते ही आँख पीछे क पं क्त पर जानी चा हए। यही आदत ऐसे हर प्रश्न म काम आती है।
प्र.2 (2) रामप्रसाद ब स्मल क माँ का सबसे बड़ा आदे श क्या था? • दे श क सेवा कर • कभी कसी के प्राण न लेना •
कभी कसी से छल न करना • सदा सच बोलना
सही उत्तर है — कभी कसी के प्राण न लेना। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
पाठ म यह बात शब्दशः लखी है —
“माताजी का सबसे बड़ा आदे श मेरे िलए यही था िक िकसी की पाणहािन न हो।
उनका कहना था िक अपने शत्र ु को भी कभी पाणद ंड न दे ना।”
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वकल्प सही / कारण
ग़लत
कभी कसी के सही ★ पाठ म इसे ही ‘सबसे बड़ा आदे श’ कहा गया है। इतना बड़ा क इसे नभाने के लए ब स्मल को
प्राण न लेना अपनी प्र तज्ञा तक भंग करनी पड़ी।
दे श क सेवा कर ग़लत माँ ने दे श-सेवा म सहायता ज़रूर क — “तुम्हारी दया से ही म दे श-सेवा म संलग्न हो सका” — पर
इसे ‘आदे श’ कहकर नह लखा गया।
कभी कसी से छल ग़लत पाठ म छल क कोई चचा नह है। वकालतनामे वाली घटना छल क नह , सत्य क है — और वह
न करना ब स्मल के अपने आचरण क बात है, माँ के आदे श क नह ।
सदा सच बोलना ग़लत सत्य का आचरण ब स्मल स्वयं करते थे — “अपने जीवन म हमेशा सत्य का आचरण करता था।”
यह उनका अपना स्वभाव है, माँ का ‘सबसे बड़ा आदे श’ नह ।
यह आदे श इतना बड़ा क्य है: सो चए — जस बेटे को अंग्रेज़ से लड़ना है, ह थयार उठाने ह, उसक माँ उससे
कहती है क शत्रु के भी प्राण मत लेना। एक ओर दे श क स्वतंत्रता, दूसरी ओर कसी क जान — और माँ जान को
ऊपर रखती ह। इसी से पता चलता है क ब स्मल क माँ का हृदय कतना बड़ा था, और यही आदे श आगे पाठ क
सबसे मा मक पं क्त को जन्म दे ता है — “उनके इस आदे श क पू त करने के लए मुझे मज़बूरन दो-एक बार अपनी
प्र तज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।”
प्र.3 (ख) अब अपने मत्र के साथ तकपूण चचा क जए क आपने ये ही उत्तर क्य चुने?
यह चचा का प्रश्न है। ‘तकपूण चचा’ का अथ है — केवल यह न कहना क “मने यह चुना”, ब ल्क पाठ क पं क्त दखाकर बताना
क क्य चुना।
अ चचा म तीन बात ज़रूर होनी चा हए —
आपने कौन-सा वकल्प चुना;
पाठ क वह पं क्त जो उसे सद्ध करती है;
कम-से-कम एक ऐसा वकल्प, जसे आपने क्य छोड़ा — यह भी बताइए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ
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नमूना उत्तर:
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m a s emइ ा पूण होती
gl वक तुम्हारे चरण क
“पहले प्रश्न म मने चुना — अपनी माँ क जीवनपयत सेवा करने क । कारण यह है क ‘ कतु यह
नह दखाई दे.cतo
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emे अपने जीवन को सफल बना लेता।’ तो ‘यह इ ा’ का मतलब वही हुआ। ‘अपनी प्र तज्ञा पर दृढ़ रहने
ी’ से ठ क पहले लखा है — ‘केवल एक इ ा है, वह यह क एक बार श्रद्धापू
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aकgl’ मने इस लए नह चुना, क्य क वह इ ा तो पूरी हो गई थी — ब स्मल खुद लखते ह ‘अपनी प्र तज्ञा पर दृढ़
सेवा करक
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रहा’।
दूसरे प्रश्न म मने चुना — कभी कसी के प्राण न eलेm
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l ‘सदा सच बोलना’ मने इस लए नह चुना, क्य क सत्य का आचरण
ना। पाठ म साफ़ लखा है क ‘माताजी का सबसे बड़ा आदे श
मेरे लए यही था क कसी क प्राणहा न a नgहो।’
ब स्मल अपने आप करते थे; उसे माँ का आदे श कहकर पाठ म नह लखा गया।”
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c कौन-सी पं क्त उसका आधार है। जब वह पं क्त ढूँ ढ़ने पाठ म लौटेगा, तब l a
gखुद ही उसे अपनी भूल दख
चचा का असली लाभ: हो सकता है कसी मत्र ने दूसरा वकल्प चुना हो। उससे बहस मत क जए — केवल पू छए
क पाठ .क a
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se यही तकपूण चचा है — जीतना नह , प्रमाण तक पहुँचना।
aजाएगी।
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पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 56
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पाठ से a g
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पाठ से भावाथ
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पाठ म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह पढ़कर सम झए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
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प्र.1
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क्या अथ समझ म आया? कक्षा म अपने वचार साझा क जए और ल खए। (क) “य द मुझे ऐसी माता न
agl मलत , तो म भी अ त साधारण मनुष्य क भाँ त संसार-चक्र म फँसकर जीवन नवाह करता।”
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as नवाह करता = बस जीवन काट देता।
पहले क ठन शब्द — अ त साधारण = बल्कुल मामूली; भाँ त = तरह; संसार-चक्र = दु नयादारी का चक्कर — कमाना, खाना,
गृह ी चलाना और इसी म उम्र बता दे ना;lजीवन
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सीधा अथ — ब स्मल कहते ह क अगर मुझे ऐसी माँ न मली होत , तो म भी बाक़ मामूली लोग क तरह दु नयादारी के चक्कर म
फँसकर बस अपनी ज़दगी काट दे ता। कोई बड़ा काम, कोई दे श-सेवा मुझसे न हो पाती।
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भाव — इस एक वाक्य म ब स्मल अपनी सारी उपल
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माँ के नाम कर दे ते ह। वे यह नह कहते क “म जन्म से ही वीर था”; वे
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कहते ह क मुझे साधारण से असाधारण मेरी माँ ने बनाया। यही बात वे पाठ म पहले भी कह चुके ह — “मुझम जो कुछ जीवन तथा
a s em साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदे व श्री सोमदे व जी क कृपाओं का ही प रणाम है।”
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‘संसार-चक्र’ शब्द पर ध्यान द जए: ब स्मल ने ‘संसार’ नह , ‘संसार-चक्र’ लखा है। चक्र यानी प हया — जो
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गोल-गोल घूमता रहता है और वह का वह रहता है। यानी बना कसी बड़े उ े श्य के जया गया जीवन आगे नह
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बढ़ता, बस घूमता रहता है। इस एक शब्द से पूरी बात चत्र बन जाती है — यही अ े लेखन क पहचान है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
अपने जीवन से जो ड़ए: सो चए, आपके जीवन म वह कौन है जसने आपक सोच को कोई नई दशा द — माँ,
पता, दाद , कोई शक्षक या कोई पुस्तक? दो-तीन वाक्य म ल खए क उनके बना आप आज क्या कर रहे होते।
ब स्मल ने ठ क यही कया है।
प्र.2 (ख) “उनके इस आदे श क पू त करने के लए मुझे मज़बूरन दो-एक बार अपनी प्र तज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।”
पहले संदभ — ‘इस आदे श’ का अथ है माँ का वह सबसे बड़ा आदे श — “ कसी क प्राणहा न न हो… अपने शत्रु को भी कभी
प्राणदं ड न दे ना।”
सीधा अथ — ब स्मल कहते ह क माँ के इस आदे श को नभाने के लए मुझे मजबूरी म एक-दो बार अपनी ली हुई प्र तज्ञा तोड़नी
पड़ी।
भाव — ब स्मल क्रां तकारी दल के सदस्य थे। दल म शा मल होते समय हर सदस्य कुछ प्र तज्ञाएँ लेता है — दल के नणय का
पालन करना, स पा गया काम पूरा करना। कई बार दल का नणय ऐसा रहा होगा जसम कसी क जान जाती। तब ब स्मल के
सामने दो कतव्य आमने-सामने आ खड़े हुए — दल क प्र तज्ञा और माँ का आदे श। उन्ह ने माँ के आदे श को ऊपर रखा और
