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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा6
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 7: जलाते चलो
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
60 – 74 17 36 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 37 pages
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: जलाते चलो
NCERT कक्षा 6 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 7 जलाते चलो के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह पाठ बाल सा हत्य के प्र सद्ध क व ा रका
प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) क एक प्रेरक क वता है, जसम ‘द प’ भलाई का और ‘ त मर’ दुख- नराशा का प्रतीक बनकर आया है। पृष्ठ 60 से
74 तक क हर ग त व ध — मेरी समझ से, मलकर कर मलान, पं क्तय पर चचा, सोच- वचार के लए, क वता क रचना, मलान, अनुमान या
कल्पना से, शब्द के रूप, अथ क बात, प्रतीक, पं क्त से पं क्त, सा/सी/से का प्रयोग, आपक बात, अमावस्या और पू णमा, त थपत्र, आज क पहेली
और खोजबीन के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 6) 60 – 74
खं ड प्रश्न
17 36
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 62
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
(क) नीचे दए गए प्रश्न का सट क उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा ( ) बनाइए— (1) नम्न ल खत म से
कौन-सी बात इस क वता म मुख्य रूप से कही गई है? • भलाई के काय करते रहना • द पावली के द पक जलाना
• बल्ब आ द जलाकर अंधकार दूर करना • त मर मलने तक नाव चलाते रहना
सही उत्तर है — भलाई के काय करते रहना। इसी वकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
क वता क पहली ही पं क्त इसका प्रमाण है —
“जलाते चलो ये िदये स्ने ह भर-भर
कभी तो धरा का अँधेरा िमटे गा।”
यहाँ ‘स्नेह’ का दोहरा अथ है — द पक का तेल भी और प्रेम भी। यानी प्रेम से भरे द पक जलाते चलो। और क वता के अंत म यही
बात खुलकर आ जाती है — “रहेगा धरा पर दया एक भी य द, कभी तो नशा को सवेरा मलेगा।” यह कसी त्योहार क बात नह ,
जीवन भर भलाई करते रहने क बात है।
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वकल्प सही / कारण
ग़लत
भलाई के काय करते रहना सही ★ ‘द प’ यहाँ प्रतीक है — भलाई, आशा और परोपकार का। पूरी क वता यही कहती है क
यह काम रुकना नह चा हए।
द पावली के द पक जलाना ग़लत क वता म द पावली का नाम तक नह है। द प यहाँ त्योहार का नह , प्रतीक का द प है।
बल्ब आ द जलाकर अंधकार ग़लत क व तो इसका उलटा कहता है — “ बना स्नेह वद्युत- दये जल रहे जो, बुझाओ इन्ह,
दूर करना य न पथ मल सकेगा।”
त मर मलने तक नाव चलाते ग़लत क वता म नाव त मर मलने तक नह , त मर को पार करने तक चलानी है — “कभी तो
रहना त मर का कनारा मलेगा।”
पहचानने का तरीक़ा: ‘मुख्य रूप से कही गई बात’ वही होती है जो क वता म बार-बार लौटती है। यहाँ तीन बार
लौटती है — “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा”, “कभी तो त मर का कनारा मलेगा”, “कभी तो नशा को सवेरा
मलेगा।” तीन एक ही बात कह रही ह — भलाई करते रहो, अँधेरा हारेगा।
प्र.2 (2) “जला द प पहला तुम्ह ने त मर क , चुनौती प्रथम बार स्वीकार क थी” — यह वाक्य कससे कहा गया है?
• तूफ़ान से • मनुष्य से • द पक से • त मर से
सही उत्तर है — मनुष्य से। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
ध्यान द जए, पं क्त म ‘तुम्ह ने’ शब्द है। पूरी क वता म क व जस ‘तुम’ को पुकार रहा है, वह मनुष्य ही है — क्य क द प
जलाना, नाव बनाना और अँधेरे को चुनौती दे ना केवल मनुष्य ही कर सकता है।
“जला दीप पहला तुम्ही ं ने ितिमर की, चुन ौती पथम बार स्वीकार की थी,
ितिमर की सिरत पार करने तुम्ही ं ने , बना दीप की नाव तै यार की थी।
युगों से तुम्ही ं ने ितिमर की िशला पर, िदये अनिगनत है िनरंत र जलाए,”
यही ‘तुम्ह ने’ तीन बार आता है — और तीन बार वह काम बताता है जो मनुष्य ने आग और द प क खोज करके कया।
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वकल्प सही / कारण
ग़लत
मनुष्य सही ★ द प जलाना, नाव बनाना, युग तक यह काम करते रहना — यह मनुष्य का ही इ तहास है।
से
तूफ़ान से ग़लत तूफ़ान तो द प बुझाता है — “अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” वह द प जलाने वाला नह हो सकता।
द पक से ग़लत द पक स्वयं जलाया जाता है, वह कसी को जलाता नह । ‘जला द प पहला तुम्ह ने’ का कता द प नह हो
सकता।
त मर से ग़लत त मर तो वह है जसे चुनौती द गई — “ त मर क चुनौती स्वीकार क ।” चुनौती दे ने वाला और स्वीकार
करने वाला एक नह होते।
व्याकरण से मदद: ऐसे प्रश्न म क्रया का कता ढूँ ढ़ए। यहाँ क्रया है ‘जला’ और ‘स्वीकार क थी’ — और कता है
‘तुम्ह ने’। अब बस यह दे खना है क यह काम कौन कर सकता है। जो कर सकता है, वही उत्तर है।
प्र.3 (ख) अब अपने मत्र के साथ चचा क जए और कारण बताइए क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
यह चचा का प्रश्न है। इसम केवल यह कहना काफ़ नह क “मने यह चुना” — बताना यह है क क वता क कौन-सी पं क्त
आपके उत्तर का प्रमाण है।
अ चचा म तीन बात ज़रूर होनी चा हए —
आपने कौन-सा वकल्प चुना;
क वता क वह पं क्त जो उसे सद्ध करती है;
कम-से-कम एक ऐसा वकल्प जो आपको ठ क नह लगा — और क्य नह लगा।
नमूना उत्तर:
“पहले प्रश्न म मने भलाई के काय करते रहना चुना। कारण यह है क क वता म ‘स्नेह भर-भर’ दये जलाने क बात
है — स्नेह यानी प्रेम। और तीन बार यही आशा दोहराई गई है — ‘कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा’, ‘कभी तो त मर
का कनारा मलेगा’, ‘कभी तो नशा को सवेरा मलेगा’। ‘बल्ब आ द जलाकर अंधकार दूर करना’ मने इस लए नह
चुना, क्य क क व तो कहते ह — ‘ बना स्नेह वद्युत- दये जल रहे जो, बुझाओ इन्ह’।
दूसरे प्रश्न म मने मनुष्य से चुना। कारण यह है क पं क्त म ‘तुम्ह ने’ आया है और यही ‘तुम्ह ने’ आगे दो बार और
आता है — ‘ त मर क स रत पार करने तुम्ह ने बना द प क नाव तैयार क थी’, ‘युग से तुम्ह ने त मर क शला
पर दये अन गनत नरंतर जलाए’। ये सब काम मनुष्य के ही ह। ‘तूफ़ान से’ मने इस लए नह चुना, क्य क तूफ़ान
क वता म द प बुझाने वाला है।”
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चचा का असली लाभ: हो सकता है कसी मत्र ने दूसरा वकल्प चुना हो। उससे बहस मत क जए — बस पू छए
com
m a s emउसे अपनी भूल
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क क वता क कौन-सी पं क्त उसका आधार है। पं क्त ढूँ ढ़ने वह क वता म लौटे गा और अक्सर वह
o तक से बात करना है।
दख जाएगी।.cयही
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मलकर कर मलान — पृष्ठ 62 और 63
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पाठ से
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पाठ से शब्द- मलान a g l
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se m.
प्र.1 क वता म से चुनकर कुछ शब्द यहाँ दए गए ह। अपने समूह म इन पर चचा क जए और इन्ह इनके सही अथ या
o m l a
.c 2. पू णमा 3. व ुत- दये 4. युग। अथ या संदभ — 1. पूणमासी, वहagत थ जस रात चंद्रमा पूरा दखाई
संदभ से मलाइए। इसके लए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शक्षक क सहायता ले सकते ह। शब्द — 1.
m
se दे ता है। 2. व ुत दये अथात बजली से जलने वाले द पक, बल्ब आ द उपकरण। 3. समय, काल, युग संख्या म
अमावस
a
agl चार माने गए ह — सत्ययुग (सतयुग), त्रेता युग, ापर युग और क लयुग। 4. अमावस्या, जस रात आकाश म
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चंद्रमा दखाई नह दे ता।
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m .co agl
l a se
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सही मलान — 1 → 4, 2 → 1, 3 → 2, 4 → 3। ध्यान द जए, केवल तीसरी जोड़ी ही आमने-सामने बैठती है; बाक क्रम बदला
हुआ है।
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s e mवता म कहाँ आया है
m a
शब्द मलान अथ या संदभ क
1.m .co agl
ase
अमावस →4 अमावस्या, जस रात आकाश म चंद्रमा दखाई नह दे ता। “ घरी आ रही है अमावस नशा-
agl
सी।”
2. पूिणमा →1 पूणमासी, वह त थ जस रात चंद्रमा पूरा दखाई दे ता है। “ क जससे अमावस बने
se m
com g l a
. a
पू णमा-सी,”
m
ase
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3. िव तु - →2 बजली से जलने वाले द पक, बल्ब आ द उपकरण। “ बना स्नेह व ुत- दये जल रहे
िदये जो”
cपर”om
समय, काल; युग संख्या म चार माने गए ह — सत्ययुग, त्रेता युग, ापर “युग से तुम्ह ने त मर क शला
.
4. युग →3
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युग और क लयुग।
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m मलान करने का तरीक़ा: पहले वे जो ड़याँ बनाइए जन पर आपको पक्का भरोसा है। जैसे ‘ वद्युत- दये’ का अथ
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ag
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तो उसी शब्द से शुरू हो रहा है — वह सबसे पहले जुड़ जाएगा। ‘अमावस’ और ‘पू णमा’ एक-दूसरे के उलटे ह,
m .
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इस लए उन्ह भी उलटा-उलटा जोड़ना है। बचा हुआ अपने आप सही जगह बैठ जाता है।
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ध्यान र खए: क वता म ‘अमावस’ और ‘पू णमा’ सफ़ त थयाँ नह ह। ‘अमावस बने पू णमा-सी’ का अथ है —
घोर अँधेरा भी पूरे उजाले म बदल जाए। यही व ान क श क्त है, जसक बात क व कर रहे ह।
पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 63
पाठ से
पाठ से भावाथ
प्र.1 क वता म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह ध्यान से प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार अपने समूह म साझा क जए और अपनी लेखन पु स्तका म ल खए—
“ दये और तूफ़ान क यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी, / जली जो प्रथम बार लौ द प क / स्वण-सी
जल रही और जलती रहेगी॥ / रहेगा धरा पर दया एक भी य द / कभी तो नशा को सवेरा मलेगा॥”
पहले क ठन शब्द — लौ = द पक क ज्वाला; स्वण = सोना; धरा = धरती; नशा = रात; सवेरा = सुबह।
सीधा अथ — द पक और तूफ़ान क यह लड़ाई बहुत पुरानी है और आगे भी चलती रहेगी। द पक क जो लौ सबसे पहली बार जली
थी, वह सोने क तरह चमकती हुई आज भी जल रही है और आगे भी जलती रहेगी। य द धरती पर एक भी दया बचा रहा, तो कसी
न कसी दन रात का अंत होगा और सवेरा अवश्य आएगा।
भाव — क व यहाँ दो चीज़ को आमने-सामने खड़ा करता है — द पक और तूफ़ान। द पक यानी अ ाई, आशा और भलाई;
तूफ़ान यानी क ठनाई, बुराई और नराशा। दोन क टक्कर हमेशा से होती आई है। पर क व क बात का असली दम अं तम दो
पं क्तय म है — जीत के लए हज़ार द पक क ज़रूरत नह , एक दया भी बचा रहे तो काफ़ है। यानी दु नया म एक भी भला
आदमी बचा रहे, तो अ ाई कभी नह हारेगी।
पं क्त ऊपरी अथ भीतरी अथ (प्रतीक)
िदये और तूफ़ ान की यह कहानी चली आ हवा द पक बुझाती है, मनुष्य फर अच्छाई और बुराई का संघ ष सदा से चला आ रहा है
रही… जलाता है
जली जो पथम बार लौ दीप की, स्वण-सी पहली बार जली लौ आज भी जल भलाई की भावना एक पीढ़ ी से दू स री पीढ़ ी तक जाती
जल रही… रही है रही, बुझी नही ं
रहेग ा धरा पर िदया एक भी यिद… एक दया भी बचा रहे तो अँधेरा एक भी भला व्यिक्त बचा रहे तो संस ार से िनराशा िमट
हारेगा सकती है
‘स्वण-सी’ ही क्य कहा: सोने क दो वशेषताएँ ह — वह मैला नह होता और घटता नह । हज़ार साल पुराना
सोना भी वैसा ही चमकता है। क व कहना चाहते ह क भलाई क वह पहली लौ भी न मैली हुई, न कम हुई — आज
भी उतनी ही चमक ली है। यहाँ ‘सी’ लगाकर तुलना क गई है, इस लए यह उपमा अलंकार है।
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कक्षा म करने के लए: इन पं क्तय को दो समूह म बाँटकर प ढ़ए — एक समूह ‘तूफ़ान’ क तरह ज़ोर से, दूसरा
‘द पक’ क तरह धीमे पर र स्वर म। सुनने पर आप स्वयं महसूस करगे क धीमा स्वर भी अंत तक टका रहता है
— यही क वता का संदेश है।
सोच- वचार के लए — पृष्ठ 64
पाठ से
पाठ से ले ख न
प्र.1 (क) क वता म अँधेरे या त मर के लए कन वस्तुओं के उदाहरण दए गए ह?
क व ने अँधेरे को कोई एक चीज़ नह रहने दया — उसे बार-बार कसी न कसी वस्तु का रूप दे कर दखाया है। क वता म ये
उदाहरण आए ह —
अँधेरे के लए द गई क वता क पं क्त इससे क्या चत्र बनता है
वस्तु
अमावस की रात (िनशा) “ घरी आ रही है अमावस नशा- अँधेरा चारों ओर से घे र ले ने वाली काली रात है — और वह भी िदन के
सी।” समय!
सिरत यानी नदी “ त मर क स रत पार करने तुम्ह अँधेरा एक बहती नदी है, िजसे पार करना पड़ ता है — इसीिलए नाव
ने” चािहए।
िशला यानी च ान “युग से तुम्ह ने त मर क शला अँधेरा कठोर च ान है, िजस पर िटककर दीप जलाने पड़ ते है।ं
पर”
तूफ़ ान / पवन “अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” अँधेरा हवा बनकर आता है और जलते दीप बुझा दे ता है।
िबना स्नेह जलते िव तु -िदये “ बना स्नेह वद्युत- दये जल रहे जो उजाला पेम के िबना है, वह उजाला नही ं — वह भी एक तरह का
जो” अँधेरा ही है।
इनके साथ ‘अँधेरा’ और ‘ त मर’ शब्द तो सीधे आए ही ह — “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा”, “कभी तो त मर का कनारा
मलेगा”।
ध्यान दे ने क बात: नद , चट्टान, रात, तूफ़ान — ये चार ऐसी चीज़ ह जो मनुष्य के रास्ते म रुकावट बनती ह। क व
ने अँधेरे को इन्ह का रूप दे कर बताया क दुख भी ऐसी ही रुकावट है। पर हर रुकावट का उपाय भी उसने साथ ही
दया — नद के लए नाव, तूफ़ान के लए फर से जलाया गया द प।
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प्र.2 (ख) यह क वता आशा और उत्साह जगाने वाली क वता है। इसम क्या आशा क गई है? यह आशा क्य क गई
है?
क्या आशा क गई है — यही क अँधेरा हमेशा नह रहेगा। क वता म तीन बार यह आशा दोहराई गई है, और तीन बार शब्द
बदलते ह पर बात एक ही रहती है —
“कभी तो धरा का अँधेरा िमटे गा।”
“कभी तो ितिमर का िकनारा िमलेगा॥”
“कभी तो िनशा को सवेरा िमलेगा॥”
इसके साथ एक आशा और है — “उसी से त मर को उजेला मलेगा।” यानी जो द प स्वयं बुझ गया, उसक द हुई ज्यो त से भी
अँधेरा हारेगा।
यह आशा क्य क गई है — इसके तीन ठोस कारण क वता म ही दए ह:
1. मनुष्य पहले भी जीत चुका है। उसी ने पहला द प जलाकर अँधेरे क चुनौती स्वीकार क थी और ‘युग से’ लगातार द प
जलाता आया है।
2. द पक हारता नह , आगे बढ़ जाता है। “मगर बुझ स्वयं ज्यो त जो दे गए वे” — बुझने से पहले वह अपनी लौ दूसरे द पक को
दे जाता है, इस लए ज्यो त क परंपरा कभी टू टती नह ।
3. जीत के लए एक दया भी काफ़ है। “रहेगा धरा पर दया एक भी य द, कभी तो नशा को सवेरा मलेगा।” जब शत इतनी
छोट है, तो नराश होने का कारण ही नह बचता।
‘कभी तो’ शब्द पर ध्यान द जए: क व यह नह कहते क कल ही सवेरा हो जाएगा। वे कहते ह — ‘कभी तो’।
यानी समय लगेगा, पर होगा ज़रूर। यही स ी आशा है — जल्दबाज़ी वाली नह , धीरज वाली। इसी लए क वता
उत्साह भी जगाती है और अधीर भी नह बनाती।
प्र.3 (ग) क वता म कसे जलाने और कसे बुझाने क बात कही गई है?
क वता म एक ही साँस म दो उलटे आदे श दए गए ह — कुछ जलाओ और कुछ बुझाओ।
क्या कसे क वता क पं क्त क्य
करना है
जलाना है स्नेह से भरे दये “जलाते चलो ये दये स्नेह भर-भर” क्य क इन्ह से धरती का अँधेरा मटे गा।
‘स्नेह’ यानी तेल भी और प्रेम भी।
बुझाना है बना स्नेह जल रहे “ बना स्नेह वद्युत- दये जल रहे जो, बुझाओ क्य क जस उजाले म प्रेम नह , वह रास्ता
व ुत- दये इन्ह, य न पथ मल सकेगा॥” नह दखा सकता।
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पूरा उत्तर एक वाक्य म — क व प्रेम और भलाई के द पक जलाते रहने को कहते ह, और उन बजली के द पक को बुझा दे ने को
कहते ह जो चमक तो रहे ह पर जनम स्नेह नह है।
बुझाने क बात क्य : पहली बार पढ़ने पर यह अजीब लगता है — भला कोई उजाला बुझाने को क्य कहेगा? पर
क व क बात गहरी है। बजली के बल्ब म तेल नह होता — और हद म तेल का नाम भी ‘स्नेह’ है, प्रेम का भी। इस
एक शब्द के दोहरे अथ पर पूरी बात टक है: जस प्रग त म प्रेम नह , वह प्रग त नह । ऐसा उजाला आँख को
च धया दे ता है, रास्ता नह दखाता — “य न पथ मल सकेगा।”
आज से जो ड़ए: शहर म रात को इतनी रोशनी होती है क तारे तक दखाई नह दे ते। पर उसी चमकते शहर म कोई
अकेला पड़ोसी बीमार पड़ा हो और कसी को पता न चले — तो वह उजाला कस काम का? क व इसी बात क ओर
इशारा कर रहे ह।
क वता क रचना — पृष्ठ 64
पाठ से
पाठ से समू ह -काय
प्र.1 “जलाते चलो ये दये स्नेह भर-भर / कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा।” इन पं क्तय को अपने शक्षक के साथ
मलकर लय स हत गाने या बोलने का प्रयास क जए। … (क) इस क वता को एक बार फर से प ढ़ए और अपने-
अपने समूह म मलकर इस क वता क वशेषताओं क सूची बनाइए, जैसे इस क वता क पं क्तय को 2–4, 2–4
के क्रम म बाँटा गया है आ द।
पहले वह करके दे खए जो पुस्तक कहती है — दोन पं क्तयाँ ताली दे कर बो लए। आप पाएँगे क दोन म लगभग बराबर समय
लगता है। यही इस क वता क सबसे बड़ी वशेषता है और बाक़ वशेषताएँ इसी के आसपास बुनी हुई ह।
क वता क वशेषताओं क सूची —
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वशेषता क वता से उदाहरण
क्रम — oदोm l a se
c ag (4)
1. 2–4 का
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पंिक्तयों का एक छोटा खंड, िफर चार पंिक्तयों का एक बड़ा खंड; “जलाते चलो… मटे गा।” (2) फर “भले श क्त
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यही क्रम अंत तक चलता है (2–4–2–4–2–4–2–4–2)। व ान… नशा-सी।”
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a2.gहरl पंिक्त में लगभग समान समय — गाने या बोलने में सब पंिक्तयाँ एक-सी लगती है,ं पूरी क वता म — ताली दे कर परखा जा सकता
इसी से किवता गेय और पभावशाली बन जाती है। है।
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3. एक -सी तुक (अंत्यानुपास ) — दो-पंिक्त वाले हर खंड की अंितम पंिक्त ‘-एगा’ पर
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मटे गा – सकेगा – मलेगा – मलेगा – मलेगा ag
समाप्त होती है।
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4. ‘कभी तो’ की पुनरावृि — आशा जगाने वाला यह जोड़ा तीन बार लौटता है। “कभी तो धरा का…”, “कभी तो त मर का…”,
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“कभी तो नशा को…”
.