अपनी प्र तज्ञा तोड़ द ।
दो कतव्य आमने-सामने ब स्मल ने क्या इससे क्या पता चलता है
चुना
क्रांितकारी दल की पित ा — दल के िनणय छोड़ दी प्र तज्ञा तोड़ना उनके लए आसान नह था; इसी लए वे ‘मज़बूरन’
का पालन शब्द लखते ह।
माँ का आदे श — िकसी की पाणहािन न हो िनभाया माँ क बात उनके लए दल के अनुशासन से भी ऊपर थी।
यह पं क्त इतनी बड़ी क्य है: एक क्रां तकारी के लए प्र तज्ञा तोड़ना बहुत बड़ी बात है — उसम सा थय क नज़र
म गरने का ख़तरा रहता है। फर भी ब स्मल ने वह जो खम उठाया, क्य क उन्ह माँ क सखाई यह बात ज़्यादा
सच्ची लगी क लड़ाई अन्याय से है, मनुष्य के प्राण से नह । इसी एक वाक्य से हम ब स्मल के भीतर का वह व्य क्त
दखता है जो बंदूक उठाकर भी हसा से बचना चाहता था।
चचा के लए: कक्षा म यह प्रश्न र खए — “क्या प्र तज्ञा तोड़ना हमेशा ग़लत है?” अपने उत्तर के साथ एक कारण
अवश्य द जए। ऐसे प्रश्न म दोन पक्ष सुनने पर ही बात पूरी होती है।
मलकर कर मलान — पृष्ठ 56
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से
पाठ से शब्द- मलान
प्र.1 पाठ म से चुनकर कुछ शब्द नीचे दए गए ह। अपने समूह म इन पर चचा क जए और इन्ह इनके सही अथ या
संदभ से मलाइए। इसके लए आप शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय या अपने शक्षक क सहायता ले सकते ह।
शब्द — 1. दे वनागरी 2. आयसमाज 3. मे जनी 4. गो बद सह। अथ या संदभ — 1. सख के दसव और अं तम
गुरु थे। उन्ह ने खालसा पंथ क ापना क । 2. इटली के गुप्त राष्ट्रवाद दल का सेनाप त; इटली का मसीहा था
जसने लोग को एक सूत्र म बाँधा। 3. मह ष दयानंद ारा ा पत एक सं ा। 4. भारत क एक भाषा- ल प
जसम हद , संस्कृत, मराठ आ द भाषाएँ लखी जाती ह।
सही मलान इस प्रकार है — 1 → 4, 2 → 3, 3 → 2, 4 → 1. ध्यान द जए, यहाँ एक भी जोड़ी आमने-सामने नह बैठती; क्रम
पूरी तरह उलटा है।
शब्द मलान अथ या संदभ पाठ म कहाँ आया है
1. दे वनागरी →4 भारत क एक भाषा- ल प जसम हद , संस्कृत, “प रश्रम के फल से थोड़े दन म ही वह दे वनागरी
मराठ आ द भाषाएँ लखी जाती ह। पुस्तक का अध्ययन करने लग ।”
2. →3 मह ष दयानंद ारा ा पत एक सं ा। “जब से मने आयसमाज म प्रवेश कया, माताजी से
आयसमाज खूब वातालाप होता।”
3. मेिजनी →2 इटली के गुप्त राष्ट्रवाद दल का सेनाप त; इटली का “…उन्ह ने मेरी वैसी ही सहायता क है, जैसी मे जनी
मसीहा था जसने लोग को एक सूत्र म बाँधा। को उनक माता ने क थी।”
4. गोिबंद →1 सख के दसव और अं तम गुरु थे। उन्ह ने खालसा “गुरु गो बद सह जी क धमपत्नी ने जब अपने पुत्र
िसंह पंथ क ापना क । क मृत्यु क खबर सुनी तो बहुत प्रसन्न हुई थ …”
हर शब्द के बारे म थोड़ा और —
दे वनागरी — यह कोई भाषा नह , ल प है, यानी लखने का ढं ग। हद , संस्कृत, मराठ , नेपाली, क कणी सब इसी ल प म
लखी जाती ह। ब स्मल क माँ का दे वनागरी पुस्तक पढ़ने लगना बताता है क उन्ह ने केवल अक्षर नह सीखे, पूरी पुस्तक पढ़ने
क योग्यता पा ली।
आयसमाज — इसक ापना मह ष दयानंद सरस्वती ने 1875 म क थी। यह मू तपूजा और छु आछू त का वरोध करती थी
और स्त्री- शक्षा पर बहुत ज़ोर दे ती थी। ब स्मल के आयसमाज म जाने के बाद माँ के वचार और उदार हो गए — यह बात पाठ
म साफ़ लखी है।
मे जनी (ज्युसेप्पे मेत्सीनी) — उन्नीसव सद के इटली के दे शभक्त, जन्ह ने ‘यंग इटली’ नाम का गुप्त दल बनाकर बखरे हुए
इटली को एक करने का काम कया। भारत के क्रां तकारी उन्ह अपना आदश मानते थे। ब स्मल अपनी माँ क तुलना मे जनी क
माँ से करते ह — यह उनक सबसे बड़ी प्रशंसा है।
गुरु गो बद सह — सख के दसव गुरु, जन्ह ने 1699 म खालसा पंथ क ापना क । उनके चार पुत्र ने ब लदान दया।
पाठ म उनक धमपत्नी क मसाल इसी लए द गई है — ब स्मल अपनी माँ से भी वैसा ही धैय माँग रहे ह।
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मलान क तरक ब: पहले वे जो ड़याँ मलाइए जो पक्क ह — जैसे ‘गो बद सह’ के आगे ‘ सख के दसव गुरु’।
पक्क जो ड़याँ हटा दे ने पर बची हुई चीज़ अपने आप जुड़ जाती ह। अंदाज़े से शुरू करने पर एक ग़लती बाक़ सब
बगाड़ दे ती है।
सोच- वचार के लए — पृष्ठ 56 और 57
पाठ से
पाठ से ले ख न
प्र.1 पाठ को एक बार फर से प ढ़ए और दए गए प्रश्न के बारे म पता लगाकर अपनी लेखन पु स्तका म ल खए। 1.
ब स्मल क माता जी जब ब्याह कर आईं तो उनक आयु काफ़ कम थी। (क) फर भी उन्ह ने स्वयं को अपने
प रवार के अनुकूल कैसे ढाला?
ब स्मल क माताजी केवल ग्यारह वष क आयु म ब्याह कर शाहजहाँपुर आई थ और उस समय वे “ नतांत अ श क्षत एक ग्रामीण
कन्या के समान” थ । इतनी कम उम्र और बल्कुल नए घर म भी उन्ह ने हार नह मानी — उन्ह ने सीखकर स्वयं को प रवार के
अनुकूल ढाल लया।
उन्ह ने यह कया —
सखाने वाली को अपनाया: शाहजहाँपुर आने के थोड़े ही दन बाद दाद जी ने अपनी छोट बहन को बुला लया। उन्ह ने
माताजी को गृहकाय क शक्षा द और माताजी ने उसे मन लगाकर सीखा।
जल्द सीखा: पाठ के शब्द म — “थोड़े दन म माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लया।”
ज़म्मेदारी सँभाल ली: वे “भोजना द का ठ क-ठ क प्रबंध करने लग ” — यानी घर का रसोई-प्रबंध पूरी तरह उनके हाथ म आ
गया।
घर का माहौल पहचाना: उन्ह ने यह भी समझ लया क इस घर म दाद जी और पताजी का मत क्या है और उससे टकराए
बना अपनी बात कैसे रखनी है। इसी लए वे बेटे क मदद करती रह और डाँट भी चुपचाप सह लेती रह ।
‘अनुकूल ढालना’ का मतलब यहाँ क्या है: ध्यान द जए — माताजी ने अपने आप को ढाला ज़रूर, पर मटाया
नह । घर के काम उन्ह ने घर के ढं ग से सीखे, पर बेटे क शक्षा और सेवा-काय के सवाल पर वे अपनी बात पर डट
रह । सच्चा अनुकूलन यही है — जहाँ सीखना है वहाँ झुक जाना, जहाँ सद्धांत है वहाँ खड़े रहना।
प्र.2 (ख) उन्ह ने अपनी इ ाश क्त के बल पर स्वयं को कैसे श क्षत कया?
ब स्मल क माँ को पढ़ाने के लए कोई स्कूल नह भेजा गया, कोई मास्टर नह रखा गया। उन्ह ने अपनी इ ाश क्त के बल पर
पढ़ना सीखा। पाठ म उनका पूरा रास्ता क्रम से दया गया है —
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क्रम उन्ह ने क्या कया पाठ के शब्द
1 पढ़ने क इ ा कसी ने जगाई नह , स्वयं भीतर से जगी “पढ़ ने का शौक उन्हे ं खुद ही पैद ा हुआ था।”
2 दे र से ही सही, शुरुआत कर द — बेटे के जन्म के पाँच-सात “मेरे जन्म होने के पाँच या सात वष बाद उन्होंने िहंद ी पढ़ ना आरंभ
वष बाद िकया।”
3 गुरु आस-पास ही ढूँ ढ़ लया — मुहल्ले क पढ़ - लखी “मुहल्ले की सखी-सहेल ी… उन्ही ं में जो िशिक्षत थी ं, माताजी उनसे
सहे लयाँ अक्षर-बोध करती ं।”
4 समय नकाला — घर का पूरा काम नपटाने के बाद जो “घर का सब काम कर चुक ने के बाद जो कु छ समय िमल जाता,
समय बचता, उसी म पढ़त उसमें पढ़ ना-िलखना करती।”
5 प रश्रम का फल — अक्षर से आगे बढ़कर पूरी पुस्तक पढ़ने “पिरश्रम के फल से थोड़े िदनों में ही वह दे वनागरी पुस्तकों का
लग अध्ययन करने लगी ं।”
6 जो सीखा, वह आगे बाँटा — बे टय को स्वयं पढ़ाया “मेर ी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही िशक्षा िदया करती थी ं।”
सबसे बड़ी बात कौन-सी है: इस पूरी सूची म सबसे क ठन काम चौथा है — समय नकालना। घर का सारा काम
नपटाने के बाद बचा हुआ समय कतना होता होगा? थोड़ा-सा, और वह भी थकान के बाद। उसी थोड़े-से समय म
लगातार पढ़ते रहना ही ‘इ ाश क्त’ है। प्र तभा नह , यही नरंतरता उन्ह अक्षर-बोध से पुस्तक-अध्ययन तक ले गई।
याद रखने योग्य: उस ज़माने म लड़ कय क पढ़ाई का चलन ही नह था। एक अ श क्षत ग्रामीण कन्या का स्वयं
पढ़ना सीखना और फर अपनी बे टय को पढ़ाना — यह उस समय के हसाब से बहुत बड़ी बात थी।
प्र.3 2. ब स्मल को साहसी बनाने म उनक माता जी ने कैसे सहयोग दया?