a s emस्वण-सी
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5. उपमा अलंक ार — ‘सा/सी/से ’ लगाकर तुल ना।
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पू णमा-सी, नशा-सी,
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s emका पयोग — शब्द अपने सीधे अथ से आगे कु छ और कहते है।ं
6. पतीकों
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द प = भलाई; त मर, नशा = दुख और बुराई;
ag
सवेरा = अ े दन
7. संबोधन शैल ी — किव पूरे समय ‘तुम ’ से बात कर रहा है, इसिलए किवता सीधे पाठक
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“तुम्ह ने”, “जलाते चलो”, “बुझाओ इन्ह”
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से जुड़ जाती है।
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se पढ़ कर कु छ करने का मन
क्रयाएँ — आदे श-रूप में, इसिलएlaकिवता
ag
8. पेर णा दे ने वाली ि जलाते चलो, बहाते चलो, बुझाओ
होता है।
9. अनुपास — एक ही वण की आवृि से पंिक्त में संग ीत आ जाता है।
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“चली आ रही और चलती रहेगी”; “जली जो…
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जल रही और जलती रहेगी”
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समo और काव्य-शब्दों की छटा — साधारण शब्दों की जगह भारी-भरकम सुंद र
10. त.त्c तa
l a
g स रत, नशा, धरा, ज्यो त, स्वण, शला,
m
seशब्द।
मर,
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साक्षी
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11. िवरोधी जोड़ ों की भरमार — दो उलटी चीज़ें आमने-सामने रखकर बात कही गई है।
se
द प × तूफ़ान, अमावस × पू णमा, नशा ×
com
सवेरा, जलना × बुझना
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12. दो-पंिक्त वाले खंडों का अंत ‘॥ ’ से — यह िचह्न बताता है िक यहाँ एक भाव पूर ा हो
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“…य न पथ मल सकेगा॥”
गया।
. com
‘समान समय’ का रहस्य क्या है: क वता क हर पं क्त म मात्राओं क संख्या लगभग बराबर रखी जाती है। मात्रा
यानी बोलने म लगने वाला समय — छोट ध्व न (जैसे ‘क’) म एक मात्रा, बड़ी ध्व नe(जै
s mसे ‘का’) म दो। जब हर
m a
.cपंoक्त म मात्राएँ बराबर ह , तो सब पं क्तयाँ एक ही ताल पर गाई जा सकतीagह।lइसी कारण यह क वता याद भी
m जल्द हो जाती है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (ख) अपने समूह क सूची को कक्षा म सबके साथ साझा क जए।
यह समूह-काय है। इसम अ ा प्रदशन करने का तरीक़ा यह है —
1. सूची को क्रम द जए: पहले वे वशेषताएँ जो सुनाई दे ती ह (लय, तुक, पुनरावृ त्त), फर वे जो दखाई दे ती ह (2–4 का क्रम),
और अंत म वे जो समझ म आती ह (प्रतीक, अलंकार)।
2. हर वशेषता के साथ प्रमाण द जए: केवल “इसम तुक है” मत क हए — “ मटे गा, सकेगा, मलेगा — दे खए, तीन एक-सी
तुक ह” क हए।
3. सुनाकर दखाइए: लय वाली बात केवल बोलकर नह समझाई जा सकती। समूह के दो साथी दो पं क्तयाँ ताली के साथ गाकर
सुनाएँ — तब बात सबको तुरंत समझ आएगी।
4. दूसरे समूह क सूची से मलाइए: जो बात आपक सूची म नह है, उसे नोट कर ली जए। अंत म कक्षा क एक साझा सूची
श्यामपट्ट पर बन जाए — वही सबसे पूरी सूची होगी।
नमूना उत्तर (प्रस्तु त क शुरुआत ऐसे क जए):
“हमारे समूह को इस क वता म सबसे पहले यह दखा क इसक पं क्तयाँ 2–4, 2–4 के क्रम म बँट ह — दो पं क्त,
फर चार पं क्त, और यही अंत तक चलता है। दूसरी बात यह क हर दो-पं क्त वाले खंड क अं तम पं क्त ‘-एगा’ पर
ख़त्म होती है — मटे गा, सकेगा, मलेगा। तीसरी बात, ‘कभी तो’ पूरी क वता म तीन बार लौटता है और हर बार
आशा और गहरी हो जाती है। और चौथी बात — पूरी क वता म क व ‘तुम’ कहकर सीधे हमसे बात कर रहे ह,
इसी लए यह क वता उपदे श नह लगती, बुलावा लगती है। अब हमारे दो साथी पहली दो पं क्तयाँ ताली के साथ
गाकर सुनाएँगे।”
साझा करने से क्या मलता है: एक समूह को लय दखती है, दूसरे को प्रतीक, तीसरे को अनुप्रास। जब सब
मलकर बोलते ह, तो एक ही क वता के दस दरवाज़े खुल जाते ह — और यह अकेले पढ़ने से कभी नह हो पाता।
मलान — पृष्ठ 64 और 65
पाठ से
पाठ से भाव- मलान
प्र.1 स्तंभ 1 और स्तंभ 2 म कुछ पं क्तयाँ द गई ह। मलते-जुलते भाव वाली पं क्तय को रेखा ख चकर जो ड़ए—
स्तंभ 1: 1. कभी तो त मर का कनारा मलेगा। 2. जलाते चलो ये दये स्नेह भर-भर। 3. मगर वश्व पर आज क्य
दवस ही म घरी आ रही है अमावस नशा-सी। 4. बना स्नेह व ुत- दये जल रहे जो बुझाओ इन्ह, य न पथ
मल सकेगा। स्तंभ 2: 1. वश्व क भलाई का ध्यान रखे बना प्रग त करने से कोई लाभ नह होगा। 2. वश्व म
सुख-शां त क्य कम होती जा रही है? 3. वश्व क समस्याओं से एक न एक दन छु टकारा अवश्य मलेगा। 4.
दूसर के सुख-चैन के लए प्रयास करते र हए।
सही मलान — 1 → 3, 2 → 4, 3 → 2, 4 → 1। यहाँ एक भी जोड़ी आमने-सामने नह बैठती।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
स्तंभ 1 (क वता क पं क्त) मलान स्तंभ 2 (भाव) क्य यही जोड़ी बनी
1. कभी तो ितिमर का िकनारा →3 वश्व क समस्याओं से एक न एक ‘ त मर’ = समस्याएँ, ‘ कनारा मलना’ = छु टकारा
िमले ग ा। दन छु टकारा अवश्य मलेगा। मलना। दोन म ‘कभी न कभी’ वाली आशा है।
2. जलाते चलो ये िदये स्नेह भर- →4 दूसर के सुख-चैन के लए प्रयास ‘स्नेह भर-भर दये जलाना’ = प्रेम से दूसर के
भर। करते र हए। लए काम करते रहना। दोन म ‘करते रहो’ का
आदे श है।
3. मगर िवश्व पर आज क्यों िदवस →2 वश्व म सुख-शां त क्य कम होती दोन प्रश्न ह और दोन म वही ‘क्य ’ है। ‘ दन म
ही में िघरी आ रही है अमावस जा रही है? अमावस’ = सब कुछ होते हुए भी सुख-शां त का
िनशा-सी। घटना।
4. िबना स्नेह िव तु -िदये जल रहे →1 वश्व क भलाई का ध्यान रखे ‘ वद्युत- दये’ = व ान क प्रग त, ‘ बना स्नेह’ =
जो बुझाओ इन्हे,ं यों न पथ िमल बना प्रग त करने से कोई लाभ भलाई का ध्यान रखे बना, ‘पथ न मलना’ =
सके गा। नह होगा। कोई लाभ न होना।
मलान का आसान रास्ता: पहले वाक्य का प्रकार दे खए। स्तंभ 1 क तीसरी पं क्त प्रश्नवाचक है (‘क्य ’) और
स्तंभ 2 म भी केवल एक ही प्रश्न है (‘क्य कम होती जा रही है?’) — यह जोड़ी बना सोचे बन जाती है। इसी तरह
स्तंभ 1 क दूसरी और चौथी पं क्त आदे श ह। ऐसे प्रकार मलाने से आधा काम पहले ही नपट जाता है।
ध्यान र खए: यहाँ शब्द नह , भाव मलाने ह। इसी लए स्तंभ 2 म ‘द पक’ या ‘ त मर’ जैसे शब्द नह आए — वहाँ
वही बात सीधी भाषा म लखी है। क वता पढ़ते समय यह आदत बहुत काम आती है: हर पं क्त को मन म सीधी
भाषा म एक बार कह ली जए।
अनुमान या कल्पना से — पृष्ठ 65
पाठ से
पाठ से कल्पना
प्र.1 अपने समूह म मलकर चचा क जए— (क) “ दये और तूफ़ान क यह कहानी / चली आ रही और चलती रहेगी”
— द पक और तूफ़ान क यह कौन-सी कहानी हो सकती है जो सदा से चली आ रही है?
यह द पक और तूफ़ान क लड़ाई क कहानी है — जो न कभी शुरू होते दे खी गई, न कभी ख़त्म होते।
कहानी कुछ य है: जस दन मनुष्य ने पहला द प जलाया, उसी दन से हवा उसे बुझाने लगी। द पक बुझा, मनुष्य ने फर जलाया।
तूफ़ान और तेज़ आया, और भी द प बुझे — “अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” पर मनुष्य ने हार नह मानी, वह फर- फर जलाता
रहा। यही कहानी युग से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी।
इसका असली अथ — यहाँ द पक और तूफ़ान दो प्रतीक ह:
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
द पक कसका प्रतीक तूफ़ान कसका प्रतीक तो कहानी क्या हुई
अच्छाई, भलाई बुराई, अन्याय अच्छाई और बुराई का संघ ष — जो हर युग में चलता रहा है
आशा, िहम्मत नराशा, डर मनुष्य के मन के भीतर चलने वाली लड़ ाई
ान, िववेक अ ान, अंध वश्वास ान का पकाश फै लाने वालों और उसे रोकने वालों की कहानी
सत्य के िलए खड़ा एक व्यिक्त उसे रोकने वाली सारी ताक़त हर युग के स त्यवादी और सुधारक की कहानी
क व ने ‘कहानी’ शब्द क्य चुना: ‘लड़ाई’ कहते तो केवल हसा का चत्र बनता। ‘कहानी’ कहने से दो बात एक
साथ आ जाती ह — यह बहुत पुरानी है, और यह आगे भी सुनाई जाती रहेगी। कहानी वही चलती है जो लोग को
याद रह जाए। यानी द पक क जीत हर बार याद रखी गई है, इसी लए वह कहानी बन गई।
अपनी कल्पना जो ड़ए: यही कहानी आप अपने आसपास भी दे ख सकते ह — परीक्षा क घबराहट (तूफ़ान) और
रोज़ क थोड़ी-थोड़ी पढ़ाई (द पक); गाँव म फैली कोई अफ़वाह (तूफ़ान) और सच बोलने वाला एक व्य क्त
(द पक)। समूह म हर सदस्य ऐसा एक-एक उदाहरण सोचकर बताए।
प्र.2 (ख) “जली जो प्रथम बार लौ द प क / स्वण-सी जल रही और जलती रहेगी” — द पक क यह सोने जैसी लौ
क्या हो सकती है जो अन गनत साल से जल रही है?