ब स्मल स्वयं लखते ह — “मुझम जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदे व श्री सोमदे व जी क कृपाओं का
ही प रणाम है।” उनक माँ ने यह साहस कई तरह से दया —
पहला क़दम उठाने दया — लखनऊ कांग्रेस म जाने क ब स्मल क बड़ी इ ा थी। दाद जी और पताजी वरोध करते रहे,
“ कतु माताजी ने मुझे खच दे ही दया।” यह से उनका सावज नक जीवन शुरू हुआ।
उत्साह टू टने नह दया — सेवा-स म त के काम पताजी और दाद जी को पसंद नह थे, फर भी “माताजी मेरा उत्साह भंग न
होने दे ती थ , जसके कारण उन्ह अक्सर पताजी क डाँट-फटकार तथा दं ड सहन करना पड़ता था।” यानी बेटे का साहस बचाने
के लए उन्ह ने खुद पर चोट ले ली।
ववाह के दबाव से बचाया — दाद जी और पताजी बार-बार ववाह के लए कहते, पर माताजी अड़ी रह क “ शक्षा पा
चुकने के बाद ही ववाह करना उ चत होगा।” इससे ब स्मल को पढ़ने और अपना रास्ता चुनने का समय मला।
दृढ़ता पैदा क — “माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन म वह दृढ़ता उत्पन्न क क कसी आप त्त तथा संकट के
आने पर भी मने अपने संकल्प को न त्यागा।”
संकट म सहारा बन — “महान से महान संकट म भी तुमने मुझे अधीर नह होने दया। सदै व अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते
हुए मुझे सांत्वना दे ती रह ।”
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ
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क्रां तकारी जीवन म साथ दया — “ शक्षा द के अ त रक्त क्रां तकारी जीवन म भी उन्ह ने मेरी वैसी ही सहायता क है, जैसी
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मे जनी को उनक माता ने क थी।”
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यहाँ साहस का असली अथ: ध्यान द जए, माँ ने ब स्मल को कभी ‘बहादुर बनो’ का उपदे श नह दया। उन्ह ने
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l और कया — जब बेटा सही काम कर रहा था, वे उसके साथ खड़ी हो गईं और उसका ख़ा मयाज़ा खुद भुगत
agलया।
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बच्चा साहस उपदे श से नह , यह दे खकर सीखता है क उसके पीछे कोई खड़ा है। इसी भरोसे से ब स्मल म
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वह दृढ़ता आई क फाँसी के सामने भी वे वच लत न हुए।
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3. आज से कई दशक पहले ब स्मल क माँ शक्षा के महत्व को समझती थ , बताइए कैसे?
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g पढ़े - लखे लोग से बेहतर समझती
c खुद अ श क्षत रहकर आई थ , फर भी वे शक्षा का महत्व उस ज़माने के बहुत-से
ब स्मल क .माँ a
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se े चार पक्के प्रमाण पाठ म मलते ह —
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प्रमाण पाठ क बात इससे क्या सद्ध होता है
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1. स्वयं पढ़ ना
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asअध्ययन करने लग ।
बेटे के जन्म के पाँच-सात वष बाद हद पढ़ना आरंभ कया और आगे
चलकर दे वनागरी पुस्तक lका
वे जानती थी ं िक पढ़ ना सीखने की कोई उम
सीखा
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उस समय जब लड़ िकयों की पढ़ ाई का
चलन ही नही ं था,oवे m
2. बेिटयों को पढ़ ाया “मेरी बहन को छोट आयु म माताजी ही शक्षा दया करती थ ।”
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बेिटयों को पढ़ ा रही
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दाद जी और पताजी ववाह के लए बहुत अनुरोध करते, पर माताजी agवे िशक्षा को िववाह से भी ऊपर रखती थी ं —
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seिशक्षा
3. िववाह
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यही कहत क “ शक्षा पा चुकने के बाद ही ववाह करना उ चत और घर के िवरोध के सामने डटी रही ं।
होगा।”
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4. िकताबी िशक्षा से
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लखनऊ कांग्रेस जाने का खच दया; सेवा-स म त के काम म उत्साह वे समझती थी ं िक दुिनया दे खना और
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m . समाज-से वा करना भी िशक्षा का ही िहस्सा a
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आगे भी सोचा भंग न होने दया।
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है।
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सबसे प्रभावशाली प्रमाण कौन-सा है: तीसरा। पहले दो म वे अपने और अपनी बे टय के साथ कुछ कर रही ह।
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तीसरे म उन्ह घर के बड़ से टकराना पड़ रहा है — दाद जी और पताजी दोन के वरुद्ध जाकर कहना क पहले
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शक्षा, फर ववाह। कसी बात का महत्व तभी पूरी तरह समझा हुआ माना जाता है, जब उसके लए कुछ क़ मत
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आज से जो ड़ए: ‘बेट पढ़ाओ’ क बात आज नारे के रूप म कही जाती है। ब स्मल क माँ ने यह काम बना नारे
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के, सौ साल से भी पहले, अपने घर म कर दखाया था।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.5 4. हम कैसे कह सकते ह क ब स्मल क माँ स्वतंत्र और उदार वचार वाली थ ?
‘स्वतंत्र वचार’ यानी अपनी बु द्ध से सोचकर नणय लेना, केवल घर क परंपरा के पीछे न चलना। ‘उदार वचार’ यानी दल का बड़ा
होना, दूसर के लए भी सोचना। ब स्मल क माँ म दोन बात थ —
स्वतंत्र वचार के प्रमाण —
घर के दो बड़ — दाद जी और पताजी — के वरोध के बावजूद उन्ह ने बेटे को लखनऊ कांग्रेस जाने का खच दया।
ववाह के अनुरोध के सामने वे झुक नह — “ शक्षा पा चुकने के बाद ही ववाह करना उ चत होगा।”
बेटे के सेवा-काय म उन्ह ने साथ दया, चाहे इसके लए उन्ह डाँट-फटकार और दं ड सहना पड़ा। यानी वे प रणाम जानते हुए भी
अपने नणय पर टक ।
अ श क्षत होते हुए भी उन्ह ने स्वयं पढ़ना शुरू कया — कसी ने कहा नह , “पढ़ने का शौक उन्ह खुद ही पैदा हुआ था।”
उदार वचार के प्रमाण —
सबसे बड़ा प्रमाण उनका वह आदे श है — “अपने शत्रु को भी कभी प्राणदं ड न दे ना।” अपने बेटे के दुश्मन के लए भी दया
माँगना उदारता क सबसे ऊँची सीढ़ है।
बे टय को पढ़ाना — उस समय के समाज क सोच से आगे बढ़कर।
बेटे के आयसमाज म जाने पर उन्ह ने नाराज़ होकर मुँह नह मोड़ा, ब ल्क उससे खुलकर बात क — “जब से मने आयसमाज म
प्रवेश कया, माताजी से खूब वातालाप होता।”
और इसका प रणाम ब स्मल स्वयं लखते ह — “उस समय क अपेक्षा अब उनके वचार भी कुछ उदार हो गए ह।”
यह अं तम पं क्त सबसे क मती क्य है: उदार होने का अथ यह नह क आप जन्म से ही सब कुछ जानते ह ।
असली उदारता यह है क नई बात सुनकर आप बदलने को तैयार ह । ब स्मल क माँ ने बेटे से बहस नह क ,
बातचीत क — और अपने वचार बदल लए। एक बड़े का छोटे से सीख लेना ही खुले मन क सबसे पक्क पहचान
है।
आत्मकथा क रचना — पृष्ठ 57
पाठ से
पाठ से समू ह -काय
प्र.1 यह पाठ रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ क आत्मकथा का एक अंश है। आत्मकथा यानी अपनी कथा। दु नया म अनेक
लोग अपनी आत्मकथा लखते ह, कभी अपने लए, तो कभी दूसर के पढ़ने के लए। (क) इस पाठ को एक बार
फर से प ढ़ए और अपने-अपने समूह म मलकर इस पाठ क ऐसी पं क्तय क सूची बनाइए जनसे पता लगे क
लेखक अपने बारे म कह रहा है।
पहचान का सूत्र — आत्मकथा म लेखक उत्तम पुरुष म लखता है, यानी ‘म, मेरा, मुझे, मने, मुझसे’ जैसे शब्द का प्रयोग करता है।
इस लए सूची बनाने के लए पाठ म ‘म / मेरा / मुझे’ वाले वाक्य छाँट ली जए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से ऐसी पं क्तय क सूची —
क्रम पाठ क पं क्त लेखक अपने बारे म क्या बता
रहा है
1 ं ेस में जाने के िलए मेर ी बड़ी इच्छा थी।”
“लखनऊ काग अपनी इ ा
2 “मैं बड़े उत्साह के साथ से वा सिमित में सहयोग दे ता था।” अपना काम
3 “मुझमें जो कु छ जीवन तथा साहस आया, वह मेर ी माताजी तथा ग रु
ु दे व श्री सोमदे व जी की अपने गुण का श्रेय कसे दे ते ह
कृ पाओं का ही पिरणाम है। ”
4 “िकसी आपित्त तथा संक ट के आने पर भी मैंने अपने संक ल्प को न त्यागा।” अपना स्वभाव
5 “मैंने तुर ंत उत्तर िदया िक यह तो धम िवरुद्ध होगा, इस पकार का पाप मैं कदािप नही ं कर अपने जीवन क एक घटना
सकता।”
6 “िकं तु मुझ पर कु छ भी पभाव न हुआ , न मैंने हस्ताक्षर िकए।” अपना नणय
7 “अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कु छ हो जाए, सत्य बात कह दे ता अपना सद्धांत
था।”
8 “जब से मैंने आयसमाज में पवेश िकया, माताजी से खूब वात लाप होता।” अपने जीवन का मोड़
9 “यिद मुझे ऐसी माता न िमलती ं तो मैं भी अित साधारण मनुष्यों की भाँित संस ार-चक्र में अपने बारे म आकलन
फँ सकर जीवन िनव ह करता।”
10 “उनके इस आदे श की पूित करने के िलए मुझे मजबूर न दो-एक बार अपनी पित ा भंग करनी अपनी क ठनाई
पड़ी थी।”
11 “तुम्हारी दया से ही मैं दे श-से वा में संल ग्न हो सका।” अपने जीवन क दशा
12 “मुझे जीवन की पत्येक घटना का स्मरण है…” अपनी स्मृ त
13 “इस संस ार में मेर ी िकसी भी भोग-िवलास तथा ऐश्वय की इच्छा नही ं। के वल एक इच्छा है…” अपनी अं तम इ ा
आत्मकथा और जीवनी म अंतर: पाठ के आरंभ का भाग — “श्री रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ बड़े होनहार नौजवान
थे…” — जीवनी जैसा है, क्य क उसम कोई और (भगत सह और पुस्तक के संपादक) ब स्मल के बारे म बता रहे
ह; वहाँ ‘वे, उन्ह ने, उनक ’ आता है। और “लखनऊ कांग्रेस म जाने के लए मेरी बड़ी इ ा थी” से जो भाग शुरू
होता है वह आत्मकथा है, क्य क वहाँ ‘म, मेरा’ आता है। सवनाम बदलते ही वधा बदल जाती है — यही इस
ग त व ध क असली सीख है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (ख) अपने समूह क सूची को कक्षा म सबके साथ साझा क जए।
यह साझा करने क ग त व ध है। इसे केवल सूची पढ़कर सुना दे ना नह है — साझा करते समय आप कक्षा को यह भी दखा सकते
ह क पाठ म लेखक अपने बारे म कस- कस तरह क बात कह रहा है।
अ प्रस्तु त क योजना —
सूची को वषय के हसाब से गु म बाँट ली जए — (क) मन क इ ाएँ, (ख) जीवन क घटनाएँ, (ग) अपने सद्धांत, (घ)
दूसर के प्र त कृतज्ञता।
हर गु े म से केवल एक सबसे अ पं क्त प ढ़ए, पूरी सूची मत प ढ़ए — इससे सुनने वाल का ध्यान बना रहेगा।
अंत म एक वाक्य म बताइए क इन पं क्तय से आपको ब स्मल का कैसा व्य क्तत्व दखा।
दूसरे समूह क सूची भी सु नए और उसम से वे पं क्तयाँ नोट कर ली जए जो आपक सूची म छू ट गई थ ।
नमूना प्रस्तु त:
“हमारे समूह को इस पाठ म तेरह ऐसी पं क्तयाँ मल जनम लेखक अपने बारे म कह रहा है। हम उन्ह चार भाग म
बाँटना चाहगे।
पहला — इ ाएँ: ‘लखनऊ कांग्रेस म जाने के लए मेरी बड़ी इ ा थी।’
दूसरा — जीवन क घटना: ‘मने तुरंत उत्तर दया क यह तो धम वरुद्ध होगा… न मने हस्ताक्षर कए।’
तीसरा — अपने सद्धांत: ‘अपने जीवन म हमेशा सत्य का आचरण करता था।’
चौथा — कृतज्ञता: ‘तुम्हारी दया से ही म दे श-सेवा म संलग्न हो सका।’
इन सब पं क्तय को साथ रखकर हम लगा क ब स्मल बहुत साहसी होने के साथ-साथ बहुत वनम्र भी थे — वे
अपनी हर अ ाई का श्रेय अपनी माँ को दे ते ह, अपने आप को नह ।”
साझा करने से क्या मलता है: एक ही पाठ पढ़कर हर समूह अलग-अलग पं क्तयाँ चुनता है। जब सब समूह
अपनी सूची सुनाते ह तो पूरी कक्षा के सामने पाठ का पूरा नक़्शा खुल जाता है, जो अकेले पढ़ने से कभी नह
खुलता।
शब्द-प्रयोग तरह-तरह के — पृष्ठ 57
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पाठ से
पाठ से शब्द क बात
प्र.1 (क) “माता जी उनसे अक्षर-बोध करत ।” इस वाक्य म अक्षर-बोध का अथ है— अक्षर का बोध या ज्ञान। एक
अन्य वाक्य दे खए— “जो कुछ समय मल जाता, उसम पढ़ना- लखना करत ।” इस वाक्य म पढ़ना- लखना
अथात पढ़ना और लखना। हम लेखन म शब्द को मलाकर छोटा बना लेते ह जससे समय, स्याही, कागज़ आ द
क बचत होती है। संक्षेपीकरण मानव का स्वभाव भी ह। इस पाठ से ऐसे शब्द खोजकर सूची बनाइए।
पाठ म ऐसे मले-जुले शब्द बहुत ह। नीचे उनक सूची है — साथ म यह भी क हर शब्द कन शब्द के मेल से बना है और उसका
अथ क्या है।
1. ‘और’ छपाकर बने शब्द (दोन शब्द बराबर ह, बीच का ‘और’ लुप्त है) —
पाठ का शब्द पूरा रूप अथ
पढ़ ना-िलखना पढ़ना और लखना पढ़ ाई-िलखाई करना
काम-काज काम और काज घर के सब काम
सखी-सहेल ी सखी और सहेली संिगिनयाँ, सहेिलयाँ
डाँट-फटकार डाँट और फटकार कड़ ी बाते ं सुनना
पालन-पोषण पालन और पोषण पालना और िखलाना-िपलाना
भोग-िवलास भोग और वलास सुख-सुिवधा का जीवन
जन्म-जन्मांतर जन्म और दूसरे जन्म एक जन्म से दू स रे जन्म तक
सुख-शांित-कांितमय सुख, शां त और कां त से भरा (किवता ‘ऐ मातभृ िू म !’ से )
2. ‘का / क / के’ छपाकर बने शब्द —
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ
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पाठ का शब्द पूरा रूप अथ
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अक्षर-बोध
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अक्षरों की पहचान
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दे श क सेवा दे श के िलए िकया गया काम
से वा-सिमित सेवा क स म त से वा-काय करने वाली संस्था
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ग ृहकाय गृह का काय
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पाणहािन
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प्राण क हा न जान चली जाना
मृत्युद ंड
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पाणदंड प्राण का दं ड
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धम-रक्षाथ धम क रक्षा के लए
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जन्मदात्री / जीवनदात्री जन्म दे ने वाली / जीवन दे ने वाली
aglसंसार-चक्र संसार का चक्र दुिनयादारी का चक्कर
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दुखभरी (खबर) दुख से भरी दुखद समाचार
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3. ‘आ द’ लगाकर बनी सूची (एक शब्द म पूरी सूची समा जाती है) — भोजना द = भोजन आ द (भोजन, जलपान वग़ैरह);
शक्षा द = शक्षा आ द ( शक्षा, संस्कार वग़ैरह)।
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4. एक ही शब्द दोहराकर बने शब्द — ठ क-ठ क ( बल्कुल ठ क), रहते-रहते (रहते हुए ही), बचते-बचाते (बचाव करते हुए),
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चोरी- छपे ( छपकर), दो-एक (एक या दो), कौन-कौन (सब कौन-कौन)।
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a s em ऐसे शब्द बनते क्य ह: पुस्तक ने इसका कारण खुद बता दया है — समय, स्याही और काग़ज़ क बचत। ज़रा
agl तुलना क जए: “माताजी उनसे अक्षर का बोध कया करती थ ” — नौ शब्द; “माताजी उनसे अक्षर-बोध करत ”
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— चार शब्द। अथ वही रहा, कहने का ढं ग कसा हुआ हो गया। भाषा हमेशा कम शब्द म ज़्यादा कहने क ओर
बढ़ती है।