यह वही पहली लौ है जो कसी मट्ट के द ये म नह , मनुष्य के मन म जली थी — साहस, वश्वास और भलाई क लौ। द ये तो
अन गनत बुझ गए, पर वह भावना कभी नह बुझी। इसी लए क व कहते ह क वह आज भी जल रही है और आगे भी जलती रहेगी।
यह लौ क्या-क्या हो सकती है —
अँधेरे से लड़ने का साहस — वही जससे मनुष्य ने पहली बार त मर को चुनौती द थी।
ान का प्रकाश — जो एक पीढ़ से दूसरी पीढ़ तक पहुँचता रहा। एक द ये से दूसरा द या जलता है, वैसे ही एक गुरु से दूसरा
शष्य।
दूसर के लए जीने क भावना — क वता का ‘स्नेह’, यानी वह प्रेम जससे द प जलते ह।
यह वश्वास क अ ाई अंत म जीतती है — यही वश्वास हर युग म लोग को टू टने से बचाता रहा।
आशा — क ठन से क ठन समय म भी यह मान लेना क “कभी तो नशा को सवेरा मलेगा।”
‘स्वण-सी’ म छपी दो बात: सोने क पहली वशेषता — वह मैला नह होता, जंग नह लगती; दूसरी — वह
घटता नह । क व इशारा कर रहे ह क भलाई क यह लौ न समय के साथ मैली हुई, न कम हुई। हज़ार साल पहले
कसी ने जो स ाई और करुणा दखाई थी, वह आज भी उतनी ही क़ मती है। ‘सी’ लगने से यह उपमा अलंकार बन
गया है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
सोचकर दे खए: आपके घर म शायद कोई ऐसी सीख चली आ रही होगी जो दाद को उनक दाद ने द थी — जैसे
“भूखे को खाना ज़रूर दे ना।” वह भी एक ऐसी ही लौ है, जो कसी द ये म नह , लोग के व्यवहार म जल रही है।
ऐसी एक सीख अपनी लेखन-पु स्तका म ल खए।
शब्द के रूप — पृष्ठ 65 और 66
पाठ से
पाठ से शब्द क बात
प्र.1 “ क जससे अमावस बने पू णमा-सी” — ‘अमावस’ का अथ है ‘अमावस्या’। इन दोन शब्द का अथ तो समान
है ले कन इनके लखने-बोलने म थोड़ा-सा अंतर है। ऐसे ही कुछ शब्द नीचे दए गए ह। इनसे मलते-जुलते दूसरे
शब्द क वता से खोजकर ल खए। ऐसे ही कुछ अन्य शब्द आपस म चचा करके खो जए और ल खए— 1. दया
2. उजेला 3. अन गन 4. ______ 5. ______ 6. ______
यहाँ ऐसे जोड़े बनाने ह जनका अथ एक हो, पर रूप थोड़ा अलग हो। क वता म क व ने कई बार शब्द का छोटा या काव्य वाला
रूप ले लया है, क्य क उससे लय ठ क बैठती है।
क्र. दया गया मलता-जुलता दूसरा कहाँ मलता है / कैसे बना
शब्द रूप
1. िदया दीप (िदये, दीपक ) दोन क वता म ह — “रहेगा धरा पर दया एक भी य द” और “जला द प पहला
तुम्ह ने”।
2. उजेल ा उजाला क वता म ‘उजेला’ है — “उसी से त मर को उजेला मलेगा॥”; बोलचाल का
सामान्य रूप ‘उजाला’ है।
3. अनिगन अनिगनत दोन क वता म ह — “ दये अन गनत है नरंतर जलाए” और “अन गन तुम्हारे
पवन ने बुझाए।”
4. अमावस अमावस्या पुस्तक ने स्वयं यही उदाहरण दया है — “ क जससे अमावस बने पू णमा-सी”।
5. सिरत सिरता क वता म — “ त मर क स रत पार करने तुम्ह ने”; सामान्य रूप ‘स रता’ यानी
नद ।
6. धरा धरती (धरणी) क वता म — “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा।”; रोज़ क भाषा म हम ‘धरती’
कहते ह।
चचा करके ऐसे और जोड़े खो जए —
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एक रूप दूसरा रूप अथ
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नेह प्रेम (और द पक का तेल भी)
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पूिणमा पूनम / पूणमासी वह रात जसम चाँद पूरा दखता है
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सोना / सुवण
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स्वण सोना
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क व छोटा रूप क्य लेते ह: क वता म हर पं क्त क मात्राएँ लगभग बराबर रखनी होती ह। ‘अन गनत’ म एक
a s emज़्यादा है, ‘अन गन’ म एक कम — जहाँ जतनी जगह बची, क व ने वही रूप रख दया। इसी तरह ‘उजाला’
gl क जगह ‘उजेला’ रखने से ‘ मलेगा’ के साथ तुक भी बेहतर बैठ गई। यानी ये बदले हुए रूप भूल नह , क व क सूझ
मात्रा
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अपना वाक्य बनाइए: हर जोड़े का एक-एक वाक्य ल खए — जैसे, “अन गन तारे आकाश म टम टमा रहे थे।”
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और “आकाश म अन गनत तारे थे।” दोन वाक्य पढ़कर दे खए — अथ एक ही है, पर पहला वाक्य कुछ काव्य-सा
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लगता है। यही अंतर पहचानना इस अभ्यास का उ े श्य है।
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seकm बात — पृष्ठ 66
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पाठ से शब्द-चयन
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s — इस पं क्त म ‘चलो’ के ान पर ‘रहो’ शब्द रखकर प ढ़ए। इस शब्द
(क) “जलाते चलो ये दये स्नेहla
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के बदलने से पं क्त के अथaम क्या अंतर आ रहा है? अपने समूह म चचा क जए।
भर-भर”
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दोन पं क्तयाँ एक बार बोलकर दे खए —
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“जलाते रहो ये िदये स्ने ह भर-भर”
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अथ बहुत बदल नह जाता, पर भाव बदल जाता है — और क वता म यही असली बात है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
शब्द उसम क्या भाव है कैसा चत्र बनता है
चलो (किव का चुना िनरंतरता + गित, आगे कोई रुका नह है — लोग चलते जा रहे ह और चलते-चलते द प जलाते जा रहे ह।
हआ
ु ) बढ़ ना, यात्रा रास्ता आगे बढ़ता जाता है।
रहो के वल िनरंतरता, गित नही ं कोई एक जगह खड़ा या बैठा है और वह द प जलाता जा रहा है। काम तो चल रहा
है, पर आगे कोई नह बढ़ रहा।
इस लए ‘चलो’ ही उपयुक्त है — क्य क पूरी क वता एक यात्रा क क वता है। इसम नद है (“ त मर क स रत”), नाव है (“बना
द प क नाव”), कनारा है (“कभी तो त मर का कनारा मलेगा”) और आगे बढ़ने का आदे श भी है (“बहाते चलो नाव तुम वह
नरंतर”)। ‘रहो’ रख दे ने से यह पूरी यात्रा रुक जाती।
एक बात और: ‘चलो’ म साथ चलने का भाव भी है — जैसे कोई हाथ पकड़कर कह रहा हो, “आओ, चलते ह।”
‘रहो’ म यह अपनापन नह , केवल आदे श है। क वता पाठक को साथ लेकर चलना चाहती है, इस लए ‘चलो’ ही
ठ क बैठता है।
ख़ुद करके दे खए: ‘बहाते चलो नाव तुम वह नरंतर’ म भी ‘चलो’ क जगह ‘रहो’ रखकर प ढ़ए — “बहाते रहो
नाव तुम वह नरंतर।” नाव तो चल रही है, पर लगता है जैसे वह एक ही जगह पानी म हल रही हो, कनारे क ओर
बढ़ ही न रही हो। इसी छोटे -से अंतर को पहचानना क वता पढ़ना सीखना है।
प्र.2 (ख) क वता म प्रत्येक शब्द का अपना वशेष महत्व होता है। … नीचे कुछ पं क्तयाँ द गई ह। पं क्तय के सामने
लगभग समान अथ वाले कुछ शब्द दए गए ह। आप उनम से वह शब्द चु नए, जो उस पं क्त म सबसे उपयुक्त
रहेगा— 1. बहाते चलो ______ तुम वह नरंतर (नैया, नाव, नौका) / कभी तो त मर का ______ मलेगा॥ (तट,
तीर, कनारा) 2. रहेगा ______ पर दया एक भी य द (धरा, धरती, भू म) / कभी तो नशा को ______ मलेगा॥
(प्रातः, सुबह, सवेरा) 3. जला द प पहला तुम्ह ने ______ क (अंधकार, त मर, अँधेरे) / चुनौती ______ बार
स्वीकार क थी। (प्रथम, अव्वल, पहली)
सही शब्द वही ह जो क व ने चुने थे। भरी हुई पं क्तयाँ —
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1. बहाते चलो नाव त मु वह िनरंत र
कभी तो ितिमर का िकनारा िमलेगा॥
2. रहेगा धरा पर िदया एक भी यिद
कभी तो िनशा को सवेरा िमलेगा॥
3. जला दीप पहला त म्ु ही ं ने ितिमर की
चुन ौती पथम बार स्वीकार की थी।
रक्त ान सही क्य यही, बाक़ क्य नह
शब्द
बहाते चलो ___ तुम नाव ‘नैया’ और ‘नौका’ म तीन ध्व नयाँ लगती ह, ‘नाव’ म दो — लय बगड़ जाती। ‘नौका’ कताबी लगता
वह िनरंतर है, ‘नैया’ भजन जैसा; ‘नाव’ सीधा और सबका शब्द है।
कभी तो ितिमर का िकनारा ‘ कनारा’ क तुक ‘सवेरा’ और ‘अँधेरा’ से मलती है और मात्रा भी पूरी बैठती है। ‘तट’ और ‘तीर’ बहुत
___ िमले ग ा॥ छोटे ह, पं क्त अधूरी लगेगी।
रहेग ा ___ पर िदया धरा क वता क पहली पं क्त म भी ‘धरा’ ही है — “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा।” वही शब्द लौटने से
एक भी यिद क वता जुड़ी रहती है। ‘धरती’ और ‘भू म’ से मात्रा बढ़ जाती है।
कभी तो िनशा को सवेरा ‘ नशा’ तत्सम है, पर उसके सामने ‘सवेरा’ रखने से चत्र गरमाहट भरा हो जाता है। साथ ही ‘सवेरा –
___ िमले ग ा॥ मलेगा’ क लय ‘अँधेरा – मटे गा’ से जुड़ जाती है। ‘प्रातः’ पं क्त को भारी कर दे ता, ‘सुबह’ बहुत छोटा
पड़ता।
जला दीप पहला ितिमर पूरी क वता म अँधेरे के लए यही शब्द बार-बार आता है — त मर क स रत, त मर क शला, त मर
तुम्ही ं ने ___ की का कनारा। एक ही प्रतीक-शब्द दोहराने से भाव गहरा होता है।
चुनौती ___ बार पथम उसी पं क्त म ‘पहला’ पहले ही आ चुका है (“जला द प पहला”)। एक ही पं क्त म ‘पहला… पहली’
स्वीकार की थी। दोहराना भ ा लगता। ‘अव्वल’ उदू-रंग का शब्द है, यहाँ के तत्सम वातावरण म नह बैठता।
तीन कसौ टयाँ याद र खए: क वता म शब्द चुनते समय हर बार यही तीन बात दे खी जाती ह — (1) मात्रा यानी
लय, (2) तुक, (3) क वता के बाक़ शब्द से मेल। ‘नाव’ लय के कारण जीता, ‘ कनारा’ तुक के कारण, और
‘ त मर’ बाक़ शब्द से मेल के कारण। अथ तो तीन वकल्प का लगभग एक ही था।
प्रतीक — पृष्ठ 66, 67 और 68
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पाठ से
पाठ से शब्द-जाल
प्र.1 (क) “कभी तो नशा को सवेरा मलेगा” — नशा का अथ है— रात। सवेरा का अथ है— सुबह। आपने अनुभव
कया होगा क क वता म इन दोन शब्द का प्रयोग ‘रात’ और ‘सुबह’ के लए नह कया गया है। अपने समूह म
चचा करके पता लगाइए क ‘ नशा’ और ‘सवेरा’ का इस क वता म क्या-क्या अथ हो सकता है। (संकेत— नशा
से जुड़ा है ‘अँधेरा’ और सवेरे से जुड़ा है ‘उजाला’)
सो चए — रात के बाद सुबह तो अपने आप आ जाती है, उसके लए ‘कभी तो’ कहने क क्या ज़रूरत? क व ने ‘कभी तो नशा को
सवेरा मलेगा’ लखा है। इसी से पता चलता है क यह उस रात क बात नह जो आठ घंटे म बीत जाती है। यहाँ दोन शब्द प्रतीक ह।
‘ नशा’ के अथ (अँधेरे से जुड़े) ‘सवेरा’ के अथ (उजाले से जुड़े)
दुख, कष्ट, बुर ा समय सुख, चैन, अच्छे िदन
िनराशा, हताशा आशा, उ त्साह, नई िहम्मत
अ ान, अंध िवश्वास, मूखता ान, समझ, िववेक
बुर ाई, अन्याय, अत्याचार अच्छाई, न्याय, भलाई
ग़ र ीबी, भूख, बीमारी ख़शु हाली, सुख-समृिद्ध
आपस की लड़ाई, अशािं त मेल -िमलाप, शािं त
पूरा उत्तर एक वाक्य म — ‘ नशा’ यहाँ दुख, अ ान, नराशा और बुराई का प्रतीक है, और ‘सवेरा’ सुख, ान, आशा और अ ाई
का। क व कह रहे ह क दु नया का यह बुरा समय भी एक दन बीतेगा और अ े दन आएँगे।
प्रतीक होता क्या है: जब कोई शब्द अपने सीधे अथ से आगे बढ़कर कसी बड़े भाव क जगह खड़ा हो जाए, तो वह
प्रतीक कहलाता है। जैसे तरंगा केवल कपड़ा नह , दे श है; कबूतर केवल पक्षी नह , शां त है। इसी तरह इस क वता
म द प केवल मट्ट का द या नह , भलाई है — और नशा केवल रात नह , दुख है।
प्र.2 (ख) क वता म से चुनकर कुछ शब्द नीचे दए गए ह। अपने समूह म मलकर इन पर चचा क जए और इन्ह