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ख़ुद बनाकर दे खए: अपने आस-पास से ऐसे शब्द छाँ टए — रोट -पानी, आना-जाना, हँसी-मज़ाक, रख-रखाव,
माता- पता, सुबह-शाम, लेन-दे न, चाय-नाश्ता, फल-सब्ज़ी। हर शब्द के आगे उसका ‘पूरा रूप’ ल खए, तभी
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अभ्यास पूरा माना जाएगा।
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agl आपक बात — पृष्ठ 58
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे खोज
प्र.1 (क) रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ के मत्र के नाम खो जए और स्वतंत्रता आंदोलन म उनक भागीदारी पर कक्षा म चचा
क जए।
ब स्मल हदुस्तान रप ब्लकन एसो सएशन नाम के क्रां तकारी दल के प्रमुख नेता थे। इसी दल के उनके साथी- मत्र इ तहास म
प्र सद्ध ह। नीचे खोज के लए एक तैयार सूची द जा रही है — नाम पढ़कर पुस्तकालय या वश्वसनीय वेबसाइट से इनके बारे म और
प ढ़ए।
साथी का नाम स्वतंत्रता आंदोलन म भागीदारी
अशफ़ ाक़ उ ल्ला ख़ाँ िबिस्मल के सबसे घिनष्ठ िमत्र। काकोरी काण्ड में साथ रहे और उ न्ही ं िदनों फ़ै ज़ ाबाद जेल में फाँस ी दी गई। िहंदू -
मुिस्लम एकता की सबसे सुंद र िमसाल — एक ‘िबिस्मल ’, दू स रे ‘हसरत’ उपनाम से शायरी करते थे।
रोशन िसंह (ठाकु र रोशन काकोरी काण्ड के अिभयुक्त; इलाहाबाद (नैनी) जेल में फाँस ी दी गई।
िसंह)
राजेंद नाथ लािहड़ी काकोरी काण्ड के साथी; गोंडा जेल में फाँस ी दी गई।
चंद शेखर आज़ाद दल के साथी; िबिस्मल की फाँस ी के बाद दल को िफर खड़ ा िकया और ‘िहंद ुस्तान सोशिल स्ट िरपिब्ल कन
एसोिसएशन’ बनाया।
सची ंद नाथ सान्याल दल के संस्थापकों में; ‘बंद ी जीवन’ नामक पिस द्ध पुस्तक िलखी, िजसने अनेक नौजवानों को पेिरत िकया।
म न्मथनाथ गप्ु त काकोरी काण्ड के सबसे कम उम के अिभयुक्तों में; बाद में उ न्होंने क्रांितकारी आंद ोलन का इितहास िलखा।
गोिवंद चरण कर / बनवारी काकोरी मुक दमे के अन्य अिभयुक्त; इन्हे ं अलग-अलग अविध की सज़ ाएँ हुई।ं
लाल आिद
चचा कस पर क जए —
काकोरी काण्ड (1925) — लखनऊ के पास काकोरी म इस दल ने सरकारी ख़ज़ाना ले जा रही रेलगाड़ी रोककर धन लया,
ता क आंदोलन चल सके। मुकदमे म ब स्मल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, रोशन सह और राजद्रनाथ ला हड़ी को फाँसी हुई।
ब स्मल और अशफ़ाक़ क मत्रता — दोन अलग धम के, दोन शायर, दोन एक साथ शहीद। यह भारत क साझी वरासत
का सबसे सुंदर उदाहरण है।
पाठ से जो ड़ए — ब स्मल क माँ का आदे श था “ कसी क प्राणहा न न हो।” चचा क जए क क्या यह आदे श उनके दल के
काम-काज पर असर डालता होगा।
खोज कहाँ कर: पुस्तकालय म — ब स्मल क आत्मकथा, सच द्रनाथ सान्याल क ‘बंद जीवन’, मन्मथनाथ गुप्त
क पुस्तक। इंटरनेट पर — सरकारी संग्रहालय और अ भलेखागार (Archives) क वेबसाइट सबसे भरोसेमंद ह।
जो जानकारी मले, उसे कक्षा म रखने से पहले शक्षक से एक बार जँचवा ली जए।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (ख) नीचे लखे बदुओं को आधार बनाते हुए अपनी माँ या अपने अ भभावक से बातचीत क जए और उनके बारे
म गहराई से जा नए क उनका प्रय रंग, भोज्य पदाथ, गीत, बचपन क याद, प्रय ान आ द कौन-कौन से थे?
उदाहरण के लए— • आपका जन्म कहाँ हुआ था? • आपक प्रय पुस्तक का नाम क्या है?
यह आपक अपनी बातचीत है, इस लए इसका उत्तर हर व ाथ का अलग होगा। नीचे करने का तरीक़ा और एक नमूना दया गया
है, जसे दे खकर आप अपनी बातचीत लख सकते ह।
बातचीत कैसे क जए —
पहले प्रश्न क सूची बनाकर कॉपी म लख ली जए, फर बात क जए। बना तैयारी क बातचीत बीच म अटक जाती है।
ऐसा समय चु नए जब वे फुरसत म ह — काम के बीच म नह ।
‘हाँ/नह ’ वाले प्रश्न कम पू छए। हर उत्तर के बाद एक बार “क्य ?” या “ फर क्या हुआ?” ज़रूर पू छए — असली कहानी
वह से नकलती है।
सुनते-सुनते छोटे -छोटे नोट लखते च लए; बाद म पूरे वाक्य बनाइए।
हो सके तो उनके बचपन क कोई पुरानी तस्वीर भी लगाइए।
पूछने के लए प्रश्न (पुस्तक के दो प्रश्न के साथ ये भी जो ड़ए) —
बदु प्रश्न इस तरह पू छए
जन्म- ान आपका जन्म कहाँ हुआ था? वह जगह अब कै सी िदखती है?
प्रय पुस्तक आपकी िपय पुस्तक कौन-सी है? वह आपको सबसे पहले िकसने दी थी?
प्रय रंग आपको कौन-सा रंग सबसे अच्छा लगता है और क्यों?
प्रय भोज्य पदाथ बचपन में आपको कौन-सी चीज़ खाना सबसे अच्छा लगता था? वह कौन बनाता था?
प्रय गीत कोई ऐसा गीत जो सुनकर आपको आज भी अपना बचपन याद आ जाता हो?
बचपन क याद बचपन की सबसे मज़ेद ार शरारत कौन-सी थी? और सबसे बड़ी डाँट िकस बात पर पड़ी?
प्रय ान आपकी सबसे िपय जगह कौन-सी है? वहाँ जाकर कै सा लगता है?
सपना बचपन में आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
नमूना उत्तर (आप अपनी बातचीत के अनुसार बदल ली जए):
“मने र ववार क दोपहर अपनी माँ से बात क । उनका जन्म बुलंदशहर के पास एक छोटे -से गाँव म हुआ था, जहाँ
घर के पीछे एक बड़ा नीम का पेड़ था। उन्ह हरा रंग सबसे अ ा लगता है, क्य क उन्ह अपने खेत याद आ जाते ह।
खाने म उन्ह नानी के हाथ क बाजरे क रोट और गुड़ सबसे प्रय था। जस गीत को सुनकर उन्ह आज भी बचपन
याद आ जाता है, वह है ‘लग जा गले’ — नानी उसे गुनगुनाया करती थ ।
सबसे मज़ेदार बात यह पता चली क माँ बचपन म पेड़ पर चढ़ने म सबसे आगे थ और एक बार अमरूद तोड़ते हुए
गरकर उनका हाथ छल गया था; उन्ह ने घर म यही कहा क फसल गई थ । उनक प्रय जगह अब भी गाँव क वही
चौपाल है। बड़े होकर वे अध्या पका बनना चाहती थ ।
इस बातचीत के बाद मुझे लगा क माँ सफ़ ‘माँ’ नह ह — उनका भी एक बचपन था, अपने सपने थे। यह बात मने
पहले कभी सोची ही नह थी।”
यह ग त व ध पाठ से क्य जोड़ी गई है: ब स्मल ने अपनी माँ के बारे म जो लखा, वह केवल “मेरी माँ अ थ”
नह है। उन्ह ने ब्यौरे लखे — कस उम्र म ब्याह कर आईं, कैसे पढ़ना सीखा, कस बात पर अड़ । ब्यौरे ही कसी को
जी वत बनाते ह। इस ग त व ध म आपसे भी वही ब्यौरे जुटाने को कहा जा रहा है।
पुस्तकालय या इंटरनेट से — पृष्ठ 58
पाठ से आगे
पाठ से आगे प रयोजना
प्र.1 आप पुस्तकालय से रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ क आत्मकथा खोजकर प ढ़ए।
यह पढ़ने क ग त व ध है। नीचे बताया गया है क यह आत्मकथा है क्या और उसे कैसे खोज-पढ़।
पुस्तक के बारे म — ब स्मल ने यह आत्मकथा गोरखपुर जेल म, फाँसी के कुछ ही दन पहले, चोरी- छपे लखी थी और पन्ने
छपाकर बाहर भजवाए थे। सा थय ने इसे छपवाया और नाम रखा — ‘ नज जीवन क एक छटा’। यही बात पाठ के आरंभ म भी
द गई है। आज यह अनेक प्रकाशक से ‘आत्मकथा — रामप्रसाद ब स्मल’, ‘क्रां त गाथा’ आ द नाम से मलती है।
कैसे खोज —
पुस्तकालय म: ‘जीवनी / आत्मकथा’ वाले खाने म दे खए, या पुस्तकालयाध्यक्ष से क हए — “रामप्रसाद ब स्मल क
आत्मकथा चा हए।”
इंटरनेट पर: सरकारी ड जटल पुस्तकालय (जैसे National Digital Library of India) और अ भलेखागार क वेबसाइट
दे खए। बहुत पुरानी पुस्तक वहाँ मुफ़्त पढ़ने को मल जाती ह।
सावधानी: इंटरनेट पर ब स्मल के नाम से बहुत-सी बात और शेर चढ़े रहते ह जो उनके ह ही नह । जो पढ़, उसका ोत दे ख
ली जए और शक्षक से जँचवा ली जए।
पढ़ते समय यह ता लका भरते च लए —
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
क्या नोट कर उदाहरण (‘मेरी माँ’ अंश से)
कोई एक घटना वकालतनामे पर िपताजी के हस्ताक्षर करने से मना कर दे ना
कोई एक पं क्त जो दल को छू गई “तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न िकया।”
कोई नया शब्द उऋण, अवणनीय, ताड़ना
अपना एक प्रश्न फाँस ी के इतने पास होकर भी वे इतने शात
ं कै से िलख सके ?
ध्यान रहे: आत्मकथा का यह पाठ जतना कोमल है, पुस्तक के दूसरे हस्से उतने ही कठोर ह — उनम जेल, मुकदमे
और फाँसी क बात ह। पढ़ते समय जो समझ न आए, उसे शक्षक या घर के बड़ से पूछ ली जए।
प्र.2 दे शभक्त से संबं धत अन्य पुस्तक, जैसे— उनके पत्र, आत्मकथा, जीवनी आ द प ढ़ए और अपने मत्र से साझा
क जए।
दे शभक्त के बारे म तीन तरह क पुस्तक मलती ह। पहले यह अंतर समझ ली जए, फर सूची म से चु नए।
वधा कौन लखता है पहचान
आत्मकथा वह व्यिक्त स्वयं ‘म, मेरा, मुझे’ — जैसे ‘मेरी माँ’ पाठ
जीवनी कोई और ले खक ‘वे, उन्ह ने, उनक ’
पत्र वह व्यिक्त, िकसी एक को संबोिधत करके ‘तुम, तुम्हारा’ — पाठ का अं तम भाग भी लगभग पत्र जैसा ही है
पढ़ने के लए सुझाई गई पुस्तक —
आत्मकथा: महात्मा गांधी — ‘सत्य के प्रयोग’; सच द्रनाथ सान्याल — ‘बंद जीवन’; रामप्रसाद ब स्मल — ‘ नज जीवन क
एक छटा’।
पत्र: जवाहरलाल नेहरू के इं दरा को लखे पत्र — ‘ पता के पत्र पुत्री के नाम’; भगत सह के जेल से लखे पत्र और उनक
‘जेल नोटबुक’।
जीवनी: रानी लक्ष्मीबाई, सुभाषचंद्र बोस, भगत सह, बरसा मुंडा, मंगल पांडे, तात्या टोपे, टं ा भील, कत्तूर रानी चेन्नम्मा,
रानी गाइ दन्ल्यू, मातं गनी हाज़रा और वेलु ना चयार जैसी वीरांगनाओं पर लखी बाल-पुस्तक (NCERT, नेशनल बुक ट्रस्ट और
सा हत्य अकादे मी क सस्ती पुस्तक पुस्तकालय म आसानी से मल जाती ह)।
मत्र से कैसे साझा कर — तीन मनट का ढाँचा:
1. पुस्तक का नाम, लेखक और वधा (आत्मकथा / जीवनी / पत्र)।
2. उसम से एक घटना सुनाइए — पूरी कहानी मत सुनाइए, वरना सुनने वाले का मज़ा चला जाएगा।
3. उसम से एक पं क्त ज्य -क -त्य प ढ़ए जो आपको सबसे अ लगी।
4. अंत म एक वाक्य — “यह पुस्तक उन्ह पढ़नी चा हए जन्ह … पसंद है।”
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ
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कक्षा के लए सुझाव: कक्षा म एक ‘दे शभक्त कोना’ बनाइए। हर सप्ताह एक व ाथ अपनी पढ़ पुस्तक का एक
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पन्ना-भर प रचय लखकर वहाँ लगाए। साल भर म पूरी कक्षा के पास चालीस पुस्तक क जानकारी
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शब्द क बात — पृष्ठ 58
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे शब्द क बात
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प्र.1 आप अपनी माँ को क्या कहकर संबो धत करते ह? अन्य भाषाओं म माँ के लए प्रयुक्त संबोधन और माँ के लए
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शब्द ढूँ ढ़ए। क्या उनम कुछ समानता दखती है? हाँ, तो क्या?
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पहला भाग आपका अपना है। आप अपनी माँ को जो कहते ह, वही ल खए — माँ, मम्मी, अम्मा, मैया, माई, बा, आई, अम्मी,
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दूसरा भाग — दूसरी भाषाओं म ‘माँ’:
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
भाषा माँ के लए शब्द / संबोधन
हद माँ, माता, मैया, अम्मा, माई
संस्कृत माता, मात,ृ अम्बा, जननी
उदू अम्मी, माँ, वािलदा
पंजाबी माँ, बीजी, अम्मी
मराठ आई, माय
गुजराती मा, बा
बांग्ला मा
अस मया मा, आइ
ओ ड़या मा, बोउ
त मल अम्मा, ताय्
तेलुगु अम्म, अव्व
कन्नड़ अम्मा, ताई
मलयालम अम्मा
कश्मीरी मौज
अंग्रेज़ी mother, mom, mummy, mama
च mère, maman
ेनी madre, mamá
जमन Mutter, Mama
रूसी मात्, मामा
अरबी उम्म, मामा
चीनी मामा (妈妈)
तीसरा भाग — हाँ, समानता साफ़ दखती है। लगभग सभी भाषाओं म माँ का शब्द ‘म’ या ‘अम्’ क ध्व न से शुरू होता है या
उसी के आस-पास घूमता है — माँ, मा, मैया, माता, अम्मा, अम्मी, अम्म, mother, madre, mère, Mutter, मामा, उम्म।
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कक्षा 6 हद अध्याय 6 मेरी माँ AglaSem · NCERT Solutions
ऐसा क्य होता है: ‘म’ क ध्व न दोन ह ठ मलाने भर से बन जाती है — इसके लए न जीभ चा हए, न कोई
अभ्यास। दूध पीता शशु जब ह ठ हलाता है, तो सबसे पहले यही ध्व न नकलती है — ‘म… म… मा’। और जसे
वह सबसे पहले पुकारता है, वह होती है माँ। इसी लए हज़ार कलोमीटर दूर क , बल्कुल अलग प रवार क
भाषाओं म भी माँ का नाम लगभग एक-सा रह गया। माँ शब्द दु नया क सबसे पहली और सबसे साझी ध्व न
है।
करके दे खए: कक्षा म एक ‘माँ-द वार’ बनाइए। हर व ाथ अपने घर क भाषा या बोली म माँ का शब्द एक पच
पर लखकर चपकाए — भोजपुरी, अवधी, बुंदेली, मै थली, संथाली, ग डी, तुलु, क कणी… फर सब मलकर
दे खए क कतनी प चय पर ‘म’ से शुरू होने वाला शब्द है। यही आपक खोज का सबसे सुंदर प्रमाण होगा।
आज क पहेली — पृष्ठ 58 और 59
पाठ से आगे
पाठ से आगे पहे ली
प्र.1 यहाँ द गई वग पहेली म पाठ से बारह वशेषण दए गए ह। उन्ह छाँटकर पाठ म रेखां कत क जए।
पुस्तक क वग पहेली छह पं क्तय और छह खान क है। पहले उसे ठ क-ठ क उतार ली जए —
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ग धा ग्या र ह खू ब
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ङ क दु ख भ री प
च म हा न स्वा धी न
इसम छपे बारह वशेषण ये ह — दस आड़े (बाएँ से दाएँ) और दो खड़े (ऊपर से नीचे)।
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क्र. वशेषण पहेली म कहाँ पाठ क वह पं क्त जसम यह आया है
1 मंगलमयी पं क्त क, खाने 1–5 (आड़े) “उसका स्मरण कर तुम्हारी मंग लमयी मूित का ध्यान आ जाता है। ”
2 प्रत्येक पं क्त ख, खाने 1–3 (आड़े) “मुझे जीवन की पत्येक घटना का स्मरण है। ”
3 छोट पं क्त ख, खाने 5–6 (आड़े) “मेर ी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही िशक्षा िदया करती थी ं।”
4 ग्यारह पं क्त ग, खाने 2–4 (आड़े) “ग्यारह वष की उम में माताजी िववाह कर शाहजहाँपरु आई थी ं।”
5 खूब पं क्त ग, खाने 5–6 (आड़े) “जब से मैंने आयसमाज में पवेश िकया, माताजी से खूब वात लाप होता।”
6 साधारण पं क्त घ, खाने 2–5 (आड़े) “मैं भी अित साधारण मनुष्यों की भाँित संस ार-चक्र में फँ सकर जीवन िनव ह करता।”
7 दुखभरी पं क्त ङ, खाने 2–5 (आड़े) “तुम्हे ं मेर ी म ृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी।”
8 महान पं क्त च, खाने 1–3 (आड़े) “महान से महान संक ट में भी तुम ने मुझे अधीर नही ं होने िदया।”
9 स्वाधीन पं क्त च, खाने 4–6 (आड़े) “जब स्वाधीन भारत का इितहास िलखा जाएगा…”
10 बड़ा खाना 6, पं क्त ग–घ (खड़े) “माताजी का सबसे बड़ा आदे श मेरे िलए यही था…”
11 धा मक खाना 1, पं क्त ग–ङ (खड़े) “धािम क जीवन में भी तुम्हारे ही पोत्साहन ने सहायता दी।”
12 मनोहर खाना 4, पं क्त क–घ (खड़े) “िजस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदे श करती थी ं…”
ध्यान द जए: ‘मनोहर’ म ‘म’, ‘ह’ और ‘र’ के खाने दूसरे शब्द के साथ साझा ह — ‘म’ मंगलमयी का, ‘ह’ ग्यारह
का और ‘र’ साधारण का। वग पहेली म एक ही खाना दो शब्द म आ सकता है, इस लए काटते समय हल्क प सल
से काम क जए। पहेली के दो खाने — ‘ल’ (पं क्त क, खाना 6) और ‘प’ (पं क्त ङ, खाना 6) — कसी शब्द म