उपयुक्त ान पर ल खए। शब्द — दये, अँधेरा, अमावस, पू णमा, दवस, त मर, नाव, कनारा, शला, ज्यो त,
उजेला, तूफ़ान, लौ, स्वण, जलना, बुझना। (‘सवेरा’ और ‘ नशा’ के शब्द-जाल म भरना है।)
सोलह शब्द दए ह और दोन शब्द-जाल म आठ-आठ बादल बने ह। इस लए आठ शब्द ‘सवेरा’ के नीचे और आठ ‘ नशा’ के नीचे
आएँगे।
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सवेरा (उजाले से जुड़े क वता म कहाँ नशा (अँधेरे से जुड़े क वता म कहाँ
शब्द) शब्द)
िदये “जलाते चलो ये दये स्नेह भर- अँधे र ा “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा।”
भर”
पूिणमा “अमावस बने पू णमा-सी” अमावस “ घरी आ रही है अमावस नशा-सी।”
िदवस “आज क्य दवस ही म” ितिमर “कभी तो त मर का कनारा
मलेगा॥”
ज् योित “मगर बुझ स्वयं ज्यो त जो दे गए तूफ़ ान “ दये और तूफ़ान क यह कहानी”
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उजेल ा “उसी से त मर को उजेला िशला “युग से तुम्ह ने त मर क शला
मलेगा॥” पर”
लौ “जली जो प्रथम बार लौ द प क ” नाव “ त मर क स रत पार करने… द प
क नाव”
स् वण “स्वण-सी जल रही और जलती िकनारा “कभी तो त मर का कनारा
रहेगी।” मलेगा॥”
जलना “जलते हुए द प”, “जलाते चलो” बुझना “अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।”
‘नाव’, ‘ कनारा’ और ‘ शला’ कस ओर जाएँगे — यह उलझन ज़रूर होगी: क वता म ये तीन शब्द हर बार
त मर के साथ ही आते ह — त मर क स रत पार करने वाली नाव, त मर का कनारा, त मर क शला।
इसी लए ये अँधेरे के चत्र का हस्सा ह और ‘ नशा’ के नीचे बैठते ह। पर य द आपका समूह यह तक दे क नाव और
कनारा तो अँधेरे से पार नकलने के साधन और मं ज़ल ह, इस लए वे ‘सवेरा’ क ओर जाएँगे — तो यह भी एक
अ ा तक है। कक्षा म दोन पक्ष र खए; बस अपना कारण क वता क पं क्त से द जए।
पक्का नयम: बाक़ चौदह शब्द म कोई उलझन नह । जो चीज़ प्रकाश दे ती है ( दये, ज्यो त, लौ, उजेला, दवस,
पू णमा, स्वण, जलना) वह सवेरे क ओर; जो प्रकाश छ नती है (अँधेरा, अमावस, त मर, तूफ़ान, बुझना) वह नशा
क ओर।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो
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(ग) अपने समूह म मलकर ‘ नशा’ और ‘सवेरा’ के लए कुछ और शब्द सो चए और ल खए। (संकेत— नीचे
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दए गए चत्र दे खए और इन पर वचार क जए।)
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पुस्तक (पृष्ठ 68) के चार चत्र-जोड़े — हर पं क्त म एक ही दृश्य दो अलग-अलग हालत म: पहाड़ क चोट , पहाड़ी
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क़ला, गुलाब और समुद्र के ऊपर का चाँद।
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पहले पुस्तक के चार चत्र-जोड़े दे खए। हर जोड़े म एक ही दृश्य दो हालत म दखाया गया है — एक ‘सवेरा’ वाली, एक ‘ नशा’
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
चत्र- सवेरे वाला चत्र नशा वाला चत्र कौन-सा शब्द मला
जोड़ा
1. पहाड़ चोट पर झंडा गाड़े खड़ा वही पहाड़, चोट सूनी सवेरा = सफलता, िवजय / िनशा = हार, अधूरापन
पवतारोही
2. िक़ ला ह रयाली से घरा, धूप म चमकता वही क़ला काला-नीला, सवेरा = समृिद्ध, उ न्नित / िनशा = पतन, वीरानी
क़ला उजड़ा हुआ
3. ग ल
ु ाब फूल से लद भरी-पूरी झाड़ी अकेली डाल पर एक फूल सवेरा = ख़शु हाली, भरा-पूरा जीवन / िनशा = अभाव,
अके लापन
4. चाँद खुले तार भरे आकाश म पूरा बादल के पीछे छपा चाँद सवेरा = स्पष्टता, आशा / िनशा = बाधा, िनराशा
चाँद
इन्ह से बने कुछ और शब्द —
‘ नशा’ के लए ‘सवेरा’ के लए
अंध कार, अँिधयारा, तम, ितिमर, कािलमा उजाला, पकाश, आलोक , ज्योित, भोर, पभात, अरुणोदय
िनराशा, हताशा, मायूस ी आशा, उ म्मीद , उ त्साह, उमंग
दुख, पीड़ा, िवपि , संक ट सुख, आनंद , चैन, शांित
अ ान, मूखता, अंध िवश्वास ान, िव ा, समझ, िववेक
हार, असफलता, ठहराव जीत, सफलता, उ न्नित, पगित
वीरानी, उजड़ना, मुर झाना, सूनापन हिरयाली, िखलना, बसना, भरा-पूरा होना
चत्र से यह भी सम झए: चार जोड़ म वस्तु वही है, हालत अलग है — वही पहाड़, वही क़ला, वही गुलाब, वही
चाँद। क व क बात भी यही है — दु नया वही रहती है, बस उस पर ‘ नशा’ छाई है या ‘सवेरा’। और यह हालत
बदली जा सकती है — बस कोई दया जलाता रहे।
पं क्त से पं क्त — पृष्ठ 68 और 69
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से
पाठ से वाक्य-रचना
प्र.1 क वता क पं क्त “जला द प पहला तुम्ह ने त मर क / चुनौती प्रथम बार स्वीकार क थी” को वाक्य के रूप म
इस प्रकार लख सकते ह— “तुम्ह ने पहला द प जला त मर क चुनौती प्रथम बार स्वीकार क थी।” अब नीचे
द गई पं क्तय को इसी प्रकार वाक्य के रूप म ल खए— 1. बहाते चलो नाव तुम वह नरंतर।
वाक्य के रूप म — “तुम वह नाव नरंतर बहाते चलो।”
क्या-क्या बदला —
क वता का क्रम वाक्य का क्रम क्य
बहाते चलो (िक्रया) → नाव (कम) → तुम (कत ) → वह नाव (कम) → िनरंतर हद वाक्य का सीधा क्रम है — कता + कम +
तुम (कत ) → वह िनरंतर (िक्रया-िवशेषण) → बहाते चलो (िक्रया) क्रया। क्रया हमेशा अंत म आती है।
क वता म क्रम उलटा क्य होता है: क वता को लय और तुक नभानी पड़ती है। ‘ नरंतर’ को पं क्त के अंत म
रखना ज़रूरी था, ता क अगली पं क्त के ‘ मलेगा’ के साथ लय बैठे। इसी लए क व ने क्रया आगे कर द । इस
उलटफेर को व्य तक्रम कहते ह — क वता म यह दोष नह , सुंदरता है।
प्र.2 2. जलाते चलो ये दये स्नेह भर-भर।
वाक्य के रूप म — “तुम स्नेह भर-भरकर ये दये जलाते चलो।”
‘तुम’ क वता म लखा नह है, पर छपा हुआ है — क्य क ‘जलाते चलो’ आदे श ‘तुम’ को ही दया गया है। वाक्य बनाते समय ऐसे
छपे कता को सामने ले आना चा हए।
अंश वाक्य म उसका काम
तुम कत (जो काम करे गा) — किवता में िछपा हआ
ु था
ये िदये कम (िजस पर काम होगा)
स्नेह भर-भरकर कै से जलाने है ं — रीित बताने वाला अंश
जलाते चलो िक्रया — वाक्य के अंत में
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ध्यान द जए: क वता म ‘भर-भर’ है, वाक्य म हम ‘भर-भरकर’ लखगे — क्य क गद्य म क्रया को जोड़ने के लए
‘कर’ चा हए। यही छोटा-सा अंतर क वता क भाषा को गद्य क भाषा से अलग करता है।
प्र.3 3. बुझाओ इन्ह, य न पथ मल सकेगा।
वाक्य के रूप म — “इन्ह बुझा दो, क्य क इस प्रकार (जलते रहने से) पथ नह मल सकेगा।”
यह पं क्त असल म दो बात कहती है, इस लए वाक्य बनाते समय दोन को जोड़ना पड़ता है —
पहली बात (आदे श): इन्ह बुझा दो।
दूसरी बात (कारण): इस तरह रास्ता नह मलेगा।
इन्ह ‘क्य क’ से जोड़ दे ने पर पूरा अथ साफ़ हो जाता है। ‘य ’ का अथ है — इस प्रकार, ऐसे ही।
पूरे संदभ के साथ यह वाक्य ऐसे भी लखा जा सकता है — “जो दये बना स्नेह के जल रहे ह, उन्ह बुझा दो, क्य क ऐसे
उजाले से रास्ता नह मल सकेगा।”
‘इन्ह’ कनके लए है: पछली पं क्त के ‘ बना स्नेह जल रहे वद्युत- दये’ के लए। सवनाम अकेला अधूरा होता है
— वाक्य बनाते समय यह दे ख लेना चा हए क वह कसक जगह खड़ा है, वरना वाक्य समझ म नह आएगा।
प्र.4 4. मगर वश्व पर आज क्य दवस ही म घरी आ रही है अमावस नशा-सी।
वाक्य के रूप म — “मगर आज वश्व पर दवस म ही अमावस नशा-सी क्य घरी आ रही है?”
यह प्रश्नवाचक वाक्य है, इस लए अंत म प्रश्नवाचक चह्न (?) लगाना ज़रूरी है — क वता म यह चह्न नह है, पर ‘क्य ’ से पता चल
जाता है क यह प्रश्न है।
अंश वाक्य म उसका काम
अमावस (िनशा-सी) कत — जो िघर रही है
िवश्व पर कहाँ िघर रही है
आज, िदवस में ही कब िघर रही है
क्यों पश्नवाचक शब्द
िघरी आ रही है िक्रया — अंत में
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
अथ भी समझ ली जए: क व पूछ रहे ह क व ान ने इतना उजाला दे दया, फर भी दु नया पर दन म ही अमावस
जैसी रात क्य छाती जा रही है? यानी सु वधाएँ बढ़ , पर सुख-शां त क्य घट रही है? यह प्रश्न आज भी उतना ही
स ा है जतना क वता लखे जाते समय था।
सा/सी/से का प्रयोग — पृष्ठ 69
पाठ से
पाठ से व्याकरण
प्र.1 “ घरी आ रही है अमावस नशा-सी / स्वण-सी जल रही और जलती रहेगी” — इन पं क्तय म ‘सी’ शब्द
समानता दखाने के लए प्रयोग कया गया है। ‘सा/सी/से’ का प्रयोग जब समानता दखाने के लए कया जाता है
तो इनसे पहले योजक चह्न (-) का प्रयोग कया जाता है। अब आप भी व भन्न शब्द के साथ ‘सा/सी/से’ का
प्रयोग करते हुए अपनी कल्पना से पाँच वाक्य अपनी लेखन-पु स्तका म ल खए।
पहले नयम साफ़ कर ली जए — ‘सा/सी/से’ जस शब्द के बारे म बता रहे ह , उसी के लग-वचन के अनुसार बदलते ह, और
उनसे पहले योजक चह्न (-) लगता है।
रूप कब लगता है उदाहरण
-सा पु ल्लंग, एकवचन उसका चेहरा चाँद -सा चमक रहा था।
-सी स्त्री लग, एकवचन दादी की बाते ं शहद -सी मीठी लगती है।ं
-से पु ल्लंग बहुवचन लू के थपेड़े आग-से लग रहे थे।
पाँच वाक्य (नमूना उत्तर) —
1. परीक्षा का प रणाम सुनते ही उसका चेहरा फूल-सा खल उठा।
2. माँ के हाथ क रोट गरम-गरम, रुई-सी मुलायम थी।
3. वह लड़का हरन-सा तेज़ दौड़ता है, कोई उसे पकड़ नह पाता।
4. बा रश के बाद खेत हरी चादर-से दखाई दे ने लगे।
5. गुरुजी क वाणी म गंगा-सी नमलता थी।
क वता के तीन उदाहरण भी दे ख ली जए —
“िक िजससे अमावस बने पूिणमा-सी” — अमावस पूिणमा जै सी उजली हो जाए
“िघरी आ रही है अमावस िनशा-सी” — अमावस रात जै सी िघर रही है
“स्वण-सी जल रही और जलती रहेगी” — लौ सोने जै सी चमकती हुई जल रही है
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो
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यह अलंकार का दरवाज़ा है: जब दो चीज़ क समानता ‘सा/सी/से’, ‘जैसा’, ‘समान’, ‘सदृश’ जैसे शब्द से
दखाई जाए, तो वहाँ उपमा अलंकार होता है। इसम चार बात रहती ह — जसक तुलना हो रही हैem
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l पं क्तय म उपमा
(लौ), जससे
तुलना हो रही.cहैo(स्वण), समानता का शब्द (सी) और साझा गुण (चमक)। क वता क इन g
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अलंकsारeहै।
तीन
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एक चेतावनी: ‘सा/सी/से’ हमेशा समानता के लए नह आते। “थोड़ा-सा पानी”, “बहुत-से लोग” म ये मात्रा बताते
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ह, तुलना नह । इस लए वाक्य बनाते समय जाँच ली जए क आपके वाक्य म सचमुच दो चीज़ क तुलना हो रही है
या नह ।
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आपक बात — पृष्ठ 69 और 70
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे अपनी बात
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प्र.1 (क) “रहेगा धरा पर दया एक भी य द / कभी तो नशा को सवेरा मलेगा” — य द हर व्य क्त अपना कतव्य
समझ ले और दूसर क भलाई के लए काय
s e mकरे तो पूरी दु नया सुंदर बन जाएगी। आप भी दूसर के लए
प्र त दन बहुत-से अ े काय करते lहaगे। अपने उन काय के बारे म बताइए।
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c o m
.
s e mतरीक़ा यह है —
यह आपके अपने जीवन का प्रश्न है, इस लए उत्तर भी आपका अपना होगा। पर अ ा उत्तर लखने का
शाmमल क जए —
क्या-क्याco
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छोटे और स े काम ल खए, बड़े-बड़े दावे नह । पानी पलाना, रास्ता बताना, कसी क गरी चीज़ उठाकर दे ना — ये सब
a ‘ दये’ ह।
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omक्या फ़ायदा हुआ — यही उत्तर क जान है। a
तीन जगह से उदाहरण ली जए — घर, वद्यालय, मुहल्ला/रास्ता। इससे उत्तर पूरा लगता है।
हर काम के साथ एक पं क्त म ल खए क उससे cकसे
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अंत म क वता से जोड़ द जए — बताइएsक
a emयही आपका ‘ दया’ है।
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कहाँ ऐसे काम जो सचमुच कए जा सकते ह
m
o, बीमार के पास बैठना
माँ के साथ काम में हाथ बँटाना, छोटे भाई-बहन को पढ़ ाना, दादा-दादी को अख़बार पढ़ कर सु.नcाना
s em
घर में
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िवcoालय में
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glकरना, क ा साफ़ रखना, नल बंद करना,
m . िजस साथी की कॉपी छू ट गई हो उसे अपनी कॉपी िदखाना, नए िव ाथ सेaबात
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क्ष
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िबजली बचाना
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पिक्षयों के िलए पानी रखना, पौधे में पानी डालना, बुज़गु को सड़ क पार कराना, कू ड़ ा कू ड़ ेद ान में डालना, िकसी को रास्ता
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मुहल्ले /रास्ते
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बताना
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नमूना उत्तर:
“म कोई बहुत बड़ा काम तो नह करता, पर कुछ छोटे काम रोज़ करता ँ। सुबह उठकर छत पर रखे मट्ट के कटोरे
म प क्षय के लए पानी भर दे ता ँ — ग मय म गौरैया और कबूतर दन भर वह आते रहते ह। स्कूल म मेरे साथ
बैठने वाले साथी क आँख कमज़ोर ह, इस लए म श्यामपट्ट पर लखी बात धीरे-धीरे बोलकर उसे लखवा दे ता ँ;
अब उसक कॉपी कभी अधूरी नह रहती। घर लौटते समय म दाद को अख़बार क मुख्य ख़बर पढ़कर सुनाता ँ,
क्य क उन्ह छोटे अक्षर दखाई नह दे ते — उस समय उनका चेहरा खल उठता है। और छु ट्ट के दन म छोट बहन
को गनती और पहाड़े याद कराता ँ।
मुझे लगता है ये सब बहुत छोटे -छोटे दये ह। पर क वता म भी तो यही कहा गया है — ‘रहेगा धरा पर दया एक भी
य द, कभी तो नशा को सवेरा मलेगा।’ इस लए म इन्ह जलाए रखना चाहता ँ।”
छोटे काम ही क्य लखने चा हए: क व ने भी बड़े-बड़े काम नह कहे — उन्ह ने कहा ‘ दया एक भी’। एक दये
क रोशनी कतनी-सी होती है! पर क वता क पूरी आशा उसी एक दये पर टक है। इसी तरह आपका उत्तर भी
छोटे , स े काम से ही सुंदर बनेगा।
प्र.2 (ख) इस क वता म नराश न होने, चुनौ तय का सामना करने और सबके सुख के लए काय करने के लए प्रे रत
कया गया है। य द आपको अपने कसी मत्र को नराश न होने के लए प्रे रत करना हो तो आप क्या करगे? क्या
कहगे? अपने समूह म बताइए।
इस प्रश्न के दो भाग ह — क्या करगे और क्या कहगे। दोन का उत्तर अलग-अलग द जए, तभी उत्तर पूरा होगा।
क. क्या करगे (काम) —
1. पहले सु नए, सलाह बाद म द जए। नराश मत्र को सबसे पहले यह चा हए क कोई उसक बात पूरी सुन ले।
2. उसे अकेला मत छो ड़ए। साथ बै ठए, साथ खे लए, साथ घर तक च लए।
3. उसक एक अ ाई याद दलाइए — कोई ऐसा काम जो उसने अ ा कया था।
4. समस्या को छोटे टु कड़ म बाँट द जए और एक छोटा-सा पहला क़दम साथ मलकर क जए — जैसे एक अध्याय साथ पढ़
लेना।
5. य द बात गंभीर लगे तो शक्षक या घर के बड़ को बताइए — यह चुगली नह , मदद है।
ख. क्या कहगे (बात) — उपदे श मत द जए। ‘तुम कमज़ोर हो’, ‘मने पहले ही कहा था’ जैसे वाक्य कभी मत बो लए।
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नमूना उत्तर:
“मेरा मत्र ग णत क परीक्षा म कम अंक आने से बहुत नराश था और कहने लगा क अब उससे ग णत कभी नह
होगा। मने पहले उसक पूरी बात सुनी, बीच म नह टोका। फर मने कहा —
‘एक परीक्षा तुम्हारा पूरा भ वष्य तय नह करती। याद है, पछली बार तुमने ही मुझे भन्न वाला सवाल समझाया था?
जसे भन्न आती है, उसे ग णत आती है — बस अभ्यास कम रह गया। चलो, आज से रोज़ आधा घंटा हम दोन साथ
बैठकर पाँच सवाल हल करगे। अगली बार दे खना क्या होता है।’
इसके बाद हम सचमुच रोज़ आधा घंटा साथ बैठने लगे। एक महीने बाद उसका आत्म वश्वास लौट आया। मुझे लगा
क यही ‘ दया जलाना’ है — बस दया मट्ट का नह , हम्मत का था।”
क वता इसम कैसे मदद करती है: क वता कहती है क तूफ़ान ने अन गनत द प बुझाए, फर भी कहानी ख़त्म नह
हुई — क्य क हर बार कोई फर से जला दे ता था। नराश मत्र का द प बुझा है; आपका काम उपदे श दे ना नह ,
अपने द ये से उसका द या जला दे ना है। क वता क पं क्त यह सच होती है — “मगर बुझ स्वयं ज्यो त जो दे गए
वे, उसी से त मर को उजेला मलेगा।”
प्र.3 (ग) क्या आपको कभी कसी ने कोई काय करने के लए प्रे रत कया है? कब? कैसे? उस घटना के बारे म
बताइए।
यह आपक अपनी स्मृ त का प्रश्न है। पर एक अ घटना सुनाने का ढाँचा हमेशा एक ही होता है —
क्रम क्या बताना है उदाहरण
1. कब घटना का समय और अवसर “िपछले वष, वािषक उ त्सव से एक स प्ताह पहले …”
2. क्या हुआ था वह त जसम आप हचक रहे थे या हार मान “मैं मंच पर बोलने से डरता था और नाम वापस ले ना चाहता
चुके थे था।”
3. िकसने पेिरत व्य क्त का नाम/ रश्ता “हमारी िहंद ी िशिक्षका ने…”
िकया
4. कै से िकया उन्ह ने क्या कहा और क्या कया — दोन “उ न्होंने डाँटा नही,ं रोज़ दस िमनट अभ्यास कराया और
कहा…”
5. िफर क्या हुआ प रणाम और आपके मन पर असर “मैंने भाषण िदया और अब मुझे मंच से डर नही ं लगता। ”
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नमूना उत्तर:
“ पछले वष वा षक उत्सव म मेरा नाम भाषण के लए लखा गया था। मुझे मंच से बहुत डर लगता था — सोचकर
ही हाथ-पैर ठं डे हो जाते थे। मने तय कर लया क नाम कटवा दूँ गा।
हमारी हद श क्षका ने जब यह सुना तो उन्ह ने डाँटा नह । उन्ह ने केवल इतना कहा — ‘ जस लड़के ने कक्षा म खड़े
होकर पूरी क वता सुना द थी, वह मंच पर क्य नह बोल सकता? वहाँ भी तो वही कक्षा बैठ होगी, बस थोड़ी बड़ी।’
फर उन्ह ने रोज़ अवकाश के समय दस मनट मुझसे अभ्यास कराया — पहले उनके सामने, फर पाँच ब के
सामने, फर पूरी कक्षा के सामने।
उत्सव के दन मने भाषण दया। हाथ थोड़ा काँपा ज़रूर, पर म पूरा बोला और सबने ता लयाँ बजाईं। उस दन मुझे
समझ आया क प्रेरणा वह नह होती जो कहे ‘डरो मत’, ब ल्क वह होती है जो छोटे -छोटे क़दम साथ चलकर
दखा दे । मेरी श क्षका ने वही कया — उन्ह ने मेरे भीतर का बुझा दया फर से जला दया।”
ऐसी घटना क्य लखवाई जाती है: क वता कहती है क द प अपने आप नह जलता — कोई उसे जलाता है। जब
आप अपने जीवन क ऐसी घटना याद करते ह, तो क वता कताब से नकलकर आपके अनुभव म उतर आती है।
और तब आपको यह भी समझ आता है क कल आपको कसी और का द या जलाना है।
अमावस्या और पू णमा — पृष्ठ 70 और 71
पाठ से आगे
पाठ से आगे जानकारी
प्र.1 (क) “भले श क्त व ान म है न हत वह / क जससे अमावस बने पू णमा-सी” — आप अमावस्या और पू णमा
के बारे म पहले ही पढ़ चुके ह। क्या आप जानते ह क अमावस्या और पू णमा के होने का क्या कारण है?