नह आते; वे केवल भरने के लए ह।
वशेषण क्या होता है — दोहरा ली जए: जो शब्द संज्ञा या सवनाम क वशेषता बताए, वह वशेषण है, और
जसक वशेषता बताई जाए वह वशेष्य। जैसे — ‘दुखभरी खबर’ म खबर वशेष्य है और दुखभरी वशेषण;
‘ग्यारह वष’ म ग्यारह संख्यावाचक वशेषण है; ‘छोट आयु’ म छोट गुणवाचक वशेषण। ‘खूब’ यहाँ ‘वातालाप’
क मात्रा बता रहा है — प रमाणवाचक। पहेली हल करने के बाद हर शब्द के आगे उसका वशेष्य भी लख ली जए,
तो अभ्यास पूरा हो जाएगा।
अगला क़दम: प्रश्न म केवल छाँटना नह , पाठ म रेखां कत करना भी कहा गया है। ऊपर क ता लका म हर शब्द
के सामने उसक पं क्त दे द गई है — अब पुस्तक खोलकर उन्ह पं क्तय म प सल से रेखा ख च द जए।
झरोखे से — पृष्ठ 59
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पाठ से आगे
पाठ से आगे क वता
प्र.1 ऐ मातृभू म! — “ऐ मातृभू म! तेरी जय हो, सदा वजय हो। / प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शां त-कां तमय हो। /
अज्ञान क नशा म, दुख से भरी दशा म; / संसार के हृदय म, तेरी प्रभा उदय हो। / तेरा प्रकोप सारे जग का
महाप्रलय हो। / तेरी प्रसन्नता ही आनंद का वषय हो। / वह भ क्त दे क ‘ ब स्मल’ सुख म तुझे न भूले, / वह
श क्त दे क दुख म कायर न यह हृदय हो।” — रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ — इस क वता को प ढ़ए और सम झए क
क व क्या कहना चाहता है।
यह क वता उसी लेखक क है जसक आत्मकथा आपने अभी पढ़ — रामप्रसाद ‘ ब स्मल’। पाठ म उन्ह ने अपनी जन्म दे ने वाली
माँ को पुकारा था; इस क वता म वे मातृभू म को माँ मानकर पुकारते ह। दोन को साथ प ढ़ए तो पाठ का पूरा अथ खुल जाता है।
पं क्त-दर-पं क्त भाव —
पं क्त भाव
“ऐ मातभृ िू म! तेर ी जय हो, सदा िवजय हो।” हे मातभृ िू म! तेरी जय हो और तू सदा िवजयी रहे। किवता का आरंभ ही एक पुक ार से होता
है।
“पत्येक भक्त तेर ा, सुख-शािं त-कािं तमय हो।” तेरा हर भक्त सुख, शािं त और कािं त (तेज) से भरा रहे। किव अपने िलए नही,ं सबके िलए
माँग रहा है।
“अ ान की िनशा में, दुख से भरी िदशा में; संस ार अ ान की रात में और दुख से भरी िदशाओं में — सारे संस ार के हृदय में तेरा पकाश उदय
के हृदय में, तेर ी पभा उदय हो।” हो। किव चाहता है िक भारत की ज्योित के वल भारत तक नही,ं पूरी दुिनया तक पहचु ँ े।
“तेर ा पकोप सारे जग का महापलय हो।” और यिद तू क्रोध करे , तो वह क्रोध ऐसा हो िक सारे जग को िहला दे । यानी माँ के वल
कोमल नही,ं शिक्तशाली भी है।
“तेर ी पसन्नता ही आनंद का िवषय हो।” हमारे आनंद का कारण के वल एक हो — तेरा पस न्न होना। अपना सुख नही,ं दे श का
सुख।
“वह भिक्त दे िक ‘िबिस्मल’ सुख में तुझे न भूले , वह मुझे ऐसी भिक्त दे ना िक सुख के िदनों में भी तुझे भूल ूँ नही,ं और ऐसी शिक्त दे ना िक दुख के
शिक्त दे िक दुख में कायर न यह हृदय हो।” िदनों में यह हृदय कायर न बने।
क वता क भाषा — कौन-कौन-सी वशेषताएँ ह:
संबोधन और मानवीकरण — पूरी क वता ‘ऐ मातृभू म!’ कहकर धरती से सीधी बात करती है, मानो वह जीती-जागती माँ हो
जो सुन सकती है, प्रसन्न हो सकती है और क्रोध भी कर सकती है।
रूपक — “अज्ञान क नशा” म अज्ञान को रात कहा गया है, और “तेरी प्रभा उदय हो” म मातृभू म क म हमा को सूय क
प्रभा। पूरा चत्र रात के बाद सूय दय का है — यानी अज्ञान के बाद ज्ञान।
अनुप्रास — “सुख-शां त” म ‘स’ क और “दुख से भरी दशा” म ‘द’ क आवृ त्त से पं क्तयाँ गाने योग्य बन जाती ह।
तुक — हर पं क्त का अंत ‘…य हो’ पर होता है — जय हो, वजय हो, कां तमय हो, उदय हो, महाप्रलय हो, वषय हो, हृदय हो।
इसी एक तुक से पूरी क वता म प्राथना क लय बँध जाती है।
वरोधी जोड़े — ‘सुख म… दुख म’, ‘भ क्त दे … श क्त दे ’। दोन को आमने-सामने रखकर क व जीवन के दोन छोर एक साथ
माँग लेता है।
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क व का नाम क वता के भीतर — अं तम दो पं क्तय म ‘ ब स्मल’ अपना उपनाम स्वयं ले आते ह। ग़ज़ल म इसे तख़ल्लुस
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कहते ह, हद म इसे छाप कहा जाता है — जैसे कबीर ‘कहै कबीर’ और रहीम ‘क ह रहीम’ लखते थे।
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क वता क सबसे बड़ी बात: अं तम दो पं क्तय को ध्यान से प ढ़ए। ब स्मल मातृभू म से न धन माँगते ह, न जीत,
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aभglक्त ऐसी हो क सुख म दे श भूल न जाए, और श क्त ऐसी हो क दुख म हृदय कायर न हो जाए। लोग प्रायः सुख
न लंबी उम्र। वे दो चीज़ माँगते ह — भ क्त और श क्त। और उनके साथ जो शत लगाते ह वे और भी सुंदर ह:
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म दे श को भूल जाते ह और दुख म डर जाते ह — ब स्मल ठ क इन्ह दोन कमज़ो रय से बचने क प्राथना कर रहे
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ह। और उन्ह ने जो माँगा, वही करके दखाया — फाँसी के तख़्ते पर भी उनका हृदय वच लत नह हुआ।
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पाठ से जो ड़ए: ‘मेरी माँ’ म ब स्मल लखते ह — “वर दो क अं तम समय भी मेरा हृदय कसी प्रकार वच लत न
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हो।” क वता म वे कहते ह — “वह श क्त दे क दुख म कायर न यह हृदय हो।” एक ही प्राथना दो जगह — एक बार
जन्म दे ने वाली माँ से, एक बार मातृभू म से। दोन को साथ रखकर प ढ़ए तो पता चलता है क m
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ब स्मल के लए ये
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दोन माँएँ अलग
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a gl करके दे खए: इस क वता को कक्षा म समूह-गान क तरह गाइए। हर पं क्त के अंत म आने वाला ‘हो’ सबसे
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मलकर बो लए — तब आपको पता चलेगा क तुक केवल सजावट नह होती, वह पूरे समूह को एक लय म बाँध
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दे ती है।
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खोजबीन के लए — पृष्ठ 59
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comप रयोजना l
पाठ से आगे
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पाठ से आगे
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प्र.1 माँ से संबं धत पाँच रचनाएँ पुस्तकालय से खोज और अपनी प त्रका बनाएँ।
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यह एक प रयोजना है, जसम दो काम ह — पहले पाँच रचनाएँ खोजना, फर उन्ह सजाकर अपनी प त्रका बनाना।
क. रचनाएँ कैसे खोज —
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पुस्तकालय म हद क क वता-संग्रह और बाल-सा हत्य वाली अलमारी दे खए; अनुक्रम णका (index) म ‘माँ’, ‘माता’,
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agजाएँगी।
.cअपनी पछली कक्षाओं क पाठ्यपुस्तक पल टए — उनम भी माँ पर रचनाएँ मल
‘जननी’ शब्द ढूँ ढ़ए।