इसका कारण तीन बात म छपा है, और तीन पुस्तक ने स्वयं बता द ह —
1. चंद्रमा का अपना प्रकाश नह होता। वह सूय के प्रकाश से ही चमकता है।
2. चंद्रमा पृथ्वी क प रक्रमा करता है और पृथ्वी सूय क ।
3. इस लए सूय, पृथ्वी और चंद्रमा क आपसी त रोज़ बदलती रहती है — और हम चंद्रमा का उतना ही भाग दखता है
जतना सूय क ओर होकर हमारी तरफ़ पड़ता है।
तथ तीन क त हम क्या दखता है
अमावस्या चंद्रमा सूय और पृथ्वी के बीच म चंद मा का पकािशत भाग सूय की ओर होता है और पथ्ृ वी की ओर वाला भाग अँधेरे में रहता है
आ जाता है — इसिलए चाँद िदखाई ही नही ं दे ता।
पूिणमा पृथ्वी सूय और चंद्रमा के बीच म चंद मा का पूरा पकािशत भाग हमारे सामने होता है — इसिलए चाँद पूरा गोल िदखाई दे ता है।
होती है
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पक्ष क्या ह — चंद्रमा एक ही दन म पूरा नह हो जाता; उसक कलाएँ धीरे-धीरे घटती-बढ़ती ह। इसी से महीने के दो भाग बनते ह
—
पक्ष क्या होता है नाम का अथ कब से कब तक
शुक्ल पक्ष चंद्रमा क कलाएँ बढ़ती ह ‘शुक्ल ’ का एक अथ है ‘उजला’ अमावस्या के बाद से पू णमा तक
कृष्ण पक्ष चंद्रमा क कलाएँ घटती ह ‘कृ ष्ण’ का एक अथ है ‘काला’ पू णमा के बाद से अमावस्या तक
क वता से जो ड़ए: क व कहते ह क व ान म वह श क्त है “ जससे अमावस बने पू णमा-सी” — यानी व ान
घोर अँधेरे को पूरे उजाले म बदल सकता है। पर आगे वे यह भी पूछते ह क फर दु नया पर दन म ही अमावस जैसी
रात क्य घर रही है। यानी बात चाँद क नह , मनुष्य के मन क है — और मन का अँधेरा बजली से नह , स्नेह से
मटता है।
प्र.2 (ख) अब नीचे दए गए चत्र म अमावस्या, पू णमा, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को पहचा नए और ये नाम उपयुक्त
ान पर ल खए— (य द पहचानने म क ठनाई हो तो आप अपने शक्षक, प रजन या इंटरनेट क सहायता भी
ले सकते ह।)
पुस्तक (पृष्ठ 71) म छपा चत्र — चार पं क्तय म सात-सात करके चंद्रमा के अ ाईस चत्र।
पुस्तक के चत्र म चंद्रमा के 28 चत्र ह — सात-सात के चार क्रम (पं क्तयाँ)। इन्ह बाएँ से दाएँ, ऊपर से नीचे उसी क्रम म पढ़ना है
जैसे पुस्तक पढ़ते ह।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो
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चत्र म ान वहाँ चाँद कैसा दखता है
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. पूरी तरह काला — चाँद दखता ही नहa
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सबसे पहला िचत्र (पहली पंिक्त, बाएँ कोने में)
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gl और दू सरी पंिक्त के िचत्र (जहाँ उजाला दाईं ओर से बढ़
aपहली पतली-सी रेखा से बढ़ते-बढ़ते आधा और फर शुक्ल पक्ष
रहा है) लगभग पूरा
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e m पूरा गोल और सबसे चमक ला पूिणमा
aओरs
तीसरी पंिक्त के शुरू के िचत्र चाँ
तीसरी पंिक्त के अंत से चौथी पंिक्त तक (जहाँ उजाला g
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बाईं पूरे से घटकर आधा, फर पतली रेखा कृ ष्ण पक्ष
रह जाता है)
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सबसे अंितम िचत्र (चौथी पंिक्त, दाएँ कोने में) फर से पूरी तरह काला स्
om आसान नयम —
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पहचानने का
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aglय द चाँद का उजला भाग… तो वह क्य क
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दाईं ओर है और बढ़ रहा है शुक्ल पक्ष अमावस्या के बाद चाँद दाईं ओर से भरना शुरू होता है
कaृ ष्णse
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बाईं ओर बचा है और घट रहा है पक्ष पू णमा के बाद चाँद दाईं ओर से घटना शुरू होता है
पूर ा गोल है पूिणमा पूरा प्रका शत भाग हमारे सामने है
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िबल्कु ल नही ं है प्रका शत भाग दूसरी ओर है
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m वाले गोल चत्र से मलाइए: उसी पृष्ठ पर एक गोल चक्र भी बना है जसम ऊपर पू णमा, नीचे अमावस्या, a g
a s eऊपर
agl दाईं ओर कृष्णपक्ष और बाईं ओर शुक्लपक्ष लखा है। वही क्रम इस 28 चत्र वाले चत्र म सीधी पं क्तय म खुल
गया है — गोल घूमने के बजाय बाएँ से दाएँ चलता हुआ। दोन चत्र एक ही बात कह रहे ह।
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यह दे खकर ख़ुद जाँ चए: आज रात चाँद दे खए और नोट क जए क उजाला कस ओर है। फर त थपत्र म
दे खए क आज कृष्ण पक्ष है या शुक्ल। य द दोन बात मल गईं, तो सम झए आपने आकाश पढ़ना सीख लया।
यही काम हमारे यहाँ हज़ार साल से त थ गनने के लए होता आया है।
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तmथपत्र — पृष्ठ 72 और 73
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे ता लका
प्र.1 नीचे त थपत्र के एक महीने का पृष्ठ दया गया है (जनवरी 2023, 11-30 पौष 1-11 माघ, शक 1944)। इसे ध्यान
से दे खए और प्रश्न के उत्तर द जए— (क) दए गए महीने म कुल कतने दन ह?
दए गए महीने म कुल 31 दन ह।
त थपत्र म सबसे बड़ी संख्या 31 है — मंगलवार वाली पं क्त के अं तम खाने म (31, दशमी शुक्ल)। और महीने का नाम है जनवरी
2023।
पहला िदन = 1 जनवरी, रिववार
अंितम िदन = 31 जनवरी, मंगलवार
कु ल िदन = 31
याद रखने का तरीक़ा: जनवरी, माच, मई, जुलाई, अगस्त, अक्तूबर और दसंबर — इन सात महीन म 31 दन
होते ह। अप्रैल, जून, सतंबर और नवंबर म 30, और फ़रवरी म 28 (लीप वष म 29)।
प्र.2 (ख) पू णमा और अमावस्या कस दनाँक और वार को पड़ रही है?
त थपत्र म सीधे यही दो शब्द ढूँ ढ़ने ह — जहाँ कोई त थ का नाम नह , ब ल्क सीधे ‘पू णमा’ या ‘अमावस्या’ लखा है।
तथ दनाँक वार त थपत्र म कहाँ
पूिणमा 6 जनवरी 2023 शुक्रवार शुक्रवार वाली पं क्त का पहला खाना — “6, पू णमा”
अमावस्या 21 जनवरी 2023 शिनवार श नवार वाली पं क्त का तीसरा खाना — “21, अमावस्या”
जाँच क जए: पू णमा और अमावस्या के बीच लगभग आधा महीना होना चा हए। यहाँ 6 से 21 तक 15 दन ह —
बल्कुल ठ क। इससे पता चलता है क उत्तर सही है। य द आपको दोन के बीच 5 या 25 दन मल, तो सम झए
कह भूल हुई है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
एक और बात: 6 जनवरी के बाद 7 जनवरी से ‘प्र तपदा (कृष्ण)’ शुरू हो जाती है — यानी पू णमा के तुरंत बाद
कृष्ण पक्ष लग गया। और 21 जनवरी (अमावस्या) के बाद 22 जनवरी को ‘प्र तपदा (शुक्ल)’ है — यानी अमावस्या
के बाद शुक्ल पक्ष। यही वह नयम है जो आपने पछली ग त व ध म पढ़ा।
प्र.3 (ग) कृष्ण पक्ष क सप्तमी और शुक्ल पक्ष क सप्तमी म कतने दन का अंतर है?
दोन सप्त मयाँ त थपत्र म श नवार वाली पं क्त म ह —
कृ ष्ण पक्ष की सप्तमी = 14 जनवरी, शिनवार
शुक्ल पक्ष की सप्तमी = 28 जनवरी, शिनवार
अंत र = 28 − 14 = 14 िदन
उत्तर — 14 दन का अंतर है।
यह अपने आप जाँचा जा सकता है: दोन त थयाँ श नवार को ही पड़ रही ह। सप्ताह म सात दन होते ह,
इस लए एक ही वार दोबारा आने का मतलब है 7 का गुणज — यहाँ 14 = 7 × 2, यानी ठ क दो सप्ताह। त थपत्र म
एक ही पं क्त म आगे-पीछे के खाने हमेशा 7 दन के अंतर पर होते ह।
सोचने के लए: एक पक्ष 15 दन का होता है, फर दोन सप्त मय म 15 दन का अंतर क्य नह ? क्य क इस
महीने कृष्ण पक्ष म एक त थ का क्षय हो गया — 20 जनवरी को त्रयोदशी है और अगले ही दन 21 को अमावस्या;
बीच क चतुदशी कसी दन पर नह पड़ी। इसी लए अंतर 15 के बजाय 14 दन रह गया। त थयाँ सूय दय के समय
क त से तय होती ह, इस लए कभी-कभी एक त थ दो दन चलती है और कभी कोई त थ छू ट जाती है — जैसे
8 और 9 जनवरी, दोन दन ‘ तीया (कृष्ण)’ लखा है।
प्र.4 (घ) इस महीने म कृष्ण पक्ष म कुल कतने दन ह?
कृष्ण पक्ष पू णमा के अगले दन से शुरू होकर अमावस्या तक चलता है। त थपत्र म दे खए —
कृ ष्ण पक्ष का पहला िदन = 7 जनवरी (पितपदा, कृ ष्ण)
कृ ष्ण पक्ष का अंितम िदन = 21 जनवरी (अमावस्या)
कु ल िदन = 21 − 7 + 1 = 15 िदन
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
उत्तर — इस महीने कृष्ण पक्ष म कुल 15 दन ह (7 जनवरी से 21 जनवरी तक)।
दनाँक तथ दनाँक तथ
7 प्र तपदा (कृष्ण) 15 अष्टमी (कृष्ण)
8 तीया (कृष्ण) 16 नवमी (कृष्ण)
9 तीया (कृष्ण) 17 दशमी (कृष्ण)
10 तृतीया (कृष्ण) 18 एकादशी (कृष्ण)
11 चतुथ (कृष्ण) 19 ादशी (कृष्ण)
12 पंचमी (कृष्ण) 20 त्रयोदशी (कृष्ण)
13 षष्ठी (कृष्ण) 21 अमावस्या
14 सप्तमी (कृष्ण)
गनती का नयम: 7 से 21 तक कतने दन? केवल 21 − 7 = 14 करना ग़लत होगा, क्य क इससे पहला दन छू ट
जाता है। इस लए हमेशा अं तम − पहला + 1 क जए। जाँच भी कर ली जए — इस महीने शुक्ल पक्ष के दन ह 1 से
6 (6 दन) और 22 से 31 (10 दन), यानी 16 दन; 16 + 15 = 31, यानी पूरा महीना। उत्तर ठ क है।
प्र.5 (ङ) ‘वसंत पंचमी’ क त थ बताइए।
त थपत्र म गुरुवार वाली पं क्त के अं तम भरे खाने म लखा है — “26, वसंत पंचमी (शुक्ल)”।
प्रश्न उत्तर
िदनाँक 26 जनवरी 2023
वार गुरुवार
ितिथ पंचमी, शुक्ल पक्ष
भारतीय मास माघ — अथ त माघ शुक्ल पंचमी
माघ मास कैसे पता चला — त थपत्र के शीषक म लखा है “11-30 पौष, 1-11 माघ, शक 1944”। यानी 1 से 20 जनवरी तक
पौष मास (11 से 30 पौष) है और 21 से 31 जनवरी तक माघ मास (1 से 11 माघ)। 26 जनवरी माघ म आता है, इस लए यह माघ
शुक्ल पंचमी हुई।
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जानने योग्य: वसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन का उत्सव है और इस दन वद्या क दे वी सरस्वती क पूजा क
जाती है। इसी दन 2023 म 26 जनवरी — गणतंत्र दवस — भी पड़ा था। ध्यान द जए, अं ेज़ी त थ हर साल एक
ही रहती है (26 जनवरी), पर वसंत पंचमी क अं ेज़ी त थ हर साल बदलती है — क्य क वह चंद्रमा क त थ से
तय होती है, सूय के कैलडर से नह ।
आज क पहेली — पृष्ठ 73 और 74
पाठ से आगे
पाठ से आगे पहे ली
प्र.1 “समय साक्षी है क जलते हुए द प / अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” — ‘पवन’ शब्द का अथ है हवा। नीचे एक
अक्षर-जाल दया गया है। इसम ‘पवन’ के लए उपयोग कए जाने वाले अलग-अलग नाम या शब्द छपे ह।
आपको उन्ह खोजकर उन पर घेरा बनाना है, जैसा एक हमने पहले से बना दया है। दे खते ह, आप कतने सही
नाम या शब्द खोज पाते ह।
अक्षर-जाल 5 × 5 का है। पुस्तक म हवा पर घेरा पहले से बना है। इसम कुल सात शब्द छपे ह — कुछ आड़े (बाएँ से दाएँ) और
कुछ खड़े (ऊपर से नीचे)।
दया गया अक्षर-जाल —
पं क्त 1 2 3 4 5
पहली बा द ल ई ब
दू स री प अ िन ल या
तीसरी व क स मी र
चौथी न ह वा यु ब
पाँचवी ं मा रु त स ड़
छपे हुए शब्द —
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो
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co m
m.
शब्द कहाँ छपा है दशा
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हवा
.co
चौथी पं क्त, दूसरा और तीसरा खाना (ह + वा)
a g l
आड़ा — यही पुस्तक म घेरा हुआ है
m
पवन ase पहले खाने म ऊपर से नीचे — दूसरी, तीसरी, चौथी पं क्त (प + व + न)
agl
खड़ा
अिनल दूसरी पं क्त, दूसरे से चौथे खाने तक (अ + न + ल) आड़ा
co m
समीर
em
तीसरी पं क्त, तीसरे से पाँचव खाने तक (स + मी + र) . आड़ा ag
g l as
वायु
a
चौथी पं क्त, तीसरा और चौथा खाना (वा + यु) आड़ा
मारुत
co m
पाँचव पं क्त, पहले से तीसरे खाने तक (मा + रु + त) आड़ा
e m.
com as
बयार
l
पाँचव खाने म ऊपर से नीचे — पहली, दूसरी, तीसरी पं क्त (ब + या + र) खड़ा
. a g
a s em
agl
शब्द अथ / वशेषता अपना एक वाक्य
s
हवा सबसे आम शब्द, रोज़ क बोलचाल का आज हवा तेज़ चल रही है।
m a
m .co agl
ase
पवन क वता का शब्द; इसी से ‘पवनपुत्र’ बना सुबह की शीतल पवन मन को भा गई।
वायु वै ा नक और शुद्ध रूप agl पेड़ों से हमें शुद्ध वायु िमलती है।
अिनल संस्कृत शब्द; लोग के नाम म भी चलता है अिनल के झोंके से दीपक काँप उठा।
co m
m .
नदी िकनारे बहता समीरseबहुत सुहावना था।
.co
m gla
समीर मंद और सुखद हवा के लए
m a
l a se मारुत वेगवाली हवा; वायुदेव का भी नाम मा त के वेग से पेड़ झूम उठे ।
रु
ag आम के बौर की महक बयार में घुल ी थी।
m
बयार धीमी, ठं डी हवा — लोकभाषा का सुंदर शब्द
a se
.com a g l
m
ase
एक जाल से ब चए: पहली पं क्त म ‘बा-द-ल’ पढ़कर बादल बनता ज़रूर है, पर बादल हवा का नाम नह है —
a gl
वह तो आकाश म छाने वाला मेघ है। पहेली म ऐसे शब्द जानबूझकर रखे जाते ह ता क आप केवल शब्द न ढूँ ढ़, अथ
भी जाँच। इसी तरह बचे हुए अक्षर (ई, क, ब, स, ड़) भी केवल जगह भरने के लए ह।
. com
खोजने का तरीक़ा: पहले हर पं क्त को बाएँ से दाएँ प ढ़ए, फर हर खाने को ऊपरeसेmनीचे। दो-अक्षर वाले शब्द
c o l asके नाम पहले काग़ज़ पर लख
mवायु) सबसे पहले मल जाते ह, उनसे आत्म वश्वास बढ़ता है। पाँच-छहgहवा
.
m ली जए — फर उन्ह को जाल म ढूँ ढ़ना बहुत आसान हो जाता है। a
se
(हवा,
g l a
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e m . co agl
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खोजबीन के लए — पृष्ठ 74
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे प रयोजना
प्र.1 क वता संबं धत कुछ रचनाएँ द गई ह, इन्ह पुस्तक म दए गए क्यू.आर. कोड क सहायता से पढ़, दे ख व समझ।
• हम सब सुमन एक उपवन के • बढ़े चलो • रोज़ बदलता कैसे चाँद भाग 1 • रोज़ बदलता कैसे चाँद भाग 2
पुस्तक के पहले पृष्ठ पर बने क्यू.आर. कोड को अपने शक्षक या घर के बड़ क सहायता से मोबाइल से स्कैन क जए। नीचे बताया
गया है क हर रचना म क्या दे खना-सुनना है और उसे इस पाठ से कैसे जोड़ना है।
रचना यह क्या है इस पाठ से क्या जुड़ता है दे खते-सुनते समय यह नोट
क जए
हम सब सुमन इसी पाठ के क व ा रका प्रसाद यहाँ भी वही बात है — सब िमलकर रहे,ं क व कस चीज़ को कस चीज़
एक उपवन के माहेश्वरी का सबसे लोक प्रय गीत — एक -दू स रे के िलए िजएँ। ‘जलाते चलो’ का प्रतीक बना रहे ह — ब
पाठ म ‘क व से प रचय’ म इसका का ‘स्नेह’ इस गीत में ‘एक उपवन’ को ‘सुमन’ और दे श/समाज को
नाम आया है। बनकर आया है। ‘उपवन’।
बढ़ े चलो आगे बढ़ते रहने क प्रेरणा दे ने वाला ‘जलाते चलो’, ‘बहाते चलो’ और ‘बढ़ े इसम भी रुकने के बजाय चलते
गीत। चलो’ — तीनों में वही ‘चलो’ है, िजस पर रहने पर ज़ोर है या नह — और
आपने ‘अथ की बात’ में चच की थी। कन शब्द से।
रोज़ बदलता चंद्रमा क कलाओं को दखाने वाली ‘अमावस्या और पूिणमा’ वाली गितिविध चंद्रमा, पृथ्वी और सूय क त
कै से चाँद — दृश्य-साम ी। इसी से पूरी तरह समझ आएगी। कैसे बदलती है — और तभी चाँद
भाग 1 घटता-बढ़ता क्य दखता है।
रोज़ बदलता पहले भाग का अगला हस्सा। कृ ष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का अंतर तथा शुक्ल पक्ष म उजाला कस ओर
कै से चाँद — ितिथपत्र की ितिथयाँ समझने में सहायक। से बढ़ता है और कृष्ण पक्ष म
भाग 2 कस ओर से घटता है।
दे खने-सुनने के बाद यह क जए —
1. दोन गीत क एक-एक पं क्त अपनी लेखन-पु स्तका म ल खए जो आपको सबसे अ लगी, और साथ म एक वाक्य म
कारण भी।
2. तुलना क जए: ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ और ‘जलाते चलो’ — दोन म क व कस बात पर ज़ोर दे रहे ह? क्या दोन क
बात एक ही है?
3. चाँद वाली साम ी दे खने के बाद एक सप्ताह तक रोज़ रात को चाँद दे खए और एक छोट -सी चत्र-डायरी बनाइए — त थ,
चाँद का आकार और यह क उजाला कस ओर था।
4. कक्षा म सुनाइए: ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ को समूह म मलकर गाइए — यह गीत मलकर गाने के लए ही बना है।
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कक्षा 6 हद अध्याय 7 जलाते चलो AglaSem · NCERT Solutions
ये चार रचनाएँ साथ क्य द गई ह: दो क वता क ओर ले जाती ह (उसी क व का गीत और ‘चलो’ वाली प्रेरणा)
और दो व ान क ओर (चाँद क कलाएँ)। यही इस पाठ क सबसे सुंदर बात है — एक क वता ने सा हत्य और
व ान दोन के दरवाज़े एक साथ खोल दए। क वता क पं क्त भी यही कहती है — “भले श क्त व ान म है न हत
वह।”
अध्याय — एक नज़र म
क वता का नाम ‘जलाते चलो’ और क व ह ा रका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998)। बाल सा हत्य के च चत रचनाकार म
इनका नाम प्रमुखता से लया जाता है। इनका लखा गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ आज भी बहुत लोक प्रय है।
क वता कससे कही गई है — पूरी क वता म क व ‘तुम’ कहकर मनुष्य को पुकारता है। वही मनुष्य, जसने युग पहले
पहला द प जलाकर अँधेरे को पहली चुनौती द थी — “जला द प पहला तुम्ह ने त मर क , चुनौती प्रथम बार स्वीकार क
थी।”
मुख्य भाव — द प जलाते चलो, यानी दूसर क भलाई के काम करते चलो। तूफ़ान अन गनत द प बुझा चुका है, फर भी हार
द प क नह हुई — क्य क बुझने वाला द प भी अपनी ज्यो त दूसरे को दे जाता है।
प्रतीक — क वता म ‘द प, ज्यो त, लौ, सवेरा, पू णमा’ अ ाई, ान और आशा के प्रतीक ह; ‘ त मर, नशा, अमावस,
तूफ़ान’ दुख, अ ान, बुराई और नराशा के। इसी लए ‘ नशा’ का अथ यहाँ केवल ‘रात’ और ‘सवेरा’ का अथ केवल ‘सुबह’
नह है।
एक चेतावनी भी है — “ बना स्नेह वद्युत- दये जल रहे जो, बुझाओ इन्ह, य न पथ मल सकेगा।” व ान ने बजली के
उजाले तो दे दए, पर जस उजाले म प्रेम न हो, वह रास्ता नह दखा सकता। इसी लए क व पूछता है — दन म ही दु नया पर
अमावस जैसी रात क्य घर रही है?
रचना क वशेषता — क वता 2–4, 2–4 के क्रम म बँट है, हर पं क्त को गाने-बोलने म लगभग समान समय लगता है, और
‘ मटे गा – मलेगा – सकेगा – मलेगा’ जैसी एक-सी तुक बार-बार लौटती है। ‘पू णमा-सी’, ‘ नशा-सी’, ‘स्वण-सी’ म उपमा
अलंकार है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
क वता का क वता म अथ क वता म कहाँ आया है अपना एक वाक्य
शब्द
त मर अँधे र ा, अंध कार; यहाँ दुख-अ ान का “कभी तो त मर का कनारा मलेगा॥” ान का द पक जलते ही मन का
पतीक त मर मट जाता है।
नशा रात; यहाँ िनराशा और बुरे समय का “कभी तो नशा को सवेरा मलेगा॥” दुख क नशा कतनी भी लंबी हो,
पतीक सवेरा आता ज़रूर है।
अमावस अमावस्या — वह रात िजसमें चंद मा “ घरी आ रही है अमावस नशा-सी।” अमावस क रात म तारे और भी
िदखाई नही ं दे ता चमक ले लगते ह।
पू णमा पूणमासी — वह ितिथ िजस रात “ क जससे अमावस बने पू णमा-सी,” पू णमा क रात नद का पानी चाँद -
चंद मा पूर ा िदखाई दे ता है सा चमकता है।
स रत नदी (सिरता का काव्य-रूप) “ त मर क स रत पार करने तुम्ह ने” गाँव के पास बहती स रत ही हमारी
प्यास बुझाती है।
धरा धरती, पथ्ृ वी “कभी तो धरा का अँधेरा मटे गा।” वषा होते ही धरा हरी चादर ओढ़ लेती
है।
स्नेह (1) दीपक का तेल , (2) पेम — दोनों “जलाते चलो ये दये स्नेह भर-भर” माँ के स्नेह से बड़ा कोई सहारा नह ।
अथ एक साथ
ज्यो त दीपक की लौ, पकाश “मगर बुझ स्वयं ज्यो त जो दे गए वे” एक द पक क ज्यो त से सौ द पक
जल सकते ह।
उजेला उजाला, पकाश (उजाला का काव्य- “उसी से त मर को उजेला मलेगा॥” खड़क खुलते ही कमरे म उजेला
रूप) भर गया।
अन गन / िजन्हे ं िगना न जा सके , असंख्य “ दये अन गनत है नरंतर जलाए”, “अन गन आकाश म अन गनत तारे टम टमा
अन गनत तुम्हारे पवन ने बुझाए।” रहे थे।
स्वण सोना; यहाँ लौ की सुनहरी चमक “स्वण-सी जल रही और जलती रहेगी।” सूयास्त के समय आकाश स्वण-सा
दखता है।
शला च ान, बड़ा पत्थर “युग से तुम्ह ने त मर क शला पर” नद के बीच पड़ी शला पर बगुला
बैठा था।
साक्षी गवाह “समय साक्षी है क जलते हुए द प” यह पुराना बरगद गाँव के सौ वष का
साक्षी है।
न हत िछपा हुआ , समाया हुआ “भले श क्त व ान म है न हत वह” इस छोट -सी कहानी म बड़ी सीख
न हत है।
पवन हवा, वायु “अन गन तुम्हारे पवन ने बुझाए।” सुबह क ठं डी पवन मन को ताज़ा
कर दे ती है।
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