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घर के बड़ से पू छए — लोकगीत म माँ पर बहुत कुछ है जो कसी कताब म नह मलता। एक लोकगीत ज़रूर शा मल
क जए, वह आपक प त्रका क सबसे अनोखी चीज़ होगी।
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हर रचना का क व/लेखक का नाम और पुस्तक का नाम साथ म लख ली जए — बना ोत के रचना अधूरी है।
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ख. खोजने के लए कुछ जानी-मानी रचनाएँ —
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रचना रचनाकार क्य पढ़
‘ऐ मातभृ िू म!’ रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ आपके इसी पाठ में ‘झरोखे से ’ के अंतगत दी गई है — पित्रका
की शुरुआत इसी से कीिजए।
‘मातभृ िू म’ सोहनलाल वेद आपकी इसी पुस्तक म ार का पहला पाठ। धरती को माँ
कहकर पुक ारने वाली किवता।
‘माँ कह एक कहानी’ मै थलीशरण गुप्त ‘यशोधरा’ से िलया गया पिस द्ध अंश — बालक राहल
ु माँ से
कहानी सुनने की िज़ द करता है।
‘मेर ी माँ’ (आत्मकथा-अंश) रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ आपका यही पाठ — गद्य में िलखी गई माँ की सबसे मािमक
याद।
‘जो बीत गई’ / माँ पर िलखे ह रवंशराय बच्चन, सुभद्राकुमारी चौहान, इन किवयों के संगहों में माँ और ममता पर अनेक रचनाएँ
गीत महादे वी वमा आ द िमले ंगी।
अपने क्षेत्र का कोई लोक (अज्ञात) दादी-नानी से सुनकर िलिखए — इसे िलख ले ने से एक बोलती
लोकगीत या लोरी हुई रचना बच जाती है।
ग. प त्रका कैसे बनाएँ —
1. नाम र खए: प त्रका को एक नाम द जए, जैसे ‘माँ’, ‘ममता’, ‘आँचल’ या ‘मेरी माँ’। ऊपर अपनी कक्षा और वष ल खए।
2. अनुक्रम णका: पहले पन्ने पर पाँच रचनाओं के नाम और पृष्ठ-संख्या ल खए।
3. हर रचना के लए एक पन्ना: ऊपर रचना का नाम और रचनाकार, बीच म रचना, और नीचे दो-तीन पं क्तय म — “मुझे इसम
क्या अ ा लगा”।
4. सजाइए: हाथ से बनाया चत्र, रंगीन बॉडर या कोई पुरानी तस्वीर लगाइए। क टग- चपकाई से पन्ना जी वत हो उठता है।
5. अपना पन्ना जो ड़ए: अंत म एक पन्ना अपनी लखी क वता या अपनी माँ पर लखे दस वाक्य का र खए। यही प त्रका का
सबसे क़ मती पन्ना होगा।
6. अं तम पन्ना — आभार: जन लोग ने रचनाएँ ढूँ ढ़ने म मदद क , उनका नाम ल खए।
प त्रका बनाने से क्या सीखते ह: रचनाएँ पढ़ लेना एक बात है, उन्ह चुनना, क्रम म लगाना और अपनी टप्पणी
जोड़ना दूसरी बात। इसी दूसरी बात म असली पढ़ाई है — क्य क तब आपको तय करना पड़ता है क कौन-सी
रचना पहले आए और क्य । यही काम एक संपादक करता है।
कक्षा के लए सुझाव: सभी समूह क प त्रकाएँ एक दन कक्षा म मेज़ पर सजाइए और सब एक-दूसरे क प त्रका
पढ़। हर प त्रका के अंत म एक ख़ाली पन्ना र खए, जस पर पढ़ने वाले अपनी दो पं क्त क टप्पणी लख सक।
अध्याय — एक नज़र म
यह पाठ कोई कहानी नह , आत्मकथा का अंश है। लखने वाले ह रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ — वही क्रां तकारी जन्ह ने
‘सरफ़रोशी क तमन्ना’ जैसा तराना लखा और जन्ह मात्र तीस वष क आयु म अंग्रेज़ सरकार ने फाँसी दे द । यह आत्मकथा
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उन्ह ने जेल म चोरी- छपे लखी और छपाकर बाहर भजवाई थी; सा थय ने इसे ‘ नज जीवन क एक छटा’ नाम से
छपवाया।
पाठ के आरंभ म भगत सह क कही बात द गई है — “श्री रामप्रसाद ‘ ब स्मल’ बड़े होनहार नौजवान थे… य द कसी और
दे श या कसी और समय पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते।” इसी से पता चलता है क ब स्मल का व्य क्तत्व कतना बड़ा था।
माँ का चत्र — ग्यारह वष क उम्र म ब्याह कर शाहजहाँपुर आईं, तब वे नतांत अ श क्षत थ । पहले घर-गृह ी सँभालना
सीखा, फर बेटे के जन्म के पाँच-सात साल बाद स्वयं हद पढ़ना शुरू कया — मुहल्ले क पढ़ - लखी सहे लय से अक्षर-बोध
करके। आगे चलकर वे दे वनागरी क पुस्तक पढ़ने लग और अपनी बे टय को खुद पढ़ाया।
माँ का साथ — लखनऊ कांग्रेस जाने का खच उन्ह ने ही दया; सेवा-स म त के काम म बेटे का उत्साह भंग न होने दया, चाहे
इसके लए उन्ह पताजी क डाँट-फटकार और दं ड सहना पड़ा। ब स्मल स्वयं लखते ह क क्रां तकारी जीवन म उन्ह ने वैसी
ही सहायता क जैसी मे जनी को उनक माता ने क थी।
माँ का सबसे बड़ा आदे श था — “ कसी क प्राणहा न न हो… अपने शत्रु को भी कभी प्राणदं ड न दे ना।” इस आदे श को
नभाने के लए ब स्मल को मजबूरन दो-एक बार अपनी प्र तज्ञा तक भंग करनी पड़ी।
पाठ का अं तम भाग माँ के नाम एक वदा-पत्र जैसा है — “जन्मदात्री जननी! …तुमसे उऋण नह हो सकता।” ब स्मल
कहते ह क माँ मेरी मृत्यु क खबर सुनकर धैय रखना, क्य क तुम्हारे बेटे ने तुम्हारी कोख कलं कत न क । साथ म उनक
क वता ‘ऐ मातृभू म!’ भी द गई है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
पाठ का शब्द पाठ म अथ कहाँ आया है अपना एक वाक्य
आ धपत्य कब्ज़ा, शासन, हुकू मत “उस समय भारत पर अंग्रेज़ का कभी इस कले पर मराठ का
आ धपत्य था।” आ धपत्य था।
आत्मकथा अपने ही हाथों िलखी अपने जीवन की कहानी “यहाँ प्रस्तुत है उसी आत्मकथा का गांधीजी क आत्मकथा का नाम
एक अंश।” ‘सत्य के प्रयोग’ है।
अक्षर-बोध अक्षरों की पहचान, वणमाला का ान “माताजी उनसे अक्षर-बोध करत ।” दाद ने पाँच साल क उम्र म ही
मुझे अक्षर-बोध करा दया था।
नतांत िबल्कु ल, पूर ी तरह “वह नतांत अ श क्षत एक ग्रामीण यह बात नतांत असत्य है।
कन्या के समान थ ।”
दृढ़ता मज़बूती, अपनी बात पर िटके रहने का ग ण
ु “मेरे जीवन म वह दृढ़ता उत्पन्न क ।” उसने दृढ़ता से कहा क वह झूठ
नह बोलेगा।
वकालतनामा वह काग़ ज़ िजस पर हस्ताक्षर करके मुक दमा “ पताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर मुव क्कल ने वकालतनामे पर
लड़ने के िलए वकील िनयुक्त िकया जाता है कर दूँ ।” अपने दस्तख़त कए।
मे जनी इटली का दे शभक्त नेता, िजसे उसकी माँ ने “जैसी मे जनी को उनक माता ने क मे जनी क तरह अनेक नेताओं को
पग-पग पर सहारा िदया थी।” उनक माताओं ने गढ़ा है।
प्राणहा न / िकसी की जान ले ना / म ृत्युद ंड दे ना “ कसी क प्राणहा न न हो… अपने माँ का आदे श था क लड़ाई हो, पर
प्राणदं ड शत्रु को भी कभी प्राणदं ड न दे ना।” प्राणहा न न हो।
उऋण कज़ से मुक्त, ऋण चुक ा दे ने वाला “सारे जीवन प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे माता- पता के ऋण से कोई उऋण
उऋण नह हो सकता।” नह हो सकता।
अवणनीय िजसका वणन शब्दों में न िकया जा सके “…वह अवणनीय है।” पहली बार समुद्र दे खने का सुख
अवणनीय था।
ताड़ना डाँटना, सुध ारने के िलए दंड दे ना “तुम्ह य द मुझे ताड़ना भी दे नी हुई…” गुरुजी क हल्क -सी ताड़ना भी
हम सुधार दे ती थी।
मंगलमयी कल्याण करने वाली, शुभ “तुम्हारी मंगलमयी मू त का ध्यान आ माँ क मंगलमयी छाया सर पर हो
जाता है।” तो डर कैसा।
कोख कलं कत न माँ का नाम न डुबोना, माँ को लिज्जत न होने “उसने तुम्हारी कोख कलं कत न क ।” अ ा काम करके ही हम माँ क
करना दे ना कोख का मान रखते ह।
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